गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

पायलटों की थकान: हवाई यात्रा की सुरक्षा पर मंडराता खतरा!

भारतीय वाणिज्यिक उड्डयन क्षेत्र (कमर्शियल फ्लाइट्स) एक बार फिर सुरक्षा की गंभीर चुनौती से जूझ रहा है। मात्र 48 घंटे के अंदर दो कमर्शियल पायलटों की अचानक मौत ने पूरे उद्योग को झकझोर दिया है। एयरलाइन पायलट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ALPA इंडिया) ने इस घटना को पायलट थकान (फैटिग) से जोड़ते हुए डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (डीजीसीए) को पत्र लिखा है। एसोसिएशन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (एफ़डीटीएल) नियमों के संशोधित संस्करण को लागू करने में हो रही देरी और एयरलाइंस को बार-बार दी जा रही छूटें पायलटों पर भारी बोझ डाल रही हैं, जिससे उड़ान सुरक्षा की नींव हिल रही है। यह मुद्दा केवल दो मौतों तक सीमित नहीं है, यह पूरे भारतीय एविएशन इकोसिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।
 
29 अप्रैल 2026 को एयर इंडिया के कैप्टन तरनदीप सिंह बाली में शेड्यूल्ड रेस्ट के दौरान दिल का दौरा पड़ने से चल बसे। एक दिन बाद अकासा एयर के एक पायलट ने भी हार्ट अटैक का शिकार होकर जान गंवाई। दोनों मौतें अलग-अलग एयरलाइंस और अलग-अलग जगहों पर हुईं, लेकिन दोनों में थकान का साया साफ नजर आता है। एएलपीए इंडिया ने डीजीसीए को लिखे अपने पत्र में इन घटनाओं को एफ़डीटीएल नियमों की देरी से सीधे जोड़ा है। एसोसिएशन का कहना है कि पायलटों की ड्यूटी घंटों को लेकर जो नई गाइडलाइंस 2024 में जारी की गई थीं, जिनमें साप्ताहिक आराम को 36 घंटे से बढ़ाकर 48 घंटे करना, मिडनाइट लैंडिंग की संख्या सीमित करना और थकान रिपोर्टिंग को अनिवार्य बनाना शामिल था। वे अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हो पाई हैं। इसके बजाय एयरलाइंस को बार-बार छूट दी जा रही है, खासकर इंडिगो जैसी बड़ी कंपनियों को, जहां ऑपरेशनल दबाव के नाम पर नियमों को ढीला किया जा रहा है।
 
भारतीय एविएशन का विकास वाकई सराहनीय है। पिछले कुछ वर्षों में यात्री यातायात में दोहरे अंकों की वृद्धि हुई है। एयरपोर्ट्स का विस्तार हो रहा है, नई एयरलाइंस आ रही हैं और कनेक्टिविटी बढ़ रही है। लेकिन विकास की इस रफ्तार के साथ पायलटों की उपलब्धता, उनके स्वास्थ्य प्रबंधन और थकान नियंत्रण की व्यवस्था नहीं बढ़ पाई है। 2024 के नए एफ़डीटीएल नियम ICAO (इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन) के मानकों के अनुरूप थे, जो वैश्विक स्तर पर पायलट थकान को गंभीरता से लेते हैं। इन नियमों का मकसद था कि पायलट 100 प्रतिशत अलर्ट रहें, क्योंकि एक छोटी सी गलती भी सैकड़ों यात्रियों की जान ले सकती है। दुर्भाग्य से, डीजीसीए ने इन नियमों को फुल-स्केल लागू करने में देरी की और एयरलाइंस के दबाव में छूटें दीं। एएलपीए इंडिया का आरोप है कि ये छूटें सुरक्षा मानकों से समझौता कर रही हैं।
 
थकान केवल शारीरिक नहीं, मानसिक भी होती है। लंबी ड्यूटी, बार-बार टाइम-जोन बदलना, अनियमित आराम, परिवार से दूरी, ये सब पायलटों पर दबाव बढ़ाते हैं। अध्ययनों के अनुसार, 12-14 घंटे की लगातार ड्यूटी के बाद पायलट की निर्णय लेने की क्षमता शराब के नशे वाले व्यक्ति जितनी कम हो जाती है। भारत में पहले भी कई घटनाएं हुई हैं जहां पायलट कोकपिट में बेहोश हो गए या स्वास्थ्य समस्या आई। 2025 में इंडिगो के फ्लाइट कैंसिलेशन के दौरान भी पायलट थकान की चर्चा हुई थी। अब 2026 में दो मौतें इस समस्या को और गंभीर बना रही हैं। एएलपीए इंडिया ने डीजीसीए से मांग की है कि एफ़डीटीएल छूटों को तुरंत बंद किया जाए, एक समयबद्ध रोडमैप बनाया जाए और सभी एयरलाइंस पर एक समान नियम लागू हों।
 
