शुक्रवार, 27 मार्च 2026

युद्ध के चलते दुनिया भर में ऊर्जा लॉकडाउन का डर!

विश्व आज एक नए संकट के कगार पर खड़ा है। 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध ने मात्र चार सप्ताह में वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया है। ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’, जिससे दुनिया के 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी का परिवहन होता है, प्रभावी रूप से बंद हो गया है। ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड और कतर के रास लाफान एलएनजी प्लांट पर हमलों से वैश्विक उत्पादन में 3.5 प्रतिशत की कमी आई है, जिसकी मरम्मत में वर्षों लग सकते हैं। तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं, जबकि भारत जैसे आयात-निर्भर देशों में ईंधन, एलपीजी और बिजली की आपूर्ति पर दबाव बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में चेतावनी दी है कि यह संकट ऊर्जा सुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। ऐसे में ‘ऊर्जा लॉकडाउन’ की चर्चा जोर पकड़ रही है। एक ऐसी स्थिति जिसमें ईंधन राशनिंग, बिजली कटौती और औद्योगिक गतिविधियों पर अंकुश लग सकता है, ठीक कोविड जैसी आपात स्थिति की तरह।


यह युद्ध केवल सैन्य टकराव नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का आर्थिक हथियार बन गया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के प्रमुख फतिह बिरोल ने इसे “मेजर, मेजर थ्रेट” बताया है। हॉर्मुज बंद होने से न केवल तेल, बल्कि उर्वरक, हीलियम और सल्फर की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है, जो खाद्य उत्पादन और एआई तकनीक तक को प्रभावित कर रही है। बांग्लादेश ने पहले ही ईंधन राशनिंग लागू कर दी है। श्रीलंका में अनिवार्य ऊर्जा अवकाश की घोषणा हुई है। भारत में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं, एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति अनिश्चित है और बिजली संयंत्रों में कोयला-गैस का संकट गहरा रहा है। यदि युद्ध लंबा चला तो ‘ऊर्जा लॉकडाउन’ वास्तविकता बन सकता है। यानी उद्योग बंद, परिवहन सीमित और घरेलू बिजली पर पाबंदी। यह न केवल मुद्रास्फीति बढ़ाएगा, बल्कि विकास दर को 1-2 प्रतिशत तक घटा सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि हॉर्मुज दो-तीन महीने और बंद रहा तो वैश्विक मंदी अनिवार्य हो जाएगी।


लेकिन संकट के बीच आशा की किरण भी दिख रही है। शांति वार्ता की संभावना बन रही है और इसमें पाकिस्तान की भूमिका अचानक केंद्र में आ गई है। पाकिस्तान ने खुद को अमेरिका और ईरान के बीच मुख्य मध्यस्थ के रूप से स्थापित किया है। पाकिस्तानी आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर की ईरान और अमेरिका दोनों के साथ अच्छी पहुंच का फायदा उठाते हुए इस्लामाबाद ने वार्ता का मंच प्रस्तावित किया है। खबरों के अनुसार, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस और ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर ग़लीबाफ के बीच इस्लामाबाद में संभावित शिखर वार्ता की तैयारी चल रही है। पाकिस्तान ने 15-पॉइंट प्रस्ताव अमेरिका की ओर से ईरान तक पहुंचाया है, जिसमें हॉर्मुज खोलने, यूरेनियम संवर्धन सीमा और मुआवजे जैसे मुद्दे शामिल हैं।


उल्लेखनीय है कि यह भूमिका संयोग नहीं है। पाकिस्तान न तो अमेरिकी सैन्य अड्डे रखता है और न ही ईरान के साथ उसके संबंध खराब हैं। बल्कि पाकिस्तान के दोनों देशों के साथ सैन्य-कूटनीतिक संबंध मजबूत हैं। ईरान के साथ साझा सीमा और शिया समुदाय के कारण, जबकि (पाक आर्मी चीफ की हालिया व्हाइट हाउस यात्रा के चलते) अमेरिका के साथ ट्रंप की व्यक्तिगत दोस्ती के कारण पाकिस्तान मध्यस्थ बनने में सक्षम है। इसके साथ ही कतर और ओमान पारंपरिक मध्यस्थ रहे हैं, सऊदी अरब और टर्की ने भी ‘बैकचैनल’ वार्ता शुरू की है, जबकि चीन ने आर्थिक हितों के कारण शांति की अपील की है। लेकिन जानकारों के अनुसार पाकिस्तान की पहल सबसे मुखर और सक्रिय लग रही है।


