शुक्रवार, 29 मई 2026

क्या वीआईपी अपराधियों के लिए जेल होटल बनते जा रहे हैं ?

भारत में कानून की समानता का सिद्धांत संविधान का मूल आधार है। अनुच्छेद 14 कहता है कि कानून के समक्ष सब समान हैं। लेकिन वास्तविकता अक्सर इसके उलट दिखती है। बलात्कार और हत्या के मामलों में सज़ा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह का मामला इसका स्पष्ट उदाहरण है। रोहतक की सुनारिया जेल, जहां वे बंद हैं, उनके लिए लगभग होटल जैसी सुविधाओं का केंद्र बन गई है, जबकि आम कैदी कठिन परिस्थितियों में सजा काटते हैं।

उल्लेखनीय है कि 2017 में दो साध्वियों के साथ बलात्कार के मामले में 20 वर्ष की सजा पाने के बाद राम रहीम रोहतक जेल में बंद हैं। बाद में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति और रंजीत सिंह हत्याकांड में आजीवन कारावास भी मिला। जेल में उनके लिए विशेष सेल, बोतलबंद पानी, सहायक कर्मी और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। एक पूर्व कैदी ने आरोप लगाया था कि राम रहीम को अन्य कैदियों से ज्यादा समय मुलाकात के लिए मिलता है। जबकि सामान्य कैदियों को मात्र 20 मिनट मिलते हैं, वहीं राम रहीम को घंटों की छूट दी जाती रही।


जेल प्रशासन ने इन आरोपों से इनकार किया, लेकिन राम रहीम को बार-बार मिलने वाली पैरोल और फरलो ने संदेह बढ़ाया है। रोहतक जेल में उनका रहना आम कैदियों के लिए कठिनाइयों के बीच विपरीत तस्वीर पेश करता है। जहां सामान्य कैदी भीड़भाड़, सीमित संसाधनों और सख्त नियमों में रहते हैं, वहीं राम रहीम को लगातार रिहाई और आरामदायक व्यवस्था मिलती रही। यह स्थिति जेल को उनके लिए होटल सरीखा बना देती है, जहां सजा का असर न के बराबर दिखता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि पैरोल का सिलसिला कानून है या विशेषाधिकार? हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स एक्ट के तहत कैदियों को पैरोल और फरलो का प्रावधान है। इस कानून के अनुसार, एक साल की सजा पूरी करने के बाद कोई भी कैदी प्रति वर्ष 10 सप्ताह की पैरोल और 21 दिन की फरलो का हकदार है। फरलो को कैदी का अधिकार माना जाता है, जो सामाजिक और पारिवारिक संबंध बनाए रखने के लिए दी जाती है, जबकि पैरोल के लिए विशिष्ट कारणों की आवश्यकता होती है। लेकिन राम रहीम के मामले में इसका दुरुपयोग स्पष्ट दिखता है। 2020 से 2026 तक उन्हें 16 बार से ज्यादा पैरोल/फरलो मिल चुकी है। कुल मिलाकर 430 से अधिक दिन वे जेल से बाहर रहे। मई 2026 में मिली 30 दिन की पैरोल पर वे जेल से बाहर निकले और सिरसा डेरे पहुंचे। यह उनकी 2026 की दूसरी पैरोल थी। कथित तौर पर ये रिहाइयां अक्सर बिना किसी ठोस कारण के दी गई हैं। क्योंकि ये रिहाइयां अक्सर चुनावों, धार्मिक कार्यक्रमों या त्योहारों के आसपास दी गईं। 2022 पंजाब, 2023 राजस्थान, 2024 हरियाणा चुनावों से पहले भी ऐसी छूट मिली। डेरे के लाखों अनुयायी एक बड़ा वोट बैंक हैं, जिसका राजनीतिक फायदा उठाने के आरोप लगते रहे।


बलात्कार और हत्या के अपराधी राम रहीम की बार-बार रिहाई पीड़ित परिवारों के लिए अपमानजनक है। 2017 में सजा के बाद हुए दंगे में 40 लोगों की मौत हुई थी। गवाहों पर दबाव पड़ने की आशंका बनी रहती है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति समेत कई संगठन इन पैरोलों की निंदा करते हैं। पत्रकार अंशुल छत्रपति ने इसे “कानून का मजाक” बताया। आम कैदियों के लिए पैरोल मिलना मुश्किल होता है। हरियाणा के आंकड़ों के अनुसार, जेलों में हजारों कैदी हैं, लेकिन सीमित संख्या को ही ऐसी छूट मिलती है। ऐसे में ये कहना ग़लत नहीं होगा कि राम रहीम को मिलने वाली लगातार रिहाइयां अन्य कैदियों में असंतोष पैदा करती हैं। 

गौरतलब है कि रोहतक की सुनारिया जेल सामान्य रूप से क्षमता से अधिक भरी रहती है। कैदियों को बुनियादी सुविधाएं भी मुश्किल से मिलती हैं। लेकिन राम रहीम के लिए यहां विशेष इंतजाम किए जाते रहे। आरामदायक रहन-सहन, बेहतर भोजन और लगातार बाहर जाने की छूट। यह जेल उनके लिए सजा की जगह आरामगाह बन गई है। एक तरफ़ तो जेल सुधार की बातें होती रहती हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर उच्च प्रभाव वाले कैदियों को मिलने वाली सुविधाएं व्यवस्था की कमजोरी उजागर करती हैं। जहां गरीब या सामान्य अपराधी सालों जेल में सड़ते हैं, वहीं प्रभावशाली व्यक्ति यहाँ एक लक्ज़री होटल जैसी जिंदगी जीते दिखते हैं। 

सवाल उठता है कि इस का क्या समाधान संभव है? पैरोल और फरलो जैसे प्रावधानों का उद्देश्य पुनर्वास है, न कि दुरुपयोग। इसलिए पुलिस प्रशासन व सरकार को इनमें पारदर्शिता लानी चाहिए। जैसे कि, रिहाई के फैसले स्वतंत्र समिति से करवाए जाएं। चुनाव के समय पैरोल पर रोक लगे। सभी कैदियों के लिए समान नियम लागू हों। जेलों में सीसीटीवी और मैन्युअल निगरानी की सख्ती बढ़े। 

गुरमीत राम रहिम के मामले में हरियाणा सरकार को ख़ुद पर लगे आरोपों का जवाब देना चाहिए। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति और अन्य संगठनों की आलोचना को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। गुरमीत राम रहीम जैसे प्रभावशाली अपराधियों को मिलने वाले ऐशो-आराम का मामला सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल है। रोहतक जेल अगर एक कैदी के लिए होटल बन जाती है, तो कानून की गरिमा कहां रह जाती है? पैरोल का प्रावधान सभी के लिए समान होना चाहिए, न कि चुनिंदा प्रभावशालियों के लिए विशेषाधिकार। समाज को इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठानी होगी। ताकि कानून वाकई सबके लिए समान हो। राम रहीम की लगातार रिहाइयां न केवल पीड़ितों का अपमान हैं, बल्कि पूरे न्याय तंत्र पर सवालिया निशान लगाती हैं। जेल सजा की जगह होनी चाहिए, न कि आराम की।
*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 22 मई 2026

वर्तमान शिक्षा प्रणाली: एक जाल जिससे मुक्ति आवश्यक है!

सभी जानते हैं कि शिक्षा को ज्ञान का दीपक माना जाता है। लेकिन आज के युग में वास्तविकता यह है कि हमारी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था एक ऐसा जाल बन गई है जिसमें लाखों-करोड़ों युवा फंस रहे हैं। यह प्रणाली न तो सच्चे कौशल विकसित करती है और न ही नवाचार को प्रोत्साहित करती है। बल्कि यह छात्रों को एक सांचे में ढालकर औसत जीवन की ओर धकेल रही है। बदलाव की मांग अब न केवल जरूरी बल्कि अनिवार्य बन चुकी है। तो ऐसा क्या किया जाए कि देश की युवा पीढ़ी शिक्षित भी बनें और अपने पसंद के क्षेत्र में निपुण भी बनें।

सफल उद्यमियों की कहानियां गवाह हैं कि बड़ी कंपनियों के संस्थापकों ने अक्सर पारंपरिक शिक्षा के इस जाल से खुद को बचाया। उनकी सफलता का राज रट्टा मारने या परीक्षा में अंक लाने में नहीं, बल्कि व्यावहारिक सोच, जोखिम लेने की क्षमता और निरंतर सीखने में छिपा है। इसके विपरीत, हमारी शिक्षा प्रणाली अमीर और गरीब के बीच खाई को और चौड़ा कर रही है। अमीर बच्चे बेहतर संसाधनों और अतिरिक्त कोचिंग के साथ आगे बढ़ते हैं, जबकि गरीब परिवार के बच्चे सीमित अवसरों में संघर्ष करते रह जाते हैं। 


शिक्षा की इस व्यवस्था में रचनात्मकता को कुचला जा रहा है। उदाहरण के लिए अधिकतर कक्षाओं में बच्चों को सरल दृश्य बनाने या मानकीकृत उत्तर लिखने को कहा जाता है, न कि स्वतंत्र सोच विकसित करने को। परिणामस्वरूप, वे किसी बड़े कारखाने की असेंबली लाइन से निकलने वाले उत्पादों की तरह एक जैसे बन जाते हैं। ‘तारे ज़मीन पर’ और ‘थ्री इडियट्स’ जैसी फिल्में भले ही सफलता से बेहतर उत्कृष्टता का संदेश देती हों, लेकिन समाज और परिवार अभी भी प्रतिशत और रैंकिंग की दौड़ में बच्चों को धकेल रहे हैं। ऐसे में जीवन को ‘दौड़’ बताकर तनाव बढ़ाया जा रहा है, जबकि वास्तव में हर बच्चे की अपनी गति और प्रतिभा होती है, जिस पर कोई ध्यान ही नहीं देता। 


