शुक्रवार, 29 मार्च 2024

सोशल मीडिया की लत पर नियंत्रण ज़रूरी


कुछ समय पहले तक एक आम धारणा थी कि जब भी कभी घर की बेटी समझदार हो जाए तो उसके विवाह के लिये विचार शुरू हो जाता था। उसी तरह यदि घर का बेटा बिगड़ने लग जाए तो उसे ठीक करने की मंशा से भी उसके विवाह के बारे में सोचा जाता था। परंतु आजकल के दौर में ऐसा नहीं है। आजकल का युवा जिस कदर सोशल मीडिया के साथ घंटों बिताता है उसे लेकर भी माँ-बाप में चिंता बढ़ती जाती है। पिछले दिनों आपने सोशल मीडिया पर होली के उपलक्ष्य में ऐसे कई वायरल वीडियो देखे होंगे जहां लड़के लड़कियाँ खुलेआम ऐसी हरकतें करते दिखाई दिए कि सभी शर्मसार हुए। आख़िर इस समस्या का क्या कारण है और इससे कैसे निपटा जाए?


दिल्ली मेट्रो में दो लड़कियों द्वारा अश्लील वीडियो रील बनाने को लेकर काफ़ी बवाल मचा। जैसे ही इस वीडियो को लेकर दिल्ली वालों ने मेट्रो प्रशासन से सवाल पूछे तो दिल्ली मेट्रो ने इसे ‘डीप फ़ेक’ कह कर इससे पल्ला झाड़ने का प्रयास किया। परंतु जब कुछ लोगों ने इसकी जाँच की तो यह वीडियो सही पाया गया और वीडियो में देखी गई लड़कियों ने भी इसे स्वीकारा। यह लड़कियाँ यहीं नहीं रुकीं उन्होंने दिल्ली से सटे नोएडा में एक स्कूटी पर बैठ ऐसा ही एक और अश्लील वीडियो बना डाला। वीडियो सामने आने के बाद नोएडा पुलिस ने कार्रवाई करते हुए इन लोगों का 33 हजार रुपए का चालान भी काटा। परंतु क्या सिर्फ़ चालान ही इस समस्या का हल है?


ऐसा देखा गया है कि न सिर्फ़ ऐसे अश्लील वीडियो बनते हैं बल्कि ऐसे अनेकों अन्य वीडियो भी बनाए जाते हैं जहां युवा ख़तरनाक स्टंट करते हुए दिखाई देते हैं। कभी-कभी तो ऐसे वीडियो जान लेवा भी साबित होते हैं। परन्तु क्या किसी ने सोचा है कि ये युवा इतने बेलगाम क्यों होते जा रहे हैं? सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो डाल कर आख़िर वो क्या हासिल करना चाहते हैं? ऐसी हरकतें कर वे कुछ समय तक तो सोशल मीडिया पर प्रसिद्ध अवश्य हो जाएँगे, पर उसके बाद क्या? क्या इस प्रसिद्धि से उन्हें कुछ आर्थिक लाभ होगा? क्या इस प्रसिद्धि का उनकी शैक्षिक योग्यता पर अच्छा असर पड़ेगा? क्या ऐसा करने से उनका मान-सम्मान बढ़ेगा? इन सभी सवालों का उत्तर ‘नहीं’ ही है। तो फिर ये प्रसिद्धि या ऐसी हरकतें किस काम की?


वहीं यदि इन युवकों के नज़रिए से देखा जाए तो इन हरकतों के पीछे न सिर्फ़ सही संगत की कमी है बल्कि उससे भी ज़्यादा रोज़गार की कमी है। यदि इन युवकों को समय रहते उनकी योग्यता के मुताबिक़ सही रोज़गार मिल जाते तो शायद ऐसे दृश्य देखने को न मिलते। जिस तरह मोबाइल फ़ोन के ज़रिये सोशल मीडिया ने हर घर में अपनी जगह बना ली है, ऐसे क्रियाकलापों से छुटकारा पाना असंभव होता जा रहा है। बच्चा हो, युवा हो या घर का कोई बड़ा सदस्य जिसे देखो उसकी गर्दन झुकी ही रहती है। ऐसे में यह कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के दौर में वही सर उठा कर रह सकता है जिसके पास स्मार्ट फ़ोन नहीं है। यह तो हुई मज़ाक़ की बात। परंतु क्या वास्तव में इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है? ऐसे कई छोटे और सरल उपचार हैं जिससे इस समस्या से निदान पाया जा सकता है।

