शुक्रवार, 31 मार्च 2023

गुवाहाटी से हुई एक अच्छी शुरुआत


आज देश में जहां देखो आपको ज़्यादातर लोग कुछ नया करने कि होड़ में लगे रहते हैं। इस नये को आज के दौर में स्टार्ट-अप का नाम दिया जाने लगा है। अधिकतर युवा अपनी पढ़ाई पूरी कर के जीवन व्यापन के लिए अपने स्टार्ट-अप को शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता देने वालों को खोजते हैं और अपना सपना सच करने की दिशा में चल देते हैं। परंतु असम की राजधानी गुवाहाटी के रेलवे स्टेशन पर एक ऐसी शुरुआत हुई है जिसे देश के सभी हिस्सों तक पहुँचाना चाहिए। इस शुरुआत के लिए पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे बधाई की पात्र है। 
 
जब भी आप रेल यात्रा करते है तो गाड़ी के स्टेशन पर रुकते ही आपको एक अलग अन्दाज़ से ‘चाय चाय चाय चाय’ की आवाज़ सुनाई देती है। रेल यात्रा की थकान को मिटाने का सबसे सस्ता तरीक़ा इसी आवाज़ से मिलता है। परंतु आज हम रेलवे स्टेशन पर मिलने वाली चाय के बारे में जो अच्छी पहल हुई है उसके बारे में बात करेंगे। रेल यात्रा के दौरान आपने अक्सर रेल के डिब्बों में किन्नर समाज के लोग यात्रियों से पैसे माँगते हुए देखा होगा। कई बार यात्रियों की इनसे झड़प भी हो जाती है। अधिकतर लोगों का किन्नरों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रहता है और वे इनसे मुँह मोड़ लेते हैं। परंतु मुँह मोड़ने से इनकी समस्या का हल नहीं होता। पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे ने इसी दिशा में पहल करते हुए देश का पहला ‘ट्रांस टी स्टाल’ खोला है। इस टी स्टाल को किन्नर समाज के लोगों द्वारा चलाया जाएगा और अब वे ट्रेनों में पैसा माँगने पर मजबूर नहीं होंगे। 
 

शास्त्रों के अनुसार किन्नर वह जाति है, जिसने देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों के साथ स्थान पाया है। भारतीय हिन्दू संस्कृति में प्राचीन काल से ही किन्नरों का गौरवपूर्ण स्थान रहा है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किन्नरों के बिना भारतीय संस्कृति अधूरी है। भारत में तुर्कों, अफगानों व मुगलों के समय में भी किन्नर शाही हरम में निवास करते थे। परंतु जैसे-जैसे समय बदला, किन्नर जाति पर विभिन्न तरह के हमले होते गये। जो किन्नर जाति किसी समय भारतीय संस्कृति का मुख्य हिस्सा थी, वह बिखरने लगी और उसके हालात बद से बदतर होने लगे। किन्नरों  बदहाली का सबसे बड़ा कारण भारतीय समाज के वे ठेकेदार हैं, जो एक ओर इसकी रक्षा न कर सके और दूसरी ओर इनको न्याय भी न दिलवा सके। इसके साथ ही इनकी बढ़ती आबादी ने भी इनको भीख माँगने जैसे काम करने पर मजबूर कर दिया।
 
देखा जाए तो किन्नर आपको दुनिया के हर मुल्क में मिलेंगे पर इनका जो हाल हमारे देश में है वो और कहीं नहीं। इसके लिए नकारात्मक सोच ही ज़िम्मेदार है जो इनको सही दर्जा नहीं देती। विदेशों में किन्नर समाज के लोग अपनी जीविका के लिए अपने मन का काम करते हैं और सम्मान के साथ जीते हैं। विदेशों में आपको कोई किन्नर सड़क पर या सार्वजनिक स्थानों पर भीख माँगता दिखाई नहीं देगा। हमारे देश में भी जैसे-जैसे समय बदला राजनीति के बाद विभिन्न व्यवसायों में ट्रांसजेंडर समाज के लोगों ने भी अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है। 
 

परंतु अभी भी इस समाज का अधिकतर हिस्सा उत्पीड़न का शिकार है। गुवाहाटी के रेलवे स्टेशन से शुरू होने वाली इस पहल का स्वागत करते हुए ट्रांसजेंडर रानी काफ़ी खुश हैं। रानी के अनुसार उनके समाज के लोग, अनपढ़ होने के कारण व परिवार से बहिष्कार के कारण बसों और ट्रेनों में भीख माँगने के लिये मजबूर थे, पर अब ऐसा नहीं। इस पहल का स्वागत करते हुए रानी का कहना है कि सरकार को किन्नर समाज के विकास के लिए ऐसे कदम उठाने चाहिए जिससे किन्नरों को अपनी जीविका चलाने में मदद मिले। रानी के अनुसार यदि कोई मेहनत मज़दूरी करके अपना ख़र्च उठाए तो उसे अपमानित नहीं होना पड़ेगा। आज रानी के टी स्टाल से लोग बेझिझक चाय व अन्य सामान ख़रीदते हैं। इससे रानी और उनके समाज को गर्व महसूस होता है। 
 

