दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण की समस्या को हम कई सालों से सुनते आ रहे हैं। एक से एक सनसनीखेज वैज्ञानिक रिपोर्टो की बातों को हमें भूलना नहीं चाहिए। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि दिल्ली से निकलने वाले गंदे कचरे, कूड़ा करकट को ठिकाने लगाने का पुख्ता इंतजाम अभी तक नहीं हो पाया। सरकार यही सोचने में लगी है कि यह पूरा का पूरा कूड़ा कहां फिंकवाया जाए या इस कूड़े का निस्तार यानी ठोस कचरा प्रबंधन कैसे किया जाए? जाहिर है इस गुत्थी को सुलझाए बगैर जलाए जाने लायक कूड़े को चोरी छुपे जलाने के अलावा और क्या चारा बचता होगा? इस गैरकानूनी हरकत से उपजे धुंए और जहरीली गैसों की मात्रा कितनी है जिसका कोई हिसाब किसी भी स्तर पर नहीं लगाया जा रहा है। इन सबके चलते आम नागरिकों पर सरकार द्वारा लगाए जा रहे प्रतिबंधों से असुविधा हो रही है। परंतु सरकार या उसकी प्रदूषण नियंत्रण करने वाली एजेंसियाँ असल कारण तक नहीं पहुँच पा रहीं।
जब भी कभी कोई उपभोक्ता एक-एक पाई जोड़ कर अपने सपनों का वाहन ख़रीदता है तो उसे उसकी की क़ीमत के साथ-साथ रोड टैक्स, जीएसटी आदि टैक्स भी देने पड़ते हैं। इन सब टैक्सों का मतलब है कि यह सब राशि सरकार की जेब में जाएगी और घूम कर जनता के विकास के लिए इस्तेमाल की जाएगी। परंतु रोड टैक्स के नाम पर ली जाने वाली मोटी रक़म क्या वास्तव में जनता पर ख़र्च होती है? क्या हमें अपनी महँगी गाड़ियों को चलाने के लिए साफ़-सुथरी और बेहतरीन सड़कें मिलती हैं? क्या टूटी-फूटी सड़कों की समय से मरम्मत होती है? क्या देश भर में सड़कों की मरम्मत करने वाली एजेंसियाँ अपना काम पूरी निष्ठा से करतीं हैं? इनमें से अधिकतर सवालों के जवाब आपको नहीं में ही मिलेंगे।
यहाँ एक सवाल यह भी उठता है कि सरकार द्वारा वाहनों प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित रखने की दृष्टि से कई नियम लागू किए गए हैं। इनमें से अहम है कि दस साल पुराने डीज़ल और पंद्रह वर्ष से अधिक पुराने पेट्रोल वाहनों को महानगरों की सड़कों पर चलने की अनुमति न देना। इसके साथ ही जिन-जिन वाहनों को चलने की अनुमति है उन सभी वाहनों में वैध प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र यानी ‘पीयूसी’ होना अनिवार्य भी है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि यदि आपके वाहन में एक वैध प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र है तो आपका वाहन तय माणकों से अधिक प्रदूषण नहीं कर रहा और तभी आपके वाहन को सड़क पर आने की अनुमति है।
पिछले वर्ष नवम्बर के महीने में दिल्ली सरकार ने एक आदेश के तहत बिना वैध प्रदूषण प्रमाण पत्र के चलने वाले वाहनों पर 10,000 का मोटा जुर्माना लगाने के आदेश दिये थे। इनका पालन भी सख़्ती से होता हुआ दिखाई दिया। दिल्ली की सड़कों पर परिवहन विभाग व ट्रैफ़िक पुलिस के अधिकारी इसे सख़्ती से लागू करते हुए नज़र भी आए। हर साल दिवाली के आस-पास दिल्ली एनसीआर पर एक ज़हरीली हवा की चादर चढ़ जाती है। पर्यावरण विशेषज्ञ, नेता और संबंधित सरकारी विभागों के अफसर हर साल की तरह इस साल भी इस समस्या को लेकर सिर खपा रहे हैं। उन्होंने अब तक के अपने सोच विचार का नतीजा यह बताया है कि खेतों में फसल कटने के बाद जो ठूंठ बचते हैं उन्हें खेत में जलाए जाने के कारण ये धुंआ बना है जो एनसीआर के उपर छा गया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि यह तो हर साल ही होता है तो नए जवाबों की तलाश क्यों हो रही है?
