शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2022
केदारनाथ हादसा: नागरिक विमानन महानिदेशालय और निजी चार्टर कम्पनियाँ
बीते मंगलवार केदारनाथ धाम पर हुए हेलीकाप्टर हादसे ने एक बार फ़िर से भारत सरकार के नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) और कुछ निजी एयर चार्टर कम्पनियों की साँठगाँठ के चलते लापरवाही को उजागर किया है। खबरों की मानें तो इस हेलीकाप्टर को उड़ाने वाले पायलट कैप्टन अनिल सिंह को पहाड़ी इलाक़े में उड़ान भरने का कोई अनुभव नहीं था। उन्होंने सितम्बर 2022 में ही इस निजी कम्पनी के साथ पहाड़ी इलाक़े में हेलीकाप्टर उड़ाना शुरू किया था। सवाल उठता है कि जिस पायलट ने बीते 15 सालों तक तटीय इलाक़ों में हेलीकाप्टर उड़ाया हो वो अचानक पहाड़ी इलाक़ों में उड़ान भरने के लिए पूरी तरह प्रशिक्षित भी था या नहीं? क्या केदारनाथ में निजी चार्टर सेवा देने वाली कम्पनी ‘आर्यन एविएशन’ मुनाफ़े के लालच में नियमों की अनदेखी कर यात्रियों की जान जोखिम में डाल रही थी?
आए दिन यह देखा जाता है कि जब भी कोई विमान हादसा होता है या किसी एयरलाइन के कर्मचारी द्वारा कोई गलती होती है तो डीजीसीए उसकी जाँच कर दोषियों को सज़ा देती है। परंतु ऐसे कई मामले सामने आते हैं जहां बड़ी से बड़ी गलती करने वाले को डीजीसीए द्वारा केवल औपचारिकता करके कम सज़ा दी जाती है। फिर वो चाहे एक कोई नामी कमर्शियल एयरलाइन हो, किसी प्रदेश का नागरिक उड्डयन विभाग हो या कोई निजी चार्टर हवाई सेवा वाली कम्पनी। यदि डीजीसीए के अधिकारियों ने मन बना लिया है तो बड़ी से बड़ी गलती को भी नज़रंदाज़ कर दिया जाता है। कभी-कभी डीजीसीए के अधिकारी अपनी गलती छिपाने के लिए भी बेक़सूर को दोषी ठहरा कर उसे सज़ा दे देते हैं या मौसम की गलती बता देते हैं।
वहीं दूसरी ओर जब भी किसी ख़ास वजह से किसी बड़ी गलती वाले दोषी को सज़ा से बचाना होता है तब भी डीजीसीए के भ्रष्ट अधिकारी पीछे नहीं रहते। फिर वो चाहे ‘आर्यन एविएशन’ हो या कोई अन्य निजी एयरलाइन डीजीसीए के भ्रष्ट अधिकारी दोषी को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। ऐसा ही एक उदाहरण एक अन्य निजी चार्टर कम्पनी ‘ए आर एयरवेज़’ का है जिसके एक पाइलट ने सभी नियम और क़ानून की धज्जियाँ उड़ा कर अपने लिए कम से कम सज़ा तय करवाई और यह भी निश्चित कर लिया कि उसकी बड़ी से बड़ी गलती को भी नज़रंदाज़ कर दिया जाए। चूँकि यह निजी चार्टर सेवा देश के बड़े-बड़े नेताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों को अपनी सेवा प्रदान करती रहती है इसलिए आरोप है कि वो अपने ख़िलाफ़ हर तरह की कार्यवाही को अपने ढंग से तोड़ मरोड़ कर खानापूर्ति करती रहती है।
