शुक्रवार, 30 जून 2023

सरकार से क्या सवाल पूछा जाए?


एक स्वस्थ लोकतंत्र में मीडिया की अहम भूमिका होती है। समय-समय पर पत्रकार सत्तारूढ़ दल और सरकार से राष्ट्रहित के सवाल पूछते रहते हैं। वहीं सरकार भी समय-समय पर अपनी उपलब्धियों के विषय में प्रेस वार्ता भी करती रहती है। जब कभी ऐसी प्रेस वार्ता होती है तो सहज व असहज दोनों तरह के सवाल पूछे जाते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से, देश और विदेश में, सवाल पूछने वाले पत्रकारों के साथ जो कुछ भी हुआ उससे तो यही प्रश्न  उठता है कि क्या सरकार से सवाल पूछे जाएँ या न पूछे जाएँ? और पूछे जाएँ तो क्या पूछे जाएँ?

ताज़ा मामला देश के यशस्वी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से अमरीका के एक पत्रकार द्वारा पूछा गए सवाल का है जिसके लिये वो मोदी समर्थकों की निंदा का पात्र बनी। अमरीका के प्रसिद्ध अख़बार ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की पत्रकार सबरीना सिद्दीकी ने प्रधान मंत्री मोदी के अमेरिका दौरे के दौरान उनसे भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर सवाल पूछा था। इस सवाल को लेकर मोदी समर्थकों ने उनका ऑनलाइन उत्पीड़न शुरू कर दिया। इस मामले ने इतना तूल पकड़ा की व्हाइट हाउस को भी उस महिला पत्रकार के समर्थन में बयान जारी करना पड़ा और ट्रोल आर्मी की भर्त्सना करनी पड़ी। यहाँ सवाल उठता है कि क्या किसी पत्रकार को किसी भी देश के प्रधान मंत्री या अन्य राजनेता से सवाल पूछने का हक़ है या नहीं? क्या किसी पत्रकार को अपना काम करने के लिए या प्रश्न पूछने के लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी? क्या किसी पत्रकार को सवाल पूछे जाने के बाद नेता या दल के समर्थकों द्वारा ट्रोल होने के डर से, उस नेता से सवाल पूछने से पहले कई बार सोचना होगा?


सबरीना सिद्दीक़ी के अल्पसंख्यक वाले सवाल पर मोदी समर्थकों द्वारा उसके पाकिस्तानी माता-पिता को लेकर सोशल मीडिया में बवाल मचा हुआ है। जबकि यह अलग बात है कि सबरीना का जन्म 1986 में अमरीका में ही हुआ। वह 24 साल की उम्र से ही ब्लूमबर्ग न्यूज, गार्जियन, सीएनएन व अन्य कई जाने-माने मीडिया समूह के साथ काम कर चुकी हैं। वाइट हाउस के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने सोशल मीडिया में सबरीना के उत्पीड़न को लेकर कहा कि, “हम (सबरीना सिद्दीकी) के उत्पीड़न की रिपोर्ट्स से अवगत हैं। ये स्वीकार्य नहीं है।” उन्होंने आगे कहा कि, “वाइट हाउस कहीं भी और किसी भी परिस्थिति में पत्रकारों के साथ होने वाले उत्पीड़न की निंदा करता है।पत्रकारों का उत्पीड़न करना लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है।”

जहां एक ओर अमरीका की सरकार है जो पत्रकारों के समर्थन में उतरती है वहीं एक ओर सत्ता के नशे में चूर भारत के कुछ नेता हैं जो एक स्थानीय पत्रकार को सवाल पूछने पर नौकरी से निकलवा देते हैं। क्या यह स्वस्थ लोकतंत्र के लक्षण हैं? आपको याद होगा कि कुछ हफ़्तों पहले अपने संसदीय क्षेत्र के दौरे के समय केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से जब एक स्थानीय पत्रकार ने एक साधारण सा सवाल किया तो मंत्री जी को इतना बुरा लगा कि उस पत्रकार को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। यहाँ पर सवाल उठता है कि यदि स्मृति ईरानी को पूछे जाने वाला सवाल असहज था तो वो उस सवाल को टाल सकती थीं। या फिर ‘सॉरी नो कमेंट्स’ कह सकती थीं। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया बल्कि खुलेआम उस पत्रकार को धमका दिया और उस मीडिया समूह के मलिक से बात करने तक की बात कह डाली। देश भर के मीडिया सर्किल में इसकी काफ़ी निंदा कि गई। 


