शुक्रवार, 31 मई 2024

चुनावों में पारदर्शिता पर ज़ोर


2024 के लोकसभा चुनाव अपने अंतिम चरण तक पहुँच गये हैं। आने वाले दिनों में सभी को चुनावी एग्जिट पोल और 4 जून का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा। सभी यह देखना चाहेंगे कि विवादों में घिरी ‘ईवीएम’ किसकी सरकार बनाएगी? हर राजनैतिक दल बड़े-बड़े दावे कर रहा है कि उसका दल या उसके समर्थन वाला समूह सरकार बनाने जा रहा है। ऐसे में यह भी देखना ज़रूरी है कि केंद्रीय चुनाव आयोग जिसकी कार्यशैली पर कई सवाल उठे, वह इस चुनाव को कितनी पारदर्शिता से संपूर्ण करेगा?


देश का आम चुनाव हमेशा से ही एक पर्व की तरह मनाया जाता है। इसमें हर राजनैतिक दल अपने अपने वोटरों के पास अगले पाँच साल के लिए उनके मत की अपेक्षा में उन्हें बड़े-बड़े वादे देकर लुभाने की कोशिश करते हैं। परंतु देश की जनता भी यह जान चुकी है कि दल चाहे कोई भी हो, राजनैतिक वादे सभी दल ऐसे करते हैं कि मानो जनता उनके लिए पूजनीय है और ये नेता उनके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। परंतु क्या वास्तव में ऐसा होता है कि चुनावी वादे पूरे किए जाते हैं? क्यों नेताओं को केवल चुनावों के समय ही जनता की याद आती है? ख़ैर ये तो रही नेताओं की बात। आज जिस मुद्दे पर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जा रहा है वो है चुनावों में पारदर्शिता।


सरकार चाहे किसी भी दल की क्यों न बने। चुनावों का आयोजन करने वाली सर्वोच्च सांविधानिक संस्था केंद्रीय चुनाव आयोग इन चुनावों को कितनी पारदर्शिता से कराती है इसकी बात बीते कई महीनों से सभी कर रहे हैं। चुनाव आयोग की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि हर दल को पूरा मौक़ा दिया जाए और निर्णय देश की जनता के हाथों में छोड़ दिया जाए। बीते कुछ महीनों में चुनाव आयोग पर पहले ईवीएम को लेकर और फिर वीवीपैट को लेकर काफ़ी विवाद रहा। हर विपक्षी दल ने एक सुर में यह आवाज़ लगाई कि देश से ईवीएम को हटा कर बैलट पेपर पर ही चुनाव कराया जाए। परंतु देश की शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश देते हुए अधिक सावधानी बरतने को कहा और ईवीएम को जारी रखा। इन विवादों के बाद चुनावों की मतगणना को लेकर फॉर्म 17सी पर एक नई बहस उठी जो देश की शीर्ष अदालत में जा पहुँची।

दरअसल, फॉर्म 17सी वह फॉर्म होता है जिसमें चुनाव संचालन नियम, 1961 के तहत देशभर के प्रत्येक मतदान केंद्र पर डाले गए वोटों का रिकार्ड होता है। फॉर्म 17सी में मतदान केंद्र के कोड नंबर और नाम, मतदाताओं की संख्या। उन मतदाताओं की संख्या जिन्होंने मतदान न करने का निर्णय लिया। उन मतदाताओं की संख्या जिन्हें मतदान करने की अनुमति नहीं मिली। दर्ज किए गए वोटों की संख्या। खारिज किए गए वोटों की संख्या। वोटों के खारिज करने के कारण। स्वीकार किए गए वोटों की संख्या। डाक मतपत्रों का डाटा भी शामिल होता है। इस जानकारी को मतदान अधिकारियों द्वारा भरा जाता है और प्रत्येक बूथ के पीठासीन अधिकारी द्वारा जाँचा भी जाता है। मतगणना के दिन, गिनती से पहले, फॉर्म 17सी के दूसरे भाग में प्रत्येक बूथ से गिने गए कुल वोट व डाले गए कुल वोटों की समानता को जाँच जाता है। यह व्यवस्था किसी भी पार्टी द्वारा वोटों में हेरफेर से बचने के लिए बनाई गई है। यह डाटा मतगणना केंद्र के पर्यवेक्षक द्वारा दर्ज किया जाता है। प्रत्येक उम्मीदवार (या उनके प्रतिनिधि) को फॉर्म पर हस्ताक्षर करना होता है, जिसे रिटर्निंग अधिकारी द्वारा जांचा जाता है। इसके बाद ही मतों की गिनती शुरू होती है।


