शुक्रवार, 26 अगस्त 2022
आपदा प्रबंधन के लिए कुछ नया करना होगा
किसी भी तरह की आपातस्थिति में आम नागरिक सीधे 100 नम्बर मिलाने की सोचता है। परंतु क्या हमारे देश का आपदा प्रबंधन इस कदर व्यवस्थित है कि किसी भी आपातस्थिति से कुशलतापूर्वक निपट सके? इसका जवाब आपको आसानी से नहीं मिल पाएगा। आपातस्थिति में तंत्र की अव्यवस्था के चलते नागरिकों को जिन दिक्कतों का सामना करना पड़ता है उनसे शायद हम सबको भविष्य के लिए सबक सीखने की आवश्यकता है।
मिसाल के तौर पर दिल्ली जैसे शहर में रहने वालों को शायद यह नहीं पता कि दिल्ली में कितने दमकल केंद्र हैं। दिल्ली अग्निशमन सेवा के अनुसार दिल्ली में 64 दमकल केंद्र हैं। प्रत्येक दमकल केंद्र का एक तय कार्यक्षेत्र और सीमा होती है। आग लगने के स्थिति में उसी सीमा के भीतर ही दमकल की गाड़ियाँ घटनास्थल पर जाती हैं। दिल्ली वालों को शायद यह भी नहीं पता कि सितम्बर 2019 से समस्त भारत के लिए आपातकालीन सेवा का एक ही नम्बर 112 शुरू किया गया है। इस सेवा को आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली (ईआरएसएस) कहा जाता है। यदि आपको पुलिस, अग्नि शमन, स्वास्थ्य और अन्य सेवाओं से आपातकालीन सहायता की आवश्यकता है, तो आपको सदियों से चले आ रहे 100, 101, 102 या 108 नम्बरों के बजाय केवल 112 नम्बर ही मिलाना होगा। भारत सरकार द्वारा यह एक अच्छी पहल कही जा सकती है। परंतु इस सेवा का जितना प्रचार होना चाहिए वो शायद नहीं हुआ।
आज भी आपातस्थिति में हड़बड़ाहट में मुंह से यही निकलता है कि 100 नम्बर मिलाओ और पुलिस बुलाओ। ईआरएसएस सेवा शुरू होने के दो सालों के बाद भी यदि हम वही पुराने 100 नम्बर को याद कर मिला देते हैं तो मिलाई गई कॉल पर यह संदेश बजता है कि आपकी कॉल को ईआरएसएस सेवा 112 से जोड़ी जा रही है। इस सब में थोड़ा समय बर्बाद ज़रूर होता है परंतु दिल्ली जैसे महानगर में पुलिस की पीसीआर गाड़ी तुरंत आ जाती है।
गाड़ी पहुँचने से पहले आपके मोबाइल पर एक संदेश भी आता है जो आपके द्वारा की गई कॉल की पुष्टि करता है और आपके पास पहुँचने वाली गाड़ी का विवरण भी दे देता है। पीसीआर की गाड़ी में तैनात सम्बंधित अधिकारी आपको फ़ोन कर बात भी करता है और समस्या की जानकारी लेता है। जानकारी के अनुसार वो उचित कार्यवाही प्रारम्भ भी कर देता है। जैसे ऐम्बुलेंस या दमकल की गाड़ी को घटनास्थल पर रवाना करना। इसे दिल्ली पुलिस की दक्षता माना जा सकता है।
