आज के डिजिटल युग में, जहां सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स ने सूचना के प्रसार को अभूतपूर्व गति दी है, ज्योतिष भी इस डिजिटल क्रांति का हिस्सा बन गया है। यूट्यूब, इंस्टाग्राम, और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर ज्योतिष से संबंधित वीडियो की बाढ़ सी आ गई है। इनमें से कई वीडियो दावा करते हैं कि वे ‘त्वरित सफलता’ के मंत्र, उपाय या टोटके प्रदान करते हैं, जो कुछ ही दिनों में जीवन की समस्याओं को हल कर सकते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ये वीडियो वास्तव में लोगों की मदद कर रहे हैं या यह केवल अज्ञानी और अनुभवहीन ‘ज्योतिषियों’ द्वारा लोकप्रियता और दर्शकों की संख्या बढ़ाने का एक हथकंडा है? दूसरी ओर, पारंपरिक और अनुभवी ज्योतिषी जो जन्म कुंडली के गहन विश्लेषण के बाद ही उपाय सुझाते हैं, उनकी विश्वसनीयता और प्रामाणिकता की तुलना में ये तथाकथित ‘त्वरित उपाय’ कितने प्रभावी हैं?
सोशल मीडिया पर उपलब्ध ज्योतिषीय वीडियो में अक्सर आकर्षक शीर्षक देखने को मिलते हैं, जैसे ‘तीन दिन में धन प्राप्ति का चमत्कारी उपाय’ या ‘इस मंत्र से बदल जाएगी आपकी किस्मत।’ ये वीडियो आमतौर पर छोटे, तेज़ी से संपादित और मनोरंजक होते हैं, जो दर्शकों का ध्यान तुरंत खींचते हैं। इनमें बताए गए उपाय सरल और त्वरित लगते हैं, जैसे किसी विशेष रंग का धागा बांधना, कोई मंत्र जपना, या किसी वस्तु को घर में रखना। वृंदावन में कई वर्षों से ज्योतिष विद्या कर रहे सुप्रसिद्ध आचार्य राजेश पाण्डे के अनुसार, “इन उपायों का कोई वैदिक या ज्योतिषीय आधार नहीं होता। ज्योतिष एक जटिल विद्या है, जिसमें ग्रहों, नक्षत्रों और कुंडली के बारह भावों का गहन अध्ययन शामिल होता है। बिना किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली का विश्लेषण किए, सामान्य उपाय देना न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि यह लोगों को गलत दिशा में ले जा सकता है।”
आचार्य पाण्डे जी कहते हैं कि, “ऐसे वीडियो का उद्देश्य अक्सर दर्शकों की भावनाओं को भुनाना होता है। कम समय में ज्योतिष विद्या कभी भी नहीं सीखी जा सकती।” दिल्ली में कई वर्षों से ज्योतिष विद्या का कार्य कर रहे एक अन्य ज्योतिषाचार्य का विचार है कि, “आज के समय में, जहां लोग तनाव, आर्थिक समस्याओं और अनिश्चितता से जूझ रहे हैं, वे त्वरित समाधान की तलाश में होते हैं। इन वीडियो में दिए गए उपाय आशा की किरण की तरह प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तव में ये केवल सतही और अस्थायी प्रभाव डालते हैं। कई बार, ये उपाय न केवल अप्रभावी साबित होते हैं, बल्कि लोगों का समय, धन और विश्वास भी बर्बाद करते हैं।”
विशेषज्ञों के अनुसार, प्रामाणिक और अनुभवी ज्योतिषी किसी भी उपाय को सुझाने से पहले व्यक्ति की जन्म कुंडली का गहन अध्ययन करते हैं। ज्योतिष शास्त्र में, प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली अलग होती है, जो उनके जन्म के समय ग्रहों की स्थिति पर आधारित होती है। कुंडली में ग्रहों के गोचर, दशा, अंतर्दशा और विभिन्न योगों का विश्लेषण करके ही यह तय किया जाता है कि व्यक्ति को किस प्रकार के उपाय की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि की साढ़ेसाती चल रही है, तो ज्योतिषी विशिष्ट मंत्र, दान, या पूजा की सलाह दे सकते हैं, जो उस व्यक्ति की स्थिति के लिए उपयुक्त हो। यह प्रक्रिया समय लेने वाली और जटिल होती है, लेकिन यह अधिक विश्वसनीय और प्रभावी होती है।
प्रामाणिक ज्योतिषी यह भी समझते हैं कि ज्योतिष केवल भविष्यवाणी या उपाय देने तक सीमित नहीं है। यह एक मार्गदर्शन प्रणाली है, जो व्यक्ति को उनकी ताकत, कमजोरियों और जीवन की संभावनाओं को समझने में मदद करती है। इसके विपरीत, तथाकथित ‘त्वरित सफलता’ वीडियो सामान्यीकृत समाधान प्रदान करते हैं, जो हर व्यक्ति पर लागू नहीं हो सकते। उदाहरण के लिए, एक ही उपाय जो एक व्यक्ति के लिए लाभकारी हो सकता है, वह दूसरे के लिए हानिकारक भी हो सकता है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली अलग होती है।
यह विचारणीय है कि क्या ये त्वरित सफलता के मंत्र देने वाले वीडियो केवल लोकप्रियता और दर्शक संख्या बढ़ाने का एक हथकंडा हैं। सोशल मीडिया पर व्यूज, लाइक्स और सब्सक्राइबर्स की संख्या सीधे तौर पर आय से जुड़ी होती है। इसलिए, कई अनुभवहीन या स्वयंभू ज्योतिषी आकर्षक और सनसनीखेज सामग्री बनाकर दर्शकों को लुभाने की कोशिश करते हैं। वे जटिल ज्योतिषीय सिद्धांतों को सरल और त्वरित समाधानों में बदल देते हैं, जो वास्तव में ज्योतिष शास्त्र की गहराई को कमजोर करते हैं।
आचार्य पाण्डे जी के अनुसार, “कुछ लोग केवल सतही जानकारी के आधार पर वीडियो बनाते हैं, जो किताबों, इंटरनेट, या अन्य स्रोतों से ली गई होती है। इनमें से कई स्वयंभू ज्योतिषियों के पास न तो औपचारिक प्रशिक्षण होता है और न ही गहन अनुभव। फिर भी, वे अपने आत्मविश्वास, आकर्षक प्रस्तुति और मार्केटिंग रणनीतियों के दम पर लाखों दर्शकों तक पहुंच जाते हैं। यह न केवल ज्योतिष की विश्वसनीयता को कम करता है, बल्कि उन लोगों को भी निराश करता है, जो इन उपायों पर भरोसा करते हैं।”
ज्योतिष एक प्राचीन और सम्मानित विद्या है, जिसका उपयोग सदियों से लोगों के मार्गदर्शन के लिए किया जाता रहा है। लेकिन इस तरह के भ्रामक वीडियो इसकी साख को नुकसान पहुंचा रहे हैं। जब लोग इन तथाकथित उपायों को आजमाते हैं और उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता, तो वे न केवल उन वीडियो पर विश्वास खो देते हैं, बल्कि पूरे ज्योतिष शास्त्र पर ही सवाल उठाने लगते हैं। यह उन अनुभवी ज्योतिषियों के लिए भी चुनौती बनता है, जो वर्षों के अध्ययन और अभ्यास के बाद लोगों की मदद करते हैं।
अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि त्वरित सफलता के मंत्र देने वाले ज्योतिषीय वीडियो अधिकांशतः भ्रामक और लोकप्रियता के लिए बनाए जाते हैं। ये वीडियो लोगों की भावनाओं और आशाओं का शोषण करते हैं, वो भी बिना किसी ठोस आधार के। दूसरी ओर, प्रामाणिक ज्योतिषी, जो कुंडली के गहन विश्लेषण के बाद उपाय सुझाते हैं, अधिक विश्वसनीय और प्रभावी होते हैं। इसलिए, लोगों को चाहिए कि वे ऐसे वीडियो पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय, किसी अनुभवी और विश्वसनीय ज्योतिषी से संपर्क करें। ज्योतिष एक विज्ञान और कला का मिश्रण है, जो तभी प्रभावी होता है जब इसे गंभीरता और जिम्मेदारी से अपनाया जाए। त्वरित सफलता का लालच छोड़कर, हमें धैर्य और समझदारी के साथ सही मार्गदर्शन की तलाश करनी चाहिए। तभी हम ज्योतिष के वास्तविक लाभों को प्राप्त कर सकते हैं और इस प्राचीन विद्या की गरिमा को बनाए रख सकते हैं।
*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।
शुक्रवार, 29 अगस्त 2025
शुक्रवार, 22 अगस्त 2025
कॉफी पाउडर में कॉकरोच: शाकाहारियों के मन में बढ़ता संकट !