ग़ौरतलब है कि मतदान डाटा का उपयोग चुनाव परिणाम को कानूनी रूप से चुनौती देने के लिए किया जा सकता है। एक और जहां चुनावों में ईवीएम से छेड़छाड़ पर सवाल उठाया गया है वहीं फॉर्म 17सी से मतदान में हुई गड़बड़ी (यदि हुई हो तो) का पता चल सकता है। जिस तरह पहले और दूसरे चरण के मतदान के आँकड़ों को जारी करने में देरी व बदलाव को लेकर चुनाव आयोग पर प्रश्न उठा तो विपक्ष ने फॉर्म 17सी को लेकर विवाद खड़ा कर दिया। देश की शीर्ष अदालत में चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रखा और विपक्षी पार्टियों ने अपना पक्ष रखा। परंतु सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई निर्णय नहीं दिया।


बीते सप्ताह देश के नामी वकील और सांविधानिक विशेषज्ञ कपिल सिब्बल ने एक प्रेस सम्मेलन बुलाकर सभी राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों से एक चेकलिस्ट जारी की। सिब्बल ने हर राजनैतिक दल और उनके मतदान/मतगणना एजेंटों के लिए आगामी 4 जून को आम चुनाव की गिनती से पहले जारी की गई इस चेकलिस्ट के माध्यम से यह समझाया है कि उन्हें कब क्या देखना है। सिब्बल के अनुसार “बहुत से लोग कह रहे हैं कि इन मशीनों के साथ संभवतः छेड़छाड़ की गई है। इसलिए, हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके साथ कोई छेड़छाड़ न हो, इससे ज्यादा कुछ नहीं। हम यह नहीं कह रहे कि उनके साथ छेड़छाड़ की गई है। किसी भी मशीन से छेड़छाड़ की जा सकती है। ऐसा नहीं है कि दुनिया में कोई ऐसी मशीन है जिसके साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। हमें इस पर भरोसा है; हम यह नहीं कह रहे हैं कि कोई भरोसा नहीं है।” कपिल सिब्बल की इस चेकलिस्ट का वीडियो सोशल मीडिया पर काफ़ी चर्चा में है। जिस तरह केंद्रीय चुनाव आयोग इवीएम और वीवीपैट को लेकर पहले से ही विवादों में घिरा हुआ है उसे चुनावों में पारदर्शिता का न केवल दावा करना चाहिए बल्कि पारदर्शी दिखाई भी देना चाहिए। इसलिए कपिल सिब्बल द्वारा जारी की गई चेकलिस्ट को सभी राजनैतिक दलों को गंभीरता से लेना चाहिए।

शुक्रवार, 24 मई 2024

ये बिगड़े रईसजादे!


जब कभी कोई ऐसा हादसा होता है जिसमें किसी बड़े नेता, उद्योगपति या किसी मशहूर हस्ती के परिवार का कोई सदस्य शामिल होता है तो वो मामला काफ़ी तूल पकड़ लेता है। ऐसे में अक्सर देखा गया है कि स्थानीय पुलिस भी दबाव में आ जाती है। पुलिस की मजबूरी ऐसी होती है कि उसे दोहरा दबाव झेलना पड़ता है। परंतु यदि पुलिस अपना काम क़ानून के दायरे में रहकर करे तो यह एक कड़ा संदेश भी देता है कि चाहे आप आम हों या ख़ास क़ानून सबके लिए बराबर है। इसके साथ ही यदि न्यायपालिका भी पुलिस पर सही कार्यवाही करने का दबाव बनाए रखे तो कोई भी मशहूर हस्ती या उसके परिवार का सदस्य क़ानून तोड़ने से पहले कई बार सोचेगा। लेकिन ऐसा क्या है कि ऐसे हादसे रुकते नहीं हैं? आए दिन हमें किसी न किसी नामी व्यक्ति के परिवार के सदस्य द्वारा की गई दुर्घटनाओं के नए-नए मामले पता चलते हैं। क्या इन बड़े व रईस परिवारों में संस्कारों की कमी है या संवेदनशीलता की जो ये क़ानून तोड़ने में ज़रा भी संकोच नहीं करते?