आनन-फ़ानन में हर वर्ष दिल्ली सरकार कड़े कदम उठा कर कई तरह के प्रतिबंध लगा देती है। इनमें निर्माण कार्य पर रोक लगाना। भवन के तोड़-फोड़ पर रोक लगाना। पुराने डीज़ल और पेट्रोल वाहनों पर रोक लगाना। कूड़े को जलाने पर रोक लगाना आदि। निर्माण कार्यों पर रोक लगाना तो समझ में आता है। परंतु जिन पुराने वाहनों पर रोक लगता है उससे सरकार को क्या हासिल होता है, यह समझ नहीं आता। उदाहरण के तौर पर यदि आपका वाहन दस साल से अधिक पुराना नहीं है और उसमें एक वैध पीयूसी सर्टिफिकेट तो आपका वाहन प्रदूषण के तय माणकों की सीमा में ही हुआ। यानी आपका वाहन अनियंत्रित प्रदूषण नहीं कर रहा। इसके बावजूद अपनी गाड़ियों में नियमित ‘पीयूसी’ जाँच करवाने वालों को प्रतिबंध के चलते वाहन सड़क पर लाने की इजाज़त नहीं दी जाती। क्या ऐसा करना उचितहै? यदि कोई मजबूरी में प्रतिबंधित वाहन को सड़क पर ले भी आता है तो पुलिस वाले उससे 20,000 का चालान वसूलने लगते हैं। ऐसे में ये लोग चालान न देने के लिए या तो बहाने बनाते हैं या पुलिस वालों की जेब गरम कर देते हैं। यानी प्रदूषण की समस्या के साथ-साथ भ्रष्टाचार जैसी समस्या भी जन्म ले लेती है।
ठीक उसी तरह, जब भी कोई वाहन ख़रीदने पर उपभोक्ता रोड टैक्स देते हैं तो उन्हें सड़कों की दुरुस्त हालत क्यों नहीं मिलती? टूटी-फूटी सड़कों पर वाहन अवरोधों के साथ चलने पर मजबूर होते हैं, नतीजा जगह-जगह ट्रैफ़िक जाम हो जाता है। ऐसे जाम में खड़े रहकर आप न सिर्फ़ अपना समय ज़ाया करते हैं बल्कि महँगा ईंधन भी ज़ाया करते हैं। जितनी देर तक जाम लगा रहेगा, आपका वाहन बंपर-टू-बंपर चलेगा और बढ़ते हुए प्रदूषण की आग में घी का काम करेगा। ऐसे में जिन वाहनों को पुराना समझ कर प्रतिबंधित किया जाता है, उनसे कहीं ज़्यादा मात्रा में नये वाहनों द्वारा प्रदूषण होता है। इसलिए लोक निर्माण विभाग या अन्य एजेंसियों की यह ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि वह सड़कों को दुरुस्त रखें जिससे प्रदूषण को बढ़ावा न मिले। सरकार को प्रदूषण की समस्या से छुटकारा पाना है तो उसे इसके असल कारणों पर वार करना होगा तभी हमारा पर्यावरण स्वच्छ हो पाएगा।
शुक्रवार, 24 नवंबर 2023
शुक्रवार, 17 नवंबर 2023
देश में पुलिस सुधार लागू हों
जब भी हमें पुलिस थाने या किसी पुलिस अधिकारी के संपर्क में आना पड़ता है तो मन में एक तनाव सा पैदा हो जाता है। इसका कारण है पुलिस के व्यवहार को लेकर हमारी सोच। ज़्यादातर देखा यह देखा गया है कि भारत में पुलिसकर्मी जनता से सीधे मुँह बात नहीं करते। इस कड़े रवैये के पीछे पुलिसकर्मियों का तनाव ही सबसे बड़ा कारण है। चाहे वो कोई उच्च अधिकारी हो या सड़क पर खड़ा एक आम सिपाही। तनाव में रहने वाले ये पुलिसकर्मी अक्सर अपने ग़ुस्से और बुरे बर्ताव को सीधी-सादी जनता पर निकालते हैं। इसी के चलते आम जनता के मन में इन्हें सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता। यदि हमारी सरकार पुलिस सुधारों को लेकर गंभीर हो जाए तो विदेशों की तरह हम भी पुलिस को एक मित्र के रूप में देखेंगे।