ईआरएसएस सेवा को चालू करने वाले भारत सरकार के गृह मंत्रालय को इन सुझावों पर भी ध्यान देना चाहिए। जैसे देश के सभी राज्यों में आपको पीसीआर की गाड़ियाँ कई चिन्हित स्थानों पर तैनात किया जाता है, उसी प्रकार क्या दमकल की छोटी गाड़ियों को तैनात नहीं किया जा सकता? आपात स्थिति में यदि ऐसी दमकल की छोटी गाड़ियाँ तैनात हों तो आग लगने की स्तिथि में वो बड़ी गाड़ियों की तुलना में घटना स्थल पर जल्दी पहुँच सकती हैं। घटना स्थल पर पहुँच कर स्तिथि का जायज़ा लेने के बाद आवश्यकता अनुसार दमकल की बड़ी गाड़ी को बुलाया जा सकता है। तब तक उस गाड़ी में तैनात अग्निशमन सेवा के कर्मी आग पर नियंत्रण पाने का प्रयास कर सकते हैं। इन छोटे दमकल वाहनों में छोटे पानी टैंकर के साथ-साथ प्राथमिक रोकथाम के वो सभी उपकरण भी होने चाहिए। इस छोटे प्रयास से बड़ा नुक़सान टाला जा सकता है। दमकल की बड़ी गाड़ी के ट्राफ़िक में फँसने की वजह से हो रही देरी से पहले ही बचाव कार्य शुरू किए जा सकते हैं।
देश भर में दिल्ली के चाँदनी चौक जैसे तंग गलियों के बाज़ारों की संख्या अनगिनत हैं। आप कल्पना कीजिए कि तंग गलियों में यदि कहीं आग लगती है तो उससे निपटने के लिए बड़ी गाड़ी कैसे पहुँच पाएगी? यदि हर ऐसे बाज़ार के पास एक छोटी गाड़ी की तैनाती हो तो प्राथमिक बचाव कार्य शुरू किए जा सकते हैं। ऐसा करने से आग को फैलने से भी रोका जा सकता है और बड़े नुक़सान को रोका जा सकता है। तंग गलियों वाले बाज़ार हों या ऐसे रिहायशी मोहल्ले, जनता का सहयोग तुरंत मिल जाता है। परंतु जनता से सही ढंग से सहयोग लेने के लिए एक अनुभवी अग्निशमन कर्मी 100 कर्मियों के बराबर होता है। ऐसा कर्मी जनता के सहयोग को सही दिशा में मोड़ने की क्षमता भी रखता है।
इसी तरह स्वास्थ्य सेवाओं में भी आपात स्थिति से निपटने के लिए छोटे-छोटे दस्तों की तैनाती से स्वास्थ्य संबंधित बड़ी आपदा से काफ़ी हद तक बचाव किया जा सकता है। ऐसी दुर्घटना के शिकार लोगों की जान भी बचाई जा सकती है।
अभी तक ऐसी तैनाती केवल पुलिस के वाहनों की देखी जा सकती है। अन्य आपात स्तिथि से निपटने वाले वाहन हमें किसी बड़े आयोजनों पर ही दिखाई देते हैं जिसके लिए उन्हें अफ़सरशाही के लालफ़ीते से गुजरना पड़ता है। यदि ऐसा प्रयोग सफल हो जाए तो कितने बेरोज़गार युवाओं को रोज़गार मिलेगा इसका अनुमान आप खुद लगा सकते हैं। ज़रूरत है तो एक ऐसी सोच की जो सुझावों को जनता के हित में ले और उन पर अनुभवी ढंग से अमल करे।
शुक्रवार, 19 अगस्त 2022
राजमार्गों का निर्माण: लक्ष्य पूर्ति के लिए गुणवत्ता से न हो समझौता
राज्य सभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी का एक विडीओ काफ़ी चर्चा में था। प्रश्न के उत्तर में मंत्री जी ने ऐसे कई दावे कर दिए जो यदि समय पर सच हुए तो हर भारतीय का सीना फूला नहीं समाएगा। परंतु सवाल उठता है कि अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए नेताओं द्वारा किए गए ऐसे वादों और दावों में कहीं निर्माण की गुणवत्ता के साथ समझौता तो नहीं हो रहा?