ताज़ा मामला पुणे के एक बड़े बिल्डर के नाबालिग बेटे का है जिसने नशे की हालत में अपनी महँगी व तेज़ रफ्तार ‘पोर्श’ कार के रास्ते में आने वाले बाइक सवार दो युवाओं को मौत के घाट उतार दिया। जैसे ही मामले की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे तो पुलिस भी कार्यवाही करती नज़र आई। इतना ही नहीं पुणे के पुलिस आयुक्त को स्वयं ही इस मामले में प्रेस वार्ता कर पुलिस की कार्यवाही की जानकारी देनी पड़ी, जो कि सराहनीय है। परंतु यहाँ सवाल उठता है कि इस हादसे में जिन प्रमुख नियमों का उल्लंघन हुआ है वह तो संवैधानिक चेतावनी के तहत ही आते हैं। जैसे कि 18 वर्ष की आयु से कम होने पर वाहन चलाना। रेस्टोरेंट या पब द्वारा 25 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को नशीले पदार्थ देना। बिना रजिस्ट्रेशन नम्बर के किसी भी कार डीलर द्वारा गाड़ी को सड़क पर आने देना। यह कुछ ऐसे नियम हैं जिनका पालन हर देशवासी को करना चाहिए। फिर वो चाहे ग्राहक हो या बिक्री करने वाला व्यापारी।

ये एक ऐसा उदाहरण हैं जिससे पता चलता है कि हमारा ‘सभ्य और कुलीन’ समाज किस ओर जा रहा है। इस समाज में पैसे वाले या बड़े कहे जाने वाले लोगों की नैतिकता व समाज के प्रति जिम्मेदारी का क्या हाल है? इस वर्ग के लोगों में सिर्फ अपनी खाल बचाने की चिंता किस कदर हावी हो चुकी है? ये कोई मामूली लोग नहीं हैं जो रोजी-रोटी के जुगाड़ में ही परेशान रहते हैं। ये तो ऐसे लोग हैं जिनके पास अकूत पैसा है, बड़े से बड़े वकील रख सकते हैं और कोर्ट-कचहरी के काम के लिए दो तीन आदमी तैनात कर सकते हैं। इस सबके बावजूद इन्हें जानलेवा गलती करके भी कोई पश्चाताप नहीं होता या इसके लिए कुछ भी करने की जरूरत महसूस नहीं होती। बड़े लोगों को अपने बिगड़ैल बच्चों को ही बचाने की फिक्र रहती है। उन परिवारों की कोई भी फ़िक्र नहीं होती जिनके घरों में इनके कारण मातम का माहौल बन  गया।


महंगाई और गरीबी की मार से सताए हुए एक तरफ वे आम लोग हैं जिनमें आज भी नैतिकता और सामाजिक सरोकार बाकी है और दूसरी तरफ ऐसे रईसज़ादे हैं जो पांच सितारा मस्ती में इतना खोए हैं कि आम लोगों को कीड़े-मकौड़े समझते हैं। ग़नीमत है कि इस दुर्घटना के बाद वहाँ की भीड़ ने उस बिगड़े रईसज़ादे को घटना स्थल से भागने नहीं दिया। वरना कर्नाटक की हसन लोकसभा से उम्मीदवार प्रज्वल रेवन्ना की तरह ये बिगड़ैल लाड़ला भी देश छोड़ कर भाग जाता। परंतु सोचने वाली बात यह है कि ऐसी मानसिकता एक दिन में तो पैदा नहीं होती। उसकी एक लंबी पृष्ठभूमि होती है। जैसे संस्कार वे अपने परिवार और परिवेश में देखते हैं वैसा ही बर्ताव फिर वे समाज में करते हैं।


ऐसे हादसों में ज़मानत लेते समय अदालत में बचाव पक्ष भले ही उसे बच्चा कहे, पर यदि उसके मां-बाप उसे बच्चा मानते तो इतनी महँगी कार से पार्टी में नहीं जाने देते। यदि जाना ज़रूरी होता तो कम से कम इस ‘बच्चे’ की हिफाज़त के लिए एक ड्राइवर तो साथ भेजते। पर रातों-रात रईस बनने वाले लोग आज इस बात पर गर्व करते हैं कि उनका बच्चा कौन सी गाड़ी चलाता है? कैसी गाड़ी चलाता है? किस ‘ब्रांड’ के कपड़े पहनता है? कैसी डांस पार्टियां आयोजित करता है? आदि। एक ऐसी ही घनाड्य महिला अपनी मित्र को बता रहीं थी कि उनका 16 साल का बेटा उनकी सातों गाड़ियाँ चला लेता है। इस एक वाक्य में उनकी पूरी मानसिकता का परिचय मिल जाता है। गाड़ी एक चलाए या सातों, क्या फर्क पड़ता है? हां, इस तरह यह ज़रूर पता चलता है कि कानूनों के पालन के प्रति इस वर्ग में कितनी अरूचि है।