तकनीकी प्रगति की तुलना करें तो स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और एआई जैसे क्षेत्रों में दुनिया तेजी से बदल रही है, लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ कर कक्षाएं अभी भी सौ साल पुरानी शैली में चल रही हैं। बोर्ड, चॉक और रट्टा-आधारित पढ़ाई छात्रों को भविष्य के लिए तैयार नहीं कर पा रही। अल्बर्ट आइंस्टीन का प्रसिद्ध उदाहरण यहां पूरी तरह लागू होता है, मछली को पेड़ पर चढ़ने की परीक्षा देकर उसकी बुद्धिमत्ता का आकलन करना अन्याय है। हर बच्चे की प्रतिभा अलग-अलग क्षेत्र में होती है, लेकिन एक आकार-एक फिट वाली प्रणाली इसे नजरअंदाज कर देती है।

उल्लेखनीय है कि इस व्यवस्था की जड़ें ब्रिटिश काल से जुड़ी हैं, जब 1835 में एक नीति बनाई गई जिसका उद्देश्य सच्चा सशक्तिकरण नहीं बल्कि आज्ञाकारी नागरिक तैयार करना था। आज भी स्कूल और कॉलेज उन पूर्वनिर्धारित भूमिकाओं के लिए ग्रेजुएट तैयार कर रहे हैं, न कि नवप्रवर्तक या नेता। ग्रेडिंग सिस्टम बुद्धिमत्ता को केवल परीक्षा अंकों तक सीमित कर देता है, जबकि संचार, समझौता कौशल और समस्या-समाधान जैसे जीवन-महत्वपूर्ण गुणों की उपेक्षा की जाती है।


ऐसे में इन सब के परिणाम भयावह हैं। स्नातकों में से आधे से अधिक नौकरी के योग्य नहीं पाए जाते। कॉर्पोरेट जगत में प्रवेश के बाद संचार की कमी, सकारात्मक दृष्टिकोण की कमी और निरंतर सीखने की इच्छा की कमी उजागर हो जाती है। जर्मनी जैसी देशों में दोहरी शिक्षा प्रणाली है, जहां सैद्धांतिक ज्ञान के साथ व्यावहारिक अनुभव जुड़ा होता है। लेकिन हमारे यहां छात्र स्नातक होने तक केवल किताबी ज्ञान पर ही निर्भर रहते हैं। नतीजा: अच्छे अंक लाने वाले छात्र भी बेरोजगारी का शिकार हो जाते हैं। 

आपको याद होगा जब 2025 में राजस्थान के चपरासी/चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के 53,000 पदों की भर्ती के लिए करीब 25 लाख युवाओं ने आवेदन किया था। इनमें से लगभग 85% से 90% उम्मीदवार उच्च शिक्षित (ग्रेजुएट, पोस्ट-ग्रेजुएट, बीटेक और पीएचडी) थे। इस जाल का सबसे दर्दनाक पहलू मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव है। नौकरी न मिलने की निराशा से हर साल हजारों छात्र आत्महत्या कर लेते हैं या गुनाह का रास्ता अपना लेते हैं। आईआईटी जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में दाखिला पाने की होड़ में व्यक्तिगत रुचि और क्षमता को नजरअंदाज किया जाता है, जिससे जलन और हताशा बढ़ती है। ऐसा कहना ग़लत नहीं होगा कि, शिक्षा डिग्री-केंद्रित हो गई है, कौशल-केंद्रित नहीं। 

इसलिए समय आ गया है कि हम डिग्री से कौशल की ओर मुड़ें। रट्टा मारने की बजाय अवधारणात्मक समझ, व्यावहारिक उदाहरण और समस्या-समाधान पर जोर दिया जाए। वित्तीय शिक्षा अनिवार्य हो। बच्चों को एसेट-लायबिलिटी का अंतर, मुद्रास्फीति से लड़ना, निवेश बनाम खर्च और जल्दी बचत करने का महत्व सिखाया जाए। स्कूलों में कोडिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल मार्केटिंग और आर्थिक मामलों जैसे भविष्योन्मुखी विषयों को भी शामिल किया जाए। 

इसके साथ ही बिजनेस सिमुलेशन प्रोजेक्ट्स शुरू किए जाएं ताकि बच्चे नौकरी मांगने वाले नहीं बल्कि नौकरियां पैदा करने वाले बनें। जोखिम लेने की क्षमता विकसित करने के लिए गणना-आधारित प्रयोगों को प्रोत्साहन मिले। हमारे शिक्षक इस व्यवस्था की रीढ़ हैं, इसलिए उनका नियमित प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरणों से लैस होना और प्रदर्शन-आधारित मूल्यांकन जरूरी है। प्रेरित शिक्षक सैकड़ों जीवन बदल सकते हैं। 

आज के भाग-दौड़ भरे युग में मानसिक स्वास्थ्य और जीवन कौशल भी शिक्षा का हिस्सा बनें। बच्चे एक ओर गणित सीखते हैं, लेकिन तनाव प्रबंधन नहीं। समय प्रबंधन, नागरिकता भावना, संचार कौशल सातवीं कक्षा से अनिवार्य हों। संचार की मजबूती ही समाज में सम्मान या अपमान तय करती है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, रचनात्मकता और स्वतंत्र सोच विकसित करना होना चाहिए। प्राचीन भारतीय गुरुकुल प्रणाली में हर छात्र की व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार शिक्षा दी जाती थी। उसी पद्धति को आधुनिक संदर्भ में अपनाने की जरूरत है। 

वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने लाखों युवाओं को औसत जीवन की ओर धकेला है। लेकिन जागरूकता और सुधार से हम इस जाल से बाहर निकल सकते हैं। सरकार, शिक्षाविद्, अभिभावक और समाज को मिलकर काम करना होगा। तभी हमारा युवा वर्ग न केवल आत्मनिर्भर बनेगा बल्कि राष्ट्र-निर्माण में योगदान देगा। बदलाव अब विलंब सहन नहीं कर सकता। सभी को मिलकर ऐसा करना होगा कि शिक्षा ज्ञान का स्रोत बने, न कि जाल।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 15 मई 2026

सोने पर सरकारी नजर: वरदान या नियंत्रण का जाल?


जब से प्रधान मंत्री ने देशवासियों को सोना न खरीदने की अपील की है सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। उनमें से एक वीडियो पोस्ट काफ़ी वायरल हो रहा है, जिसमें सरकार की सोने से जुड़ी नई नीति पर गहरी चिंता जताई गई है। पोस्ट में कहा गया है कि सरकार अब आम घरों में पड़े सोने को वित्तीय संपत्ति बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। आयात के दबाव, रुपए पर तनाव और ई-गोल्ड को बढ़ावा देने के नाम पर यह कदम उठाया जा रहा है। वीडियो में स्पष्ट किया गया कि सोना अब सिर्फ जेवर या निवेश नहीं, बल्कि एक ‘पावर’ है। पर जब यह डिजिटल हो जाएगा तो नियंत्रण किसके हाथ में होगा? आपके, बैंक के या सिस्टम के? यह सवाल आज हर आम आदमी को सोचने पर मजबूर कर रहा है।


वीडियो में सरकार की तर्कसंगतता को भी समझाया गया है। भारत में घरों, लॉकरों, जेवरों और सिक्कों के रूप में भारी मात्रा में सोना पड़ा हुआ है, लेकिन यह अर्थव्यवस्था में घूमता नहीं है। न बैंक इसका इस्तेमाल कर पाते हैं, न जेवराती। हर साल देश को नया सोना आयात करना पड़ता है, जिसके लिए डॉलर खर्च होते हैं और आयात बिल बढ़ता है। सरकार का तर्क है कि यदि यह निष्क्रिय सोना सिस्टम में आ जाए, तो आयात कम होगा, अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। इसके लिए ई-गोल्ड यूनिट्स या गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें आप भौतिक सोना जमा करेंगे, डिजिटल यूनिट्स लेंगे, ब्याज कमाएंगे और लॉकर चार्ज बचाएंगे। वीडियो में सोने की शुद्धता जांच, बार-कॉइन-जेवर स्वीकार करने और रिनॉउन्ड रिफाइनर से टाई-अप जैसी सुविधाओं का जिक्र भी है।


लेकिन वीडियो सिर्फ सरकारी तर्क पर नहीं रुकता। यह चेतावनी देता है के कैश को ‘यूपीआई’ से डिजिटल बनाने, कागज़ी शेयरों को डीमैट में लाने के बाद अब सोने की बारी है। भौतिक सोना, जो लॉकर में ‘अदृश्य’ और ‘निजी' था, अब पंजीकृत, ‘ट्रैकेबल’ और नियमों के दायरे में आ जाएगा। वीडियो में ‘सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड’ का भी उदाहरण दिया गया है, जहां 1 लाख का निवेश 4.86 लाख हो गया, लेकिन अब फोकस घरेलू सोने पर है। सवाल उठाया गया है कि क्या यह सिर्फ आयात कम करने की रणनीति है या सिस्टम में पूर्ण नियंत्रण का खेल? 


यह पोस्ट आम आदमी की चिंताओं को छूता है। सोना भारतीय संस्कृति में सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि सुरक्षा, विवाह और आपातकालीन फंड माना जाता है। महिलाओं के मंगलसूत्र से लेकर परिवार की पीढ़ी-दर-पीढ़ी की जमा पूंजी तक, यह भावनात्मक और आर्थिक रूप से जुड़ा है। वीडियो के संदेश को देखते हुए लगता है कि डिजिटल सोना बनने पर न सिर्फ रूप बदलेगा, बल्कि नियंत्रण, दृश्यता और भविष्य के नियम भी बदल जाएंगे।


इस पोस्ट पर आए कमेंट्स इस चिंता को और गहरा करते हैं। एक यूजर ने लिखा, “बड़े-बड़े उद्योगपतियों का जेवर ले लो, आम जनता को बक्श दो।” दूसरे ने कहा, “डिजिटल इंडिया मतलब गुलामी, फंडामेंटल राइट्स खोना।” कई कमेंट्स में डर जताया गया कि सरकार महिलाओं के मंगलसूत्र तक पर नजर रखेगी। एक ने चेतावनी दी, “बैंक डूब गया तो क्या देंगे? फिजिकल गोल्ड ही अच्छा।” कुछ यूजर्स ने इसे ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ या ‘ग्लोबलिस्ट एजेंडे’ से जोड़कर देखा, जहां सोना रजिस्टर कराने के बाद आम आदमी सड़क पर आ जाएगा। कुल मिलाकर, कमेंट सेक्शन सरकार पर अविश्वास, डिजिटल नियंत्रण के भय और व्यक्तिगत स्वायत्तता खोने की भावना से भरा पड़ा है। लोग याद दिला रहे हैं कि कैश और शेयरों की तरह सोना भी ‘ट्रैकेबल’ हो गया तो निजी संपत्ति पर सिस्टम की पकड़ मजबूत हो जाएगी।