भारत में कॉफी और चाय न केवल एक पेय हैं, बल्कि यह हमारे सामाजिक मेलजोल और रोजमर्रा की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। सुबह की ताजगी हो या दोस्तों के साथ गपशप, कॉफी का एक कप हमें जोड़ता है। लेकिन क्या हो अगर यह कॉफी, जिसे हम शुद्ध और शाकाहारी मानते हैं, वास्तव में शाकाहारी न हो? हाल ही में सोशल मीडिया में कुछ खबरों और अध्ययनों ने यह चौंकाने वाला खुलासा किया है कि कॉफी पाउडर में कॉकरोच जैसे कीड़ों की मिलावट हो सकती है। यह न केवल खाद्य सुरक्षा का सवाल उठाता है, बल्कि उन लाखों शाकाहारी लोगों के विश्वास को भी तोड़ता है जो अपने आहार को लेकर सजग रहते हैं। पेयों और खाद्य पदार्थों में बढ़ती मिलावट की समस्या एक गंभीर मुद्दा है जिसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।
कॉफी पाउडर में कॉकरोच की मौजूदगी का विचार ही किसी के लिए भी घृणित हो सकता है। लेकिन यह केवल एक डरावनी कहानी नहीं, बल्कि एक वास्तविकता है जो खाद्य प्रसंस्करण और गुणवत्ता नियंत्रण की कमियों को उजागर करती है। कुछ अध्ययनों और उपभोक्ता शिकायतों के अनुसार, सस्ते और निम्न गुणवत्ता वाले कॉफी पाउडर में कीड़े, कॉकरोचों के अवशेष और अन्य अशुद्धियां पाई गई हैं। यह समस्या विशेष रूप से उन ब्रांडों में देखी गई है जो लागत कम करने के लिए निम्न गुणवत्ता वाले कच्चे माल का उपयोग करते हैं या जिनके उत्पादन इकाइयों में स्वच्छता मानकों का पालन नहीं होता।
कॉकरोच जैसे कीड़े न केवल कॉफी को अशुद्ध करते हैं, बल्कि इसे शाकाहारी पेय की श्रेणी से बाहर भी ले जाते हैं। भारत जैसे देश में, जहां शाकाहार न केवल एक आहार है, बल्कि एक धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्य भी है, यह एक गंभीर मुद्दा है। शाकाहारी लोग अपने भोजन और पेय में पशु-आधारित सामग्री से बचते हैं, लेकिन ऐसी मिलावट उनकी पसंद और विश्वास का उल्लंघन करती है। यह न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि नैतिकता और विश्वास का भी सवाल है। वहीं यदि कोई कॉफ़ी के साबुत बीन्स को स्वयं ही पीस कर कॉफ़ी बनाए तो उसमें मिलावट का डर नहीं रहता।
कॉफी पाउडर में कॉकरोचों की मिलावट केवल एक उदाहरण है। खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या भारत में लंबे समय से चली आ रही है। दूध, मसाले, शहद, घी और यहाँ तक कि अनाज जैसे रोजमर्रा के खाद्य पदार्थ भी मिलावट का शिकार हैं। उदाहरण के लिए, दूध में पानी, यूरिया या डिटर्जेंट मिलाने की खबरें आम हैं। मसालों में कृत्रिम रंग, चूरा या ईंट का पाउडर मिलाया जाता है। शहद में चीनी का सिरप और घी में वनस्पति तेल की मिलावट कोई नई बात नहीं है।
इनमें से कई मिलावटें न केवल शाकाहारी भोजन को प्रभावित करती हैं, बल्कि कुछ मामलों में पशु-आधारित सामग्री भी शामिल हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, कुछ सस्ते घी ब्रांडों में पशु वसा (animal fat) की मिलावट भी पाई गई है, जिसे शाकाहारी लोग पूरी तरह से अस्वीकार करते हैं। इसी तरह, कुछ मिठाइयों और बेकरी उत्पादों में अंडे या पशु-आधारित जेलाटिन का उपयोग होता है, जिसे पैकेजिंग पर स्पष्ट रूप से नहीं बताया जाता। यह शाकाहारी उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ा धोखा है, जो अपने भोजन को लेकर सावधानी बरतते हैं।
मिलावट का प्रभाव केवल स्वाद या गुणवत्ता तक सीमित नहीं है, यह स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है। कॉकरोच और अन्य कीड़े बैक्टीरिया और रोगजनकों के वाहक हो सकते हैं, जो कॉफी के सेवन से पेट की बीमारियों, एलर्जी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं। इसके अलावा, मिलावटी खाद्य पदार्थों में रासायनिक पदार्थों का उपयोग, जैसे कृत्रिम रंग या संरक्षक, दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं जैसे कैंसर, गुर्दे की बीमारी और हृदय रोगों को जन्म दे सकता है।
नैतिक दृष्टिकोण से, यह उपभोक्ताओं के साथ विश्वासघात है। शाकाहारी लोग अपने आहार को लेकर इसलिए सजग रहते हैं क्योंकि यह उनकी धार्मिक, सांस्कृतिक या पर्यावरणीय मान्यताओं का हिस्सा है। जब उन्हें पता चलता है कि उनके द्वारा खाया या पिया गया भोजन शाकाहारी नहीं है, तो यह उनके विश्वास और मूल्यों पर चोट करता है। इसके अलावा, यह खाद्य कंपनियों और नियामक संस्थानों पर सवाल उठाता है कि वे उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा क्यों नहीं कर पा रहे हैं।
मिलावट की समस्या के कई कारण हैं। पहला, लागत कम करने की होड़ में कुछ निर्माता निम्न गुणवत्ता वाले कच्चे माल का उपयोग करते हैं और स्वच्छता मानकों की अनदेखी करते हैं। दूसरा, खाद्य सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन न होना और निरीक्षण की कमी। तीसरा, उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी, जिसके कारण वे सस्ते और मिलावटी उत्पादों को खरीद लेते हैं।
इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब सभी हितधारक मिलकर काम करें। सरकार को खाद्य सुरक्षा मानकों को और सख्त करना चाहिए और नियमित निरीक्षण सुनिश्चित करना चाहिए। खाद्य कंपनियों को पारदर्शिता बरतनी चाहिए और अपने उत्पादों की सामग्री को स्पष्ट रूप से पैकेजिंग पर उल्लेख करना चाहिए। उपभोक्ताओं को भी जागरूक होना होगा और विश्वसनीय ब्रांडों को चुनना होगा। इसके अलावा, शाकाहारी लोग अपने भोजन की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए घर पर कॉफी बीन्स को पीसने या प्रमाणित शाकाहारी उत्पादों का उपयोग करने जैसे विकल्प चुन सकते हैं।
कॉफी पाउडर में कॉकरोचों की मिलावट और अन्य खाद्य पदार्थों में पशु-आधारित सामग्री का मिश्रण न केवल एक स्वास्थ्य संकट है, बल्कि यह शाकाहारी लोगों के विश्वास और मूल्यों पर भी हमला है। यह समय है कि हम खाद्य मिलावट के खिलाफ एकजुट हों और अपने भोजन की शुद्धता और सुरक्षा को सुनिश्चित करें। सरकार, खाद्य कंपनियों और उपभोक्ताओं को मिलकर इस समस्या का समाधान करना होगा ताकि हमारा भोजन और पेय न केवल स्वादिष्ट हो, बल्कि शुद्ध और नैतिक भी हो। कॉफी का एक कप हमें ताजगी और खुशी देता है, और यह हमारा अधिकार है कि यह शाकाहारी और सुरक्षित रहे।