कानून तोड़ने की इस संस्कृति से ही पनप रहे ये रईस लोग भारत में उसी मानसिकता से रहते हैं जैसे औपनिवेशिक शासक देश लूटने के लालच में भीषण गर्मी की मजबूरी झेलकर भी यहां पड़े रहते थे। जब तक उन्हें भारत से आर्थिक फायदा मिला, वे यहां टिके रहे। जब भारत उन पर भार बनने लगा, तो इसे छोड़ भागे। क़ानून के प्रति जिम्मेदारी तो मध्यम और निम्न वर्ग के उन युवाओं की है जिन्हें इसी भारत भूमि पर जीना और मरना है। उन्हें चाहिए कि इन रईसजादों के भड़काऊ जीवन की चकाचौंध से भ्रमित न हों बल्कि इनके कारनामों, इनकी जिंदगी और रवैए पर कड़ी निगाह रखें, ताकि भौंडे उपभोक्तावाद के इस नासूर को बढ़ने से पहले ही कुचल दिया जाए। वरना पुणे जैसे हादसे अन्य शहरों में भी होते रहेंगे। 

शुक्रवार, 17 मई 2024

वायरल वीडियो: केवल एक पक्ष न देखें

जब-जब सोशल मीडिया में किसी मुद्दे पर कोई वीडियो वायरल हो जाता है तो ज़्यादातर लोग उसके एक ही पहलू पर ध्यान देते हैं। जबकि समझदारी इसी में है कि तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखा जाए। आजकल के ‘फेक मीडिया’ वाले माहौल में हमें अपना निर्णय लेने से पहले उस वीडियो को गहराई से समझने की आवश्यकता है। हाल ही में दिल्ली व देश के अन्य भागों में कुछ ऐसे वीडियो वायरल हुए जिन्हें देख कर लोगों ने काफ़ी सहानुभूति जताई और कुछ समय बाद जब उसी वीडियो का दूसरा पक्ष सामने आया तो वीडियो को वायरल करने वालों की असलियत पता चली। परंतु हर व्लॉगर (सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट करने वाले प्रोफेशनल) एक जैसे नहीं होते। इनमें कुछ अपवाद भी होते हैं जो मुद्दे की तह तक जाते हैं।


पिछले दिनों दिल्ली के तिलक नगर में एक दस साल के बच्चे का वीडियो इतना वायरल हुआ कि उसके समर्थन में कई जाने-माने लोगों ने सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफ़ार्मों पर उसे खुले आम सहयोग देने की बात कर डाली। इनमें सबसे पहले व्यक्ति थे देश के प्रसिद्ध उद्योगपति आनंद महिंद्रा। इसके बाद फ़िल्म अभिनेता सोनू सूद भी इस बच्चे के समर्थन में उतरे। कहानी दिल्ली में रहने वाले जसप्रीत सिंह की है। इस दस वर्षीय बालक को वीडियो में दिल्ली के तिलक नगर में एक रेढ़ी पर ‘एग रोल’ बनाते हुए दिखाया गया है। वीडियो बनाने वाले ने जब उस मासूम बालक से पूछा कि वो ये काम  क्यों कर रहा है तो उसका जवाब था कि “मुझ पर अपनी बहन की ज़िम्मेदारी है।” जब उससे यह पूछा गया कि उसके माता-पिता कहाँ है तो वो बोला कि, “पिता की मृत्यु हो गई और माँ छोड़ कर चली गई।” बस फिर क्या था वीडियो बनाने वाले ने जो शुरुआत की उसे कई अन्य व्लॉगर्स ने भी खूब वायरल कर डाला। जसप्रीत पर बने लगभग हर वीडियो ने यही दर्शाया कि ‘दस वर्ष की उम्र में घर चलाने को मजबूर’, ‘पिता की मृत्यु हो गई और माँ छोड़ कर चली गई।’ ऐसे प्रचार होने लगे कि जो भी इस वीडियो को देखे उसका दिल भर आए। जसप्रीत की ख़ुद्दारी ऐसी है कि उसे किसी से भी वित्तीय सहायता नहीं चाहिए। ऐसा सुनकर कुछ लोगों ने उसके स्टाल से सैंकड़ों रोल बनवा कर लंगर में बँटवाए जिससे कि जसप्रीत के स्वाभिमान को ठेस न पहुँचे।   