सबसे पहले तो स्क्रीन टाइम पर राशन लगाना ज़रूरी है। क्या आपने कभी सोचा है कि दिन के 24 घंटों में आप कितना समय अपने मोबाइल फ़ोन या कंप्यूटर पर लगाते हैं? क्या आप अपने परिवार, समाज व सहकर्मियों के साथ उसका कुछ हिस्सा भी बिताते हैं? आज के दौर में मोबाइल फ़ोन और सोशल मीडिया ही हैं जो हमें अपने समाज से दूर कर अराजक बना रहे हैं। यदि हम अपने परिवारों में एक बात निश्चित कर लें कि दिन के 24 घंटों में एक निर्धारित समय ऐसा हो जब परिवार का हर सदस्य अपना-अपना मोबाइल छोड़ एक दूसरे से बात करे, साथ बैठ कर भोजन या भजन करे तो इस समस्या का अंत आसानी से हो जाएगा।

एक बार कुछ मित्रों ने मिलने का प्लान बनाया। एक महँगे से रेस्टोरेंट में मिलना तय हुआ। सभी मित्र अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में काफ़ी प्रसिद्ध और संपन्न थे। सभी के हाथ में महँगे मोबाइल फ़ोन भी थे। जैसे ही सभी मित्र इकट्ठा हुए तो जिस मित्र ने इस पार्टी का आयोजन किया उसने खड़े हो कर एक घोषणा की। उसने सभी मित्रों से कहा कि आज की पार्टी हमेशा की तरह नहीं है। जैसा कि हम सभी मित्र हमेशा करते हैं कि रेस्टोरेंट के बिल का भुगतान मिल-बाँट कर करते हैं, आज ऐसा नहीं होगा। सभी ने पूछा तो फिर आज पार्टी कौन दे रहा है? इससे पहले की उत्तर मिलता आयोजक ने टेबल के बीचों बीच रखी एक टोकरी की ओर इशारा किया और सभी से अपना-अपना फ़ोन उसमें रखने को कहा। फिर वो बोला कि यह समय हम सभी एक दूसरे के साथ बिताएँ और अपने फ़ोन को भी आराम करने दें। फ़ोन की घंटी बजने पर, जो भी व्यक्ति सबसे पहले इस टोकरी में से अपना फ़ोन उठाएगा वो ही सबका बिल भरेगा। इस अटपटी शर्त को सभी ने माना। बस फिर क्या था भले ही कइयों के फ़ोन की घंटी बजी लेकिन जितनी भी देर पार्टी चली किसी ने भी फ़ोन नहीं उठाया। अंत में हमेशा की तरह बिल सभी के बीच बराबर बटा और सभी मित्र कुछ पल के लिये ही सही परंतु काफ़ी ताज़ा महसूस करने लगे। यह तो एक उदाहरण है यदि आप खोजेंगे तो आपको इस समस्या के कई हल मिल जाएँगे और युवा हों या अन्य सभी नियंत्रित हो जाएँगे।

शुक्रवार, 22 मार्च 2024

विदेश में पढ़ने जा रहे हैं तो रहें सावधान


उच्च शिक्षा पाने के लिए विदेश जाना कोई नई बात नहीं है। विदेश से पढ़ाई करने वाले भारतीयों की संख्या काफ़ी है। परंतु जैसे-जैसे समय बदला नए-नए शैक्षणिक संस्थान व विश्वविद्यालय दुनिया के कई अन्य देशों में भी खुलते गये। इधर भारत में भी जनसंख्या बढ़ने के कारण यहाँ के विद्यार्थियों को प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं में दाख़िला नहीं मिल पाता। इसी के चलते देश के कई हिस्सों से विद्यार्थियों में पढ़ाई के लिए विदेश जाने की होड़ सी लग गई। परंतु क्या सभी विद्यार्थियों के हिस्से अच्छे संस्थान और उपयोगी डिग्री ही आती है? क्या देश छोड़ कर जाने वाले विद्यार्थियों के साथ कुछ एजेंट धोखा तो नहीं करते? आजकल के माहौल में विदेश में पढ़ाई करने जाने वाले विद्यार्थियों को कई तरह सावधानी बरतने की भी ज़रूरत है।


विदेशों में उच्च शिक्षा पाने के लिए भारत से छात्र दुनिया के कोने कोने में जाते हैं। इनमें सबसे ज़्यादा लोकप्रिय देश यूके, अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि हैं। आँकड़ों के अनुसार साल 2023 में विदेश में पढ़ाई के लिए जाने वाले भारतीयों की संख्या क़रीब 13 लाख थी। ऐसा नहीं है कि विदेशों में पढ़ना सस्ता होता है। जो भी छात्र विदेशों में पढ़ाई के लिए गये उन्होंने प्रतिवर्ष औसतन 32 लाख रुपये खर्च किए। परंतु इतना ख़र्च करने के बावजूद क्या उन्हें वो सब मिला जिसकी खोज में ये अपना घर-भार छोड़ कर गये? क्या विदेशों में पढ़ाई करने वाले सभी भारतीयों के सपने सच होते हैं?   