मशहूर लेखिका चित्रा मुद्गल के उपन्यास के एक उदाहरण में स्पष्टतः किन्नरों के प्रति चेतन होने का आह्नान किया गया है- ‘जरूरत है सोच बदलने की। संवेदनशील बनाने की। सोच बदलेगी, तभी जब अभिभावक अपने लिंग-दोषी बच्चों को कलंक न मान किन्नरों के हवाले नहीं करेंगे। उन्हें घूरे में भी नहीं फेंकेंगे। ट्रांसजेंडर के खांचे में नहीं ढकेलेंगे। यह पहचान जब उन्हें किन्नरों के रूप में जीने नहीं दे रही समाज में तो सरकारी मान्यता मिल जाने के बाद जीने देगी?’
 
जिस तरह जेलों में बंद क़ैदियों को सुधारने की दृष्टि से जेलों में लघु उद्योग स्थापित किए जाते हैं और फिर उनके द्वारा निर्मित सामान को बाज़ारों बेचा जाता है उसी तरह किन्नर समाज के लिए भी ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है। इस दिशा में किन्नरों को जागृत करने के लिए सरकार के साथ-साथ ग़ैर सरकार संस्थाओं को भी आगे आना चाहिए। किन्नर भी सामान्य मानव की तरह ही होते हैं। उनके विकास के लिए सर्वप्रथम समाज को अपनी मानसिकता में कुछ परिवर्तन करना होगा। शासन की सक्रिय भूमिका के साथ किन्नरों का विकास हो सकता है। इससे भी आवश्यक है कि किन्नर समुदाय में चेतना का संचरण। यदि वे स्वयं चेतन हो जाएंगे तो बहुत सी समस्याओं का हल वे स्वयं चेतन हो जाएंगे तो बहुत सी समस्याओं का हल वे स्वयं भी खोज सकते हैं। इसलिए गुवाहाटी से शुरू हुई इस पहल को और आगे बढ़ाना चाहिए।

शुक्रवार, 24 मार्च 2023

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी!

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे। कफ़ील आज़र अमरोहवी ने जब अपनी ये नज़्म लिखी होगी तब उन्हें शायद इस बात का ध्यान नहीं होगा कि उनकी नज़्म के शेर कई परिस्थितियों में इस्तेमाल किए जाएँगे। जब भी कभी किसी रहस्यमयी घटना का आंशिक पर्दाफ़ाश होता है तो अक्सर इसी शेर को याद किया जाता है। आपने संसद में भी माननीय सांसदों से इस शेर को कई बार सुना होगा। आज इस शेर को एक बार फिर से याद किया जा रहा है। कारण है जम्मू कश्मीर की घाटी में घटी एक घटना का, जिसने पूरे देश को अचंभे में डाल रखा है। 
 

पिछले दिनों एक ऐसा मामला सामने आया जिसमें एक शख़्स ने ख़ुद को प्रधान मंत्री कार्यालय का एक बड़ा अधिकारी बता कर जम्मू कश्मीर में ‘जेड प्लस’ श्रेणी की सुरक्षा ले ली और उन्हीं के संरक्षण में सीमावर्ती राज्य के कई संवेदनशील इलाक़ों में भी चला गया। डॉ किरण पटेल नाम के इस अधिकारी ने सरकारी चिन्ह वाले अपने कार्ड भी छपवा रखे थे। अक्तूबर 2022 से फ़रवरी 2023 तक इसने जम्मू कश्मीर के कई ‘सरकारी दौरे’ भी कर डाले। इतना ही नहीं वहाँ के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कुछ महत्वपूर्ण मामलों में मीटिंग भी की। उन अधिकारियों पर अपना रौब भी दिखाया। अपने मित्रों में अपने रुतबे का दिखावा करने की मंशा से, कई संवेदनशील इलाक़ों में सुरक्षाकर्मियों के साथ फ़ोटो और वीडियो को सोशल मीडिया पर भी डाला।
 