यदि देश के जाने-माने लोगों ने ऐसे  वीडियो को देख कर उस बालक का समर्थन किया है तो इसे ग़लत नहीं माना जा सकता। ये बात सत्य है कि जसप्रीत के पिता की बीमारी के कारण मृत्यु हुई। यह भी सत्य है कि जसप्रीत स्कूल जाने के साथ-साथ एक ठेले पर एग रोल बेचने को मजबूर है। यह भी सत्य है कि उसकी माँ उसके साथ नहीं रहती। परंतु क्या किसी भी व्लॉगर ने इस बात को जानने का प्रयास किया कि ऐसी कौन माँ होगी जो अपने पति की मृत्यु के चार दिन ही बाद अपने छोटे बच्चों को छोड़ कर अपने मायके चली जाएगी? पर क्या किसी ने उस माँ का पक्ष जानने की कोशिश की? दिल्ली में सामाजिक कार्य करने वाले एक शख़्स सरदार हरमीत सिंह पिंका ने इस दिशा में पहल की। वे जसप्रीत के स्टाल पर गये और उससे बातचीत के दौरान उसकी माँ का पता लिया। इस बीच उन्होंने कुछ स्थानीय लोगों की मदद से जसप्रीत के लिये एक चमचमाता हुआ आधुनिक स्टाल भी बनवाया। सच की खोज में वे पंजाब के राजपुरा पहुँचे। जहां जसप्रीत की माँ सिमरन कौर का मायका था। हरमीत सिंह ने सिमरन कौर के साथ बातचीत का वीडियो भी यूट्यूब पर डाला। इतना ही नहीं उन्होंने इस बिखरे हुए परिवार को जोड़ने का भी प्रयास किया। क्योंकि जसप्रीत की माँ किसी मजबूरी में ही घर छोड़ कर गयी थी।

आज हर व्लॉगर को सरदार हरमीत सिंह पिंका से सबक़ लेना चाहिए। आपको याद होगा कि किस तरह दक्षिण दिल्ली के एक ढाबा चलाने वाले ‘बाबा’ का वीडियो वायरल कर कुछ व्लॉगर्स ने पैसे इकट्ठा करने शुरू कर दिये थे। ‘बाबा का ढाबा’ के नाम से वायरल हुए वीडियो और उससे जुड़े एक व्लॉगर के गोरख धंधे की पोल भी बहुत जल्द खुल गई और उस व्लॉगर को सरेआम सभी से माफ़ी भी माँगनी पड़ी। उस व्लॉगर द्वारा ‘बाबा के ढाबा’ के नाम पर इकट्ठा किए पैसे भी लौटाने पड़े। दरअसल बहुत जल्दी और बहुत ज़्यादा प्रसिद्धि पाने की नीयत से कुछ लोग जनता को गुमराह कर देते हैं। बिना इस बात को सोचे कि ऐसा करने से जो सच्चे और सुपात्र लोग होते हैं उन्हें भी शक की नज़र से देखा जाता है।

इसी श्रृंखला में दिल्ली में ‘वायरल वड़ा-पाव’ के नाम से जाने जाने वाली चंद्रिका दीक्षित हैं। ये भी बहुत जल्द प्रसिद्ध होने वाली एक और सोशल मीडिया की शख़्सियत हैं। ये जितनी जल्दी प्रसिद्ध हुईं उतनी ही जल्दी विवाद में भी आईं। इनके दोनों तरह के वीडियो आज सोशल मीडिया पर वायरल हैं। परंतु सोचने वाली बात यह है कि पहले प्रसिद्ध होने पर और फिर दूसरा पहलू सामने आने पर आम जनता को ठगने वाले व्लॉगर्स पर लगाम कैसे लगाई जाए? इसलिए जब भी कभी आपके पास कोई वायरल वीडियो पहुँचता है तो आप इसके दूसरे पहलू की जाँच की माँग अवश्य करें। आज के दौर में वायरल वीडियो का दूसरा पहलू उजागर करने वाले व फैक्ट चेक करने वाले व्लॉगर की संख्या गिनी-चुनी अवश्य है परंतु जब तक ऐसे व्लॉगर हमारे समाज में सक्रिय रहेंगे तब तक मासूम जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करना आसान नहीं होगा।            

शुक्रवार, 10 मई 2024

गिग वर्कर्स: अपने बॉस स्वयं बनें


एक दौर था जब पढ़ाई लिखाई पूरी करने के बाद हर युवक को नौकरी या व्यवसाय में प्रवेश करना ही पड़ता था। फिर शुरू होती थी उनके जीवन में 9 से 5 की दिनचर्या। जैसे-जैसे समय बदला नौकरी और व्यापार के माहौल में भी बदलाव आए। लेकिन जब से कोविड की महामारी आई उसने दुनिया भर में ‘वर्क फ्रॉम होम’ का चलन शुरू कर दिया। दुनिया भर में सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति के बाद, आज हर किसी के हाथ में एक स्मार्ट फ़ोन देखा जा सकता है और मेज़ पर कंप्यूटर। इस क्रांति ने दुनिया भर के हर कोने में व्यक्तियों को एक दूसरे से जोड़ दिया है। आज अधिकतर युवा और प्रोफेशनल किसी की नौकरी करना पसंद नहीं करते। वे ख़ुद के ही बॉस बनने में विश्वास रखते हैं। ऐसे काम करने वालों को ‘गिग वर्कर्स’ कहा जाता है।