अब सवाल यह है कि यह नीति आम आदमी को कितना फायदा पहुंचाएगी? फायदों की बात करें तो यह निश्चित रूप से कुछ वर्गों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है। जो लोग अपना सोना लॉकर में बेकार पड़ा रखते हैं, उन्हें ब्याज कमाने का मौका मिलेगा। लॉकर चार्ज बचेंगे, सोने की शुद्धता की जांच होगी और जरूरत पड़ने पर इसे आसानी से लिक्विड किया जा सकेगा। अर्थव्यवस्था के स्तर पर आयात बिल कम होने से रुपया मजबूत होगा, महंगाई पर काबू रहेगा और विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित होगा। अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी को फायदा पहुंचेगा। यानी कि स्थिर अर्थव्यवस्था, बेहतर रोजगार और कम आयात निर्भरता। छोटे किसान, मध्यम वर्गीय परिवार या महिलाएं, जो सोने को सुरक्षित निवेश मानती हैं, बिना बेचे ब्याज कमा सकेंगी। गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम में शुद्धता जांच की सुविधा भी जेवरातों की विश्वसनीयता बढ़ाएगी।

लेकिन नुकसान भी कम नहीं। सबसे बड़ा खतरा नियंत्रण का है। भौतिक सोना परिवार की स्वतंत्र संपत्ति है। डिजिटल होने पर बैंक या सरकार के पास डेटा होगा। कर चोरी, ब्लैक मनी या आपात स्थिति में सरकार इसका इस्तेमाल कर सकती है। विगत में नोटबंदी और अन्य नीतियों के अनुभव ने लोगों में अविश्वास पैदा कर दिया है। यदि बैंक संकट आए या सिस्टम फेल हो जाए तो क्या होगा? कई कमेंट्स में यही डर व्यक्त किया गया। सांस्कृतिक रूप से सोना ‘निजी’ है, विवाह, त्योहार या आपात में इसे बेचने या गिरवी रखने का फैसला परिवार का होता है। डिजिटल सिस्टम में यह फैसला नियमों से बंध जाएगा। मध्यम और निचले वर्ग के लिए, जो सोने को मुद्रास्फीति रोधी बचाव मानते हैं, यह जोखिम भरा हो सकता है।

आम आदमी के लिए फायदा तभी होगा जब इस स्कीम में पारदर्शिता, वैकल्पिक विकल्प और विश्वास का माहौल बने। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई जबरदस्ती न हो, डेटा प्राइवेसी सुरक्षित रहे और निकासी आसान हो। यदि स्कीम वैकल्पिक रहे और लोग अपनी मर्जी से जुड़ें, तो यह वरदान साबित हो सकती है। लेकिन यदि इसे ‘सिस्टम का गेम’ बनाया गया तो अविश्वास बढ़ेगा।

देखा जाए तो यह बहस सिर्फ सोने की नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण की है। वायरल पोस्ट और उसके कमेंट्स ने आम आदमी की चिंता को आवाज दी है। सरकार को इस पर खुली बहस करनी चाहिए। सोना भारत की सांस्कृतिक धरोहर है, इसे सिर्फ वित्तीय संपत्ति बनाकर आम आदमी का भरोसा न खोया जाए। यदि नीति संतुलित और जनहित में बनी तो यह अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी; अन्यथा यह सिर्फ ‘नियंत्रण’ का खेल साबित होगी। आम आदमी को फैसला खुद करना होगा, डिजिटल सुविधा चुनें या पारंपरिक सुरक्षा?

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 8 मई 2026

विपक्ष को गंभीर चिंतन की जरूरत !

पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम और केरल के विधानसभा चुनाव परिणामों पर हर टीवी चैनल पर चुनावी पंडित और राजनैतिक वुशेषज्ञ गहन टिप्पणी कर रहे हैं। कुल मिलाकर इन विशेषज्ञों ने इन नतीजों को महज साधारण चुनावी उलटफेर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की दिशा में एक बड़े बदलाव के रूप में चित्रित किया। चुनाव विश्लेषक एक ओर इसे ‘बंगाल की विजय’ मानते हैं और दूसरी ओर विपक्षी दलों के लिए ‘गंभीर आत्मचिंतन का क्षण’ मानते हैं। नतीजों से यह बात तो स्पष्ट है कि परिणाम केवल मतदाता रुझान नहीं, बल्कि प्रक्रियागत सवालों और विपक्ष की रणनीतिक कमजोरियों का मिश्रण हैं। लेकिन विपक्ष के लिए सबसे महत्वपूर्ण सबक यह है कि भविष्य के चुनावों के लिए उन्हें कुछ नया सोचना होगा और बेहतर रणनीति बनानी पड़ेगी।
 

पश्चिम बंगाल की बात करें तो बीजेपी के वोट शेयर में मात्र 3 प्रतिशत की बढ़त के साथ काफ़ी मात्रा में सीटें जीती। लेकिन तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि राज्यव्यापी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया में लगभग 90 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए, जिनमें अधिकांश मुस्लिम और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के पारंपरिक वोटर थे। यदि ये 4.3 प्रतिशत मतदाता वोट डाल पाते तो शायद नतीजा अलग होता। कुछ चुनवी विश्लेषक इसे ‘क्यूरेटेड चुनाव’ कहते हैं। यानी परिणाम पहले से तय करने वाली प्रक्रिया। इसी तरह असम में भी बीजेपी की बड़ी जीत को चुनावी विश्लेषक सीमा-समस्या, ध्रुवीकरण और मतदाता सूची संशोधन से जोड़ कर देख रहे हैं।
 

यदि तमिलनाडु की बात करें तो टीवीके की सफलता को सकारात्मक विकास माना जाए। डीएमके की सत्ता-विरोधी लहर और स्टालिन की अपनी सीट हारने जैसी घटना ने साबित किया कि पुरानी पार्टियां जनता से दूर हो चुकी हैं। टीवीके की जीत नए चेहरे, युवा अपील और क्षेत्रीय आकांक्षाओं का प्रतीक है। वहीं केरल में कांग्रेस-नेतृत्व वाले यूडीएफ की जीत ने विपक्षी खेमे को कुछ राहत दी, लेकिन कुछ जानकर ऐसा मानते हैं कि क्या यह राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के ‘टेम्प्लेट’ का हिस्सा बन सकता है, जहां मतदाता सूची प्रबंधन, ध्रुवीकरण और संगठनात्मक ताकत एक साथ काम करती हो?
 
गौरतलब है कि विशेष गहन पुनरीक्षण जैसी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी और मतदाता सूची से नाम कटने के आरोप निश्चित रूप से जांच के योग्य हैं। चुनाव आयोग को इन सवालों का जवाब देना चाहिए। लेकिन केवल प्रक्रियागत दोषों पर जोर देकर विपक्ष अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। बंगाल में टीएमसी की 15 साल की सत्ता में भ्रष्टाचार, हिंसा और विकास की अनदेखी ने जनता को बीजेपी की ओर धकेला। तमिलनाडु में डीएमके का परिवारवाद और प्रदर्शन की कमी ने टीवीके जैसे नए विकल्प को रास्ता दिया। असम और केरल के नतीजे भी साबित करते हैं कि स्थानीय मुद्दे, विकास और नेतृत्व की विश्वसनीयता निर्णायक हैं। ऐसे में विपक्ष के लिए यह ‘आत्मचिंतन का क्षण’ है, लेकिन विपक्ष को इसे केवल शिकायत में नहीं बदलना चाहिए।
 

विपक्षी दलों और इंडिया गठबंधन को भविष्य की रणनीति पर गंभीरता से काम करना होगा। पहला: आंतरिक सुधार- पुरानी पार्टियां परिवारवाद, सत्ता-केंद्रित संस्कृति और भ्रष्टाचार से ग्रस्त हैं। टीएमसी और डीएमके को युवा, नए चेहरों और स्थानीय मुद्दों पर आधारित नेतृत्व विकसित करना चाहिए, जैसा टीवीके ने किया। कांग्रेस को अपने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करना होगा, न कि केवल गठबंधनों पर निर्भर रहना। विपक्ष को ‘सिर्फ बीजेपी-विरोध’ की राजनीति छोड़कर सकारात्मक एजेंडे पर काम करना चाहिए, जैसे कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान कल्याण और क्षेत्रीय अस्मिता।
 

दूसरा: चुनावी प्रक्रिया की निगरानी और सुधार - विपक्ष को विशेष गहन पुनरीक्षण के मुद्दे को राष्ट्रीय आंदोलन बनाना चाहिए। पारदर्शी मतदाता सूची, वीवीपीएटी की पूरी जांच, डिजिटल निगरानी और चुनाव आयोग की स्वायत्तता के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी जाए। लेकिन यह लड़ाई केवल अदालतों तक सीमित न रहे, जमीनी स्तर पर मतदाता जागरूकता अभियान चलाएं। मुस्लिम और पिछड़े वर्गों के मतदाताओं को सूची में शामिल कराने के लिए विशेष ड्राइव चलाई जाए, ताकि भविष्य में कोई ‘क्यूरेटेड’ नतीजा न निकले।
 
तीसरा, गठबंधन और रणनीतिक एकता - इंडिया गठबंधन को बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में सीट बंटवारे की बजाय विचारधारा आधारित साझेदारी पर जोर देना चाहिए। जहां टीवीके जैसी नई पार्टियां उभर रही हैं, वहां उन्हें सहयोगी बनाएं, न कि प्रतिद्वंद्वी। डिजिटल कैंपेनिंग, डेटा एनालिटिक्स और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके युवा वोटरों को जोड़ा जाए। विजय जैसे सेलिब्रिटी नेताओं की सफलता से सीखें, भावनात्मक जुड़ाव, साफ-सुथरी छवि और विकास-केंद्रित संदेश देना।
 
