शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

नागरिक उड्डयन: समस्याओं को गम्भीरता से लें


पिछले कुछ हफ़्तों में देश की नामी एयरलाइन कम्पनियों के विमानों में तकनीकी ख़राबी सुर्ख़ियों में थी। इसके पीछे कई कारण हैं। इनमें से प्रमुख है विमानों के रख-रखाव सम्बंधित कर्मचारियों की कमी। नागरिक उड्डयन क्षेत्र में पिछले दिनों हुई तकनीकी विफलताओं ने देश का नाम ख़राब किया है। तकनीकी कर्मचारियों की कमी का कारण है उन्हें एयरलाइन द्वारा उचित मानदेय न देना। इसके विरोध में कई कर्मचारी हड़ताल पर भी हैं।

सवाल उठता है कि नागरिक उड्डयन क्षेत्र में दुनिया के तीसरे सबसे बड़े देश भारत का नाम क्यों ख़राब हो रहा है? क्या केवल एयरलाइन कम्पनियाँ ही इसके लिए ज़िम्मेदार हैं? क्या नागर विमानन महानिदेशालय या डीजीसीए की इसमें कोई भूमिका नहीं है?


नागर विमान क्षेत्र में हाल ही में हुई तकनीकी कमियों की घटनाओं में से अहम घटनाएँ कुछ इस प्रकार हैं। गो-एयर के एक विमान की विंडशील्ड का हवा के बीच चटख जाना। इसी कम्पनी के दो विमानों के इंजन में कमी होने के कारण उड़ान नहीं भरी जा सकी। एक अन्य एयरलाइन में उड़ान के बीच केबिन में धुआँ उठने लगा। एक विमान में तो फ़्यूल इंडिकेटर की ख़ामी सामने आई। बैंकॉक से आते हुए एक निजी एयरलाइन के विमान का एक इंजन ही फेल हो गया और उसे एक इंजन के भरोसे ही लैंड करना पड़ा। आए दिन खबरों में यह भी पता चलता है कि एयरलाइन क्रू के सदस्य ‘ब्रेथ एनलाइजर टेस्ट’ (खून में नशे की मात्रा की जाँच) में दोषी पाए जाने के बावजूद उड़ान भी भरी। ऐसे अनेक मामले हैं जिन्हें गम्भीरता से लेने की ज़रूरत है। ऐसी ही तकनीकी या अन्य लापरवाही किसी बड़े हादसे को अंजाम देती है।

ऐसी तकनीकी लापरवाही को भविष्य में दोहराया न जाए इसके लिए देश के नागर विमानन महानिदेशालय में एक ‘एयर सेफ़्टी डिपार्टमेंट’ होता है। इस विभाग की ज़िम्मेदारी विमान और उसमें सवार यात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चित करना है। परंतु जिस तरह के हादसे पिछले हफ़्तों में सामने आए हैं उनसे ऐसा लगता है कि डीजीसीए के अधिकारी विमान सुरक्षा को भगवान भरोसे छोड़ कर अपने आरामदायक कमरों से बाहर निकलना पसंद नहीं कर रहे हैं। ये अधिकारी सारा दोष कर्मचारियों पर डालकर उनकी कमी बता रहे हैं।

हर विमान उड़ान भरने से पहले तीन चरण की तकनीकी जाँच से गुजरता है। इन तकनीकी जाँचों को तीन श्रेणी के एयरक्राफ़्ट मेंटेनेंस इंजीनियर अंजाम देते हैं। बी2 श्रेणी के इंजीनियर विमान के इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों की जाँच कर उसकी ख़ामियों को दुरुस्त करते हैं। वहीं बी1 श्रेणी के इंजीनियर विमान के मकैनिकल पुर्ज़ों की जाँच कर उसकी ख़ामियों को दुरुस्त कर सकते हैं। ए श्रेणी के इंजीनियर अन्य चीजों की जाँच करते हैं। जब इतने हादसे सामने आए तो डीजीसीए के अधिकारियों की आँख खुली और जाँच में पाया गया कि उड़ान भरने के तनाव के चलते और एयरक्राफ़्ट मेंटेनेंस इंजीनियरों की कमी के चलते विमानों की जाँच केवल ए श्रेणी के एयरक्राफ़्ट मेंटेनेंस इंजीनियरों द्वारा ही की जा रही थी। बाक़ी के इंजीनियर नदारद हैं। जबकी नागर विमानन क़ानून के तहत विमान कि उड़ान पूर्व जाँच केवल बी2 व बी1 श्रेणी के द्वारा ही की जानी चाहिए।