यह मुद्दा केवल पायलट यूनियन की शिकायत का नहीं है। यह यात्रियों, एयरलाइंस और सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर डीजीसीए अब भी देरी करता रहा तो भविष्य में बड़े हादसे का खतरा बढ़ जाएगा। याद रखें, एयर इंडिया एक्सप्रेस या अन्य एयरलाइंस के पायलट पहले भी थकान के शिकार हो चुके हैं। 2025 में इंडिगो और एयर इंडिया के पायलट कोकपिट में गिरने की घटनाएं सामने आई थीं। हर बार यही बहाना दिया जाता है कि पायलट कमी है, ट्रेनिंग स्लॉट कम हैं या ऑपरेशनल दबाव है। लेकिन क्या ये बहाने सुरक्षा से ऊपर हो सकते हैं? एयरलाइंस को चाहिए कि वे अधिक पायलटों की भर्ती करें, बेहतर शेड्यूलिंग करें और फेटिग रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम (FRMS) को सख्ती से लागू करें। ऐसे में डीजीसीए को भी अपनी निगरानी बढ़ानी होगी।
 
वैश्विक उदाहरण देखें तो यूरोप और अमेरिका में एफ़डीटीएल के नियम बहुत सख्त हैं। वहां पायलटों को पर्याप्त आराम मिलता है और थकान रिपोर्टिंग रियल-टाइम होती है। भारत, जो विश्व का तीसरा सबसे बड़ा एविएशन मार्केट बनने जा रहा है, वहां ऐसे लापरवाह रवैये की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। एएलपीए इंडिया का पत्र सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक गंभीर विषय है जिस पर तुरंत करवाई होनी चाहिए। डीजीसीए को चाहिए कि वह इस पत्र पर तुरंत संज्ञान ले, सभी एयरलाइंस से फीडबैक और सुझाव ले और एफ़डीटीएल के नियमों को 100 प्रतिशत लागू करने की समयसीमा घोषित करे। साथ ही, पायलटों के स्वास्थ्य जांच को अनिवार्य और नियमित बनाया जाए।
 
गौरतलब है कि इस समस्या का समाधान केवल नियम बनाने से नहीं होगा। एयरलाइंस को अपनी संस्कृति बदलनी होगी। जहां लाभ के बजाय सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए। सरकार को भी एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट पर निवेश बढ़ाना होगा। पायलट ट्रेनिंग स्कूलों को बढ़ावा दें, विदेशी पायलटों पर निर्भरता कम करें और घरेलू टैलेंट को प्रोत्साहित करें।
 
ऐसा कहना ग़लत नहीं होगा कि दो पायलटों की मौत एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता का संकेत है। अगर हम आज चुप रहे तो कल का हादसा पूरे देश को महंगा पड़ेगा। एएलपीए इंडिया ने जो आवाज उठाई है, उसे डीजीसीए अविलंब को सुनना चाहिए। उड़ानें सुरक्षित हों, तभी विकास सार्थक होगा। डीजीसीए और सरकार को अब जागना होगा, जहाँ देरी की कोई गुंजाइश नहीं है। पायलट थकान रोकना सिर्फ एक नियम नहीं, बल्कि सैकड़ों जिंदगियों को बचाने का वादा है। 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

सीबीआई अधिकारी की सजा: संस्थागत भ्रष्टाचार पर सवाल !

दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में गत 18 अप्रैल को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया। न्यायमूर्ति शशांक नंदन भट्ट ने सीबीआई के वर्तमान संयुक्त निदेशक रमनीश और सेवानिवृत्त सहायक पुलिस आयुक्त वी.के. पांडे को धारा 323, 427, 448 तथा 34 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया। यह घटना वर्ष 2000 की है, जब रमनीश सीबीआई में डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस के पद पर थे। यह फैसला सीबीआई की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाता है। सीबीआई खुद को देश की प्रमुख जांच एजेंसी बताती है, जो भ्रष्टाचार और दुरुपयोग के खिलाफ लड़ती है। लेकिन जब उसके अपने वरिष्ठ अधिकारी ही ‘मालाफाइड रेड’, मारपीट और साजिश में शामिल हों, तो सवाल उठता है कि तब सीबीआई अपने भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करती?
 
शिकायतकर्ता अशोक कुमार अग्रवाल, 1985 बैच के आईआरएस अधिकारी, उस समय दिल्ली जोन में डिप्टी डायरेक्टर (इनफोर्समेंट) थे। अदालत ने पाया कि 19 अक्टूबर 2000 को सीबीआई टीम द्वारा उनके घर पर की गई प्रातः कालीन रेड और गिरफ्तारी पूरी तरह ‘मालाफाइड’ (दुराभिसंधि से) थी। इसका एकमात्र उद्देश्य सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (सीएटी) के 28 सितंबर 2000 के आदेश को निष्प्रभावी बनाना था, जिसमें अग्रवाल के निलंबन की समीक्षा चार सप्ताह में करने का निर्देश दिया गया था।
 

अदालत ने माना कि रेड और गिरफ्तारी कानून द्वारा प्रदत्त शक्तियों का घोर उल्लंघन थी। आरोपी अधिकारियों के कार्य ‘आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन’ की परिभाषा में नहीं आते, इसलिए उन्हें धारा 197 सीआरपीसी या दिल्ली पुलिस एक्ट की धारा 140 के संरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता। इसके साथ ही अदालत ने इस मामले में साजिश भी स्थापित की। क्योंकि कानून के मुताबिक तत्कालीन डीएसपी रमनीश को केस दर्ज करने का अधिकार ही नहीं था। अदालत ने कहा कि आरोपियों की पूरी कार्रवाई कानून का उल्लंघन थी और सीएटी के आदेश के तहत शिकायतकर्ता को वंचित करने का जानबूझकर प्रयास था। सबूत ‘बियॉन्ड रीजनेबल डाउट’ के स्तर पर शिकायतकर्ता के पक्ष में थे। विभागीय जांच में यह भी देखना होगा कि डीएसपी रमनीश किसके इशारे पर ऐसा कर रहे थे?  
 