इस निजी एयरलाइन के पाइलट कैप्टन एच एस विर्दी ने लगातार नियम और क़ानून तोड़ कर यह साबित कर दिया है कि वे चाहे कुछ भी करे उसे उसके पद से कोई नहीं हटा सकता। कैप्टन विर्दी के ख़िलाफ़ बी॰ए॰ टेस्ट (पायलट के नशे में होने का टेस्ट) के उल्लंघन से लेकर तमाम संगीन लापरवाहियों की लिखित शिकायत डीजीसीए को भेजी गई। जाँच के बाद उसे व उसके लाइसेन्स को 17 फ़रवरी 2022 को केवल 3 महीने के लिए ही निलंबित किया गया। जबकि इससे कम संगीन ग़लतियों पर डीजीसीए के अधिकारी एयरलाइन के कर्मचारियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दे देते हैं। ऐसे दोहरे मापदंड क्यों? दिल्ली के कालचक्र समाचार ब्युरो ने डीजीसीए को लिखित शिकायत में इस बात के प्रमाण भी दिए कि कैप्टन विर्दी ने अपने रसूख़ के चलते निलंबन अवधि के दौरान ही 3 मार्च 2022 को अपना पीपीसी चेक भी करवा डाला। निलंबन अवधि में ऐसा करना ग़ैर-क़ानूनी है। ऐसा नहीं है कि डीजीसीए के उच्च अधिकारियों को इस बात का पता नहीं था। लेकिन रहस्यमयी कारणों से वे इस संगीन गलती को अनदेखा करने पर मजबूर थे।
इतना ही नहीं जब डीजीसीए के अधिकारियों को इस बात का एहसास हुआ तो डीजीसीए के इतिहास में पहली बार, कैप्टन विर्दी के निलंबन की तारीख़ को बदल दिया गया। शिकायत में आरोप है कि डीजीसीए के अधिकारियों द्वारा कैप्टन विर्दी के निलंबन की तारीख़ को एक सोची-समझी साज़िश के तहत 17 फ़रवरी 2022 से बदल कर 4 मार्च 2022 कर दिया। ऐसा इसलिए किया गया जिससे कि विर्दी द्वारा ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से किया गया पीपीसी चेक मान्य माना जाए। इस निर्णय से साफ़ ज़ाहिर होता है कि डीजीसीए में भ्रष्टाचार ने किस कदर अपने पाँव पसार लिए हैं। इसलिए यदि किसी भी पायलट की गलती पर पर्दा डाल कर उसे ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से उड़ान भरने की अनुमति दे दी जाती है तो केदारनाथ जैसे हादसे भविष्य में दोहराए जाएँगे।
ग़ौरतलब है कि डीजीसीए के इस कृत के ख़िलाफ़ 28 मई 2022 को एक और पत्र लिखा गया जिसमें नागरिक उड्डयन मंत्री, नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री, नागरिक उड्डयन सचिव, नागरिक उड्डयन मंत्रालय के सतर्कता अधिकारी व केंद्रीय सतर्कता आयोग को डीजीसीए के अधिकारियों की इस गलती की जाँच करने की माँग की है।
सूत्रों के अनुसार मौजूदा महानिदेशक और उनके कुछ चुनिंदा अधिकारी डीजीसीए में बड़ी से बड़ी लापरवाही को मामूली सी गलती बता कर दोषियों को चेतावनी देकर छोड़ देते हैं। आँकड़ों की माने तो ऐसी लापरवाही के चलते हादसों में भी बढ़ोतरी हुई है। हादसे चाहे निजी एयरलाइन के कर्मचारियों द्वारा हो, निजी चार्टर कंपनी द्वारा हो, किसी ट्रेनिंग सेंटर में हो या फिर किसी राज्य सरकार के नागर विमानन विभाग द्वारा हो, यदि वो मामले तूल पकड़ते हैं तो ही दोषियों को कड़ी सज़ा मिलती है। वरना ऐसी घटनाओं को आमतौर पर छिपा दिया जाता है।
वीवीआईपी व जनता की सुरक्षा की दृष्टि से समय की माँग है कि नागर विमानन मंत्रालय के सतर्कता विभाग को कमर कस लेनी चाहिए और डीजीसीए में लंबित पड़ी पुरानी शिकायतों की जाँच कर यह देखना चाहिए कि किस अधिकारी से क्या चूक हुई। ऐसे कारणों की जाँच भी होनी चाहिए कि तय नियमों के तहत डीजीसीए के अधिकारियों ने दोषियों को नियमों के तहत तय सज़ा क्यों नहीं दी और एक ही तरह की गलती के लिए दोहरे मापदंड क्यों अपनाए?
शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022
‘डॉक्टर जी’ फ़िल्म में है बड़ा संदेश
बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता आयुष्मान खुराना की हर फ़िल्म मनोरंजन के साथ-साथ समाज के लिए एक संदेश भी लाती है। लीक से हटकर विषयों पर बनी उनकी फ़िल्में, ‘विक्की डोनर’, ‘शुभ मंगल सावधान’, ‘बधाई हो’ और 'बरेली की बर्फी’ से अपनी अलग पहचान बनाने वाले आयुष्मान खुराना इस बार भी ऐसे ही विषय पर बनी ‘डॉक्टर जी’ में आपको प्रभावित करते हैं।
यह फ़िल्म आपको हसाएगी, रुलाएगी और सोचने पर भी मजबूर करेगी। फ़िल्म के निर्माताओं ने इस फ़िल्म में उन स्त्री रोग विशेषज्ञों के बारे में आम लोगों में चली आ रही रूढ़िवादी सोच को बदलने का काम किया है जो होते तो पुरुष हैं पर महिलाओं के शरीर के उन अंगों का इलाज करते हैं जिन्हें हर भारतीय महिला पराये पुरुषों से छिपा कर रखती है।
फ़िल्म का तानाबाना डाक्टरी पढ़ने वाले एक पुरुष डाक्टर पर केंद्रित है। एमबीबीएस पढ़ने के बाद, डॉ उदय गुप्ता (आयुष्मान खुराना) हड्डी रोग विशेषज्ञ बनने का सपना लेकर भोपाल के मेडिकल कालेज में प्रवेश लेना चाहता है। परंतु रैंक कम आने के कारण उसे हड्डी रोग के बजाए स्त्री रोग (गाईनेकोलॉजी) में ही सीट मिलती है। जो उसकी रुचि की नहीं होती। काफ़ी प्रयास के बाद भी जब डॉ उदय हड्डी रोग ब्रांच में अपने लिए स्थान नहीं बना पाता तो मजबूरन वो गाईनेकोलॉजी की कक्षा में चला ही जाता है। अन्य कॉलेजों की तरह भोपाल मेडिकल कॉलेज के स्त्री रोग विभाग में भी उदय की एक फेर्शेर की तरह खिंचाई होती है। पर पुरुषों द्वारा नहीं बल्कि उसकी सीनियर महिला छात्राओं द्वारा। यहीं उदय की मुलाक़ात अपनी सीनियर, डॉ फ़ातिमा शेख़ (रकुलप्रीत सिंह) से होती है। यह जानते हुए कि फ़ातिमा की शादी पहले से ही तय हो चुकी है, दोनो अच्छे दोस्त बन जाते हैं। गाईनेकोलॉजी की पढ़ाई के साथ-साथ उदय की ऑर्थोपैडिक ब्रांच लेने की चाहत कम नहीं होती। वह अगले साल ज्यादा नंबर लाकर गाइनेकॉलजी से छुटकारा पाने की तैयारियों में लगा रहता है।
उदय के गाईनेकोलॉजी के सहपाठी और वहाँ की एच॰ओ॰डी॰ डॉ नंदिनी श्रीवास्तव (शेफाली शाह) उसे गाईनेकोलॉजी में ही मेहनत कर वहीं पर टिके रहने की सलाह देती हैं। लेकिन वो अपने इरादे पर अड़ा रहता है और गाईनेकोलॉजी ब्रांच पर ज़्यादा ध्यान नहीं देता। उदय के दिमाग़ में एक बात बैठ जाती है कि एक पुरुष भला स्त्री रोग विशेषज्ञ कैसे बन सकता है? स्त्रियों के रोग को एक महिला डाक्टर से ज़्यादा बेहतर कौन समझ सकता है?
फ़िल्म में कई जगह जब उदय को अपनी मरीज़ों की जाँच करनी होती है तो मरीज़ों व उनके रिश्तेदारों द्वारा भी उसे संदेह से देखा जाता है। इन्हीं सब परिस्थितियों से बचने के लिए उदय किसी न किसी बहाने से अपनी मरीज़ों की जाँच करने से बचता रहता है।
डॉ नंदिनी जब उदय को अपना ‘मेल टच’ भूलने की सलाह देती हैं तो वो इसी सोच में पड़ जाता है कि वो उसे कैसे छोड़े। परंतु एक दिन जब आपात स्थिति में उदय को एक महिला की प्रसूति अस्पताल के कॉरिडर में ही करनी पड़ती है तब उसे समझ आता है कि कैसे बिना ‘मेल टच’ के वो आराम से महिला मरीज़ को बच्चा जनने की पीड़ा से छुटकारा दिला देता है। उस दिन से उदय की मानसिकता में बदलाव शुरू हो जाता है। इसी मानसिकता को बदलने की नियत से बनी इस फ़िल्म का निर्देशन अनुभूति कश्यप द्वारा बहुत अच्छे ढंग से किया गया है। बतौर निर्देशक यह अनुभूति की पहली फ़िल्म है।