आम तौर पर ‘उबर’ ‘ओला’ जैसी टैक्सी चलाने वाले या खाना व अन्य वस्तुएँ डिलीवर करने वालों को ‘गिग वर्कर’ माना जाता है। परंतु ऐसा सोचना सही नहीं है। आज के दौर में हर वो व्यक्ति या प्रोफेशनल जो किसी भी कंपनी में मासिक वेतन की सूची में नहीं है, परंतु वो किसी न किसी कंपनी के लिए कुछ न कुछ कार्य कर रहा है वो ‘गिग वर्कर’ की श्रेणी में आता है। फिर वो चाहे पत्रकार हो, वकील हो, आर्किटेक्ट हो, लेखक हो, फ़ोटग्राफ़र हो, वेब डिज़ाइनर हो या अन्य कोई भी हो, जो भी किसी बड़ी या छोटी कंपनी या संस्था के लिए एक विशेष प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहा है वो गिग वर्कर, फ्रीलांसर या सलाहकार की श्रेणी में ही आता है। ऐसा करने से उस कंपनी को भी अपने वैतनिक कर्मचारी की संख्या बढ़ानी नहीं पड़ती। ऐसे में ‘गिग वर्कर’ उस कंपनी के न सिर्फ़ ऊपरी ख़र्च भी घटाते हैं बल्कि कार्य कुशलता के साथ उस प्रोजेक्ट या असाइनमेंट को पूरा भी करते हैं।


‘गिग वर्कर’ होने के कई फ़ायदे भी हैं। ऐसा कार्य करने वाला हर व्यक्ति अपनी मर्ज़ी का मालिक होता है। जब भी मन करे वो काम पर हो सकता है और जब भी मन करे वो छुट्टी पर हो सकता है। उसे किसी से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती। यदि आप इस श्रेणी में आने वाली महिला हैं और आपके घर में एक छोटा बच्चा है जिसे आपकी देखभाल की ज़रूरत है, तो आप अपने बच्चे की दिनचर्या पूरी कर, उसे सुलाने के बाद अपने कंप्यूटर की मदद से ‘ऑनलाइन’ आ सकती हैं। हाँ ऐसे में आपकी सेवा केवल वही कंपनी लेंगी जिनका उस समय काम का समय होगा। ऐसे में ‘एक पंथ दो काज’ बड़े आराम से हो सकते हैं और आप घर बैठे दुनिया के किसी भी कोने में अपनी क्षमता अनुसार किसी कंपनी को अपनी सेवा दे सकते हैं।  


मुझे याद है जब 2013 में मैं दुबई गया था वहाँ टैक्सी चलाने वाले एक दक्षिण भारतीय से पूछा कि दुबई में काम करने के लिए अधिकतर लोग भारत या अन्य देशों से ही आते हैं। इन्हें दुबई में काम करने पर कैसा माहौल मिलता है? वो काफ़ी संतुष्टि से बोला कि हम बहुत सुखी हैं। यहाँ की सरकार हमारा बहुत ध्यान रखती है। हम अच्छा पैसा कमाते हैं। जब मैंने उससे उसकी औसत कमाई पूछी तो उसने बताया क़रीब एक लाख रुपए कमा लेता हूँ। जैसे ही मैंने उसकी तनख़्वाह पूछी तो वह बोला कि हमें प्रति किलोमीटर कमीशन मिलती है। हम अधिक से अधिक समय गाड़ी चलाना पसंद करते हैं। जब मन करता है ड्यूटी ऑफ कर लेते हैं। कुछ ही वर्षों बाद जब से भारत में ‘उबर’ ‘ओला’ की टैक्सियों का चलन बढ़ने लगा तो इनके ड्राइवरों से भी कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया मिली। आज भारत में ऐप से चलने वाली कई टैक्सी सेवाएँ हैं जो आपको कभी भी और कहीं भी ले जा सकती हैं। ऐसे में यदि आप स्वयं गाड़ी ख़रीद कर रखें तो उसके रख-रखाव आदि के ख़र्च से भी बच जाते हैं। इतना ही नहीं आप प्रदूषण की रोकथाम में भी सहयोगी बनते हैं। इसके साथ ही किसी बेरोज़गार को रोज़गार भी मिल जाता है।