ये तो हुई निजी एयरलाइन की बात। परंतु राज्य सरकार के नागरिक उड्डयन विभाग हों या फिर निजी चार्टर सेवा, इन सब में तो नियम क़ानून की धज्जियाँ खुले आम उड़ाई जाती हैं और डीजीसीए आँख मूँद कर बैठा रहता है। इतिहास गवाह है कि देश के कई बड़े नेताओं ने विमानों की तकनीकी ख़राबी के चलते अपनी जान गवाई। परंतु डीजीसीए ने इन हादसों से कोई सबक़ नहीं सीखा।

विमान की उड़ान पूर्व तकनीकी जाँच में हुई इस चूक की ज़िम्मेदारी केवल एयरलाइन के सिर मढ़ने से डीजीसीए का ‘एयर सेफ़्टी डिपार्टमेंट’ अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता। ग़ौरतलब है कि हर उड़ान की एक लॉग बुक होती है जिसमें प्रत्येक छोटी बड़ी जाँच की रिपोर्ट दर्ज होती है। इसके साथ ही उस जाँच को करने वाले का भी ज़िक्र इसी लॉग बुक में होता है। जिसे एयरलाइन द्वारा डीजीसीए में नियमित रूप से जमा किया जाता है। सोचने वाली बात यह है कि डीजीसीए के ‘एयर सेफ़्टी डिपार्टमेंट’ के अधिकारियों तक या तो यह सूचना पहुँच नहीं रही थी या सूचना मिलने के बावजूद डीजीसीए के अधिकारी निहित स्वार्थ के चलते इस पर जान-बूझ कर कार्यवाही नहीं कर रहे थे। यदि सूचना का नहीं पहुँचना या देर से पहुँचना कारण है तो पहली गलती पर ही इन अधिकारियों ने शोर क्यों नहीं मचाया? यदि सूचना समय पर पहुँच गयी थी तो ये अधिकारी आँख मूँद कर क्यों बैठे थे? जानकारों के मुताबिक़ ऐसा इसलिए है क्योंकि डीजीसीए जैसी संस्था में तकनीकतंत्र पर अफ़सरशाही हावी है।

डीजीसीए के कुछ अधिकारियों द्वारा कुछ निजी एयरलाइन कम्पनियों के साथ ‘ख़ास रिश्तों’ के चलते उनकी गंभीर ग़लतियों पर भी उन्हें माफ़ कर दिया जाता है। दूसरी तरफ़ जहां इन अधिकारियों के ‘रिश्ते’ अच्छे नहीं होते तो उस एयरलाइन के स्टाफ़ की मामूली सी गलती पर कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाती है। एक अनुमान के तहत आनेवाले दो दशकों में भारत का नागर विमानन ट्राफ़िक 5 गुना बढ़ने की संभावना है। यदि इस क्षेत्र में हमें एक अच्छी पहचान बनानी है तो डीजीसीए के चुनिंदा अधिकारियों को अपने स्वार्थों को दरकिनार करते हुए देश के नागरिकों की सुरक्षा और एयरलाइन कम्पनी के विमानों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी।

डीजीसीए के ‘एयर सेफ़्टी डिपार्टमेंट’ विमानों की जाँच के हर पहलू को कड़ाई से लागू करने को गम्भीरता से लेना होगा। ऐसा करने से एक ओर हवाई यात्रा करने वाले यात्री अपने को सुरक्षित महसूस करेंगे। वहीं दूसरी ओर एयरलाइन कम्पनियों को भी इस बात का ख़ौफ़ रहेगा कि छोटी सी भूल के चलते उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्यवाही भी हो सकती है। 

