शुक्रवार, 27 दिसंबर 2024

चुनावी वादों के बीच फँसा वोटर


जैसे ही देश का दिल माने जाने वाले दिल्ली में विधान सभा चुनावों का माहौल बनता है तो सभी की नज़र इस चुनाव पर लग जाती है। क्योंकि जब बात केंद्र और दिल्ली की सरकार पर क़ाबिज़ होने की हो तो यह लड़ाई और भी रोचक बन जाती है। ऐसा नहीं कि दिल्ली विधान सभा का चुनाव अन्य राज्यों से अलग है। परंतु यह चुनाव अन्य राज्यों के जैसा होते हुए भी हमेशा से ही अलग ही रहता है। परंतु इस बार के चुनावों की घोषणा से पहले राजनैतिक दलों में जो खींच-तान बनी हुई है वह काफ़ी रोचक है क्योंकि लुभावने चुनावी वादों के बीच मतदाता अपने आप को फँसा हुआ पा रहा है।

दिल्ली के दंगल में सभी राजनैतिक दल अभी से उतर चुके हैं, बस देर है तो चुनावों की तारीख़ों के ऐलान की। परंतु तारीख़ों के ऐलान से पहले ही सभी राजनैतिक दल मतदाताओं को लुभाने में जुटे गये हैं। दिल्ली की मौजूदा सरकार के नेताओं ने दिल्ली की महिलाओं को लुभाने के लिए हर महिला को प्रति माह 2100 रुपए देने का वादा किया है। इसके साथ ही 60 वर्ष की आयु पूरी कर चुके दिल्ली के सभी बुजुर्गों को मुफ़्त इलाज देने की घोषणा भी कर दी गई है। ग़ौरतलब है कि दिल्ली की सत्ता पर क़ाबिज़ आम आदमी पार्टी द्वारा किए गए यह वो चुनावी वादे हैं जो वे सत्ता में आने के बाद ही  पूरे करेंगे। परंतु न जाने क्यों मौजूदा दिल्ली सरकार के ही दो विभागों ने इन घोषणाओं की हवा निकाल दी है। दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल कल्याण विभाग और स्वास्थ्य विभाग ने एक विज्ञापन जारी किया जिसमें यह बात स्पष्ट कर दी, कि इन दो घोषणाओं से संबंधित ऐसी कोई भी योजना वर्तमान में मौजूद नहीं है। इस विज्ञापन के जारी होते ही दिल्ली की जनता में संदेह पैदा हो गया।


परंतु जैसे ही इस विज्ञापन के चर्चे होने लगे तो दिल्ली की मुख्य मंत्री आतिशी ने एक बयान जारी कर इस बात को स्पष्ट कर दिया कि इस विज्ञापन की पूरी जाँच की जाएगी और ऐसा विज्ञापन जिस भी अधिकारी ने जारी किया है उसके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्यवाही की जाएगी। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि विज्ञापन में ऐसा क्या ग़लत लिखा गया, जिससे कि आम आदमी पार्टी इतना उत्तेजित हुई? वादा तो चुनावी है जो कि वर्तमान में लागू नहीं है। तो इस विज्ञापन को लेकर इतना बवाल क्यों? क्या वास्तव में ऐसे विज्ञापन को इसलिए जारी किया गया कि जनता के मन में भ्रम पैदा किया जा सके?

इसी बीच, जब आम आदमी पार्टी द्वारा ऐसी घोषणाएँ की जा रही थी, तो दिल्ली में भाजपा नेता प्रवेश वर्मा के घर के बाहर महिलाओं की क़तार दिखाई दी गई जिसमें वे दिल्ली की ‘ज़रूरतमंद’ महिलाओं को ‘मदद’ बाँटे रहे थे। उल्लेखनीय है कि जो-जो महिलाएँ प्रवेश वर्मा के घर से निकल रहीं थीं उन्होंने बताया कि बाँटे गए लिफ़ाफ़े में रुपये थे और उन सभी महिलाओं को भाजपा को वोट देने के लिए कहा गया। जैसे ही मामले ने तूल पकड़ी तो प्रवेश वर्मा और भाजपा के कई नेताओं ने अपनी सफ़ाई में यह कहा कि प्रवेश वर्मा ज़रूरतमंदों की मदद अपनी एक एनजीओ की ओर से कई सालों से कर रहे हैं और यह उसी धर्मार्थ कार्य का हिस्सा है। यदि भाजपा के इस धर्मार्थ कार्य को सच मान लिया जाए तो इसमें कोई बुराई नहीं है कि कोई संस्था ज़रूरतमंदों की मदद करे।


