शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023
केदारनाथ हादसा: नागरिक विमानन महानिदेशालय कब जागेगा?
केदारनाथ में हैलीकाप्टर के पंखों ने एक युवा का सिर धड़ से अलग कर दिया। ये हृदय विदारक दुर्घटना बीते रविवार हुई। इस हेलीकाप्टर हादसे ने एक बार फ़िर से भारत सरकार के नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) और कुछ निजी एयर चार्टर कम्पनियों की साँठगाँठ के चलते हो रही लापरवाही को उजागर किया है। यदि निरीक्षण यात्रा पर हादसा हो जाता है तो हवाई सेवा प्रदान करने वाली निजी कंपनी का सवालों के घेरे में आना निश्चित ही है। क्या केदारनाथ में निजी चार्टर सेवा देने वाली कम्पनी मुनाफ़े के लालच में नियमों की अनदेखी कर रही थी? पिछले वर्ष हुई दुर्घटना के बावजूद, इस कंपनी को उड़ान भरने की इजाज़त देने से पहले क्या डीजीसीए ने सब कुछ सुनिश्चित कर लिया था?
इस दुर्घटना में उत्तराखंड सिविल एविएशन के फाइनेंशियल कंट्रोलर अमित सैनी की हेलीकॉप्टर के पंखे की चपेट में आने से मृत्यु हो गई। हमेशा की तरह मामले की जाँच डीजीसीए द्वारा किए जाने के आदेश भी दे दिए गये। परंतु जो भी तथ्य सामने आ रहे हैं उनसे तो ऐसा लगता है कि कुछ बुनियादी मानदंड की अनदेखी हुई है। केदारनाथ यात्रा से एक दिन पहले किए जाने वाले निरीक्षण की केवल औपचारिकता ही निभाई जा रही थी। यदि ऐसा नहीं थी तो क्या कारण था की अमित सैनी को हेलीकॉप्टर के पीछे से जाने दिया गया? जब हेलीकॉप्टर के रोटर व इंजन चालू थे तो निजी विमान कंपनी के द्वारा अनुभवी ग्राउंड स्टाफ़ को तैनात क्यों नहीं किया गया था? यदि अनुभवी स्टाफ़ की तैनाती होती तो किसी को भी हेलीकॉप्टर के पीछे से जाने नहीं दिया जाता।
जैसा कि हमेशा होता है, हर विमान यात्रा से पहले यात्रियों को आपात स्थित के बारे में समझाया जाता है। शायद यहाँ ऐसा नहीं हुआ। डीजीसीए के ‘एयर सेफ़्टी’ विभाग के अधिकारियों ने भी क्या निरीक्षण के नाम पर केवल औपचारिकता ही निभाई थी? ऐसे में क्या केवल पायलट को ही दोषी ठहरा कर ही जाँच पूरी कर दी जाएगी? डीजीसीए के जो अधिकारी ऐसी निजी कंपनियों का निरीक्षण करते हैं उनकी क्या ज़िम्मेदारी है?
आए दिन यह देखा जाता है कि जब भी कोई विमान हादसा होता है या किसी एयरलाइन के कर्मचारी द्वारा कोई गलती होती है तो डीजीसीए उसकी जाँच कर कुछ दोषियों को सज़ा देती है। परंतु ऐसे कई मामले सामने आते हैं जहां बड़ी से बड़ी गलती करने वाले को डीजीसीए द्वारा केवल औपचारिकता करके कम सज़ा दी जाती है। फिर वो चाहे एक कोई नामी कमर्शियल एयरलाइन हो, किसी प्रदेश का नागरिक उड्डयन विभाग हो या कोई निजी चार्टर हवाई सेवा वाली कम्पनी। यदि डीजीसीए के अधिकारियों ने मन बना लिया है तो बड़ी से बड़ी गलती को भी नज़रंदाज़ कर दिया जाता है। कभी-कभी डीजीसीए के अधिकारी अपनी गलती छिपाने के लिए भी बेक़सूर को दोषी ठहरा कर उसे सज़ा दे देते हैं या मौसम की गलती बता देते हैं।
वहीं दूसरी ओर जब भी किसी ख़ास वजह से किसी बड़ी गलती वाले दोषी को सज़ा से बचाना होता है तब भी डीजीसीए के भ्रष्ट अधिकारी पीछे नहीं रहते। फिर वो चाहे ‘आर्यन एविएशन’ हो या कोई अन्य निजी एयरलाइन डीजीसीए के भ्रष्ट अधिकारी दोषी को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। आपको ऐसे कई उदाहरण मिल जाएँगे जहां अन्य निजी चार्टर कम्पनी के पाइलट या अन्य कर्मचारी सभी नियम और क़ानून की धज्जियाँ उड़ा कर अपने लिए कम से कम सज़ा तय करवा लेते हैं। चूँकि यह निजी चार्टर सेवा प्रदान करने वाली कंपनियाँ देश के बड़े-बड़े नेताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों को अपनी सेवा प्रदान करती रहती है इसलिए वो अपने प्रभाव का दुरुपयोग करके अपने ख़िलाफ़ हर तरह की कार्यवाही को अपने ढंग से तोड़ मरोड़ कर खानापूर्ति करवा लेती हैं। जबकि इससे कम संगीन ग़लतियों पर डीजीसीए के अधिकारी एयरलाइन के कर्मचारियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दे देते हैं। ऐसे दोहरे मापदंड क्यों?