चौथा, क्षेत्रीय मुद्दों पर फोकस - राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी की ‘हिंदुत्व’ और विकास की दोहरी रणनीति का मुकाबला स्थानीय एजेंडे से करें। बंगाल में टीएमसी को हिंसा-मुक्त प्रशासन और औद्योगिक विकास का वादा करना चाहिए। तमिलनाडु में डीएमके को डीएमके-विरोधी लहर को ‘क्षेत्रीय गौरव’ में बदलना होगा। विपक्ष को महिला, युवा और किसान योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर देना चाहिए, ताकि बीजेपी की कल्याण योजनाओं का मुकाबला किया जा सके।
 
पांचवां, लंबी अवधि की तैयारी- 2029 लोकसभा चुनाव को नजर में रखते हुए विपक्ष को अब से संगठनात्मक काम शुरू करना चाहिए। प्रत्येक बूथ स्तर पर कार्यकर्ता ट्रेनिंग, फीडबैक मैकेनिज्म और विरोधी दलों की कमजोरियों का विश्लेषण जरूरी है। उल्लेखनीय है कि यह राष्ट्रीय ‘टेम्प्लेट’ बन सकता है। इसलिए विपक्ष को राष्ट्रीय स्तर पर ‘लोकतंत्र बचाओ’ अभियान चलाना चाहिए, जिसमें मीडिया, बुद्धिजीवी और नागरिक समाज शामिल हों।
 
चुनावी नतीजों के बाद आने वाली अधिकतर टीवी चर्चाएँ विपक्ष के लिए एक आईना है। इसमें हार के कारण दिखते हैं, लेकिन जीत का रास्ता भी। यदि विपक्ष केवल आरोप-प्रत्यारोप पर अटका रहा तो बीजेपी का ‘क्यूरेटेड’ मॉडल और मजबूत होगा। लेकिन आत्मचिंतन, सुधार, एकता और सकारात्मक एजेंडे के साथ विपक्ष न केवल अगले चुनाव जीत सकता है, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत भी कर सकता है। समय कम है। अब फैसला विपक्ष को करना है, या तो शिकायत करें या बदलाव लाएं।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 1 मई 2026

पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग से क्या होगा ?


पिछले कुछ दिनों से केंद्र सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को 20% (E20) से अधिक बढ़ाने और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (FFVs) को बढ़ावा देने का संकेत दिए है। पश्चिम एशिया संकट के कारण ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने के बीच यह कदम तेल आयात पर निर्भरता कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने और स्वच्छ ईंधन को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय की एक संयुक्त सचिव ने संकेत दिए कि सरकार जल्द ही E85 (85% इथेनॉल) से E100 (100% इथेनॉल) तक के वाहनों के टेस्टिंग नॉर्म्स अधिसूचित करने वाली है। ऑटोमेकर्स पहले से ही इसके प्रोटोटाइप तैयार कर चुके हैं। देखना यह होगा कि सरकार का यह फैसला आम आदमी की जेब, पर्यावरण और वाहनों पर क्या असर डालेगा?

भारत ने 2025 में E20 कार्यक्रम को पूरा कर लिया है। अप्रैल 2026 तक देशभर में E20 पेट्रोल उपलब्ध है। अब सरकार E85 या इससे ऊंचे ब्लेंड की ओर आगे बढ़ रही है। फ्लेक्स-फ्यूल वाहन किसी भी अनुपात (E20 से E100 तक) में इथेनॉल चला सकते हैं। ब्राजील इसका सफल उदाहरण है, जहां FFVs सालों से चल रहे हैं। भारत में यह कदम ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है। सरकार का दावा है कि EBP कार्यक्रम से अब तक 4.5 करोड़ बैरल कच्चा तेल बचाया गया और 1.65 लाख करोड़ रुपये विदेशी मुद्रा की बचत हुई। 2014 से अब तक 69.8 मिलियन टन CO2 उत्सर्जन कम हुआ। लेकिन क्या यह आम आदमी के लिए फायदेमंद है?


दावा है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग का सबसे बड़ा फायदा पर्यावरण को है। इथेनॉल नवीकरणीय स्रोत (गन्ना, मक्का, चावल) से बनता है। नीति आयोग के अनुसार, गन्ने से बने इथेनॉल से GHG उत्सर्जन 65% और मक्के से 50% कम होता है। टेलपाइप पर CO, HC और पार्टिकुलेट मैटर (PM) कम निकलते हैं। E20 से CO2 में 6-8% कमी आती है, जबकि E85 या E100 पर यह और ज्यादा। अध्ययनों से पता चलता है कि इथेनॉल ब्लेंड से वाहन प्रदूषण 20-30% तक घट सकता है।

वहीं इसके नुकसान भी हैं। गन्ना आधारित इथेनॉल पानी-गहन है। एक लीटर इथेनॉल बनाने में करीब 2860 लीटर पानी लगता है। भारत में गन्ना पहले से ही 70% सिंचाई पानी का उपभोग करता है। ज्यादा इथेनॉल के लिए अगर गन्ना या खाद्यान्न (मक्का, चावल) का इस्तेमाल बढ़ा तो ‘फूड बनाम फ्यूल’ विवाद खड़ा हो सकता है। इसके साथ ही भूमि उपयोग भी बढ़ेगा, मिट्टी की उर्वरता घट सकती है और कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ेगा। दूसरी पीढ़ी (2G) इथेनॉल (कृषि अपशेष से) पर जोर देने की जरूरत है, जो पर्यावरण के लिए बेहतर है। कुल मिलाकर, अगर नीति सतर्क रही तो पर्यावरणीय फायदा साफ है, कम आयात, कम प्रदूषण, लेकिन पानी और भूमि प्रबंधन बिना तो नुकसान भी हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि इथेनॉल पेट्रोल से सस्ता है, इसलिए ब्लेंडेड पेट्रोल का प्रति लीटर दाम कम रहता है। सरकार ने E20 के लिए कीमत कम रखने की सिफारिश की थी। लेकिन इथेनॉल की ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से 30% कम है, इसलिए इससे वाहन का माइलेज घटता है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, पुराने E10 वाहनों में E20 से 6-7% (4-व्हीलर) या 3-4% (2-व्हीलर) माइलेज गिरावट हो सकती है। मतलब, अगर आपकी कार 15 किलोमीटर प्रति लीटर की खपत करती है तो E20 पर 14.1-14.5 किलोमीटर हो जाएगी।


गौरतलब है कि आप E85 या E100 चुन सकते हैं, अगर वह सस्ता हो। ब्राजील में FFVs पर इथेनॉल सस्ता होने से उपभोक्ता बचत करते हैं। लेकिन भारत में अभी इंफ्रास्ट्रक्चर (अलग पंप) और कीमत निर्धारण स्पष्ट नहीं है। नए FFV थोड़े महंगे हो सकते हैं, हालांकि लंबे समय में इंसेंटिव से बचत हो सकती है। पुराने वाहन वाले उपभोक्ता (2012-2023 तक बने) को माइलेज नुकसान और संभवतः मेंटेनेंस खर्च बढ़ सकता है। कुल मिलाकर, जेब पर तुरंत असर नकारात्मक हो सकता है, लेकिन अगर सरकार टैक्स छूट और सब्सिडी दे तो लंबे समय में यह फायदेमंद साबित हो सकता है। वहीं किसान समुदाय को इसका फायदा जरूर होगा, गन्ना और मक्का की खरीद बढ़ेगी, तो आय निश्चित ही बढ़ेगी।

वाहनों की बात करें तो उनके लिए इसका असर मिश्रित है। अप्रैल 2023 से बने वाहन E20 कंप्लायंट हैं, वे 20% इथेनॉल मिश्रित ईंधन से अपने वाहन आसानी से चला सकते हैं। अप्रैल 2025 से बने वाहन पूर्ण E20 अनुकूलित हैं। लेकिन 2023 से पहले के वाहनों में रबर पार्ट्स, गैस्केट्स और प्लास्टिक पर इथेनॉल का बुरा असर हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञ कहते हैं कि यह मामूली है और सर्विसिंग में ठीक हो जाता है। E20 से ऑक्टेन नंबर बढ़ता है (91 से 95 तक), इसलिए एक्सेलरेशन बेहतर हो सकता है।

कुछ जानकर मानते हैं कि फ्लेक्स-फ्यूल वाहन सबसे अच्छे विकल्प हैं, इन्हें किसी भी ब्लेंड पर चलाया जा सकता है। लेकिन अभी इसका कमर्शियल उत्पादन शुरू नहीं हुआ। पुराने वाहनों में E85+ ब्लेंड से समस्या ज्यादा हो सकती है। ARAI और SIAM अध्ययनों के अनुसार, सही ट्यूनिंग से परफॉर्मेंस बनी रहती है। कुल मिलाकर, नए वाहन खरीदने वालों के लिए यह अच्छी खबर है, लेकिन पुराने वाहन वालों को काफ़ी हद तक सावधानी बरतनी होगी। सरकार का यह फैसला दूरदर्शी है, लेकिन क्रियान्वयन ही असली परीक्षा है। पर्यावरण को फायदा, ऊर्जा सुरक्षा की मज़बूती और किसानों की आय में बढ़ोतरी कुछ फ़ायदे ज़रूर हैं। लेकिन इसके साथ ही आम आदमी की जेब और पुराने वाहनों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर नीति संतुलित रही, तो यह ‘विन-विन’ निर्णय साबित हो सकता है। वरना, माइलेज का नुकसान और महंगाई का बोझ आम आदमी पर पड़ेगा। क्योंकि सतर्क और पारदर्शी रोलआउट ही सफलता की कुंजी है। इसलिए सरकार को हर पहलू पर गंभीरता से विचार करने के बाद ही किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिए। 

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

पायलटों की थकान: हवाई यात्रा की सुरक्षा पर मंडराता खतरा!