परंतु यदि कोई संस्था जिसका मुखिया किसी राजनैतिक दल का हिस्सा हो और ऐन चुनावों की घोषणा से पहले ही ऐसी ‘मदद’ करे, जिसमें उसकी पार्टी व उसके वरिष्ठ नेताओं से संबंधित प्रचार सामग्री भी हो और बदले में अपनी पार्टी के लिए वोट माँगे तो क्या वो ‘धर्मार्थ’ कार्य की श्रेणी में आएगा? क्या ऐसा ‘धर्मार्थ’ कार्य वह संस्था पूरे साल करती है? क्या इस संस्था ने अपने प्रबंधक सदस्यों की बैठक में ऐसे किसी प्रस्ताव को मंज़ूरी दी थी जिसके तहत किसी एक राजनैतिक दल के समर्थन में वोट जुटाए जाएँ?

दिल्ली में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच हो रहे ऐसे वार पर गौर किया जाए तो इसकी पृष्ठभूमि में वह महत्वपूर्ण पहलू है जिसके तहत दिल्ली की अफ़सरशाही दिल्ली के उपराज्यपाल के अधीन है न कि दिल्ली के चुने हुए मुख्य मंत्री के। उल्लेखनीय है कि दिल्ली की अफ़सरशाही पर हक़ को लेकर एक लंबी क़ानूनी लड़ाई भी लड़ी गई थी जिसका फ़ैसला देश की सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली की चुनी हुई सरकार के हक़ में ही दिया था। परंतु चूँकि मौजूदा माहौल में केंद्र और दिल्ली की सरकार को अलग-अलग राजनैतिक दल चला रहे हैं, इसलिए 2023 में संसद में एक बिल पेश कर एक क़ानून बनाया गया जिसके तहत दिल्ली की अफ़सरशाही को उपराज्यपाल के अधीन कर दिया गया। ऐसे में चुनावी घोषणा के बाद यदि कोई सरकारी विभाग या मंत्रालय ऐसी घोषणा के खंडन में विज्ञापन देता है तो दिल्ली की जनता को ख़ुद ही समझ लेना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है?

बहरहाल चुनाव चाहे किसी राज्य की सरकार का हो या केंद्र की सरकार का, हर राजनैतिक दल मतदाताओं को लुभाने की मंशा से ऐसे कई वादे करते हैं जो वास्तव में सच नहीं किए जाते। यदि जनता को चुनावों में किए गए वादों और उन्हें पूरा किए जाने के अंतर की देखा जाए तो यह अंतर काफ़ी बड़ी संख्या में पाया जाएगा। चुनावों से पहले ऐसे वादे हर राजनैतिक दल द्वारा किए जाते हैं। परंतु मतदाताओं यह सोचना होगा कि वादों की सूची और उन्हें पूरा करने में जिस भी दल का अंतर सबसे कम हो वही दल जनता के हित की सोचता है और उसे ही चुनना चाहिए। यदि सभी दल एक समान हैं तो जनता को चुनावी वादों से भ्रमित होकर इनमें फँसना नहीं चाहिए।     


*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2024

क्या अंडे शाकाहारी हैं ?


विज्ञापन जगत ने आम जनता के मन में एक बात बिठा दी है कि अंडे शाकाहारी नहीं हैं। कुछ दशक पहले “संडे हो या मंडे, रोज खाओ अंडे” का नारा इसी नियत से दिया गया। अंडे का उपयोग बढ़ाने के लिए इसे प्रोटीन का बढ़िया स्रोत बताया जाता है। प्रोटीन की मात्रा बहुत सारी शाकाहारी चीजों में भी काफी ज्यादा है पर इस विवाद में नहीं भी पड़ा जाए तो यह तथ्यात्मक रूप से गलत है कि अंडा शाकाहारी है। इसलिए शाकाहारियों के लिए अंडे को लोकप्रिय बनाने के लिए किए जाने वाले प्रचार का उल्टा नारा लगाया जा सकता है - ‘संडे हो या मंडे, कभी न खाओ अंडे’। कोई क्या खाए और क्या नहीं इसमें बहुत कुछ आदमी की अपनी पसंद और जीवनशैली के साथ-साथ कई अन्य बातों पर निर्भर करता है। फिर भी आप जो चीज खाते हैं या किसी कारण से नहीं खाते हैं उसके बारे में आपको आवश्यक जानकारी अवश्य होनी चाहिए।