ऐसे वीडियो और सरकारी तंत्र के रुतबे को देख कर कौन होगा जो ऐसे व्यक्ति को वास्तव में प्रधान मंत्री कार्यालय का एक बड़ा अधिकारी ना मान ले। इसके पाखंड का भांडा तब फूटा जब इसने फ़रवरी 2023 में ही जम्मू कश्मीर में कई दौरे कर डाले। एक अधिकारी को जब संदेह हुआ तो उसने दिल्ली में प्रधान मंत्री कार्यालय में फ़ोन लगा कर इस व्यक्ति के बारे में जानकारी हासिल करनी चाही। जब पता चला कि न तो इस नाम का कोई व्यक्ति है और न ही वो पद प्रधान मंत्री कार्यालय में है। जब दिल्ली से ये पूछा गया कि ये जानकारी क्यों ली जा रही है तो श्रीनगर के अधिकारी ने सब सच बताया। दोनों अधिकारियों ने यह तय किया कि इस ठग को रंगे हाथों पकड़ा जाए। जब श्रीनगर पुलिस ने इसे किसी वशिष्ठ व्यक्ति से मिलवाने के लिए कहा तो ये बहरूपिया तुरंत राज़ी हो गया। इसकी ख़ुशी उस समय थम गई जब हमेशा कि तरह उसे बुलेट प्रूफ़ गाड़ी में बैठाने के बजाय पुलिस की साधारण गाड़ी में बिठाया गया। उसके बाद जो भी हुआ वो आप सबको पता ही है।
 
जम्मू कश्मीर के पूर्व पुलिस महानिदेशक डॉ शेष पाल वैद ने एक टीवी इंटरव्यू में बताया कि जब भी कभी किसी व्यक्ति को ‘जेड प्लस’ श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की जाती है तो संबंधित अधिकारियों को लिखित सूचना दी जाती है। इस मामले में क्योंकि ये व्यक्ति प्रधान मंत्री कार्यालय के अधीन था तो तय नियमों के अनुसार दिल्ली से जम्मू कश्मीर के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को सूचना भेजी जाती। जो कि इस मामले में नहीं भेजी गई। इसलिए इस ठग को प्रदान की गई सुरक्षा ग़ैर क़ानूनी है। इसके साथ ही डॉ वैद के अनुसार इस पद के अधिकारी को ज़ेड प्लस की सुरक्षा प्रदान करने का कोई प्रावधान ही नहीं है। ऐसी सुरक्षा तो केवल अति वशिष्ठ व्यक्तियों को ही दी जाती है किसी आम अधिकारी को नहीं। जिस तरह से किरण पटेल को सरकारी सुरक्षा के घेरे में घाटी के संवेदनशील इलाक़ों में घूमते हुए देखा गया है उसे सुरक्षा में चूक मानने से इनकार नहीं किया जा सकता। 
 

ग़ौरतलब है कि अकसर यह देखा जाता है कि यदि कभी कोई चरवाहा गलती से भी सरहद पार करके इस पार या उस पार चला जाए तो दोनों देशों की पुलिस, ख़ुफ़िया विभाग और सेना उसे जासूस मान कर उसकी सख़्ती से पूछताछ करतीं हैं। बाद में भले ही वो चरवाहा बेक़सूर साबित हो लेकिन उसकी जाँच किए बिना उसे छोड़ा नहीं जाता। इस मामले में देखा जाए तो जब यह साबित हो चुका है कि किरण पटेल बहरूपिया बन कर ख़ुद को प्रधान मंत्री कार्यालय का एक वरिष्ठ अधिकारी बता रहा था तो क्या पुलिस, ख़ुफ़िया विभाग और सेना इसे जासूस समझ कर इसकी पूछताछ करेंगे? क्या इस बहरूपिये को बिना जाँच किए सुरक्षा और अन्य सुविधाएँ प्रदान करवाने वाले राज्य सरकार के अधिकारियों के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही होगी? 
 
आज के दौर में ये बात आम हो चुकी है कि जब भी हमें किसी सरकारी दफ़्तर में जाना होता है तो बिना एंट्री पास के आप उस कार्यालय में नहीं घुस सकते। एक दफ़्तर में एंट्री पास के लिए भी नियम तय होते हैं, जिनका पालन सख़्ती से किया जाता है। उसी तरह किसी को उच्च श्रेणी की सुरक्षा व अन्य सुविधाएँ देने के लिए भी तय नियम होते हैं। सूचना क्रांति के इस युग में प्रधान मंत्री कार्यालय समेत किसी भी मंत्रालय या सरकारी दफ़्तर में तैनात अधिकारियों की जानकारी आम आदमी को बड़ी आसानी से मिल जाती है। सरकारी अधिकारियों को यह जानकारी लेने में कुछ ही क्षण लगते हैं। फिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि जब किरण पटेल पहली बार घाटी के ‘सरकारी दौरे’ पर आया तो उसके बारे में जाँच नहीं हुई? अब जब मामले ने तूल पकड़ लिया है तो जाँच होना तो स्वाभाविक ही है। परंतु इस जाँच की आँच कितनी दूर तक जाएगी यह तो आनेवाला समय ही बताएगा।