*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।
कॉफी पाउडर में कॉकरोच की मौजूदगी का विचार ही किसी के लिए भी घृणित हो सकता है। लेकिन यह केवल एक डरावनी कहानी नहीं, बल्कि एक वास्तविकता है जो खाद्य प्रसंस्करण और गुणवत्ता नियंत्रण की कमियों को उजागर करती है। कुछ अध्ययनों और उपभोक्ता शिकायतों के अनुसार, सस्ते और निम्न गुणवत्ता वाले कॉफी पाउडर में कीड़े, कॉकरोचों के अवशेष और अन्य अशुद्धियां पाई गई हैं। यह समस्या विशेष रूप से उन ब्रांडों में देखी गई है जो लागत कम करने के लिए निम्न गुणवत्ता वाले कच्चे माल का उपयोग करते हैं या जिनके उत्पादन इकाइयों में स्वच्छता मानकों का पालन नहीं होता।
कॉकरोच जैसे कीड़े न केवल कॉफी को अशुद्ध करते हैं, बल्कि इसे शाकाहारी पेय की श्रेणी से बाहर भी ले जाते हैं। भारत जैसे देश में, जहां शाकाहार न केवल एक आहार है, बल्कि एक धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्य भी है, यह एक गंभीर मुद्दा है। शाकाहारी लोग अपने भोजन और पेय में पशु-आधारित सामग्री से बचते हैं, लेकिन ऐसी मिलावट उनकी पसंद और विश्वास का उल्लंघन करती है। यह न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि नैतिकता और विश्वास का भी सवाल है। वहीं यदि कोई कॉफ़ी के साबुत बीन्स को स्वयं ही पीस कर कॉफ़ी बनाए तो उसमें मिलावट का डर नहीं रहता।
कॉफी पाउडर में कॉकरोचों की मिलावट केवल एक उदाहरण है। खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या भारत में लंबे समय से चली आ रही है। दूध, मसाले, शहद, घी और यहाँ तक कि अनाज जैसे रोजमर्रा के खाद्य पदार्थ भी मिलावट का शिकार हैं। उदाहरण के लिए, दूध में पानी, यूरिया या डिटर्जेंट मिलाने की खबरें आम हैं। मसालों में कृत्रिम रंग, चूरा या ईंट का पाउडर मिलाया जाता है। शहद में चीनी का सिरप और घी में वनस्पति तेल की मिलावट कोई नई बात नहीं है।
इनमें से कई मिलावटें न केवल शाकाहारी भोजन को प्रभावित करती हैं, बल्कि कुछ मामलों में पशु-आधारित सामग्री भी शामिल हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, कुछ सस्ते घी ब्रांडों में पशु वसा (animal fat) की मिलावट भी पाई गई है, जिसे शाकाहारी लोग पूरी तरह से अस्वीकार करते हैं। इसी तरह, कुछ मिठाइयों और बेकरी उत्पादों में अंडे या पशु-आधारित जेलाटिन का उपयोग होता है, जिसे पैकेजिंग पर स्पष्ट रूप से नहीं बताया जाता। यह शाकाहारी उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ा धोखा है, जो अपने भोजन को लेकर सावधानी बरतते हैं।
मिलावट का प्रभाव केवल स्वाद या गुणवत्ता तक सीमित नहीं है, यह स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है। कॉकरोच और अन्य कीड़े बैक्टीरिया और रोगजनकों के वाहक हो सकते हैं, जो कॉफी के सेवन से पेट की बीमारियों, एलर्जी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं। इसके अलावा, मिलावटी खाद्य पदार्थों में रासायनिक पदार्थों का उपयोग, जैसे कृत्रिम रंग या संरक्षक, दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं जैसे कैंसर, गुर्दे की बीमारी और हृदय रोगों को जन्म दे सकता है।
नैतिक दृष्टिकोण से, यह उपभोक्ताओं के साथ विश्वासघात है। शाकाहारी लोग अपने आहार को लेकर इसलिए सजग रहते हैं क्योंकि यह उनकी धार्मिक, सांस्कृतिक या पर्यावरणीय मान्यताओं का हिस्सा है। जब उन्हें पता चलता है कि उनके द्वारा खाया या पिया गया भोजन शाकाहारी नहीं है, तो यह उनके विश्वास और मूल्यों पर चोट करता है। इसके अलावा, यह खाद्य कंपनियों और नियामक संस्थानों पर सवाल उठाता है कि वे उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा क्यों नहीं कर पा रहे हैं।
मिलावट की समस्या के कई कारण हैं। पहला, लागत कम करने की होड़ में कुछ निर्माता निम्न गुणवत्ता वाले कच्चे माल का उपयोग करते हैं और स्वच्छता मानकों की अनदेखी करते हैं। दूसरा, खाद्य सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन न होना और निरीक्षण की कमी। तीसरा, उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी, जिसके कारण वे सस्ते और मिलावटी उत्पादों को खरीद लेते हैं।
इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब सभी हितधारक मिलकर काम करें। सरकार को खाद्य सुरक्षा मानकों को और सख्त करना चाहिए और नियमित निरीक्षण सुनिश्चित करना चाहिए। खाद्य कंपनियों को पारदर्शिता बरतनी चाहिए और अपने उत्पादों की सामग्री को स्पष्ट रूप से पैकेजिंग पर उल्लेख करना चाहिए। उपभोक्ताओं को भी जागरूक होना होगा और विश्वसनीय ब्रांडों को चुनना होगा। इसके अलावा, शाकाहारी लोग अपने भोजन की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए घर पर कॉफी बीन्स को पीसने या प्रमाणित शाकाहारी उत्पादों का उपयोग करने जैसे विकल्प चुन सकते हैं।
कॉफी पाउडर में कॉकरोचों की मिलावट और अन्य खाद्य पदार्थों में पशु-आधारित सामग्री का मिश्रण न केवल एक स्वास्थ्य संकट है, बल्कि यह शाकाहारी लोगों के विश्वास और मूल्यों पर भी हमला है। यह समय है कि हम खाद्य मिलावट के खिलाफ एकजुट हों और अपने भोजन की शुद्धता और सुरक्षा को सुनिश्चित करें। सरकार, खाद्य कंपनियों और उपभोक्ताओं को मिलकर इस समस्या का समाधान करना होगा ताकि हमारा भोजन और पेय न केवल स्वादिष्ट हो, बल्कि शुद्ध और नैतिक भी हो। कॉफी का एक कप हमें ताजगी और खुशी देता है, और यह हमारा अधिकार है कि यह शाकाहारी और सुरक्षित रहे।
*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।
शनिवार, 16 अगस्त 2025
आवारा कुत्तों की समस्या और सुप्रीम कोर्ट