पुलिस सुधारों को लेकर हर सरकार में उच्च स्तरीय बैठकें होती रहती हैं परंतु इन बैठकों में कभी कोई विशेष समाधान नहीं निकलते। क्या आपको पता है कि भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 संविधान की मूल भावना के विरूद्ध है? भारत का संविधान, भारत की जनता को सर्वोच्च मानता है। उसको ही समर्पित है। भारतीय गणराज्य की समस्त संस्थाएं जनता की सेवा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। किंतु भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 में कहीं भी जनता शब्द का उल्लेख नहीं आता है। जाहिर है कि यह अधिनियम उस समय बनाया गया था जब भारत पर ब्रिटिश हुकूमत कायम थी। इस कानून का उद्देश्य ब्रिटिश हितों को साधना था। पुलिस का काम जनता पर नियंत्रण रखना था ताकि कानून और व्यवस्था इस तरह बनी रहे कि अंग्रेज हुक्मरानों को भारत का दोहन करने में कोई दिक्कत पेश न आए।
दरअसल, 1897 के गदर के बाद जब इंग्लैंड की हुकूमत ने ईस्ट इंडिया कंपनी से हिन्दुस्तान की बागडोर ली तब उसे ऐसी ही पुलिस की जरूरत थी। इसलिए ऐसे कानून बनाए गए। पर आश्चर्य की बात है कि 1947 में जब भारत आजाद हुआ या 1950 में जब हमने अपना संविधान लागू किया तब क्यों नहीं इस भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 में बुनियादी परिवर्तन किया गया? क्यों औपनिवेशिक मानसिकता वाले कानून को एक स्वतंत्र, सार्वभौमिक, लोकतांत्रिक जनता के ऊपर थोपा गया? जब कानून पुराना ही रहा तो भारतीय पुलिस से ये कैसे उम्मीद की जाती है कि वह सत्ताधीशों को छोड़कर जनता की सेवा करना अपना धर्म माने?
1977 में बनी जनता पार्टी की पहली सरकार ने एक राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन किया जिसमें तमाम अनुभवी पुलिस अधिकारियों व अन्य लोगों को मनोनीत कर उनसे पुलिस व्यवस्था में वांछित सुधारों की रिपोर्ट तैयार करने को कहा गया। आयोग ने काफी मेहनत करके अपनी रिपोर्ट तैयार की पर बड़े दुख की बात है कि चार दशक बाद भी आज तक इस रिपोर्ट को लागू नहीं किया गया। 1998 में पुलिस सुधारों का अध्ययन करने के लिए महाराष्ट्र के पुलिस अधिकारी श्री जेएफ रिबैरो की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया जिसने मार्च 1999 तक अपनी अंतिम रिपोर्ट दे दी। पर इसकी सिफारिशें भी आज तक धूल खा रही हैं। इसके बाद के पदमनाभइया की अध्यक्षता में एक और समिति का गठन किया गया। जिसने सुधारों की एक लंबी फेहरिश्त केन्द्र सरकार को भेजी, पर रहे वही ढाक के तीन पात।
यह बड़े दुख और चिंता की बात है कि कोई भी राजनैतिक दल पुलिस व्यवस्था के मौजूदा स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहता। इसलिए न सिर्फ इन आयोगों और समितियों की सिफारिशों की उपेक्षा कर दी जाती है बल्कि आजादी के 75 साल बाद भी आज देश औपनिवेशिक मानसिकता वाले संविधान विरोधी पुलिस कानून को ढो रहा है। इसलिए इस कानून में आमूलचूल परिवर्तन होना परम आवश्यक है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पुलिस को जनोन्मुख होना ही पड़ेगा। पर क्या राजनेता ऐसा होने देंगे?