शुक्रवार, 17 मार्च 2023

भ्रष्टाचार पर लगाम कैसे लगाएँ केजरीवाल


भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन से जन्मीं आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने सत्ता में आने से पहले दावा किया था कि उनकी सरकार में भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह नहीं रहेगी। दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने कुछ ऐसे ठोस कदम ज़रूर उठाए हैं जिनसे भ्रष्टाचार पर लगाम कसती हुई दिखाई तो देती है। परंतु दिल्ली की गद्दी पर तीसरी बार काबिज केजरीवाल क्या भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से लगाम कसने में कामयाब हुए? क्या अन्य नेताओं की तरह भ्रष्टाचार से मुक्ति पाने का उनका नारा भी महज़ चुनावी जुमला था? क्या दिल्ली सरकार के कार्यालयों में भ्रष्टाचार पहले के मुक़ाबले कम हुआ या बढ़ा?
 
पिछले दिनों कर्नाटक में एक चुनावी सभा में बोलते हुए केजरीवाल ने कहा कि यदि उनका बेटा भी भ्रष्टाचार करेगा तो वे उसे भी जेल भेज देंगे। जनता इसका ये मतलब निकालेगी कि केजरीवाल सरकार में किसी भी तरह के भ्रष्टाचार की कोई भी जगह नहीं है। भ्रष्टाचार को कम करने की दृष्टि से दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने कुछ ऐसे कदम ज़रूर उठाए हैं। आम जनता अब घर बैठे ही कई सरकारी काम करवा सकती है जिनके लिए उन्हें दलालों और अधिकारियों को रिश्वत देनी पड़ती थी। मिसाल के तौर पर ड्राइविंग लाइसेंस का घर बैठे ही नवीकरण हो जाना ऐसी ही एक सहूलियत है। पहले इस काम को करवाने के लिए कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता था। जब काम सीधे तरीक़े से नहीं होता था तो हार कर दलालों की शरण में जाना पड़ता था, परंतु अब ऐसा नहीं है। इसी तरह अब आप अपने घर के जल कनेक्शन में नाम परिवर्तन आदि सेवाओं का लाभ भी घर बैठे करवा सकते हैं। सभी दस्तावेज़ों को अपलोड कर आप समुचित शुल्क देकर ऐसे तमाम कार्यों को आराम से करवा सकते हैं। पहले की तरह आपको किसी सरकारी दफ़्तर या दलाल के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
 

दिल्ली के लोक निर्माण विभाग में भी ऐसा ही कुछ बदलाव देखा गया है। पहले के समय में आपको किसी सड़क, फुटपाथ या अन्य लोक निर्माण संबंधित शिकायतों के लिए स्थानीय नेताओं के चक्कर काटने पड़ते थे। हफ़्तों और महीनों की मशक़्क़त के बाद ही सड़क की मरम्मत या नवनिर्माण होते थे। परंतु अब ऐसा नहीं है। यदि आपको दिल्ली के किसी भी कोने में कोई भी सड़क या अन्य लोक निर्माण संबंधित कार्यों कि मरम्मत करवानी हो तो दिल्ली के लोक निर्माण विभाग के कंट्रोल रूम या ऑनलाइन सेवा से आप जगह का विवरण देते हुए शिकायत लिखवाएँ। आपको संबंधित अधिकारी का फ़ोन आएगा और वो आपसे शिकायत की पुष्टि करेगा। अच्छी बात यह है कि मरम्मत होने के बाद आपके साथ उस जगह हुए कार्य कि फ़ोटो भी शेयर की जाएगी। यह एक अच्छी पहल है जिसके लिये दिल्ली सरकार बधाई योग्य है। 
 

परंतु ऐसा नहीं है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है। भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का दावा कर दिल्ली के मुख्य मंत्री बने केजरीवाल को शायद इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि दिल्ली सरकार के दफ़्तरों में भ्रष्टाचार अभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ। आम जनता आज भी भ्रष्ट अधिकारियों के दबाव के चलते अपने जायज़ कामों को करवाने के लिए ‘सुविधा शुल्क’ देने पर मजबूर है। ताज़ा उदाहरण दिल्ली के दक्षिण ज़िले के राजस्व विभाग के एक अधिकारी से संबंधित है। सूत्रों के अनुसार यह अधिकारी इतना प्रभावशाली है कि यदि इसके वरिष्ठ अधिकारी लंबित पड़े ऑनलाइन आवेदनों को निपटाने का दबाव डालते हैं तो वो इन वरिष्ठ अधिकारियों का तबादला तक करवा देता है। 
 