सरकारी आँकड़ों के अनुसार 100 ग्राम अंडों में जहाँ 13 ग्राम प्रोटीन होगा, वहीं पनीर में 24 ग्राम, मूँगफली में 31 ग्राम, दूध से बने कई पदार्थों में तो इससे भी अधिक एवं सोयाबीन में 53 ग्राम प्रोटीन होता है। यही तथ्य कैलोरी के बारे में है। जहाँ 100 ग्राम अंडों में 173 कैलोरी, मछली में 93 कैलोरी व मुर्गे के गोश्त में 194 कैलोरी प्राप्त होती है, वहीं गेहूँ व दालों में 300 कैलोरी, सोयाबीन में 350 कैलोरी व मूंगफली में 550 कैलोरी और मक्खन निकले दूध एवं पनीर से लगभग 350 कैलोरी प्राप्त होती है तो हम यह निर्णय ले सकते हैं कि स्वास्थ्य के लिए क्या चीज जरूरी है? यह स्पष्ट करना भी उचित रहेगा कि अधिक कोलेस्ट्रोल शरीर के लिए लाभदायक नहीं है। 100 ग्राम अंडों में कोलेस्ट्रोल की मात्रा 500 मिलीग्राम है और मुर्गी के गोश्त में 60 है तो वही कोलेस्ट्रोल सभी प्रकार के अन्न, फलों, सब्जियों आदि में शून्य है। अमेरीका के विश्व-विख्यात विशेषज्ञ डॉ. माइकेल कलेपर का कहना है कि अंडे का पीला भाग विश्व में कोलेस्ट्रोल एवं जमी चिकनाई का सबसे बड़ा स्रोत है जो स्वास्थ्य के लिए घातक है। उन्होंने यह भी साबित किया है कि जो व्यक्ति माँस या अंडे खाते हैं उनके शरीर में ‘रिस्पटरों’ की संख्या में कमी हो जाती है जिससे रक्त के अन्दर कोलेस्ट्रोल की मात्रा अधिक हो जाती है। इससे हृदय रोग शुरू हो जाता है और गुर्दे के रोग एवं पथरी जैसी बीमारियों को भी बढ़ावा मिलता है।


वास्तविकता यह है कि 1962 में यूनीसेफ ने एक पुस्तक प्रकाशित की तथा अंडों को लोकप्रिय बनाने के लिए अनिषेचित (इन्र्फटाइल) अंडों को शाकाहारी अंडे (वेजीटेरियन) जैसा मिथ्या नाम देकर भारत के शाकाहारी समाज में भ्रम फैला दिया। 1971 में मिशिगन यूनीवर्सिटी (अमेरिका) के वैज्ञानिक डॉ. फिलिप जे. स्केन्ट ने यह सिद्ध किया कि:

अनिषेचित अंडे किसी भी प्रकार से शाकाहारी नहीं होते क्योंकि वे न तो पेड़ों पर उगते हैं और न किसी पौधे पर बल्कि वे सब मुर्गी के पेट में से ही उत्पन्न होते हैं। एक वैज्ञानिक प्रयोग के आधार पर यह देखा गया है कि विद्युत धारा के द्वारा अंडों को आंका जा सकता है। अनिषेचित अंडे में निषेचित अंडे की भाँति ही यह विद्युत धारा होती है। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि निर्जीव वस्तु में कभी भी विद्युत धारा का अंकन नहीं किया जा सकता।

विज्ञान ने यह साबित कर दिया है कि किसी भी प्राणी के जीवन का आधार मात्र लैंगिक प्रजनन क्रिया ही नहीं है बल्कि अलैंगिक प्रजनन के द्वारा भी जीवन हो सकता है जैसे अमीबा और अनेक एककोशीय प्राणी बिना निषेचन क्रिया के उत्पन्न होते रहते हैं। इसी प्रकार से ”टैस्ट ट्यूब बेबी“ या उसके द्वारा उत्पन्न प्राणी निर्जीव नहीं गिने जा सकते।