शुक्रवार, 15 जुलाई 2022

ज़मानत क़ानून में सुधार की ज़रूरत


गर्मियों की छुट्टियों के बाद जहां एक दिन में 44 फ़ैसले सुना कर सुप्रीम कोर्ट ने अपने इतिहास में एक नया रिकोर्ड बनाया वहीं ज़मानत के क़ानून में सुधार को लेकर केंद्र सरकार को एक नया क़ानून बनाने पर विचार करने को भी कहा। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल व न्यायमूर्ति एमएम सुंद्रेश की बेंच वाली कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि “भारत को कभी भी एक पुलिस स्टेट नहीं बनना चाहिए, जहां जांच एजेंसियां औपनिवेशिक युग की तरह काम करें।” इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिकाओं के निपटारे के लिए समय-सीमा की जरूरत को भी दोहराया है। कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि महिला क़ैदियों के साथ लगभग एक हज़ार बच्चों को भी जेलों में रहना पड़ रहा है। ये बच्चे बड़े हो कर अपराधी बनेंगे इस बात के अंदेशे से इन्कार नहीं किया जा सकता।   

क़ानून में यह बात स्पष्ट रूप से लिखी है कि जब तक आरोपी पर लगाए हुए आरोप सिद्ध न हो जाएं तब तक उसे दोषी करार नहीं किया जा सकता। यदि किसी के ख़िलाफ़ कोई एफ़आईआर दर्ज होती है तो उस व्यक्ति पर लगे आरोपों के आधार पर क़ानूनी धाराओं को एफ़आईआर में जोड़ा जाता है। अपराध और आपराधिक धाराओं पर निर्भर करता है कि वो अपराध ज़मानती है या ग़ैर ज़मानती। यदि अपराध ज़मानती होता है तो आम तौर पर आरोपी को पुलिस थाने में ही ज़मानत मिल जाती है। यदि अपराध संगीन होता है तो ज़मानत का मिलना या न मिलना केवल अदालत पर निर्भर करता है।


जहां तक दंड प्रक्रिया संहिता, 1973, का सवाल है तो वो जमानत को परिभाषित नहीं करता। हालांकि मामलों को जमानती अपराध और गैर जमानती अपराध संहिता की धारा 2 (क) में परिभाषित किया गया है। एक जमानती अपराध को एक ऐसे अपराध के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसे संहिता की पहली अनुसूची में जमानती के रूप में दिखाया गया है या जिसे किसी अन्य कानून द्वारा जमानती बनाया गया है, और गैर-जमानती अपराध का मतलब कोई अन्य अपराध है। एक व्यक्ति जिसे 'जमानती' अपराध के लिए गिरफ्तार किया गया है, वह पुलिस थाने में जमानत सुरक्षित कर सकता है, जबकि जो लोग पुलिस जमानत हासिल करने में विफल रहते हैं और जो गैर-जमानती अपराधों के लिए गिरफ्तार होते हैं, उन्हें अदालत में जमानत मिलनी चाहिए।।

ज़मानत मिलने का मतलब यह नहीं होता कि आप आरोप मुक्त हो गए हैं। ज़मानत आमतौर पर कई शर्तों के साथ दी जाती है। इन शर्तों में प्रमुख शर्त यह होती है कि आरोपी शहर छोड़ कर नहीं जाएगा। इसके साथ ही ज़मानत की एक राशि भी तय की जाती है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि आरोपी जाँच में सहयोग करे, जिसके आधार पर ही उस पर लगे आरोपों की पुष्टि या उसे आरोप मुक्त किया जा सके।