इसलिए यदि किसी भी पायलट या निजी विमान सेवा कंपनी के स्टाफ़ की गलती पर पर्दा डाल कर उसे ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से उड़ान भरने की अनुमति दे दी जाती है तो केदारनाथ जैसे हादसे भविष्य में दोहराए जाएँगे। यदि उस हादसे में आम जानता की जान जाएगी तो जाँच की औपचारिकता ज़रूर की जाएगी परंतु सच सामने आएगा या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं।
ग़ौरतलब है कि डीजीसीए के ऐसे ही कृत्यों के ख़िलाफ़ जब भी कोई शिकायती पत्र लिखा गया, जिसमें नागरिक उड्डयन मंत्री का ध्यान इन मुद्दों पर आकर्षित किया गया तो डीजीसीए व नागरिक उड्डयन मंत्रालय के कुछ चुनिंदा अधिकारी जाँच न होने के लिए सभी हथकंडों का इस्तेमाल करते हैं। यदि उनके हथकंडे काम में नहीं आते तो दोषियों को दंड देने की औपचारिकता के चलते बहुत कम सज़ा दे दी जाती है। मंत्रालय के अधिकारियों पर गाज तब भी नहीं गिरती।
ऐसी लापरवाहियों के चलते ही ऐसे हादसों में भी बढ़ोतरी हुई है। हादसे चाहे निजी एयरलाइन के कर्मचारियों द्वारा हो, निजी चार्टर कंपनी द्वारा हो, किसी ट्रेनिंग सेंटर में हो या फिर किसी राज्य सरकार के नागर विमानन विभाग द्वारा हो, यदि वो मामले तूल पकड़ते हैं तो ही दोषियों को कड़ी सज़ा मिलती है। वरना ऐसी घटनाओं को आमतौर पर छिपा दिया जाता है।
वीवीआईपी व जनता की सुरक्षा की दृष्टि से समय की माँग है कि नागर विमानन मंत्रालय के सतर्कता विभाग को कमर कस लेनी चाहिए और डीजीसीए में लंबित पड़ी पुरानी शिकायतों की जाँच कर यह देखना चाहिए कि किस अधिकारी से क्या चूक हुई। ऐसे कारणों की जाँच भी होनी चाहिए कि तय नियमों के तहत डीजीसीए के अधिकारियों ने दोषियों को नियमों के तहत तय सज़ा क्यों नहीं दी और एक ही तरह की गलती के लिए दोहरे मापदंड क्यों अपनाए?
शुक्रवार, 21 अप्रैल 2023
पुलिस फिर सवालों के घेरे में !