ऐसा तो नहीं है कि भारत में अच्छे कॉलेज और यूनिवर्सिटी नहीं हैं। हमारे यहाँ 1200 विश्वविद्यालय हैं और क़रीब 50 हज़ार कॉलेज। इसके बावजूद हमारे यहाँ के छात्र अगर विदेशों में पढ़ाई करने जा रहे हैं तो उसके पीछे कई कारण हैं। अच्छे कॉलेज में दाख़िला पाने की प्रतियोगिता, शिक्षा से आमदनी, अच्छा जीवन स्तर और हैसियत। इन कारणों के चलते यदि किसी छात्र को भारत में मौक़ा नहीं मिलता तो उसके पास विदेश जाने का ही विकल्प बचता है। परंतु विदेशों में शिक्षा पाना इतना आसान नहीं होता। उच्च शिक्षा के लिए वीज़ा पाना भी एक अहम बात होती है। विदेश यात्रा और वहाँ पर रहन-सहन का ख़र्च भी काफ़ी होता है। इसी कारण वहाँ पर पढ़ाई के लिए जाने वाले छात्र पार्ट-टाइम नौकरी भी करते हैं। इसी सुहावने सपने का झाँसा दे कर कुछ एजेंट भोले-भाले छात्रों को ठगने में कामयाब हो जाते हैं।


बात कनाडा की करें तो उच्च शिक्षा के लिए यह देश भारतीयों का सबसे पसंदीदा देश है। इतना ही नहीं कनाडा में पढ़ने जाने वालों में पंजाब के छात्रों की संख्या सबसे अधिक है। एक के बाद एक पंजाब के गाँवों से युवकों का कनाडा में पलायन एक सपने की तरह होता है। ये भोले-भाले युवक इन सुहावने सपनों के जाल में बड़ी आसानी से फँस जाते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि इनके मित्र व रिश्तेदार कनाडा या विदेशों में जाने के कुछ ही महीनों में अपनी ऐसी तस्वीरें भेजते हैं जहां वो महँगी गाड़ियों में घूमते व बड़े-बड़े घरों में दिखाई देते हैं। बस इसे देखते ही हर युवक का मन भी विदेश जाने को उतावला हो जाता है। बस फिर क्या वो सीधे-सादे किसान अपनी ज़मीन-जायदाद को गिरवी रख एजेंटों के चक्कर में आ जाते हैं।

कनाडा जाने वाले कुछ छात्रों को यह भी नहीं पता होता कि उनका दाख़िला जिस कॉलेज या यूनिवर्सिटी में हुआ है उसकी मान्यता कैसी है। कनाडा में ऐसे कई कॉलेज हैं जिनके द्वारा दी गई डिग्री का कोई भी अहमियत नहीं है। यानी कि उन डिग्रियों पर नौकरी मिलना बहुत मुश्किल है। कनाडा में ऐसे कई कॉलेज हैं जो कि किसी शॉपिंग मॉल से चलाये जा रहे हैं। एक कमरे से चलने वाले ऐसे कॉलेजों के द्वारा दाख़िला मिलने पर भी वहाँ की सरकार वीज़ा दे देती है। जबकि अन्य देशों में ऐसे कॉलेजों को कोई महत्व नहीं दिया जाता। कनाडा में कॉलेज खोलने के लिए सरकार द्वारा लाइसेंस आसानी से मिल जाता है। उसी आधार पर विदेशी छात्रों को वीज़ा भी मिल जाता है। आँकड़ों के अनुसार विदेशी छात्र कनाडा की जीडीपी में सालाना 20 अरब कैनेडियन डॉलर का योगदान देते हैं। शायद इसीलिए ऐसे छोटे कॉलेजों के द्वारा नियम क़ानून न मानने पर कोई सख़्त करवाई नहीं की जाती।