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2016 में और सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2023 में पहले ही धारा 197 सीआरपीसी के तहत संरक्षण को अस्वीकार कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने स्वतंत्र रूप से पुष्टि की कि ‘मालाफाइड’ इरादे से किए गए कार्य आधिकारिक कर्तव्य नहीं माने जा सकते। रमनीश आज भी सीबीआई में संयुक्त निदेशक के पद पर हैं। दोषसिद्धि के बाद भी क्या विभागीय कार्रवाई हुई? क्या सस्पेंशन या बर्खास्तगी का प्रस्ताव है? अतीत में कई मामलों में सीबीआई अधिकारियों पर भ्रष्टाचार, फर्जी मुठभेड़, सबूत गढ़ने या राजनीतिक दबाव के आरोप लगे, लेकिन आंतरिक कार्रवाई अक्सर कमजोर या लंबित रहती है। क्या यह संस्थागत संरक्षण का मामला नहीं है? क्या सीबीआई में ‘अपने लोगों’ को बचाने की संस्कृति है, जो उसकी निष्पक्षता को कमजोर करती है? अगर एजेंसी खुद कानून तोड़ती है तो आम नागरिक उस पर भरोसा कैसे करे? यह घटना 2000 की है, लेकिन आज भी रमनीश जैसे अधिकारी उच्च पद पर हैं, जो कि चिंताजनक है।
 

यहां आर्टिकल 311 और रूल 19 का उल्लेख जरूरी है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 311 सरकारी कर्मचारियों (सिविल सेवा में नियुक्त व्यक्तियों) की रक्षा करता है। यह कहता है कि किसी कर्मचारी को बिना जांच के, बर्खास्तगी, हटाया जाना या रैंक में कमी नहीं की जा सकती। ऐसे में आरोपी को उस पर लगे आरोप बताए जाएं और सुनवाई का अवसर दिया जाए। लेकिन दूसरे प्रावधान (दूसरा प्रोविजो) में अपवाद हैं। खंड (a) स्पष्ट है, अगर कर्मचारी का आचरण आपराधिक मुकदमे में दोषसिद्धि का आधार बना है, तो पूर्ण जांच की जरूरत नहीं। दोषसिद्धि के आधार पर सीधे बर्खास्तगी या अन्य सजा दी जा सकती है।सीसीएस (सीसीए) रूल्स 1965 के रूल 19(i) इसी सिद्धांत पर आधारित है। इसमें कहा गया है कि आपराधिक दोषसिद्धि वाले आचरण के आधार पर दंड लगाने के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। दोषसिद्धि के बाद विभागीय अधिकारी शो-कॉज नोटिस जारी कर कर्मचारी को सजा के प्रस्ताव पर अपना पक्ष रखने का अवसर देता है, लेकिन पूर्ण अनुशासनिक जांच की जरूरत नहीं पड़ती। 
 
रूल 19 का उद्देश्य है कि दोषसिद्धि के बाद अनावश्यक देरी न हो और दोषी को सेवा में बनाए रखने का जोखिम न लिया जाए। अदालत की दोषसिद्धि को विभागीय रूप से स्वीकार किया जाता है, हालांकि कर्मचारी अपील में राहत मांग सकता है, लेकिन अपील या सजा पर स्टे होने से दोषसिद्धि स्वतः रद्द नहीं होती।
 

इस मामले में रमनीश और पांडे की दोषसिद्धि के बाद सीबीआई और संबंधित विभाग को अनुच्छेद 311(2) के प्रोविजो (a) और रूल 19 के तहत त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो यह सवाल और मजबूत हो जाएगा कि सीबीआई अपने अधिकारियों के खिलाफ क्यों नरम रवैया अपनाती है ?
 
कानून के जानकार इस फैसले को न्याय की जीत मानते है, लेकिन फैसला आने में बहुत देरी हुई। 26 साल बाद न्याय मिला। यह दर्शाता है कि शक्तिशाली लोगों के खिलाफ लड़ाई कितनी लंबी और कठिन हो सकती है। सीबीआई को आत्मचिंतन करना चाहिए। अपनी छवि सुधारने के लिए उसे आंतरिक जवाबदेही मजबूत करनी होगी। भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी अगर खुद भ्रष्टाचार या दुरुपयोग से मुक्त नहीं होती, तो लोकतंत्र में उस पर जानता का  विश्वास घटता है।
 
अशोक कुमार अग्रवाल जैसे निडर लोगों की हिम्मत सराहनीय है। ऐसे लोग दबाव, धमकियों और लंबी कानूनी लड़ाई के बावजूद न्याय की राह नहीं छोड़ते। यह मामला याद दिलाता है कि कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए – चाहे आरोपी कोई भी हो। सीबीआई जैसे संस्थानों को इस सबक को गंभीरता से लेना चाहिए, वरना ‘सीबीआई बनाम सीबीआई’ जैसी स्थितियां बार-बार उभरेंगी। 

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

नोएडा में मजदूर अशांति: क्या एक राष्ट्रीय चेतावनी?

नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में बीते 13 अप्रैल को जो घटना घटी, वह केवल एक स्थानीय प्रदर्शन नहीं थी। फेज-2 के होजरी  कॉम्प्लेक्स, सेक्टर 60, 62, 63 और आसपास के दर्जनों कारखानों के हजारों मजदूर वेतन वृद्धि, ओवरटाइम का दोगुना भुगतान, साप्ताहिक छुट्टी, बोनस और शिकायत निवारण समिति जैसी मांगों को लेकर सड़क पर उतरे। शुरू में शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन था, लेकिन जल्द ही पथराव, वाहनों में आगजनी, संपत्ति तोड़फोड़ और पुलिस के साथ टकराव का रूप ले लिया। पुलिस को आंसू गैस और लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा। सैकड़ों लोग घायल हुए, दर्जनों वाहन जलाए गए और सैकड़ों मजदूरों की गिरफ्तारी हुई। उत्तर प्रदेश सरकार ने तुरंत न्यूनतम मजदूरी में 21 प्रतिशत की अंतरिम वृद्धि की घोषणा कर दी, लेकिन आग बुझने में समय लगा। यह घटना मात्र नोएडा की नहीं है। यह पूरे देश के लिए एक बड़े संदेश की तरह है। आज भारत मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अगर श्रमिक-प्रबंधन संबंधों को नजरअंदाज किया गया तो नोएडा जैसी स्थिति कहीं भी दोहराई जा सकती है।
 


मुख्य वजह हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बीच न्यूनतम मजदूरी का बड़ा अंतर था। हरियाणा सरकार ने हाल ही में अनुभवी मजदूरों के वेतन में करीब 35 प्रतिशत की वृद्धि कर दी। अकुशल श्रमिकों के वेतन को 14,000 रुपये से बढ़ाकर 19,000 रुपये तक कर दिया गया। नोएडा के मजदूरों को यही खबर मिली और उन्होंने मांग की कि उनका वेतन भी उसी स्तर पर हो। वर्तमान में नोएडा में कई कारखानों में अनुभवी मजदूरों को 11-13 हजार रुपये मासिक मिल रहे थे, जबकि महंगाई, किराया, राशन, शिक्षा और स्वास्थ्य खर्च ने आसमान छू लिया है। साथ ही लंबे काम के घंटे, ओवरटाइम का सिंगल रेट, वेतन स्लिप न मिलना और यौन उत्पीड़न समिति जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ने आक्रोश को भड़काया।



सोशल मीडिया पर ‘हरियाणा मॉडल’ की खबरें तेजी से फैलीं। कुछ बाहरी तत्वों ने भी इसे भड़काने की कोशिश की, लेकिन मूल समस्या आर्थिक थी। तीन-चार दिन के शांत प्रदर्शन के बाद 13 अप्रैल को हिंसा भड़क गई। पुलिस ने न्यूनतम बल प्रयोग किया, लेकिन स्थिति बिगड़ चुकी थी। सरकार ने बाद में 1 अप्रैल से लागू होने वाली वेतन वृद्धि की घोषणा की, फिर भी कई मजदूर संतुष्ट नहीं हुए।


गौरतलब है कि यह अशांति अचानक नहीं आई है। पिछले कुछ वर्षों में देश भर में श्रमिकों के बीच असंतोष बढ़ा है। कारण कई हैं। महंगाई और वास्तविक आय में कमी: खाने-पीने, आवास और परिवहन का खर्च तेजी से बढ़ा है, लेकिन वेतन वृद्धि धीमी रही। विशेषकर अनुबंधित और ठेकेदार मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित रहे। श्रम कानूनों का अधूरा कार्यान्वयन: चार नए श्रम संहिताओं का उद्देश्य सुविधा देना था, लेकिन कई राज्यों में उन्हें पूरी तरह लागू नहीं किया गया। न्यूनतम मजदूरी की समीक्षा समय पर नहीं होती। प्रबंधन की उदासीनता: कई कारखाने एमएसएमई क्षेत्र के हैं। मालिक लागत बचाने के चक्कर में वेतन, बोनस और सुरक्षा पर ध्यान नहीं देते। संवाद की कमी भी रहती है। जब हरियाणा में वेतन बढ़ा, तो नोएडा के मालिकों ने इसे ‘स्थानीय मुद्दा’ मानकर नजरअंदाज कर दिया। प्रवासी मजदूरों की स्थिति: नोएडा जैसे क्षेत्रों में ज्यादातर मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों और पूर्वी राज्यों से आते हैं। वे परिवार को पैसा भेजने के लिए कम वेतन पर भी काम करते हैं, लेकिन महंगाई ने उनका सब्र तोड़ दिया। सोशल मीडिया और सूचना का प्रसार ऐसा होने लगा कि एक जिले की खबर दूसरे जिले में तुरंत पहुंचने लगी। जिस कारण तुलना आसान हो गई है।
इसी तरह की घटनाएं पहले गुरुग्राम, चेन्नई, कोयंबटूर और अहमदाबाद में भी देखी गई हैं। इसलिए नोएडा की घटना कोई अलग घटना नहीं है।