पिछले दिनों हुई वर्षा के कारण हिमाचल प्रदेश व अन्य पहाड़ी राज्यों में हुए भूस्खलन की खबरें आपने ज़रूर पढ़ी होंगी। आए दिन ऐसी दुर्घटनाओं में जान-माल का काफ़ी नुक़सान होता है। पहाड़ों पर होने वाली इन दुर्घटनाओं को कुदरत का क़हर कह कर पल्ला झाड़ लिया जाता है। लेकिन सत्य इसके विपरीत है। प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ हमें बहुत महंगी पड़ रही है, इस बात के सैंकड़ों उदाहरण मिल जाएँगे। ऐसी दुर्घटनाओं के पीछे बहुत सारे निहित स्वार्थ कार्य करते हैं जिनमें राजनेता, अफ़सर और निर्माण कम्पनियाँ प्रमुख होती हैं। क्योंकि ऐसे आत्मघाती ‘विकास’ के पीछे केवल आर्थिक मुनाफ़ा ही सर्वोच्च प्राथमिकता होता है।
ये मुनाफ़ा करने वाले लोग नेताओं से बड़े-बड़े ऐलान तो ज़रूर करवा देते हैं, लेकिन इन ऐलानों के पीछे छिपे अपने स्वार्थ को कभी सामने नहीं आने देते। इन भ्रष्ट अफ़सरों और निर्माण कम्पनियों का भांडा तब फूटता है जब लोकार्पण के कुछ ही दिनों बाद अरबों रुपए की लागत से बने राजमार्ग या एक्सप्रेस-वे गुणवत्ता की कमी के चलते या तो धँस जाते हैं या बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसी धांधली केवल सड़क मार्गों पर ही होती है। ऐसा भी देखने को मिला है जब रेल की पटरियाँ भी धँस गई और रेल दुर्घटना हुई।
मिसाल के तौर पर दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे बड़े-बड़े राज्यों से वर्षा के दिनों में सड़कों के धँस जाने के कई मामले हाल ही में सामने आए हैं। ग़ौरतलब है कि ये परियोजनाएँ किसी और लक्ष्य को ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं। सड़क के बनने में ठेका किसे मिले पहले उसकी योजना बनाई जाती है। जितनी महंगी परियोजना होती है उतनी जल्दी उसे मंज़ूरी मिलती है। फिर उसमें उतना ही ज़्यादा कमीशन बनता है। यह कोई नयी बात नहीं है सदा से यही चला आ रहा है और आजतक कुछ भी नहीं बदला हालाँकि पारदर्शिता के दावे बहुत किए गये।
सड़क बनने के बाद यदि किन्ही कारणों से सड़क पर कोई टूट-फूट होती है तो उसकी मरम्मत की ठेकेदारी पर भी ठीक वैसा ही होता है जैसा सड़क के बनने पर हुआ था। दोनों ही स्थितियों में धनलक्ष्मी की अहम भूमिका होती है। परंतु कुछ काम ऐसे होते हैं जिनमें आर्थिक लाभ के बजाए जनहित को महत्व देना बेहतर होता है।
नितिन गड़करी हों या भविष्य में आने वाले मंत्री, इन सबको जनहित के कार्यों में जनता के हित को ही महत्व देना चाहिए। ये आम मतदाता की अपेक्षा रहती है। गडकरी ने राज्य सभा में कहा कि 2024 से पहले देश की सड़कों को अमेरिका जैसा कर दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस साल दिसंबर तक दिल्ली से कई शहर 2 घंटे की दूरी पर होंगे। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि, “दिल्ली से मेरठ चालीस मिनट में आते हैं। मेरठ के लोगों ने बताया कि हम कनॉट प्लेस जाते हैं और आइसक्रीम खाते हैं और वापस मेरठ आ जाते हैं।” यह बात अगर सच है तो तारीफ़ के काबिल है। पिछले वर्ष मेरा राजस्थान के जैसलमेर जाना हुआ। वहाँ भारत माला परियोजना के तहत बनी नई सड़कों पर चलते हुए इस बात का यक़ीन नहीं हो रहा था कि हम भारत में हैं। ऐसा ही कुछ अनुभव तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद की नई बनी रिंग रोड पर भी हुआ जहां गाड़ियाँ हवा से बातें कर रही थीं।