कुख्यात अपराधी अतीक अहमद के बेटे असद अहमद के एनकाउंटर का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि पुलिस हिरासत में मेडिकल जाँच के लिये जाते समय अतीक और उसके भाई अशरफ़ की हत्या कर दी गई। इस घटना से पुलिस प्रशासन एक बार फिर से सवालों के घेरे में आ गई है। उस पर कई तरह के सवाल उठने लग गये हैं। सरकार ने भी जाँच के आदेश दे दिये हैं, जिसकी रिपोर्ट आने पर ही सही कारण का पता चलेगा।
जब भी कभी ऐसी घटना घटती है तो राजनेता इस पर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेकने से पीछे नहीं हटते। हमेशा की तरह विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है। पर यहाँ सवाल राजनीति का नहीं है। सवाल पुलिस की कार्यशैली का है। पुलिस की हिरासत में विचाराधीन कैदियों का फ़िल्मी अन्दाज़ में मारा जाना पुलिस व्यवस्था को शक के घेरे में लाती है। ऐसा नहीं है कि इस तरह की घटना पहली बार हुई हो। अफ़सोस की बात है कि कई बार पहले हो चुकी ऐसी घटनाओं से पुलिस प्रशासन ने कोई सबक़ नहीं लिए।
हत्या अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ़ की हुई हो या किसी और विचाराधीन कैदी की ऐसी घटना की जितनी भी निंदा की जाए उतनी कम है। विचाराधीन कैदी कितना कुख्यात है, उसे कितनी कठोर सज़ा मिलनी चाहिए, ये काम अदालत का है। यदि अदालत के बजाय बदले की भावना से सड़कों पर न्याय होने लगे तो भारत को गणतंत्र के बजाय ‘गन’-तंत्र कहा जाने लगेगा।
सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में हम सभी ने देख कि कोरोना काल के दौरान जब सभी कुछ घर बैठे हो सकता है। तो ऐसे कुख्यात अपराधी व विचाराधीन क़ैदियों को न्यायालय के सामने भौतिक रूप से उपस्थित करना कहाँ तक उचित है? ख़ासतौर से जब पुलिस के पास इस बात की जानकारी हैं कि ऐसे क़ैदियों को छुड़ाया जा सकता है या उन पर हमला हो सकता है। तो क्या कारण था कि साबरमती की जेल से लगभग 1300 किलोमीटर की दूरी सड़क मार्ग से ही पूरी की गई? इस पूरी यात्रा पर जो खर्च हुआ उससे काफ़ी कम ख़र्च में क़ैदियों को दूसरे साधनों से भी लाया जा सकता था। ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में ही एक कुख्यात अपराधी को आजीवन कारावास की सज़ा वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के माध्यम से सुनाई गई थी।
क्या अतीक और उसके भाई अशरफ़ की मेडिकल जाँच सुरक्षित माहौल में प्रयागराज के जेल में नहीं हो सकती थी? इन दोनों अपराधियों की संवेदनशीलता और सुरक्षा के चलते पुलिस को अदालत में इस बात को भी उठाना चाहिए था कि दोनों अपराधियों की मेडिकल जाँच जेल में ही हो। यदि उनकी मेडिकल जाँच के लिये उनको अस्पताल ले जाना ही था तो एक कड़ा सुरक्षा घेरा क्यों नहीं बनाया गया? ऐसी क्या मजबूरी थी कि इस जाँच को रात में ही होना था? इस जाँच की सूचना मीडिया को किस ने दी और क्यों दी? ये सूचना इन युवकों तक कैसे पहुँची? किसी भी विचाराधीन कैदी को मीडिया से बात करने की अनुमति नहीं होती है तो ऐसी अनुमति किस अधिकारी ने दी? जो मीडियाकर्मी इन क़ैदियों के इतने नज़दीक आ गये थे क्या उनकी तलाशी हुई थी? दोनों क़ैदियों को एक ही हथकड़ी से बांधा जाना क्या सही था? जिन विचाराधीन क़ैदियों की सुरक्षा को लेकर पहले से ही कई तरह के संदेह बने हुए थे, उनकी सुरक्षा में अनुभवी पुलिसकर्मियों को क्यों नहीं लगाया गया? यदि इन अपराधियों को ले जा रहे पुलिसकर्मी चौकन्ना रहते तो शायद ये वारदात न हो पाती।