भारतीय वाणिज्यिक उड्डयन क्षेत्र (कमर्शियल फ्लाइट्स) एक बार फिर सुरक्षा की गंभीर चुनौती से जूझ रहा है। मात्र 48 घंटे के अंदर दो कमर्शियल पायलटों की अचानक मौत ने पूरे उद्योग को झकझोर दिया है। एयरलाइन पायलट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ALPA इंडिया) ने इस घटना को पायलट थकान (फैटिग) से जोड़ते हुए डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (डीजीसीए) को पत्र लिखा है। एसोसिएशन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (एफ़डीटीएल) नियमों के संशोधित संस्करण को लागू करने में हो रही देरी और एयरलाइंस को बार-बार दी जा रही छूटें पायलटों पर भारी बोझ डाल रही हैं, जिससे उड़ान सुरक्षा की नींव हिल रही है। यह मुद्दा केवल दो मौतों तक सीमित नहीं है, यह पूरे भारतीय एविएशन इकोसिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।
 
29 अप्रैल 2026 को एयर इंडिया के कैप्टन तरनदीप सिंह बाली में शेड्यूल्ड रेस्ट के दौरान दिल का दौरा पड़ने से चल बसे। एक दिन बाद अकासा एयर के एक पायलट ने भी हार्ट अटैक का शिकार होकर जान गंवाई। दोनों मौतें अलग-अलग एयरलाइंस और अलग-अलग जगहों पर हुईं, लेकिन दोनों में थकान का साया साफ नजर आता है। एएलपीए इंडिया ने डीजीसीए को लिखे अपने पत्र में इन घटनाओं को एफ़डीटीएल नियमों की देरी से सीधे जोड़ा है। एसोसिएशन का कहना है कि पायलटों की ड्यूटी घंटों को लेकर जो नई गाइडलाइंस 2024 में जारी की गई थीं, जिनमें साप्ताहिक आराम को 36 घंटे से बढ़ाकर 48 घंटे करना, मिडनाइट लैंडिंग की संख्या सीमित करना और थकान रिपोर्टिंग को अनिवार्य बनाना शामिल था। वे अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हो पाई हैं। इसके बजाय एयरलाइंस को बार-बार छूट दी जा रही है, खासकर इंडिगो जैसी बड़ी कंपनियों को, जहां ऑपरेशनल दबाव के नाम पर नियमों को ढीला किया जा रहा है।
 
भारतीय एविएशन का विकास वाकई सराहनीय है। पिछले कुछ वर्षों में यात्री यातायात में दोहरे अंकों की वृद्धि हुई है। एयरपोर्ट्स का विस्तार हो रहा है, नई एयरलाइंस आ रही हैं और कनेक्टिविटी बढ़ रही है। लेकिन विकास की इस रफ्तार के साथ पायलटों की उपलब्धता, उनके स्वास्थ्य प्रबंधन और थकान नियंत्रण की व्यवस्था नहीं बढ़ पाई है। 2024 के नए एफ़डीटीएल नियम ICAO (इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन) के मानकों के अनुरूप थे, जो वैश्विक स्तर पर पायलट थकान को गंभीरता से लेते हैं। इन नियमों का मकसद था कि पायलट 100 प्रतिशत अलर्ट रहें, क्योंकि एक छोटी सी गलती भी सैकड़ों यात्रियों की जान ले सकती है। दुर्भाग्य से, डीजीसीए ने इन नियमों को फुल-स्केल लागू करने में देरी की और एयरलाइंस के दबाव में छूटें दीं। एएलपीए इंडिया का आरोप है कि ये छूटें सुरक्षा मानकों से समझौता कर रही हैं।
 
थकान केवल शारीरिक नहीं, मानसिक भी होती है। लंबी ड्यूटी, बार-बार टाइम-जोन बदलना, अनियमित आराम, परिवार से दूरी, ये सब पायलटों पर दबाव बढ़ाते हैं। अध्ययनों के अनुसार, 12-14 घंटे की लगातार ड्यूटी के बाद पायलट की निर्णय लेने की क्षमता शराब के नशे वाले व्यक्ति जितनी कम हो जाती है। भारत में पहले भी कई घटनाएं हुई हैं जहां पायलट कोकपिट में बेहोश हो गए या स्वास्थ्य समस्या आई। 2025 में इंडिगो के फ्लाइट कैंसिलेशन के दौरान भी पायलट थकान की चर्चा हुई थी। अब 2026 में दो मौतें इस समस्या को और गंभीर बना रही हैं। एएलपीए इंडिया ने डीजीसीए से मांग की है कि एफ़डीटीएल छूटों को तुरंत बंद किया जाए, एक समयबद्ध रोडमैप बनाया जाए और सभी एयरलाइंस पर एक समान नियम लागू हों।
 
यह मुद्दा केवल पायलट यूनियन की शिकायत का नहीं है। यह यात्रियों, एयरलाइंस और सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर डीजीसीए अब भी देरी करता रहा तो भविष्य में बड़े हादसे का खतरा बढ़ जाएगा। याद रखें, एयर इंडिया एक्सप्रेस या अन्य एयरलाइंस के पायलट पहले भी थकान के शिकार हो चुके हैं। 2025 में इंडिगो और एयर इंडिया के पायलट कोकपिट में गिरने की घटनाएं सामने आई थीं। हर बार यही बहाना दिया जाता है कि पायलट कमी है, ट्रेनिंग स्लॉट कम हैं या ऑपरेशनल दबाव है। लेकिन क्या ये बहाने सुरक्षा से ऊपर हो सकते हैं? एयरलाइंस को चाहिए कि वे अधिक पायलटों की भर्ती करें, बेहतर शेड्यूलिंग करें और फेटिग रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम (FRMS) को सख्ती से लागू करें। ऐसे में डीजीसीए को भी अपनी निगरानी बढ़ानी होगी।
 
वैश्विक उदाहरण देखें तो यूरोप और अमेरिका में एफ़डीटीएल के नियम बहुत सख्त हैं। वहां पायलटों को पर्याप्त आराम मिलता है और थकान रिपोर्टिंग रियल-टाइम होती है। भारत, जो विश्व का तीसरा सबसे बड़ा एविएशन मार्केट बनने जा रहा है, वहां ऐसे लापरवाह रवैये की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। एएलपीए इंडिया का पत्र सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक गंभीर विषय है जिस पर तुरंत करवाई होनी चाहिए। डीजीसीए को चाहिए कि वह इस पत्र पर तुरंत संज्ञान ले, सभी एयरलाइंस से फीडबैक और सुझाव ले और एफ़डीटीएल के नियमों को 100 प्रतिशत लागू करने की समयसीमा घोषित करे। साथ ही, पायलटों के स्वास्थ्य जांच को अनिवार्य और नियमित बनाया जाए।
 
गौरतलब है कि इस समस्या का समाधान केवल नियम बनाने से नहीं होगा। एयरलाइंस को अपनी संस्कृति बदलनी होगी। जहां लाभ के बजाय सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए। सरकार को भी एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट पर निवेश बढ़ाना होगा। पायलट ट्रेनिंग स्कूलों को बढ़ावा दें, विदेशी पायलटों पर निर्भरता कम करें और घरेलू टैलेंट को प्रोत्साहित करें।
 
ऐसा कहना ग़लत नहीं होगा कि दो पायलटों की मौत एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता का संकेत है। अगर हम आज चुप रहे तो कल का हादसा पूरे देश को महंगा पड़ेगा। एएलपीए इंडिया ने जो आवाज उठाई है, उसे डीजीसीए अविलंब को सुनना चाहिए। उड़ानें सुरक्षित हों, तभी विकास सार्थक होगा। डीजीसीए और सरकार को अब जागना होगा, जहाँ देरी की कोई गुंजाइश नहीं है। पायलट थकान रोकना सिर्फ एक नियम नहीं, बल्कि सैकड़ों जिंदगियों को बचाने का वादा है। 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

सीबीआई अधिकारी की सजा: संस्थागत भ्रष्टाचार पर सवाल !

दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में गत 18 अप्रैल को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया। न्यायमूर्ति शशांक नंदन भट्ट ने सीबीआई के वर्तमान संयुक्त निदेशक रमनीश और सेवानिवृत्त सहायक पुलिस आयुक्त वी.के. पांडे को धारा 323, 427, 448 तथा 34 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया। यह घटना वर्ष 2000 की है, जब रमनीश सीबीआई में डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस के पद पर थे। यह फैसला सीबीआई की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाता है। सीबीआई खुद को देश की प्रमुख जांच एजेंसी बताती है, जो भ्रष्टाचार और दुरुपयोग के खिलाफ लड़ती है। लेकिन जब उसके अपने वरिष्ठ अधिकारी ही ‘मालाफाइड रेड’, मारपीट और साजिश में शामिल हों, तो सवाल उठता है कि तब सीबीआई अपने भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करती?
 
शिकायतकर्ता अशोक कुमार अग्रवाल, 1985 बैच के आईआरएस अधिकारी, उस समय दिल्ली जोन में डिप्टी डायरेक्टर (इनफोर्समेंट) थे। अदालत ने पाया कि 19 अक्टूबर 2000 को सीबीआई टीम द्वारा उनके घर पर की गई प्रातः कालीन रेड और गिरफ्तारी पूरी तरह ‘मालाफाइड’ (दुराभिसंधि से) थी। इसका एकमात्र उद्देश्य सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (सीएटी) के 28 सितंबर 2000 के आदेश को निष्प्रभावी बनाना था, जिसमें अग्रवाल के निलंबन की समीक्षा चार सप्ताह में करने का निर्देश दिया गया था।
 

अदालत ने माना कि रेड और गिरफ्तारी कानून द्वारा प्रदत्त शक्तियों का घोर उल्लंघन थी। आरोपी अधिकारियों के कार्य ‘आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन’ की परिभाषा में नहीं आते, इसलिए उन्हें धारा 197 सीआरपीसी या दिल्ली पुलिस एक्ट की धारा 140 के संरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता। इसके साथ ही अदालत ने इस मामले में साजिश भी स्थापित की। क्योंकि कानून के मुताबिक तत्कालीन डीएसपी रमनीश को केस दर्ज करने का अधिकार ही नहीं था। अदालत ने कहा कि आरोपियों की पूरी कार्रवाई कानून का उल्लंघन थी और सीएटी के आदेश के तहत शिकायतकर्ता को वंचित करने का जानबूझकर प्रयास था। सबूत ‘बियॉन्ड रीजनेबल डाउट’ के स्तर पर शिकायतकर्ता के पक्ष में थे। विभागीय जांच में यह भी देखना होगा कि डीएसपी रमनीश किसके इशारे पर ऐसा कर रहे थे?  
 