जिस तरह आज आपको घर बैठे ही कुछ भी सामान, कभी भी और कहीं भी मंगाना हो तो आप झट से अपने स्मार्ट फ़ोन की मदद से उसे उपलब्ध करा लेते हैं। ऐसा तभी संभव होता है कि क्योंकि इसे कामयाब करने के लिए ऐसे लाखों ‘गिग वर्कर्स’ की एक फ़ौज दुनिया भर में तैनात है और हर दिन इसमें बढ़ौतरी हो रही है। ज़्यादातर लोग ‘गिग वर्कर्स’ को टैक्सी चलाने वाले और सामान डिलीवर करने वाले ही समझते हैं। परंतु ऐसा नहीं है। आँकड़ों के अनुसार अमरीका जैसे देश में 5.73 करोड़ ‘गिग वर्कर’ हैं। एक अनुमान के तहत 2027 आते-आते अमरीका में काम करने वालों की 50 प्रतिशत संख्या ‘गिग वर्कर्स’ की होगी। भारत की ही बात करें तो 2021 में ही ‘गिग वर्कर्स’ की संख्या क़रीब 1.5 करोड़ थी जो हर दिन बढ़ती जा रही है। एक शोध के अनुसार 2023 के अंत तक दुनिया भर की अर्थ व्यवस्था में ‘गिग वर्कर’ के ज़रिये क़रीब 45.5 करोड़ डॉलर का योगदान हुआ।

दुनिया भर में ऐसे कई प्लेटफार्म हैं जो ‘गिग वर्कर’ को ऐसी कई कंपनियों या व्यक्तियों से जोड़ते हैं जो मासिक तनख़्वाह पाने वाले कर्मचारी नहीं रखना चाहते। इसलिए यदि आप अपने लिए घर बैठे ही कोई रोज़गार देख रहे हैं तो आप इस विषय में भी सोचें कि ‘गिग वर्कर’ बन कर आप न सिर्फ़ स्वयं के बॉस बन सकते हैं बल्कि अपनी मर्ज़ी अनुसार काम पर आ-जा सकते हैं। आज के तनाव भरे माहौल में यदि आपको अपने लिए व अपनों के लिए समय निकालना है तो ‘गिग वर्कर’ एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है।

शुक्रवार, 3 मई 2024

सेवा भाव से चलता एशिया का सबसे बड़ा अस्पताल


कुछ समय पहले इसी कॉलम में हमने पाठकों को बीमा कंपनियों और कुछ निजी अस्पतालों के द्वारा चल रहे ‘मेडिक्लेम’ के गोरखधंधे के बारे में अवगत कराया था। परंतु क्या सभी निजी अस्पतालों में मेडिक्लेम के नाम पर ग़ैर ज़रूरी खर्चे कराए जाते हैं? क्या सभी अस्पताल मरीज़ों को कमाई का ज़रिया मानते हैं? जिस तरह पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होतीं उसी तरह हर क्षेत्र में आपको अपवाद भी मिलेंगे। आज एशिया के सबसे बड़े निजी अस्पताल की बात करेंगे जहां हर मरीज़ का  पूरे सेवा भाव से ही उपचार किया जाता है।

पिछले सप्ताह दिल्ली से सटे फ़रीदाबाद स्थित नवनिर्मित अमृता अस्पताल में जाना हुआ। जैसे ही अस्पताल के मेन गेट से प्रवेश किया तो 2016 का वो दृश्य याद आया जब इस अस्पताल की नींव रखे जाने का मैं साक्षी बना था। तब के बाद अब जब इस अस्पताल में गया तो ऐसा लगा ही नहीं कि मैं भारत के किसी अस्पताल में हूँ। 135 एकड़ के विशाल परिसर में आपको भरपूर हरियाली, साफ़ सुथरे बगीचे, व्यवस्थित सेवाएँ और मार्गदर्शक बोर्ड दिखाई देंगे।

2,600 बिस्तरों की क्षमता वाले इस अस्पताल में जैसे ही आप प्रवेश करेंगे, तो चाहे सुरक्षा कर्मी हो या अस्पताल का कोई अन्य स्टाफ़ वो आपको ‘ॐ नमः शिवाय’ कह कर स्वागत करते हैं। चमचमाते हुए फ़र्श और पूरी तरह व्यवस्थित अस्पताल के मुख्य कक्ष में घुसते ही आपको यह बिलकुल भी महसूस नहीं होगा कि आप एक अस्पताल में आए हैं। देश के महँगे से महँगे निजी अस्पताल में भी आपको मरीज़ों और उनके तीमारदारों का शोर सुनाई देगा। परंतु अमृता अस्पताल की पार्किंग में खड़ी गाड़ियों की संख्या को देख अगर आप यह सोचें कि अस्पताल में काफ़ी भीड़ होने की संभावना है, तो आप ग़लत होंगे। इतने बड़े और सुनियोजित अस्पताल में आपको कहीं भी भीड़ नहीं दिखाई देगी।

दुनिया भर में करोड़ों लोगों को गले लगा कर आशीर्वाद देने वाली भारत की आध्यात्मिक शख़्सियत माता अमृतानंदमयी माँ जिन्हें सब ‘अम्मा’ कह कर पुकारते हैं, के माता अमृतानंदमयी मठ द्वारा संचालित यह इस संस्था द्वारा चलाए जाने वाला देश का दूसरा बड़ा अस्पताल है।