वारदात को अंजाम देने वाले युवकों को सीधा न्यायिक हिरासत में क्यों भेजा गया? उनका पुलिस रिमांड क्यों नहीं माँगा गया? वारदात के कई दिनों बाद तक पुलिस रिमांड का ना लेने से क्या इस कांड के मास्टरमाइंड को सुबूतों को मिटाने व देश छोड़ कर भागने का मौक़ा दिया जा रहा था? इतने महँगे व प्रतिबंधित हथियार इन युवकों के पास कैसे आए? इन युवकों को, जो कि छोटे-मोटे अपराधी थे, इन अत्याधुनिक हथियारों को चलाने का प्रशिक्षण किसने दिया? यदि पुलिस रिमांड लिया जाता तो ऐसे कई तथ्यों का पता चलता। परंतु ऐसा नहीं हुआ। इन सवालों का जवाब भी पुलिस को जाँच कमेटी को देना पड़ेगा।
जिस तरह ज़्यादातर अदालतों में विचाराधीन क़ैदियों के प्रवेश के लिए अलग गेट बने होते हैं उसी तरह अस्पतालों में भी सुरक्षित गेट होने चाहिए जहां क़ैदी व पुलिस के अलावा और कोई भी न आ सके। यदि किसी जगह विचाराधीन कैदी या कुख्यात अपराधी को ले जाया जाता है तो पुलिस को सुरक्षा के पुख़्ता इंतज़ाम रखने चाहिए। नहीं तो ऐसी घटनाएँ नहीं रुकेंगी और अपराधियों को क़ानून के हिसाब से सज़ा नहीं मिल पाएगी। अपराधियों का ख़ात्मा या तो किसी षड्यंत्र के तहत या विरोधी गिरोह द्वारा होता ही रहेगा और आरोप पुलिस पर ही लगेगा।
हर कोई चाहता है कि अपराधियों को कड़ी से कड़ी सज़ा मिले, जिससे कि भविष्य में अपराधी अपराध करने से पहले कई बार उसके अंजाम के बारे में सोचे। परंतु इसके साथ इस बात पर भी गौर करने की ज़रूरत है कि क्या देश भर की अदालतों में लंबित पड़े लाखों आपराधिक मामलों में देरी होने के चलते ‘पुलिस एनकाउंटर’ या ऐसी हत्याएँ बढ़ने लग गई है? क्या यह न्याय का नया तरीक़ा है जो चलन में आ गया है? क्या आपराधिक जाँच कर रही पुलिस को या किसी अन्य को ऐसी सज़ा देने का कोई हक़ है जिस पर सवाल उठाए जा सकते हैं? यदि ऐसा नहीं है तो पुलिस द्वारा किए जाने वाले एनकाउंटर या पुलिस की मौजूदगी में होने वाली ऐसी हत्याएँ भी कड़ी सज़ा की श्रेणी में ही आएँगी और पुलिसकर्मियों को इसकी सज़ा भी भुगतनी पड़ सकती है।
शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023
जालसाज़ों से सावधान!
लोग जब किसी पर आँख बंद कर विश्वास कर लेते हैं तो अक्सर जालसाज़ी और ठगी के शिकार हो जाते हैं। परंतु आज के युग में न केवल फ़ोन पर आपकी ज़रूरी जानकारी ले कर आपको लूट लिया जाता है बल्कि नये-नये तरीक़ों से ठग और जालसाज़ अपना कारोबार बढ़ा लेते हैं। ऐसे में मासूम और भोले भाले लोगों को उनके लुटने का पता तब चलता है जब काफ़ी देर हो चुकी होती है। इस बार आपको ठगों के ऐसे ही एक तरीक़े से वाक़िफ़ कराया जाएगा।
मामला मध्य प्रदेश के भिंड जिले के रवि गुप्ता का है। रवि भिंड जिले में एक टेलीकाम कंपनी में काम करने वाले साधारण से व्यक्ति हैं जिनका मासिक वेतन 50-60 हज़ार रुपए है। रवि को हाल ही में आयकर विभाग से 113.80 करोड़ रुपये जमा करने का नोटिस मिला। रवि के साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ। इससे पहले दिसंबर 2020 में भी रवि को 132 करोड़ रुपये के लेनदेन के मामले में 3.49 करोड़ का नोटिस मिला था। नोटिस मिलते ही रवि ने भोपाल में सीबीआइ कार्यालय व प्रधान मंत्री कार्यालय में इसकी शिकायत की। सीबीआइ में हुई शिकायत के बाद ग्वालियर की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा इसकी जांच की चल रही है। जाँच में यह बात सामने आई कि जब 2011-12 में रवि गुप्ता कोलकाता में क़रीब 6-7 हजार रुपए प्रतिमाह की नौकरी कर रहे थे तब मुंबई के एक्सिस बैंक में उनके नाम से एक खाता खोलकर 132 करोड़ रुपए का लेनदेन किया गया। इसी लेनदेन के चलते आयकर विभाग ने रवि को 3.49 करोड़ का नोटिस जारी किया। जाँच में यह भी पता चला कि इस जालसाज़ी के पीछे एक हीरा कंपनी है। बैंक के दस्तावेज़ों में रवि को सूरत की हीरा कंपनी का मालिक बता कर सैंकड़ों करोड़ का लेनदेन किया गया।