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2016 में और सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2023 में पहले ही धारा 197 सीआरपीसी के तहत संरक्षण को अस्वीकार कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने स्वतंत्र रूप से पुष्टि की कि ‘मालाफाइड’ इरादे से किए गए कार्य आधिकारिक कर्तव्य नहीं माने जा सकते। रमनीश आज भी सीबीआई में संयुक्त निदेशक के पद पर हैं। दोषसिद्धि के बाद भी क्या विभागीय कार्रवाई हुई? क्या सस्पेंशन या बर्खास्तगी का प्रस्ताव है? अतीत में कई मामलों में सीबीआई अधिकारियों पर भ्रष्टाचार, फर्जी मुठभेड़, सबूत गढ़ने या राजनीतिक दबाव के आरोप लगे, लेकिन आंतरिक कार्रवाई अक्सर कमजोर या लंबित रहती है। क्या यह संस्थागत संरक्षण का मामला नहीं है? क्या सीबीआई में ‘अपने लोगों’ को बचाने की संस्कृति है, जो उसकी निष्पक्षता को कमजोर करती है? अगर एजेंसी खुद कानून तोड़ती है तो आम नागरिक उस पर भरोसा कैसे करे? यह घटना 2000 की है, लेकिन आज भी रमनीश जैसे अधिकारी उच्च पद पर हैं, जो कि चिंताजनक है।
 

यहां आर्टिकल 311 और रूल 19 का उल्लेख जरूरी है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 311 सरकारी कर्मचारियों (सिविल सेवा में नियुक्त व्यक्तियों) की रक्षा करता है। यह कहता है कि किसी कर्मचारी को बिना जांच के, बर्खास्तगी, हटाया जाना या रैंक में कमी नहीं की जा सकती। ऐसे में आरोपी को उस पर लगे आरोप बताए जाएं और सुनवाई का अवसर दिया जाए। लेकिन दूसरे प्रावधान (दूसरा प्रोविजो) में अपवाद हैं। खंड (a) स्पष्ट है, अगर कर्मचारी का आचरण आपराधिक मुकदमे में दोषसिद्धि का आधार बना है, तो पूर्ण जांच की जरूरत नहीं। दोषसिद्धि के आधार पर सीधे बर्खास्तगी या अन्य सजा दी जा सकती है।सीसीएस (सीसीए) रूल्स 1965 के रूल 19(i) इसी सिद्धांत पर आधारित है। इसमें कहा गया है कि आपराधिक दोषसिद्धि वाले आचरण के आधार पर दंड लगाने के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। दोषसिद्धि के बाद विभागीय अधिकारी शो-कॉज नोटिस जारी कर कर्मचारी को सजा के प्रस्ताव पर अपना पक्ष रखने का अवसर देता है, लेकिन पूर्ण अनुशासनिक जांच की जरूरत नहीं पड़ती। 
 
रूल 19 का उद्देश्य है कि दोषसिद्धि के बाद अनावश्यक देरी न हो और दोषी को सेवा में बनाए रखने का जोखिम न लिया जाए। अदालत की दोषसिद्धि को विभागीय रूप से स्वीकार किया जाता है, हालांकि कर्मचारी अपील में राहत मांग सकता है, लेकिन अपील या सजा पर स्टे होने से दोषसिद्धि स्वतः रद्द नहीं होती।
 

इस मामले में रमनीश और पांडे की दोषसिद्धि के बाद सीबीआई और संबंधित विभाग को अनुच्छेद 311(2) के प्रोविजो (a) और रूल 19 के तहत त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो यह सवाल और मजबूत हो जाएगा कि सीबीआई अपने अधिकारियों के खिलाफ क्यों नरम रवैया अपनाती है ?
 
कानून के जानकार इस फैसले को न्याय की जीत मानते है, लेकिन फैसला आने में बहुत देरी हुई। 26 साल बाद न्याय मिला। यह दर्शाता है कि शक्तिशाली लोगों के खिलाफ लड़ाई कितनी लंबी और कठिन हो सकती है। सीबीआई को आत्मचिंतन करना चाहिए। अपनी छवि सुधारने के लिए उसे आंतरिक जवाबदेही मजबूत करनी होगी। भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी अगर खुद भ्रष्टाचार या दुरुपयोग से मुक्त नहीं होती, तो लोकतंत्र में उस पर जानता का  विश्वास घटता है।
 
अशोक कुमार अग्रवाल जैसे निडर लोगों की हिम्मत सराहनीय है। ऐसे लोग दबाव, धमकियों और लंबी कानूनी लड़ाई के बावजूद न्याय की राह नहीं छोड़ते। यह मामला याद दिलाता है कि कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए – चाहे आरोपी कोई भी हो। सीबीआई जैसे संस्थानों को इस सबक को गंभीरता से लेना चाहिए, वरना ‘सीबीआई बनाम सीबीआई’ जैसी स्थितियां बार-बार उभरेंगी। 

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

नोएडा में मजदूर अशांति: क्या एक राष्ट्रीय चेतावनी?

नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में बीते 13 अप्रैल को जो घटना घटी, वह केवल एक स्थानीय प्रदर्शन नहीं थी। फेज-2 के होजरी  कॉम्प्लेक्स, सेक्टर 60, 62, 63 और आसपास के दर्जनों कारखानों के हजारों मजदूर वेतन वृद्धि, ओवरटाइम का दोगुना भुगतान, साप्ताहिक छुट्टी, बोनस और शिकायत निवारण समिति जैसी मांगों को लेकर सड़क पर उतरे। शुरू में शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन था, लेकिन जल्द ही पथराव, वाहनों में आगजनी, संपत्ति तोड़फोड़ और पुलिस के साथ टकराव का रूप ले लिया। पुलिस को आंसू गैस और लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा। सैकड़ों लोग घायल हुए, दर्जनों वाहन जलाए गए और सैकड़ों मजदूरों की गिरफ्तारी हुई। उत्तर प्रदेश सरकार ने तुरंत न्यूनतम मजदूरी में 21 प्रतिशत की अंतरिम वृद्धि की घोषणा कर दी, लेकिन आग बुझने में समय लगा। यह घटना मात्र नोएडा की नहीं है। यह पूरे देश के लिए एक बड़े संदेश की तरह है। आज भारत मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अगर श्रमिक-प्रबंधन संबंधों को नजरअंदाज किया गया तो नोएडा जैसी स्थिति कहीं भी दोहराई जा सकती है।
 


मुख्य वजह हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बीच न्यूनतम मजदूरी का बड़ा अंतर था। हरियाणा सरकार ने हाल ही में अनुभवी मजदूरों के वेतन में करीब 35 प्रतिशत की वृद्धि कर दी। अकुशल श्रमिकों के वेतन को 14,000 रुपये से बढ़ाकर 19,000 रुपये तक कर दिया गया। नोएडा के मजदूरों को यही खबर मिली और उन्होंने मांग की कि उनका वेतन भी उसी स्तर पर हो। वर्तमान में नोएडा में कई कारखानों में अनुभवी मजदूरों को 11-13 हजार रुपये मासिक मिल रहे थे, जबकि महंगाई, किराया, राशन, शिक्षा और स्वास्थ्य खर्च ने आसमान छू लिया है। साथ ही लंबे काम के घंटे, ओवरटाइम का सिंगल रेट, वेतन स्लिप न मिलना और यौन उत्पीड़न समिति जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ने आक्रोश को भड़काया।



सोशल मीडिया पर ‘हरियाणा मॉडल’ की खबरें तेजी से फैलीं। कुछ बाहरी तत्वों ने भी इसे भड़काने की कोशिश की, लेकिन मूल समस्या आर्थिक थी। तीन-चार दिन के शांत प्रदर्शन के बाद 13 अप्रैल को हिंसा भड़क गई। पुलिस ने न्यूनतम बल प्रयोग किया, लेकिन स्थिति बिगड़ चुकी थी। सरकार ने बाद में 1 अप्रैल से लागू होने वाली वेतन वृद्धि की घोषणा की, फिर भी कई मजदूर संतुष्ट नहीं हुए।


गौरतलब है कि यह अशांति अचानक नहीं आई है। पिछले कुछ वर्षों में देश भर में श्रमिकों के बीच असंतोष बढ़ा है। कारण कई हैं। महंगाई और वास्तविक आय में कमी: खाने-पीने, आवास और परिवहन का खर्च तेजी से बढ़ा है, लेकिन वेतन वृद्धि धीमी रही। विशेषकर अनुबंधित और ठेकेदार मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित रहे। श्रम कानूनों का अधूरा कार्यान्वयन: चार नए श्रम संहिताओं का उद्देश्य सुविधा देना था, लेकिन कई राज्यों में उन्हें पूरी तरह लागू नहीं किया गया। न्यूनतम मजदूरी की समीक्षा समय पर नहीं होती। प्रबंधन की उदासीनता: कई कारखाने एमएसएमई क्षेत्र के हैं। मालिक लागत बचाने के चक्कर में वेतन, बोनस और सुरक्षा पर ध्यान नहीं देते। संवाद की कमी भी रहती है। जब हरियाणा में वेतन बढ़ा, तो नोएडा के मालिकों ने इसे ‘स्थानीय मुद्दा’ मानकर नजरअंदाज कर दिया। प्रवासी मजदूरों की स्थिति: नोएडा जैसे क्षेत्रों में ज्यादातर मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों और पूर्वी राज्यों से आते हैं। वे परिवार को पैसा भेजने के लिए कम वेतन पर भी काम करते हैं, लेकिन महंगाई ने उनका सब्र तोड़ दिया। सोशल मीडिया और सूचना का प्रसार ऐसा होने लगा कि एक जिले की खबर दूसरे जिले में तुरंत पहुंचने लगी। जिस कारण तुलना आसान हो गई है।
इसी तरह की घटनाएं पहले गुरुग्राम, चेन्नई, कोयंबटूर और अहमदाबाद में भी देखी गई हैं। इसलिए नोएडा की घटना कोई अलग घटना नहीं है।



