शुक्रवार, 30 दिसंबर 2022

कोचर और धूत ही गिरफ़्तार क्यों?


पिछले दिनों सीबीआई द्वारा आईसीआईसीआई बैंक की पूर्व एमडी व सीईओ चंदा कोचर और उनके पति दीपक कोचर की गिरफ्तारी की खबर सुर्ख़ियों में थी। उसके बाद हाल ही में वीडियोकॉन के अध्यक्ष वेणुगोपाल धूत को भी सीबीआई ने बैंक फ्रॉड मामले में गिरफ़्तार किया। तमाम सबूतों के बावजूद सीबीआई ने 2019 में एफ़आईआर दर्ज की और जाँच करने लगी। आश्चर्य है कि आरोपियों की गिरफ़्तारी तीन बरस बाद दिसंबर 2022 में ही की गई। सीबीआई के इस ढुलमुल रवैये से सवाल उठता है कि देश में ऐसे कितने और मामले हैं जिन पर सीबीआई और अन्य जाँच एजेंसियां इसी तरह ढुलमुल रवैया अपना रही हैं?
 

कोचर दंपत्ति की ज़मानत के लिए बहस करते हुए उनके वकीलों ने कोर्ट में कहा कि, “जनवरी 2019 से अब तक कोचर दंपत्ति उपलब्ध थी, तो फिर इतने सालों में उन्हें जांच के लिए क्यों नहीं बुलाया गया?” वकील के अनुसार, जुलाई 2022 तक सीबीआई को जांच के लिए उनकी जरूरत तक नहीं थी और अब सीबीआई हिरासत में पूछताछ की मांग कर रही है। क़ानून के जानकार इसे सीबीआई की कार्यशैली की कमी बताते हैं। बैंक फ्रॉड का ऐसा चर्चित मामला सीबीआई के आलस्य के कारण अगर इस कदर खिंचता है तो जाँच एजेंसियों पर सवाल तो उठेंगे ही। ऐसा क्या कारण था कि 2019 में दर्ज एफ़आईआर पर गिरफ़्तारी और पूछताछ इतनी देर से हुई? जिन मामलों में सीबीआई या अन्य जाँच एजेंसियों को तत्पर्ता दिखानी होती है वहाँ तो रातों-रात गिरफ़्तारी भी हो जाती है और कार्यवाही भी गति पकड़ती है। जहां ढील देने का मन होता है या ऊपर से ढील देने के ‘निर्देश’ होते हैं, वहाँ विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहूल चौकसी जैसे आर्थिक अपराधियों को देश छोड़ कर भाग जाने का मौक़ा भी दे दिया जाता है। 
 

बैंक फ्रॉड के मामलों में, बिना बैंक के अधिकारियों की साँठ-गाँठ के कोई भी बैंक को धोखा नहीं दे सकता। आरबीआई के आँकड़े बताते हैं कि देश के 'टॉप 50 विल्फुल लोन डिफ़ॉल्टरों’ की ऋण की राशि जोड़ी जाए तो वो 92,570 करोड़ रुपये बैठती है। ये रक़म इतनी ज़्यादा कैसे हो गई? क्या बैंक के अधिकारी सो रहे थे? यदि कोई आम आदमी अपनी नई गाड़ी या नये घर के लिये बैंक से छोटा सा ऋण लेता है तो तमाम दस्तावेज़ों पर साइन कराए जाते हैं। गारंटी के तौर पर उसकी चल-अचल संपत्ति के दस्तावेज़ों को भी बैंक अपने पास गिरवी रख लेता है। परंतु देश के नामी बैंक लुटेरों के लिए सभी नियम और क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ा दी जाती हैं। ऐसा केवल इसीलिए होता है कि क़र्ज़ लेने वाला बैंक अधिकारियों को क़र्ज़ लेने की एवज़ में मोटी रिश्वत देता है। क़र्ज़ और ब्याज की राशि जब बहुत बड़ी हो जाती है और बैंक अधिकारी की नौकरी पर बन आती है तो शिकायत और जाँच का नाटक शुरू हो जाता है।  
 

विजय माल्या और नीरव मोदी पर इतना हल्ला मचने के बाद जबसे भारत सरकार इस मामले पर गंभीर हुई तो इन दोनों को देश में वापस लाने की प्रक्रिया भी तेज़ हुई। हमारी सरकार को इन मामलों में कुछ सफलता भी मिल रही है। परंतु जो बैंक लोन का फ्रॉड करने वाले इसी देश में हैं उनका क्या हो रहा है? मिसाल के तौर पर देश के ‘टॉप 50 विल्फुल लोन डिफ़ॉल्टरों’ की सूची में एक नाम फ्रॉस्ट इंटरनेशनल लिमिटेड का भी है। इनकी बैंक फ्रॉड की रक़म 3500 करोड़ से अधिक है। इस कंपनी पर 14 बैंकों के एक समूह के साथ धोखाधड़ी का आरोप है। 
 