ऐसा नहीं है कि कनाडा में सभी कॉलेज निम्न स्तर के हैं। विदेशों से जो भी छात्र स्नातक की डिग्री लेकर आते हैं उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार अच्छे कॉलेजों में दाख़िला मिल जाता है। परंतु जो भी छात्र बारहवीं पास करने के बाद यहाँ आते हैं उनके लिए डिप्लोमा कोर्स लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। इस डिप्लोमा कोर्स की उपयोगिता सिवाय छात्रों से पैसा कमाने के और कुछ भी नहीं होती। ऐसा नहीं है कि कनाडा सरकार को इस गोरखधंधे के बारे में कुछ नहीं पता। यहाँ की सरकार को जैसे ही पता चला कि ऐसे कई कॉलेज हैं जो अपनी क्षमता से अधिक विदेशी छात्रों को दाख़िला दे रहे हैं उन्होंने एक सूचना भी जारी की जिसमें विदेशी छात्रों को यह हिदायत दी गई कि फ़ीस जमा करने से पहले कॉलेज की ठीक से जाँच अवश्य कर लें।


परंतु सीधे-सादे छत्रों को ठगने में एजेंट पीछे नहीं रहते। इतना ही नहीं अब तो कई ऐसे एजेंट हैं जिनके कनाडा में कॉलेज भी हैं और वो छात्रों को बड़ी आसानी से दाख़िला भी दे देते हैं। यदि किसी छात्र को पता है कि वो कनाडा जाने के योग्य नहीं है तो ये एजेंट उसे बहला फुसला कर फ़र्ज़ी दस्तावेज बना देते हैं। लेकिन इस पाखंड का पर्दा तब उठता है जब केवल डिप्लोमा करने के लिए ये छात्र विदेश पहुँचते हैं। इस जाल में फँसने के बाद कठिन परिस्थितियों में उन्हें मजबूरन अपना गुज़ारा मज़दूरों की तरह करना पड़ता है। इसलिए यदि आप या आपका कोई जानकार विदेश में पढ़ाई करने के बारे में सोच रहा है तो उसे पूरी छान-बीन के बाद ही ऐसा कदम उठाना चाहिए। 

शुक्रवार, 15 मार्च 2024

वॉइस क्लोनिंग: नये साइबर अपराध से रहें सावधान


साइबर अपराधों में लिप्त अपराधी हर दिन नये ढंग से अपने शिकारों को फँसाने के तरीक़े खोजते रहते हैं। यदि आप जागरूक हैं तो आप इनके जाल में फँसने से बच सकते हैं। यदि आप घबराहट में कुछ ऐसा-वैसा कर बैठते हैं तो आप इनके जाल में आसानी फँस सकते हैं। आज इस कॉलम में साइबर अपराध के एक नये तरीक़े ‘वॉइस क्लोनिंग’ के बारे में बात करेंगे जो आजकल सीधे सादे लोगों को अपना शिकार बना रहा है।

कुछ समय पहले तक साइबर अपराधियों द्वारा ह्वाट्सऐप पर वीडियो कॉल करके लोगों से पैसा ऐंठा जा रहा था। जैसे-जैसे इस तरह के साइबर अपराध के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को पता चला तो इन साइबर ठगों के अपराधों में कमी आने लगी। परंतु ‘आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस’ के इस नये दौर में साइबर ठगी के नये तरीक़े भी सामने आने लगे हैं। इनमें एक ताज़ा तरीक़ा है ‘वॉइस क्लोनिंग’। यह एक ऐसी तकनीक है जिससे कि कंप्यूटर द्वारा किसी की भी आवाज़ की नक़ल आसानी से बनाई जा सकती है। आवाज़ की इस नक़ल को पहचान पाना बहुत ही मुश्किल होता है।


कुछ दिन पिछले मुझे मेरे एक मित्र जतिन का घबराहट में फ़ोन आया। उसकी घबराहट का कारण ये था कि ख़ुद को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच का एक अधिकारी बताने वाला व्यक्ति उसे धमका रहा था। उस व्यक्ति ने जतिन को फ़ोन पर यह कहते हुए धमकाया कि उसका बेटा पुलिस हिरासत में हैं। जब उसने अपने बेटे की गिरफ़्तारी की वजह पूछी तो उसे बताया गया कि उसका बेटा अपने कॉलेज की लड़कियों को अश्लील मेसेज भेजता और उन्हें ब्लैकमेल करता है। चूँकि जतिन का बेटा आजकल के युवाओं की तरह ‘मस्त-मौला’ विचारों का नहीं है इसलिए उसे इस बात पर यक़ीन नहीं हुआ। परंतु फिर भी एक घबराए हुए पिता की तरह जतिन ने भी यह जानना चाहा कि उसका बेटा कौनसे थाने में है और उसे कैसे छुड़ाया जा सकेगा? परंतु तभी किसी कारण से फ़ोन कट गया।  