सवाल उठता है कि क्या युद्धविराम संभव है? कूटनीतिक विशेषज्ञों की राय विभाजित है। कुछ का मानना है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता एक ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हो सकती है क्योंकि दोनों पक्ष थक चुके हैं। तेल की महंगाई के चलते अमेरिका को घरेलू आर्थिक दबाव और इजरायल को क्षेत्रीय विस्तार की सीमा का सामना करना पड़ रहा है। ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही चरमरा रही है। पाकिस्तान के माध्यम से ‘बैकचैनल’ संदेशों का आदान-प्रदान पहले ही शुरू हो चुका है। यदि इस्लामाबाद शिखर सफल हुआ तो हॉर्मुज दोबारा खुल सकता है और ऊर्जा संकट थम सकता है।

वाशिंगटन इंस्टीट्यूट और स्टिमसन सेंटर के विश्लेषकों का कहना है कि यह युद्ध ‘कोई स्पष्ट विजेता’ नहीं देगा। इजरायल के हमलों से ईरान की ऊर्जा सुविधाएं क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, जिनकी मरम्मत में वर्षों लगेंगे। ईरान की ओर से जवाबी हमले अभी भी जारी हैं। यदि युद्धविराम हो भी गया तो भी ‘दूसरे चरण’ के मुद्दे जैसे कि, परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव और मुआवजा आदि, बने रहेंगे। पाकिस्तान की भूमिका को कुछ विशेषज्ञ ‘रणनीतिक अवसरवाद’ मानते हैं। पाकिस्तान खुद अफगानिस्तान के साथ संघर्ष में फंसा है और सऊदी के साथ रक्षा समझौते की तलाश में है। मध्यस्थता से वह वैश्विक कूटनीति में अपनी प्रासंगिकता बढ़ाना चाहता है। लेकिन विशेषज्ञ चेताते हैं कि यदि ईरान पाकिस्तानी प्रस्ताव को ‘ट्रंप का दबाव’ माने तो बात आगे नहीं बढ़ेगी।

पाकिस्तान भले ही क्षेत्रीय शक्तियों (सऊदी, टर्की) और महाशक्तियों (अमेरिका, चीन) के बीच संतुलन बनाए रखता है। फिर भी, युद्ध की जड़ें गहरी हैं, परमाणु मुद्दा, इजरायल-ईरान शत्रुता और हॉर्मुज का भू-राजनीतिक महत्व आदि। यदि पाकिस्तान सफल हुआ तो भारत को फायदा होगा, क्योंकि हमारा 60 प्रतिशत तेल आयात मध्य पूर्व से आता है। लेकिन भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए।, जैसे कि रणनीतिक भंडार बढ़ाना, नवीकरणीय ऊर्जा को तेज करना और रूस-मध्य एशिया से आयात विविधीकरण करना। ऊर्जा लॉकडाउन से बचने का एकमात्र रास्ता कूटनीति है। लेकिन यदि युद्ध जारी रहा तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। भारत जैसे विकासशील देशों को हर स्थिति के लिए तैयार रहना होगा, न केवल संकट प्रबंधन के लिए, बल्कि दीर्घकालिक ऊर्जा स्वतंत्रता के लिए भी।

यह संकट हमें याद दिलाता है कि युद्ध अब केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि ऊर्जा पाइपलाइनों और आर्थिक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भी लड़ा जाता है। गौरतलब है कि शांति की अपील सभी पक्षों, अमेरिका, इजरायल, ईरान और मध्यस्थ देशों से होनी चाहिए। अन्यथा, दुनिया भर में ऊर्जा लॉकडाउन का साया काफ़ी देर तक मँडराता रहेगा।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

अमरीका ईरान युद्ध और भारत: पूर्व सैनिकों की चिंता !