सच्चाई यह है कि अंडे दो प्रकार के होते हैं एक वे जिनसे बच्चे निकल सकते हैं तथा दूसरे वे जिनसे बच्चे नहीं निकलते। मुर्गी यदि मुर्गे के संसर्ग में न आए तो भी जवानी में अंडे दे सकती है। इन अंडों की तुलना स्त्री के रजः स्राव से की जा सकती है। जिस प्रकार स्त्री के मासिक धर्म होता है। उसी तरह मुर्गी के भी यह धर्म अंडों के रूप में होता है। यह अंडा मुर्गी की आन्तरिक गन्दगी का परिणाम है। मुर्गियाँ जो अंडे देती हैं वे सब अपनी स्वेच्छा से या स्वभावतया नहीं देतीं ! बल्कि उन्हें विशिष्ट हार्मोन्स और एग-फम्र्युलेशन के इन्जेक्शन दिये जाते हैं। इन इन्जेक्शनों के कारण ही मुर्गियाँ लगातार अंडे दे पाती हैं। अंडे के बाहर आते ही उसे इंक्यूबेटर (सेटर) में डाल दिया जाता है ताकि उसमें से 21 दिन की जगह 18 दिनों में ही चूज़ा बाहर आ जाए। मुर्गी का बच्चा जैसे ही अंडे से बाहर निकलता है नर तथा मादा बच्चों को अलग-अलग कर लिया जाता है। मादा बच्चों को शीघ्र जवान करने के लिए एक खास प्रकार की खुराक दी जाती है और इन्हें चैबीसों घंटे तेज़ प्रकाश में रखकर सोने नहीं दिया जाता ताकि ये दिन रात खा-खा कर जल्दी ही रजः स्राव करने लगें और अंडा देने लायक हो जाऐं। अब इन्हें ज़मीन की जगह तंग पिंजरों में रख दिया जाता है। इन पिंजरों में इतनी अधिक मुर्गियां भर दी जाती हैं कि वे पंख भी नहीं फड़फड़ा सकतीं। तंग जगह के कारण आपस में चोंचें मारती हैं, जख़्मी होती हैं, गुस्सा करती हैं व कष्ट भोगती हैं। जब मुर्गी अंडा देती है तो अंडा जाली में से किनारे पड़कर अलग हो जाता है और उसे अपनी अंडे सेने की प्राकृतिक भावना से वंचित रखा जाता है ताकि वह अगला अंडा जल्दी दे। जिन्दगी भर पिंजरे में कैद रहने व चल फिर न सकने के कारण उसकी टांगे बेकार हो जाती हैं। जब उसकी उपयोगिता घट जाती है, तो उसे कत्लखाने भेज दिया जाता हैै। इस प्रकार से प्राप्त अंडे अहिंसक व शाकाहारी कैसे हो सकते हैं?

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2024

संसद का गतिरोध कैसे ख़त्म हो?


संसद का शीतकालीन सत्र पहले दिन से हंगामेदार बना हुआ है। विपक्ष ने सरकार को अडानी मुद्दे पर घेर रखा है। विपक्ष की माँग है कि सरकार अडानी मुद्दे पर बयान दे कर अपना रुख़ साफ़ करे। परंतु जैसे ही विपक्ष अडानी मुद्दे को उठाता है तो हल्ला मच जाने के कारण संसद के सत्र को स्थगित करना पड़ता है। इसके साथ ही राज्य सभा में भी सभापति के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है।
 