आज हर सत्ताधीश राजनेता पुलिस को अपनी निजी जायदाद समझता है। नेताजी की सुरक्षा, उनके चारों ओर कमांडो फौज का घेरा, उनके पारिवारिक उत्सवों में मेहमानों की गाड़ियों का नियंत्रण, तो ऐसे वाहियात काम हैं जिनमें इस देश की ज्यादातर पुलिस का, ज्यादातर समय जाया होता है।
पुलिस आयोग की सिफारिश से लेकर आज तक बनी समितियों की सिफारिशों को इस तरह समझा जा सकता है; पुलिस जनता के प्रति जवाबदेह हो। पुलिस की कार्यप्रणाली पर लगातार निगाह रखी जाए। उनके प्रशिक्षण और काम की दशा पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए। उनका दुरूपयोग रोका जाए। उनका राजनीतिकरण रोका जाए। उन पर राजनीतिक नियंत्रण समाप्त किया जाए। उनकी जवाबदेही निर्धारित करने के कड़े मापदंड हों। पुलिस महानिदेशकों का चुनाव केवल राजनैतिक निर्णयों से प्रभावित न हों बल्कि उसमें न्यायपालिका और समाज के प्रतिष्ठित लोगों का भी प्रतिनिधित्व हो। इस बात की आवश्यकता महसूस की गई कि पुलिस में तबादलों की व्यवस्था पारदर्शी हो। उसके कामकाज पर नजर रखने के लिए निष्पक्ष लोगों की अलग समितियां हों। पुलिस में भर्ती की प्रक्रिया में व्यापक सुधार किया जाए ताकि योग्य और अनुभवी लोग इसमें आ सकें। आज की तरह नहीं जब सिफारिश करवा कर या रिश्वत देकर अयोग्य लोग भी पुलिस में भर्ती हो जाते हैं। जो सिपाही या इन्सपेक्टर मोटी घूस देकर पुलिस की नौकरी प्राप्त करेगा उससे ईमानदार रहने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? पुलिस जनता का विश्वास जीते। उसकी मददगार बनें। अपराधों की जांच बिना राजनैतिक दखलंदाज़ी के और बिना पक्षपात के फुर्ती से करे। लगभग ऐसा कहना हर समिति की रिपोर्ट का रहा है।
पर लाख टके का सवाल यह है कि क्या हो यह तो सब जानते हैं, पर हो कैसे ये कोई नहीं जानता। राजनैतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई भी सुधार सफल नहीं हो सकता। अनुभव बताता है कि हर राजनैतिक दल पुलिस की मौजूदा व्यवस्था से पूरी तरह संतुष्ट है। क्योंकि पूरा पुलिस महकमा राजनेताओं की जागीर की तरह काम कर रहा है। जनता की सेवा को प्राथमिकता मानते हुए नहीं। फिर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? अगर जनता चाहती है कि पुलिस का रवैया बदले तो उसे अपने क्षेत्र के सांसद को इस बात के लिए तैयार करना होगा कि वह संसद में पुलिस आयोग की सिफारिशों को लागू करने का अभियान चलाए। क्या हम यह करेंगे ?
शुक्रवार, 10 नवंबर 2023
क़र्ज़ की किश्तें: कितनी आसान, कितनी पेचीदा
त्योहारों के मौसम में ग्राहकों को आकर्षित करने के इरादे से ज़्यादातर कंपनियाँ अपने उत्पादों पर आकर्षक ऑफर चला देते हैं। इनमें कई तरह के ऑफर होते हैं जैसे हर ख़रीद पर मुफ़्त उपहार। एक के साथ एक फ़्री। पुराना लाओ नया पाओ ऑफर आदि। परंतु इन सब में सर्वप्रथम ऑफर ‘नो कॉस्ट ईएमआई’ का है। ग्राहक इस ‘नो कॉस्ट ईएमआई’ के झाँसे में बड़ी आसानी से आ जाते हैं। परंतु क्या ‘नो कॉस्ट ईएमआई’ वास्तव में बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के, ग्राहकों को मिलती है?