आज की दुनिया की सबसे बड़ी चिंता है – तेल का दाम। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और हर चीज महंगी हो रही है। क्यों? क्योंकि अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया। मार्च 2026 की शुरुआत में ही सुप्रीम लीडर अली खामेनी समेत ईरान के कई बड़े नेता मारे गए। ईरान ने जवाब दिया, मिसाइलें और ड्रोन दागे। अब युद्ध दो सप्ताह से ज्यादा चल रहा है। तेल 110 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। होर्मुज की खाड़ी, जहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है, को बंद किए जाने का खतरा भी मंडरा रहा है।

दुनिया भर के युद्ध व कूटनीति विशेषज्ञ इस पूरे मामले को लेकर काफ़ी गंभीर हैं। भारत के बात करें तो रिटायर्ड मेजर जनरल जी डी बख्शी स्पष्ट शब्दों में इस युद्ध का विश्लेषण कर रहे हैं। सोशल मीडिया और टीवी पर उन्होंने बार-बार कहा, “ये हमला गलत था। अमेरिका-इजराइल ने ईरान को बहुत कम आंका।” जनरल बख्शी ने अपने एक पोस्ट में लिखा, “सब सोच रहे थे कि ये केकवॉक होगा। लेकिन मैंने शुरू से चेतावनी दी थी कि ईरान को कम मत समझो। ये असममित युद्ध लड़ेगा।” 


एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने सरल भाषा में समझाया कि क्या गलती हुई। ईरान के पास सस्ते ड्रोन (20,000 डॉलर का एक) हैं, जबकि अमेरिका-इजराइल के महंगे इंटरसेप्टर मिसाइल (20 लाख डॉलर का एक) खत्म हो रहे हैं। ईरान ने हाइपरसोनिक मिसाइलें दागीं, जो रडार से बच सकती हैं। इन मिसाइलों ने कतर के रडार, थाड बैटरी, अमेरिकी बेस और इजराइल के कई शहरों पर हमले किए। 15 दिन में 650 मिसाइलें और 2600 ड्रोन तबाह हुए, 21 अमेरिकी सैनिक मारे गए। इस सबका अंदाज़न खर्च क़रीब 21 अरब डॉलर से ज्यादा हुआ। जनरल बख्शी के अनुसार, “ट्रंप ने सोचा था कि खामेनी मरते ही युद्ध खत्म हो जाएगा। लेकिन ईरान का हौसला बहुत ऊंचा है। 8 साल के ईरान-इराक युद्ध में 10 लाख मौतें हुईं, फिर भी ईरान नहीं झुका। अब ये अस्तित्व की लड़ाई है।”

वे आगे कहते है, “होर्मुज खाड़ी बंद करने से पूरी दुनिया में मंदी आ जाएगी। तेल 150 डॉलर से भी ऊपर जा सकता है। अमेरिका के लिए बॉडी बैग्स (सैनिकों की मौत) मिडटर्म चुनाव में आफत बन सकती है। ट्रंप फंस गए हैं। ये युद्ध शुरू करना आसान था, लेकिन खत्म करना मुश्किल। ये 21वीं सदी का सबसे बड़ा संघर्ष है। एकध्रुवीय दुनिया खत्म हो रही है। बहुध्रुवीय दुनिया मजबूत हो रही है।”


साधारण भारतीय के लिए ये युद्ध दूर की बात नहीं। हम दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक हैं। 80% तेल बाहर से आता है। यदि होर्मुज बंद हुआ तो पेट्रोल 150-200 रुपये लीटर हो जाएगा। रसोई गैस भी महंगी हो जाएगी। वहीं खाड़ी देशों में काम करने वाले 9 लाख भारतीयों की नौकरी भी खतरे में आ जाएगी। ईरान के साथ भारत का ‘चाबहार बंदरगाह प्रोजेक्ट’ ठप पद सकता है। अफगानिस्तान और मध्य एशिया का मार्ग भी बंद हो सकता है। महंगाई आम आदमी की जेब काटेगी।

