शुक्रवार, 29 मई 2026

क्या वीआईपी अपराधियों के लिए जेल होटल बनते जा रहे हैं ?

भारत में कानून की समानता का सिद्धांत संविधान का मूल आधार है। अनुच्छेद 14 कहता है कि कानून के समक्ष सब समान हैं। लेकिन वास्तविकता अक्सर इसके उलट दिखती है। बलात्कार और हत्या के मामलों में सज़ा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह का मामला इसका स्पष्ट उदाहरण है। रोहतक की सुनारिया जेल, जहां वे बंद हैं, उनके लिए लगभग होटल जैसी सुविधाओं का केंद्र बन गई है, जबकि आम कैदी कठिन परिस्थितियों में सजा काटते हैं।

उल्लेखनीय है कि 2017 में दो साध्वियों के साथ बलात्कार के मामले में 20 वर्ष की सजा पाने के बाद राम रहीम रोहतक जेल में बंद हैं। बाद में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति और रंजीत सिंह हत्याकांड में आजीवन कारावास भी मिला। जेल में उनके लिए विशेष सेल, बोतलबंद पानी, सहायक कर्मी और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। एक पूर्व कैदी ने आरोप लगाया था कि राम रहीम को अन्य कैदियों से ज्यादा समय मुलाकात के लिए मिलता है। जबकि सामान्य कैदियों को मात्र 20 मिनट मिलते हैं, वहीं राम रहीम को घंटों की छूट दी जाती रही।


जेल प्रशासन ने इन आरोपों से इनकार किया, लेकिन राम रहीम को बार-बार मिलने वाली पैरोल और फरलो ने संदेह बढ़ाया है। रोहतक जेल में उनका रहना आम कैदियों के लिए कठिनाइयों के बीच विपरीत तस्वीर पेश करता है। जहां सामान्य कैदी भीड़भाड़, सीमित संसाधनों और सख्त नियमों में रहते हैं, वहीं राम रहीम को लगातार रिहाई और आरामदायक व्यवस्था मिलती रही। यह स्थिति जेल को उनके लिए होटल सरीखा बना देती है, जहां सजा का असर न के बराबर दिखता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि पैरोल का सिलसिला कानून है या विशेषाधिकार? हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स एक्ट के तहत कैदियों को पैरोल और फरलो का प्रावधान है। इस कानून के अनुसार, एक साल की सजा पूरी करने के बाद कोई भी कैदी प्रति वर्ष 10 सप्ताह की पैरोल और 21 दिन की फरलो का हकदार है। फरलो को कैदी का अधिकार माना जाता है, जो सामाजिक और पारिवारिक संबंध बनाए रखने के लिए दी जाती है, जबकि पैरोल के लिए विशिष्ट कारणों की आवश्यकता होती है। लेकिन राम रहीम के मामले में इसका दुरुपयोग स्पष्ट दिखता है। 2020 से 2026 तक उन्हें 16 बार से ज्यादा पैरोल/फरलो मिल चुकी है। कुल मिलाकर 430 से अधिक दिन वे जेल से बाहर रहे। मई 2026 में मिली 30 दिन की पैरोल पर वे जेल से बाहर निकले और सिरसा डेरे पहुंचे। यह उनकी 2026 की दूसरी पैरोल थी। कथित तौर पर ये रिहाइयां अक्सर बिना किसी ठोस कारण के दी गई हैं। क्योंकि ये रिहाइयां अक्सर चुनावों, धार्मिक कार्यक्रमों या त्योहारों के आसपास दी गईं। 2022 पंजाब, 2023 राजस्थान, 2024 हरियाणा चुनावों से पहले भी ऐसी छूट मिली। डेरे के लाखों अनुयायी एक बड़ा वोट बैंक हैं, जिसका राजनीतिक फायदा उठाने के आरोप लगते रहे।


बलात्कार और हत्या के अपराधी राम रहीम की बार-बार रिहाई पीड़ित परिवारों के लिए अपमानजनक है। 2017 में सजा के बाद हुए दंगे में 40 लोगों की मौत हुई थी। गवाहों पर दबाव पड़ने की आशंका बनी रहती है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति समेत कई संगठन इन पैरोलों की निंदा करते हैं। पत्रकार अंशुल छत्रपति ने इसे “कानून का मजाक” बताया। आम कैदियों के लिए पैरोल मिलना मुश्किल होता है। हरियाणा के आंकड़ों के अनुसार, जेलों में हजारों कैदी हैं, लेकिन सीमित संख्या को ही ऐसी छूट मिलती है। ऐसे में ये कहना ग़लत नहीं होगा कि राम रहीम को मिलने वाली लगातार रिहाइयां अन्य कैदियों में असंतोष पैदा करती हैं। 