पिछले कुछ वर्षों से ये देखने में आ रहा है कि जब भी विपक्ष सरकार

को भ्रष्टाचार या अन्य किसी मुद्दे पर घेरने की कोशिश करता है तो संसद का वह सत्र शोर-शराबे के बीच बर्बाद हो जाता है। वैसे तो हर सरकार ही ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना चाहती, जहां उसकी छीछालेदर हो। वो उससे बचने के रास्ते खोजती है। यदि सरकार का दमन साफ़ है और वो किसी भी तरह की जाँच के लिए तैयार है तो उसे ऐसे किसी मुद्दे का सामना करने से हिचकना नहीं चाहिए। पर ऐसा हो नहीं रहा। विपक्षी दलों का आरोप है कि जब भी सरकार के पास उनके सवालों का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं होता तो वे संसद को ठप कर देती है पर इसके लिए विपक्ष को ही ज़िम्मेदार ठहराती है। भ्रष्टाचार की बात करें तो दुनिया के देशों में भ्रष्टाचार के सूचकांक को जारी करने वाली संस्था ‘ट्रांसपेरेंसी इण्टरनेशनल’ की एक रिपोर्ट में बताया है कि भारत का 28 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक का धन अवैध रूप से विदेशों में जमा है। ऐसी ठोस और विश्वसनीय रिपोर्ट के बाद किसी भी सरकार को हरकत में आना चाहिए था और इस एजेंसी व ऐसी अन्य एजेंसियों की मदद से इस रिपोर्ट के आधार बिन्दुओं की जाँच करनी चाहिए थी। जिससे भ्रष्टाचार की जड़ पर कुठाराघात किया जा सकता। पर सरकार किसी भी दल की क्यों न रही हो जब-जब उससे इस बाबत पूछा गया कि उसने इस रिपोर्ट को लेकर तथ्य जानने की क्या कोशिश की, तो सरकार का उत्तर था, चूंकि ‘ट्रांसपेरेंसी इण्टरनेशनल’ नाम की संस्था भारत सरकार का अंग नहीं है, इसलिए उसकी रिपोर्ट पर ध्यान नहीं दिया जा सकता।
 

यहाँ 2011 की एक घटना को याद करना उचित होगा। जब सत्तापक्ष को भ्रष्टाचार के मामले में जोड़-शोर से घेरने वाली  भाजपा को ही मीडिया ने घेर लिया था। मीडिया का सवाल था कि सत्तापक्ष के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार की माँग करने वाली भाजपा अपनी कर्नाटक सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री येदुरूप्पा के घोटालों के विषय में चुप क्यों है? ऐसे में भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष नितिन गडकरी ने एक बड़ा ही हास्यास्पद बयान दिया था। उन्होंने कहा कि “येदुरूप्पा ने जो कुछ किया, वह अनैतिक है पर अवैध नहीं।” अब इस बयान को पढ़कर कौन ऐसा होगा जो अपना सिर न धुने। यानि कि क्या भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व सार्वजनिक जीवन में अनैतिक आचरण को स्वीकार्य मान रहा था? यही वजह है कि उस समय की भाजपा की कथनी और करनी में भ्रष्टाचार से लड़ने और उसे समाप्त करने की कोई मंशा दिखाई नहीं दी। सारा शोर राजनैतिक लाभ उठाने को मचाया गया। जनता को सन्देश ये दिया गया कि विपक्ष भ्रष्टाचार के विरूद्ध है, जबकि हकीकत यह है कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ भाजपा नेतृत्व भ्रष्टाचार से लड़ना ही नहीं चाहता था। इसलिए उस समय का विपक्ष जे.पी.सी. की माँग पर अड़ा हुआ था। जिसका कोई हल निकलने वाला नहीं था और उस समय का गतिरोध यूं ही चलता रहा।
 

न सिर्फ़ भ्रष्टाचार व अन्य मामलों को लेकर सरकार पर, बल्कि चुनाव आयोग पर भी चुनावों की प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप लग रहे हैं। चुनावों के बाद सरकार चाहे किसी भी दल की क्यों न बने। चुनावों का आयोजन करने वाली सर्वोच्च संविधानिक संस्था केंद्रीय चुनाव आयोग हर चुनावों को पारदर्शिता से कराने चाहिये। यह बात बीते कई महीनों से सभी विपक्षी दल और अन्य जागरूक नागरिक कर रहे हैं। चुनाव आयोग की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि हर दल को पूरा मौक़ा दिया जाए और निर्णय देश की जनता के हाथों में छोड़ दिया जाए। बीते कुछ समय से चुनाव आयोग पर, पहले ईवीएम को लेकर और फिर वीवीपैट को लेकर और चुनावी आँकड़ों को लेकर काफ़ी विवाद चल रहा है। हर विपक्षी दल ने एक सुर में यह आवाज़ लगाई कि देश से ईवीएम को हटा कर बैलट पेपर पर ही चुनाव कराया जाए। परंतु देश की शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश देते हुए अधिक सावधानी बरतने को कहा और ईवीएम को जारी रखा।    
 