इस कंपनी के निर्देशकों में उदय देसाई, सुजय देसाई, सुनील वर्मा, अनूप कुमार, बलदेव राज वढ़ेरा और अन्य हैं। ग़ौरतलब है कि बैंक ऑफ़ इंडिया और इण्डियन ओवरसीज़ बैंक ने 2020 में उदय देसाई और 13 अन्य लोगों के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी के मामलों की एफ़आईआर लिखवाई थी। इतना ही नहीं बैंकों द्वारा इस समूह के निर्देशकों के ख़िलाफ़ ‘लुक आउट नोटिस’ भी जारी करवाया गया था। परंतु इस मामले की जाँच कर रही एजेंसियाँ किन्हीं कारणों से इस गंभीर मामले पर फुर्ती नहीं दिखा रही हैं। आँकड़ों के अनुसार, 2020 में जब इस मामले की एफ़आईआर दर्ज हुई थी तब यह मामला नीरव मोदी और मेहूल चौकसी के 13000 करोड़ के बैंक फ्रॉड मामले के बाद दूसरा बड़ा मामला था। 
 
बैंक की एफ़आईआर में उदय देसाई और उनके सहयोगियों पर आरोप है कि बैंक से लोन लेने के लिये इन्होंने फ़र्ज़ी दस्तावेज जमा कराए। देसाई बंधुओं के खाते में तनाव के संकेत तब दिखाई देने लगे जब निर्यात आय प्राप्त नहीं होने के कारण बैंकों के साथ साख पत्र हस्तांतरित होना शुरू हो गए। देसाई की कंपनी के खाते को अंततः बैंक कंसोर्टियम द्वारा गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) के रूप में वर्गीकृत किया गया। बैंक द्वारा कंपनी के खातों का ‘फॉरेंसिक ऑडिट’ भी करवाया गया, जिसमें यह पाया गया कि किसी भी माल का कोई वास्तविक निर्यात हुआ ही नहीं था। लोडिंग और डिस्चार्ज पोर्ट की तुलना में जहाज की आवाजाही के आँकड़े भी बेमेल थे। फॉरेंसिक जाँच में यह भी पता चला कि देसाई समूह ने अपने ही चिर-परिचित लोगों को असुरक्षित ऋण प्रदान कर धन शोधन किया है। इस जाँच से यह भी पता चला कि देसाई ने अपने जानकारों के साथ ही लगभग दस हज़ार करोड़ की ख़रीद फ़रोख़्त भी की है।
 
बैंक फ्रॉड जैसे बड़े घोटालों की जाँच कर रही एजेंसियों का ढीला रवैया ही ऐसे अपराधियों को देश छोड़ने का मौक़ा देते हैं। अगर एजेंसियों द्वारा कड़ी कार्यवाही की जाती है तो जनता के बीच ऐसा संदेश जाता है कि जाँच एजेंसियाँ अपना काम स्वायत्तता और निष्पक्ष रूप से कर रहीं हैं। देश की शीर्ष जाँच एजेंसियों का सिद्धांत यह होना चाहिये कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। फिर वो चाहे किसी भी विचारधारा या राजनैतिक पार्टी का समर्थक ही क्यों न हो। एजेंसियाँ ऐसे किसी भी अपराधी को नहीं बख्शेंगी, ऐसा करने से अपराधियों के बीच भी ख़ौफ़ का संदेश जाएगा और लोगों का इन एजेंसियों पर विश्वास भी बढ़ेगा।

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

अध्यापकों को भी मिले ग्रेच्युटी की रक़म


किसी भी कंपनी या प्रतिष्ठान में लंबे समय तक काम करने वाले व्यक्ति को सेवानिवृत होने पर पेंशन, प्रोविडेंट फंड के अलावा ग्रेच्युटी की रक़म भी मिलती है। ग्रेच्‍युटी किसी कर्मचारी को कंपनी की ओर से मिलने वाला इनाम होता है। अगर कर्मचारी नौकरी की कुछ शर्तों को पूरा करता है तो ग्रेच्‍युटी का भुगतान एक निर्धारित फॉर्मूले के तहत निश्चित तौर पर दिया जाता है। अगस्त 2022 तक सभी निजी स्कूल के अध्यापकों को इस सुविधा का लाभ नहीं मिलता था। हाल ही में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कई सालों से लंबित पड़े इस मामले में निजी स्कूल के अध्यापकों के हित में एक अहम फ़ैसला दिया है। जो अध्यापकों के पक्ष में है। 