गौरतलब है कि रोहतक की सुनारिया जेल सामान्य रूप से क्षमता से अधिक भरी रहती है। कैदियों को बुनियादी सुविधाएं भी मुश्किल से मिलती हैं। लेकिन राम रहीम के लिए यहां विशेष इंतजाम किए जाते रहे। आरामदायक रहन-सहन, बेहतर भोजन और लगातार बाहर जाने की छूट। यह जेल उनके लिए सजा की जगह आरामगाह बन गई है। एक तरफ़ तो जेल सुधार की बातें होती रहती हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर उच्च प्रभाव वाले कैदियों को मिलने वाली सुविधाएं व्यवस्था की कमजोरी उजागर करती हैं। जहां गरीब या सामान्य अपराधी सालों जेल में सड़ते हैं, वहीं प्रभावशाली व्यक्ति यहाँ एक लक्ज़री होटल जैसी जिंदगी जीते दिखते हैं। 

सवाल उठता है कि इस का क्या समाधान संभव है? पैरोल और फरलो जैसे प्रावधानों का उद्देश्य पुनर्वास है, न कि दुरुपयोग। इसलिए पुलिस प्रशासन व सरकार को इनमें पारदर्शिता लानी चाहिए। जैसे कि, रिहाई के फैसले स्वतंत्र समिति से करवाए जाएं। चुनाव के समय पैरोल पर रोक लगे। सभी कैदियों के लिए समान नियम लागू हों। जेलों में सीसीटीवी और मैन्युअल निगरानी की सख्ती बढ़े। 

गुरमीत राम रहिम के मामले में हरियाणा सरकार को ख़ुद पर लगे आरोपों का जवाब देना चाहिए। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति और अन्य संगठनों की आलोचना को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। गुरमीत राम रहीम जैसे प्रभावशाली अपराधियों को मिलने वाले ऐशो-आराम का मामला सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल है। रोहतक जेल अगर एक कैदी के लिए होटल बन जाती है, तो कानून की गरिमा कहां रह जाती है? पैरोल का प्रावधान सभी के लिए समान होना चाहिए, न कि चुनिंदा प्रभावशालियों के लिए विशेषाधिकार। समाज को इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठानी होगी। ताकि कानून वाकई सबके लिए समान हो। राम रहीम की लगातार रिहाइयां न केवल पीड़ितों का अपमान हैं, बल्कि पूरे न्याय तंत्र पर सवालिया निशान लगाती हैं। जेल सजा की जगह होनी चाहिए, न कि आराम की।
*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 22 मई 2026

वर्तमान शिक्षा प्रणाली: एक जाल जिससे मुक्ति आवश्यक है!

सभी जानते हैं कि शिक्षा को ज्ञान का दीपक माना जाता है। लेकिन आज के युग में वास्तविकता यह है कि हमारी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था एक ऐसा जाल बन गई है जिसमें लाखों-करोड़ों युवा फंस रहे हैं। यह प्रणाली न तो सच्चे कौशल विकसित करती है और न ही नवाचार को प्रोत्साहित करती है। बल्कि यह छात्रों को एक सांचे में ढालकर औसत जीवन की ओर धकेल रही है। बदलाव की मांग अब न केवल जरूरी बल्कि अनिवार्य बन चुकी है। तो ऐसा क्या किया जाए कि देश की युवा पीढ़ी शिक्षित भी बनें और अपने पसंद के क्षेत्र में निपुण भी बनें।

सफल उद्यमियों की कहानियां गवाह हैं कि बड़ी कंपनियों के संस्थापकों ने अक्सर पारंपरिक शिक्षा के इस जाल से खुद को बचाया। उनकी सफलता का राज रट्टा मारने या परीक्षा में अंक लाने में नहीं, बल्कि व्यावहारिक सोच, जोखिम लेने की क्षमता और निरंतर सीखने में छिपा है। इसके विपरीत, हमारी शिक्षा प्रणाली अमीर और गरीब के बीच खाई को और चौड़ा कर रही है। अमीर बच्चे बेहतर संसाधनों और अतिरिक्त कोचिंग के साथ आगे बढ़ते हैं, जबकि गरीब परिवार के बच्चे सीमित अवसरों में संघर्ष करते रह जाते हैं। 


शिक्षा की इस व्यवस्था में रचनात्मकता को कुचला जा रहा है। उदाहरण के लिए अधिकतर कक्षाओं में बच्चों को सरल दृश्य बनाने या मानकीकृत उत्तर लिखने को कहा जाता है, न कि स्वतंत्र सोच विकसित करने को। परिणामस्वरूप, वे किसी बड़े कारखाने की असेंबली लाइन से निकलने वाले उत्पादों की तरह एक जैसे बन जाते हैं। ‘तारे ज़मीन पर’ और ‘थ्री इडियट्स’ जैसी फिल्में भले ही सफलता से बेहतर उत्कृष्टता का संदेश देती हों, लेकिन समाज और परिवार अभी भी प्रतिशत और रैंकिंग की दौड़ में बच्चों को धकेल रहे हैं। ऐसे में जीवन को ‘दौड़’ बताकर तनाव बढ़ाया जा रहा है, जबकि वास्तव में हर बच्चे की अपनी गति और प्रतिभा होती है, जिस पर कोई ध्यान ही नहीं देता। 