सवाल उठता है कि क्या दोष किसी एक पक्ष का है? उल्लेखनीय है कि कई फैक्टरियां लाभ कमा रही हैं, लेकिन मजदूरों को न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं दे पा रही। संवाद की जगह दमन का रवैया अपनाया जाता है। वहीं सरकार की बात करें तो  उनके द्वारा न्यूनतम मजदूरी की समीक्षा में देरी करना। पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय की कमी। श्रम विभाग की कमजोर निगरानी, आदि जैसे कई कारण हैं जो सरकार को भी सवालों के घेरे में लाते हैं। वहीं मजदूरों की बात की जाए तो हिंसा कभी जायज नहीं होती। वाहनों में आग लगाना, पथराव और संपत्ति तोड़फोड़ से उनकी अपनी मांगें कमजोर होती हैं। ऐसे में कुछ बाहरी उकसावे वाले तत्व इन सब का फायदा उठा लेते हैं। कई जगह यूनियनें राजनीतिक रंग ले लेती हैं और संवाद की बजाय आंदोलन को बढ़ावा देती हैं। वास्तव में दोष ‘व्यवस्था’ का है, जिसमें त्रिपक्षीय संवाद (सरकार-प्रबंधन-श्रमिक) कमजोर हो गया है।


नोएडा से सबक लेकर देश भर के कारखाना मालिकों को तुरंत कुछ कदम उठाने चाहिए। नियमित वेतन समीक्षा: हर साल महंगाई के आधार पर वेतन बढ़ोतरी का फॉर्मूला तय करें। न्यूनतम मजदूरी से ऊपर का। ‘लिविंग वेज’ को अपनाएं। संवाद स्थापित करें: ग्रेविएंस कमेटी, वर्कर्स वेलफेयर कमेटी बनाएं। मासिक बैठकें रखें। कानूनों का पूर्ण पालन: ओवरटाइम, पीएफ, ईएसआई, बोनस, छुट्टियां जैसे सभी नियमों का पालन करें। वेतन समय पर और स्लिप के साथ दें। कौशल विकास: मजदूरों को ट्रेनिंग दें ताकि वे ज्यादा उत्पादक बनें और बेहतर वेतन का हकदार हों। सुरक्षा और सम्मान: काम का माहौल सुरक्षित और सम्मानजनक बनाएं। यौन उत्पीड़न समिति अनिवार्य रूप से सक्रिय रखें। सरकार से समन्वय: राज्य और केंद्र सरकार के साथ मिलकर लंबी अवधि की मजदूरी नीति बनाएं।

नोएडा की घटना भारत की औद्योगिक क्रांति के बीच एक लाल बत्ती है। अगर हम ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को साकार करना चाहते हैं, तो मजदूरों को साझेदार मानना होगा, न कि सिर्फ लागत का हिस्सा। हिंसा से कोई समस्या हल नहीं होती, लेकिन जड़ों में उपेक्षा भी घातक है। सरकार को श्रम कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना चाहिए, प्रबंधन को मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और मजदूरों को शांतिपूर्ण संवाद का रास्ता चुनना चाहिए। तभी औद्योगिक शांति बनी रहेगी और विकास सतत होगा। नोएडा ने चेतावनी दी है, समय रहते इसे गंभीरता से लें, वरना यह आग देश के किसी भी कोने में भड़क सकती है। 
*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

कैसे सुधरे भारतीय पुलिस स्टेशनों की दयनीय स्थिति?

अक्सर हम फ़िल्मों और वेब सीरीज में यह देखते हैं कि किस तरह भारत की पुलिस को बुनियादी सुविधाओं और लाचार पुरानी व्यवस्थाओं के चलते अक्सर कोर्ट और मीडिया का शिकार बनना पड़ता है। जबकि वास्तविक स्थिति सभी को पता है कि पुलिस वाले भी आख़िर इंसान ही होते हैं। यदि पुलिस से उम्मीद की जाए कि वह क़ानून व्यवस्था बनाए रखे तो क्या पुलिस व पुलिस थानों में बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखना सरकार की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए? इस बात को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि फ़िल्में व टीवी शो समाज का आईना होते हैं। इनमें दिखाए जाने वाली पुलिस की लाचारी वास्तविकता पर ही आधारित होती है। आज जब सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘मॉडर्न पोलिसिंग’ का नारा लगाती है, तब भी देश के अधिकांश पुलिस स्टेशन उसी औपनिवेशिक युग की इमारतों में कैद हैं। बुनियादी सुविधाओं की कमी, जर्जर इंफ्रास्ट्रक्चर और पुरानी व्यवस्था न केवल पुलिस कर्मियों के काम को बाधित कर रही है, बल्कि आम जनता के लिए भी ये स्टेशन आतंक का प्रतीक बने हुए हैं। 2025 के इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के अनुसार, 83 प्रतिशत पुलिस स्टेशनों में कम से कम एक सीसीटीवी कैमरा जरूर लगा है, लेकिन ऐसे कई मामले हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट के मानकों का पालन असंगत है। 78 प्रतिशत स्टेशनों में महिला हेल्पडेस्क बनी हैं, फिर भी महिला पुलिसकर्मियों का राष्ट्रीय औसत मात्र 12 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्टेशनों की संख्या 2017-22 के बीच 7 प्रतिशत घट गई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में 4 प्रतिशत बढ़ी। 


जनवरी 2023 के केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 17,849 पुलिस स्टेशन हैं, जिनमें से 58 में वाहन नहीं, 680 में लैंडलाइन फोन नहीं और 282 में मोबाइल फोन तक नहीं हैं। कई स्टेशनों में बिजली, इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता की भारी कमी है। बीपीआरडी (ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट) ने आधुनिक पुलिस स्टेशन भवनों के लिए मानक तय किए हैं, जिनमें आगंतुकों के लिए प्रतीक्षा कक्ष, शौचालय, जांच कक्ष और रिकॉर्ड रूम शामिल हैं, लेकिन ज्यादातर राज्यों में इनका पालन नाममात्र का है। असिस्टेंस टू स्टेट्स फॉर मॉडर्नाइजेशन ऑफ पुलिस (एएसयूएमपी) योजना के तहत केंद्र ने 2025-26 में 540 करोड़ रुपये आवंटित किए, लेकिन इसमें भी उपयोगिता कम पाई गई। 

सवाल उठता है कि यह जर्जर इंफ्रास्ट्रक्चर पुलिस कार्य को किस तरह बाधित कर रहा है? स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) को 24 घंटे ड्यूटी पर रहना पड़ता है, लेकिन ज़्यादातर थानों में न तो आराम कक्ष ठीक हैं, न बैरक स्वच्छ। मैनुअल पेपरवर्क, पुराने रिकॉर्ड और भीड़भाड़ के कारण जांच में देरी होती है। जनता शिकायत दर्ज कराने आती है तो प्रतीक्षा कक्ष न होने से खुले में खड़ी रहती है। महिला आगंतुकों के लिए अलग शौचालय की कमी आम है। परिणामस्वरूप, पुलिस पर भरोसा घटता है और अपराधी लाभ उठाते हैं।


सबसे दर्दनाक स्थिति मालखाने (पुलिस रिकॉर्ड रूम) की है। यहां सबूत, हथियार, नशीले पदार्थ और संपत्ति रखी जाती है, लेकिन ज्यादातर स्टेशनों में यह कमरा गंदा, भीड़भाड़ वाला और असुरक्षित होता है। मैनुअल रजिस्टर, चूहों-कीड़ों का आतंक और अपर्याप्त जगह के कारण सबूत बिगड़ जाते हैं। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 2024 में चूहों द्वारा सबूत नष्ट होने पर डीजीपी को आदेश दिया था कि मालखाने की नियमित देखभाल हो। दिल्ली के कई स्टेशनों में एक मालखाना अधिकारी के पास हजारों एग्जिबिट्स होते हैं, लेकिन स्टाफ की कमी से घंटों खोजबीन करनी पड़ती है। इससे सबूतों में छेड़छाड़, गुम होने या अदालत में अस्वीकार होने की घटनाएँ आम हैं। कुछ राज्यों में ई-मालखाना शुरू हुआ है, जहां बारकोड और डिजिटल ट्रैकिंग से पारदर्शिता आई, लेकिन यह पूरे देश में लागू नहीं हुआ। 


इसी तरह, जब्त वाहनों की समस्या पर्यावरणीय आपदा बन चुकी है। देश भर के पुलिस स्टेशनों में हजारों जब्त कारें, बाइकें व अन्य छोटे बड़े वाहन सड़ रहे हैं। जो कि थानों से सटी सड़कों पर खड़े रहते हैं और यातायात बाधित करते हैं। ईंधन रिसाव, जंग, बरसाती पानी से मच्छर पनपते हैं, डेंगू-मलेरिया का खतरा बढ़ता है। आग लगने का जोखिम तो हमेशा बना ही रहता है। पंजाब सरकार ने हाल ही में आदेश दिया कि सभी जब्त वाहन शहर से बाहर स्क्रैप यार्ड में शिफ्ट किए जाएं, लेकिन अन्य राज्यों में ऐसा नहीं हुआ। 

ऐसे में सुधार कैसे हो? सबसे पहले, बीपीआरडी के मॉडल पुलिस स्टेशन मानकों को सख्ती से लागू किया जाए। हर स्टेशन में डिजिटल रिकॉर्ड रूम (ई-मालखाना), सीसीटीवी नाइट विजन, पर्याप्त शौचालय, प्रतीक्षा कक्ष और महिला हेल्पडेस्क अनिवार्य हों। नियम उल्लंघन के बाद जब्त वाहनों के लिए अलग-अलग डिस्पोजल यार्ड और ऑनलाइन नीलामी की व्यवस्था हो, ताकि 30 दिनों में उन्हें हटाया जा सके। उसी तरह अपराध में शामिल वाहनों की विस्तृत फॉरेंसिक जांच के बाद, कोर्ट के आदेश पर उन्हें भी थानों से हटाया जाए। पुलिस कर्मियों के लिए बेहतर बैरक, कैंटीन और प्रशिक्षण सुविधाएं जरूरी हों। जनता के लिए थाने ‘यूजर फ्रेंडली’ बनाने के लिए शिकायत पोर्टल, हेल्पडेस्क और कम्युनिटी पोलिसिंग को बढ़ावा दें।

