शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

नोएडा में युवा टेकी की मौत: किसकी जिम्मेदारी?

नोएडा, जो उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख औद्योगिक और आईटी हब है, हाल ही में एक दुखद घटना से सुर्खियों में आया। 17 जनवरी 2026 को, 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत हो गई। मौत का कारण उनकी कार का एक निर्माण स्थल पर पानी से भरे गड्ढे में गिर जाना। यह घटना युवराज के परिवार के लिए न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और आपदा प्रबंधन की विफलता का जीता-जागता उदाहरण भी है। नोएडा के जिला प्रशासन और विभिन्न आपदा लड़ने वाली एजेंसियां इस मौत के लिए उतनी ही जिम्मेदार हैं, जितना कि बिल्डर। मामला अब एक विशेष जांच टीम (एसआईटी) के बीच जूझ रहा है। सवाल है कि ऐसे मामलों में अदालतों को क्या करना चाहिए जिससे कि एक मिसाल कायम हो।
 
युवराज मेहता गुड़गांव से लौट रहे थे, जब बारिश और कोहरे के कारण सेक्टर 150, में एक निर्माण स्थल पर उनकी कार 20 फीट गहरे पानी भरे गड्ढे में गिर गई। यह गड्ढा एक व्यावसायिक परियोजना के बेसमेंट के लिए खोदा गया था, लेकिन बारिश के पानी से भर गया था। कोई बैरिकेडिंग नहीं थी, रोशनी अपर्याप्त थी जिस कारण उनकी कार सीधा पानी में जा गिरी। युवराज के पिता के अनुसार उनका बेटा दो घंटे तक संघर्ष करता रहा, लेकिन बचाव टीम की लापरवाही के कारण उसे बचाया नहीं जा सका। यह घटना कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टेमेटिक फेलियर का नतीजा है।
 

अब सवाल यह है कि जिला प्रशासन की भूमिका क्या है? नोएडा अथॉरिटी, जो शहर की योजना और विकास के लिए जिम्मेदार है, ने निर्माण स्थल की निगरानी में घोर लापरवाही बरती। खाली जमीनों पर निर्माण कार्य की अनुमति देते समय, अथॉरिटी को सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए। लेकिन यहां, गड्ढा खोदने के बाद कोई सुरक्षा उपाय नहीं किए गए। बारिश के मौसम में पानी भरने की संभावना स्पष्ट थी, फिर भी कोई निरीक्षण नहीं हुआ। क्या अथॉरिटी के अधिकारियों को पहले से शिकायतें नहीं मिली थीं? स्थानीय निवासियों ने कई बार जलभराव और असुरक्षित साइटों की शिकायत की, लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया गया। क्या यही लापरवाही सीधे तौर पर मौत का कारण बनी?
 
इसके अलावा, आपदा लड़ने वाली एजेंसियां जैसे फायर ब्रिगेड, पुलिस और एनडीआरएफ की प्रतिक्रिया अप्रभावी थी। घटना के बाद दो घंटे तक युवराज संघर्ष करते रहे, लेकिन बचाव अभियान में देरी हुई। कोई उचित उपकरण नहीं थे और समन्वय की कमी थी। क्या ये एजेंसियां आपदा प्रबंधन के लिए तैयार नहीं थीं? नोएडा जैसे शहर में, जहां भारी बारिश आम है, ड्रेनेज सिस्टम और आपातकालीन प्रतिक्रिया को मजबूत होना चाहिए। लेकिन यहां, रोड सेफ्टी, ड्रेनेज और डिजास्टर रिस्पॉन्स सभी विफल हो गए। एसआईटी की प्रारंभिक जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि यह कोई फ्रीक एक्सीडेंट नहीं, बल्कि मल्टीपल सिस्टम फेलियर था। जिला प्रशासन ने इन एजेंसियों की निगरानी नहीं की, जिससे वे लापरवाह बनी रहीं।
 
गौरतलब है कि केवल बिल्डर को ही दंडित क्यों किया जा रहा है? पुलिस ने लोटस ग्रीन्स और एमजेड विजटाउन प्लानर्स के डायरेक्टर्स अभय कुमार, रवि बंसल और सचिन कर्णवाल को गिरफ्तार किया है। उन पर आईपीसी की धारा 105 (गैर-इरादतन हत्या), 106 (लापरवाही से मौत) और 125 (जीवन खतरे में डालना) के तहत आरोप लगे हैं। एक अलग एफआईआर में पर्यावरण उल्लंघन के लिए भी मामला दर्ज हुआ है। निश्चित रूप से, बिल्डर ने साइट को फेंस नहीं किया, जो उनकी जिम्मेदारी थी। लेकिन क्या प्रशासन निर्दोष है? नोएडा अथॉरिटी के अधिकारियों ने निर्माण अनुमति दी, लेकिन नियमित निरीक्षण नहीं किया। खाली जमीन की स्थिति को जानते हुए भी, उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। क्या ये अधिकारी भी लापरवाही के दोषी नहीं? केवल बिल्डर को निशाना बनाना एक आसान तरीका है, लेकिन असली समस्या प्रशासनिक विफलता है। अगर अधिकारी जिम्मेदार नहीं ठहराए गए, तो ऐसी घटनाएं दोहराई जाएंगी।
 