याचिकाकर्ता ने अदालत से स्पष्ट करने की अपील की थी कि ‘पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972’ की धारा 2 के तहत निजी स्कूल के अध्यापकों को कर्मचारी माना जाए या नहीं? 29 अगस्त 2022 को सर्वोच्च न्यायालय की एक खण्डपीठ ने अपना ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए इन अध्यापकों को भी कर्मचारी की श्रेणी में माना। सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी की पीठ द्वारा दिये गये इस फैसले ने सभी शैक्षिक संस्थाओं को अब अध्यापकों को ग्रेच्युटी की रक़म देने के लिए बाध्य कर दिया है। कोर्ट की खंडपीठ ने ऐसी सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया जिनमें शिक्षकों को ग्रेच्युटी न देने की पैरवी की गई थी। फ़ैसले के मुताबिक़ जो भी शिक्षक 1997 के बाद सेवानिवृत हुए हैं उनके संबंधित स्कूलों को भी उन्हें ग्रेच्युटी देनी होगी। इस फ़ैसले से देश के लाखों शिक्षकों को सीधे तौर पर फायदा मिलेगा। 


कर्मचारी को मिलने वाली ग्रेच्युटी की रक़म नियोक्ता कंपनी की तरफ से दी जाती है। मौजूदा व्यवस्था के अनुसार यदि कोई कर्मचारी किसी कंपनी या संस्थान में कम से कम 5 साल तक काम करता है तो वह ग्रेच्युटी का हकदार होता है। पेमेंट ऑफ ग्रेच्‍युटी एक्‍ट, 1972 के तहत इसका लाभ उस संस्‍थान के हर कर्मचारी को मिलता है जहां 10 से ज़्यादा लोग काम करते हैं। यदि कोई कर्मचारी नौकरी छोड़ता है या रिटायर हो जाता है, परंतु वह ग्रेच्‍युटी के नियमों को पूरा कर लेता है तो वह ग्रेच्‍युटी के लाभ का हक़दार होता है। अभी तक सभी निजी स्कूल के अध्यापकों को इसका लाभ नहीं मिल रहा था। लेकिन इस फ़ैसले के बाद वे सभी लाभान्वित हो जाएँगे।


परंतु सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बावजूद कुछ स्कूल इसका पालन नहीं कर रहे थे। ताज़ा मामला दिल्ली के एक निजी स्कूल में काम कर रही अध्यापिका का है। इस महिला अध्यापक ने अपने जीवन के 27 साल दिल्ली के इस निजी स्कूल को दिये। मई 2021 में उनके रिटायर होने पर स्कूल प्रशासन ने इन्हें ग्रेच्युटी देने से मना कर दिया। रिटायर होने के एक डेढ़ साल बाद तक वे अपने ग्रेच्युटी के लिए स्कूल को बार-बार लिखती रहीं पर उनके हाथ निराशा ही लगी। अख़िरकार इस महिला ने अदालत का रुख़ किया और दिल्ली उच्च न्यायालय में न्याय की गुहार लगाई। इनके हक़ की लड़ाई के लिये दिल्ली की ‘राधे कृष्णा लीगल एड फाउंडेशन’ ने इस मामले को निःशुल्क लड़ने का निर्णय लिया। संस्था के प्रमुख ट्रस्टी अजय गर्ग एडवोकेट के अनुसार स्कूल में इतने लंबे समय तक कार्य करने पर, इस अध्यापिका की ग्रेच्युटी की रक़म लगभग दस लाख से अधिक बनती थी। शायद इसीलिए दिल्ली का यह निजी स्कूल इस रक़म को देने से बच रहा था। 


स्कूल और दिल्ली के शिक्षा विभाग को क़ानूनी नोटिस भेजे जाने पर भी जब कोई उत्तर नहीं आया तो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की गई। याचिका में स्कूल द्वारा अध्यापिका को ग्रेच्युटी की रक़म ब्याज सहित देने व स्कूल पर क़ानून का पालन न करने की उचित क़ानूनी कार्यवाही की माँग की गई।


स्कूल प्रशासन ने 11 नवम्बर 2022 को, मामले की सुनवाई की पहली तारीख़ पर ही ग्रेच्युटी देने की माँग को स्वीकार लिया और मामला रद्द करने की अपील की। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि स्कूल द्वारा दी गई राशि से याचिकाकर्ता संतुष्ट नहीं हों तो दिल्ली सरकार का शिक्षा विभाग इस बात को सुनिश्चित करे कि ग्रेच्युटी की सही रक़म याचिकाकर्ता को दी जाए। यदि इसके बाद भी अध्यापिका को कोई शिकायत हो तो वे अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकती हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद पीड़ित अध्यापिका को उनकी ग्रेच्युटी की रक़म ब्याज सहित प्राप्त हुई। 