जैसा कि नाम से ही पता चलता है ‘नो कॉस्ट ईएमआई’, का सीधा मतलब यह निकाला जाता है कि ग्राहक को उत्पाद की क़ीमत के बदले अतिरिक्त ब्याज या बैंक चार्ज नहीं देना पड़ता। केवल उत्पादन की क़ीमत को ही आसान किश्तों में देना होगा। ज़्यादातर मामलों में इस ‘नो कॉस्ट ईएमआई’ की किश्तों की सीमा 6, 9, या 12 महीने ही होती है। वहीं अगर आप एक निश्चित ब्याज दर अदा कर कोई वाहन या घरेलू उत्पादन ख़रीदते हैं तो आपके पास उसे चुकाने के लिए कई महीनों से लेकर कई सालों तक का विकल्प होता है। ब्याज पर ली गई वस्तु आसान किश्तों पर ज़रूर मिलती है परंतु असल क़ीमत से काफ़ी महँगी पड़ती है।
‘नो कॉस्ट ईएमआई’ के ज़्यादातर मामलों में यह सुविधा ग्राहक को मुफ़्त में ही पड़ती है। परंतु वहीं कुछ वित्तीय संस्थान या बैंक इसमें ‘फाइल चार्ज’ जोड़ लेते हैं, जिसका भार भी ग्राहक को ही सहना पड़ता है। साथ ही अधिकतर ‘नो कॉस्ट ईएमआई’ पर मिलने वाले सामान को ग्राहक को बिना किसी छूट के ही ख़रीदना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी वस्तु का मूल्य दस हज़ार है, तो यदि ग्राहक उस सामान को नक़द पर ख़रीदता है तो उसे उस सामान पर मिलने वाली छूट का लाभ भी मिलता है। परंतु यदि ग्राहक उस सामान को ‘नो कॉस्ट ईएमआई’ पर ख़रीदेगा तो उसे उस सामान पर कोई छूट नहीं मिलेगी। इसलिए ‘नो कॉस्ट ईएमआई’ के अनुबंध में घुसने से पहले आप काफ़ी सोच-विचार कर लें। साथ ही यदि आप किसी स्टोर से ऐसा सामान ‘नो कॉस्ट ईएमआई’ पर ले रहे हैं तो मोल-भाव करते समय ‘फाइल चार्ज’ को भी हटवा सकते हैं। इसलिए ‘नो कॉस्ट ईएमआई’ के आकर्षित विज्ञापनों के झाँसे में न आएँ और सोच-समझ कर ही ख़रीदारी करें।
ठीक इसी तरह ग्राहकों को लुभाने की दृष्टि से कई बैंक मुफ़्त क्रेडिट कार्ड बनाने के आकर्षक विज्ञापन जारी करते हैं। इन ऑफरों में भी ‘मुफ़्त’ कार्ड के नाम पर ग्राहकों को क्रेडिट कार्ड और लोन के मायाजाल फ़साने की मंशा ही होती है। मिसाल के तौर पर यदि कोई ग्राहक अपने लिए कुछ वस्तु आसान किश्तों पर लेता है और कभी-कभी वह अपनी मासिक किश्त या ईएमआई भरने में असमर्थ रहता है। ऐसे में बैंक की तरफ़ से उस पर लेट फ़ीस लगा दी जाती है। ईएमआई का लेट पर लेट होना ग्राहक को काफ़ी महँगा पड़ता है। उस पर न सिर्फ़ लेट फ़ीस का भार पड़ता है बल्कि ब्याज पर ब्याज भी चढ़ने लगता है। अंततः उसे अन्य बैंक के द्वारा दी जाने वाली ‘मुफ़्त क्रेडिट कार्ड’ की ऑफर की याद आती है। इस ‘मुफ़्त कार्ड’ की ऑफर के आगे उसे मजबूरन समर्पण करना पड़ता है। ऐसा सिर्फ़ अपनी किश्त चुकाने के लिए। परंतु ग्राहक शायद यह नहीं जानते कि ईएमआई पर सामान खरीदने की सूरत में ब्याज दरें 10-20 फीसदी के बीच ही रहती हैं। वहीं क्रेडिट कार्ड पर लगने वाला ब्याज इससे कहीं अधिक हो सकता है। यदि मुफ़्त में क्रेडिट कार्ड बनवाने को लेकर बैंक काफ़ी ज़ोर देते हैं और उस पर ब्याज दर भी काफ़ी ज़्यादा होती है तो फिर इसमें ‘फ्री’ क्या हुआ?
किश्तों और लोन का मायाजाल एक पति-पत्नी के उदाहरण से समझा जा सकता है। जब ये दोनों जवान थे, तो अपने मित्रों और जानने वालों का घर देखकर उन्हें लगता था कि काश हमारे पास भी अपना एक घर होता। दोनों ने यह निर्णय लिया कि वे अपनी आमदनी से पैसे बचाकर, बैंक लोन लेकर अपना एक घर खरीदेंगे। जैसे-तैसे उन्होंने एक घर ले लिया और कुछ समय बाद उन्हें हर महीने की भारी किश्त चुकाना मुश्किल लगने लगा। लोन की किश्तें चुकाने के लिए दोनों को देर रात तक ज़्यादा काम करना पड़ा। जिसकी वजह से उनके पास अपने बच्चों के लिए भी समय नहीं बचता था। थोड़े ही दिनों में पति यह भी कहने लगा कि, लोन न चुका पाने का तनाव, चिंता और नींद पूरी न होने की वजह से उसे ऐसा लगता है कि जैसे वह अपने सिर पर भारी बोझ ढोह रहा है। तो इनके लिए क्या आसान किश्तें वास्तव में आसान हुईं?