जानकारों की मानें तो, खाली जमीन की स्थिति को नजरअंदाज करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी स्पष्ट है। नोएडा में कई निर्माण साइटें हैं, जहां गड्ढे खुले छोड़ दिए जाते हैं। अथॉरिटी को इनकी मॉनिटरिंग करनी चाहिए, लेकिन भ्रष्टाचार और लापरवाही के कारण ऐसा नहीं होता। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी पर्यावरणीय उल्लंघनों पर ध्यान दिया है। क्या अथॉरिटी के सीईओ को हटाना पर्याप्त है? नहीं, व्यक्तिगत जवाबदेही तय होनी चाहिए। अधिकारियों पर भी एफआईआर दर्ज होनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने सुरक्षा मानकों को लागू नहीं किया। यह मौत केवल बिल्डर की गलती नहीं, बल्कि प्रशासन की मिलीभगत का नतीजा है।
 
कोर्ट चाहें तो इस मामले में कोर्ट के पास एक मिसाल कायम करने का अवसर है। सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट को स्वत: संज्ञान लेना चाहिए और एक व्यापक जांच आदेशित करनी चाहिए। दोषी अधिकारियों पर आईपीसी की समान धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जाए। जुर्माना और जेल की सजा के अलावा, सस्पेंशन और डिमोशन जैसे प्रशासनिक दंड भी लगाए जाएं। अदालतें निर्देश दें कि सभी निर्माण साइटों पर अनिवार्य बैरिकेडिंग, लाइटिंग और ड्रेनेज हो। साथ ही, आपदा प्रबंधन के लिए एक स्वतंत्र ऑडिट सिस्टम स्थापित किया जाए। दिल्ली में कोचिंग सेंटर बेसमेंट डूबने की घटना की तरह, यहां भी सख्त कार्रवाई से भविष्य की त्रासदियां रोकी जा सकती हैं। अदालतों का हस्तक्षेप जवाबदेही सुनिश्चित करेगा और आम आदमी का विश्वास बहाल करेगा।
 
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश पर गठित एसआईटी, जिसमें मेरठ डिविजनल कमिश्नर, एडीजी मेरठ जोन और पीडब्ल्यूडी चीफ इंजीनियर शामिल हैं, ने नोएडा अथॉरिटी अधिकारियों से पूछताछ की है। प्रारंभिक निष्कर्ष बताते हैं कि रोड सेफ्टी, ड्रेनेज, डिजास्टर रिस्पॉन्स और कमांड कंट्रोल में विफलताएं थीं। एसआईटी की रिपोर्ट संभवत: प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश करेगी, जिसमें सस्पेंशन और कानूनी कार्यवाही शामिल होगी। यह रिपोर्ट पर्यावरणीय उल्लंघनों पर भी फोकस करेगी, जिससे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की कार्रवाई तेज होगी। यदि एसआईटी निष्पक्ष रही, तो यह केवल बिल्डरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सिस्टेमिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त करेगी। लेकिन अगर राजनीतिक दबाव पड़ा, तो यह एक और सफेद हाथी साबित हो सकती है।
 
यह घटना हमें याद दिलाती है कि विकास की दौड़ में सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। युवराज जैसे युवाओं की मौत व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। प्रशासन को जवाबदेह बनाना जरूरी है, ताकि नोएडा सचमुच एक स्मार्ट सिटी बने, न कि लापरवाही का शिकार। सरकार, अदालतें और समाज को मिलकर ऐसी त्रासदियों को रोकना होगा।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

साइबर अपराध का बढ़ता आतंक और लाचार सरकारी तंत्र!

साइबर अपराध आज की डिजिटल दुनिया में एक ऐसी महामारी बन चुका है जो न केवल आम आदमी की मेहनत की कमाई को चंद मिनटों में उड़ा देता है, बल्कि समाज के सबसे कमजोर वर्गों: बुजुर्गों और अशिक्षितों को भी अपना शिकार बना लेता है। हाल ही में दिल्ली के ग्रेटर कैलाश इलाके में रहने वाले एक बुजुर्ग एनआरआई दंपत्ति, ओम तनेजा और डॉ. इंदिरा तनेजा, के साथ हुई घटना इसकी एक दर्दनाक मिसाल है। यह दंपत्ति अमेरिका से 2014 में अपनी मातृभूमि की सेवा करने के इरादे से भारत लौटे थे, लेकिन साइबर ठगों ने उन्हें ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर दो सप्ताह से अधिक समय तक मानसिक रूप से प्रताड़ित कर 14.85 करोड़ रुपये ठग लिए। यह दिल्ली में हुई अब तक के सबसे बड़े साइबर फ्रॉड मामलों में से एक है, जहां ठगों ने खुद को दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई), मुंबई पुलिस और सीबीआई अधिकारी बताकर दंपत्ति को मनी लॉन्ड्रिंग और ड्रग्स से जुड़े झूठे आरोपों में फंसाया। इस घटना ने न केवल इस दंपत्ति की जीवनभर की बचत छीन ली, बल्कि पूरे देश में साइबर सुरक्षा की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। 