इसी बीच जतिन ने मुझे फ़ोन कर अपनी परेशानी बताई। सबसे पहले मैंने उससे पूछा कि उसका बेटा इस समय कहाँ है? उसने बताया कि वो कॉलेज गया है। मैंने उससे पूछा कि फ़ोन किस नंबर से आया था? क्या फ़ोन उसके बेटे के फ़ोन से आया था? चेक करने पर पता चला कि फ़ोन किसी अनजान नम्बर से आया था। इतना ही नहीं उस नंबर से पहले +92 लगा था, जिससे संदेह हुआ कि यह एक फ्रॉड कॉल है। क्योंकि भारत के सभी फ़ोन नंबरों से पहले +92 नहीं बल्कि +91 लगता है। मैंने जतिन को शांत करते हुए यह बात समझाई कि यदि पुलिस किसी छात्र को गिरफ़्तार कर उसके माता-पिता से बात करती है तो या तो वो थाने के फ़ोन से करेगी या छात्र के ही फ़ोन से या पुलिस अधिकारी अपने फ़ोन से कॉल करेगा जिसके पहले +91 लगा होगा।


इस पर जतिन को कुछ बात तो समझ में आई। लेकिन उसने यह भी कहा कि उस पुलिस अधिकारी ने उसके बेटे की फ़ोन रिकॉर्डिंग के कुछ अंश भी सुनाए हैं, जिसे सुन कर उसे चिंता हुई। इस पर मैंने जतिन से कहा कि क्या उसने अपने बेटे से उसी के फ़ोन पर बात की? तो वो बोला घबराहट में उसने पहला फ़ोन मुझे ही किया। जैसे ही जतिन ने दूसरे फ़ोन से अपने बेटे से बात की तो उसे पता चला कि वो बिलकुल सकुशल है और अपने कॉलेज में ही है। मैंने जतिन को ‘वॉइस क्लोनिंग’ स्कैम के बारे में जो बताया वो आपके साथ साझा करना भी आवश्यक है। उगाही के इस नये ढंग को यदि आप जान लेंगे तो शायद आप भी इन जालसाज़ों का शिकार होने से बच सकेंगे।

‘वॉइस क्लोनिंग’ साइबर ठगों का सबसे ताज़ा हथियार साबित हो रहा है। साइबर ठग आपके फ़ोन पर किसी बैंक, फ़ोन या बीमा कंपनी का अधिकारी बन कर आपसे बात करते हैं। ऐसे में ये आपके साथ हो रही पूरी बात को रिकॉर्ड भी कर लेते हैं। इसके बाद ‘आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस’ की मदद से ‘वॉइस क्लोनिंग’ सॉफ्टवेर में आपकी आवाज़ में आसानी से बदलाव लाकर, आपकी आवाज़ की नक़ल या ‘वॉइस क्लोनिंग’ कर लेते हैं। मतलब आपकी ही आवाज़ में बातचीत का विषय बदल देते हैं। इन साइबर ठगों के पास आपके करीबी रिश्तेदारों के नंबर होना कोई बड़ी बात नहीं है। इसी के चलते वे ‘वॉइस क्लोनिंग’ की मदद से आपकी नक़ली आवाज़ के ज़रिए स्कैम करने में कामयाब हो रहे हैं। इसलिए आप सभी के लिये कुछ बातों को समझना ज़रूरी है।

पहला, यदि आपको किसी अनजान नंबर से ऐसा ‘वॉइस क्लोनिंग’ वाला फ़ोन आए तो पहले यह सुनिश्चित कर लें कि आपके जिस रिश्तेदार के बारे में बात की जा रही है, क्या वो उसी की आवाज़ है? दूसरा, किसी न किसी बहाने से फ़ोन को काट कर अपने उसी रिश्तेदार को फ़ोन कर उससे बात अवश्य करें। तीसरा, यदि कोई भी ख़ुद को पुलिस अधिकारी बताता है तो पहले उस व्यक्ति का पूरा परिचय माँग लें और आधिकारिक फ़ोन नंबर माँग लें। यदि संभव हो तो फ़ौरन उसके दिये परिचय की पुष्टि भी कर लें। कभी भी अनजान नंबर से आने वाली कॉल, ख़ासकर जिस नम्बर से पहले +92 लगा हो उसे न उठाएँ। कॉल करने वाले के लाख कहने पर भी उनकी बातों में न आएँ। अपने बैंक खाते या अन्य ज़रूरी जानकारी को कभी शेयर न करें। ऐसे नंबरों को तुरंत ‘ब्लॉक’ करें। जैसे ही यह पता चले कि आपके साथ ठगी हो सकती है या आप इनके शिकार हो चुके हैं तो पुलिस को इसकी इत्तला तुरंत दें। आप जानकार रहेंगे तभी तो सुरक्षित रहेंगे। 

शुक्रवार, 8 मार्च 2024

सवाल गुणवत्ता का !