ग़ौरतलब है कि रवि के साथ कुछ ही महीने बाद उन्हीं की कंपनी में काम करने वाले कपिल को भी 142 करोड़ के लेनदेन के चलते आयकर विभाग का नोटिस मिला। रवि और कपिल के बाद इंदौर के कॉल सेंटर में काम करने वाले प्रवीण राठौड़ को भी ऐसा ही एक नोटिस मिला। जाँच के बाद पता चला कि इन सभी जालसाज़ों के तार भी गुजरात के हीरा व्यापारियों से जुड़े थे। जब प्रधान मंत्री कार्यालय से दबाव आया तो भारतीय रिज़र्व बैंक ने संबंधित बैंक से स्पष्टीकरण माँगा। बैंक ने 2020 और 2022 में इस बात की पुष्टि करते हुए लिखा कि ये खाता रवि का नहीं लग रहा। बैंक द्वारा इस स्पष्टीकरण के बावजूद आयकर विभाग संतुष्ट नहीं हुआ और अभी भी अपने नोटिस पर अड़े हुए हैं। रवि अब इस नोटिस के ख़िलाफ़ उच्च न्यायालय जाने की तैयारी कर रहे हैं।
फ़ोन पर ठगी करने वालों के मामलों में बढ़ौतरी होने पर सरकार ने इनसे बचाव के कई कदम उठाए हैं। जैसे कि जनता को ऐसी ठगी के संबंध में जागरूक करना। वित्त मंत्रालय द्वारा विशेष हेल्पलाइन जारी करना, जहां खाता धारक ऐसे मामलों की तुरंत शिकायत करके ठगी को रोक सकते हैं। हर खाते में ऑनलाइन लेनदेन से पहले ओटीपी का आना। यदि आपके डेबिट या क्रेडिट कार्ड पर किसी बड़ी राशि की लेनदेन होती है तो बैंक आपसे फ़ोन पर इस लेनदेन की पुष्टि करता है। हर ऑनलाइन लेनदेन की प्रतिदिन सीमा तय करना आदि। इसके साथ ही जब भी आपके आधार कार्ड की वेरिफिकेशन होती है तो आपके पास एक ओटीपी आता है। परंतु अभी तक किसी भी पैन कार्ड धारक के पास ऐसा कोई भी ओटीपी नहीं आता कि उसके पैन कार्ड पर एक बैंक का खाता खोला गया है। जबकि बैंक खाता खोलने के लिए आधार के साथ-साथ पैन कार्ड होना भी अनिवार्य है। यदि सरकार द्वारा ऐसा कुछ किया जाता तो रवि, कपिल और प्रवीण जैसे कई लोगों के साथ होने वाली जालसाज़ी पर रोक लग जाती।
नोटबंदी के समय बैंकों में पुराने नोट जमा कराने के लिए लोगों ने आयकर से बचने के लिए अपने घरेलू नौकरों और अन्य कर्मचारियों के खाते खुलवा डाले थे। आयकर विभाग ने बैंकों की मदद से ऐसे कई लोगों को पकड़ा भी था। परंतु बैंक अधिकारियों और आयकर चोरों की साँठगाँठ के चलते कई लोग बच भी निकले। जिन्हें आजतक पकड़ा नहीं गया।
अब बात करें रवि, कपिल और प्रवीण जैसे भोले-भले मासूम लोगों की तो ऐसे बड़े घोटाले बिना बैंक अधिकारियों की साँठगाँठ के संभव ही नहीं होते। अक्सर बैंक अधिकारी अपने टारगेट पूरे करने कि होड़ में कुछ ऐसा कर बैठते हैं जिनका ख़ामियाजा बेक़सूर लोगों को भुगतना पड़ता है। यह सब हमेशा टारगेट पूर्ति के लिए ही नहीं होता। कभी-कभी लालच भी ऐसा करवा देता है। वरना क्या कारण था कि रवि, कपिल और प्रवीण जैसे युवकों को ढाल बना कर घपला करने वाले गुजरात के हीरा व्यापारी बड़े आराम से ऐसा कर सके? क्या बैंक के अधिकारी ने खाता खोलने से पहले खाता धारक के पैन और आधार का मिलान किया था? क्या पैन कार्ड पर और आधार कार्ड पर एक ही शख़्स की फ़ोटो लगी थी? क्या खाता खोलने आए व्यक्ति की फ़ोटो आधार और पैन कार्ड से मिल रही थी? यदि नहीं तो केवल रवि, कपिल और प्रवीण को ही नोटिस क्यों भेजा गया? बैंक के उन अधिकारियों, जिन्होंने खाता खोला था उनकी पूछताछ क्यों नहीं हुई? यदि हुई होती तो असली जालसाज़ तक पहुँच पाना बहुत आसान होता।
जब प्रधान मंत्री कार्यालय द्वारा इस मामले का संज्ञान लेने के बावजूद इन युवकों को आयकर विभाग परेशान कर रहा है तो जो लोग पीएमओ तक नहीं पहुँच पाए उनका क्या हाल हुआ होगा? देखना यह है कि इस मामले में रवि, कपिल और प्रवीण को न्याय मिलता है या नहीं।
शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023
आर-ओ का पानी क्यों नहीं पीना चाहिए?