ग़ौरतलब है कि दिल्ली के राजस्व विभाग की वेबसाइट पर विभिन्न कार्यों की सूची दी गई है जिन्हें आप ऑनलाइन आवेदन के माध्यम से करवा सकते हैं। इन कार्यों की सूची के साथ ही एक कॉलम में इन कार्यों को करने की अधिकतम समय सीमा भी दी गई है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी आवेदक को ज़मीन बेचने या ख़रीदने से पहले ‘भूमि की स्थिति रिपोर्ट’ चाहिए तो उसकी समय सीमा 14 दिन है। आम जनता इसे देख कर उम्मीद कर बैठती है कि भूमि की स्थिति रिपोर्ट उनको हर हाल में 14 दिनों के भीतर मिल जाएगी। मिलनी भी चाहिए क्योंकि सरकार का दावा है कि सभी कुछ पारदर्शिता से किया जाता है। ऑनलाइन होने के कारण वरिष्ठ अधिकारी इसकी निगरानी भी कर लेते हैं। परंतु दिल्ली के दक्षिण ज़िले की बात करें तो यहाँ ऐसा नहीं है। 
 

एक शिकायत के माध्यम से पता चला है कि दिल्ली के दक्षिण ज़िले के राजस्व विभाग में नवम्बर 2022 में जिन लोगों ने भूमि की स्थिति कि रिपोर्ट के लिए आवेदन किया था उन्हें अभी तक यह रिपोर्ट नहीं दी गई। जिस कारण सरकार को राजस्व का भारी नुक़सान भी सहना पड़ रहा है। क्योंकि भूमि की स्थिति रिपोर्ट के बाद ही लोग रजिस्ट्री करवा सकते हैं, जिसमें उन्हें सरकार को स्टाम्प ड्यूटी देनी पड़ती है। जाँच करने पर यह पता चला कि दक्षिण ज़िले के इस अधिकारी ने नवम्बर 2022 से फ़रवरी 2023 तक के लगभग 100 से अधिक आवेदनों को रोक रखा है। सूत्रों ने बताया कि इस अधिकारी से इन आवेदनों को रोकने का कारण पूछे जाने पर एक वरिष्ठ महिला आईएएस अधिकारी का तबादला तक करवा दिया गया।  
 
मुख्य मंत्री केजरीवाल यदि भ्रष्टाचार में लिप्त होने पर अपने बेटे को गिरफ़्तार करवाने की बात खुले मंच से करते हैं तो अपनी सरकार में ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों पर नकेल क्यों नहीं कस पा रहे? क्या भ्रष्टाचार की शिकायतों पर केजरीवाल को सरकारी दफ़्तरों में औचक निरीक्षण नहीं करवाना चाहिए? दिल्ली के बाद पंजाब में सरकार बनाने के बाद यदि केजरीवाल की आम आदमी पार्टी देश भर में अपना अस्तित्व बनाना चाहती है तो उन्हें कुछ ऐसे अनूठे कदम उठाने होंगे जिससे उन्हें देश भर में पंख पसारने से कोई नहीं रोक पाएगा। 

शुक्रवार, 10 मार्च 2023

हाथरस कांड: क्या जाँच सही दिशा में हुई?


सितंबर 2020 में हाथरस के बूलगढ़ी गांव में एक दलित लड़की के साथ हुई दरिंदगी एक बार फिर से सुर्ख़ियों में है। इस बार का कारण है अदालत का फ़ैसला जिसने चार में से तीन अपराधियों को न सिर्फ़ छोड़ दिया बल्कि सुबूतों के अभाव में बलात्कार की धाराएँ भी हटा दी। यहाँ सवाल उठता है कि इतने चर्चित बलात्कार और हत्या के कांड की जाँच क्या सही दिशा में हुई थी? क्या प्रारंभिक जाँच करने वाली उत्तर प्रदेश पुलिस, सरकार द्वारा गठित एसआईटी या सीबीआई इस संगीन अपराध की जाँच को गंभीरता से नहीं ले रही थी?