देश भर की उच्च अदालतों में आए दिन ऐसे मामले आते हैं जिन पर कोर्ट ऐतिहासिक निर्णय देते हैं। परंतु देश की आम जनता के बीच ऐसे फ़ैसलों को सही ढंग से प्रचारित नहीं किया जाता। यदि ऐसे फ़ैसलों का सही ढंग से प्रचार हो तो जानता के बीच अपने अधिकारों को लेकर न सिर्फ़ जागरूकता फैलेगी बल्कि न्यायपालिका पर विश्वास भी बढ़ेगा। ऐसे महत्वपूर्ण मामलों पर देश की विभिन्न अदालतों द्वारा दिये गये फ़ैसलों को, सोशल मीडिया के माध्यम से, सरल भाषा में आम जनता तक पहुँचाने का काम देश भर में न्यायिक मामलों में कार्य करने वाली सामाजिक संस्थाओं द्वारा भी किया जा सकता है। ऐसी स्वयं सेवी संस्थाएँ पीड़ितों को न्याय दिलाने का काम कम खर्चे पर या निःशुल्क करती हैं, जिससे पीड़ित को कोर्ट जाने में कोई हिचक नहीं होती।

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

विपक्ष का एकजुट होना लोकतंत्र के लिए ज़रूरी


हाल ही के चुनावों में मिले-जुले परिणाम आए हैं। दिल्ली, गुजरात और हिमाचल में जो नतीजे आए हैं उनका अनुमान लगा रहे राजनैतिक पंडितों की भविष्यवाणी काफ़ी हद तक सही साबित हुई। विपक्षी दलों ने जिस तरह कमर कस कर इन चुनावों में पहले के मुक़ाबले बेहतर प्रदर्शन किया है, उससे अब यह बात तो स्पष्ट है कि विपक्षी दल 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले 2023 में नौ राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों को काफ़ी गंभीरता से ले रहे हैं। बिखरा हुआ विपक्ष किसी भी लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं होता। शायद इसीलिए तमाम क्षेत्रीय दलों के नेता एक दूसरे के साथ बैठकें कर रहे हैं और आगे की योजना बना रहे हैं।
 
गुजरात में भाजपा ने जीत का नया कीर्तिमान स्थापित किया है। वहाँ प्रधान मंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की कड़ी मेहनत रंग लाई। पर हिमाचल और दिल्ली में शिकस्त के बाद, भाजपा के नेतृत्व को आने वाले चुनावों की तैयारी में जुटना होगा। विपक्षी दलों को भी इस बात का मंथन करना पड़ेगा कि यदि वो एकजुट नहीं हुए तो वो अपने-अपने राज्यों तक ही सिमट कर रह जाएँगे। उधर केजरीवाल फैक्टर को नज़रअंदाज़ करना भी ठीक नहीं होगा। 
 

दिल्ली एमसीडी के चुनाव में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को बहुमत मिला। भाजपा समर्थक इसे 15 साल की ‘एंटी इनकम्बेंसी’ बता रहे हैं। वहीं केजरीवाल बढ़-चढ़ कर दावे कर रहे हैं कि उन्हें उनके काम पर वोट मिला। जिस तरह केजरीवाल ने ‘दिल्ली मॉडल’ का ढोल पीट-पीट कर पंजाब में अपनी सरकार बनाई, ठीक उसी तरह दिल्ली की एमसीडी में भी अपनी पकड़ बना ली। परंतु हिमाचल और गुजरात में उनका ‘झाड़ू’ नहीं चल सका। राजनैतिक पंडितों के अनुसार इसके पीछे का कारण केवल विपक्ष की एकता का न होना है। 
 
मिसाल के तौर पर गुजरात के नतीजों को अगर गौर से देखें तो कई सीटों पर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के वोटों को अगर जोड़ा जाए तो भाजपा को मिले वोटों के मुक़ाबले वो संख्या काफ़ी अधिक है। इसका मतलब यह हुआ कि विपक्षी एकता न होने के कारण भाजपा को न मिलने वाले वोट बंट गये। इसका सीधा फ़ायदा भाजपा को ही हुआ और वो ऐतिहासिक जीत हासिल कर पाई। शायद इसीलिए केजरीवाल को भाजपा के लिए विपक्ष के वोट काटने वाला कहा जा रहा है। परंतु जिस तरह केजरीवाल ने हिमाचल के चुनावों में गुजरात और दिल्ली जैसी ताक़त नहीं झोंकी और कांग्रेस को इसका फ़ायदा मिला, उससे तो यही लगता है कि आम आदमी पार्टी ने वोट काटने का ही काम किया है। 
 