गौरतलब है कि पुलिस सुधार समितियों ने इन मुद्दों पर बार-बार आवाज उठाई। 1977-81 की नेशनल पुलिस कमीशन ने बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षण और स्वायत्तता पर जोर दिया। रिबेरो, पद्मनाभैया और मलीमाथ समितियों ने भी यही सिफारिशें कीं। 2006 में प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सात ऐतिहासिक निर्देश दिए। राज्य सुरक्षा आयोग का गठन, डीजीपी की दो साल की न्यूनतम अवधि, एसपी और एसएचओ की स्थिरता, जांच और कानून-व्यवस्था का अलगाव, पुलिस स्थापना बोर्ड, शिकायत प्राधिकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग। लेकिन ज्यादातर राज्य इन्हें लागू करने में असफल रहे। थॉमस कमेटी (2008) ने राज्यों की उदासीनता पर दुख जताया। कारण स्पष्ट हैं, पुलिस राज्य विषय है, जहाँ राजनीतिक दखल, फंड का दुरुपयोग और सुधारों से सत्ता के लिए खतरा बना रहता है। मॉडल पुलिस एक्ट 2006 को भी सिर्फ कुछ राज्यों ने ही अपनाया है। 

आज जरूरत है मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की। केंद्र सरकार एएसयूएमपी फंड का पूरा उपयोग सुनिश्चित करे, अनुपालन न करने वाले राज्यों पर करवाई करे और सुप्रीम कोर्ट इसकी नियमित समीक्षा करे। पुलिस स्टेशन अगर आधुनिक और जन-अनुकूल नहीं बने, तो ‘विकसित भारत’ का सपना अधूरा रहेगा। समय की माँग है कि हम पुलिस को सेवा प्रदाता मानें, न कि सिर्फ अपराध नियंत्रक। बुनियादी सुविधाओं से शुरू कर सुधार की दिशा में कदम उठाएं, ताकि पुलिसकर्मी और जनता दोनों को न्याय मिले। 

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

नौकरियां गंवाने की चिंता और मानसिक स्वास्थ्य की पुकार


बेंगलुरु, जिसे भारत की आईटी राजधानी के नाम से भी जाना जाता है, पिछले दिनों एक ऐसी घटना से हिल गया है जो न केवल दिल दहला देने वाली है, बल्कि पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर देती है। गत 31 मार्च को कोठानूर इलाके के एक हाई-राइज अपार्टमेंट में एक युवा तकनीकी जोड़ी ने आत्महत्या कर ली। पति भानुचंद्र रेड्डी (32) और पत्नी बीबी शाजिया सिराज (31)। दोनों सॉफ्टवेयर इंजीनियर, दोनों की कमाई लाखों में, अमेरिका में काम का अनुभव, 80 लाख का सालाना पैकेज और सफलता की सारी बाहरी निशानियां। लेकिन अंदर से? नौकरी खोने का भय और बढ़ता तनाव। ठीक उसी दिन जब वैश्विक स्तर पर एआई की वजह से आईटी सेक्टर में भारी छंटनी की खबरें आ रही थीं।

भानुचंद्र अमेरिका में काम कर रहे थे। एआई टूल्स के कारण उनकी टीम में छंटनी हुई और उनकी नौकरी चली गई। भारत लौटकर वे नई नौकरी की तलाश में लगे, लेकिन असफल रहे। चिंता ने उन्हें घेर लिया। स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। अपने सुसाइड नोट में उन्होंने यही लिखा, “नौकरी की अनिश्चितता और लगातार दबाव।” पत्नी शाजिया आईबीएम में नाइट शिफ्ट कर रही थीं। सुबह 7:30 बजे घर लौटीं तो पति का कमरा अंदर से बंद था। सुरक्षा गार्ड ने दरवाजा तोड़ा तो भानुचंद्र फांसी पर लटक रहे थे। शाजिया ने 20 मिनट तक वह दृश्य देखा। फिर वे अचानक 18वें फ्लोर पर पहुंचीं और वाहन से नीचे कूद गईं।


यह घटना एआई क्रांति की उस काली साइड का प्रतीक है जो कल तक ‘भविष्य की तकनीक’ मानी जा रही थी। ठीक उसी दिन, 31 मार्च 2026 को, अमेरिकी सॉफ्टवेयर दिग्गज ओरेकल (Oracle) ने हजारों कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। कंपनी एआई डेटा सेंटर बनाने के लिए भारी निवेश कर रही है। 2026 में 500 करोड़ डॉलर से ज्यादा का कैपिटल निवेश भी किया। लेकिन इस खर्च को पूरा करने के लिए उसने लागत घटाने का फैसला किया। CNBC, ब्लूमबर्ग और बिजनेस इंसाइडर की रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 20,000-30,000 तक के कर्मचारी प्रभावित हुए हैं।

ओरेकल अकेली नहीं। 2026 में एआई की वजह से बिग टेक की छंटनी की लहर चल रही है। अमेजन ने जनवरी में 16,000 कॉर्पोरेट जॉब्स काटे। माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले साल 15,000 पद घटाए। मेटा, एटलासियन, ब्लॉक आदि सभी कंपनियां  एआई के नाम पर कर्मचारियों को ‘रिडंडेंट’ बता रहे हैं। भारत में भी आईटी सेक्टर में 2017 से अब तक 227 से ज्यादा सुसाइड केस दर्ज हुए हैं। एनसीआरबी के 2023 के आंकड़ों के अनुसार कुल 1,71,418 आत्महत्याएं हुईं, जिनमें युवा प्रोफेशनल्स (25-40 साल) की संख्या सबसे ज्यादा हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे जैसे हर शहर में एआई छंटनी का डर युवाओं को घेर रहा है।

समस्या सिर्फ नौकरी चले जाने की नहीं। समस्या है उस चिंता की भी है, जो एआई के नाम पर पैदा हो रही है। एआई टूल्स कोडिंग, डेटा एनालिसिस, यहां तक कि सॉफ्टवेयर डिजाइन में इंसानों से बेहतर साबित हो रहे हैं। कंपनियां सोच रही हैं कि,’कम लोगों से ज्यादा काम’। लेकिन कर्मचारी? उनके लिए यह जीवन-मरण का सवाल बन गया है। ईएमआई, लोन, परिवार की जिम्मेदारी, सब कुछ एक नौकरी पर टिका है। जब नौकरी चली जाती है, तो चिंता डिप्रेशन में बदल जाती है। और समाज? हम अभी भी इसे ‘व्यक्तिगत कमजोरी’ मानते हैं।

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे कहता है कि 80% लोग मानसिक बीमारी का इलाज नहीं लेते। वजह, ‘कलंक’ और सुविधाओं की कमी। भारत में प्रति लाख जनसंख्या पर सिर्फ 0.75 साइकिएट्रिस्ट हैं। जिला स्तर पर मनोवैज्ञानिक क्लिनिक नाममात्र के। हमें एक मजबूत ‘साइकोलॉजिकल इकोसिस्टम’ की जरूरत है। ठीक वैसे ही जैसे सामान्य अस्पतालों का नेटवर्क है। हर जिले में फुल-टाइम मेंटल हेल्थ सेंटर, फ्री या सस्ती ओपीडी, टेली-मेंटल हेल्थ, आयुष्मान भारत में मानसिक स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य। कॉर्पोरेट कंपनियों को कर्मचारी सहायता कार्यक्रम (ईएपी) अनिवार्य करने होंगे लेआउफ के समय न सिर्फ आउटप्लेसमेंट, बल्कि मानसिक सहायता भी देनी चाहिए।

लेकिन इलाज सिर्फ दवाओं और काउंसलिंग तक सीमित नहीं रहना चाहिए। भारतीय संस्कृति में सदियों से ध्यान, योग और भगवद्गीता जैसे ग्रंथ चिंता पर विजय पाने का रास्ता बताते हैं। जब एआई छंटनी का दबाव बढ़े, तो आध्यात्मिक मार्गदर्शन मन को स्थिरता दे सकता है। भगवद्गीता में कर्मयोग की शिक्षा है—कर्म करो, लेकिन फल की चिंता मत करो। “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”। यह सिखाता है कि नौकरी चली जाए तो भी आत्मसम्मान और जीवन का अर्थ खत्म नहीं होता।

ध्यान और योग एंग्जायटी को कम करने में वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हैं। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में अब ‘माइंडफुलनेस’ प्रोग्राम चल रहे हैं। कई कंपनियां कर्मचारियों के लिए योग सेशन्स और आध्यात्मिक सत्र आयोजित कर रही हैं। आध्यात्मिक गुरुओं और काउंसलर्स का कहना है कि जब मन अशांत हो, तो प्रार्थना, सत्संग या गीता पाठ से आंतरिक शक्ति जागृत होती है। यह चिंता को ‘स्वीकार’ करने की क्षमता देता है, कि बदलाव जीवन का हिस्सा है, लेकिन हम उससे ऊपर उठ सकते हैं। ध्यान रखें, आध्यात्मिक मार्गदर्शन पेशेवर मनोचिकित्सा का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक है। जब डॉक्टर की दवा के साथ ध्यान और गीता का ज्ञान जुड़ जाए, तो रिजल्ट बेहतर होता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि आध्यात्मिक प्रैक्टिस डिप्रेशन के मरीजों में रिकवरी रेट बढ़ाती है।

सरकार, कॉर्पोरेट और समाज को मिलकर काम करना होगा। स्कूल-कॉलेज में मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ आध्यात्मिक शिक्षा भी शामिल करें। मीडिया आत्महत्या की खबरों को संवेदनशील तरीके से कवर करे। परिवारों में खुली बातचीत का माहौल बने। बेंगलुरु की यह त्रासदी और ओरेकल जैसी कंपनियों की छंटनी हमें चेतावनी दे रही है। एआई भविष्य है, लेकिन बिना मानवता के नहीं। जब हम मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक बीमारी की तरह देखेंगे, जब अस्पतालों की तरह साइकोलॉजिकल सेंटर्स हर जगह होंगे और जब आध्यात्मिक मार्गदर्शन हमें अंदर से मजबूत करेगा, तब ही हम इस दबाव को पार कर पाएंगे।

भानुचंद्र और शाजिया सिर्फ एक जोड़ी नहीं थे। वे हजारों उन युवा आईटी प्रोफेशनल्स का प्रतिनिधित्व करते हैं जो आज भी चुपचाप एआई छंटनी की चिंता में जूझ रहे हैं। समय आ गया है कि हम बदलें। शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को एक साथ देखें। तभी एक स्वस्थ, सशक्त और संतुलित भारत बनेगा। 


*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।