गौरतलब है कि भारत ने हमेशा युद्ध की स्थिति में संतुलन बनाए रखा है। इस युद्ध की बात करे तो, ईरान से हमें सस्ता तेल, इजराइल से हथियार और टेक्नोलॉजी और अमेरिका से व्यापार मिलता रहा है। लेकिन इस बार मोदी सरकार ने अमेरिका-इजराइल के साथ खुलकर खड़ा होने का फैसला किया। प्रधानमंत्री मोदी फरवरी में इजराइल गए। वहां उन्होंने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ “स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” की घोषणा की। युद्ध शुरू होते ही भारत ने ईरान के हमलों की निंदा की। खाड़ी देशों के राजाओं को फोन कर समर्थन जताया। संयुक्त राष्ट्र में ईरान के खिलाफ प्रस्ताव का समर्थन किया। खामेनी की मौत पर ईरानी दूतावास में श्रद्धांजलि देरी से दी।


जानकार मानते हैं कि भारत का ये फैसला गलत था। क्योंकि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता खतरे में पड़ गई। हम BRICS के अध्यक्ष हैं। रूस-चीन-ईरान हमारे साथी हैं। लेकिन अमेरिका के दबाव में हम ईरान के खिलाफ खड़े हो गए। भारत इजराइल और ईरान से अच्छे संबंध रखता है। हम युद्धविराम का मध्यस्थ बन सकते हैं। लेकिन सरकार ने मध्यस्थता की बजाय एक तरफा रुख अपनाया। भारत को तटस्थ रहना चाहिए था। दोनों पक्षों से बात कर युद्धविराम की अपील करनी चाहिए थी। मोदी जी को इजराइल जाने के बजाय दोनों देशों के नेताओं से फोन पर बात करनी चाहिए थी। संयुक्त राष्ट्र में ‘शांति और संवाद’ का प्रस्ताव लाना चाहिए था। ईरान से तेल खरीदना जारी रखना चाहिए था। चाबहार प्रोजेक्ट को मजबूत करना चाहिए था।


सरकार ने सोचा कि अमेरिका-इजराइल के साथ खड़े होने से फायदा होगा। लेकिन भूल गए कि ईरान हमारा पुराना दोस्त है। चाबहार बंदरगाह अमेरिका के खिलाफ हमारा रणनीतिक कदम था। सस्ता ईरानी तेल हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूत करता था। अब तेल महंगा होने से मुद्रास्फीति बढ़ेगी। विदेशी मुद्रा भंडार पर बोझ पड़ेगा। यदि भारत QUAD और BRICS दोनों का सदस्य है तो हमारी आवाज दोनों तरफ सुनी जाती। लेकिन क्या एक तरफा रुख अपनाकर हमने अपनी ताकत कम कर दी?

मेजर जनरल बख्शी के अनुसार, “ये मूर्खतापूर्ण युद्ध है। ये जल्द खत्म हो।” भारत को अब अपनी गलती सुधारनी चाहिए। तटस्थ रहकर शांति की बात करनी चाहिए। ईरान से संबंध वापसी सुधारने चाहिए। तेल आयात के वैकल्पिक रास्ते तलाशने चाहिए। भारत की विदेश नीति हमेशा “सभी के साथ, किसी के खिलाफ नहीं” रही है। मोदी सरकार को इस सिद्धांत पर लौटना चाहिए। क्योंकि अंत में भारत का हित सबसे ऊपर है – सस्ता तेल, सुरक्षित नौकरियां और मजबूत अर्थव्यवस्था। युद्ध में किसी एक का पक्ष नहीं, बल्कि शांति का पक्ष लेना चाहिए। 

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

लड़ाकू विमान अपग्रेड: भारत का वायु रक्षा में क्रांतिकारी कदम ?