इस मामले में मुंबई पुलिस और सीबीआई के फर्जी अधिकारियों ने उन्हें डर धमका कर ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखा, जहां वे घर से बाहर नहीं निकल सकते थे और लगातार निगरानी में रहने को मजबूर थे। ठगों ने धमकी दी कि अगर वे सहयोग नहीं करेंगे, तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा और उनके बच्चे भी फंस जाएंगे। दंपत्ति, जो शिक्षित और अमेरिका में दशकों तक काम कर चुके थे, डर के मारे इनकी हर गैरकानूनी शर्तों पर सहमत हो गए। उन्होंने अपनी म्यूचुअल फंड और बचत खातों से 8 अलग-अलग ट्रांसफर में 14.85 करोड़ रुपये ‘वेरिफिकेशन’ के नाम पर ठगों के खातों में ट्रांसफर कर दिए, जिसमें हर ट्रांसफर लगभग 2 करोड़ का हुआ।

गौरतलब है कि यह कोई इकलौता मामला नहीं है, भारत में ‘डिजिटल अरेस्ट’ घोटाले की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2022 से 2024 के बीच ऐसे मामले तीन गुना बढ़कर 1,23,000 हो गए और पीड़ितों से करोड़ों रुपये ठगे गए। उदाहरण के तौर पर, मुंबई में एक 86 वर्षीय महिला से 20 करोड़ रुपये ठगे गए, जहां ठगों ने खुद को अधिकारियों के रूप में पेश किया। बेंगलुरु में एक महिला टेकी से 32 करोड़ रुपये की ठगी हुई, जो इनसाइडर ट्रेडिंग और इन्वेस्टमेंट स्कैम से जुड़ी थी। मुंबई में एक 72 वर्षीय व्यवसायी और उनकी पत्नी से 58 करोड़ रुपये उड़ाए गए, जहां ठगों ने उन्हें दो महीने तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखा। दिल्ली में ही एक और बुजुर्ग व्यवसायी महिला से 6.9 करोड़ रुपये ठगे गए। ये मामले दिखाते हैं कि ठग बुजुर्गों और शिक्षितों को निशाना बनाते हैं, क्योंकि वे डर और अकेलेपन का फायदा उठाते हैं। कुल मिलाकर, 2025 में केवल दिल्ली में ही 1,250 करोड़ रुपये की साइबर ठगी हुई और पूरे भारत में 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ। 

सवाल उठता है कि आज के टेक्निकल युग में देश का सिस्टम क्यों फेल हो रहा है? अपराधी मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया कंबोडिया, म्यांमार, लाओस और चीन से ऑपरेट करते हैं, जहां वे भारतीयों को ट्रैफिक कर ‘स्लेव कंपाउंड्स’ में साइबर अपराध करवाते हैं। फ़र्ज़ी कॉल्स, फेक आईडी और एआई का इस्तेमाल कर वे भारतीय सिस्टम को चकमा देते हैं। जानकारों के अनुसार, भारतीय पुलिस में कुशल कर्मचारियों की कमी, पुरानी इंफ्रास्ट्रक्चर और कानूनी खामियां इसका एक बड़ा कारण हैं। जांच धीमी है, क्योंकि अपराध सीमा पार से हो रहे हैं और पैसा विदेशी खातों में जाता है। बैंक वाले ट्रांसफर को रोकने में असफल रहते हैं, क्योंकि पीड़ित खुद ही पैसा ट्रांसफर करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि बिना अंतरराष्ट्रीय सहयोग के अपराधियों को पकड़ना मुश्किल है। अपराधी कम जोखिम में ज्यादा कमाई करते हैं और पकड़े जाने की दर काफ़ी कम है।

सोचने वाली बात है कि क्या सरकार केवल जागरूकता फैलाने तक ही सीमित है? नहीं, लेकिन सरकार द्वारा किए जाने वाले प्रयास अपर्याप्त हैं। गृह मंत्रालय ने इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) स्थापित किया है, जहां नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) और हेल्पलाइन 1930 काम करते हैं। अब तक 9.42 लाख सिम और 2.63 लाख आईएमईआई ब्लॉक किए गए। सिटीजन फाइनेंशियल साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग सिस्टम ने 5,489 करोड़ रुपये बचाए। प्रधानमंत्री ने ‘मन की बात’ में जागरूकता फैलाई और विज्ञापन, रेडियो, मेट्रो में अभियान चलाए। 26 दिसंबर 2025 को इंटर-डिपार्टमेंटल कमिटी बनी, जो गूगल, व्हाट्सऐप जैसी कंपनियों के साथ मिलकर काम कर रही है। फाइनेंशियल फ्रॉड के लिए नई एसओपी बनी और एआई-बेस्ड फ्रॉड डिटेक्शन पर जोर दिया जाने लगा। लेकिन शायद इतना सब भी काफी नहीं। इसके लिए कड़े चेक सिस्टम होने चाहिए। बैंक में असामान्य ट्रांसफर पर अलर्ट और अंतरराष्ट्रीय समझौतों जैसे यूएन साइबरक्राइम ट्रीटी को दृढ़ करना भी ज़रूरी है।