‘इंडिया’ गठबंधन अगर सोचता है कि वो देश में अडानी मुद्दे और ईवीएम के मुद्दों पर ‘बोफोर्स’ जैसा माहौल बना लेगा, तो यह सम्भव नहीं लगता। क्योंकि बोफोर्स के समय नेतृत्व देने के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसी साफ छवि वाला नेता मौजूद था और आज के राजनेताओं में ऐसा एक भी चेहरा नहीं जिसे देश की जनता बेदाग मानती हो। जब नेतृत्व में ही जनता का विश्वास नहीं तो ऐसे मुद्दों पर जन आन्दोलन कैसे बनेगा? हाँ अगर विपक्ष एकजुट होकर किसी साफ़ छवि वाले नेता को अपना नेतृत्व सौंपती है, तब सम्भावना अवश्य है कि जनता का कुछ विश्वास हासिल किया जा सके। पर इसमें भी पेच है। ऐसे नेतृत्व को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकारने में सभी विपक्षी दल इसके लिए मानसिक रूप से तैयार हों। परंतु देश की संसद में गतिरोध पैदा करके सिवाय करदाता के पैसे की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं हो रहा। इसलिए सत्तापक्ष और विपक्ष को इस गतिरोध को जल्द से जल्द ख़त्म कर देना चाहिए।

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2024

क्या इस देश को अदालतें चला रही हैं?


हमारे देश में जब-जब सरकारी तंत्र फेल होता है तो उसके ख़िलाफ़ कोई न कोई अदालत का रुख़ कर लेता है। इस उम्मीद से कि संविधान की रक्षा और नागरिकों के अधिकारों के हित में यदि कोई फ़ैसला कर सकता है तो वह न्यायपालिका ही है। परंतु क्या कभी किसी ने यह सोचा है कि जहां देश भर की अदालतों में करोड़ों मुक़दमें लंबित पड़े हैं, वहाँ सरकारी तंत्र के काम न करने के कारण अदालतों पर अतिरिक्त मुक़दमों का ढेर लगता जा रहा है। ऐसा क्यों है कि सरकारी तंत्र अपनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह से नहीं निभा रहा जिस कारण नागरिकों को कोर्ट का रुख़ करने को मजबूर होना पड़ता है?

जब भी किन्हीं दो पक्षों में कोई विवाद होता है तो उनका आख़िरी वाक्य होता है कि “आई विल सी यू इन कोर्ट”। यानी जब भी किसी को किसी दूसरे से आहत पहुँचती है वह इस उम्मीद में अदालत जाता है कि उसके साथ न्याय होगा। परंतु हमारे देश के न्यायालयों में लंबित पड़े केसों की संख्या इतनी ज़्यादा है कि, न्याय मिलते-मिलते या फ़ैसला आते-आते बहुत देर हो जाती है। कई मामलों में तो याचिकाकर्ता दुनिया छोड़ कर भी चला जाता है लेकिन उसका केस अंतिम फ़ैसले तक नहीं पहुँच पाता। ऐसे में कोर्ट में हर दिन बढ़ने वाले मामलों की संख्या पर रोक नहीं लग रही। विवाद चाहे किसी की ज़मीन जायदाद का हो या अन्य किसी मामले का हो। वादी-प्रतिवादी सीधा कोर्ट का रुख़ करते हैं और कई मामलों में तो वकील भी अपने मुवक्किल को गुमराह करने में पीछे नहीं हटते। ऐसे में किसी न किसी कारण से न्याय मिलने में देरी हो जाती है।


बीते कुछ वर्षों से न्यायपालिका पर काम का बोझ दिन-प्रतिदिन बढ़ने का एक और कारण है कि सरकारी तंत्र में तैनात कई अधिकारी जो अपने राजनैतिक आकाओं को खुश करने की नीयत से देश की जनता के साथ धोखा करते हैं। वे संविधान को एक तरफ़ रख कर अपने राजनैतिक आकाओं को भी गुमराह कर उनसे कुछ ऐसे फ़ैसले दिलवा देते हैं जो जनता के हित में नहीं होते। केवल निहित स्वार्थों के लिए लिए गये ऐसे फ़ैसले राजनैतिक रूप से अक्सर घातक साबित हो जाते हैं। ऐसे में सत्तापक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा कर जनता को असल मुद्दों से भटकाने का काम करने लगते हैं। अंततः दोनों में से एक पक्ष अदालत का रुख़ कर लेता है। ऐसे में मुक़दमों के दबाव से भरी हुई अदालतें इन सरकारी तंत्र के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं को प्राथमिकता पर सुनने के लिए मजबूर हो जाती हैं।