समझदारी इसी में है कि हम उधार लेने या किश्तों पर सामान लेने से पहले सोच-समझकर फैसला लें। उधार लेने से पहले खुद से ये सवाल अवश्य पूछें, क्या ऐसी वस्तु की इतनी ज़रूरत है कि बिना उधार लिए काम नहीं चलेगा? क्या समाज में अपने परिवार का रुतबा दिखाने के लिए कर्ज़ लेना ज़रूरी है? ऐसा तो नहीं कि हम लालच में आकर, अपनी चादर से बाहर पैर फैला रहे हैं? अगर ऐसा है, तो भलाई इसी में होगी कि आपके पास जितना है उसी में खुश रहिए और उधार लेने से बचे रहिए। बाज़ार के लुभावने ऑफर के मायाजाल में जहां तक हो सके न फँसें।
शुक्रवार, 3 नवंबर 2023
क्या आपका मोबाइल फ़ोन सुरक्षित है?
आए दिन हमें यह सुनने को मिलता है कि किसी बड़े व्यक्ति या मशहूर शख़्सियत ने अपने मोबाइल फ़ोन में छेड़-छाड़ या टैपिंग की शिकायत की है। ऐसा आरोप अक्सर उस व्यक्ति के प्रतिद्वंदी या दुश्मनों पर लगते हैं। यह सब तब भी होता है जब फ़ोन टैपिंग का शिकार व्यक्ति किसी ऐसे कार्य को अंजाम देने वाला होता है जिससे उसके प्रतिद्वंदियों को भारी नुक़सान पहुँचने की आशंका होती है। ऐसी घटनाएँ केवल राजनीति के मैदान में नहीं होती। कॉर्पोरेट सेक्टर और खेल के मैदान में भी ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं। फ़ोन टैपिंग के ज़रिये जासूसी करना कोई नई बात नहीं है। ऐसा कार्य, सरकारी एजेंसियाँ अक्सर देश विरोधी गतिविधियों की जाँच के लिए करती आईं हैं। परंतु पिछले कुछ वर्षों में फ़ोन टैपिंग के ग़ैर-क़ानूनी इस्तेमाल की खबरें भी सामने आई हैं।
ताज़ा मामला आईफ़ोन बनाने वाली अमरीकी कंपनी ऐपल द्वारा दिये गये चेतावनी संदेश का है। उपभोक्ताओं को भेजे गये चेतावनी संदेश के अनुसार, ‘राज्य प्रायोजित हमलावर’ उनके आईफोन को निशाना बना सकते हैं। ऐपल ने दुनिया भर में 150 से अधिक देशों में अपने कुछ उपभोक्ताओं को ऐसे चेतावनी संदेश भेजे हैं। जैसे ही यह संदेश भारत के कुछ प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं के पास पहुँचे तो सभी विपक्षी दलों के नेताओं को सरकार पर हमला करने का मौक़ा मिल गया। चुनावी माहौल में यदि विपक्ष के नेताओं पर ऐसा कुछ हो रहा है तो सरकारी तंत्र सवालों के घेरे में आएगा ही। मामले के तूल पकड़ते ही सरकार ने भी बयान जारी किया कि वह चिंतित है और उन्होंने इस घटना की जांच के आदेश दिए हैं।
मोबाइल फ़ोन निर्माताओं में ऐपल कंपनी का आईफ़ोन सुरक्षा की दृष्टि से सर्वोत्तम माना जाता है। इन उपकरणों में हैकिंग या जासूसी रोकने के लिए सुरक्षा की दृष्टि से सबसे उन्नत तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जो एक अभेद्य क़िले के समान होती है। साइबर विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी हैकर को किसी के आईफ़ोन को हैक करना है तो वह काफ़ी कठिन और महँगा होता है परंतु असंभव नहीं होता। इसलिए यदि किसी हैकर को किसी का आईफ़ोन हैक करना है तो उसे पैसे और तकनीक की दृष्टि से काफ़ी मज़बूत होना पड़ेगा। जानकारों के अनुसार, भले ही किसी का आईफ़ोन हैक हो जाए, लेकिन जैसे ही उस आईफ़ोन का सॉफ्टवेयर अपडेट होगा तो उसमें पड़ा जासूसी वाला सॉफ़्टवेयर स्वतः ही निष्क्रिय हो जाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि आईफ़ोन जैसे सुरक्षित मोबाइल भी ख़तरे में कैसे हैं? क्या आईफ़ोन के सुरक्षा सॉफ़्टवेयर का तोड़ भी साइबर अपराध के हैकरों के हाथ लग गया है?