तकनीकी प्रगति की तुलना करें तो स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और एआई जैसे क्षेत्रों में दुनिया तेजी से बदल रही है, लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ कर कक्षाएं अभी भी सौ साल पुरानी शैली में चल रही हैं। बोर्ड, चॉक और रट्टा-आधारित पढ़ाई छात्रों को भविष्य के लिए तैयार नहीं कर पा रही। अल्बर्ट आइंस्टीन का प्रसिद्ध उदाहरण यहां पूरी तरह लागू होता है, मछली को पेड़ पर चढ़ने की परीक्षा देकर उसकी बुद्धिमत्ता का आकलन करना अन्याय है। हर बच्चे की प्रतिभा अलग-अलग क्षेत्र में होती है, लेकिन एक आकार-एक फिट वाली प्रणाली इसे नजरअंदाज कर देती है।

उल्लेखनीय है कि इस व्यवस्था की जड़ें ब्रिटिश काल से जुड़ी हैं, जब 1835 में एक नीति बनाई गई जिसका उद्देश्य सच्चा सशक्तिकरण नहीं बल्कि आज्ञाकारी नागरिक तैयार करना था। आज भी स्कूल और कॉलेज उन पूर्वनिर्धारित भूमिकाओं के लिए ग्रेजुएट तैयार कर रहे हैं, न कि नवप्रवर्तक या नेता। ग्रेडिंग सिस्टम बुद्धिमत्ता को केवल परीक्षा अंकों तक सीमित कर देता है, जबकि संचार, समझौता कौशल और समस्या-समाधान जैसे जीवन-महत्वपूर्ण गुणों की उपेक्षा की जाती है।


ऐसे में इन सब के परिणाम भयावह हैं। स्नातकों में से आधे से अधिक नौकरी के योग्य नहीं पाए जाते। कॉर्पोरेट जगत में प्रवेश के बाद संचार की कमी, सकारात्मक दृष्टिकोण की कमी और निरंतर सीखने की इच्छा की कमी उजागर हो जाती है। जर्मनी जैसी देशों में दोहरी शिक्षा प्रणाली है, जहां सैद्धांतिक ज्ञान के साथ व्यावहारिक अनुभव जुड़ा होता है। लेकिन हमारे यहां छात्र स्नातक होने तक केवल किताबी ज्ञान पर ही निर्भर रहते हैं। नतीजा: अच्छे अंक लाने वाले छात्र भी बेरोजगारी का शिकार हो जाते हैं। 

आपको याद होगा जब 2025 में राजस्थान के चपरासी/चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के 53,000 पदों की भर्ती के लिए करीब 25 लाख युवाओं ने आवेदन किया था। इनमें से लगभग 85% से 90% उम्मीदवार उच्च शिक्षित (ग्रेजुएट, पोस्ट-ग्रेजुएट, बीटेक और पीएचडी) थे। इस जाल का सबसे दर्दनाक पहलू मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव है। नौकरी न मिलने की निराशा से हर साल हजारों छात्र आत्महत्या कर लेते हैं या गुनाह का रास्ता अपना लेते हैं। आईआईटी जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में दाखिला पाने की होड़ में व्यक्तिगत रुचि और क्षमता को नजरअंदाज किया जाता है, जिससे जलन और हताशा बढ़ती है। ऐसा कहना ग़लत नहीं होगा कि, शिक्षा डिग्री-केंद्रित हो गई है, कौशल-केंद्रित नहीं। 

इसलिए समय आ गया है कि हम डिग्री से कौशल की ओर मुड़ें। रट्टा मारने की बजाय अवधारणात्मक समझ, व्यावहारिक उदाहरण और समस्या-समाधान पर जोर दिया जाए। वित्तीय शिक्षा अनिवार्य हो। बच्चों को एसेट-लायबिलिटी का अंतर, मुद्रास्फीति से लड़ना, निवेश बनाम खर्च और जल्दी बचत करने का महत्व सिखाया जाए। स्कूलों में कोडिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल मार्केटिंग और आर्थिक मामलों जैसे भविष्योन्मुखी विषयों को भी शामिल किया जाए। 

इसके साथ ही बिजनेस सिमुलेशन प्रोजेक्ट्स शुरू किए जाएं ताकि बच्चे नौकरी मांगने वाले नहीं बल्कि नौकरियां पैदा करने वाले बनें। जोखिम लेने की क्षमता विकसित करने के लिए गणना-आधारित प्रयोगों को प्रोत्साहन मिले। हमारे शिक्षक इस व्यवस्था की रीढ़ हैं, इसलिए उनका नियमित प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरणों से लैस होना और प्रदर्शन-आधारित मूल्यांकन जरूरी है। प्रेरित शिक्षक सैकड़ों जीवन बदल सकते हैं। 

आज के भाग-दौड़ भरे युग में मानसिक स्वास्थ्य और जीवन कौशल भी शिक्षा का हिस्सा बनें। बच्चे एक ओर गणित सीखते हैं, लेकिन तनाव प्रबंधन नहीं। समय प्रबंधन, नागरिकता भावना, संचार कौशल सातवीं कक्षा से अनिवार्य हों। संचार की मजबूती ही समाज में सम्मान या अपमान तय करती है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, रचनात्मकता और स्वतंत्र सोच विकसित करना होना चाहिए। प्राचीन भारतीय गुरुकुल प्रणाली में हर छात्र की व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार शिक्षा दी जाती थी। उसी पद्धति को आधुनिक संदर्भ में अपनाने की जरूरत है। 

वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने लाखों युवाओं को औसत जीवन की ओर धकेला है। लेकिन जागरूकता और सुधार से हम इस जाल से बाहर निकल सकते हैं। सरकार, शिक्षाविद्, अभिभावक और समाज को मिलकर काम करना होगा। तभी हमारा युवा वर्ग न केवल आत्मनिर्भर बनेगा बल्कि राष्ट्र-निर्माण में योगदान देगा। बदलाव अब विलंब सहन नहीं कर सकता। सभी को मिलकर ऐसा करना होगा कि शिक्षा ज्ञान का स्रोत बने, न कि जाल।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 15 मई 2026

सोने पर सरकारी नजर: वरदान या नियंत्रण का जाल?


जब से प्रधान मंत्री ने देशवासियों को सोना न खरीदने की अपील की है सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। उनमें से एक वीडियो पोस्ट काफ़ी वायरल हो रहा है, जिसमें सरकार की सोने से जुड़ी नई नीति पर गहरी चिंता जताई गई है। पोस्ट में कहा गया है कि सरकार अब आम घरों में पड़े सोने को वित्तीय संपत्ति बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। आयात के दबाव, रुपए पर तनाव और ई-गोल्ड को बढ़ावा देने के नाम पर यह कदम उठाया जा रहा है। वीडियो में स्पष्ट किया गया कि सोना अब सिर्फ जेवर या निवेश नहीं, बल्कि एक ‘पावर’ है। पर जब यह डिजिटल हो जाएगा तो नियंत्रण किसके हाथ में होगा? आपके, बैंक के या सिस्टम के? यह सवाल आज हर आम आदमी को सोचने पर मजबूर कर रहा है।


वीडियो में सरकार की तर्कसंगतता को भी समझाया गया है। भारत में घरों, लॉकरों, जेवरों और सिक्कों के रूप में भारी मात्रा में सोना पड़ा हुआ है, लेकिन यह अर्थव्यवस्था में घूमता नहीं है। न बैंक इसका इस्तेमाल कर पाते हैं, न जेवराती। हर साल देश को नया सोना आयात करना पड़ता है, जिसके लिए डॉलर खर्च होते हैं और आयात बिल बढ़ता है। सरकार का तर्क है कि यदि यह निष्क्रिय सोना सिस्टम में आ जाए, तो आयात कम होगा, अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। इसके लिए ई-गोल्ड यूनिट्स या गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें आप भौतिक सोना जमा करेंगे, डिजिटल यूनिट्स लेंगे, ब्याज कमाएंगे और लॉकर चार्ज बचाएंगे। वीडियो में सोने की शुद्धता जांच, बार-कॉइन-जेवर स्वीकार करने और रिनॉउन्ड रिफाइनर से टाई-अप जैसी सुविधाओं का जिक्र भी है।


लेकिन वीडियो सिर्फ सरकारी तर्क पर नहीं रुकता। यह चेतावनी देता है के कैश को ‘यूपीआई’ से डिजिटल बनाने, कागज़ी शेयरों को डीमैट में लाने के बाद अब सोने की बारी है। भौतिक सोना, जो लॉकर में ‘अदृश्य’ और ‘निजी' था, अब पंजीकृत, ‘ट्रैकेबल’ और नियमों के दायरे में आ जाएगा। वीडियो में ‘सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड’ का भी उदाहरण दिया गया है, जहां 1 लाख का निवेश 4.86 लाख हो गया, लेकिन अब फोकस घरेलू सोने पर है। सवाल उठाया गया है कि क्या यह सिर्फ आयात कम करने की रणनीति है या सिस्टम में पूर्ण नियंत्रण का खेल? 


यह पोस्ट आम आदमी की चिंताओं को छूता है। सोना भारतीय संस्कृति में सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि सुरक्षा, विवाह और आपातकालीन फंड माना जाता है। महिलाओं के मंगलसूत्र से लेकर परिवार की पीढ़ी-दर-पीढ़ी की जमा पूंजी तक, यह भावनात्मक और आर्थिक रूप से जुड़ा है। वीडियो के संदेश को देखते हुए लगता है कि डिजिटल सोना बनने पर न सिर्फ रूप बदलेगा, बल्कि नियंत्रण, दृश्यता और भविष्य के नियम भी बदल जाएंगे।