आज के युग में मीडिया हमारे दैनिक जीवन का एक मुख्य हिस्सा है। जहाँ एक ओर मीडिया के लिए लोकतंत्र एक प्राथमिक आवश्यकता है, वहीं यह भी सच है कि मीडिया के बिना लोकतंत्र ठीक उसी तरह है जैसे बिना पहिये की गाड़ी। इसलिए दोनों का एक दूसरे से एक अटूट संबंध है। परंतु पिछले कुछ सालों से भारतीय मीडिया की प्रताड़ना को लेकर दुनिया भर में सवाल उठने लगे हैं। लोकतंत्र में जनता में जागरूकता लाने की ज़िम्मेदारी मीडिया पर ही है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मज़बूती देने का काम भी मीडिया ही करती है। ऐसा करने से ही विकास की प्रक्रिया को रफ़्तार प्रदान करता है। लोकतंत्र में मीडिया की तीन प्रमुख ज़िम्मेदारियों हैं। पहला, सत्ताधारी दलों पर लगाम रखना, जवाबदेही को बढ़ावा देना, शासन में पारदर्शिता की माँग करना और सार्वजनिक जाँच में सहयोग की अपेक्षा रखना। दूसरा, राजनैतिक बहस के लिए नागरिक मंच उपलब्ध कराना, सूचित चुनावी विकल्प और कार्यों को सुविधाजनक बनाना। तीसरा, नीति निर्माताओं के लिए विषय उपलब्ध कराने हेतु सामाजिक समस्याओं के लिए सरकार की जवाबदेही को बढ़ाना।


परंतु पिछले कुछ सालों से मीडिया को जिस तरह पंगु बनाने की कोशिश की जा रही है क्या वो सही है? क्या लोकतंत्र में मीडिया को अपना काम निडर होकर नहीं करना चाहिए? क्या सत्तारूढ़ दल या सरकार से सवाल करना गुनाह है? क्या अमरीकी पत्रकार सबरीना द्वारा प्रधान मंत्री से सवाल करना ग़लत था? या सवाल के बाद सबरीना का सोशल मीडिया पर उत्पीड़न सही था? जब प्रधान मंत्री दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र के राष्ट्रपति के सामने खड़े होकर गर्व से भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे और प्रेस की आज़ादी का दावा करते हैं तो फिर ये सब विवाद क्यों उठते हैं?

शनिवार, 24 जून 2023

क्या आस्था मनोरंजन का विषय है?

पिछले कुछ दिनों से एक फ़िल्म को लेकर देश भर में काफ़ी विवाद चल रहा है। कारण है इस फ़िल्म में दिखाए गए भ्रामक दृश्यों और आपत्तिजनक डायलॉग। समाज का एक बड़ा हिस्सा, धार्मिक गुरु व संत और राजनैतिक दल फ़िल्म के निर्माताओं को हर मंच पर घेर रहे हैं। विवादों के चलते सोशल मीडिया पर इस फ़िल्म को दुनिया भर से काफ़ी ट्रोल भी किया गया है। सवाल उठता है कि क्या मनोरंजन के लिए आप आस्था से खिलवाड़ कर सकते हैं? क्या आस्था मनोरंजन का विषय है?
 

रामायण पर आधारित फ़िल्म ‘आदिपुरुष’ के निर्माताओं ने इस फ़िल्म में कुछ पात्रों का विवादास्पद चित्रण किया है, जो हिंदुओं की भावना को ठेस पहुँचा रहा है। इसके साथ ही इस फ़िल्म में बोले गये कई ऐसे डायलॉग भी हैं जो कि सभ्य नहीं माने जा सकते। जैसे ही विवाद बढ़ा तो फ़िल्म के निर्माता व संवाद लेखक ने अपने पुराने बयानों से पलटते हुए यह सफ़ाई दी कि “यह फ़िल्म रामायण पर आधारित नहीं बल्कि रामायण से प्रेरित है।” इसके बाद लेखक मनोज मुंतशिर ने विवादित डायलॉगों में संशोधन करने का ऐलान भी कर दिया है।
 