जब भी कोई पीड़ित मृत्यु से पहले अपनी मृत्यु की परिस्थितियों के बारे में बताते हुए मर जाए तो उस ब्यान को ‘मृत्युपूर्व घोषणा’ या ‘डाईंग डिक्लेरेशन’ माना जाता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा-32(1) के मुताबिक़ ‘मृत्युपूर्व घोषणा’ को सुसंगत माना जाएगा। फिर वो बयान मृत व्यक्ति द्वारा लिखित या मौखिक रूप से दिये गए हों उन्हें क़ानून की नज़र में अधिकारिता दी गई है। हाथरस की पीड़िता ने भी एएमयू के जेएन मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान अपने साथ हुई दरिंदिगी के बारे में बयान देते हुए आरोपियों के नाम बताए थे। जिसके बाद सभी आरोपियों के ख़िलाफ़ विभिन्न धाराओं में एफ़आईआर दर्ज की गई थी। 

निचली जातियों के पीड़ितों के ख़िलाफ़ होने वाले अन्य गंभीर अपराधों की तरह इस कांड में भी पुलिस पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। पुलिस सिस्टम पर पहले दिन से पीड़ित की मदद न करना। परिवार व पीड़ित के बदलते बयान भी पुलिस की परेशानी बना। मसलन पहले सिर्फ मारपीट, फिर छेडख़ानी और फिर दुष्कर्म जैसे आरोप आए। पीड़िता की मौत के बाद प्रकरण में जो भूचाल आया उसने तो पुलिस महकमे और प्रदेश सरकार के आला अधिकारियों को भी सवालों के घेरे में ले लिया। ऐसी क्या जल्दी थी कि पीड़िता का अंतिम संस्कार रात में बिना परिजनों की अनुमति के किया गया?

इतना ही नहीं पुलिस की प्रारंभिक जाँच में कई ख़ामियों को सीबीआई की चार्जशीट में उजागर किया गया। एफ़आईआर में पीड़िता ने ‘जबरदस्ती’ शब्द का इस्तेमाल किया था, लेकिन पुलिस ने इसे नजरअंदाज किया और मेडिकल जांच नहीं कराई। पुलिस ने यौन हिंसा के आरोपों को छोड़कर केवल धारा 307 (हत्या का प्रयास) और एससी/एसटी एक्ट के तहत ही शिकायत दर्ज की थी। जब पीड़िता को ज़िला अस्पताल में भर्ती कराया गया तो उसकी बिगड़ती हालत के चलते उसे बिना मेडिको लीगल रिपोर्ट (एमएलसी) के एएमयू के जेएन मेडिकल कॉलेज भेजा गया जहां कई घंटों बाद उसकी मेडिको लीगल रिपोर्ट तैयार हुई। अस्पताल में दिये गये बयान में पीड़िता ने ‘छेड़खानी’ शब्द को कहा परंतु उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक बार फिर इसे अनदेखा किया और इस दिशा में जाँच ही नहीं की। केवल आईपीसी की धारा 354 (किसी महिला को अपमानित करने के इरादे से हमला या बलप्रयोग करना) को जोड़ दिया। 

ग़ौरतलब है कि सीबीआई की चार्जशीट में सामने आया है कि यूपी पुलिस की लापरवाही से पीड़िता पर यौन हिंसा की जांच और बाद में फोरेंसिक जांच में काफ़ी देरी हुई। जिस कारण यौन हिंसा के अहम सुबूत इकट्ठा नहीं किए गये। यदि संबंधित पुलिस अधिकारी इस जाँच को गंभीरता से लेते तो शायद आरोपियों के ख़िलाफ़ पुख़्ता केस बना लेते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और सुबूतों के अभाव में अपराधी छूट गये। उल्लेखनीय है कि सीबीआई जैसी श्रेष्ठ जाँच एजेंसी ने यदि उत्तर प्रदेश पुलिस की कमियों को उजागर किया सो किया, ख़ुद भी इस जाँच को गंभीरता से नहीं लिया। जहां-जहां प्रदेश की पुलिस जाँच में चूकी, यदि उन्हीं पहलुओं को सीबीआई खंगालती तो इस कांड के सही तथ्य सामने आ जाते। पूरे देश ने पीड़ित परिवार के साथ पूरी सहानुभूति दिखाई। परंतु कोर्ट द्वारा तीनों आरोपियों को सुबूतों के अभाव में छोड़ा गया। पीड़ित परिवार निचली अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में अपील करने जा रहा है। परंतु देश में लंबित पड़े लाखों मामलों के चलते उन्हें न्याय कब मिलेगा ये कहा नहीं जा सकता। 

जिस तरह पीड़िता की मृत्यु के बाद उसके शव को पुलिस द्वारा बिना परिजन की अनुमति के, रात में ही अंतिम संस्कार कर दिया गया, वो प्रदेश सरकार के गृह विभाग पर भी सवाल उठाता है। क्योंकि प्रदेश की पुलिस गृह विभाग के अधीन होती है तो ऐसा कहना ग़लत नहीं होगा कि गृह विभाग के आला अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं थी। जैसे ही अंतिम संस्कार के फोटो और वीडियो वायरल हुए तो इसका जगह-जगह विरोध भी हुआ। मामले के तूल पकड़ते ही प्रदेश सरकार ने एसपी और सीओ सहित पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया। परंतु गृह विभाग के कुछ आला अधिकारियों को रिटायर होने पर अहम पद पर तैनात किया गया। यदि रात में पीड़िता का संस्कार बिना परिजनों की अनुमति के किया गया तो क्या केवल पुलिस अधिकारी ही दोषी थे? गृह विभाग के अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका की जाँच क्यों नहीं की गई?