हिमाचल के चुनावों में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने हिमाचल के प्रभारी सत्येंद्र जैन की कमी महसूस की और चुनाव प्रचार से अचानक हट गये। जो लोग केजरीवाल को भाजपा की ‘बी टीम’ कहते हैं, वो इस बात पर हैरान हैं कि यदि ये बात सच है तो सत्येंद्र जैन को हिमाचल के चुनावों से पहले जेल से क्यों नहीं छुड़ाया गया? भाजपा द्वारा सत्येंद्र जैन के जेल के वीडियो हर रोज़ वायरल क्यों किए जा रहे थे? यदि भाजपा और आम आदमी पार्टी एक हैं तो क्या भाजपा सरकार द्वारा सत्येंद्र जैन को इतने दिनों तक तिहाड़ में रखना एक ग़लत रणनीति थी?
 
आमतौर पर जब भी किसी राज्य में उपचुनाव हुए हैं, फिर वो चाहे लोक सभा हो या विधान सभा, वहाँ पर सत्तारूढ़ दल ही विजयी होता है। परंतु 2017 के लोक सभा उपचुनाव में मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्य मंत्री केशव मौर्य की सीट सत्तारूढ़ भाजपा के पक्ष में नहीं जा सकी। इसका कारण था सपा और बसपा का समझौता। ठीक उसी तरह मुलायम सिंह की मृत्यु के बाद मैनपुरी के उपचुनाव में डिंपल यादव की ऐतिहासिक जीत का कारण केवल सहानुभूति नहीं था। नेताजी जैसे क़द्दावर नेता की लोकप्रियता को देखते हुए भाजपा को भी और दलों की तरह इस चुनाव में किसी उम्मीदवार को नहीं खड़ा करना चाहिए था। परंतु अपना उम्मीदवार उतार कर भाजपा ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है। 
 

राहुल गांधी का गुजरात में ‘भारत जोड़ो यात्रा’ न निकालना भी एक ग़लत निर्णय था। परंतु यदि वे सोच लेते कि उन्हें गुजरात में मोदी-शाह की जोड़ी को ध्वस्त करना है तो उन्हें केजरीवाल के साथ कुछ सीटों पर समझौता कर लेना चाहिए था। उनका ऐसा न करना भाजपा के फ़ायदे में रहा। जो भी हो कांग्रेस अध्यक्ष मल्लीकार्जून खड़गे तो अभी से चुनावी मोड में आ चुके हैं। उन्होंने आगामी विधान सभा चुनावों की रणनीति तय करने के लिए पदाधिकारियों की बैठकें बुलानी शुरू कर दी है। शायद उन्हें इस बात का विश्वास है कि हिमाचल की जीत को अन्य राज्यों में दोहराया जा सकता है।    
 

चुनाव के बाद तमाम टीवी चर्चाओं में राजनैतिक विश्लेषक इस बात पर ख़ास ज़ोर दे रहे हैं कि विपक्षी दलों को आपस में एकजुट हो कर चुनावी मैदान में उतरना चाहिये था। जो भी क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में एक मज़बूत स्थिति में हैं उन्हें 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले जानता के बीच अभी से प्रचार करना चाहिए। इसके साथ ही उन्हें उन दलों का सहयोग भी करना चाहिए जहां दूसरे दल मज़बूत हैं। विपक्षी दल यदि एक दूसरे के वोट नहीं काटेंगे तो उनकी एकता के चक्रव्यूह को भेदना भाजपा या किसी अन्य बड़े दल के लिए मुश्किल होगा। ऐसा केवल तभी हो सकता है जब सभी विपक्षी दल एकजुट हो जाएँ एक आम सहमति पर पहुँच कर चुनाव लड़ें। सफल लोकतंत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष का मज़बूत होना ज़रूरी है। विपक्ष मज़बूत तभी होगा जब एकजुट होगा। 

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2022

चेक बाउंस मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला


देश की सर्वोच्च अदालत ने चेक बाउंस के एक मामले की सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। इस फ़ैसले से देश भर की अदालतों में लंबित पड़े 33 लाख मामलों पर प्रभाव पड़ेगा। इसके साथ ही चेक बाउंस के नाजायज़ केसों में भी कटौती हो सकेगी। 
 
दुनिया के कई देशों की तरह हमारे देश में भी चेक बाउंस होना एक अपराध माना जाता है। नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट, 1881 के मुताबिक चेक बाउंस होने की स्थिति में चेक जारी करने वाले व्यक्ति पर मुकदमा चलाया जा सकता है। क़ानून के मुताबिक़ उसे 2 साल तक की जेल या चेक में भरी राशि का दोगुना जुर्माना या दोनों लगाया जा सकता है। 
 