देश भर के कई हिंदू संगठन इस फ़िल्म के विरोध में खुलेआम उतर आए हैं। कई संगठनों ने तो फ़िल्म के निर्माताओं को फ़िल्म के आपत्तिजनक डायलॉग की भाषा में ही धमकी तक दे डाली है। इन सबके चलते मुंबई पुलिस ने लेखक व निर्माता को सुरक्षा भी दे दी है। पड़ोसी देश नेपाल से भी इस फ़िल्म के विरोध की खबरें आ रहीं हैं। कहा जाता है कि ‘बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा’। तो क्या फ़िल्म के निर्माताओं ने इसी मंशा से इस फ़िल्म को बनाया? या फिर किसी अन्य एजेंडे के तहत ऐसी फ़िल्में योजनाबद्ध तरीक़े से बनाई जाती हैं जो समाज में मतभेद पैदा करने का कम करती हैं? यहाँ पर यह कहना ठीक होगा कि ऐसी फ़िल्में न सिर्फ़ एक तरफ़ा होती हैं बल्कि तथ्यों से भी काफ़ी दूर होती हैं। 
 

वृंदावन में कई वर्षों से भजन कर रहे रसिक संत श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी ने हाल ही में फ़िल्म ‘आदिपुरुष’ और इसी तरह की अन्य फ़िल्मों पर अपनी कठोर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि, “आस्था मनोरंजन का विषय नहीं है। मनोरंजन कभी आस्था नहीं हो सकती और आस्था के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। भगवान की लीलाएँ हमारी आस्था का विषय हैं। जो भी इन्हें मनोरंजन की दृष्टि से बनाता है वो हमारी आस्था के साथ खिलवाड़ करता है।” इस विषय पर स्वामी जी आगे कहते हैं कि, “श्री कृष्ण लीला हो या श्री राम लीला, यह एक मर्यादा के तहत ही दिखाई जाती हैं। यदि कोई इसका चित्रण मनोरंजन की भावना से करता है, उनका उपहास करता है या उसे मर्यादा रहित ढंग से पेश करता है तो वह जो कोई भी हो अपराधी है, जिसका दंड उसे अवश्य मिलेगा। इन लीलाओं को बड़े-बड़े ऋषियों ने जैसा समाधि लगा कर देखा, वही लिखा। इन्हीं लीला चरित्रों के बल पर संतगण भक्तों को सही मार्ग पर चलने का उपदेश देते हैं। ऐसे सत्संगों या धार्मिक सम्मेलनों में जाने वालों को एक अलग अनुभूति होती है।”
 
स्वामी जी कहते हैं कि “भगवान और उनकी लीला मनोरंजन की चीज़ नहीं है। प्रायः यह देखा गया है कि सामने वाले को रिझाने की दृष्टि से सत्संग और लीला गायन को मनोरंजन बनाया जा रहा है।” सभी से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि, “शास्त्र सम्मत भगवत् चरित्र सुने जाएँ, शास्त्र सम्मत भगवत् लीला अनुकरण के दर्शन किए जाएँ, मनमानी न की जाए।” इस विषय पर श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण स्वामी जी का विस्तृत वीडियो यूट्यूब पर उपलब्ध है।  
 

एक समय था जब ‘जय संतोषी माँ’, ‘संपूर्ण रामायण’ जैसी धार्मिक फ़िल्में श्रद्धा के साथ बनाई जाती थीं। इन फ़िल्मों को लोग पूरी आस्था के साथ देखने जाते थे। सिनेमा हॉल में चप्पल बाहर उतारते थे, फ़िल्म को देखते हुए भक्ति रस में डूब कर रो पड़ते थे और फ़िल्म के समापन के बाद श्रद्धा से पैसे भी चढ़ाते थे। आपको याद होगा कि जब दूरदर्शन पर रामानन्द सागर और बी आर चोपड़ा निर्मित ‘रामायण’ व ‘महाभारत’ का टेलीकास्ट होता था तब सड़कों पर ऐसा सन्नाटा छा जाता था जैसे कि सरकार ने कर्फ़्यू लगा दिया हो। अभी हाल ही में कोविड महामारी के चलते जब रामायण का दोबारा टेलीकास्ट हुआ तो भी उसे उतनी ही श्रद्धा से देखा गया जितना दशकों पहले देखा जाता था। जब इन धारावाहिकों के कलाकार सार्वजनिक स्थलों पर दिखाई देते थे तो ऐसा प्रतीत होता था कि अरुण गोविल में साक्षात ‘प्रभु श्री राम’ व दीपिका चिखलिया में ‘सीता जी’ के दर्शन हो रहे हैं। यहाँ तक कि रामायण में ‘वीर हनुमान’ की भूमिका करने वाले दारा सिंह व महाभारत में ‘गदाधारी भीम’ का किरदार निभाने वाले प्रवीण कुमार को लोग असल जीवन में भी उनके किरदार में ही देखते थे।
 