गत 11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों की समस्या पर स्वत: संज्ञान लेते हुए यह आदेश जारी किया कि दिल्ली सरकार और स्थानीय निकायों को अगले छह से आठ सप्ताह के भीतर सभी आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाकर आश्रय स्थलों में स्थानांतरित करें, उनकी नसबंदी करें और टीकाकरण सुनिश्चित करें। कोर्ट ने स्थिति को “बेहद गंभीर” बताते हुए कहा कि बच्चों और बुजुर्गों को आवारा कुत्तों के हमलों से बचाना अत्यंत आवश्यक है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में इस साल जनवरी से जून तक 35,198 कुत्तों के काटने के मामले दर्ज किए गए, जिनमें 49 रेबीज के मामले भी शामिल हैं। रेबीज, एक जानलेवा बीमारी है और भारत वैश्विक रेबीज मृत्यु दर का 36% हिस्सा लेता है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम में तत्काल प्रभाव से कुत्तों को पकड़ने, उनकी नसबंदी और टीकाकरण करने और उन्हें आश्रय स्थलों में रखने की प्रक्रिया शुरू की जाए। इसके साथ ही, कोर्ट ने एक हेल्पलाइन स्थापित करने और आश्रय स्थलों में सीसीटीवी निगरानी सुनिश्चित करने का भी आदेश दिया।
पशु प्रेमी, जो जानवरों के कल्याण के प्रति संवेदनशील होते हैं, उन्हें इस निर्णय को एक सकारात्मक कदम के रूप में देखना चाहिए। यह आदेश केवल कुत्तों को सड़कों से हटाने की बात नहीं करता, बल्कि उनके लिए एक सुरक्षित और मानवीय वातावरण प्रदान करने पर भी जोर देता है। नसबंदी और टीकाकरण जैसे कदम न केवल कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करेंगे, बल्कि उनके स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाएंगे। सड़कों पर रहने वाले कुत्ते अक्सर भोजन, पानी और चिकित्सा सुविधाओं की कमी से जूझते हैं, जिसके कारण वे आक्रामक हो सकते हैं। आश्रय स्थलों में उन्हें नियमित भोजन, चिकित्सा देखभाल और सुरक्षित स्थान मिलेगा, जो उनके जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाएगा।
वहीं सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सरकार को कई महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे। यह न केवल दिल्ली-एनसीआर के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक मॉडल बन सकता है। कोर्ट ने शुरूआत में 5,000 कुत्तों के लिए आश्रय स्थलों के निर्माण का आदेश दिया है। दिल्ली में अनुमानित 10 लाख आवारा कुत्तों को देखते हुए, यह संख्या अपर्याप्त हो सकती है। सरकार को बड़े पैमाने पर आधुनिक आश्रय स्थल बनाने होंगे, जो स्वच्छता, भोजन और चिकित्सा सुविधाओं से सुसज्जित हों। इन आश्रय स्थलों में पशु चिकित्सकों और प्रशिक्षित कर्मचारियों की नियुक्ति आवश्यक है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 70% से अधिक कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण रेबीज को नियंत्रित करने में प्रभावी है। दिल्ली सरकार को एक त्वरित और व्यापक अभियान चलाना होगा, जिसमें गैर-सरकारी संगठनों और पशु कल्याण संगठनों का सहयोग लिया जाए। गोवा का “मिशन रेबीज” इस दिशा में एक सफल उदाहरण है, जिसने रेबीज को नियंत्रित करने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की।
इसके अलावा कोर्ट ने एक हेल्पलाइन स्थापित करने का निर्देश भी दिया है, जो कुत्तों के काटने की शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई करे। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह हेल्पलाइन 24/7 सक्रिय रहे और शिकायत मिलने पर चार घंटे के भीतर कार्रवाई हो। रेबीज और कुत्तों के काटने से बचाव के लिए जनता को जागरूक करना आवश्यक है। सरकार को स्कूलों, कॉलेजों और समुदायों में जागरूकता अभियान चलाने चाहिए, जिसमें लोगों को बताया जाए कि रेबीज से बचने के लिए तुरंत चिकित्सा सहायता लेना कितना महत्वपूर्ण है। साथ ही, लोगों को सड़कों पर कुत्तों को भोजन न देने के लिए प्रेरित करना होगा, क्योंकि यह उनकी आबादी को बढ़ाने का कारण बनता है।
वर्तमान में, पशु जन्म नियंत्रण (ABC) नियम, 2023 के तहत नसबंदी के बाद कुत्तों को उसी स्थान पर छोड़ना अनिवार्य है। यह नियम कई बार प्रभावी नहीं होता, क्योंकि यह आक्रामक कुत्तों को नियंत्रित करने में बाधा बनता है। सरकार को इन नियमों में संशोधन करना चाहिए ताकि खतरनाक कुत्तों को आश्रय स्थलों में रखा जा सके। यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी होगी कि इस प्रक्रिया में कुत्तों के साथ कोई क्रूरता न हो। आश्रय स्थलों में कुत्तों को पर्याप्त भोजन, पानी और चिकित्सा सुविधाएं मिलनी चाहिए। पशु कल्याण संगठनों को इस प्रक्रिया में शामिल करना महत्वपूर्ण है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कुत्तों के साथ मानवीय व्यवहार किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों की समस्या को हल करने और रेबीज को नियंत्रित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि इसे प्रभावी रूप से लागू किया जाए तो इस समस्या पर काफ़ी हद तक नियंत्रण किया जा सकेगा। उल्लेखनीय है कि दुनिया भर में केवल नीदरलैंड ही एक ऐसा देश है जहां पर आपको आवारा कुत्ते नहीं मिलेंगे। नीदरलैंड सरकार ने एक अनूठा नियम लागू किया। किसी भी पालतू पशु की दुकान से ख़रीदे गये महेंगी नसल के कुत्तों पर वहाँ की सरकार भारी मात्रा में टैक्स लगती है। वहीं दूसरी ओर यदि कोई भी नागरिक इन बेघर पशुओं को गोद लेकर अपनाता है तो उसे आयकर में छूट मिलती है। इस नियम के लागू होते ही लोगों ने अधिक से अधिक बेघर कुत्तों को अपनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे नीदरलैंड की सड़कों व मोहल्लों से आवारा कुत्तों की संख्या घटते-घटते बिलकुल शून्य हो गई। दुनिया भर के पशु प्रेमी संगठनों ने इस कार्यक्रम को सबसे सुरक्षित और असरदार माना है। इस कार्यक्रम से न सिर्फ़ आवारा कुत्तों की जनसंख्या पर रोक लगती है बल्कि आम नागरिकों को भी इस समस्या से निजाद मिलता है। हमारे देश ऐसा कब होगा यह तो आनेवाला समय ही बताएगा।
*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।
शुक्रवार, 8 अगस्त 2025
पैरोल और फरलो: कानून या विशेषाधिकार?