पिछले सप्ताह दिल्ली एनसीआर के दो शॉपिंग मॉल की छत गिरने से देश भर में एक ख़ौफ़ का संदेश गया। जिस तरह एक नामी शॉपिंग मॉल की छत ताश के पत्तों की तरह भरभरा कर नीचे आ गिरी इससे इसके निर्माण और गुणवत्ता पर कई सवाल उठाए जा रहे हैं। शहर के नामी बिल्डर द्वारा निर्मित इस करोड़ों रुपये के मॉल में कई महँगे ब्रांड की दुकानें हैं। यह मॉल ग्राहकों और सैलानियों से भरा रहता है। ऐसे में विभिन्न मॉल में जाने वालों को अब वहाँ जाने से पहले यह सोचना पड़ेगा कि क्या बड़े-बड़े मॉल में जाना सुरक्षित है या वे वापिस अपने स्थानीय बाज़ारों में ही ख़रीदारी करने जाएँ?

दक्षिण दिल्ली के वसंत कुंज इलाक़े में स्थित एम्बिएंस मॉल की छत रविवार की देर रात अचानक गिरी। ग़नीमत है कि यह हादसा मध्यरात्रि के बाद हुआ जब वहाँ पर लोग नहीं थे। यदि ऐसा हादसा सुबह या दोपहर के समय हुआ होता तो जान-माल का नुक़सान कई गुना होता, क्योंकि वहाँ पर काफ़ी भीड़ रहती है। कहा यह जा रहा है कि मॉल में कुछ मरम्मत कार्य चल रहा था जिसके चलते यह हादसा हुआ। हादसे का असली कारण तो जाँच के बाद ही सामने आएगा, परंतु यहाँ सवाल उठता है कि क्या मरम्मत के समय भी उपयुक्त सुरक्षा नियमों का पालन किया गया था? क्या वहाँ पर मरम्मत का काम कर रहे कर्मचारियों को उपयुक्त सुरक्षा साधन, जैसे सेफ्टी जैकेट, हेलमेट आदि प्रदान किए गए थे?


जब भी कभी किसी शहर में कोई बड़ा शॉपिंग मॉल, ऑफिस काम्प्लेक्स या बड़ा होटल बनता है तो इसे तरक़्क़ी का प्रतीक माना जाता है। ऐसे वहाँ रहने वाले बेरोज़गार युवाओं को रोज़गार के अवसर तो मिलते ही हैं इसके साथ ही आस-पास के इलाक़े का भी विकास होता है। उस शहर में रहने वालों ऐसी जगहों पर कभी न कभी जाने का भी मौक़ा मिलता है। ऐसे में यदि इनमें से किसी भी भवन में यदि कोई अप्रिय घटना या हादसा हो जाता है तो उस मॉल या होटल को उस घटना के साथ जोड़ कर कई वर्षों तक देखा जाता है। ऐसे में जिस उद्देश्य के लिए किसी बिल्डर ने इनका निर्माण किया था वो सिद्ध नहीं होता। इससे उस नामी बिल्डर की साख पर भी कई सवाल खड़े होते हैं। आम जनता यह समझने लग जाती है कि यह बिल्डर समूह सुरक्षा के साथ समझौता करता है और उसके मन में केवल मुनाफ़ा कमाने का ही मक़सद है।    

परंतु वहीं दूसरी ओर देखें तो यदि किसी बिल्डर ने गुणवत्ता को ध्यान में रख कर ऐसे किसी भवन का निर्माण किया हो तो वहाँ पर आपको ऐसी कोई भी अप्रिय घटना कभी भी देखने को नहीं मिलेगी। ऐसे श्रेष्ठ बिल्डर हमेशा गुणवत्ता को सर्वोपरि रखते हैं मुनाफ़े को नहीं। इसके साथ ही प्रशासन की भी कुछ ज़िम्मेदारियों होनी चाहिएँ। जैसे, निर्माण के समय में ही निर्माण में इस्तेमाल किए जाने वाली निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की जाँच होती रहनी चाहिए। निर्माण चाहे किसी निजी बिल्डर द्वारा निर्मित किसी मॉल का हो, किसी ऑफिस काम्प्लेक्स का हो या किसी बड़े होटल का हो। सरकारी एजेंसियों द्वारा नियमित निरीक्षण होते रहने चाहिए। लेकिन अक्सर देखा गया है कि ऐसे निरीक्षण केवल काग़ज़ों पर ही होते हैं। इन निरीक्षणों की पोल तब खुलती है जब कोई बड़ा हादसा होता है।