परंतु जिस तरह धार्मिक चोला ओढ़ कर मनोरंजन और एजेंडे के तहत बनाई जाने वाली फ़िल्में आजकल बनाई जा रही हैं वे केवल विवाद भड़काने का काम कर रही हैं। तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर आस्था के साथ खिलवाड़ करना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकारा नहीं जा सकता। इसके लिए सरकार को कड़े दिशा निर्देश देने की आवश्यकता है, जिससे कि ऐसी किसी भी फ़िल्म को बनने न दिया जाए जो किसी भी धर्म के मानने वालों की आस्था को ठेस पहुँचाए।

शुक्रवार, 16 जून 2023

सावधान: ऊपरवाला सब देख रहा है!


देश की एक नामी सीसीटीवी कंपनी ने अपने विज्ञापन में एक लाइन को प्रमुखता दी ‘ऊपरवाला सब देख रहा है’। इस कंपनी का उद्देश्य था कि उनके सीसीटीवी कैमरे की निगाह से कोई नहीं बच सकता। परंतु आज हम जिस संदर्भ में इस बात को कह रहे हैं वो सरकार द्वारा जनता पर नज़र रखने से संबंधित है। यह एक ऐसा विषय है जो आप सभी को सोचने पर मजबूर कर देगा।


आपने देश के कई शहरों यातायात पुलिस द्वारा लगाए गये स्पीड कैमरे देखे होंगे। जो भी वाहन चालक स्पीड का क़ानून तोड़ता है। लाल बत्ती पार करता है। लाल बत्ती पर वाहन को स्टॉप लाइन के आगे खड़ा करता है। बिना हेलमेट के दुपहिया वाहन चलाता है या ऐसा कोई अन्य उल्लंघन करता है जो ट्रैफ़िक पुलिस के कैमरों में क़ैद हो जाता है तो उसके घर पर एक चालान पहुँच जाता है। ऐसे चालान आजकल ऑनलाइन भी चेक किए जा सकते हैं जहां पर फ़ोटो द्वारा ट्रैफ़िक नियम तोड़ने का प्रमाण भी दिखाई देता है। ज़ाहिर सी बात है कि जब से ऐसे चालान काटने शुरू हुए हैं जनता काफ़ी सतर्क हो गई है। इससे ट्रैफ़िक नियम उल्लंघन में काफ़ी कमी भी आई है।

अब बात करें एक अन्य कैमरे की जो हम पर नज़र रखे हुए है। यह कैमरा पुलिस विभाग द्वारा नहीं लगाया गया है। बल्कि यह कैमरा है ही नहीं। बिना कैमरे की यह निगरानी आयकर विभाग द्वारा रखी जाएगी। इन दिनों ज़्यादातर लेन-देन जब ऑनलाइन हो रहे हैं तो हमें काफ़ी सतर्क रहने की ज़रूरत है। सतर्क केवल ऑनलाइन फ्रॉड करने वालों से नहीं बल्कि अपने द्वारा खर्च की जाने वाली रक़म पर भी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम जितनी भी ऑनलाइन ख़रीदारी करें वो हमारे खातों में दिखाई देगी। इसलिए आयकर विभाग की इन सब लेन-देन पर नज़र बनी रहेगी।

आजकल देश भर में एक से बढ़कर एक लक्ज़री गाड़ियों की भरमार है। पिछले कुछ वर्षों में सड़कों की स्थिति काफ़ी बेहतर हुई है। एक के बाद एक एक्सप्रेसवे जनता के लिए खोले जा रहे हैं। जब गाड़ियाँ और सड़कें बेहतर होंगी तो ज़ाहिर सी बात है कि लोग घूमने या अन्य कामों से अपने घरों से निकलेंगे भी। यहाँ प्रश्न उठता है कि इस सब से आयकर विभाग को क्या? इस सब से हमें सतर्क रहने की क्या ज़रूरत है? तो इसका जवाब है आपकी गाड़ी पर लगा ‘फ़ास्ट टैग’ जो आपके वाहन को किसी भी टोल नाके से बिना देर लगाए पार करवा देता है।