इस पोस्ट पर आए कमेंट्स इस चिंता को और गहरा करते हैं। एक यूजर ने लिखा, “बड़े-बड़े उद्योगपतियों का जेवर ले लो, आम जनता को बक्श दो।” दूसरे ने कहा, “डिजिटल इंडिया मतलब गुलामी, फंडामेंटल राइट्स खोना।” कई कमेंट्स में डर जताया गया कि सरकार महिलाओं के मंगलसूत्र तक पर नजर रखेगी। एक ने चेतावनी दी, “बैंक डूब गया तो क्या देंगे? फिजिकल गोल्ड ही अच्छा।” कुछ यूजर्स ने इसे ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ या ‘ग्लोबलिस्ट एजेंडे’ से जोड़कर देखा, जहां सोना रजिस्टर कराने के बाद आम आदमी सड़क पर आ जाएगा। कुल मिलाकर, कमेंट सेक्शन सरकार पर अविश्वास, डिजिटल नियंत्रण के भय और व्यक्तिगत स्वायत्तता खोने की भावना से भरा पड़ा है। लोग याद दिला रहे हैं कि कैश और शेयरों की तरह सोना भी ‘ट्रैकेबल’ हो गया तो निजी संपत्ति पर सिस्टम की पकड़ मजबूत हो जाएगी।


अब सवाल यह है कि यह नीति आम आदमी को कितना फायदा पहुंचाएगी? फायदों की बात करें तो यह निश्चित रूप से कुछ वर्गों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है। जो लोग अपना सोना लॉकर में बेकार पड़ा रखते हैं, उन्हें ब्याज कमाने का मौका मिलेगा। लॉकर चार्ज बचेंगे, सोने की शुद्धता की जांच होगी और जरूरत पड़ने पर इसे आसानी से लिक्विड किया जा सकेगा। अर्थव्यवस्था के स्तर पर आयात बिल कम होने से रुपया मजबूत होगा, महंगाई पर काबू रहेगा और विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित होगा। अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी को फायदा पहुंचेगा। यानी कि स्थिर अर्थव्यवस्था, बेहतर रोजगार और कम आयात निर्भरता। छोटे किसान, मध्यम वर्गीय परिवार या महिलाएं, जो सोने को सुरक्षित निवेश मानती हैं, बिना बेचे ब्याज कमा सकेंगी। गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम में शुद्धता जांच की सुविधा भी जेवरातों की विश्वसनीयता बढ़ाएगी।

लेकिन नुकसान भी कम नहीं। सबसे बड़ा खतरा नियंत्रण का है। भौतिक सोना परिवार की स्वतंत्र संपत्ति है। डिजिटल होने पर बैंक या सरकार के पास डेटा होगा। कर चोरी, ब्लैक मनी या आपात स्थिति में सरकार इसका इस्तेमाल कर सकती है। विगत में नोटबंदी और अन्य नीतियों के अनुभव ने लोगों में अविश्वास पैदा कर दिया है। यदि बैंक संकट आए या सिस्टम फेल हो जाए तो क्या होगा? कई कमेंट्स में यही डर व्यक्त किया गया। सांस्कृतिक रूप से सोना ‘निजी’ है, विवाह, त्योहार या आपात में इसे बेचने या गिरवी रखने का फैसला परिवार का होता है। डिजिटल सिस्टम में यह फैसला नियमों से बंध जाएगा। मध्यम और निचले वर्ग के लिए, जो सोने को मुद्रास्फीति रोधी बचाव मानते हैं, यह जोखिम भरा हो सकता है।

आम आदमी के लिए फायदा तभी होगा जब इस स्कीम में पारदर्शिता, वैकल्पिक विकल्प और विश्वास का माहौल बने। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई जबरदस्ती न हो, डेटा प्राइवेसी सुरक्षित रहे और निकासी आसान हो। यदि स्कीम वैकल्पिक रहे और लोग अपनी मर्जी से जुड़ें, तो यह वरदान साबित हो सकती है। लेकिन यदि इसे ‘सिस्टम का गेम’ बनाया गया तो अविश्वास बढ़ेगा।

देखा जाए तो यह बहस सिर्फ सोने की नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण की है। वायरल पोस्ट और उसके कमेंट्स ने आम आदमी की चिंता को आवाज दी है। सरकार को इस पर खुली बहस करनी चाहिए। सोना भारत की सांस्कृतिक धरोहर है, इसे सिर्फ वित्तीय संपत्ति बनाकर आम आदमी का भरोसा न खोया जाए। यदि नीति संतुलित और जनहित में बनी तो यह अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी; अन्यथा यह सिर्फ ‘नियंत्रण’ का खेल साबित होगी। आम आदमी को फैसला खुद करना होगा, डिजिटल सुविधा चुनें या पारंपरिक सुरक्षा?

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 8 मई 2026

विपक्ष को गंभीर चिंतन की जरूरत !

पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम और केरल के विधानसभा चुनाव परिणामों पर हर टीवी चैनल पर चुनावी पंडित और राजनैतिक वुशेषज्ञ गहन टिप्पणी कर रहे हैं। कुल मिलाकर इन विशेषज्ञों ने इन नतीजों को महज साधारण चुनावी उलटफेर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की दिशा में एक बड़े बदलाव के रूप में चित्रित किया। चुनाव विश्लेषक एक ओर इसे ‘बंगाल की विजय’ मानते हैं और दूसरी ओर विपक्षी दलों के लिए ‘गंभीर आत्मचिंतन का क्षण’ मानते हैं। नतीजों से यह बात तो स्पष्ट है कि परिणाम केवल मतदाता रुझान नहीं, बल्कि प्रक्रियागत सवालों और विपक्ष की रणनीतिक कमजोरियों का मिश्रण हैं। लेकिन विपक्ष के लिए सबसे महत्वपूर्ण सबक यह है कि भविष्य के चुनावों के लिए उन्हें कुछ नया सोचना होगा और बेहतर रणनीति बनानी पड़ेगी।
 