भारत में कानून की समानता का सिद्धांत संविधान का एक आधारभूत तत्व है। संविधान का अनुच्छेद 14 स्पष्ट रूप से कहता है कि कानून के समक्ष सभी समान हैं। लेकिन जब हम समाज के प्रभावशाली और ताकतवर लोगों के व्यवहार को देखते हैं, तो यह सिद्धांत कई बार मजाक बनकर रह जाता है। डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम का मामला इसका जीवंत उदाहरण है, जहां बार-बार दी जाने वाली पैरोल और फरलो ने न केवल कानूनी व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, बल्कि आम जनता के विश्वास को भी हिलाकर रख दिया है।
गुरमीत राम रहीम, जिन्हें 2017 में दो साध्वियों के साथ बलात्कार के मामले में 20 साल की सजा सुनाई गई थी। बाद में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति और डेरा के पूर्व प्रबंधक रंजीत सिंह की हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा मिली थी। पिछले कुछ वर्षों में ये बार-बार जेल से बाहर निकले हैं। 2020 से 2025 तक, उन्हें कम से कम 14 बार पैरोल या फरलो दी गई है, जिसमें कुल मिलाकर 326 दिन जेल के बाहर बिताए गए हैं। हाल ही में, अगस्त 2025 में, उन्हें 40 दिन की पैरोल दी गई, जो उनकी सजा के सात साल के भीतर उनकी तीसरी रिहाई थी। यह पैटर्न न केवल कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे प्रभावशाली लोग अपने रसूख का इस्तेमाल कर कानून को अपने पक्ष में मोड़ लेते हैं।
पैरोल और फरलो का प्रावधान हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्परेरी रिलीज) एक्ट, 2022 के तहत किया गया है। इस कानून के अनुसार, एक साल की सजा पूरी करने के बाद कोई भी कैदी प्रति वर्ष 10 सप्ताह की पैरोल और 21 दिन की फरलो का हकदार है। फरलो को कैदी का अधिकार माना जाता है, जो सामाजिक और पारिवारिक संबंध बनाए रखने के लिए दी जाती है, जबकि पैरोल के लिए विशिष्ट कारणों की आवश्यकता होती है। लेकिन राम रहीम के मामले में, ये रिहाइयां अक्सर बिना किसी ठोस कारण के दी गई हैं।
राम रहीम का डेरा सच्चा सौदा हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और दिल्ली जैसे राज्यों में लाखों अनुयायियों के साथ एक प्रभावशाली संगठन है। अनुमान के अनुसार, डेरे के 90-95 लाख अनुयायी हैं, जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए एक बड़ा वोट बैंक हो सकते हैं। 2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव, 2023 में राजस्थान विधानसभा चुनाव और 2024 में हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले उनकी रिहाई ने राजनीतिक प्रभाव की आशंकाओं को बल दिया है। यह सवाल उठता है कि क्या ये रिहाइयां कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा हैं या राजनीतिक लाभ के लिए सुनियोजित कदम?
हरियाणा के जेल मंत्री रंजीत सिंह चौटाला और अन्य नेताओं ने दावा किया है कि राम रहीम को दी गई रिहाइयां कानून के दायरे में हैं और अन्य कैदियों को भी ऐसी सुविधाएं दी जाती हैं। लेकिन 2023 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा की जेलों में 5,832 कैदियों में से केवल 2,801 को ही अस्थायी रिहाई मिली थी। यह सवाल उठता है कि क्या सभी कैदियों को इतनी बार और इतने लंबे समय के लिए रिहाई दी जाती है, जितनी राम रहीम को दी गई है?
राम रहीम की बार-बार रिहाई ने कानूनी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) ने उनकी लगातार रिहाइयों के खिलाफ पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि रिहाई का निर्णय कानूनी ढांचे के भीतर लिया गया है। लेकिन यह तर्क उस आम धारणा को कमजोर करता है कि कानून सबके लिए समान है। पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति ने इसे “कानून का मजाक” करार दिया है, यह कहते हुए कि अगर कोई कैदी हर साल 90 दिन जेल से बाहर रह सकता है, तो सजा का क्या अर्थ रह जाता है?