ग़ौरतलब है कि देश की जेलों में ऐसे कई अपराधी क़ैद हैं जो कि विचाराधीन हैं। इन अपराधियों को कोर्ट में पड़े लम्बित करोड़ों केसों के चलते सुनवाई न हो पाने के कारण ज़मानत मिलने में देर हो जाती है। इसी के चलते सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत के मामलों के निपटारे की समय-सीमा तय करने पर भी ज़ोर दिया है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी उच्च न्यायालयों को उन विचाराधीन कैदियों रिहाई को सुविधाजनक बनाने के लिए उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिये जो क़ैदी जमानत की शर्तों का पालन करने में असमर्थ हैं। कोर्ट ने ऐसे मामलों से निपटने के लिए हाई कोर्ट की विशेष अदालत पर भी ज़ोर दिया और इनमें रिक्त स्थानों को जल्द से जल्द भरने को भी कहा। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल व न्यायमूर्ति एमएम सुंद्रेश की बेंच ने सभी उच्च न्यायालयों और राज्यों व केंद्र-शासित प्रदेशों की सरकारों से चार महीने में इस संबंध में स्टेटस  रिपोर्ट दाखिल करने को भी कहा।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि जब सुप्रीम कोर्ट ज़मानत के मामलों को लेकर इतना गंभीर हुआ है। ऐसे तमाम मामले हैं जिनमें कोर्ट ने ज़मानत के मौजूदा क़ानून और आरोपी की ज़मानत के हक़ को लेकर तीखी टिप्पणी की है और पुलिस प्रशासन चेतावनी भी दी है। आमतौर पर यह देखा गया है कि कोर्ट और पुलिस की तना-तनी, पुलिस द्वारा ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से की गई गिरफ़्तारी के चलते होती है। जानकारों का मानना है कि पुलिस कभी-कभी राजनैतिक कारणों या किसी अन्य दबाव के चलते गिरफ़्तारी करने में जल्दी करती है। वहीं ऐसा भी देखने में आया है कि जब इसके विपरीत पुलिस द्वारा गिरफ़्तारी न करने पर भी कोर्ट ने पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ज़मानत के क़ानून में सुधार और उसे समयबद्ध तरीक़े से लागू करने में केंद्र सरकार क्या रुख़ अपनाती है? जो भी हो सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से जेलों में बंद विचाराधीन क़ैदियों को राहत मिलेगी। इसके साथ ही लम्बित पड़े रूटीन गिरफ़्तारियों की ज़मानत के मामलों की सुनवाई को लेकर कोर्ट के क़ीमती समय की बचत भी होगी। बशर्ते उच्च न्यायालय और सरकार सर्वोच्च न्यायालय के इन निर्देशों का कड़ाई से और बिना देरी के पालन करें।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

पुलिस की मजबूरी


हाल ही में हुई दो पत्रकारों की गिरफ़्तारी को लेकर पुलिस की कार्यशैली पर एक बार फिर से सवाल उठने लगे हैं। ताज़ा मामला एक राष्ट्रीय टीवी चैनल के एंकर की गिरफ़्तारी से सम्बंधित है। इस घटना में जिस तरह दो राज्यों की पुलिस इस एंकर की गिरफ़्तारी को लेकर आपस में भिड़ी है वो नई बात नहीं है। कुछ हफ़्तों पहले भी ऐसा कुछ हुआ था जब एक राजनैतिक पार्टी के प्रवक्ता की गिरफ़्तारी के समय पंजाब, दिल्ली और हरियाणा की पुलिस आपस में उलझ गयी थी। जब कभी ऐसी परिस्थिति पैदा होती है पुलिस अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठते आए हैं।

न्यूज़ एंकर रोहित रंजन की गिरफ़्तारी के समय हुई घटना के तथ्यों को देखें। छत्तीसगढ़ पुलिस के पास उन्हें पूछताछ के लिए ले जाने वाला एक वारंट था। जिसका वो पालन कर रहे थे। छत्तीसगढ़ पुलिस का आरोप है कीं नॉएडा पुलिस ने उस वारंट को अनदेखा कर रोहित को अपनी हिरासत में ले लिया। नॉएडा पुलिस ने ऐसा एक दूसरी शिकायत के आधार पर किया। ग़ौरतलब है कि नॉएडा पुलिस को रोहित के ख़िलाफ़ शिकायत देने वाला और कोई नहीं बल्कि वही न्यूज़ चैनल है जहां रोहित बतौर एंकर काम करते हैं।


जब उसी चैनल को अपनी गलती का एहसास हुआ तब उन्होंने अपने चैनल पर न सिर्फ़ गलती की माफ़ी माँगी बल्कि उस कार्यक्रम के दो निर्माताओं को भी इस गलती के लिए निलम्बित कर दिया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि न्यूज़ एंकर तो केवल लिखी हुई स्क्रिप्ट पढ़ते हैं। प्रायः अपनी तरफ़ से नहीं बोलते।