पुरानी कहावत है, ‘हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती’। यह बात हर उस चीज़ के लिए लागू होती है जिसे हम सोना समझ लेते हैं। फिर वो चाहे आर-ओ से निकलने वाला चमचमाता पानी ही क्यों न हो। क्या आर-ओ का पानी जितना साफ बताया जाता है उतना ही गुणकारी भी होता है? क्या आर-ओ के पानी में वे सभी ज़रूरी तत्व होते हैं जो हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता व के विकास के लिये ज़रूरी हैं? क्या हमें आर-ओ का पानी पीना चाहिए?
अक्सर देखा गया है कि दूषित पानी से गंभीर बीमारियाँ हो जाती हैं। दूषित पानी से होने वाली बीमारियों से बचने के लिए और पानी को पीने योग्य व स्वच्छ बनाने के लिए रिवर्स ऑस्मोसिस (आर-ओ) व अन्य तरह के कई उपकरण बाज़ार में लाए गये। इन उपकरणों को बनाने वाली कंपनियों के दावे हैं कि उनके उपकरण सर्वश्रेष्ठ हैं। वे दूषित पानी से सभी कीटाणु निकाल कर उन्हें पीने योग्य व स्वच्छ बना देते हैं। परंतु यहाँ सवाल उठता है कि क्या कीटाणुओं के साथ-साथ आर-ओ जैसे ये आधुनिक उपकरण पानी में से ज़रूरी खनिज भी निकाल देते हैं? यदि इसका उत्तर हाँ है तो क्या हमें बिना ज़रूरी मिनरल वाला पानी पीना चाहिए?
विश्व स्वास्थ्य संगठन और ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैण्डर्ड के तय मानकों के अनुसार आर-ओ व अन्य तकनीकों से शुद्ध किए जाने वाले पानी को उसमें मौजूद टोटल डिजाल्वड सॉलिड्स या टीडीएस की मात्रा से स्वच्छ या पीने योग्य कहा जा सकता है। मानव शरीर अधिकतम 500 पार्ट्स प्रति मिलियन (पीपीएम) टीडीएस सहन कर सकता है। यदि यह स्तर 1000 पीपीएम हो जाता है, तो शरीर के लिए नुकसानदेह हैं। फिलहाल आरओ से साफ़ हुए पानी में 18 से 25 पार्ट्स पीपीएम टीडीएस पाये जाते हैं जो काफी कम है। इसे स्वच्छ पानी तो कह सकते हैं परंतु सेहतमंद नहीं है। 100 से 150 मिलीग्राम/लीटर टीडीएस लेवल के पानी को ही पीने के लिए सही बताया गया है। टीडीएस लेवल 300 मिलीग्राम/लीटर से अधिक वाला पानी स्वाद व सेहत के लिए खराब होता है।
जब हमने सोशल मीडिया पर आर-ओ के पानी संबंधित मिलने वाली विभिन्न जानकारियों को देखा तो सोचा कि क्यों न इसकी जाँच स्वयं ही कर ली जाए। तब हमने मापक की मदद से अपने घर व कार्यालय में अलग-अलग स्रोतों के पानी की जाँच की। आर-ओ से निकलने वाले पानी की टीडीएस मात्रा 20 से 25 के बीच पाई गई। जल बोर्ड द्वारा सप्लाई किए जाने वाले पानी की टीडीएस मात्रा 100-110 के बीच पाई गई। वहीं जल बोर्ड के पानी को मिट्टी के घड़े में 8 घंटे से अधिक रखने के बाद उस पानी की टीडीएस मात्रा 125-130 के बीच आई। इसका मतलब यह हुआ कि दिल्ली जैसे शहर में जल बोर्ड द्वारा सप्लाई किए जाने वाले पानी की गुणवत्ता काफ़ी अच्छी है। परंतु जब अपने ही कार्यालय के एक सह-कर्मी के घर के पानी के सैंपल को जाँच गया तो वहाँ आर-ओ का आँकड़ा तो नहीं बदला पर जल बोर्ड का आँकड़ा काफ़ी अधिक पाया गया, 500 से ऊपर। ऐसे इलाक़ों में जब तक सही टीडीएस का पानी उपलब्ध न हो तब तक मजबूरी में आर-ओ का ही पानी पीना चाहिए।