जब भी आप किसी टोल नाके को पार करते हैं तो आपकी गाड़ी पर लगे ‘फ़ास्ट टैग’ की मदद से टोल का भुगतान हो जाता है। हर वाहन चालक समय-समय पर अपने वाहन पर लगे ‘फ़ास्ट टैग’ को रिचार्ज भी करता रहता है जिससे कि कम बैलेंस के चलते वाहन को टोल पार करने में कोई दिक़्क़त न हो। परंतु क्या आपने इस बात पर ग़ौर किया है कि जैसे ही आपकी गाड़ी टोल से पार होती है और आपके खाते से टोल की रक़म कटती है तो उस लेन-देन का पूरा रिकॉर्ड रख लिया जाता है। इस रिकॉर्ड के कई फ़ायदे हैं। यदि आपका वाहन चोरी हो जाता है और किसी टोल नाके को पार करता है तो वाहन को पकड़ने में भी मदद मिल जाती है। यदि आपने टोल को पास नहीं किया और फिर भी आपका टोल कट गया है तो आप इसी रिकॉर्ड के माध्यम से काटे गए ग़लत टोल को चुनौती भी दे सकते हैं। पुलिस द्वारा कुख्यात अपराधियों को पकड़ने में भी टोल नाके पर लगे कैमरे अक्सर मददगार साबित होते हैं।

इसी श्रृंखला में अब ‘फ़ास्ट टैग’ आयकर विभाग की मदद भी करने लगेगा। मान लीजिए कि किसी ने छुट्टी मनाने की नियत से एक रोड ट्रिप प्लान किया। इस रोड ट्रिप में उनकी एक दिशा की यात्रा लगभग 700 किलोमीटर की है। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी लंबी यात्रा में वे आरामदायक गाड़ी ही लेकर जाएँगे। मिसाल के तौर पर एक अच्छी एस.यू.वी गाड़ी। ऐसी गाड़ी की ईंधन की खपत आराम से निकाली जा सकती है। जैसे ही यह गाड़ी टोल नाके से पार होगी सो ही उसका पूरा डाटा टोल नाके के कंप्यूटर पर क़ैद हो जाएगा। पूरी यात्रा के टोल से ही अनुमान लग जाएगा कि गाड़ी कितने किलोमीटर चली। सवाल उठता है कि इस सबसे आयकर विभाग को क्या परेशानी?

जब तक आप इस यात्रा में इस्तेमाल की गई गाड़ी में ईंधन अपने कार्ड से ख़रीदेंगे तब तक आयकर विभाग को इस सबसे कोई परेशानी नहीं है। लेकिन आमतौर पर यह देखा गया है कि लोग ऐसी यात्राओं पर नक़द ख़र्च करते हैं। क्योंकि कभी-कभी पेट्रोल पम्प पर कार्ड की मशीन काम नहीं करती या अन्य कोई कारण हो। परंतु यदि ऐसी यात्रा कभी-कभी कि जाती है और नक़द ख़र्चे के समर्थन में आपके पास समुचित बैंक की एंट्री है, तो कोई परेशानी नहीं। परंतु यदि आपके द्वारा की गई ऐसी यात्राओं की संख्या अधिक है, जो केवल छुट्टी मनाने के लिए नहीं है और इन यात्राओं में आपने गाड़ी में ईंधन नक़द भुगतान करके डलवाया है तो आप आयकर विभाग की निगरानी में ज़रूर आ सकते हैं। कारण स्पष्ट है आयकर विभाग इस ख़र्चे को आपकी आय से तुलना करेगा। यदि कोई विसंगति पाई जाती है तो आपको उसका उत्तर देना होगा। इसलिए यदि आप ऐसा करते हैं तो आपको सतर्क रहने की ज़रूरत है। बेहतर तो यह हो कि ‘डिजिटल’ युग में आप नक़द भुगतान कम से कम करें और देश को उन्नति की ओर ले जाएँ। वरना ध्यान रहे ‘ऊपर वाला सब देख रहा है!’

शुक्रवार, 9 जून 2023

प्रतिशोध की भावना से न हो एफ़आइआर: सुप्रीम कोर्ट

एक पुरानी कहावत है, ‘जब घी सीधी उँगली से न निकले तो उँगली टेढ़ी करनी पड़ती है’ यानी जब कभी भी आपका कोई काम आसानी से न हो रहा हो तो आप कोई दूसरा विकल्प अपनायें। परंतु प्रायः यह देखा गया है कि जब भी किसी को किसी से दुश्मनी निकालनी होती है तो वे उँगली टेढ़ी करने में ही विश्वास रखते हैं। यह बात अक्सर पुलिस की एफ़आइआर दर्ज कराने में देखी जाती है जब लोग बिना किसी ठोस कारण के दूसरों पर एफ़आइआर लिखवाने के लिए न्यायालय का रुख़ करते हैं। हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने इसी प्रचलन को देखते हुए एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया है, जिससे देश भर की अदालतों में एफ़आइआर को लेकर फ़िज़ूल की याचिकाएँ आनी कम हो सकती हैं। 
 