गौरतलब है कि ऐसे में आम आदमी क्या करे? सबसे पहले, याद रखें कि भारत में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई कानून नहीं है। कोई कॉल आए तो उसकी जाँच करें, पुलिस स्टेशन जाकर सूचना दें और इसे चेक करें। किसी भी स्थिति में पैसे ट्रांसफर न करें, ओटीपी शेयर न करें। अपने घर परिवार में बुजुर्गों को शिक्षित करें, अकेले न छोड़ें। सरकारी जागरूकता अभियान के अनुसार यदि आप भी साइबर फ्रॉड के शिकार होते हैं तो तुरंत 1930 पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें। बैंक को सूचित कर ट्रांसफर फ्रीज करवाएं। एफआईआर दर्ज कराएं और कोर्ट ऑर्डर से पैसा वापस पा सकते हैं। जैसे कि बेंगलुरु में एक दंपत्ति ने अपने 1.4 करोड़ रिकवर किए। जागरूकता फैलाएं, क्योंकि परहेज इलाज से बेहतर होता है। ऐसी घटनाएँ साइबर अपराध की गंभीरता दर्शाती है। सरकार को जागरूकता से आगे बढ़कर सख्त चेक सिस्टम, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और तकनीकी अपग्रेडेशन पर फोकस करना चाहिए। अन्यथा, ‘डिजिटल इंडिया’ का सपना एक डरावना सपना बन जाएगा। आम आदमी की सुरक्षा राज्य की जिम्मेदारी है, समय है कड़े कदम उठाने का।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: क्या हो समाधान?

भारत में आवारा कुत्तों की समस्या एक गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य संकट बन चुकी है, जो न केवल नागरिकों के जीवन को प्रभावित कर रही है बल्कि पशु कल्याण के सवाल भी उठा रही है। दुनिया के किसी अन्य देश में यह समस्या इतनी विकराल रूप नहीं लेती जितनी भारत में। अनुमानों के अनुसार, भारत में आवारा कुत्तों की संख्या 3 से 6 करोड़ तक है, जो विश्व में सबसे अधिक है। जबकि अमेरिका, ब्राजील और चीन जैसे देशों में कुत्तों की कुल संख्या अधिक है, लेकिन आवारा कुत्तों का अनुपात भारत जितना नहीं। रेबीज से होने वाली मौतों का 36 प्रतिशत हिस्सा भारत में है और हर साल लाखों लोग कुत्तों के काटने से प्रभावित होते हैं। यह समस्या क्यों इतनी गंभीर है? इसका कारण हमारी सांस्कृतिक परंपराएं, अपर्याप्त स्वच्छता व्यवस्था और कानूनी ढांचे की कमी है। लोग धार्मिक भावनाओं से कुत्तों को भोजन देते हैं, लेकिन इससे उनकी संख्या अनियंत्रित रूप से बढ़ती जाती है। अन्य देशों जैसे नीदरलैंड्स में ‘कलेक्ट, न्यूटर, वैक्सीनेट एंड रिटर्न’ नीति से आवारा कुत्तों को समाप्त कर दिया गया है, बिना किसी हत्या के। भारत में भी ऐसी नीतियां हैं, लेकिन क्रियान्वयन की कमी है।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया है। जनवरी 2026 में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य सरकारों को चेतावनी दी कि हर कुत्ते के काटने, मौत या चोट के लिए भारी मुआवजा तय किया जाएगा, खासकर बच्चों और बुजुर्गों के मामलों में। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारें कुछ नहीं कर रही हैं और पिछले पांच सालों में पशु जन्म नियंत्रण नियमों का पालन नहीं हुआ। इसके अलावा, कुत्तों को भोजन देने वालों को भी जिम्मेदार ठहराया जाएगा। कोर्ट ने सुझाव दिया कि अगर कोई कुत्तों की देखभाल करना चाहता है, तो उन्हें अपने घर ले जाएं, न कि सड़कों पर छोड़कर लोगों को डराएं।  कोर्ट ने स्कूलों, अस्पतालों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थलों से आवारा कुत्तों को हटाने और शेल्टर में रखने का आदेश दिया है, लेकिन उन्हें वापस उसी जगह न छोड़ने की हिदायत दी। यह सख्ती आवश्यक है क्योंकि कुत्तों के हमलों से हर साल हजारों लोग प्रभावित होते हैं और रेबीज जैसी घातक बीमारी फैलती है। कोर्ट का यह कदम मानव सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल अदालती हस्तक्षेप से समस्या हल हो जाएगी? नहीं, इसके लिए समाज, पशु प्रेमियों और कॉर्पोरेट जगत की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।

पशु प्रेमी इस समस्या के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे आवारा कुत्तों की समस्या को खत्म करने के लिए शांतिपूर्ण वातावरण बनाने में मदद कर सकते हैं। सबसे पहले, जिम्मेदार फीडिंग अपनाएं। सड़कों पर भोजन फेंकने के बजाय, निर्धारित जगहों पर या अपने घरों में कुत्तों को रखकर ही खिलाएं। इससे कुत्ते आक्रामक नहीं बनेंगे और लोगों को डर नहीं लगेगा। दूसरा, एडॉप्शन को बढ़ावा दें। पशु प्रेमी आवारा कुत्तों को गोद लें, उन्हें घर दें और उनकी देखभाल करें। भारत में कई एनजीओ जैसे वीओएसडी और स्ट्रे एनिमल फाउंडेशन इंडिया इस काम में लगे हैं। पशु प्रेमी समुदाय बनाकर स्थानीय स्तर पर कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण अभियान चला सकते हैं। तीसरा, शिक्षा और जागरूकता फैलाएं। लोगों को बताएं कि आवारा कुत्तों को नियंत्रित करने से सभी का लाभ है। पशु प्रेमी सोशल मीडिया और कम्युनिटी ग्रुप्स के माध्यम से यह संदेश फैला सकते हैं कि पशु कल्याण मानव सुरक्षा से अलग नहीं है। यदि पशु प्रेमी इन कदमों को अपनाएं, तो आवारा कुत्तों की समस्या कम हो सकती है और यह सभी के लिए शांतिपूर्ण वातावरण बन सकता है।