नितिन गडकरी ने आने वाले कुछ महीनों में बनने वाले राजमार्गों की लिस्ट गिनाते हुए कहा कि “दिल्ली से दो घंटों की दूरी तय करने वाले शहर होंगे जयपुर, हरिद्वार और देहरादून। दिल्ली से अमृतसर की दूरी 4 घंटे में और दिल्ली से मुंबई की दूरी 12 घंटे में इसी साल दिसंबर से पहले हम संभव कर देंगे।” उन्होंने ये भी कहा कि दक्षिण भारत में भी यह काम चल रहा है।चेन्नई से बेंगलुरू की दूरी भी 2 घंटे में तय हो जाएगी।
नितिन गड़करी के बारे में यह कहा जाता है कि वो एक कर्मठ नेता हैं, जो लक्ष्य कि पूर्ति के लिए गुणवत्ता से समझौता नहीं करते। पिछले दिनों गड़करी का एक निरीक्षण सुर्ख़ियों में था जहां वे निर्माणाधीन दिल्ली मुंबई एक्सप्रेसवे के निरीक्षण के लिए रतलाम पहुँचे। उस हिस्से का स्पीड टेस्ट करने के लिए अपनी गाड़ी को 150 तेज़ गति से चलवाया। इस स्पीड टेस्ट से वे काफ़ी संतुष्ट नज़र आए। ग़ौरतलब है कि अन्य नेताओं की तरह वे चाहते तो वे भी हेलीकाप्टर से निरीक्षण कर लौट सकते थे। परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। स्पीड टेस्ट कर उन्होंने एक मिसाल क़ायम की जो भविष्य में आने वाले सड़क एवं राजमार्ग मंत्रियों के लिए उपयोगी होगी। इतना ही नहीं सड़क या राजमार्ग बनाने वाली कम्पनी को भी इस बात का डर रहेगा कि उनके द्वारा बनाई गई सड़क के किसी भी हिस्से पर ऐसा स्पीड टेस्ट हो सकता है।
अभी भी सुधार की गुंजाइश है। लक्ष्य पूर्ति के साथ गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए। यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि इन घोषणाओं के चलते किए गए ये दावे गुणवत्ता के पैमाने पर कितने खरे उतरते हैं? चूँकि ऐसी योजनाओं में भ्रष्टाचार तों अपने पाँव पसारता ही है? ऐसे में जनहित का दावा करने वाले नेता क्या वास्तव में जनहित करे पाएँगे?
शुक्रवार, 12 अगस्त 2022
अपने मोहल्ले के श्रीकांत त्यागी को सबक़ सिखाएँ
नॉएडा की एक बहुमंज़िला सोसाइटी में एक राजनैतिक दल के नेता की दबंगाई पर पिछले हफ़्ते काफ़ी बवाल मचा। वैसे ऐसे दबंग हर गली मोहल्ले में पाए जाते हैं। परंतु स्थानीय निवासी उनके दबदबे के आगे मौन रह जाते हैं। कोई भी नागरिक फ़िज़ूल के बवाल में नहीं उलझना चाहता ।स्थानीय निवासी ऐसे ‘नेताओं’ के झूठे दावों को सच मान कर उन्हें वास्तव में किसी बड़े दल का नेता मान लेते हैं। ऐसे आत्मघोषित नेताओं द्वारा नियमों और क़ानूनो की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाना उनके राजनैतिक रुतबे का हिस्सा मान लिया जाता है। ऐसा व्यक्ति जिस राजनैतिक दल का नेता होने का दावा करता है, यदि वो दल सत्ता में हो तो सोने पे सुहागा।
वर्षों से श्रीकांत त्यागी ने खुद को सत्तारूढ़ दल का नेता बता कर इस बात का फ़ायदा उठाया और सोसाइटी के लोगों को परेशान करता रहा। सोसाइटी के निवासियों की माने तो वहाँ के सुरक्षाकर्मियों से त्यागी की आए दिन झड़प होती रहती थी। कभी-कभी हाथापाई भी होती थी। परंतु मामले ने तूल तब पकड़ा जब उसी सोसाइटी की निवासी एक जागरूक महिला ने हिम्मत दिखाई और त्यागी के तीन साल पुराने ग़ैरक़ानूनी अतिक्रमण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। इस पर त्यागी बौखला गया और उसने इस महिला से काफ़ी बदसलूकी की। जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वाईरल हो गया। फिर तो टीवी के राष्ट्रीय चैनलों ने भी मामले को तूल दे दिया। नतीजन उस महिला से बदतमीज़ी करना त्यागी को बहुत भारी पड़ा। उसके विरुद्ध स्थानीय थाने में केस दर्ज हो गया।