उन्नत माध्यमिक लड़ाकू विमान (AMCA) को 5.5वीं और छठी पीढ़ी में अपग्रेड करना भारत की रक्षा क्षमताओं में एक नया अध्याय लिखा जा रहा है। हाल के वर्षों में, भारत ने अपनी वायु सेना को मजबूत बनाने के लिए स्वदेशी तकनीकों पर जोर दिया है। ‘एमका’ कार्यक्रम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। 2026 तक, ‘एमका’ को 5.5वीं पीढ़ी और आगे छठी पीढ़ी के स्तर तक अपग्रेड करने की योजना ने दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। इस योजना के तहत, नई स्टेल्थ तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग पर ज़ोर दिया गया है। सवाल उठता है कि क्या यह भारत की वैश्विक वायु क्षेत्र में स्थिति को कैसे मजबूत करेगा और क्या यह अमेरिका तथा चीन से मुकाबला करने में सक्षम होगा? 

‘एमका’ कार्यक्रम की शुरुआत 2011 में हुई थी, जब रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) ने पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर जेट विकसित करने का फैसला किया। उल्लेखनीय है कि, ‘एमका’ एक ट्विन-इंजन, सिंगल-सीट विमान है, जिसका वजन लगभग 27 टन है और यह मैक 2.15 की गति से उड़ान भर सकता है। Mk1 संस्करण GE F414 इंजन का उपयोग करेगा, जबकि Mk2 को 110-120 kN थ्रस्ट वाले नए इंजन से लैस किया जाएगा, जो फ्रांस की साफरान या अन्य साझेदारों के साथ सह-विकासित होगा। 2026 तक, ‘एमका’ Mk2 को 5.5वीं पीढ़ी का दर्जा दिया जा रहा है, जिसमें छठी पीढ़ी की विशेषताएं जैसे AI-संचालित इलेक्ट्रॉनिक पायलट और प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस शामिल हैं। इसका प्रोटोटाइप रोलआउट 2028 के अंत तक और पहली उड़ान 2029 में होने की उम्मीद है, जबकि इंडक्शन 2035 तक हो सकता है। यह अपग्रेड भारत को अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों की श्रेणी में खड़ा करेगा, जो पांचवीं पीढ़ी के विमान संचालित करते हैं।


जानकारों का मानना है कि ‘एमका’ में अपनाई जा रही नई स्टेल्थ तकनीक भारत की वायु रक्षा को अभूतपूर्व मजबूती प्रदान करेगी। स्टेल्थ का मतलब है रडार से बचाव, जो विमान को दुश्मन की नजरों से छिपा कर रखता है। ‘एमका’ में डाइवर्टरलेस सुपरसोनिक इनलेट (DSI), सर्पेंटाइन एयर इनटेक डक्ट और उन्नत रडार-एब्जॉर्बेंट मटेरियल्स का उपयोग किया जा रहा है। ये विशेषताएं रडार सिग्नेचर को न्यूनतम करती हैं, जिससे विमान दुश्मन के वायु रक्षा सिस्टम को भेद सकता है। उदाहरण के लिए, एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी ने हाल ही में एक नए इंटेक डिजाइन का विकास किया है, जो 98% प्रेशर रिकवरी सुनिश्चित करता है, जो स्टेल्थ और इंजन दक्षता के बीच संतुलन भी बनाता है। यह तकनीक ‘एमका’ को चीनी J-20 या अमेरिकी F-35 जैसे विमानों से बेहतर छिपाव प्रदान करेगी।

गौरतलब है कि ‘एमका’ में ‘इलेक्ट्रॉनिक पायलट’ नामक AI-सिस्टम होगा, जो पायलट के साथ सहयोगी की भूमिका निभाएगा। यह AI खतरे का पता लगाने, रूट ऑप्टिमाइजेशन, कॉम्बैट स्ट्रैटेजी और मिशन प्लानिंग में मदद करेगा। इसके अलावा, AI-आधारित प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस से विमान की उपलब्धता दर 75% तक पहुंच जाएगी, जो वर्तमान विमानों से कहीं अधिक है। सेंसर फ्यूजन और नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर सिस्टम ‘एमका’ को ड्रोन स्वार्म्स और अन्य प्लेटफॉर्म्स के साथ एकीकृत करेगा। यह छठी पीढ़ी की दिशा में कदम है, जहां AI स्वायत्त निर्णय लेने में सक्षम होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह अपग्रेड भारत की वायु सेना को आधुनिक युद्धों में बढ़त देगा, जहां AI और स्टेल्थ निर्णायक कारक हैं।