पानी में टीडीएस 100 मिलीग्राम से कम हो तो उसमें चीजें तेजी से घुल सकती हैं। प्लास्टिक की बोतल में बंद पानी में कम टीडीएस हो तो उसमें प्लास्टिक के कण घुलने का खतरा भी होता है। ऐसा पानी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक होता है। ऐसा भी देखा गया है कि कई आर-ओ बनाने वाली कंपनियां पानी को मीठा करने के लिए उसका टीडीएस घटा देती हैं। 65 से 95 टीडीएस होने पर पानी मीठा तो ज़रूर हो जाता है लेकिन उसमें से कई जरूरी मिनरल्स भी निकल जाते हैं। ज़्यादातर लोगों को इससे होने वाले नुक्सान समझ में नहीं आते हैं। आर-ओ पानी में से जहां एक ओर बुरे मिनरल जैसे लेड, आर्सेनिक, मरकरी आदि को निकाल देता है वहीं अच्छे मिनरल यानी कैल्शियम, मैग्नीशियम आदि को भी निकाल देता है। इस कारण आर-ओ के पानी के लगातार उपयोग से आवश्यक मिनरल हमारे शरीर को नहीं मिल पाते और इनकी शरीर में कमी हो सकती है। अतः ये हमारे शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
एक शोध के अनुसार, अगर नियमित रूप से आर-ओ का पानी पीया जाता है तो इसका बुरा प्रभाव हमारे पाचन तंत्र पर भी पड़ता है। पाचन तंत्र के कमजोर होने से पेट संबंधित कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही यदि लम्बे समय तक आर-ओ के पानी को पीया जाए तो उससे हृदय संबंधी समस्याएं, थकावट, सिरदर्द और दिमागी समस्याएं आदि भी हो सकती हैं। पानी में मौजूद गंदगी व खनिज हटने से यह पानी अधिक साफ़ तो हो जाता है लेकिन इसके बाद यह पानी एसिडिक भी हो जाता है जो शरीर के लिए बहुत हानिकारक है। यही नहीं, पानी में मौजूद कार्बोनिक एसिड हमारे शरीर से कैल्शियम की मात्रा को भी कम करने का काम करते हैं। ऐसे में हड्डियों में कमज़ोरी और जोड़ों में दर्द भी शुरू हो जाता है। इसलिये आजकल काफ़ी डॉक्टर आर ओ का पानी बिलकुल भी न पीने की सलाह देते हैं।
कुल मिलाकर यह माना जाए कि हमें बाज़ार के प्रभाव में आ कर और भेड़-चाल में नहीं चलना चाहिए। अपने शहर में जल बोर्ड द्वारा सप्लाई किए जाने वाले पानी की गुणवत्ता जाँच करने के बाद ही निर्णय लेना चाहिए कि वास्तव में आर-ओ की ज़रूरत है या नहीं। जिन इलाक़ों में पानी का टीडीएस लेवल तय माणकों से अधिक है या खारा पानी आता हो केवल वहीं पर आर-ओ का इस्तेमाल करें। लेकिन उसे आर-ओ से निकालने के बाद कम से कम 24 घंटे तक पहले मिट्टी के घड़े या ताँबे के कलश में रखें। इससे उसकी गुणवत्ता काफ़ी बढ़ जायेगी। अन्य जगहों पर पारंपरिक तरीक़े भी लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं। ऐसा करने से हमारे शरीर को मिलने वाले ज़रूरी मिनरल भी मिलते रहेंगे और प्यास भी बुझेगी।
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