तीन-चार दिनों की आँख मिचौली के बाद आख़िरकार पुलिस ने त्यागी को मेरठ से गिरफ़्तार कर लिया। इस विवाद में सत्तारूढ़ दल भाजपा का त्यागी से फ़ौरन पल्ला झाड़ना और फिर त्यागी के ग़ैरक़ानूनी अतिक्रमण पर सरकारी बुलडोज़र का चलना ऐसा संदेश हैं जो त्यागी जैसे सैंकड़ों स्वघोषित नेताओं पर भविष्य में शायद लगाम कसेगा।
सवाल उठता है कि चाहे अपनी गाड़ी पर झंडा लगाकर किसी राजनैतिक दल का प्रचार करना हो या अपने मोहल्ले में अपनी दबंगाई का दिखावा करना हो, क्या इन लोगों को इस बात की छूट उनका राजनैतिक दल देता है? जवाब है नहीं, कोई भी दल इस बात अनुमति नहीं देता कि उसके कार्यकर्ता आम लोगों से बदतमीज़ी करें। दरअसल ये असामाजिक तत्व हैं जो राजनीति की खाल ओढ़ लेते हैं। पर ये थाली के बैंगन ही होते हैं और मौक़ा देखते ही अपना दल बदल लेते हैं। इनका मक़सद राजनीति का चोला ओढ़ कर गुंडागर्दी से केवल पैसा कमाना होता है। तभी तो ऐसे स्वघोषित नेता अपने पैसे से वो सब दिखावा कर लेते हैं जिससे सामने वाले को यह यक़ीन हो जाता है कि इसके राजनैतिक रिश्ते बहुत ऊपर तक हैं। त्यागी ने पुलिस को दिए अपने बयान में बताया है कि अपनी हर गाड़ी पर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का वीआईपी पंजीकरण नम्बर लेने के लिए ही उसने लाखों रुपए खर्च किए।
हालाँकि त्यागी के मामले में भाजपा के पल्ला झाड़ने के बावजूद इस दल के शीर्ष नेताओं के साथ त्यागी के फ़ोटो भी सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में हैं। इन तस्वीरों को लेकर विपक्ष भी भाजपा को घेरने में जुटा है। जब तक त्यागी की गिरफ़्तारी नहीं हुई थी, तब तक विपक्षी नेता नॉएडा पुलिस और प्रशासन द्वारा की गई कार्यवाही को महज़ दिखावा बता रहे थे।
दरअसल ये स्वघोषित नेता अपनी दबंगाई के चलते स्थानीय पुलिस और प्रशासन को भी क़ाबू में रखते हैं। ज़ाहिर है इसमें धनलक्ष्मी की भी ख़ास भूमिका रहती है। जिससे पुलिसकर्मी और प्रशासन इनके प्रभाव में रहता है। नतीजतन स्थानीय लोगों को परेशान करने का हर ज़िले में एक पूरा तंत्र व्यवस्थित है। जिसमें और रंग जमाने के लिये ये आत्मघोषित नेता अपने दल के बड़े-बड़े नेताओं के करीबी होने का प्रदर्शन करने के लिए उनको हर मौक़े पर बधाई देने वाले होर्डिंग लगवाते हैं। जिनकी कोई अनुमति स्थानीय शासन से नहीं लीं जाती। इन पर ये अपने भी फ़ोटो लगवाते रहते हैं। या फिर उन नेताओं के सम्मान में अपने खर्च पर जलसे भी करवाते रहते हैं। जिसका फिर ये खूब नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं।
राजमार्गों पर टोल बूथ के कर्मचारी हों या किसी सोसाइटी के गार्ड, इन नेताओं की गाड़ी को नियम और क़ानून का पालन करने के लिए कहना इनको काफ़ी नागवार लगता है। नेता जी के साथ चलने वाले इनके चमचे इन ग़रीबों की काफ़ी अच्छी ख़ातिर करते हैं। ऐसे में इन कर्मचारियों का इनके दबाव के आगे झुकना एक सामान्य सी बात है। इसके विपरीत आचरणवाद के लिये आज देश भर में उस साहसी महिला की मिसाल दी जा रही है जिसने हिम्मत दिखाई और त्यागी और उसके झूठे रुतबे को धूल चटवाई।
मोटर वाहन अधिनियम के तहत केवल सरकारी वाहन पर ‘भारत सरकार’ या ‘प्रदेश सरकार’ लिखा जा सकता है। किसी भी निजी वाहन पर ‘प्रदेश सरकार’ या ‘भारत सरकार’ नहीं लिखा जा सकता। नॉएडा पुलिस ने श्रीकांत त्यागी की कई महंगी गाड़ियाँ भी ज़ब्त की हैं। इनमें से एक गाड़ी पर ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से ‘उत्तर प्रदेश शासन’ का चिन्ह भी छपा है। क़ानून की इस अवहेलना पर भी त्यागी पर केस चलेगा। लेकिन उसकी सज़ा तो मामूली सा जुर्माना ही होगी। अच्छा तो यह हो कि एक मिसाल क़ायम करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को उस गाड़ी को ज़ब्त कर लेना चाहिए। वो भी उस अवधि की दुगनी अवधि तक जिस समय से त्यागी उसपर राज्य सरकार के चिन्ह गैरक़ानूनी रूप से इस्तेमाल कर रहा था।