अब सवाल है कि कॉर्पोरेट कंपनियां और पशु प्रेमी मिलकर आवारा कुत्तों का प्रबंधन कैसे करें ताकि नागरिकों को नुकसान न हो? कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के तहत कंपनियां बड़ा योगदान दे सकती हैं। वे एनजीओ के साथ साझेदारी करके शेल्टर बना सकती हैं, जो सरकारी डॉग शेल्टर से बेहतर बने, जहां आवारा कुत्तों को रखा जाए, उनकी नसबंदी और वैक्सीनेशन किया जाए। मसलन, दिल्ली जैसे शहर में 10 लाख आवारा कुत्तों को शेल्टर में रखने का खर्च करीब 700-800 करोड़ रुपये सालाना हो सकता है, लेकिन कॉर्पोरेट फंडिंग से यह संभव हो सकता है। पशु प्रेमी इन शेल्टर में वॉलंटियर के रूप में काम कर सकते हैं, कुत्तों की देखभाल कर सकते हैं और एडॉप्शन इवेंट आयोजित कर सकते हैं। कंपनियां स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित कर सकती हैं जो कुत्तों के लिए फूड डिलीवरी या हेल्थ सर्विसेस प्रदान करें। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायतों के साथ मिलकर शिक्षा कार्यक्रम चला सकते हैं, जहां कुत्तों को वैक्सीनेट किया जाए और अनावश्यक कुत्तों को शेल्टर में भेजा जाए। शहरों में, पशु प्रेमी और कंपनियां मिलकर ‘ट्रैप, न्यूटर, रिलीज’ प्रोग्राम चला सकते हैं, जो कानूनी रूप से अनुमत है। इससे कुत्तों की संख्या नियंत्रित होगी और वे आक्रामक नहीं बनेंगे। कंपनियां अपने कर्मचारियों को एडॉप्शन के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं और पशु प्रेमी क्लब बना सकती हैं जहां अनुभव साझा किए जाएं।

इस संयुक्त प्रयास से न केवल आवारा कुत्तों की समस्या हल होगी बल्कि पशु कल्याण भी सुनिश्चित होगा। सरकार को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, लेकिन समाज की भागीदारी के बिना कोई बदलाव संभव नहीं। भारत में यह समस्या इसलिए गंभीर है क्योंकि हम पशु प्रेम और मानव सुरक्षा को अलग-अलग देखते हैं, जबकि दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती एक अवसर है कि हम सभी मिलकर एक ऐसा भारत बनाएं जहां कुत्ते और इंसान शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रहें। पशु प्रेमी आगे आएं, कॉर्पोरेट सहयोग दें और सरकार क्रियान्वयन करे। तभी हम इस समस्या से मुक्ति पा सकेंगे।


*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

इंडिगो प्रकरण में नियामक सुस्ती बनी गलत मिसाल

साल 2025 नागरिक उड्डयन की दृष्टि से सबसे बुरा साल बीता। एयर इंडिया का दर्दनाक हादसा हो या इंडिगो का एफ़डीटीएल संकट, दोनों ने ही भारत का नाम दुनिया के सिविल एविएशन सेक्टर में बदनाम किया है। वहीं सरकार और नियामक (डीजीसीए व नागर विमानन मंत्रालय) की देरी, आधे-अधूरे कदम और चेतावनियों तक सिमटी कार्रवाई ने हालिया एफ़डीटीएल प्रकरण के बाद इंडिगो को बेवजह समय, स्पेस और नैरेटिव – तीनों में फ़ायदा पहुँचाया है। सरकार का यही ढीलापन पिछले मामलों में भी दिखा, जिसने निजी एयरलाइंस को यह संदेश दिया कि यदि आपके ‘संपर्क’ सही हैं तो बड़े अपराधों पर भी अंततः ‘नोटिस और चेतावनी’ से काम चल सकता है।

 उल्लेखनीय है कि भारत सरकार के नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा नए एफ़डीटीएल नियमों की प्रभावी तारीख काफ़ी पहले से तय और सार्वजनिक थी, फिर भी न तो इंडिगो ने पर्याप्त पायलट और स्टाफिंग तैयार की और न ही डीजीसीए ने समय से सख़्त अनुपालन की मॉनिटरिंग की। परिणाम यह हुआ कि नवंबर–दिसंबर में हजारों फ्लाइट्स प्रभावित हुईं, पर नियामक की शुरुआती भूमिका दिखावटी ऑडिट, ‘विशेष निरीक्षण’ और ऑपरेशनल रियायतों तक सीमित रही, न कि कठोर दंडात्मक कार्रवाई तक।