फ़िल्म के पहले हिस्से में आपको जहां कॉमेडी अधिक दिखेगी वहीं फ़िल्म के दूसरे हिस्से में सभी मर्दों को 'मेल टच’ के माध्यम से अपनी मां, बहन, गर्लफ्रेंड या दूसरी औरतों के प्रति जीवन से जुड़ी कुछ अहम सीख भी मिलेगी।
छोटे शहरों में रहने वाले कुछ कामयाब मर्द किस तरह अपनी हवस पूरी करने के बाद अपनी इज़्ज़त बचाने के लिये एक मासूम और नाबालिग लड़की की ज़िंदगी से खिलवाड़ करते हैं और उन्हें नारकीय गर्भपात केंद्रों में धकेल देते हैं। इसे भी बखूबी दर्शाया गया है। ताकि भावना में बहने वाली लड़कियाँ ऐसे पुरुषों से सावधान हो जाएं।
फ़िल्म के डायलॉग और इसका छायांकन भी आपको खूब भाएगा। युवा छायाकार ईशित नारायण की सिनेमेटोग्राफ़ी हमेशा की तरह फ़िल्म को जीवंत रखती है और मेडिकल कॉलेज के अत्यंत पेचीदे माहौल को बखूबी दर्शाती है।
एक अनुभवी अभिनेत्री शेफाली शाह ने फ़िल्म में अपने किरदार को बहुत प्रभावशाली ढंग से निभाया है। रकुलप्रीत सिंह ने कॉमेडी के साथ-साथ गम्भीर किरदार को भी एक संतुलित रूप में प्रस्तुत किया है। आयुष्मान खुराना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि लीक से हटकर विषयों पर वे अपने किरदार को सहजता से निभा लेते हैं। फ़िल्म में आयुष्मान की माँ का किरदार निभाने वाली शीबा चड्ढा ने अपने किरदार द्वारा अकेली माँओं द्वारा किए गए संघर्ष को दिखाया है। कम उम्र में विधवा होने के बाद बच्चों की ज़िम्मेदारी के चलते उन्हें कैसे-कैसे समझौते करने पड़ते हैं ये शीबा ने इस फ़िल्म में पूरी तरह से जिया है। ‘जंगली फ़िल्मस’ द्वारा निर्मित इस फ़िल्म में कुल मिला कर आपको कॉमेडी के साथ समाज में चली आ रही प्रथाओं पर दिए गए संदेश का एक अच्छा मिश्रण नज़र आएगा। डाक्टरी पढ़ने व पढ़ाने वाले विद्यार्थी व प्रोफ़ेसर इस फ़िल्म में खुद को देख सकेंगे और अपने पढ़ाई के दिनों को याद करेंगे। कुल मिलाकर ये एक सार्थक मनोरंजक वाली किंतु वयस्क फ़िल्म है।
सोमवार, 17 अक्टूबर 2022
किसके दबाव में केस दबाए बैठी है सीबीआई?
2014 में जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्य मंत्री से देश के प्रधान मंत्री बनने की तैयारी में थे तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनका आह्वान था, “न खाऊँगा न खाने दूँगा”। इसका असर भी फ़ौरन दिखाई दिया। मोदी जी के प्रधान मंत्री बनने के बाद जिस तरह केंद्र सरकार की नौकरशाही में यह संदेश गया तो हर महकमे में बरसों से चली कोताही ख़त्म होती नज़र आई। तब ऐसा लगा कि सरकारी फ़ाइलों में बरसों से लम्बित मामले भी तेज़ी पकड़ेंगे। पर यहाँ जिस मामले को उठाया जा रहा है वो है सीबीआई कि कोताही का। वैसे तो सीबीआई की छवि बड़े-बड़े मामलों को लम्बा खींचने या दबाए रखने की है। पर मोदी राज में भी यह हो रहा है यह आश्चर्यजनक है।
जून 2014 में सीबीआई में तैनात डीआईजी अरुण बोथरा ने पूर्वोत्तर राज्यों के मुख्य सचिवों को उनके राज्यों में होने वाले एक घोटाले के सम्बंध में सीबीआई द्वारा जाँच करने सहमति माँगी थी। सिवाय मेघालय के किसी अन्य राज्य ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी। ग़ौरतलब है कि इस घोटाले पर जाँच के लिए भारत सरकार के सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय के सचिव विजय छिब्बर ने भी सभी पूर्वोत्तर राज्यों को जुलाई 2014 में लिखा। चूँकि यह घोटाला उन राज्यों में हुआ था इसलिए उनकी सरकारों से सीबीआई को सहमति पत्र लेना अनिवार्य था और आज भी है। जिसके बिना सीबीआई वहाँ जा कर जाँच नहीं कर सकती।