नॉएडा के त्यागी प्रकरण के बाद सोशल मीडिया पर देश भर से तमाम ऐसे और भी विडीयो चर्चा में आ रहे हैं जहां ऐसे स्वघोषित नेता या तो किसी गरीब पर या किसी प्रशासनिक व्यक्ति पर अपने रुतबे का आतंक दिखाते नज़र आ रहे हैं। इस बीमारी का एक ही इलाज है। जैसे उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने त्यागी मामले में किया वैसा ही योगी जी को हर ज़िले के अपने दल के ऐसे नेताओं के विरुद्ध करना चाहिये। इसी तरह अन्य प्रदेशों के मुख्य मंत्रियों को भी अपने शहरों में करना चाहिए।सार्वजनिक जीवन शुद्धि के इस अभियान से जनता के बीच एक सकारात्मक संदेश जाएगा कि कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो लेकिन कानून सब से ऊपर है। एक कहावत है कि यदि डाल पर दस पक्षी बैठे हैं और शिकारी एक पर निशान साधता है तो बाक़ी के नौ डर कर उड़ जाते हैं। नॉएडा प्रकरण में योगी जी की इस पहल से ऐसा ही कुछ होने की आशा की जानी चाहिए। साथ ही इसका आम लोगों में भी एक संदेश जाएगा कि यदि कोई व्यक्ति त्यागी की तरह अपने राजनैतिक संबंधों का नाजायज़ फ़ायदा उठाए तो उसके ख़िलाफ़ आप आवाज़ ज़रूर उठाएँ। उसे सोशल मीडिया पर खूब वाईरल करें। इससे हर गली-मोहल्ले के इन आत्मघोषित नेताओं की खाल में छिपे गुंडों को सबक़ मिलेगा और जनता को उनकी दबंगाई से राहत।
शुक्रवार, 5 अगस्त 2022
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला !
‘रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला’ सुप्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन की बहुचर्चित कविता की इस पंक्ति से शायद दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल को प्रोत्साहन मिला और उन्होंने दिल्ली की आबकारी नीति में कुछ बड़े फेरबदल किए। नतीजा यह हुआ कि दिल्ली एनसीआर में शराब की क़ीमतों और बिक्री में दिल्ली अव्वल नम्बर पर आ गया। परंतु पिछले कुछ दिनों से दिल्ली की आबकारी नीति के चलते दिल्ली सरकार और उप-राज्यपाल में विवाद की स्थिति आ गई है। दिल्ली की शराब की दुकानों पर लागू हुई नई आबकारी नीति 31 जुलाई 2022 को समाप्त होनी थी। इसके बाद इस नई नीति को दोबारा लागू किया जाता उससे पहले ही ये नीति विवादित हो गई।
अगर केजरीवाल सरकार की मानें तो 2021-22 में लागू की गई इस नीति के तहत सभी सरकारी दुकानों को बन्द कर प्राइवेट दुकानों को नीलामी की प्रक्रिया के तहत आवंटित करना तय हुआ। दिल्ली सरकार का दावा था इस नई नीति से भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और आबकारी विभाग का ख़ज़ाना भी बढ़ेगा। नई नीति के तहत दिल्ली में 850 से ज़्यादा शराब की दुकानें नहीं खुलनी थीं। पुरानी व्यवस्था में इन्हीं 850 दुकानों से सरकार को करीब 6 हजार करोड़ रुपये का राजस्व मिलता था। नई नीति के तहत इन्हीं 850 दुकानों के निजी क्षेत्र में जाने से सरकार का राजस्व डेढ़ गुना बढ़ कर 9.30 हज़ार करोड़ हो जाता।