कुछ वर्षों पहले जब 1997 में दिल्ली के उपहार सिनेमा में ऐसी ही लापरवाही के चलते आग लगी थी तो उसमें 59 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इस दर्दनाक हादसे के बाद कोर्ट की फटकार लगने पर सरकारों को सार्वजनिक स्थानों पर आगज़नी से बचाव के सभी नियमों को सख़्ती से लागू करने को कहा गया। नतीजा यह हुआ कि सभी बिल्डर काफ़ी चौकन्ना भी हो गये और किसी भी तरह की लापरवाही करने से बचने लगे। देखना यह है कि दिल्ली के एम्बिएंस मॉल के हादसे के बाद क्या प्रशासन कुछ कड़े नियम लागू करेगा? ऐसे बड़े शॉपिंग मॉल्स में जब भी मरम्मत के काम हों पूरी हिफ़ाज़त के साथ ही हों। किसी भी अप्रिय घटना की स्थिति से निपटने के लिए संबंधित ज़िला प्रशासन, अग्निशमन, पुलिस आपदा प्रबंधन और एंबुलेंस सेवा को इस कार्य की पहले से ही सूचना दी जाए जिससे की हादसे के समय इनकी गाड़ियाँ  बिना विलंब वहाँ सहायता के लिए पहुँच सकें। आजकल के सूचना प्रौद्योगिकी के दौर में ऐसे हर स्थल पर सीसीटीवी केमरे भी चालू रहें जो पूरे समय ऐसे कार्य पर निगरानी रखें।  

दिल्ली एनसीआर में हुई यह घटनाएँ सीधे-सीधे इन शॉपिंग मॉल्स के निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठाती हैं। गुणवत्ता में हुई लापरवाही ही इस हादसे का कारण बनी। परंतु यदि बिल्डर द्वारा सही सामग्री का इस्तेमाल किया गया होता या मरम्मत करने वाले ठेकेदार या मज़दूरों द्वारा पूरी सावधानी बरती गई होती तो यह हादसा टाला जा सकता था। इस हादसे की जाँच के बाद जो भी दोषी होगा उसे कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए जिससे कि हर उस बड़े बिल्डर को एक संदेश दिया जा सके कि यदि आप मुनाफ़ा कमाने की मंशा से महँगे-महँगे मॉल और सिनेमा घर आदि बनाएँगे, तो वहाँ पर जाने वाले और वहाँ पर काम करने वालों को सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी भी आपकी ही होनी चाहिए।    

शुक्रवार, 1 मार्च 2024

इंसानियत का गिरता स्तर


अंग्रेजों के शासन के समय भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार के खूब क़िस्से आप सब ने पढ़े और सुने होंगे। परंतु आज के भारत में यदि आपको किसी सरकारी व्यक्ति के दुर्व्यवहार की घटना के बारे में पता चलता है तो आपको ग़ुस्सा न आए ऐसा हो नहीं सकता। घटना कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु की है जहां पर मेट्रो के सुरक्षाकर्मी ने एक बुजुर्ग यात्री को इसलिए ट्रेन में चढ़ने नहीं दिया क्योंकि उस बुजुर्ग किसान के कपड़े गंदे और पुराने दिखाई दे रहे थे। जब मेट्रो के सुरक्षाकर्मी की इस हरकत पर सह-यात्रियों ने आपत्ति जताई तो वहाँ पर एक हंगामा खड़ा हो गया और देखते ही देखते इस पूरे प्रकरण का वीडियो वायरल हो गया। मेट्रो सुरक्षाकर्मी की इस ग़ैर ज़िम्मेदाराना हरकत ने औपनिवेशिक काल की याद दिला कर एक बार फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि हम इतने असंवेदनशील कैसे हो सकते हैं?


इक्कीसवीं सदी में क्या कभी किसी ने ऐसी कल्पना की होगी कि कोई एक इंसान दूसरे के प्रति इतना द्वेष इसलिए रखे क्योंकि वो या तो किसी निचले तबके का है या वो किसी अन्य धर्म या जाति का है या सिर्फ़ इसलिए कि उसके पहनावे से उसके ग़रीब होने का परिचय मिलता है। एक ओर जब हम बराबरी और सम्मान की बात करते हैं तो हम यह क्यों भूल जाते हैं कि हमारे देश में सिखों के गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने कहा था कि ‘अव्वल अल्लाह नूर उपाया कुदरत के सब बंदे, एक नूर ते सब जग उपजा कौन भले कौन मंदे’। इस वाणी के अनुसार गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने, किसी भी प्राणी में जात का भेद समाप्त कर दिया था। बल्कि उन्होंने ऊँच-नीच के भेदभाव को भी समाप्त करने का संदेश दिया। परंतु क्या आज हम ऐसे संदेशों पर अमल करते हैं?