रक्षा विशेषज्ञ यह सवाल भी उठा रहे हैं कि इस अपग्रेड से भारत की वैश्विक वायु क्षेत्र में स्थिति कैसे सुधरेगी? यह स्वदेशी तकनीक पर निर्भरता बढ़ाएगा, जो आयात पर निर्भरता कम करेगा। वर्तमान में, भारतीय वायु सेना में स्क्वाड्रन की कमी है, और ‘एमका’ इस कमी को पूरा करेगा। स्टेल्थ और AI से लैस ‘एमका’ भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में मजबूत डिटरेंस प्रदान करेगा। चीन के साथ सीमा विवादों में, ‘एमका’ J-20 का मुकाबला कर सकेगा, जो वर्तमान में भारत के लिए चुनौती है। पाकिस्तान के चीनी J-10 या JF-17 के खिलाफ भी यह श्रेष्ठ होगा। वैश्विक स्तर पर, ‘एमका’ भारत को क्वाड (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) जैसे गठबंधनों में मजबूत भागीदार बनाएगा। यह एशिया में पावर बैलेंस को भारत के पक्ष में झुका सकता है, क्योंकि यह चौथा देश होगा जो स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का विमान विकसित करेगा।

उल्लेखनीय है कि अमेरिका के F-22 और F-35 परिपक्व तकनीक वाले लड़ाकू विमान हैं, जिनमें दशकों का अनुभव है। ‘एमका’ की स्टेल्थ और AI विशेषताएं F-35 से तुलनीय हैं, लेकिन उत्पादन और संचालन अनुभव की कमी एक कमजोरी है। हालांकि, ‘एमका’ की लागत कम होगी और यह भारत की विशिष्ट जरूरतों के अनुरूप होगा। वहीं चीन के J-20 के खिलाफ, ‘एमका’ की उन्नत स्टेल्थ और AI बढ़त दे सकती है, खासकर LAC पर, जहाँ J-20 की संख्या अधिक है, लेकिन ‘एमका’ की AI एकीकरण से भारत गुणवत्ता में आगे निकल सकता है। दावा है कि छठी पीढ़ी की ओर अपग्रेड से ‘एमका’ अमरीका के ‘नेक्स्ट जनरेशन एयर डोमिनेन्स’ (NGAD) या चीनी छठी पीढ़ी कार्यक्रमों से मुकाबला अवश्य कर सकेगा। लेकिन वहीं इस परियोजना में चुनौतियां भी हैं। जैसे कि इंजन विकास में देरी, फंडिंग की कमी और समयसीमा का पालन। इसलिए यदि ‘एमका’ को एक सफल परियोजना बनाना है तो सरकार को समय पर फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां सुनिश्चित करनी चाहिए। यह न केवल रक्षा बल्कि भारत की तकनीकी क्षमता का प्रतीक है, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम है।

 

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।
 

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

कैरियर पिजन सर्विस: संचार का प्राचीन तरीका

आज के डिजिटल युग में जहां व्हाट्सएप, वीडियो कॉल, इंटरनेट और सैटेलाइट फोन से पल भर में संदेश दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच जाते हैं, वहां एक प्राचीन संचार माध्यम अभी भी जीवित है – ‘कैरियर पिजन सर्विस’। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि वास्तविकता है। ओडिशा पुलिस की कैरियर पिजन सर्विस दुनिया की एकमात्र ऐसी पुलिस फोर्स है जो इस विरासत को आज भी संरक्षित रखे हुए है। यह सेवा न सिर्फ इतिहास की याद दिलाती है, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं में जब आधुनिक संचार व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है, तब एक विश्वसनीय बैकअप के रूप में काम आती है। एक ऐसा माध्यम जो हजारों वर्षों से मानव सभ्यता का अभिन्न अंग रहा है।