जब भी किन्हीं दो पक्षों में कोई विवाद होता है, भले ही वो मामूली सा विवाद ही क्यों हो, एक पक्ष दूसरे पक्ष पर दबाव डालने की नियत से एफ़आइआर दर्ज कराने की कोशिश में रहता है। ऐसा होते ही दूसरा पक्ष दबाव के चलते समझौते पर आ सकता है। प्रायः ऐसा मामूली विवादों से में ही होता है। इन विवादों को क़ानूनी भाषा में ‘सिविल डिस्प्यूट’ कहा जाता है। फिर वो चाहे चेक बाउंस का केस हो या फिर कोई अन्य मामूली सा विवाद। आम तौर पर सिविल डिस्प्यूट होने पर पुलिस आसानी से एफ़आइआर दर्ज नहीं करती। जिसके चलते एफ़आइआर दर्ज करवाने वाले को मजिस्ट्रेट का रुख़ करना पड़ता है। 
 
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3), 1973 के अनुसार यदि कोई भी पुलिस अधिकारी आपकी शिकायत पर एफ़आइआर दर्ज नहीं करता है तो संबंधित मजिस्ट्रेट के पास विशेषाधिकार हैं कि वो पुलिस को एफ़आइआर दर्ज करने के निर्देश दे सकते हैं। आजकल इसी बात का चलन बढ़ने लग गया है और प्रायः हर दूसरी एफ़आइआर धारा 156(3) के तहत दर्ज हो रही है। इससे देश भर में विभिन्न अदालतों में दर्ज होने वाले मामलों में भी बढ़ौतरी हो रही है। साथ ही साथ पुलिस पर भी फ़िज़ूल के मामलों को लेकर काम का बोझ भी बढ़ रहा है। 
 
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत की जाने वाली एफ़आइआर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में बाबू वेंकटेश बनाम स्टेट ऑफ़ कर्नाटक के मामले में ये विस्तृत दिशा निर्देश दिये हैं। इस मामले के तहत दो पक्षों के बीच प्रॉपर्टी की ख़रीद फ़रोख़्त को लेकर एक सिविल डिस्प्यूट हुआ था। एक पक्ष का कहना था कि दूसरा पक्ष समझौते के तहत पैसा देने के बावजूद तय समय सीमा के भीतर प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री नहीं करवा रहा। इस मामले को लेकर प्रथम पक्ष स्थानीय सिविल कोर्ट में पहुँचा और रजिस्ट्री करवाने की माँग को लेकर एक केस डाल दिया। दूसरे पक्ष ने भी सिविल कोर्ट में अपना जवाब दाखिल कर दिया। क़रीब एक डेढ़ साल तक मामला चलता रहा और कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। इसी बीच प्रथम पक्ष ने सोचा कि क्यों न एक एफ़आइआर भी दाखिल कर दी जाए? इससे दूसरे पक्ष पर दबाव पड़ेगा और वो समझौता करने को राज़ी हो जाएगा। सिविल डिस्प्यूट होने के नाते पुलिस ने रिपोर्ट नहीं दर्ज की। लिहाज़ा प्रथम पक्ष ने मजिस्ट्रेट के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत याचिका दायर की। 
 

मजिस्ट्रेट ने धारा 156(3) के तहत विशेषाधिकार अधिकार के चलते प्रथम पक्ष की याचिका पर पुलिस को निर्देश दिये कि वो इस मामले में एफ़आइआर दर्ज करें। एफ़आइआर के विरोध में द्वितीय पक्ष ने उच्च न्यायालय का रुख़ किया। यदि आपके ख़िलाफ़ कभी कोई ग़लत एफ़आइआर दर्ज होती है तो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482, 1973 के तहत आप उसे उच्च न्यायालय द्वारा रद्द करा सकते हैं। परंतु इस मामले में जब उच्च न्यायालय ने द्वितीय पक्ष को कोई राहत नहीं दी तो वे सुप्रीम कोर्ट पहुँचे। 
 
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान 1992 का स्टेट ऑफ़ हरियाणा बनाम चौ॰ भजन लाल का फ़ैसला संज्ञान में लिया। इस ऐतिहासिक फ़ैसले में एक महत्वपूर्ण बात यह बताई गई थी कि यदि किसी पक्ष को यह लगता है कि उसके ख़िलाफ़ कोई एफ़आइआर बदले या बदनामी की भावना से दर्ज कराई गई है तो उसे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत रद्द करवाया जा सकता है। इस मामले में भी कुछ ऐसा ही पाया गया।
 