एक शिकायत पर इस नॉएडा पुलिस की तत्परता पर कई सवाल उठते हैं। आमतौर पर जब तक कोई संगीन आरोप न हो और पुलिस को लिखित शिकायत न मिले तो पुलिस गिरफ़्तारी से पहले आरोपी को संदेश देकर जाँच में सहयोग करने के लिए बुलाती है। यदि जाँच में यह पाया जाता है कि आरोपी पर लगाए गए आरोप सही हैं तब उसकी गिरफ़्तारी कर ली जाती है। उसे ज़मानत मिलेगी या नहीं वो उस आरोपी पर लगी धाराओं पर निर्भर करता है।एक राजनैतिक पार्टी के प्रवक्ता के बयान पर पंजाब, दिल्ली और हरियाणा पुलिस के बीच हुई रस्साकशी में जो बवाल हुआ वो कोर्ट के दख़ल के बाद ही सुलझा।

वहीं देखा जाए तो सोशल मीडिया में चलने वाली खबरों के ‘फ़ैक्ट चैकर’ मोहम्मद ज़ुबैर की जब 4 साल पुराने ट्वीट को लेकर गिरफ़्तारी हुई तो दिल्ली पुलिस के काम में दूसरे राज्य की पुलिस ने कोई दख़ल नहीं दिया। ये बात अलग है कि ज़ुबैर के ख़िलाफ़ शिकायत करने वाला ट्वीटर हैंडल, इस गिरफ़्तारी के बाद रहस्यमयी ढंग से डिलीट कर दिया गया। पुलिस की मुस्तैदी से अपराध रोकने में हमेशा मदद मिलती है। परंतु जब मुस्तैदी सही समय पर न हो तो इस पर पुलिस को कई तरह के सवालों का सामना करना पड़ता है।

परंतु पुलिस हर मामले में ऐसी ही मुस्तैदी दिखाती हो प्रायः ऐसा देखने में नहीं आता। मिसाल के तौर पर नॉएडा के एक व्यापारिक समूह पर कई निवेशकों के साथ धोखाधड़ी के आरोप के चलते नॉएडा फ़ेस 1 के थाने के अंतर्गत एफ़आइआर संख्या 0047/2022 गत 23 फ़रवरी 2022 को दर्ज हुई थी। यह एफ़आइआर शरद अरोड़ा और 12 अन्य व्यक्तियों के ख़िलाफ़ आईपीसी की 8 संगीन धाराओं में दर्ज कराई गई थी। फ़िलहाल ये मामला नॉएडा क्राइम ब्रांच के पास लम्बित पड़ा है।  

एफ़आइआर पढ़ने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि आरोपी शरद अरोड़ा की कम्पनी ने करोड़ों रुपये का ग़बन करके कई कम्पनियों को धोखा दिया है। यह कम्पनी सोफ्टवेयर बनाने का काम करती है। आरोप है कि निवेशकों को झूठे सपने दिखा कर कम्पनी ने करोड़ों की पूँजी का निवेश करवा था। साथ ही इन पर यह भी आरोप है कि इन्होंने कई फ़र्ज़ी कम्पनियाँ खोल कर निवेशकों के साथ किए अनुबंध का भी उल्लंघन किया। एफ़आइआर के अनुसार अरोड़ा ने अपनी कम्पनी में होने वाली बोर्ड मीटिंग के दस्तावेज़ों को भी जालसाज़ी कर, फ़र्ज़ी बोर्ड मीटिंग होना दिखाया है। इस पर आरोप है कि इनकी कम्पनी ने फ़र्जीवाड़ा कर निवेशकों के करोड़ों रुपयों को ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से कम्पनी से निकाल लिया।