महिलाओं के ख़िलाफ़ हुए ऐसे अपराधों में पुलिस की प्राथमिक जाँच अपराध के जड़ तक पहुँचने की अहम कड़ी होती है। प्राथमिक जाँच ही अपराधी को उसके सही अंजाम तक पहुँचा सकती है। ज़रा सी कोताही केस को ग़लत दिशा में मोड़ सकती है। ये बात केवल महिला अपराधों पर लागू नहीं होती। परंतु प्रायः ऐसा देखा गया है कि पुलिस अधिकारी किन्ही कारणों से जब संगीन अपरोधों की जाँच को पूरी क्षमता से नहीं कर पाते तो उन्हें अदालत की लताड़ भी झेलनी पड़ती है। जाँच में कोताही के कारण ही असल अपराधी छूट जाते हैं। महिला सुरक्षा और विकास को लेकर सरकार द्वारा ‘बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ’ जैसे लुभावने नारे तो ज़रूर दिये जाते हैं परंतु ये कितने व्यावहारिक साबित होते हैं इसका पता तब चलता है जब मामले में पीड़ित को न्याय मिलता है या नहीं मिलता। इसलिए जाँच एजेंसियों को बिना किसी दबाव के जाँच करनी चाहिए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दिलवानी चाहिए।

शुक्रवार, 3 मार्च 2023

घर बनता है घरवालों से !


मशहूर कवि अशोक चक्रधर की कविता ‘घर बनता है घरवालों से’ हमें सिखाती है कि घर केवल खिड़की दरवाज़ों से नहीं बल्कि उसमें रहने वालों से बनता है। मनुष्य का जीवन रिश्तों से जुड़ा रहता है। रिश्ते यदि मधुर रहें तो जीवन सुखी और खुशहाल रहता है। परंतु रिश्तों में खटास आते ही व्यक्ति टूट जाता है। एक छत के नीचे रहने वाले लोग विभिन्न रिश्तों से जुड़े रहते हैं। रिश्ते चाहे खून के हों या न हों उनमें गहराई तभी आती है जब वे दिल से बनते हैं।

पहले के युग में संयुक्त परिवार होते थे, जो साथ में रहते थे। बड़े परिवारों को साथ में रहने के लिए बड़े मकान की ज़रूरत होती थी। ज़माना बदला और ज़माने के साथ परिवार भी बदले। संयुक्त परिवार अब एकल परिवार होने लग गये। समय की माँग और कामकाज के चलते जो परिवार हमेशा साथ में रहते थे वे अब केवल त्योहारों में ही साथ नज़र आने लग गये। ऐसे में घर के बड़े बुजुर्गों ने परिवार के लिए जो विशाल घर बनाए थे वे वीरान होने लग गये। फिर वो दौर आया जब पुराने मकानों को तोड़ कर उसे बहुमंज़िला अपार्टमेंट का रूप दिये जाने लगा। लोग साथ में रहते हुए भी अलग-अलग रहने लगे।


ऐसे ही एक घर की कहानी को दर्शाती है फ़िल्म ‘गुलमोहर’। इसी शुक्रवार को डिज़्नी हॉटस्टार चैनल पर रिलीज़ होने वाली इस फ़िल्म में दिल्ली के एक संपन्न बत्रा परिवार की कहानी को दिखाया गया है। जो अपने 34 साल पुराने मकान को बिल्डर को बेच कर जा रहे हैं। इस घर का नाम ‘गुलमोहर विला’ है, जो दिल्ली के एक पॉश इलाक़े में स्थित है। परिवार की मुखिया कुसुम बत्रा (शर्मिला टैगोर) के आग्रह पर परिवार उस घर को छोड़ने से पहले आख़िरी बार होली का त्योहार मनाने के लिए जैसे-तैसे राज़ी हो जाता है। फ़िल्म की कहानी उस घर में बत्रा परिवार के उन अंतिम चार दिनों पर दर्शाई गई है। जब पैकर्स पेकिंग करने में जुटे हैं।