सवाल उठता है कि क्या दोष किसी एक पक्ष का है? उल्लेखनीय है कि कई फैक्टरियां लाभ कमा रही हैं, लेकिन मजदूरों को न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं दे पा रही। संवाद की जगह दमन का रवैया अपनाया जाता है। वहीं सरकार की बात करें तो  उनके द्वारा न्यूनतम मजदूरी की समीक्षा में देरी करना। पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय की कमी। श्रम विभाग की कमजोर निगरानी, आदि जैसे कई कारण हैं जो सरकार को भी सवालों के घेरे में लाते हैं। वहीं मजदूरों की बात की जाए तो हिंसा कभी जायज नहीं होती। वाहनों में आग लगाना, पथराव और संपत्ति तोड़फोड़ से उनकी अपनी मांगें कमजोर होती हैं। ऐसे में कुछ बाहरी उकसावे वाले तत्व इन सब का फायदा उठा लेते हैं। कई जगह यूनियनें राजनीतिक रंग ले लेती हैं और संवाद की बजाय आंदोलन को बढ़ावा देती हैं। वास्तव में दोष ‘व्यवस्था’ का है, जिसमें त्रिपक्षीय संवाद (सरकार-प्रबंधन-श्रमिक) कमजोर हो गया है।


नोएडा से सबक लेकर देश भर के कारखाना मालिकों को तुरंत कुछ कदम उठाने चाहिए। नियमित वेतन समीक्षा: हर साल महंगाई के आधार पर वेतन बढ़ोतरी का फॉर्मूला तय करें। न्यूनतम मजदूरी से ऊपर का। ‘लिविंग वेज’ को अपनाएं। संवाद स्थापित करें: ग्रेविएंस कमेटी, वर्कर्स वेलफेयर कमेटी बनाएं। मासिक बैठकें रखें। कानूनों का पूर्ण पालन: ओवरटाइम, पीएफ, ईएसआई, बोनस, छुट्टियां जैसे सभी नियमों का पालन करें। वेतन समय पर और स्लिप के साथ दें। कौशल विकास: मजदूरों को ट्रेनिंग दें ताकि वे ज्यादा उत्पादक बनें और बेहतर वेतन का हकदार हों। सुरक्षा और सम्मान: काम का माहौल सुरक्षित और सम्मानजनक बनाएं। यौन उत्पीड़न समिति अनिवार्य रूप से सक्रिय रखें। सरकार से समन्वय: राज्य और केंद्र सरकार के साथ मिलकर लंबी अवधि की मजदूरी नीति बनाएं।

नोएडा की घटना भारत की औद्योगिक क्रांति के बीच एक लाल बत्ती है। अगर हम ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को साकार करना चाहते हैं, तो मजदूरों को साझेदार मानना होगा, न कि सिर्फ लागत का हिस्सा। हिंसा से कोई समस्या हल नहीं होती, लेकिन जड़ों में उपेक्षा भी घातक है। सरकार को श्रम कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना चाहिए, प्रबंधन को मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और मजदूरों को शांतिपूर्ण संवाद का रास्ता चुनना चाहिए। तभी औद्योगिक शांति बनी रहेगी और विकास सतत होगा। नोएडा ने चेतावनी दी है, समय रहते इसे गंभीरता से लें, वरना यह आग देश के किसी भी कोने में भड़क सकती है। 
*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

कैसे सुधरे भारतीय पुलिस स्टेशनों की दयनीय स्थिति?

अक्सर हम फ़िल्मों और वेब सीरीज में यह देखते हैं कि किस तरह भारत की पुलिस को बुनियादी सुविधाओं और लाचार पुरानी व्यवस्थाओं के चलते अक्सर कोर्ट और मीडिया का शिकार बनना पड़ता है। जबकि वास्तविक स्थिति सभी को पता है कि पुलिस वाले भी आख़िर इंसान ही होते हैं। यदि पुलिस से उम्मीद की जाए कि वह क़ानून व्यवस्था बनाए रखे तो क्या पुलिस व पुलिस थानों में बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखना सरकार की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए? इस बात को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि फ़िल्में व टीवी शो समाज का आईना होते हैं। इनमें दिखाए जाने वाली पुलिस की लाचारी वास्तविकता पर ही आधारित होती है। आज जब सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘मॉडर्न पोलिसिंग’ का नारा लगाती है, तब भी देश के अधिकांश पुलिस स्टेशन उसी औपनिवेशिक युग की इमारतों में कैद हैं। बुनियादी सुविधाओं की कमी, जर्जर इंफ्रास्ट्रक्चर और पुरानी व्यवस्था न केवल पुलिस कर्मियों के काम को बाधित कर रही है, बल्कि आम जनता के लिए भी ये स्टेशन आतंक का प्रतीक बने हुए हैं। 2025 के इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के अनुसार, 83 प्रतिशत पुलिस स्टेशनों में कम से कम एक सीसीटीवी कैमरा जरूर लगा है, लेकिन ऐसे कई मामले हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट के मानकों का पालन असंगत है। 78 प्रतिशत स्टेशनों में महिला हेल्पडेस्क बनी हैं, फिर भी महिला पुलिसकर्मियों का राष्ट्रीय औसत मात्र 12 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्टेशनों की संख्या 2017-22 के बीच 7 प्रतिशत घट गई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में 4 प्रतिशत बढ़ी। 