राम रहीम की रिहाइयों का प्रभाव केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी है। उनकी सजा के बाद 2017 में हरियाणा और पंजाब में हुई हिंसा में 40 लोगों की मौत हुई थी और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ था। ऐसे व्यक्ति को बार-बार रिहा करना न केवल पीड़ितों के परिवारों के लिए अपमानजनक है, बल्कि उन गवाहों के लिए भी खतरा पैदा करता है जो अभी भी उनके खिलाफ चल रहे मामलों में गवाही दे रहे हैं। उदाहरण के लिए, सिरसा आश्रम में नपुंसकता के मामले में अभी भी मुकदमा चल रहा है और उनकी मौजूदगी गवाहों पर दबाव डाल सकती है।
राम रहीम का मामला यह दर्शाता है कि कैसे प्रभावशाली लोग अपनी पहुंच और रसूख का इस्तेमाल कर कानूनी प्रणाली को अपने पक्ष में कर सकते हैं। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करता है जहां सत्ता और प्रभाव कानून के ऊपर हावी हो जाते हैं। पैरोल और फरलो जैसे प्रावधानों का उद्देश्य कैदियों के पुनर्वास और सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देना है, लेकिन जब इनका दुरुपयोग विशिष्ट लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए किया जाता है, तो यह पूरी प्रणाली की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।
इस समस्या का समाधान करने के लिए, पैरोल और फरलो के नियमों में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाने की आवश्यकता है। रिहाई के लिए ठोस और उचित कारणों को अनिवार्य करना चाहिए और निर्णय प्रक्रिया को स्वतंत्र निगरानी के अधीन रखा जाना चाहिए। साथ ही, राजनीतिक प्रभाव को कम करने के लिए, चुनाव के समय में ऐसी रिहाइयों पर रोक लगाने जैसे उपाय किए जा सकते हैं। समय की माँग है कि हमारी कानूनी व्यवस्था इस तरह के दुरुपयोग को रोकने के लिए कठोर कदम उठाए, ताकि कानून की गरिमा और विश्वसनीयता बरकरार रहे।
*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।
गुरमीत राम रहीम, जिन्हें 2017 में दो साध्वियों के साथ बलात्कार के मामले में 20 साल की सजा सुनाई गई थी। बाद में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति और डेरा के पूर्व प्रबंधक रंजीत सिंह की हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा मिली थी। पिछले कुछ वर्षों में ये बार-बार जेल से बाहर निकले हैं। 2020 से 2025 तक, उन्हें कम से कम 14 बार पैरोल या फरलो दी गई है, जिसमें कुल मिलाकर 326 दिन जेल के बाहर बिताए गए हैं। हाल ही में, अगस्त 2025 में, उन्हें 40 दिन की पैरोल दी गई, जो उनकी सजा के सात साल के भीतर उनकी तीसरी रिहाई थी। यह पैटर्न न केवल कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे प्रभावशाली लोग अपने रसूख का इस्तेमाल कर कानून को अपने पक्ष में मोड़ लेते हैं।
पैरोल और फरलो का प्रावधान हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्परेरी रिलीज) एक्ट, 2022 के तहत किया गया है। इस कानून के अनुसार, एक साल की सजा पूरी करने के बाद कोई भी कैदी प्रति वर्ष 10 सप्ताह की पैरोल और 21 दिन की फरलो का हकदार है। फरलो को कैदी का अधिकार माना जाता है, जो सामाजिक और पारिवारिक संबंध बनाए रखने के लिए दी जाती है, जबकि पैरोल के लिए विशिष्ट कारणों की आवश्यकता होती है। लेकिन राम रहीम के मामले में, ये रिहाइयां अक्सर बिना किसी ठोस कारण के दी गई हैं।
राम रहीम का डेरा सच्चा सौदा हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और दिल्ली जैसे राज्यों में लाखों अनुयायियों के साथ एक प्रभावशाली संगठन है। अनुमान के अनुसार, डेरे के 90-95 लाख अनुयायी हैं, जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए एक बड़ा वोट बैंक हो सकते हैं। 2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव, 2023 में राजस्थान विधानसभा चुनाव और 2024 में हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले उनकी रिहाई ने राजनीतिक प्रभाव की आशंकाओं को बल दिया है। यह सवाल उठता है कि क्या ये रिहाइयां कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा हैं या राजनीतिक लाभ के लिए सुनियोजित कदम?
हरियाणा के जेल मंत्री रंजीत सिंह चौटाला और अन्य नेताओं ने दावा किया है कि राम रहीम को दी गई रिहाइयां कानून के दायरे में हैं और अन्य कैदियों को भी ऐसी सुविधाएं दी जाती हैं। लेकिन 2023 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा की जेलों में 5,832 कैदियों में से केवल 2,801 को ही अस्थायी रिहाई मिली थी। यह सवाल उठता है कि क्या सभी कैदियों को इतनी बार और इतने लंबे समय के लिए रिहाई दी जाती है, जितनी राम रहीम को दी गई है?
राम रहीम की बार-बार रिहाई ने कानूनी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) ने उनकी लगातार रिहाइयों के खिलाफ पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि रिहाई का निर्णय कानूनी ढांचे के भीतर लिया गया है। लेकिन यह तर्क उस आम धारणा को कमजोर करता है कि कानून सबके लिए समान है। पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति ने इसे “कानून का मजाक” करार दिया है, यह कहते हुए कि अगर कोई कैदी हर साल 90 दिन जेल से बाहर रह सकता है, तो सजा का क्या अर्थ रह जाता है?
राम रहीम की रिहाइयों का प्रभाव केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी है। उनकी सजा के बाद 2017 में हरियाणा और पंजाब में हुई हिंसा में 40 लोगों की मौत हुई थी और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ था। ऐसे व्यक्ति को बार-बार रिहा करना न केवल पीड़ितों के परिवारों के लिए अपमानजनक है, बल्कि उन गवाहों के लिए भी खतरा पैदा करता है जो अभी भी उनके खिलाफ चल रहे मामलों में गवाही दे रहे हैं। उदाहरण के लिए, सिरसा आश्रम में नपुंसकता के मामले में अभी भी मुकदमा चल रहा है और उनकी मौजूदगी गवाहों पर दबाव डाल सकती है।
राम रहीम का मामला यह दर्शाता है कि कैसे प्रभावशाली लोग अपनी पहुंच और रसूख का इस्तेमाल कर कानूनी प्रणाली को अपने पक्ष में कर सकते हैं। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करता है जहां सत्ता और प्रभाव कानून के ऊपर हावी हो जाते हैं। पैरोल और फरलो जैसे प्रावधानों का उद्देश्य कैदियों के पुनर्वास और सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देना है, लेकिन जब इनका दुरुपयोग विशिष्ट लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए किया जाता है, तो यह पूरी प्रणाली की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।
इस समस्या का समाधान करने के लिए, पैरोल और फरलो के नियमों में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाने की आवश्यकता है। रिहाई के लिए ठोस और उचित कारणों को अनिवार्य करना चाहिए और निर्णय प्रक्रिया को स्वतंत्र निगरानी के अधीन रखा जाना चाहिए। साथ ही, राजनीतिक प्रभाव को कम करने के लिए, चुनाव के समय में ऐसी रिहाइयों पर रोक लगाने जैसे उपाय किए जा सकते हैं। समय की माँग है कि हमारी कानूनी व्यवस्था इस तरह के दुरुपयोग को रोकने के लिए कठोर कदम उठाए, ताकि कानून की गरिमा और विश्वसनीयता बरकरार रहे।
*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।
शुक्रवार, 1 अगस्त 2025
अचानक इतनी फुर्ती में क्यों है डीजीसीए?