एक परिवार कितना विकसित होता है और कैसे एक ख़ुशहाल और मज़बूत परिवार के रूप में उभर कर आता है यह निर्भर करता है उस घर के ‘मुखिया’ पर। यदि घर का मुखिया अनुशासित हो, तो परिवार भी अनुशासन में रहता है। इस बात का जीता-जागता उदाहरण है ‘अम्मा’ का परिवार। ‘अम्मा’ के अस्पतालों में सभी को इस बात पर विशेष ध्यान देने को कहा जाता है कि मरीज़ों का सेवा भाव से ही इलाज किया जाए। किसी को भी अमीर या ग़रीब समझ कर किसी भी तरह का फ़र्क़ न किया जाए।

अन्य महँगे निजी अस्पतालों की तुलना में जब भी कोई मरीज़ यहाँ पहली बार आता है तो उसे अपना पंजीकरण कराने के लिए मात्र 50 रुपये ही देने होते हैं जो कि आजीवन पंजीकरण शुल्क है। यहीं किसी भी डॉक्टर को दिखाने के लिए ओपीडी चार्ज मात्र 400 रुपये है। आज की महँगाई के दौर में दिल्ली जैसे महानगर में यदि आप किसी भी मामूली से क्लिनिक में जाएँ तो डॉक्टर को दिखाने की फ़ीस 500 से 1000 तक होती है। वहीं अगर आप किसी बड़े निजी अस्पताल में जाएँ तो ओपीडी चार्ज के नाम पर आपकी जेब से क़रीब 2000 रुपये ख़र्च हो जाएँगे।

मैंने जब अमृता अस्पताल के आईसीयू वार्ड में कदम रखा तो यह देख कर चौंक गया कि इस वार्ड में न तो अन्य अस्पतालों की तरह एक ख़ास तरह के केमिकल की गंध आ रही थी और न ही मरीज़ों के साथ जुड़ी हुई मशीनों की तेज़ बीप सुनाई दे रही थी। आईसीयू वार्ड में जो एक विशेष बात देखी वह थी मरीज़ों को इन्फेक्शन से बचाने का एक नया तरीक़ा। इस वार्ड में सेंसर द्वारा स्वचालित काँच के दरवाज़े हैं जो बिना छुए खुलते हैं। इन दरवाज़ों के सेंसर एक विशेष स्थान पर लगे हैं जिससे कि मरीज़ तक केवल डॉक्टर या नर्स की अनुमति से ही प्रवेश किया जा सकता है। देश भर में किसी भी आईसीयू वार्ड में ऐसा पहली बार हुआ है। हर बेड पर लगे मरीज़ का रिकॉर्ड दर्ज करने वाले पारंपरिक तख़्तों की जगह एक कंप्यूटर स्क्रीन ने ले ली है जिस पर मरीज़ का पूरा रिकॉर्ड अस्पताल के सर्वर पर दर्ज होता है। अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारी किसी भी समय पर किसी भी वार्ड में औचक निरीक्षण करने आते रहते हैं। इससे अस्पताल में साफ़-सफ़ाई और व्यवस्था बनी रहती है। अन्य महँगे निजी अस्पतालों की तुलना में यहाँ पर प्राइवेट कमरा केवल 5500 प्रतिदिन पर मिल जाता है।

अस्पताल के संचालन में लगे हुए सभी वरिष्ठ अधिकारी यहाँ सेवा भाव से कार्य करते हैं। ये सभी व्यक्ति विभिन्न क्षेत्रों से आए हुए अनुभवी लोग हैं जो ‘अम्मा’ के प्रति समर्पित हैं। ये सभी अस्पताल की व्यवस्था बनाए रखने के लिए सभी को प्रेरित करते हैं। बातों-बातों में वरिष्ठ अधिकारियों ने मुझे बताया कि कुछ अन्य निजी अस्पतालों की तुलना में हम अमृता अस्पताल के सभी डॉक्टरों को यह बात स्पष्ट रूप से कहते हैं कि इस अस्पताल में किसी भी डॉक्टर के पास किसी भी तरह का कोई ‘टारगेट’ नहीं है। उन्हें केवल मरीज़ को सही और ज़रूरी उपचार ही देना है। अम्मा के अस्पतालों में केवल सेवा भाव से ही इलाज किया जाता है और इस बात को सुनिश्चित किया जाता है कि उपचार के बाद यहाँ से जाते हुए मरीज़ और उसका परिवार हँसता हुआ जाए। देश के सभी अस्पतालों को अम्मा से प्रेरणा लेनी चाहिए।