पश्चिम बंगाल की बात करें तो बीजेपी के वोट शेयर में मात्र 3 प्रतिशत की बढ़त के साथ काफ़ी मात्रा में सीटें जीती। लेकिन तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि राज्यव्यापी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया में लगभग 90 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए, जिनमें अधिकांश मुस्लिम और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के पारंपरिक वोटर थे। यदि ये 4.3 प्रतिशत मतदाता वोट डाल पाते तो शायद नतीजा अलग होता। कुछ चुनवी विश्लेषक इसे ‘क्यूरेटेड चुनाव’ कहते हैं। यानी परिणाम पहले से तय करने वाली प्रक्रिया। इसी तरह असम में भी बीजेपी की बड़ी जीत को चुनावी विश्लेषक सीमा-समस्या, ध्रुवीकरण और मतदाता सूची संशोधन से जोड़ कर देख रहे हैं।
 

यदि तमिलनाडु की बात करें तो टीवीके की सफलता को सकारात्मक विकास माना जाए। डीएमके की सत्ता-विरोधी लहर और स्टालिन की अपनी सीट हारने जैसी घटना ने साबित किया कि पुरानी पार्टियां जनता से दूर हो चुकी हैं। टीवीके की जीत नए चेहरे, युवा अपील और क्षेत्रीय आकांक्षाओं का प्रतीक है। वहीं केरल में कांग्रेस-नेतृत्व वाले यूडीएफ की जीत ने विपक्षी खेमे को कुछ राहत दी, लेकिन कुछ जानकर ऐसा मानते हैं कि क्या यह राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के ‘टेम्प्लेट’ का हिस्सा बन सकता है, जहां मतदाता सूची प्रबंधन, ध्रुवीकरण और संगठनात्मक ताकत एक साथ काम करती हो?
 
गौरतलब है कि विशेष गहन पुनरीक्षण जैसी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी और मतदाता सूची से नाम कटने के आरोप निश्चित रूप से जांच के योग्य हैं। चुनाव आयोग को इन सवालों का जवाब देना चाहिए। लेकिन केवल प्रक्रियागत दोषों पर जोर देकर विपक्ष अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। बंगाल में टीएमसी की 15 साल की सत्ता में भ्रष्टाचार, हिंसा और विकास की अनदेखी ने जनता को बीजेपी की ओर धकेला। तमिलनाडु में डीएमके का परिवारवाद और प्रदर्शन की कमी ने टीवीके जैसे नए विकल्प को रास्ता दिया। असम और केरल के नतीजे भी साबित करते हैं कि स्थानीय मुद्दे, विकास और नेतृत्व की विश्वसनीयता निर्णायक हैं। ऐसे में विपक्ष के लिए यह ‘आत्मचिंतन का क्षण’ है, लेकिन विपक्ष को इसे केवल शिकायत में नहीं बदलना चाहिए।
 

विपक्षी दलों और इंडिया गठबंधन को भविष्य की रणनीति पर गंभीरता से काम करना होगा। पहला: आंतरिक सुधार- पुरानी पार्टियां परिवारवाद, सत्ता-केंद्रित संस्कृति और भ्रष्टाचार से ग्रस्त हैं। टीएमसी और डीएमके को युवा, नए चेहरों और स्थानीय मुद्दों पर आधारित नेतृत्व विकसित करना चाहिए, जैसा टीवीके ने किया। कांग्रेस को अपने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करना होगा, न कि केवल गठबंधनों पर निर्भर रहना। विपक्ष को ‘सिर्फ बीजेपी-विरोध’ की राजनीति छोड़कर सकारात्मक एजेंडे पर काम करना चाहिए, जैसे कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान कल्याण और क्षेत्रीय अस्मिता।
 

दूसरा: चुनावी प्रक्रिया की निगरानी और सुधार - विपक्ष को विशेष गहन पुनरीक्षण के मुद्दे को राष्ट्रीय आंदोलन बनाना चाहिए। पारदर्शी मतदाता सूची, वीवीपीएटी की पूरी जांच, डिजिटल निगरानी और चुनाव आयोग की स्वायत्तता के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी जाए। लेकिन यह लड़ाई केवल अदालतों तक सीमित न रहे, जमीनी स्तर पर मतदाता जागरूकता अभियान चलाएं। मुस्लिम और पिछड़े वर्गों के मतदाताओं को सूची में शामिल कराने के लिए विशेष ड्राइव चलाई जाए, ताकि भविष्य में कोई ‘क्यूरेटेड’ नतीजा न निकले।
 