मामला चाहे एक बुजुर्ग किसान को मेट्रो पर न चढ़ने देना का हो या किसी आदिवासी या निचली माने जानी वाली तबके की जाति के व्यक्ति के साथ की जाने वाले दुर्व्यवहार की घटना का हो, हमेशा इंसानियत ही शर्मसार होती है। जब यह पता चलता है कि ऐसा दुर्व्यवहार करने वाला किसी बड़े राजनैतिक दल का एक मामूली सा कार्यकर्ता है तो उस पर राजनीति भी शुरू हो जाती है। परंतु यहाँ किसी राजनैतिक दल की बात नहीं है बल्कि इंसानों में खो रही इंसानियत की बात है। ऐसा क्यों है कि कुछ लोग पैसे, पद या राजनीति के घमंड में किसी दूसरे को अपने से नीचा देखने लगते हैं? क्या इस संवेदनशील विषय पर उन्हें उनके बड़े-बुजुर्गों ने सही पाठ नहीं पढ़ाया? क्या ये सही नहीं है कि जब कोई महँगी और आलीशान गाड़ी में चलता है तो सड़क पर पैदल चलने वालों को वो कुछ नहीं समझता? सड़क जितनी महँगी गाड़ी वालों की है उतनी ही पैदल चलने या सस्ते वाहन के मालिकों की भी है।


आजकल सोशल मीडिया युग में यह देखा गया है कि जैसे ही बेंगलुरु, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश या देश के किसी भी कोने में ऐसी असंवेदनशील घटनाएँ वायरल होती हैं तो आनन-फ़ानन में कार्यवाही भी हो जाती है। बेंगलुरु में मेट्रो के प्रबंधकों ने इस घटना का संज्ञान लेते हुए उस सुरक्षाकर्मी को तुरंत प्रभाव से निलंबित तो कर दिया। परंतु सुरक्षाकर्मी हो या किसी भी राजनैतिक दल के कार्यकर्ता, उन्हें आम आदमी से बर्ताव करने के लिए विशेष हिदायत या प्रशिक्षण क्यों नहीं दिये जाते? अक्सर हमें यह भी सुनने को मिलता है कि कभी किसी एयरलाइंस द्वारा ज़रूरतमंद की व्हीलचेयर की माँग को भी अनदेखा किया जाता है। परंतु जब ऐसे मामले तूल पकड़ते हैं तो सभी चौकन्ना हो जाते हैं। आख़िर हमारी संवेदनाओं का स्तर इतना गिरता क्यों जा रहा है? भारत भगवान राम और कृष्ण का देश है जिन्होंने शबरी माता के झूठे बेर और सुदामा के तंदुल स्वीकार कर समाज के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया था।

हर दल के बड़े नेता देश में बराबरी का संदेश तो ज़रूर देते हैं। यह भी देखा गया है कि अक्सर जब ये नेता किसी नये भवन या सार्वजनिक स्थल का लोकार्पण करते हैं तो उसका निर्माण करने वाले मज़दूरों का सम्मान भी करते हैं। परंतु जब उन्हीं के दल का कोई कार्यकर्ता या छुटभैया नेता सड़क पर या अपने इलाक़े में अपनी दबंगई दिखाता है तो ऐसा लगता है कि बराबरी का संदेश देने की नीयत से नेताओं द्वारा ग़रीबों का सम्मान केवल फ़ोटो खिंचवाने की दृष्टि से ही किया जाता है।


जिस तरह बेंगलुरु में एक बुजुर्ग व ग़रीब किसान को टिकट होने के बावजूद ट्रेन में चढ़ने नहीं दिया गया और वो लाचार हो कर एक कोने में तब तक खड़ा रहा जब तक किसी ने इस बात का विरोध नहीं किया। इससे एक संदेश ज़रूर गया है कि आज के युग में हम जब भी ऐसी घटना होते हुए देखें तो इसका विरोध अवश्य करें। लोग विरोध इसलिए नहीं करते क्योंकि कौन फ़ालतू के बवाल में पड़े। परंतु ज़रा सोचिये कि आप यदि किसी काउंटर की लाइन में अपनी बारी आने की प्रतीक्षा में हों और अचानक कोई वीआईपी बन कर बिना लाइन में लगे सीधे ही काउंटर पर चला जाए तो क्या आप इसका विरोध नहीं करेंगे? ठीक उसी तरह, यदि आप किसी के साथ अन्याय होता देखें तो उसका विरोध अवश्य करें वरना बैंगलुरु जैसी घटनाएँ बढ़ती रहेंगी और इंसानियत बार-बार शर्मसार होगी।