जब भी कभी कोई विमान हादसा होता है या होते-होते टल जाता है तो भारत का नागर विमानन महानिदेशालय यानी डीजीसीए और एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टीगेशन ब्यूरो ऐसी घटना की जाँच करता है। ऐसे मामलों में जाँच पूरी होने तक डीजीसीए उस विमान के पायलट व क्रू को ‘ग्राउंड’ कर देता है यानी उड़ान भरने पर रोक लगा देता है। सवाल है कि क्या डीजीसीए का सिर्फ़ इतना ही फ़र्ज़ है? सवाल ये भी है कि क्या ऐसी दुर्घटनाओं के बाद की जाने वाली ऐसी जाँच में केवल एयरलाइन के स्टाफ़ की ही गलती क्यों सामने आती है? क्या डीजीसीए के अधिकारियों को हवाई जहाज़ की नियमित जाँच और रख-रखाव की ऑडिट नहीं करनी चाहिए, जो उनका फ़र्ज़ है? यदि डीजीसीए द्वारा ऐसे निरीक्षण समय-समय पर होते रहें तो ऐसे हादसे टाले जा सकते हैं।
हाल ही में भारत के एविएशन इतिहास में सबसे बड़ा हादसा अहमदाबाद में हुआ। उसके बाद से ही तमाम जानकारियाँ सामने आने लगी कि एयर इंडिया के इस विमान हादसे में किसकी गलती हो सकती है। क्या पायलट दोषी हैं? क्या विमान बनाने वाली कंपनी दोषी है? क्या एयर इंडिया के विमान की राख-रखाव करने वाली एजेंसी दोषी है? इन सभी सवालों पर फिलहाल अटकलें ही लगाई जा रही हैं क्योंकि विमान हादसे की जाँच अभी चल रही है। लेकिन कहीं पर भी आपको यह सुनने को नहीं मिलेगा कि क्या भारत का नागर विमानन महानिदेशालय यानी डीजीसीए अपना काम ज़िम्मेदारी से कर रहा था? यदि हाँ तो फिर ऐसा हादसा कैसे हो गया? यदि नहीं तो क्यों नहीं?
एयर इंडिया के बोइंग विमानों में अचानक एक के बाद एक हादसों का होना एक गंभीर मुद्दा अवश्य है। लेकिन जिस तरह इन हादसों के बाद डीजीसीए अचानक हरकत में आया है वह कई सवाल उठाता है। क्या डीजीसीए द्वारा नियमित रूप से की जाने वाली ऑडिट में कहीं चूक हुई थी? गौरतलब है कि हर विमान, चाहे वो किसी भी एयरलाइन का क्यों ना हो, उसकी नियमित जांच व रख-रखाव करना अनिवार्य होता है। हर उड़ान से पहले विमान का पूरा निरीक्षण किया जाता है। ऐसे निरीक्षण को पहले टेक्नीशियन और उसके बाद इंजीनियर द्वारा किया जाता है। विमान जो भी कमी पाई जाती है उसे विमान की लॉगबुक में दर्ज किया जाता है। इसके साथ ही विमान में पाई गई कमी को दुरुस्त करने की एंट्री भी इसी लॉगबुक में की जाती है जिसे विमान से संबंधित सभी लोग साइन भी करते हैं। इसमें पायलट, टेक्नीशियन और इंजीनियर शामिल हैं। इतना ही नहीं इस सबके ऊपर इन लॉगबुक्स का डीजीसीए द्वारा नियमित रूप से ऑडिट भी किया जाता है। यदि इसमें कोई कमी होती है तो डीजीसीए द्वारा संबंधित एयरलाइन को नोटिस दिया जाता है।
वहीं यदि किन्हीं कारणों से डीजीसीए द्वारा ऑडिट को केवल औपचारिकता के लिए किया जाए तो अनदेखी के चलते विमान हादसा कभी भी हो सकता है। ऐसा देखा गया है कि जब भी कभी कोई बड़ा विमान हादसा होता है तो डीजीसीए तुरंत हरकत में आकर कड़े ऑडिट करने शुरू कर देता है। इन ऑडिटों में डीजीसीए यह दिखाने की कोशिश करता है कि वह किसी भी तरह की लापरवाही के प्रति शून्य सहनशीलता (ज़ीरो टॉलरेंस) रखता है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा सोचना सही है? यदि डीजीसीए के अधिकारी एयरलाइन की न सुनकर, क़ानून के हिसाब से हर एयरलाइन का नियमित व विस्तृत ऑडिट करते रहें तो डीजीसीए पर उँगलियाँ नहीं उठेंगी। पर पता नहीं किस लालच या दबाव में ये जाँच नहीं होती।
एविएशन के जानकारों के अनुसार विमान के इंजन में होने वाली कोई ख़राबी का कारण नियमित रख-रखाव का न होना है। इसके अलावा विमान के स्पेयर पार्ट की गुणवत्ता और पायलट की उचित ट्रेनिंग का न होना भी है। इन घटनाओं के पीछे डीजीसीए के अधिकारियों द्वारा ऐसी कमियों को अनदेखा करना भी एक प्रमुख कारण है। यदि डीजीसीए के अधिकारी केवल इस बात पर ज़ोर न दें कि यात्रियों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा तो शायद ऐसी घटनाएँ न हों। पिछले दिनों संसद में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए नागरिक उड्डयन मंत्री ने यह बताया कि डीजीसीए के स्वीकृत 1644 पदों में से 823 रिक्त हैं। यानी 50% से अधिक पद रिक्त हैं। इनमें से अधिकतर पद तकनीकी हैं। यह वही तकनीकी पद हैं जो विमानों की तकनीकी जांच करने में सक्षम होने चाहिए। परंतु डीजीसीए के पास यदि टेक्निकल मैनपावर की कमी है तो वो टेक्निकल ऑडिट किस हद तक कर पाएगा इसका अनुमान कोई भी लगा सकता है।
वहीं डीजीसीए के कुछ अधिकारी कुछ चुनिंदा एयरलाइंस, फिर वो चाहे शेड्यूल्ड एयरलाइन हों या नॉन-शेड्यूल एयरलाइन (प्राइवेट चार्टर कंपनी) हों, के साथ ‘अच्छे संबंध’ बनाए रखता है। ऐसे ‘संबंधों’ का यह नतीजा होता है कि यदि ‘अच्छे संबंधों’ वाली एयरलाइन बड़ी से बड़ी गलती क्यों न करे उसे केवल एक चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता है और किसी को कानों कान भी ख़बर नहीं होती। वहीं किसी अन्य एयरलाइन द्वारा कोई मामूली सी गलती भी हो जाए तो उसके ख़िलाफ़ कड़े से कड़े नियमों के तहत कार्यवाही की जाती है। क्या डीजीसीए बताएगा कि ऐसे दोहरे मापदंड क्यों अपनाए जाते हैं?
एक अनुमान के तहत आनेवाले दो दशकों में भारत का नागर विमानन ट्रैफ़िक 5 गुना बढ़ने की संभावना है। यदि कनाडा और न्यूज़ीलैंड की तरह हमें भी एविएशन के क्षेत्र में एक अच्छी पहचान बनानी है तो डीजीसीए के अधिकारियों को अपने स्वार्थों को दरकिनार करते हुए यात्रियों की सुरक्षा और एयरलाइन कम्पनी के विमानों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। डीजीसीए के ‘एयर सेफ़्टी डिपार्टमेंट’, ‘फ्लाइट स्टेण्डर्ड्स डिपार्टमेंट’, ‘एयरक्राफ्ट इंजीनियरिंग’ व ‘एयरवर्थिनेस डिपार्टमेंट’ जैसे विभागों को विमानों की जाँच के हर पहलू को कड़ाई से लागू करने को गम्भीरता से लेना होगा। ऐसा करने से एक ओर हवाई यात्रा करने वाले यात्री अपने को सुरक्षित महसूस करेंगे। वहीं दूसरी ओर एयरलाइन कम्पनियों को भी इस बात का ख़ौफ़ बना रहेगा कि छोटी सी भूल के चलते उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्यवाही भी हो सकती है।
हाल ही में भारत के एविएशन इतिहास में सबसे बड़ा हादसा अहमदाबाद में हुआ। उसके बाद से ही तमाम जानकारियाँ सामने आने लगी कि एयर इंडिया के इस विमान हादसे में किसकी गलती हो सकती है। क्या पायलट दोषी हैं? क्या विमान बनाने वाली कंपनी दोषी है? क्या एयर इंडिया के विमान की राख-रखाव करने वाली एजेंसी दोषी है? इन सभी सवालों पर फिलहाल अटकलें ही लगाई जा रही हैं क्योंकि विमान हादसे की जाँच अभी चल रही है। लेकिन कहीं पर भी आपको यह सुनने को नहीं मिलेगा कि क्या भारत का नागर विमानन महानिदेशालय यानी डीजीसीए अपना काम ज़िम्मेदारी से कर रहा था? यदि हाँ तो फिर ऐसा हादसा कैसे हो गया? यदि नहीं तो क्यों नहीं?