जनवरी 2023 के केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 17,849 पुलिस स्टेशन हैं, जिनमें से 58 में वाहन नहीं, 680 में लैंडलाइन फोन नहीं और 282 में मोबाइल फोन तक नहीं हैं। कई स्टेशनों में बिजली, इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता की भारी कमी है। बीपीआरडी (ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट) ने आधुनिक पुलिस स्टेशन भवनों के लिए मानक तय किए हैं, जिनमें आगंतुकों के लिए प्रतीक्षा कक्ष, शौचालय, जांच कक्ष और रिकॉर्ड रूम शामिल हैं, लेकिन ज्यादातर राज्यों में इनका पालन नाममात्र का है। असिस्टेंस टू स्टेट्स फॉर मॉडर्नाइजेशन ऑफ पुलिस (एएसयूएमपी) योजना के तहत केंद्र ने 2025-26 में 540 करोड़ रुपये आवंटित किए, लेकिन इसमें भी उपयोगिता कम पाई गई। 

सवाल उठता है कि यह जर्जर इंफ्रास्ट्रक्चर पुलिस कार्य को किस तरह बाधित कर रहा है? स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) को 24 घंटे ड्यूटी पर रहना पड़ता है, लेकिन ज़्यादातर थानों में न तो आराम कक्ष ठीक हैं, न बैरक स्वच्छ। मैनुअल पेपरवर्क, पुराने रिकॉर्ड और भीड़भाड़ के कारण जांच में देरी होती है। जनता शिकायत दर्ज कराने आती है तो प्रतीक्षा कक्ष न होने से खुले में खड़ी रहती है। महिला आगंतुकों के लिए अलग शौचालय की कमी आम है। परिणामस्वरूप, पुलिस पर भरोसा घटता है और अपराधी लाभ उठाते हैं।


सबसे दर्दनाक स्थिति मालखाने (पुलिस रिकॉर्ड रूम) की है। यहां सबूत, हथियार, नशीले पदार्थ और संपत्ति रखी जाती है, लेकिन ज्यादातर स्टेशनों में यह कमरा गंदा, भीड़भाड़ वाला और असुरक्षित होता है। मैनुअल रजिस्टर, चूहों-कीड़ों का आतंक और अपर्याप्त जगह के कारण सबूत बिगड़ जाते हैं। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 2024 में चूहों द्वारा सबूत नष्ट होने पर डीजीपी को आदेश दिया था कि मालखाने की नियमित देखभाल हो। दिल्ली के कई स्टेशनों में एक मालखाना अधिकारी के पास हजारों एग्जिबिट्स होते हैं, लेकिन स्टाफ की कमी से घंटों खोजबीन करनी पड़ती है। इससे सबूतों में छेड़छाड़, गुम होने या अदालत में अस्वीकार होने की घटनाएँ आम हैं। कुछ राज्यों में ई-मालखाना शुरू हुआ है, जहां बारकोड और डिजिटल ट्रैकिंग से पारदर्शिता आई, लेकिन यह पूरे देश में लागू नहीं हुआ। 


इसी तरह, जब्त वाहनों की समस्या पर्यावरणीय आपदा बन चुकी है। देश भर के पुलिस स्टेशनों में हजारों जब्त कारें, बाइकें व अन्य छोटे बड़े वाहन सड़ रहे हैं। जो कि थानों से सटी सड़कों पर खड़े रहते हैं और यातायात बाधित करते हैं। ईंधन रिसाव, जंग, बरसाती पानी से मच्छर पनपते हैं, डेंगू-मलेरिया का खतरा बढ़ता है। आग लगने का जोखिम तो हमेशा बना ही रहता है। पंजाब सरकार ने हाल ही में आदेश दिया कि सभी जब्त वाहन शहर से बाहर स्क्रैप यार्ड में शिफ्ट किए जाएं, लेकिन अन्य राज्यों में ऐसा नहीं हुआ। 

ऐसे में सुधार कैसे हो? सबसे पहले, बीपीआरडी के मॉडल पुलिस स्टेशन मानकों को सख्ती से लागू किया जाए। हर स्टेशन में डिजिटल रिकॉर्ड रूम (ई-मालखाना), सीसीटीवी नाइट विजन, पर्याप्त शौचालय, प्रतीक्षा कक्ष और महिला हेल्पडेस्क अनिवार्य हों। नियम उल्लंघन के बाद जब्त वाहनों के लिए अलग-अलग डिस्पोजल यार्ड और ऑनलाइन नीलामी की व्यवस्था हो, ताकि 30 दिनों में उन्हें हटाया जा सके। उसी तरह अपराध में शामिल वाहनों की विस्तृत फॉरेंसिक जांच के बाद, कोर्ट के आदेश पर उन्हें भी थानों से हटाया जाए। पुलिस कर्मियों के लिए बेहतर बैरक, कैंटीन और प्रशिक्षण सुविधाएं जरूरी हों। जनता के लिए थाने ‘यूजर फ्रेंडली’ बनाने के लिए शिकायत पोर्टल, हेल्पडेस्क और कम्युनिटी पोलिसिंग को बढ़ावा दें।