तीसरा, गठबंधन और रणनीतिक एकता - इंडिया गठबंधन को बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में सीट बंटवारे की बजाय विचारधारा आधारित साझेदारी पर जोर देना चाहिए। जहां टीवीके जैसी नई पार्टियां उभर रही हैं, वहां उन्हें सहयोगी बनाएं, न कि प्रतिद्वंद्वी। डिजिटल कैंपेनिंग, डेटा एनालिटिक्स और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके युवा वोटरों को जोड़ा जाए। विजय जैसे सेलिब्रिटी नेताओं की सफलता से सीखें, भावनात्मक जुड़ाव, साफ-सुथरी छवि और विकास-केंद्रित संदेश देना।
 
चौथा, क्षेत्रीय मुद्दों पर फोकस - राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी की ‘हिंदुत्व’ और विकास की दोहरी रणनीति का मुकाबला स्थानीय एजेंडे से करें। बंगाल में टीएमसी को हिंसा-मुक्त प्रशासन और औद्योगिक विकास का वादा करना चाहिए। तमिलनाडु में डीएमके को डीएमके-विरोधी लहर को ‘क्षेत्रीय गौरव’ में बदलना होगा। विपक्ष को महिला, युवा और किसान योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर देना चाहिए, ताकि बीजेपी की कल्याण योजनाओं का मुकाबला किया जा सके।
 
पांचवां, लंबी अवधि की तैयारी- 2029 लोकसभा चुनाव को नजर में रखते हुए विपक्ष को अब से संगठनात्मक काम शुरू करना चाहिए। प्रत्येक बूथ स्तर पर कार्यकर्ता ट्रेनिंग, फीडबैक मैकेनिज्म और विरोधी दलों की कमजोरियों का विश्लेषण जरूरी है। उल्लेखनीय है कि यह राष्ट्रीय ‘टेम्प्लेट’ बन सकता है। इसलिए विपक्ष को राष्ट्रीय स्तर पर ‘लोकतंत्र बचाओ’ अभियान चलाना चाहिए, जिसमें मीडिया, बुद्धिजीवी और नागरिक समाज शामिल हों।
 
चुनावी नतीजों के बाद आने वाली अधिकतर टीवी चर्चाएँ विपक्ष के लिए एक आईना है। इसमें हार के कारण दिखते हैं, लेकिन जीत का रास्ता भी। यदि विपक्ष केवल आरोप-प्रत्यारोप पर अटका रहा तो बीजेपी का ‘क्यूरेटेड’ मॉडल और मजबूत होगा। लेकिन आत्मचिंतन, सुधार, एकता और सकारात्मक एजेंडे के साथ विपक्ष न केवल अगले चुनाव जीत सकता है, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत भी कर सकता है। समय कम है। अब फैसला विपक्ष को करना है, या तो शिकायत करें या बदलाव लाएं।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 1 मई 2026

पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग से क्या होगा ?


पिछले कुछ दिनों से केंद्र सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को 20% (E20) से अधिक बढ़ाने और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (FFVs) को बढ़ावा देने का संकेत दिए है। पश्चिम एशिया संकट के कारण ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने के बीच यह कदम तेल आयात पर निर्भरता कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने और स्वच्छ ईंधन को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय की एक संयुक्त सचिव ने संकेत दिए कि सरकार जल्द ही E85 (85% इथेनॉल) से E100 (100% इथेनॉल) तक के वाहनों के टेस्टिंग नॉर्म्स अधिसूचित करने वाली है। ऑटोमेकर्स पहले से ही इसके प्रोटोटाइप तैयार कर चुके हैं। देखना यह होगा कि सरकार का यह फैसला आम आदमी की जेब, पर्यावरण और वाहनों पर क्या असर डालेगा?

भारत ने 2025 में E20 कार्यक्रम को पूरा कर लिया है। अप्रैल 2026 तक देशभर में E20 पेट्रोल उपलब्ध है। अब सरकार E85 या इससे ऊंचे ब्लेंड की ओर आगे बढ़ रही है। फ्लेक्स-फ्यूल वाहन किसी भी अनुपात (E20 से E100 तक) में इथेनॉल चला सकते हैं। ब्राजील इसका सफल उदाहरण है, जहां FFVs सालों से चल रहे हैं। भारत में यह कदम ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है। सरकार का दावा है कि EBP कार्यक्रम से अब तक 4.5 करोड़ बैरल कच्चा तेल बचाया गया और 1.65 लाख करोड़ रुपये विदेशी मुद्रा की बचत हुई। 2014 से अब तक 69.8 मिलियन टन CO2 उत्सर्जन कम हुआ। लेकिन क्या यह आम आदमी के लिए फायदेमंद है?


दावा है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग का सबसे बड़ा फायदा पर्यावरण को है। इथेनॉल नवीकरणीय स्रोत (गन्ना, मक्का, चावल) से बनता है। नीति आयोग के अनुसार, गन्ने से बने इथेनॉल से GHG उत्सर्जन 65% और मक्के से 50% कम होता है। टेलपाइप पर CO, HC और पार्टिकुलेट मैटर (PM) कम निकलते हैं। E20 से CO2 में 6-8% कमी आती है, जबकि E85 या E100 पर यह और ज्यादा। अध्ययनों से पता चलता है कि इथेनॉल ब्लेंड से वाहन प्रदूषण 20-30% तक घट सकता है।