मुख्य न्यायाधीश का पदभार सँभालने से कुछ हफ़्ते पहले, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने अपनी सहयोगी जज जस्टिस हिमा कोहली के साथ एक खंडपीठ में अक्तूबर 2022 को दिये इस फ़ैसले में इस क़ानून की एक धारा के सही उपयोग को स्पष्ट किया है। कोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति ने जितनी राशि का चेक जारी किया है, यदि उसमें से उसे कुछ रुपया लौटा दिया गया है तो नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत उस पर मामला नहीं चल सकता।
 

कोर्ट का यह फ़ैसला गुजरात हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर दशरथभाई त्रिकमभाई पटेल की अपील पर आया। गुजरात के व्यापारी हितेश महेंद्रभाई पटेल ने अपने ही रिश्तेदार दशरथभाई से जनवरी, 2012 में 20 लाख रुपये उधार लिए थे। इसकी गारंटी के तौर पर हितेश ने दशरथभाई को समान राशि का एक चेक भी दिया था। परंतु बैंक में भुनाने के लिए जमा करने पर वह चेक बाउंस हो गया। ग़ौरतलब है कि, चेक को बैंक में जमा करने की तारीख़ से पहले ही हितेश ने उधार की रकम का कुछ हिस्सा लौटा दिया था। हितेश पर चेक बाउंस का केस दर्ज हुआ। मामले की सुनवाई करते हुए न सिर्फ़ निचली अदालत बल्कि हाई कोर्ट ने भी कहा कि हितेश के खिलाफ चेक बाउंस का कोई वाद नहीं बनता है।
 

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों का विस्तार से विश्लेषण करने के बाद कहा, ‘‘इसकी धारा 138 के तहत चेक बाउंस को आपराधिक कृत्य मानने के लिए यह जरूरी है कि बाउंस हुआ चेक पेश किए जाते समय एक वैध प्रवर्तनीय ऋण का प्रतिनिधित्व करे। यदि परिस्थिति में कोई सामग्री परिवर्तन हुआ है जैसे कि राशि में चेक परिपक्वता या नकदीकरण के समय कानूनी रूप से लागू करने योग्य ऋण का प्रतिनिधित्व नहीं करता है, तो धारा 138 के तहत अपराध नहीं बनता है।’’ आम भाषा में कहें तो गारंटी चेक पर लिखी राशि यदि बकाया राशि से अधिक है तो यदि वो चेक बाउंस होता है तो चेक जारी करने वाले पर चेक बाउंस का मुक़दमा नहीं चल सकता। 
 
कोर्ट ने यह भी कहा कि, “जब ऋण का आंशिक भुगतान चेक के आहरण के बाद लेकिन चेक को भुनाने से पहले किया जाता है, ऐसे भुगतान को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 56 के तहत चेक पर पृष्ठांकित किया जाना चाहिए। आंशिक भुगतान को रिकॉर्ड किए बिना चेक को नकदीकरण के लिए प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। यदि बिना समर्थन वाला चेक प्रस्तुत करने पर बाउंस हो जाता है, तो धारा 138 एनआई अधिनियम के तहत अपराध को आकर्षित नहीं किया जाएगा क्योंकि चेक नकदीकरण के समय कानूनी रूप से लागू करने योग्य ऋण का प्रतिनिधित्व नहीं करता है।” आदेश के अनुसार यदि आप गारंटी के चेक को बैंक में जमा कराते हैं तो उस चेक के पीछे आपको अनुमोदन करना होगा कि चेक पर लिखी राशि में से आपको आंशिक भुगतान हो चुका है। जारी किया हुआ चेक केवल बकाया राशि के लिये ही मान्य होगा।   
 

देश भर के व्यापारियों में ऐसा आए दिन देखा जाता है कि एक व्यापारी दूसरे से अनुकूल ऋण या ‘फ़्रेंडली लोन’ लेते हैं। प्रायः ये लोन नक़द में ही किया जाता है, जिसकी एवज़ में उसी मात्रा का चेक, गारंटी के तौर पर दे दिया जाता है। लोन वापस करने पर या तो वो चेक फाड़ दिया जाता है या लौटा दिया जाता है। चूँकि ये लेन-देन नक़दी रूप में होता है इसलिए बैंक में चेक डालने की नौबत ज़्यादातर मामलों में नहीं आती। चेक जमा करने का मतलब, पैसा वापस लेने वाले और देने वाले दोनों को ही अपनी किताबों में इसे दर्ज करना पड़ेगा। 
 