गौरतलब है कि पुलिस सुधार समितियों ने इन मुद्दों पर बार-बार आवाज उठाई। 1977-81 की नेशनल पुलिस कमीशन ने बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षण और स्वायत्तता पर जोर दिया। रिबेरो, पद्मनाभैया और मलीमाथ समितियों ने भी यही सिफारिशें कीं। 2006 में प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सात ऐतिहासिक निर्देश दिए। राज्य सुरक्षा आयोग का गठन, डीजीपी की दो साल की न्यूनतम अवधि, एसपी और एसएचओ की स्थिरता, जांच और कानून-व्यवस्था का अलगाव, पुलिस स्थापना बोर्ड, शिकायत प्राधिकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग। लेकिन ज्यादातर राज्य इन्हें लागू करने में असफल रहे। थॉमस कमेटी (2008) ने राज्यों की उदासीनता पर दुख जताया। कारण स्पष्ट हैं, पुलिस राज्य विषय है, जहाँ राजनीतिक दखल, फंड का दुरुपयोग और सुधारों से सत्ता के लिए खतरा बना रहता है। मॉडल पुलिस एक्ट 2006 को भी सिर्फ कुछ राज्यों ने ही अपनाया है। 

आज जरूरत है मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की। केंद्र सरकार एएसयूएमपी फंड का पूरा उपयोग सुनिश्चित करे, अनुपालन न करने वाले राज्यों पर करवाई करे और सुप्रीम कोर्ट इसकी नियमित समीक्षा करे। पुलिस स्टेशन अगर आधुनिक और जन-अनुकूल नहीं बने, तो ‘विकसित भारत’ का सपना अधूरा रहेगा। समय की माँग है कि हम पुलिस को सेवा प्रदाता मानें, न कि सिर्फ अपराध नियंत्रक। बुनियादी सुविधाओं से शुरू कर सुधार की दिशा में कदम उठाएं, ताकि पुलिसकर्मी और जनता दोनों को न्याय मिले। 

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

नौकरियां गंवाने की चिंता और मानसिक स्वास्थ्य की पुकार


बेंगलुरु, जिसे भारत की आईटी राजधानी के नाम से भी जाना जाता है, पिछले दिनों एक ऐसी घटना से हिल गया है जो न केवल दिल दहला देने वाली है, बल्कि पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर देती है। गत 31 मार्च को कोठानूर इलाके के एक हाई-राइज अपार्टमेंट में एक युवा तकनीकी जोड़ी ने आत्महत्या कर ली। पति भानुचंद्र रेड्डी (32) और पत्नी बीबी शाजिया सिराज (31)। दोनों सॉफ्टवेयर इंजीनियर, दोनों की कमाई लाखों में, अमेरिका में काम का अनुभव, 80 लाख का सालाना पैकेज और सफलता की सारी बाहरी निशानियां। लेकिन अंदर से? नौकरी खोने का भय और बढ़ता तनाव। ठीक उसी दिन जब वैश्विक स्तर पर एआई की वजह से आईटी सेक्टर में भारी छंटनी की खबरें आ रही थीं।

भानुचंद्र अमेरिका में काम कर रहे थे। एआई टूल्स के कारण उनकी टीम में छंटनी हुई और उनकी नौकरी चली गई। भारत लौटकर वे नई नौकरी की तलाश में लगे, लेकिन असफल रहे। चिंता ने उन्हें घेर लिया। स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। अपने सुसाइड नोट में उन्होंने यही लिखा, “नौकरी की अनिश्चितता और लगातार दबाव।” पत्नी शाजिया आईबीएम में नाइट शिफ्ट कर रही थीं। सुबह 7:30 बजे घर लौटीं तो पति का कमरा अंदर से बंद था। सुरक्षा गार्ड ने दरवाजा तोड़ा तो भानुचंद्र फांसी पर लटक रहे थे। शाजिया ने 20 मिनट तक वह दृश्य देखा। फिर वे अचानक 18वें फ्लोर पर पहुंचीं और वाहन से नीचे कूद गईं।


यह घटना एआई क्रांति की उस काली साइड का प्रतीक है जो कल तक ‘भविष्य की तकनीक’ मानी जा रही थी। ठीक उसी दिन, 31 मार्च 2026 को, अमेरिकी सॉफ्टवेयर दिग्गज ओरेकल (Oracle) ने हजारों कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। कंपनी एआई डेटा सेंटर बनाने के लिए भारी निवेश कर रही है। 2026 में 500 करोड़ डॉलर से ज्यादा का कैपिटल निवेश भी किया। लेकिन इस खर्च को पूरा करने के लिए उसने लागत घटाने का फैसला किया। CNBC, ब्लूमबर्ग और बिजनेस इंसाइडर की रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 20,000-30,000 तक के कर्मचारी प्रभावित हुए हैं।

ओरेकल अकेली नहीं। 2026 में एआई की वजह से बिग टेक की छंटनी की लहर चल रही है। अमेजन ने जनवरी में 16,000 कॉर्पोरेट जॉब्स काटे। माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले साल 15,000 पद घटाए। मेटा, एटलासियन, ब्लॉक आदि सभी कंपनियां  एआई के नाम पर कर्मचारियों को ‘रिडंडेंट’ बता रहे हैं। भारत में भी आईटी सेक्टर में 2017 से अब तक 227 से ज्यादा सुसाइड केस दर्ज हुए हैं। एनसीआरबी के 2023 के आंकड़ों के अनुसार कुल 1,71,418 आत्महत्याएं हुईं, जिनमें युवा प्रोफेशनल्स (25-40 साल) की संख्या सबसे ज्यादा हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे जैसे हर शहर में एआई छंटनी का डर युवाओं को घेर रहा है।