दरअसल ये घोटाला हर आम वाहन मालिक की रुचि का है। सरकारी आदेश के अनुसार हर नए वाहन पर हाई सिक्योरिटी नम्बर प्लेट का लगना अनिवार्य हो गया था। पूरे देश में इसे चरण बद्ध तरीक़े से लागू किया जाना था। इस तरह की नम्बर प्लेट बनाने के लिए कुछ चुनिंदा कम्पनियों को गुणवत्ता के आधार पर अधिकृत किया गया था। लागत के अनुसार नम्बर प्लेट की क़ीमत भी तय की गई। चूँकि यह ठेका सरकार द्वारा आवंटित होना था तो ‘ओपन टेंडर’ के द्वारा ही ठेका दिया जा सकता था। पर इन राज्यों में ऐसा नहीं किया गया। बल्कि इसमें काफ़ी बड़ा घोटाला कर दिया गया। सीबीआई और सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय को पूर्वोत्तर राज्यों में होने वाली इस धांधली के बारे में पता चला। इन राज्यों में 200 से 300 रुपए की लागत वाली नम्बर प्लेट को तीन गुना दामों पर 1500 से 1600 रुपयों में ग्राहकों को दिया जा रहा था। जिसकी शिकायत किसी जागरूक नागरिक ने सीबीआई से की।
सीबीआई और सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय को भेजी गयी इस शिकायत में इस बात का भी खुलासा हुआ कि पूर्वोत्तर राज्य की सरकारों के अधिकारियों की मिलीभगत से टेंडर में ऐसी शर्तें रखी गाईं कि केवल चुनिंदा कम्पनी ही इसमें चुनी जाए। शिकायत में आरोप के मुताबिक मुंबई की सिमनीट कंपनी ने इस मामले में मेघालय सरकार के परिवहन विभाग के अज्ञात कर्मियों की मिलीभगत से अपने द्वारा नियंत्रित कंपनियों के माध्यम से सांठगांठ वाली नीलामी की बोली लगाई जिससे उसे यह ठेका मिल सके।
अगस्त 2014 में मेघालय सरकार ने इस मामले में सीबीआई को जाँच करने के लिए अधिसूचना जारी कर दी। सीबीआई ने 29 जुलाई 2021 को मुंबई की सिमनीट कंपनी व उनके निदेशक नितिन शाह पर एफ़आईआर दर्ज करी और नितिन शाह के कई ठिकानों पर छापेमारी भी हुई। सीबीआई के मुताबिक़ छापेमारी में बरामद तमाम दस्तावेज़ों की जाँच जारी है। ग़ौरतलब है कि 2014 की शिकायत पर सीबीआई द्वारा 2021 में एफ़आईआर दर्ज हुई और आज तक इसकी ‘जाँच’ ही चल रही है। यह सीबीआई की कार्यशैली का एक और अद्भुत नमूना है। स्पष्ट है कि सीबीआई में बैठे जाँच अधिकारियों को आरोपी ने प्रभावित कर रखा है वरना जाँच में इस अनावश्यक देरी का क्या कारण हो सकता है?
ग़ौरतलब है कि भारत के इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) की मई 2005 की एक रिपोर्ट में नितिन शाह की कम्पनी और उस पर लगे आपराधिक मामलों का पूरा ब्योरा है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक़ नितिन शाह को 1989 में एक हवाला केस में प्रवर्तन निदेशालय व सीबीआई द्वारा गिरफ़्तार भी किया गया था।
सीबीआई की कार्यवाही के बाद आरोपी नितिन शाह ने अदालत का रुख़ किया और अदालत ने शाह की गिरफ़्तारी पर रोक लगाई। सूत्रों की मानें तो अदालत के आदेश से न सिर्फ़ सीबीआई बल्कि पूर्वोत्तर के अन्य राज्य भी इस मामले में हाथ डालने में मजबूर दिखाई देते हैं। उधर क़ानून के जानकारों की मानें तो इस मामले में नितिन शाह की गिरफ़्तारी पर रोक है, जाँच पर नहीं। सीबीआई की ऐसी कौनसी मजबूरी है कि वे सैंकड़ों करोड़ रुपए के घोटाले के आरोपी नितिन शाह की कम्पनी व उसके अन्य निदेशकों व अधिकारियों से पूछताछ कर तथ्यों को अदालत के सामने पेश नहीं कर रही? आश्चर्य इस बात का भी है कि जो घोटाला मोदी सरकार के आने से पहले हुआ था उसकी भी जाँच 8 बरस से ज़्यादा समय में पूरी नहीं हो पाई। क्या केंद्रीय सतर्कता आयोग व प्रधान मंत्री कार्यालय, जिनके अधीन सीबीआई काम करती है, इस संगीन मामले में बिना देरी के हस्तक्षेप करके अपराधियों को सज़ा दिलवाएगा?
शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022
एक कमरे के मंदिर से शुरू हुआ था दुबई का ‘हिंदू टेंपल’
कहते हैं कि एक बड़ी उपलब्धि कि शुरुआत छोटी सी पहल से ही होती है। दुबई का जेबेल अली इलाक़ा हाल ही में सुर्ख़ियों में था। दुनिया भर के हिंदुओं के लिए यह एक गर्व की बात है कि मुस्लिम बाहुल्य संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी दुबई में राम नवमी के दिन एक विशाल हिंदू मंदिर का लोकार्पण हुआ। इस विशाल हिंदू टेंपल की शुरुआत एक छोटे से कमरे से हुई थी। आज वही छोटा से कमरे वाला मंदिर 70 हज़ार वर्ग फ़ीट का एक विशाल मंदिर बन गया है। इस मंदिर को शांति, सद्भाव और सहिष्णुता के एक मजबूत संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है।
1958 में बने इस एक कमरे के मंदिर को गुरु दरबार सिंधी मंदिर के नाम से जाना जाता था। इस मंदिर की स्थापना रामचन्द्रन सवलानी और विक्योमल श्रॉफ़ ने की थी। ज्यों-ज्यों दुबई में बसे हिंदुओं को इस मंदिर के बारे में पता चला तब से वे बड़ी श्रद्धा से यहाँ आने लगे। जैसे-जैसे लोगों का विश्वास इस मंदिर पर बढ़ता चला गया तबसे यह मंदिर दुबई में बसे हिंदुओं की आस्था का केंद्र बन गया। आज इस विशाल मंदिर के प्रांगण में 16 अलग-अलग देवी देवताओं के मंदिर हैं। इन प्रतिमाओं को भारत के कोने-कोने से दुबई लाया गया है। इनमें प्रमुख हैं श्री राम, श्री राधा कृष्ण, शिव-पार्वती व गणपति। मकराना से लाए सफ़ेद संगमरमर से बने इस विशाल मंदिर के दर्शन के लिए दुबई के हर कोने से हिन्दू धर्म के लोग पहुंच रहे हैं।
मंदिर के कंसल्टेंट आर्किटेक्ट सुभाष बोइते ने अपने 45 साल के अनुभवों को इस मंदिर के निर्माण में जुटाया है। 1958 में जब पहला हिंदू मंदिर स्थापित हुआ था तब दुबई में भारतीय समुदाय के सिर्फ 6,000 लोग रहते थे। जबकि आज के समय यह आंकड़ा 33 लाख से भी ज़्यादा है। दुबई में हिंदुओं की तादाद बढ़ने के साथ-साथ एक बड़े मंदिर की ज़रूरत को महसूस किया जाने लगा। 2019 में दुबई के सामुदायिक विकास प्राधिकरण ने इस मंदिर के लिए जगह का आवंटन किया और 2020 में इस मंदिर का कार्य शुरू हुआ। मंदिर के ट्रस्टी राजू श्रॉफ़ के अनुसार कोविड महामारी के चलते भी इस मंदिर के निर्माण पर कोई असर नहीं पड़ा। दुबई सरकार के सहयोग से यह मंदिर समय पर बन कर तैयार हुआ।
मंदिर के कई हिस्सों को खूबसूरत नक्काशी से अलंकृत किया गया है। मंदिर की छत पर बंधी घंटियां भी बेहद खास हैं। मंदिर के मुख्य हॉल की छत के बीचोंबीच एक विशाल 3डी गुलाबी कमल का फूल बनाया गया है जो अपने आप में एक अजूबे से कम नहीं है। इस मंदिर का निर्माण दुबई के जबेल अली इलाक़े में 'पूजा गांव' में हुआ है। ग़ौरतलब है कि इस स्थान में चर्च और गुरुद्वारा भी है। इस कॉम्प्लेक्स में हिंदू देवी-देवताओं के साथ-साथ गुरु ग्रंथ साहिब को भी स्थापित किया है। इस मंदिर के प्रांगण में एक समय में 1000-1200 लोग आराम से बैठ सकते हैं। सूचना और प्रौद्योगिकी के दौर में यह मंदिर किसी से पीछे नहीं है। इस मंदिर की वेबसाइट पर जा कर आप यहाँ जाने का समय निर्धारित कर सकते हैं। क्यूआर कोड की मदद से आपको बिना किसी बाधा के इस मंदिर में घूमने दिया जा सकता है। खबरों के अनुसार अक्टूबर के अंत तक वीकेंड के लिए अधिकांश बुकिंग पहले ही हो चुकी है। मंदिर सुबह 6.30 बजे से रात 8 बजे के बीच खुला रहता है।