परंतु कुछ लोग, जिनकी पैसा लौटाने की नियत नहीं होती, वो लेनदार को किसी न किसी बहाने से टालते रहते हैं। ऐसे लोग हमेशा अपनी बदहाली का रोना तो रोते हैं परंतु असलियत में उतने बदहाल नहीं होते। लोन देने वाले को जैसे ही उन पर शक हो जाता है, वो गारंटी के चेक को बैंक में जमा कर देता है। यदि उसकी क़िस्मत अच्छी होती है तो चेक पास हो जाता है। यदि चेक बाउंस हो जाता है तो मामला कोर्ट में जाता है। फिर लोन देने वाले को पैसा जल्दी मिलेगा या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं होती।
 
ऐसा नहीं है कि केवल लोन लेने वाले की ही नीयत में खोट होता है। अक्सर यह भी देखा गया है कि लोन देने वाले, लालच के चलते लोन की राशि वापिस मिलने के बावजूद चेक को जमा करा देते हैं। ऐसे में अक्सर यह देखा गया है कि चेक बाउंस का केस कोर्ट में ने जाए, इसलिये दो पक्ष किसी न किसी समझौते पर आ जाते हैं। यहाँ लोन देने वाले के लालच का मक़सद पूरा हो जाता है। परंतु कुछ मामलों में पैसा लौटाने वाला, जो गारंटी का चेक देता है, उस पर सही साइन नहीं करता। ऐसे में चेक बाउंस होना तो तय है। फिर वो लेनदार पर जालसाज़ी का आरोप भी लगा सकता है। ऐसे में लोन लेने वाले का पलड़ा भारी हो जाता है। 
 
सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से एक ओर जहां देश के व्यापारी जगत को काफ़ी राहत मिली है। वहीं दूसरी ओर इस क़ानून की धाराओं का भी स्पष्टीकरण हुआ है। इस फ़ैसले से देश भर में लंबित पड़े चेक बाउंस के मामलों में से कुछ को अब जल्दी सुलझाया जा सकेगा।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

पेन किलर के दुष्प्रभाव से बचें


‘इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना’। मिर्ज़ा ग़ालिब के चर्चित शेरों में से यह एक ऐसा शेर है जो हमें दर्द सहने की नसीहत देता है। परंतु आजकल के भाग-दौड़ भरे दौर में हमारे शरीर में दर्द सहने की शक्ति कम होती जा रही है। हम किसी भी उम्र के क्यों न हों, ज़रा सी दर्द को भगाने के लिए ‘पेन किलर’ के बिना नहीं चल सकते। पर क्या हम इन रंग बिरंगी गोलियों के दुष्प्रभाव से वाक़िफ़ हैं?

आमतौर पर हम सिरदर्द जैसी छोटी सी पीड़ा पर, पेट या बदन दर्द पर तुरंत पेन किलर ले लेते हैं। बिना इस बात का ख़्याल हुए कि इन गोलियों का हमारे शरीर पर क्या असर पड़ेगा। हमारी ज़रा सी लापरवाही, इन दवाओं को जीवन भर का दर्द बना सकती हैं। जबकि पेट दर्द, सिर दर्द और बदन दर्द के लिए नानी-दादी के बताए ऐसे हज़ारों घरेलू नुस्ख़े हैं जिनसे तुरंत आराम मिल सकता है। परंतु मार्केटिंग के युग में हर चीज़ को इस ढंग से बेचा जाता है कि वो हमारी ज़रूरत बन जाती है। चर्चित कलाकार हों या मशहूर खिलाड़ी, उनको पर्दे पर दिखा कर दवा कंपनियाँ हमें इन पेन किलर के जाल में फँसा ही लेती हैं।


दर्द से झटपट छुटकारा पाने के लिए, बिना डाक्टर की प्रिस्क्रिप्शन मिलने वाली दवाएं 'ओवर द काउंटर ड्रग्स' (ओटीसी) के नाम से जानी जाती हैं। इन रंग बिरंगी दवाओं की हल्की डोज से आपको आराम भले ही मिल जाता हो, लेकिन इनका साइड एफेक्ट जाने बिना इनका सेवन करना घातक हो सकता है। लंबे समय तक पेन किलर को बिना सोचे-समझे या बिना डॉक्टरी सलाह के लेने से किडनी खराब होने तक का खतरा हो सकता है।

आज कल के तनावपूर्ण माहौल में युवा पीढ़ी कई बार थकान मिटाने और दर्द से आराम के लिए पेन किलर के इतने आदी हो जाते हैं कि ये दवाएं उनके दिनचर्या का हिस्सा बन जाती हैं और इनकी लत लग जाती है। बिना दर्द के और लंबे समय तक इनके इस्तेमाल से न सिर्फ़ किडनी बल्कि लिवर ख़राब होने के साथ-साथ हमारे शरीर में डिप्रेशन जैसी कई मानसिक समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।