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत एफ़आइआर दर्ज करवाने से पहले शिकायतकर्ता को एक हलफ़नामा देना ज़रूरी होगा कि वो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154(1) के तहत पहले स्थानीय पुलिस के पास गया और सुनवाई न होने के कारण धारा 154(3) के तहत संबंधित उच्च पुलिस अधिकारियों के पास भी गया था। जब कहीं सुनवाई नहीं हुई तभी वह मजिस्ट्रेट के समक्ष आया है। यदि शिकायतकर्ता ऐसा हलफ़नामा नहीं देता तो धारा 156(3) के तहत उसकी अर्ज़ी मंज़ूर नहीं की जा सकती और झूठा हल्फ़नामा देने पर शिकायतकर्ता के ख़िलाफ़ कार्यवाही भी हो सकती है। इस ऐतिहासिक फ़ैसले से देश भर की जानता, अदालतों और पुलिस विभाग में एक सकारात्मक संदेश गया है। जिससे प्रतिशोध की भावना से व बिना प्राथमिक कार्यवाही किए बिना, की जाने वाली एफ़आइआर की संख्या भी घट सकेगी।

शुक्रवार, 2 जून 2023

श्रद्धा और समझ से हो धार्मिक स्थलों का जीर्णोद्धार


12 ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन के महाकालेश्वर के मंदिर में सप्त ऋषियों की मूर्तियां पहली ही आँधी में ध्वस्त हो कर गिर गयीं। 856 करोड़ के इस प्रोजेक्ट का लोकार्पण सात महीने पहले ही प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था। क्या इस भव्य कॉरिडोर का निर्माण व इस तीर्थ स्थल का जीर्णोद्धार सही समझ, अनुभव, श्रद्धा और कलात्मक अभिरूचि के साथ किया गया था? क्या इस जीर्णोद्धार करने वाले ठेकेदार ने पहले भी कभी किसी पौराणिक तीर्थ स्थल का जीर्णोद्धार किया था?



देश के यशस्वी प्रधान मंत्री मोदी जी जिस तरह से देश भर में नए भवनों और सड़कों आदि का निर्माण करवा रहे हैं वो हर मतदाता के लिए गर्व की बात है। जब भी देश में विकास होता है तो उसका श्रेय तत्कालीन सरकार को ही मिलता है। देश भर में होने वाले विकास कार्यों से जहां देश भर में तरक़्क़ी की लहर दौड़ती है वहीं रोज़गार के अफ़सर भी बढ़ते हैं। परंतु जहां सरकार को विकास का श्रेय मिलता है, वहीं यदि कभी इन विकसित स्थानों पर  कोई हादसा या दुर्घटना हो जाए तो उसका दोषी भी सरकार को ही माना जाता है। सरकार चाहे किसी भी दल की क्यों न हो? यदि वे श्रेय के हक़दार हैं तो गुणवत्ता की कमी के कारण होने वाले नुक़सान के भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 अक्टूबर 2022 को उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर के नए परिसर ‘महाकाल लोक’ का लोकार्पण किया था। नवम्बर 2022 मुझे भी इस नवनिर्मित परिसर को देखने का मौक़ा मिला। वहाँ मौजूद दर्शनार्थियों की भीड़ को देख इस बात का अंदाज़ा लग गया था कि यह स्थान बहुत लोकप्रिय हो गया है। महाकाल के सेवायत गोसाईयों से बात करके पता चला कि इतने खुले परिसर के बन जाने से यहाँ पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या भी बड़ गई है। पूरे परिसर का दौरा करने के पश्चात एक अच्छी अनुभूति ज़रूर हुई। परंतु जब वहाँ पर फ़ाइबर की इतनी विशाल मूर्तियों को देखा तो विचार आया कि भगवान करे यह मूर्तियाँ सालों तक टिकी रहें। बीते रविवार जब यह हादसा हुआ तो मुझे उस दिन की बात याद आई।