ग़ौरतलब है कि यदि किसी लंबित पड़े मामले में कोई अहम सुनवाई की तारीख़ लगी हो और उसी बीच कोर्ट के सामने कोई ऐसा ‘राजनैतिक’ केस आ जाए जिसे, सुनने के लिए उस अदालत को अपनी पहले से तय सूची में फेर-बदल करना पड़े तो सोचिए कि न सिर्फ़ अदालत के क़ीमती समय और पैसे की बर्बादी होती है, बल्कि अदालत में न्याय की उम्मीद कर रहे फ़रयादी की हिम्मत और न्यायपालिका पर भरोसा भी डगमगाने लगता है। सोचने वाली बात यह है कि यदि सरकारी मशीनरी अपना काम ज़िम्मेदारी से करे तो अदालतें भी अपना काम बिना किसी विघ्न के करने लगेंगी। ऐसे में लंबित पड़े करोड़ों मामलों में भी गिरावट आएगी।

आजकल ऐसा भी देखा जा रहा है कि यदि किसी राजनैतिक दल को उसकी पूर्ववर्ती सरकार द्वारा लिए गए किसी ख़ास फ़ैसले से एतराज होता है तो वे उसमें कोई न कोई कमी निकाल कर देश भर में एक नया विवाद पैदा करने में कसर नहीं छोड़ते। फिर वो मामला चाहे किसी विशेष क़ानून को लेकर ही क्यों न हो। ग़ौरतलब है कि जब ऐसे किसी विधेयक को संसद में पास करके क़ानून बनाया जाता है, तो उस समय सत्तापक्ष और विपक्ष, इस पर चर्चा करते हैं और यदि कुछ संशोधन करना हो तो उसे करके ही क़ानून का रूप दिया जाता है। ऐसे में यह माना जाए कि उस समय की विपक्षी पार्टी ने भी ऐसे विधेयक को अपनी सहमति प्रदान की है। लेकिन जैसे ही उस समय की विपक्षी पार्टी सत्ता में आती है तो उसी क़ानून का विरोध करने लगती है और देश में उथल-पुथल का माहौल बन जाता है। लेकिन क्या वह राजनैतिक दल इस बात पर ध्यान देता है कि उसने विपक्ष में बैठे हुए क्या इस क़ानून का विरोध किया था? यदि नहीं तो आज वह ऐसा क्यों कर रहा है? उस क़ानून के ख़िलाफ़ अराजकता फैला कर उसे क्या मिल रहा है?

वहीं ऐसे विवादों में बात-बात पर अदालतों का रुख़ करने वाले याचिकाकर्ता के राजनैतिक संबंधों की जाँच होना भी ज़रूरी है। इस बात की भी जाँच होनी चाहिए कि अदालत में पहुँचने वाला जनहित का मामला क्या वास्तव में ‘जनहित’ का है या ‘निजहित’ का? यदि यह बात सिद्ध हो जाती है कि कोई याचिकाकर्ता जनहित की आड़ में किसी राजनैतिक दल के निजहित में याचिका कर रहा है तो ऐसी याचिका को देश की किसी भी अदालत में दाखिल नहीं होने दिया जाए। वहीं यदि कोई निचली अदालत किसी क़ानून या संवेदनशील मामले के ख़िलाफ़ किसी याचिका को दाखिल करती है तो उसे ऐसा सोच-समझ कर और किसी उच्च श्रेणी की अदालत के पूर्व न्यायाधीश या संविधान विशेषज्ञ की राय लेकर ही करना चाहिए। किसे क्या पता कि ऐसे संवेदनशील मामले देश में कैसी आग लगा दें। इसलिए एक स्वस्थ लोकतंत्र को सही सलामत रखने के लिए लोकतंत्र के हर स्तंभ को मिल-जुलकर ही काम करना चाहिए न कि किसी विशेष समुदाय या राजनैतिक दल के हित में रह कर। यदि ऐसा होता है तो शायद हम अपने संविधान के मूल ढाँचे का पालन कर पाएँ और अपने देश को वास्तव में एक ‘संपूर्ण प्रभुत्त्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ बनाने के दिशा में बढ़ सकें।