आज एक ओर जहां किसी भी धर्म विशेष के कट्टरपंथी निहित स्वार्थों के लिए आपस में फूट डालने का काम करते हैं वहीं क़ौमी एकता का प्रतीक बन कर दुबई के इस मंदिर ने एक सकारात्मक पहल की है। आशा है कि और धर्मों के कट्टरपंथी भी इस पहल से सबक़ लेंगे और दूसरे धर्मों के प्रति उदार होंगे। शायद इसीलिए कबीर दास जी ने कहा है कि, ‘नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए। मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए।’ हमें दूसरे धर्मों के प्रति उसी उदारता से रहना चाहिए जैसा हम दूसरों से अपेक्षा करते हैं। केवल ऊपरी मीठी बातें और दिखावा करने से कुछ नहीं होता। इसे आचरण में भी लाना चाहिए। किसी भी प्रगतिशील समाज की सफलता के पीछे क़ौमी एकता मूलभूत आधार होती है। परंतु इसमें कड़वाहट तब पैदा होती है जब कुछ असामाजिक तत्व इसमें ज़हर घोलने का प्रयास करते हैं। ऐसी घड़ी में संयम रख सजग रहना ही बेहतर होता है। नकारात्मक ताक़तों के हावी हुए बिना सकारात्मकता का साथ दें तभी समाज में एकता बढ़ेगी। हिन्दू हो या मुस्लिम, सिख या ईसाई हम सब एक ही हैं और भगवान ने हमारी एक ही प्रकार से रचना की है। हम सभी की एकता के कारण ही भारत अंग्रेज हुकूमत से आजाद हुआ था। भारत की आज़ादी में सभी धर्मों के लोगों का योगदान है।
दुबई के रामचन्द्रन सवलानी और विक्योमल श्रॉफ़ द्वारा 1958 में शुरू की गई इस पहल का उदाहरण हम सभी को लेना चाहिए। एक छोटे से कमरे से बढ़ कर एक विशाल मंदिर की कल्पना को सच करना वास्तव में सराहनीय है। आप जब भी अगली बार दुबई जाएं तो इस मंदिर के दर्शन अवश्य करें और स्वयं ही इस शानदार परिसर की सुंदरता की अनुभूति करें।
शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2022
आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान
हाल ही में देश भर से परेशान करने वाली कुछ ऐसी खबरें आई जिनका सामना हम सभी को अपने-अपने इलाक़े कभी न कभी करना पड़ा है। हमारे शहरों में आवारा कुत्तों की समस्या हर दिन बढ़ती जा रही है। आम जनता को हर गली मोहल्ले में आवारा कुत्तों से खुद को बचा कर निकलना पड़ता है। यदि इन कुत्तों से बचने के लिए हम इन्हें लाठी, डंडा या पत्थर का डर दिखाते हैं तो समाज के कुछ सभ्य लोग, जो खुद को पशु प्रेमी कहते हैं, इसका विरोध करते हैं। कुछ जगहों पर तो ये लोग नागरिकों को पुलिस की कार्यवाही की धमकी तक दे देते हैं। ग़नीमत है कि आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में कुछ सुझाव आम नागरिकों के हित में दिये हैं।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति जे के माहेश्वरी की खंडपीठ ने ऐसे एक मामले की सुनवाई के समय कहा कि ‘लोगों की सुरक्षा और पशुओं के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।’ कोर्ट ने कहा कि हर गली मोहल्ले में आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वाले लोगों को ही उनका टीकाकरण कराने तथा यदि जानवर किसी पर हमला करे तो उसका खर्च वहन करने के लिए जिम्मेदार बनाया जा सकता है।आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के मुद्दे पर न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने कहा, 'हममें से ज्यादातर कुत्ता प्रेमी हैं। मैं भी कुत्तों को खाना खिलाता हूं। मेरे दिमाग में कुछ आया। लोगों को कुत्तों का ख्याल रखना चाहिए, लेकिन उन्हें चिह्नित किया जाना चाहिए, चिप के माध्यम से ट्रैक नहीं किया जाना चाहिए, मैं इसके पक्ष में नहीं हूं।’ मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है। इस मामले में अंतिम आदेश क्या आता है ये तो आने वाला समय ही बताएगा। परंतु इस समस्या का बढ़ना देशवासियों के लिए ख़तरा बनता जा रहा है।
जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस जेके माहेश्वरी की पीठ ने 2016 में न्यायालय द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति से भी रिपोर्ट मांगी, जिसका नेतृत्व केरल हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस एस सिरिजगन ने केरल में आवारा कुत्ते के मुद्दे के संबंध में किया। सिरी जगन समिति ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट दाखिल की, जिसमें कहा गया कि अकेले पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) कार्यक्रम के कार्यान्वयन से केरल में आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान नहीं होगा। इस समस्या का कोई स्थाई हल निकालना होगा।
मामला केरल का हो, आगरा का हो, दिल्ली एनसीआर का हो या मुंबई का हो, देश भर से ऐसी खबरें आती हैं जहां कभी किसी बच्चे को, किसी डिलीवरी करने वाले को या किसी बुजुर्ग को इन आवारा पशुओं का शिकार होना पड़ता है। वहीं यदि कोई स्थानीय नगर निगम से इन कुत्तों की शिकायत करता है तो निगम द्वारा इन कुत्तों को पकड़ कर इनका टीकाकरण कर देता है जिससे इन कुत्तों की जनसंख्या पर रोक लगाया जा सकती है। टीका लगाने के पश्चात कुत्तों को वापिस उसी इलाक़े में छोड़ दिया जाता है जहां से उन्हें पकड़ा गया था। यानी कुत्तों की समस्या से छुटकारा नहीं मिलता। केवल उनके जन्म नियंत्रण पर ही रोक लगती है। उनके द्वारा काटे जाने पर रेबीज़ जैसी से बचने वाले टीके नहीं लगते।
इस सब के बावजूद आवारा कुत्तों में वृद्धि ही हो रही है। इसका मतलब यह निकाला जा सकता है कि या तो आवारा कुत्तों को सरकारी इंजेक्शन का कोई असर नहीं हो रहा और इनकी जनसंख्या बढ़ रही है। कोर्ट के आदेश की अनदेखी कर पकड़े गए आवारा कुत्तों को दूसरे इलाक़ों में छोड़ दिया जाता है।
इसलिए यह ज़रूरी है कि आवारा कुत्तों के हक़ के लिए लड़ने वाले एक्टिविस्ट इस बात का ध्यान दें कि उनकी ज़िम्मेदारी केवल बेज़ुबान पशुओं के प्रति ही नहीं बल्कि समाज के प्रति भी है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के सुझाव का सम्मान करते हुए इन एक्टिविस्टों को अपने गली मोहल्ले में सभी आवारा पशुओं को चिन्हित कर उनका पंजीकरण करवाना चाहिए। उनका टीकाकरण करवाना चाहिए। यदि उन आवारा पशुओं द्वारा किसी व्यक्ति को काट लिया जाता है या उसकी संपत्ति को नुक़सान पहुँचाया जाता है तो उसकी भरपाई और इलाज के लिए इन एक्टिविस्टों को ही ज़िम्मेदार ठहराना चाहिए। जिस तत्पर्ता से ये एक्टिविस्ट इन आवारा कुत्तों के अधिकारों के लिए नागरिकों से उलझ जाते हैं उसी तत्पर्ता से इन्हें नागरिकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आवारा पशुओं के हक़ के लिए लड़ना चाहिए।
इसके साथ ही राज्य सरकारों और नगर निगमों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हर गली मोहल्ले में आवारा पशुओं के साथ-साथ ‘एनिमल लवर्स’ का भी पंजीकरण अनिवार्य हो। हर ‘एनिमल लवर’ को केवल निर्धारित स्थानों पर ही आवारा पशुओं को खाना देने की अनुमति हो। नगर निगम द्वारा ‘एनिमल लवर्स’ और आवारा कुत्तों की नियमित जाँच हो जिससे यदि किसी भी इलाक़े में आवारा पशु की वृद्धि होती है तो उस पर तुरंत कार्यवाही कर नियंत्रण पाया जा सके।
यह समस्या विदेशों में नहीं देखी जाती क्योंकि वहाँ पर नगर निगम के अधिकारी और जनता एक दूसरे पर भरोसा करते हैं और क़ानून का पालन भी करते हैं। हमारे देश में यह कब और कैसे होगा ये तो आने वाला समय ही बताएगा। तब तक के लिए ‘एनिमल लवर्स’ और नागरिकों को संयम बनाए रखने की ज़रूरत है। बेज़ुबान जानवर तो वही करेंगे जैसा उनको समझाया जाएगा। बेज़ुबान जानवरों की रक्षा करते हुए हमें खुद जानवर नहीं बनना चाहिए।
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