इस देरी ने इंडिगो को दो स्पष्ट लाभ दिए, संकट के दौरान पब्लिक आक्रोश ठंडा पड़ने तक कोई बड़ी पेनल्टी या उड़ान-सीमिती नहीं लगी, जिससे कंपनी को रिकवरी का वक़्त मिला। डीजीसीए द्वारा ‘रिकवरी रोडमैप’, ‘विशेष ऑडिट’ और भविष्य की निगरानी जैसी भाषा ने यह संकेत दिया कि मामला बातचीत और सुधार योजनाओं से सुलझ जाएगा, न कि लाइसेंस या स्लॉट पर त्वरित प्रहार से। 
एफ़डीटीएल नियमों के मसौदे के समय से ही विशेषज्ञों और पायलट प्रतिनिधियों ने आगाह किया था कि अगर एयरलाइंस ने समय पर भर्ती व रोस्टर सुधार नहीं किए, तो पायलट थकान और ऑपरेशनल कोलैप्स का जोखिम बढ़ेगा। डीजीसीए की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ नियम बनाना नहीं, बल्कि समयबद्ध ट्रांज़िशन सुनिश्चित करना भी थी, खासकर उस एयरलाइन पर जो घरेलू बाज़ार की सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखती है और जिसके फेल होने से पूरा सिस्टम झटके में आ सकता है। इसके बावजूद, डीजीसीए ने इंडिगो की विंटर शेड्यूल मंज़ूर करते समय एफ़डीटीएल कंप्लायंस की रियलिस्टिक क्षमता पर कठोर स्ट्रेस टेस्ट नहीं किया। नवंबर से ही बढ़ती देरी, कैंसिलेशन और ‘फ्रैक्चर्ड रोस्टर’ की शिकायतों के बावजूद समय रहते दंडात्मक हस्तक्षेप नहीं हुआ। चेतावनियाँ और अपीलें ज़्यादा दिखीं, प्रतिबंध कम। 


ऐसा नहीं है कि ये पहली बार हुआ। नोटिस, चेतावनी, ‘कड़ी निगरानी में लिया गया है’ जैसे वाक्य, दोषी प्रबंधन पर त्वरित नज़ीर-स्थापित करने वाला प्रहार नहीं। जब सिस्टम बार-बार इसी पैटर्न पर चलता है, तो यह एक ख़तरनाक मिसाल बन जाता है। यानी नियम तोड़ो, संकट खड़ा करो, फिर बातचीत और लॉबिंग से मामला नरम करवा लो। वहीं दूसरी ओर दिलचस्प और चिंताजनक तथ्य यह है कि डीजीसीए व मंत्रालय छोटी या अपेक्षाकृत सीमित प्रभाव वाले उल्लंघनों पर तुरंत और बड़ी सख़्ती दिखाने में पीछे नहीं रहते। एयर इंडिया पर सिर्फ एक फ़र्स्ट ऑफ़िसर की ‘रेसेन्सी’ न होने के बावजूद फ्लाइट ऑपरेट करने के मामले में 30 लाख रुपये का जुर्माना और रोस्टरिंग अधिकारियों पर सख़्त अनुशासनात्मक कार्रवाई का आदेश दिया गया। एयर इंडिया व्हीलचेयर सेवा में चूक और लो-विज़िबिलिटी ट्रेनिंग की कमी जैसे मामलों में भी 30–30 लाख के जुर्माने झेल चुकी है, साथ ही पायलट सस्पेंशन और अन्य कार्रवाइयाँ भी हुई। बोइंग के विमान पर बिना अनुमति विशिष्ट बाहरी लिवरी पेंट करने जैसे अपेक्षाकृत ‘टेक्निकल’ उल्लंघन पर भी एयर इंडिया  पर 30 लाख का दंड लगाया गया। इतना ही नहीं संसद में इसे सख़्त एन्फ़ोर्समेंट का उदाहरण बता कर पेश भी किया गया।


वहीं इसके उलट, इंडिगो के एफ़डीटीएल संकट जैसा गंभीर मामला, जिसमें पूरे नेटवर्क में हज़ारों यात्रियों की यात्रा, समय, स्वास्थ्य और आर्थिक हित प्रभावित हुए, अब तक मुख्यतः ऑडिट, चेतावनी, भविष्य में कड़ी कार्रवाई की धमकी और ‘रिकवरी प्लान’ तक सीमित दिखता है, न कि तत्काल और उच्च-स्तरीय दंड तक। नागर विमानन मंत्रालय और डीजीसीए दोनों अक्सर डेटा दिखाते हैं कि हर साल सैकड़ों इनफोर्समेंट एक्शन लिए जाते हैं, जिसमें चेतावनी, सस्पेंशन, कैंसिलेशन और आर्थिक दंड शामिल हैं। लेकिन कागज़ी कार्रवाई और वास्तविक नज़ीर के बीच एक बड़ा एग्ज़िक्यूशन गैप है।


हाल के वर्षों में 500–600 से अधिक एन्फ़ोर्समेंट एक्शन हर साल दर्ज हुए, पर इनमें बड़ी एयरलाइंस के टॉप मैनेजमेंट पर सीधे प्रहार करने वाले केस बहुत कम हैं; ज़्यादातर चेतावनी, मामूली जुर्माना या मिड–लेवल अफ़सरों पर जिम्मेदारी तक सिमटे दिखते हैं। डीजीसीए ने कई मौक़ों पर एयरलाइंस को भविष्य में ‘किसी भी उल्लंघन पर सख़्त कार्रवाई’ की चेतावनी दी, लाइसेंस निलंबन तक की धमकी दी, पर बड़े संकटों के बाद वास्तविक लाइसेंस–स्तर की कार्रवाई विरले ही देखी गई। इंडिगो संकट में भी, मंत्री स्तर पर “ऐसी मिसाल बनाएँगे कि कोई दोबारा हिम्मत न करे” जैसे बयान दिए गए, पर ज़मीनी स्तर पर जो दिखा, वह था – शो कॉज़ नोटिस, समीक्षा बैठकें, सिस्टम सुधार और आगे की निगरानी। इस अंतर ने संदेश साफ़ कर दिया: कड़े शब्द, नरम दंड।