जब से यह सियासी विवाद उठा तो दिल्ली सरकार इस नीति को लेकर बैकफुट पर दिखाई देने लगी। इसके पीछे कारण दिल्ली के उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना द्वारा नई आबकारी नीति के कार्यान्वयन की सीबीआई जांच की सिफारिश है। दिल्ली सरकार पर आरोप है कि नई आबकारी नीति में नियमों की अनदेखी के चलते शराब की दुकानों के टेंडर दिए गए हैं। उपराज्यपाल की सिफ़ारिश के बाद आनन-फ़ानन में दिल्ली सरकारने ने अब पुरानी व्यवस्था को लागू करने का निर्णय लिया है। फ़िलहाल यह पुरानी व्यवस्था 6 महीने के लिए ही लागू की जाएगी। इन 6 महीनों में दिल्ली सरकार एक नई नीति लाने की योजना बनाएगी। इसका मतलब यह हुआ कि दिल्ली सरकार ने जैसा अनुमान लगाया था वैसा नहीं हुआ।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब केजरीवाल द्वारा लिए गए निर्णय विवादों में न रहे हों। विपक्ष को इन विवादों के पीछे अनुभवहीनता की झलक दिखाई देती आई है। फिर वो चाहे मुफ़्त में बिजली-पानी जैसी मूलभूत सुविधाएँ हों या महिलाओं को बसों में मुफ़्त यात्रा हो। विपक्ष केजरीवाल को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ती। केजरीवाल सरकार द्वारा लिए गए कुछ निर्णय अव्यावहारिक ज़रूर रहे हैं। लेकिन कई निर्णय ऐसे भी हैं जिनमें कुछ विभागों में जनता की सहूलियत सालों से चले आ रहे भ्रष्टाचार पर भारी पड़ी। इनमें ज़्यादा विवाद नहीं उठे क्योंकि ज़्यादातर लोगों को इन नीतियों से लाभ ही मिला। मिसाल के तौर पर ड्राइविंग लाइसेंस के नवीकरण का घर बैठे ही हो जाना एक अच्छा कदम है। परंतु इसके साथ ही केजरीवाल सरकार द्वारा दिल्ली की सड़कों को यूरोप की तर्ज़ पर सजाने के निर्णय से मौजूदा सड़कों की चौड़ाई कम की गई जिससे नागरिकों को आय दिन काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सड़कों पर जाम बढ़ गए और बिना वजह लाखों का क़ीमती ईंधन ज़ाया जाने लगा। मौजूदा सड़कों की मरम्मत और रख-रखाव कर इन्हीं को दुरुस्त बनाया जा सकता था। परंतु जल्दबाज़ी के निर्णय से जनता को जो कष्ट झेलने पड़ते हैं उनका विचार किए बिना नई नीतियों को लागू कर दिया जाता है।
शराब की दुकानों के विषय में दिल्ली सरकार की नई आबकारी नीति का लाना, फिर वापस पुरानी नीति पर जाना, इसी बात का संकेत है कि केजरीवाल सरकार के अफ़सर जनता के कर के पैसे को ऐसी योजनाओं पर बर्बाद कर रहे हैं। यदि ध्यान से देखा जाए तो दिल्ली में शराब की बिक्री को लेकर बार-बार बदलाव के कारण उपभोक्ताओं को दिल्ली से सटे एनसीआर इलाक़ों में जा कर शराब ख़रीदने पर मजबूर होना पड़ रहा है। इससे सरकार के राजस्व में भी घाटा हो रहा है।
ग़ौरतलब है कि 2021-22 की नई आबकारी नीति को 31 मार्च 2022 के बाद दो बार दो-दो महीने के लिए बढ़ाया भी गया था। यदि ऐसा हुआ था तो इसका यही मतलब हुआ कि यह नीति ठीक थी। दिल्ली सरकार के उप-मुख्य मंत्री मनीष सिसोदिया के अनुसार शराब की तय 850 दुकानों में से केवल 468 दुकानें ही चल रही थीं। सिसोदिया ने केंद्र में भाजपा की सरकार पर आरोप लगाया है कि उनके द्वारा इन दुकानदारों को भी ईडी और सीबीआई का भय दिखा कर बन्द करवाया जा रहा है। इस सब से दिल्ली में शराब की क़िल्लत पैदा हो जाएगी। नतीजतन तस्करी वाली शराब और नकली शराब के धंधे में इज़ाफ़ा होगा। जो भी हो दिल्ली में शराब के शौक़ीन लोगों को या तो महंगी शराब के सहारे रहना होगा या पड़ौस के शहरों से शराब ले कर पीना होगा। शायद बच्चन साहब ने सही ही कहा ‘रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला’ !
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