30 किलोमीटर की रफ़्तार से चलने वाली एक ही आँधी में सात में से छह मूर्तियों का ढह जाना वास्तव में चिन्ताजनक है। इस हादसे से सीधे तौर पर यही सवाल उठता है कि क्या इस कॉरिडोर का निर्माण करने वाले गुजरात की कंपनी के पास वास्तव में इस तरह के कार्य करने का कोई अनुभव था? क्या यह ठेकेदार भी अन्य सरकारी काम करने वाले ठेकेदारों की तरह केवल दिखावटी काम करने में माहिर था, ठोस काम करने में नहीं? यदि ऐसा होता तो इतनी सी आँधी में ये मूर्तियाँ नहीं गिरतीं। 856 करोड़ रुपये की लागत से बने इस प्रोजेक्ट की गुणवत्ता पर अब सवाल उठने लग गये हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार इस प्रोजेक्ट पर लगभग 200 से 250 करोड़ ही ख़र्च हुए हैं। शेष राशि भ्रष्टाचार की बलि चढ़ गई है। इस बात में कितनी सच्चाई है ये तो जाँच के बाद ही पता चलेगा। इस हादसे के बाद ऐसे सभी प्रोजेक्टों को शक की निगाह से देखा जा रहा है।

दरअसल जब भी कभी किसी तीर्थ स्थल का जीर्णोद्धार होता है तो वह कार्य कुछ सालों के लिए नहीं बल्कि सदियों के लिए होना चाहिए। सरकारें आएँगी और जाएँगी परंतु तीर्थ स्थल तो सदियों के लिए ही बनाए जाते हैं। मिसाल के तौर पर तेलंगाना के यदाद्रीगिरीगुट्टा क्षेत्र में बने भगवान लक्ष्मी-नृसिंह देव के एक अत्यंत भव्य मंदिर को ही लीजिए। मंदिर के निर्माण में कहीं भी ईंट, सीमेंट या कंक्रीट का प्रयोग नहीं हुआ है। सारा मंदिर ग्रेनाइट की भारी-भारी ‘श्री कृष्ण शिलाओं’ से बना है, जिन्हें प्राचीन तरीक़े के चूने के मसाले से जोड़ा गया है। मंदिर के निर्माण में 80 हज़ार टन पत्थर लगा है। जो ये सुनिश्चित करेगा कि ये मंदिर सदियों तक रहे। मंदिर का सारा निर्माण कार्य आगम, वास्तु और पंचरथ शास्त्रों के सिद्धांतों पर किया गया है। जिनकी दक्षिण भारत के खासी मान्यता है। 2016 में तेलंगाना सरकार ने 1800 करोड़ रुपए की लागत से तिरुपति की तर्ज पर इसका भव्य निर्माण शुरू करवाया। पारम्परिक नक्काशी से सुसज्जित यह मंदिर मात्र साढ़े चार साल में बन कर तैयार हुआ है जो अपने आप में एक आश्चर्य है। मंदिर का सात मंज़िला ग्रेनाइट का बना मुख्य द्वार, जिसे राजगोपुरम कहा जाता है, करीब 84 फीट ऊंचा है। इसके अलावा मंदिर के 6 और गोपुरम हैं। राजगोपुरम के आर्किटेक्चर में 5 सभ्यताओं द्रविड़, पल्लव, चौल, चालुक्य और काकातिय की झलक भी मिलती है। आज यहाँ लाखों दर्शनार्थियों का मेला लगा रहता है।

धर्मनगरियों व ऐतिहासिक भवनों का जीर्णोंद्धार या सौन्दर्यीकरण एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। जटिल इसलिए कि चुनौतियां अनंत है। पुरोहित समाज के पैतृक अधिकार, लोगों की धार्मिक भावनाएं, वहां आने वाले लाखों आम लोगों से लेकर मध्यम वर्गीय व अति धनी लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करना बहुत कठिन होता है। सीमित स्थान और संसाधनों के बीच व्यापक व्यवस्थाऐं करना, इन नगरों की सफ़ाई, ट्रैफ़िक, कानून व्यवस्था और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चति करना बड़ी चुनौतियाँ हैं। इस सबके लिए जिस अनुभव, कलात्मक अभिरूचि व आध्यात्मिक चेतना की आवश्यक्ता होती है, प्रायः उसका प्रशासनिक व्यवस्था में अभाव होता है। सड़क, खड़ंजे, नालियां, फ्लाई ओवर जैसी आधारभूत संरचनाओं के निर्माण का अनुभव रखने वाला प्रशासन तंत्र इन नगरों के जीर्णोंद्धार और सौन्दर्यीकरण में वो बात नहीं ला सकता, जो इन्हें विश्वस्तरीय तीर्थस्थल बना दे। इसलिए तीर्थस्थलों के विकास और जीर्णोद्धार के लिए विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है।