ग़ौरतलब है कि ऐपल ने अपने स्पष्टीकरण में एक अहम बात भी स्पष्ट की है। ऐपल ने कहा, “हम इस बारे में जानकारी देने में असमर्थ हैं कि किस कारण से हमें खतरे की सूचनाएं जारी करनी पड़ रही हैं, क्योंकि इससे राज्य-प्रायोजित हमलावरों को भविष्य में पता लगाने से बचने के लिए अपने व्यवहार को अनुकूलित करने में मदद मिल सकती है।” इससे यह बात तो स्पष्ट है कि ऐपल अभी भी फ़ोन हैकरों से एक कदम आगे है। ऐसे में ऐपल को अपने सॉफ्टवेयर को बहुत जल्द अपडेट भी करना पड़ेगा, जिससे कि यदि फ़ोन हैक हुए भी हैं तो उनमें से हैकिंग निकाली जा सके।
जानकारों के मुताबिक़ स्टेट स्पॉन्सर्ड अटैक करने वाले हैकर एक छोटे समूह को ही अपना लक्ष्य बनाते हैं। ये हैकर तकनीक की दृष्टि से एकदम नए और आधुनिक संसाधनों का ही इस्तेमाल करते हैं। अन्य साइबर अपराधियों की तरह ये एक बड़े समूह को अपना शिकार नहीं बनाते, जिस कारण इनको ट्रैक करना मुश्किल होता है। ऐसे अटैक काफ़ी जटिल होते हैं और इनका ईजाद करने में करोड़ों का ख़र्च आता है। इन अटैकों की समयावधि भी बहुत छोटी होती है। परंतु ऐसे हैकरों द्वारा हैक किए गये आईफ़ोन पूरी तरह उनके इशारों पर चलते हैं। यदि आप किसी से फ़ोन पर बात नहीं भी कर रहे हैं तब भी आपके आईफ़ोन के माइक के ज़रिये फ़ोन के आसपास होने वाली हर बात को सुना जा सकता है। आपकी मर्ज़ी के बिना आपके आईफ़ोन के कैमरे का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। आप अपना फ़ोन लिये कहाँ-कहाँ गये, इसकी जानकारी भी हैकर को मिल जाती है। इसलिए हमें काफ़ी सचेत रहने की ज़रूरत है। किसी भी अनजान व्यक्ति द्वारा भेजी गई तस्वीर, वीडियो या लिंक को अपने फ़ोन में नहीं खोलना चाहिए। फ़ोन के सॉफ्टवेयर को हमेशा अपडेट रखें।
कुछ वर्षों पहले जब ‘पेगसस’ द्वारा जासूसी का मामला उठा था तो यह सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा जहां ये आज भी लंबित पड़ा है। यदि इन ताज़ा अटैक के मामले को लें तो जिस तरह से इस अटैक की चेतावनी वाले संदेश केवल विपक्षी नेताओं को गये हैं तो सरकार पर आरोप लगना ज़ाहिर सी बात है। वहीं यदि सरकार की बात मानें तो ऐपल ने अपने स्पष्टीकरण यह बात साफ़ नहीं की है कि किस सरकारी तंत्र ने ऐसा अटैक दुनिया भर में किया। क्या कोई अन्य देश ऐसे अटैक कर रहा है, जिसकी मंशा भारत में राजनैतिक अस्थिरता लाना है? यदि ऐसा है तो केवल विपक्षी नेताओं के फ़ोन में ही ऐसा अटैक क्यों हुआ? ऐसे में सरकार को भी एक स्पष्टीकरण जारी करना चाहिए और इस मामले में अपना रुख़ साफ़ कर देना चाहिए। वरना हर फ़ोन इस्तेमाल करने वाला सोचेगा कि क्या उनका फ़ोन सुरक्षित है?
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