इस एफ़आइआर के ख़िलाफ़ ज़मानत लेने के लिए इन 13 आरोपियों में से एक आरोपी ने नॉएडा कोर्ट में अर्ज़ी लगाई जिसे कोर्ट ने 25 अप्रेल 2022 को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में इन आरोपियों को जाँच में सहयोग करने के आदेश भी दिए। इतना ही नहीं मुख्य आरोपी शरद अरोड़ा ने माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इस एफ़आइआर को रद्द करने की याचिका भी दाखिल की। जिसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 12 अप्रेल 2022 को अपने आदेश द्वारा रद्द कर दिया। कोर्ट के आदेश स्थानीय पुलिस को न मिले हों ऐसा हो नहीं सकता। क्योंकि जब भी कोई मामला अदालत के समक्ष जाता है तो दोनों पक्षों को सुना जाता है।

एक ओर कुछ ही घंटों पहले दी गई तहरीर के आधार पर आनन-फ़ानन में तथ्यों से छेड़-छाड़ के आरोप पर न्यूज़ एंकर को उत्तर प्रदेश पुलिस गिरफ़्तार कर लेती है। वहीं करोड़ों की धोखाधड़ी के आरोपी अरोड़ा परिवार और उनके सहयोगियों को पुलिस किस मजबूरी या दबाव के चलते पिछले पाँच महीनों से गिरफ़्तार नहीं कर पा रही? ये एक गंभीर सवाल है। इसलिये कहना पड़ता है कि कभी-कभी पुलिस अपने ही ग़लत कारनामों से विवादों में रहती है।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

बाइक राइडिंग और महिलाएँ


भारत में आमतौर पर मोटर साइकिल चलाना या बाइक राइडिंग करना ज़्यादातर पुरुषों का खेल ही माना जाता था। लेकिन गुरुग्राम की सुपर्णा सरकार एक ऐसी लड़की हैं जिसने अपनी ‘स्टार एकेडमी ऑफ बाइक ट्रेनिंग’, के माध्यम से पुरुषों की इस दुनिया में अपनी पहचान बना ली है। इसके माध्यम से सुपर्णा ने कई महिलाओं को बाइक राइडिंग की ट्रेनिंग दे कर पुरुषों को अच्छी टक्कर दी है।

सुपर्णा ने ये दिखा दिया कि कोई भी काम सिर्फ पुरुषों के लिए ही नियत हो ऐसा नहीं है। सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की पढ़ाई के साथ-साथ अपने शौक़ को सुपर्णा ने ज़िंदा रखा और फिर उसी को अपना पेशा बना लिया।


भारत की मोटरसाइकिलों के सभी ब्रांडों में ‘मर्द बाइक’ माने जाने वाली ‘रॉयल एनफील्ड या बुलेट’ को चलाना कभी-कभी मर्दों के बस की बात भी नहीं होती। लेकिन सुपर्णा ऐसी दो रॉयल एनफील्ड मोटरसाइकिलों की मालकिन हैं। इतना ही नहीं उन्होंने इन मोटरसाइकिलों पर होने वाले ऑफ-रोडिंग और डर्ट बाइकिंग इवेंट्स में भी हिस्‍सा लिया और पहला स्थान भी हासिल किया।

2019 में उन्होंने महिलाओं के बीच हुई ‘द आगरा ताज बाइक रैली’ में भी पहला स्थान हासिल किया। इतना ही जलवा काफ़ी नहीं था, तो जब सुपर्णा की शादी हुई तो उन्होंने बाइक पर सवार होकर मेहमानों के सामने शादी में एक शानदार एंट्री की थी। जो किसी ने पहले न कभी देखा न सुना।


कहावत है कि ‘जो रुचे सो पचे’, यदि आपको एक आलीशान दफतर में एक अच्छे पद पर बैठा दिया जाए और आपका मन कुछ और करने की सोचे तो क्या होगा? न तो आप जो कर रहे हैं, वो अच्छे से कर पाएँगे और न ही अपने सपने को सच कर पाएँगे। इसलिए अपने कैरीयर की शुरुआत एक आईटी कम्पनी से करने वाली सुपर्णा ने बहुत जल्द ये सोच लिया कि वो बाइक राइडिंग को ही अपना पेशा बनाएँगी। सुपर्णा कहती हैं कि 2018 में जब उन्हें अपने ही कॉलेज में एक व्याख्यान देने के लिए बुलाया गया था तो उन्होंने ये इच्छा ज़ाहिर की कि वे सुरक्षित बाइक राइडिंग की एक ट्रेनर बनना चाहती हैं।