इन चार दिनों में चार दशकों की पुरानी यादें फिर से जी उठती हैं। यादें, कुछ खट्टी कुछ मीठी इस फ़िल्म को हर पल एक नया मोड़ देती हैं। फ़िल्म में जहां आप हँसेंगे वहीं आप भावुक भी हो उठेंगे। कई वर्षों बाद फ़िल्मी पर्दे पर  आनेवाले बॉलीवुड के दिग्गज कलाकार, शर्मिला टैगोर और अमोल पालेकर, आपको देवर-भाभी के किरदार में नज़र आएँगे। फ़िल्म में शर्मिला टैगोर के बेटे का किरदार मनोज बाजपेयी ने बखूबी निभाया है। वहीं अमोल पालेकर के बेटे के किरदार में अनुराग अरोड़ा नज़र आएँगे। युवा निर्देशक राहुल चित्तेला की यह पहली फ़िल्म है जो कई किरदारों और मशहूर कलाकारों को लेकर बनाई गई है। हर किरदार के साथ एक अलग ही कहानी जुड़ी हुई है।


इस फ़िल्म में एक ऐसा संदेश दिया है जिसकी तुलना दर्शक ख़ुद से कर पाएँगे। हर किसी में कुछ न कुछ करने की चाहत होती है, यदि वो चाहत पूरी न हो पाए और उसे दबा कर समझौता करना पड़े तो कैसा लगता है। इस फ़िल्म में आप ऐसी ही अनुभूति करेंगे। आज के दौर में दिल्ली के ज़्यादातर पुराने बंगले बिल्डर ख़रीद कर उन्हें बहुमंज़िला बना रहे हैं। आधुनिकता के नाम पर दिल्ली जैसे शहरों में कंकरीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं। इससे दिल्ली को एक नया रूप दिया जा रहा है। पुराने मकानों के टूटते ही उनमें बसी यादें और उनमें छिपे राज़ भी ढह जाते हैं। तेज़ रफ़्तार में दौड़ती ज़िंदगी में बच्चे अपने माँ-बाप के साथ नहीं रहना चाहते। एक ओर जहां वे स्वतंत्र रहना चाहते हैं। वहीं उन्हें आत्मसम्मान के चलते माँ-बाप से मदद लेना भी मंज़ूर नहीं।

गुलमोहर में छिपे राज़ और यादें जैसे-जैसे सामने आते हैं फ़िल्म और भी रोचक होती जाती है। तीन पीढ़ियों की कहानी में कई रोचक क़िस्से हैं। परिवार के अलावा बंगले की देखभाल कर रहे घरेलू नौकरों की कहानी भी दर्शकों को भाएगी। युवा छायाकार ईशित नारायण के कैमरे का जादू फ़िल्म को काफ़ी आकर्षक बना देता है। जहां किरदार अपनी भावनाएँ और राज़ छिपाना चाहता हैं वहीं केमरा घुस कर उसे पकड़ लेता है। बत्रा परिवार के पुराने घर में आख़िरी चार दिनों में ज़िंदगी के हर रंग को दिखाया गया है।

निर्देशक राहुल चित्तेला के अनुसार इस फ़िल्म की प्रेरणा उन्हें मशहूर फ़िल्म निर्माता मीरा नायर के वसंत विहार स्थित घर को इन्हें हालातों में बेचने से मिली। बतौर सहायक वे मीरा नायर के साथ कई चर्चित फ़िल्मों पर काम कर चुके हैं। मीरा नायर के दिल्ली वाले घर में उन्होंने कई अन्य फ़िल्मों से संबंधित कार्य भी किए थे। एक दिन जब मीरा नायर ने अपना दिल्ली वाला घर एक बिल्डर को बेच दिया, तो वहाँ पर एक आख़िरी पार्टी रखी गई। उस समय पार्टी के साथ-साथ सामान को भी पैक किया जा रहा था। उसी पार्टी के माहौल से राहुल को इस फ़िल्म को बनाने की प्रेरणा मिली। जो एक समर्पित टीम के साझे प्रयास से रोचक ही नहीं दिल की गहराई तक छूने वाली बनी है। उम्मीद है, ओटीटी पर दिखाई जाने वाली ये फ़िल्म दुनियाँ भर के हिन्दी फ़िल्म दर्शकों को पसंद आएगी।  

पुराने घर से जुड़ी यादें इतनी आसानी से नहीं मिटती। आप चाहे जितने भी आधुनिक सुविधाओं वाले घर में चले जाएँ, लेकिन जो रिश्ता आपका पुराने घर से जुड़ जाता है उसे आप चाह कर भी नहीं भुला सकते। पुराने घर में बिताए अच्छे-बुरे पल आपको हमेशा याद रहते हैं, जिनके किससे आप आने वाली पीढ़ियों को बताते हैं। घर केवल ईंट और सीमेंट से नहीं बनता। घर बनता है उसमें रहने वालों से और उस घर से जुड़ी यादों से। ठीक उसी तरह जैसे रिश्ते केवल खून से नहीं बल्कि दिल से बनते हैं।