अक्सर देखा गया है कि तेज़ दर्द से जल्द आराम लेने की होड़ में हम एक से अधिक पेन किलर ले लेते हैं। डाक्टरों के अनुसार ऐसा कभी भी नहीं करना चाहिए। आमतौर पर एक पेन किलर अपना असर 15-30 मिनट में दिखाती है। यदि हम जल्दबाज़ी में एक से अधिक पेन किलर ले लेते हैं तो इनके साइड इफ़ेक्ट का ख़तरा बढ़ जाता है। डाक्टरों के अनुसार पेन किलर के ओवर डोज़ से आंतरिक रक्तस्राव या ‘इन्टरनल ब्लीडिंग’ हो सकती है। इतना ही नहीं पेन किलर के ओवर डोज़ से दिल का दौरा भी पड़ सकता है।

दवा कंपनियाँ अपनी दवा को लोकप्रिय बनाने कि नियत से डाक्टरों को लुभावने ऑफर देती हैं। इसी लालच में आकर प्रायः कुछ डाक्टर इन्हें मरीज़ों को लिख कर दे देते हैं। दर्द में आराम आने पर मरीज़ों को इनकी आदत पड़ जाती है। जहां  एक या दो मरीज़ों को दवा से आराम मिलना शुरू हुआ वहीं दवा का नाम चलन में आ जाता है। इस पैंतरे से दवा कंपनी पेन किलर के बाज़ार में अपनी जगह आसानी से बना लेती है। डाक्टरों की माने तो पेन किलर के हल्के डोज़ को तेज दर्द में राहत के लिए तो ले सकते हैं परंतु इन पर निर्भर होना काफ़ी खतरनाक हो सकता है।

एक शोध के अनुसार पेन किलर के साइड इफ़ेक्ट की एक लंबी सूची है। यह हर रोगी और उसके दर्द पर निर्भर करती है।  इनमें अहम साइड इफ़ेक्ट हैं कॉन्सटपिशन या लूज मोशन्स, पेट में अल्सर या ब्लीडिंग, गैस्ट्रो-इन्टेस्टाइनिल समस्याएं, अनिद्रा व ध्यान न लगना जैसी मानसिक स्मस्याएं, त्वचा पर चकत्ते और खुजली या जलन, श्वास संबंधी दिक्कतें आदि। इसलिए केवल दवा कंपनी के प्रचार, दवा बेचने वाले दुकानदार और मिलने वालों की आम चर्चा से नहीं बल्कि सही डाक्टरी सलाह के बाद ही सही पेन किलर लें।

शोध यह भी बताते हैं कि पेन किलर लेने पर शरीर में पानी की कमी भी हो सकती है। इसलिए जब भी पेन किलर लेने की सलाह मिले तो पानी पीते रहें। अच्छी मात्रा में पानी पीने से पेन किलर के विषालु प्रदार्थ या टॉक्सिन का असर कम हो जाता है। जिस कारण इनके साइड इफ़ेक्ट की आशंका भी कम हो जाती है।

आम भाषा में मरीज़ के उपचार करने वाले ‘दवा-दारू’ जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। परंतु पेन किलर के संबंध में दवा और दारू एक दूसरे के दुश्मन हैं। यदि आपको डाक्टर की सलाह पर पेन किलर लेनी पड़ती है तो ऐसे में मदिरा सेवन न करें। ऐसा करने से आप हार्ट अटैक या स्ट्रोक के शिकार भी हो सकते हैं। पेन किलर दवा और शराब, दोनों ही एसिडिटी बढ़ाते हैं। आप ख़ुद ही अंदाज़ा लगा सकते हैं कि हमारे शरीर पर इन दोनों का प्रभाव कितना बुरा हो सकता है।

आज के इंटरनेट के युग में आप पेन किलर लेने से पहले इनके दुष्प्रभावों के बारे में अवश्य पढ़ें। सही डाक्टर से सलाह करने के बाद ही ज़रूरत के अनुसार ही सही दवा का सेवन करें और स्वस्थ रहें। दवा कंपनी के प्रचार का शिकार बने बिना आप जेनेरिक दवा या होमियोपैथिक दावा का सेवन भी कर सकते हैं। किसी भी तरह के दर्द से राहत के लिए एलोपैथिक दवाओं के मुक़ाबले होमियोपैथिक दवाओं का असर बहुत अच्छा होता है और इनका कोई साइड इफ़ेक्ट भी नहीं होता। यहाँ तक कि सर्जिकल ऑपरेशन के बाद भी ये दवाएँ दर्द से राहत देती हैं। ये वैकल्पिक दवाएँ आपकी जेब पर भी भारी नहीं पड़तीं। मगर इन विकल्पों का उपयोग भी होमियोपैथिक डाक्टर की सलाह पर ही करें। जहां तक हो सके एलोपैथिक दवाओं के आदि न बनें और इनके दुष्प्रभाव से बचें।