‘कैरियर पिजन’ या ‘होमिंग पिजन’ का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा है। मिस्र में लगभग 3000 ईसा पूर्व से ही कबूतरों को संदेशवाहक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। फारस, यूनान और रोमन साम्राज्य में इनकी व्यापक उपयोगिता थी। यूनानियों ने ओलंपिक खेलों के परिणाम इन कबूतरों के जरिए शहर-दर-शहर पहुंचाए। चंगेज खान ने अपने विशाल साम्राज्य में ‘पिजन नेटवर्क’ स्थापित किया। मध्यकाल में यूरोप के युद्धों और मध्य पूर्व के व्यापारियों ने इनका सहारा लिया। भारत में भी यह परंपरा बहुत पुरानी है। चंद्रगुप्त मौर्य के काल में फारसी प्रभाव से ‘पिजन पोस्ट’ शुरू हुई थी। मुगल और ब्रिटिश काल में पुलिस और सेना दोनों ने इसका इस्तेमाल किया। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में ‘कैरियर पिजनों’ ने जान भी बचाई,  फ्रांस में 'चेर आमी' नामक कबूतर ने 194 अमेरिकी सैनिकों की जान बचाई थी। भारत में भी ब्रिटिश काल से पुलिस स्टेशनों के बीच संचार के लिए ‘पिजन सर्विस’ चली आ रही थी।

लेकिन आज की बात करें तो ओडिशा पुलिस की यह सेवा अनूठी है। 1946 में, द्वितीय विश्व युद्ध के ठीक बाद, ओडिशा पुलिस ने इसे शुरू किया। सबसे पहले नक्सल प्रभावित कोरापुट जिले में प्रयोग किया गया। धीरे-धीरे यह 38 स्थानों (जिलों, सब-डिवीजनों, सर्कलों और पुलिस स्टेशनों) तक फैल गई। इस सेवा के चरम पर 19 ‘पिजन लॉफ्ट’ सक्रिय थे, जहां 1500 से अधिक प्रशिक्षित कबूतर तैनात थे। हर लॉफ्ट पर एक इंस्पेक्टर, तीन सब-इंस्पेक्टर, एक सहायक सब-इंस्पेक्टर और 35 कांस्टेबल तैनात थे। यह सेवा न सिर्फ सामान्य संचार, बल्कि चुनावों और आपदाओं में भी काम आई। 1976-77 के चुनावों और 1982 के ‘फ्लैश फ्लड्स’ में जब सड़कें-ब्रिज बह गए और वायरलेस-टेलीफोन फेल हो गए, तब इन कबूतरों ने सरकारी संदेश पहुंचाए।

सबसे रोचक घटना 13 अप्रैल 1948 की है। तब भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संबलपुर, ओडिशा में थे। उन्हें 265 किलोमीटर दूर कटक में तत्काल निर्देश भेजने थे, सुबह 6 बजे नेहरू का हस्तलिखित संदेश लेकर एक ‘कैरियर पिजन’ उड़ा। ठीक 11:20 पर, यानी महज 5 घंटे 20 मिनट में, वह कटक पहुंच गया। जब नेहरू खुद कटक पहुंचे तो अपना मूल संदेश और वही कबूतर देखकर दंग रह गए, वे हैरान और प्रसन्न थे। यह घटना ओडिशा पुलिस की ‘पिजन सर्विस’ की विश्वसनीयता का जीवंत प्रमाण है।