समस्या सिर्फ नौकरी चले जाने की नहीं। समस्या है उस चिंता की भी है, जो एआई के नाम पर पैदा हो रही है। एआई टूल्स कोडिंग, डेटा एनालिसिस, यहां तक कि सॉफ्टवेयर डिजाइन में इंसानों से बेहतर साबित हो रहे हैं। कंपनियां सोच रही हैं कि,’कम लोगों से ज्यादा काम’। लेकिन कर्मचारी? उनके लिए यह जीवन-मरण का सवाल बन गया है। ईएमआई, लोन, परिवार की जिम्मेदारी, सब कुछ एक नौकरी पर टिका है। जब नौकरी चली जाती है, तो चिंता डिप्रेशन में बदल जाती है। और समाज? हम अभी भी इसे ‘व्यक्तिगत कमजोरी’ मानते हैं।

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे कहता है कि 80% लोग मानसिक बीमारी का इलाज नहीं लेते। वजह, ‘कलंक’ और सुविधाओं की कमी। भारत में प्रति लाख जनसंख्या पर सिर्फ 0.75 साइकिएट्रिस्ट हैं। जिला स्तर पर मनोवैज्ञानिक क्लिनिक नाममात्र के। हमें एक मजबूत ‘साइकोलॉजिकल इकोसिस्टम’ की जरूरत है। ठीक वैसे ही जैसे सामान्य अस्पतालों का नेटवर्क है। हर जिले में फुल-टाइम मेंटल हेल्थ सेंटर, फ्री या सस्ती ओपीडी, टेली-मेंटल हेल्थ, आयुष्मान भारत में मानसिक स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य। कॉर्पोरेट कंपनियों को कर्मचारी सहायता कार्यक्रम (ईएपी) अनिवार्य करने होंगे लेआउफ के समय न सिर्फ आउटप्लेसमेंट, बल्कि मानसिक सहायता भी देनी चाहिए।

लेकिन इलाज सिर्फ दवाओं और काउंसलिंग तक सीमित नहीं रहना चाहिए। भारतीय संस्कृति में सदियों से ध्यान, योग और भगवद्गीता जैसे ग्रंथ चिंता पर विजय पाने का रास्ता बताते हैं। जब एआई छंटनी का दबाव बढ़े, तो आध्यात्मिक मार्गदर्शन मन को स्थिरता दे सकता है। भगवद्गीता में कर्मयोग की शिक्षा है—कर्म करो, लेकिन फल की चिंता मत करो। “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”। यह सिखाता है कि नौकरी चली जाए तो भी आत्मसम्मान और जीवन का अर्थ खत्म नहीं होता।

ध्यान और योग एंग्जायटी को कम करने में वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हैं। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में अब ‘माइंडफुलनेस’ प्रोग्राम चल रहे हैं। कई कंपनियां कर्मचारियों के लिए योग सेशन्स और आध्यात्मिक सत्र आयोजित कर रही हैं। आध्यात्मिक गुरुओं और काउंसलर्स का कहना है कि जब मन अशांत हो, तो प्रार्थना, सत्संग या गीता पाठ से आंतरिक शक्ति जागृत होती है। यह चिंता को ‘स्वीकार’ करने की क्षमता देता है, कि बदलाव जीवन का हिस्सा है, लेकिन हम उससे ऊपर उठ सकते हैं। ध्यान रखें, आध्यात्मिक मार्गदर्शन पेशेवर मनोचिकित्सा का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक है। जब डॉक्टर की दवा के साथ ध्यान और गीता का ज्ञान जुड़ जाए, तो रिजल्ट बेहतर होता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि आध्यात्मिक प्रैक्टिस डिप्रेशन के मरीजों में रिकवरी रेट बढ़ाती है।

सरकार, कॉर्पोरेट और समाज को मिलकर काम करना होगा। स्कूल-कॉलेज में मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ आध्यात्मिक शिक्षा भी शामिल करें। मीडिया आत्महत्या की खबरों को संवेदनशील तरीके से कवर करे। परिवारों में खुली बातचीत का माहौल बने। बेंगलुरु की यह त्रासदी और ओरेकल जैसी कंपनियों की छंटनी हमें चेतावनी दे रही है। एआई भविष्य है, लेकिन बिना मानवता के नहीं। जब हम मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक बीमारी की तरह देखेंगे, जब अस्पतालों की तरह साइकोलॉजिकल सेंटर्स हर जगह होंगे और जब आध्यात्मिक मार्गदर्शन हमें अंदर से मजबूत करेगा, तब ही हम इस दबाव को पार कर पाएंगे।

भानुचंद्र और शाजिया सिर्फ एक जोड़ी नहीं थे। वे हजारों उन युवा आईटी प्रोफेशनल्स का प्रतिनिधित्व करते हैं जो आज भी चुपचाप एआई छंटनी की चिंता में जूझ रहे हैं। समय आ गया है कि हम बदलें। शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को एक साथ देखें। तभी एक स्वस्थ, सशक्त और संतुलित भारत बनेगा। 


*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।