एयर इंडिया के बोइंग विमानों में अचानक एक के बाद एक हादसों का होना एक गंभीर मुद्दा अवश्य है। लेकिन जिस तरह इन हादसों के बाद डीजीसीए अचानक हरकत में आया है वह कई सवाल उठाता है। क्या डीजीसीए द्वारा नियमित रूप से की जाने वाली ऑडिट में कहीं चूक हुई थी? गौरतलब है कि हर विमान, चाहे वो किसी भी एयरलाइन का क्यों ना हो, उसकी नियमित जांच व रख-रखाव करना अनिवार्य होता है। हर उड़ान से पहले विमान का पूरा निरीक्षण किया जाता है। ऐसे निरीक्षण को पहले टेक्नीशियन और उसके बाद इंजीनियर द्वारा किया जाता है। विमान जो भी कमी पाई जाती है उसे विमान की लॉगबुक में दर्ज किया जाता है। इसके साथ ही विमान में पाई गई कमी को दुरुस्त करने की एंट्री भी इसी लॉगबुक में की जाती है जिसे विमान से संबंधित सभी लोग साइन भी करते हैं। इसमें पायलट, टेक्नीशियन और इंजीनियर शामिल हैं। इतना ही नहीं इस सबके ऊपर इन लॉगबुक्स का डीजीसीए द्वारा नियमित रूप से ऑडिट भी किया जाता है। यदि इसमें कोई कमी होती है तो डीजीसीए द्वारा संबंधित एयरलाइन को नोटिस दिया जाता है।
वहीं यदि किन्हीं कारणों से डीजीसीए द्वारा ऑडिट को केवल औपचारिकता के लिए किया जाए तो अनदेखी के चलते विमान हादसा कभी भी हो सकता है। ऐसा देखा गया है कि जब भी कभी कोई बड़ा विमान हादसा होता है तो डीजीसीए तुरंत हरकत में आकर कड़े ऑडिट करने शुरू कर देता है। इन ऑडिटों में डीजीसीए यह दिखाने की कोशिश करता है कि वह किसी भी तरह की लापरवाही के प्रति शून्य सहनशीलता (ज़ीरो टॉलरेंस) रखता है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा सोचना सही है? यदि डीजीसीए के अधिकारी एयरलाइन की न सुनकर, क़ानून के हिसाब से हर एयरलाइन का नियमित व विस्तृत ऑडिट करते रहें तो डीजीसीए पर उँगलियाँ नहीं उठेंगी। पर पता नहीं किस लालच या दबाव में ये जाँच नहीं होती।
एविएशन के जानकारों के अनुसार विमान के इंजन में होने वाली कोई ख़राबी का कारण नियमित रख-रखाव का न होना है। इसके अलावा विमान के स्पेयर पार्ट की गुणवत्ता और पायलट की उचित ट्रेनिंग का न होना भी है। इन घटनाओं के पीछे डीजीसीए के अधिकारियों द्वारा ऐसी कमियों को अनदेखा करना भी एक प्रमुख कारण है। यदि डीजीसीए के अधिकारी केवल इस बात पर ज़ोर न दें कि यात्रियों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा तो शायद ऐसी घटनाएँ न हों। पिछले दिनों संसद में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए नागरिक उड्डयन मंत्री ने यह बताया कि डीजीसीए के स्वीकृत 1644 पदों में से 823 रिक्त हैं। यानी 50% से अधिक पद रिक्त हैं। इनमें से अधिकतर पद तकनीकी हैं। यह वही तकनीकी पद हैं जो विमानों की तकनीकी जांच करने में सक्षम होने चाहिए। परंतु डीजीसीए के पास यदि टेक्निकल मैनपावर की कमी है तो वो टेक्निकल ऑडिट किस हद तक कर पाएगा इसका अनुमान कोई भी लगा सकता है।
वहीं डीजीसीए के कुछ अधिकारी कुछ चुनिंदा एयरलाइंस, फिर वो चाहे शेड्यूल्ड एयरलाइन हों या नॉन-शेड्यूल एयरलाइन (प्राइवेट चार्टर कंपनी) हों, के साथ ‘अच्छे संबंध’ बनाए रखता है। ऐसे ‘संबंधों’ का यह नतीजा होता है कि यदि ‘अच्छे संबंधों’ वाली एयरलाइन बड़ी से बड़ी गलती क्यों न करे उसे केवल एक चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता है और किसी को कानों कान भी ख़बर नहीं होती। वहीं किसी अन्य एयरलाइन द्वारा कोई मामूली सी गलती भी हो जाए तो उसके ख़िलाफ़ कड़े से कड़े नियमों के तहत कार्यवाही की जाती है। क्या डीजीसीए बताएगा कि ऐसे दोहरे मापदंड क्यों अपनाए जाते हैं?
एक अनुमान के तहत आनेवाले दो दशकों में भारत का नागर विमानन ट्रैफ़िक 5 गुना बढ़ने की संभावना है। यदि कनाडा और न्यूज़ीलैंड की तरह हमें भी एविएशन के क्षेत्र में एक अच्छी पहचान बनानी है तो डीजीसीए के अधिकारियों को अपने स्वार्थों को दरकिनार करते हुए यात्रियों की सुरक्षा और एयरलाइन कम्पनी के विमानों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। डीजीसीए के ‘एयर सेफ़्टी डिपार्टमेंट’, ‘फ्लाइट स्टेण्डर्ड्स डिपार्टमेंट’, ‘एयरक्राफ्ट इंजीनियरिंग’ व ‘एयरवर्थिनेस डिपार्टमेंट’ जैसे विभागों को विमानों की जाँच के हर पहलू को कड़ाई से लागू करने को गम्भीरता से लेना होगा। ऐसा करने से एक ओर हवाई यात्रा करने वाले यात्री अपने को सुरक्षित महसूस करेंगे। वहीं दूसरी ओर एयरलाइन कम्पनियों को भी इस बात का ख़ौफ़ बना रहेगा कि छोटी सी भूल के चलते उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्यवाही भी हो सकती है।
*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।
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