1954 में दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय डाक प्रदर्शनी में इन कबूतरों का प्रदर्शन किया गया। 1989 में तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरामन जब कटक आए तो इन कबूतरों को देखकर मुग्ध हो गए। 1999 के ‘सुपर साइक्लोन’ में जब तटीय इलाकों में संचार लाइनें पूरी तरह ठप हो गईं, तब इन कबूतरों ने लाज रखी। इनकी गति औसतन 55 से 80 किलोमीटर प्रति घंटा होती है। ये एक बार में 400-500 किलोमीटर उड़ने की क्षमता रखते हैं। ‘बेल्जियन होमर’ नस्ल के ये कबूतर चुंबकीय क्षेत्र का पता लगाकर अपने घोंसले तक आसानी से पहुंच जाते हैं।

2008 में आधुनिक संचार के चलते इसे औपचारिक रूप से बंद कर दिया गया। लेकिन ओडिशा पुलिस ने इसे पूरी तरह खत्म नहीं होने दिया। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के आदेश पर दो ‘लॉफ्ट’ अभी भी बरकरार रखे गए, एक कटक में ओडिशा पुलिस मुख्यालय पर 105 ‘बेल्जियन होमर पिजन’ और दूसरा अंगुल के पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज पर 44 पिजन। कुल लगभग 150 प्रशिक्षित कबूतर आज भी सेवा में हैं। अब इन्हें सिर्फ सांस्कृतिक और औपचारिक उपयोग के लिए रखा गया है।  ये कबूतर गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस की परेड में शांति, प्रेम और स्वतंत्रता का संदेश लेकर उड़ते हैं। हाल ही में भुवनेश्वर में 25 कबूतरों ने 30 किलोमीटर की दूरी मात्र 29 मिनट में तय की।

आज जब साइबर हमले, प्राकृतिक आपदाएं और इमरजेंसी में मोबाइल नेटवर्क फेल हो जाते हैं, तब यह सेवा सिर्फ विरासत नहीं, बल्कि सुरक्षा की गारंटी है। ओडिशा पुलिस के स्पेशल डीजी (कम्युनिकेशंस) अरुण रे के अनुसार, “यह भारत का सबसे अच्छा रखा गया राज है।” गौरतलब है कि सीएजी ने इसकी लागत पर आपत्ति जताई थी, लेकिन मुख्यमंत्री ने साफ कहा, “विरासत को बचाओ।”

यह सेवा हमें सिखाती है कि प्रगति का मतलब पुरानी चीजों को फेंकना नहीं, बल्कि उन्हें संभाल कर रखना है। आज युवा पीढ़ी स्मार्टफोन पर जीती है, लेकिन जब वे इन कबूतरों को उड़ते देखते हैं तो इतिहास जीवंत हो उठता है। ऐसे में यदि स्कूलों-कॉलेजों व अन्य कार्यकर्मों में इनका प्रदर्शन करवाया जाए, तो न सिर्फ़ नई पीढ़ी को बरसों पुरानी विरासत जानने का मौका मिलेगा बल्कि पर्यटन को भी बढ़ावा मिले। ड्रोन और सैटेलाइट के युग में भी ये पंख वाले डाकिया हमें याद दिलाते हैं कि प्रकृति की शक्ति आज भी अजेय है।

ओडिशा पुलिस की यह पहल दुनिया के लिए मिसाल है। अमेरिका, यूरोप या एशिया की कोई अन्य पुलिस फोर्स आज ऐसा नहीं कर रही। यह सिर्फ ओडिशा का गौरव नहीं, बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक विरासत है। हमें इसे और मजबूत करना चाहिए। ज्यादा ‘लॉफ्ट’, ज्यादा प्रशिक्षण, ज्यादा जागरूकता किया जाए। क्योंकि संचार सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि विश्वास और विश्वसनीयता का मामला है। जब आधुनिक दुनिया इंस्टेंट मैसेजिंग पर निर्भर है, तब ये उड़नहार संदेशवाहक हमें सिखाते हैं – कुछ चीजें कभी पुरानी नहीं होतीं, वे सिर्फ विरासत बन जाती हैं। ओडिशा पुलिस की ‘कैरियर पिजन सर्विस’ इसी विरासत का जीवंत प्रतीक है। इसे बचाए रखना हमारी जिम्मेदारी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इन पंखों की उड़ान में इतिहास को महसूस कर सकें।
 

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।