इरादे की पक्की सुपर्णा ने कुछ ही महीनों में एक बाइक राइडिंग ट्रेनेर की नौकरी करना शुरू कर दिया। वहाँ उन्होंने क़रीब 18 महीने काम किया। जब कोविड महामारी के कारण वे भी औरों की तरह घर की चारदीवारी में सिमट कर रह गईं तो भी उन्होंने अपने इस इरादे को ज़िंदा रखा।

सुपर्णा ने जब एहसास किया कि वे खुद एक सुरक्षित बाइक राइडर हैं तो क्यों न इस कला को सबके साथ साझा किया जाए। ख़ासकर महिलाओं को इस कला में शिक्षित करने के इरादे से उन्होंने कोविड महामारी के दौरान अपनी ही एक एकेडमी बनाई। आज इस एकेडमी में न सिर्फ़ महिलाएँ बल्कि पुरुष दोनों ही सुरक्षित बाइक राइडिंग सीखने आते हैं। जिन लोगों ने सुपर्णा को इस एकेडमी में प्रशिक्षण देते हुए देखा है वो कहते हैं कि सुपर्णा न सिर्फ़ बाइक राइडिंग सिखाती हैं बल्कि इसकी बारीकियों से भी अपने विद्यार्थियों को परिचित कराती हैं। वो हरेक सीखने वाले को न सिर्फ़ पूरा समय देती हैं बल्कि उनसे उनकी समस्या को समझ कर उसका समाधान भी करतीं हैं। देश भर की युवतियों के लिए सुपर्णा का जीवन सचमुच बहुत प्रेरणादायक है। जिसने रूढ़ियों को तोड़ कर वो कर दिखाया जो हर मर्द भी आसानी से हिम्मत नहीं करेगा। ऐसी लगन से ही अपने मक़सद को हासिल किया जाता है।

प्रायः लड़कियाँ लोक निंदा के भय से संकोच कर जाती हैं या उनके परिवारजन प्रोत्साहित नहीं करते कि लोग क्या कहेंगे? पर इसकी परवाह किए बिना जब सुपर्णा ने जब अपनी मल्टीनैशनल कम्पनी की पहली नौकरी बदली तो उन्हें एक मोटरसाइकिल की कम्पनी में राइड आयोजन की मार्केटिंग का काम मिला। यहाँ उन्होंने अपने इस इरादे को पंख लगा दिए। इसी जॉब के लिए उन्होंने अपनी इंजिनीयरिंग डिग्री वाली नौकरी छोड़ दी। ये सोच कर कि डिग्री तो उनके पास है ही और इसी आधार पर नौकरी भी दोबारा मिल जाएगी। लेकिन बाइक राइडिंग के अपने जज़्बे को ज़िंदा रखने का यही एक मौक़ा था।

फ़ौजी की इस बेटी ने दृढ़ संकल्प लेकर बाइक राइडिंग के समुद्र में छलांग लगा ही डाली और इस जगत में अपने लिए एक अच्छा स्थान भी हासिल किया। सुपर्णा के अनुसार इस बाइक की कम्पनी में काम करने से पहले वो अन्य महिला बाइकर्स की तरह सिर्फ़ मोटरसाइकिल को स्टार्ट कर उसकी सवारी करती थीं। लेकिन यहाँ आ कर उन्हें सही मायने में यह पता चला मोटरसाइकिल को सही ढंग से कैसे कंट्रोल किया जाता है। इसके बाद उन्होंने एहसास किया कि वो शायद अकेली महिला नहीं हैं जिनके पास ये सब जानकारी नहीं है। इसी इरादे से उन्होंने ज्ञान बाँटना शुरू किया और आज वे एक बाइक राइडिंग ट्रेनर एकेडमी सफलता से चलाती हैं। जहां चाह वहाँ राह, सुपर्णा इस बात का एक जीता जागता उदाहरण हैं जो देश कि कई बेटियों को प्रेरणा देती है।