यदि भारतीय एविएशन में नियम सिर्फ़ पायलट की नींद और क़ानून की किताब में लिखे घंटों तक सीमित नहीं, बल्कि यात्री के अधिकार, सार्वजनिक सुरक्षा और बाज़ार अनुशासन से जुड़े हैं, तो फिर चुनिंदा सख़्ती से आगे जाना ही होगा।डीजीसीए और नागरिक उड्डयन मंत्रालय को बड़े ‘ऑपरेशनल फ़ियास्को’, जैसे एफ़डीटीएल संकट, व्यापक क्रू थकान या जानबूझकर की गई शेड्यूलिंग हेरफेर – पर सीधे टॉप मैनेजमेंट और बोर्ड स्तर तक दंडात्मक कार्रवाई करनी चाहिए, जिसमें भारी आर्थिक जुर्माना, स्लॉट कटौती और नए रूट अनुमोदनों पर अस्थायी रोक शामिल हो। चेतावनी और नोटिस को केवल प्रारंभिक कारवाही ही बनाया जाए। एक बार सिस्टमिक गलती सिद्ध हो जाए, तो ‘ग्रेजुएटेड पेनल्टी’ के तहत स्वचालित और समयबद्ध दंड लागू हो – ताकि न तो राजनीतिक इच्छा पर निर्भरता रहे और न ही लॉबिंग के लिए मौक़ा  बचे। मंत्रालय को भी अपने भीतर जवाबदेही तय करनी होगी। जब एक साल पहले से ज्ञात नियम लागू होते समय ध्वस्त हो जाते हैं, तो सिर्फ़ एयरलाइन नहीं, उस नियम-निर्माण और निगरानी ढांचे पर भी कार्रवाई हो। 


इंडिगो संकट और एफ़डीटीएल विवाद ने दिखा दिया कि नियामक और सरकार की सुस्ती सिर्फ़ एक निजी एयरलाइन की मदद नहीं करती, वह पूरी इंडस्ट्री को गलत संकेत देती है, कि बड़ा खिलाड़ी बन जाओ, फिर बड़े अपराध भी “मैनेज” हो सकते हैं। अगर यह पैटर्न नहीं टूटा, तो अगली दुर्घटना या संकट के समय केवल पायलट, क्रू और यात्रियों को दोषी ठहराना न केवल अन्याय होगा, बल्कि सच से भी भागना होगा।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

चाँदी के बाज़ार में चिन का नया खेल

दुनिया के चांदी बाज़ार में इस समय जो उथल‑पुथल दिख रही है, उसमें चीन की नीतियां निर्णायक भूमिका निभा रही हैं और यही स्थिति वैश्विक निवेशकों के लिए गंभीर चेतावनी बन गई है। यह केवल सामान्य उतार‑चढ़ाव नहीं, बल्कि आपूर्ति, स्टॉकपाइल और निर्यात नियंत्रण के ज़रिए कीमतों व भावनाओं को प्रभावित करने का जटिल खेल है। 2025 में चीन ने चांदी पर राज्य‑नियंत्रित निर्यात लाइसेंसिंग सिस्टम लागू किया, यानी बिना सरकारी मंज़ूरी के कोई कंपनी चांदी बाहर नहीं भेज सकती। शुरुआत में यह कदम “घरेलू उद्योग की सुरक्षा” और “संसाधन‑संरक्षण” के नाम पर उठाया गया, लेकिन इसका तात्कालिक असर वैश्विक बाज़ार में आपूर्ति‑संकट और तेज़ी से बढ़ती कीमतों के रूप में दिखा।
 
इसी साल अक्टूबर में चीन ने अचानक रिकॉर्ड 660 टन चांदी एक महीने में निर्यात कर दी, जो इतिहास में सबसे बड़ा मासिक आंकड़ा माना जा रहा है। यह कदम पहले लगाए गए निर्यात नियंत्रणों से उलट था और इसे एक घबराए हुए बाज़ार को शांत करने तथा वैश्विक कीमतों की दिशा तय करने की कोशिश के रूप में देखा गया।
 
शंघाई फ्यूचर्स एक्सचेंज के आंकड़े दिखाते हैं कि 2021 के आसपास लगभग 3,900–5,000 टन तक पहुंचा चीन का चांदी स्टॉक 2025 के अंत तक गिरकर लगभग 700–800 टन के आसपास ही रह गया। यानी 80–85 प्रतिशत तक की गिरावट। जब दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक खपत वाली अर्थव्यवस्था के गोदाम इस तरह खाली होने लगते हैं और साथ ही निर्यात नीति बार‑बार बदली जाती है, तो बाज़ार में “वास्तविक कमी” और “संचालित कमी” के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
 
अनुमान है कि 2024 में चीन ने लगभग 3,300 टन चांदी का उत्पादन किया, जबकि घरेलू खपत 19,000 टन के आसपास पहुंच गई, यानी लगभग 15,700 टन का वार्षिक घाटा। यह संरचनात्मक घाटा और घटते स्टॉकपाइल चीन को नीति के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों और सप्लाई‑चेन पर अतिरिक्त दबाव बनाने का मौका देता है।
 