वहीं इसके नुकसान भी हैं। गन्ना आधारित इथेनॉल पानी-गहन है। एक लीटर इथेनॉल बनाने में करीब 2860 लीटर पानी लगता है। भारत में गन्ना पहले से ही 70% सिंचाई पानी का उपभोग करता है। ज्यादा इथेनॉल के लिए अगर गन्ना या खाद्यान्न (मक्का, चावल) का इस्तेमाल बढ़ा तो ‘फूड बनाम फ्यूल’ विवाद खड़ा हो सकता है। इसके साथ ही भूमि उपयोग भी बढ़ेगा, मिट्टी की उर्वरता घट सकती है और कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ेगा। दूसरी पीढ़ी (2G) इथेनॉल (कृषि अपशेष से) पर जोर देने की जरूरत है, जो पर्यावरण के लिए बेहतर है। कुल मिलाकर, अगर नीति सतर्क रही तो पर्यावरणीय फायदा साफ है, कम आयात, कम प्रदूषण, लेकिन पानी और भूमि प्रबंधन बिना तो नुकसान भी हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि इथेनॉल पेट्रोल से सस्ता है, इसलिए ब्लेंडेड पेट्रोल का प्रति लीटर दाम कम रहता है। सरकार ने E20 के लिए कीमत कम रखने की सिफारिश की थी। लेकिन इथेनॉल की ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से 30% कम है, इसलिए इससे वाहन का माइलेज घटता है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, पुराने E10 वाहनों में E20 से 6-7% (4-व्हीलर) या 3-4% (2-व्हीलर) माइलेज गिरावट हो सकती है। मतलब, अगर आपकी कार 15 किलोमीटर प्रति लीटर की खपत करती है तो E20 पर 14.1-14.5 किलोमीटर हो जाएगी।


गौरतलब है कि आप E85 या E100 चुन सकते हैं, अगर वह सस्ता हो। ब्राजील में FFVs पर इथेनॉल सस्ता होने से उपभोक्ता बचत करते हैं। लेकिन भारत में अभी इंफ्रास्ट्रक्चर (अलग पंप) और कीमत निर्धारण स्पष्ट नहीं है। नए FFV थोड़े महंगे हो सकते हैं, हालांकि लंबे समय में इंसेंटिव से बचत हो सकती है। पुराने वाहन वाले उपभोक्ता (2012-2023 तक बने) को माइलेज नुकसान और संभवतः मेंटेनेंस खर्च बढ़ सकता है। कुल मिलाकर, जेब पर तुरंत असर नकारात्मक हो सकता है, लेकिन अगर सरकार टैक्स छूट और सब्सिडी दे तो लंबे समय में यह फायदेमंद साबित हो सकता है। वहीं किसान समुदाय को इसका फायदा जरूर होगा, गन्ना और मक्का की खरीद बढ़ेगी, तो आय निश्चित ही बढ़ेगी।

वाहनों की बात करें तो उनके लिए इसका असर मिश्रित है। अप्रैल 2023 से बने वाहन E20 कंप्लायंट हैं, वे 20% इथेनॉल मिश्रित ईंधन से अपने वाहन आसानी से चला सकते हैं। अप्रैल 2025 से बने वाहन पूर्ण E20 अनुकूलित हैं। लेकिन 2023 से पहले के वाहनों में रबर पार्ट्स, गैस्केट्स और प्लास्टिक पर इथेनॉल का बुरा असर हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञ कहते हैं कि यह मामूली है और सर्विसिंग में ठीक हो जाता है। E20 से ऑक्टेन नंबर बढ़ता है (91 से 95 तक), इसलिए एक्सेलरेशन बेहतर हो सकता है।

कुछ जानकर मानते हैं कि फ्लेक्स-फ्यूल वाहन सबसे अच्छे विकल्प हैं, इन्हें किसी भी ब्लेंड पर चलाया जा सकता है। लेकिन अभी इसका कमर्शियल उत्पादन शुरू नहीं हुआ। पुराने वाहनों में E85+ ब्लेंड से समस्या ज्यादा हो सकती है। ARAI और SIAM अध्ययनों के अनुसार, सही ट्यूनिंग से परफॉर्मेंस बनी रहती है। कुल मिलाकर, नए वाहन खरीदने वालों के लिए यह अच्छी खबर है, लेकिन पुराने वाहन वालों को काफ़ी हद तक सावधानी बरतनी होगी। सरकार का यह फैसला दूरदर्शी है, लेकिन क्रियान्वयन ही असली परीक्षा है। पर्यावरण को फायदा, ऊर्जा सुरक्षा की मज़बूती और किसानों की आय में बढ़ोतरी कुछ फ़ायदे ज़रूर हैं। लेकिन इसके साथ ही आम आदमी की जेब और पुराने वाहनों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर नीति संतुलित रही, तो यह ‘विन-विन’ निर्णय साबित हो सकता है। वरना, माइलेज का नुकसान और महंगाई का बोझ आम आदमी पर पड़ेगा। क्योंकि सतर्क और पारदर्शी रोलआउट ही सफलता की कुंजी है। इसलिए सरकार को हर पहलू पर गंभीरता से विचार करने के बाद ही किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिए। 

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।