यह पहली बार नहीं है जब चीन किसी महत्वपूर्ण खनिज या धातु की आपूर्ति को भू‑राजनीतिक (जियोपॉलिटिक्स) या आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया हो। दुर्लभ धातुओं में 2008–2010 के बीच चीन ने निर्यात पर कोटा और पाबंदियां लगाकर कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया और जापान के साथ विवाद के दौरान सप्लाई रोक कर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की कोशिश की थी।
 
हाल के वर्षों में भी लिथियम, रेयर अर्थ और अन्य रणनीतिक खनिजों के बाज़ार में अचानक कोटा बदलाव, “मेंटेनेन्स” के नाम पर प्रोसेसिंग बंदी और स्टॉक से अचानक बड़े पैमाने पर माल छोड़ने जैसी नीतियों के ज़रिए 40–60 प्रतिशत तक कृत्रिम कीमत‑झटके पैदा करने के आरोप लगते रहे हैं। यह पैटर्न दिखाता है कि चीन संसाधनों पर अपनी पकड़ को केवल कारोबारी नहीं, बल्कि भू‑राजनीतिक शक्ति के रूप में देखता है।
 
कमोडिटी बाज़ारों में ‘कोर्नरिंग’ या ‘मैनिपुलेशन’ की कोशिशों का इतिहास बेहद कड़वा रहा है। 1979–80 में हंट ब्रदर्स ने भारी मात्रा में फ्यूचर्स और भौतिक चांदी खरीदकर दुनिया का एक‑तिहाई चांदी पर नियंत्रण करने की कोशिश की, जिससे कीमतें लगभग 6 डॉलर से बढ़कर 50 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गईं। जैसे ही नियामकों ने पोज़िशन लिमिट कड़ी की और मार्जिन बढ़ाए, बाज़ार ध्वस्त हुआ, ‘सिल्वर थर्सडे’ के नाम से मशहूर क्रैश में कुछ ही दिनों में कीमत आधे से भी कम पर आ गई और लाखों निवेशक बर्बाद हुए।
 
इसी तरह, दुर्लभ धातुओं के बाज़ार में चीन की 2010 की पाबंदियों ने वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को झटका दिया, उनकी लागत अचानक बढ़ गई और निवेश निर्णयों में भारी अनिश्चितता पैदा हुई। ये उदाहरण बताते हैं कि जब भी कोई सरकार या शक्तिशाली समूह किसी कमोडिटी को नियंत्रित करने की हद तक अपने हाथ में लेने लगता है, तो शुरुआती दौर में कीमतें ऊंची होकर ‘लाभ’ का भ्रम पैदा करती हैं, लेकिन अंततः परिणाम क्रैश और अव्यवस्था के रूप में सामने आते हैं।
 
आज की स्थिति में चांदी की कीमतों में तेज़ उछाल के पीछे दो समानांतर धाराएं काम कर रही हैं। एक तरफ वास्तविक औद्योगिक मांग, जैसे कि सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स, मेडिकल उपकरण, जिसके लिए चांदी लगभग अपरिवर्तनीय है। दूसरी तरफ चीन सहित बड़े खिलाड़ियों की नीतिगत चालें, जैसे कि निर्यात पर रोक, अचानक बड़े निर्यात और कमोडिटी एक्सचेंजों पर ‘पेपर’ व ‘फिजिकल’ बाज़ार के बीच बढ़ती खाई। भ्रमित हो रहे निवेशकों के लिए इन दिनों सबसे बड़ा खतरा यह है कि चांदी की मौजूदा तेज़ी को बिना समझे ‘नई सामान्य स्थिति’ मान लिया जाए। कई विश्लेषण 80–100 प्रतिशत सालाना बढ़त और 90–170 डॉलर प्रति औंस के संभावित लक्ष्य जैसी बातों का ज़िक्र कर रहे हैं, लेकिन यह भी साफ चेतावनी देते हैं कि यह वित्तीय सलाह नहीं, बल्कि उच्च जोखिम वाले परिदृश्य हैं। ऐसे माहौल में भावनात्मक खरीद, लेवरेज्ड ट्रेडिंग और अफवाह आधारित निर्णय निवेशकों को एक बार फिर से ‘सिल्वर थर्सडे’ जैसी स्थितियों की ओर धकेल सकते हैं।  
 
निवेशकों के लिए ज़रूरी है कि वे चीन की हर नीति‑घोषणा, निर्यात लाइसेंसिंग, टैक्स बदलाव, स्टॉक रिलीज़ आदि को केवल ‘समाचार’ नहीं, बल्कि बाज़ार‑रणनीति का हिस्सा समझें। किसी भी एक देश, एक एक्सचेंज या एक विश्लेषक के नैरेटिव पर अत्यधिक भरोसा करने के बजाय, विविध स्रोतों से आंकड़े, स्टॉक स्तर, इंडस्ट्रियल डिमांड और पॉलिसी‑रिस्क का आकलन करना आवश्यक है। सबक साफ है कि जब भी संसाधन और सत्ता एक ही हाथ में केंद्रित होते हैं, बाज़ार ‘फ्री’ नहीं रह जाते, वे ‘मैनेज्ड’ हो जाते हैं। चांदी की मौजूदा कहानी निवेशकों के लिए केवल मुनाफे का मौका नहीं, बल्कि यह समझने की कसौटी है कि भू‑राजनीति और कमोडिटी बाज़ार के बीच गठजोड़ कितना खतरनाक हो सकता है और इस खतरनाक गठजोड़ से बचाव की पहली और अहम शर्त केवल सावधानी ही है, अंध‑उत्साह नहीं।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।