भारतीय वाणिज्यिक उड्डयन क्षेत्र (कमर्शियल फ्लाइट्स) एक बार फिर सुरक्षा की गंभीर चुनौती से जूझ रहा है। मात्र 48 घंटे के अंदर दो कमर्शियल पायलटों की अचानक मौत ने पूरे उद्योग को झकझोर दिया है। एयरलाइन पायलट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ALPA इंडिया) ने इस घटना को पायलट थकान (फैटिग) से जोड़ते हुए डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (डीजीसीए) को पत्र लिखा है। एसोसिएशन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (एफ़डीटीएल) नियमों के संशोधित संस्करण को लागू करने में हो रही देरी और एयरलाइंस को बार-बार दी जा रही छूटें पायलटों पर भारी बोझ डाल रही हैं, जिससे उड़ान सुरक्षा की नींव हिल रही है। यह मुद्दा केवल दो मौतों तक सीमित नहीं है, यह पूरे भारतीय एविएशन इकोसिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।
29 अप्रैल 2026 को एयर इंडिया के कैप्टन तरनदीप सिंह बाली में शेड्यूल्ड रेस्ट के दौरान दिल का दौरा पड़ने से चल बसे। एक दिन बाद अकासा एयर के एक पायलट ने भी हार्ट अटैक का शिकार होकर जान गंवाई। दोनों मौतें अलग-अलग एयरलाइंस और अलग-अलग जगहों पर हुईं, लेकिन दोनों में थकान का साया साफ नजर आता है। एएलपीए इंडिया ने डीजीसीए को लिखे अपने पत्र में इन घटनाओं को एफ़डीटीएल नियमों की देरी से सीधे जोड़ा है। एसोसिएशन का कहना है कि पायलटों की ड्यूटी घंटों को लेकर जो नई गाइडलाइंस 2024 में जारी की गई थीं, जिनमें साप्ताहिक आराम को 36 घंटे से बढ़ाकर 48 घंटे करना, मिडनाइट लैंडिंग की संख्या सीमित करना और थकान रिपोर्टिंग को अनिवार्य बनाना शामिल था। वे अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हो पाई हैं। इसके बजाय एयरलाइंस को बार-बार छूट दी जा रही है, खासकर इंडिगो जैसी बड़ी कंपनियों को, जहां ऑपरेशनल दबाव के नाम पर नियमों को ढीला किया जा रहा है।
भारतीय एविएशन का विकास वाकई सराहनीय है। पिछले कुछ वर्षों में यात्री यातायात में दोहरे अंकों की वृद्धि हुई है। एयरपोर्ट्स का विस्तार हो रहा है, नई एयरलाइंस आ रही हैं और कनेक्टिविटी बढ़ रही है। लेकिन विकास की इस रफ्तार के साथ पायलटों की उपलब्धता, उनके स्वास्थ्य प्रबंधन और थकान नियंत्रण की व्यवस्था नहीं बढ़ पाई है। 2024 के नए एफ़डीटीएल नियम ICAO (इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन) के मानकों के अनुरूप थे, जो वैश्विक स्तर पर पायलट थकान को गंभीरता से लेते हैं। इन नियमों का मकसद था कि पायलट 100 प्रतिशत अलर्ट रहें, क्योंकि एक छोटी सी गलती भी सैकड़ों यात्रियों की जान ले सकती है। दुर्भाग्य से, डीजीसीए ने इन नियमों को फुल-स्केल लागू करने में देरी की और एयरलाइंस के दबाव में छूटें दीं। एएलपीए इंडिया का आरोप है कि ये छूटें सुरक्षा मानकों से समझौता कर रही हैं।
थकान केवल शारीरिक नहीं, मानसिक भी होती है। लंबी ड्यूटी, बार-बार टाइम-जोन बदलना, अनियमित आराम, परिवार से दूरी, ये सब पायलटों पर दबाव बढ़ाते हैं। अध्ययनों के अनुसार, 12-14 घंटे की लगातार ड्यूटी के बाद पायलट की निर्णय लेने की क्षमता शराब के नशे वाले व्यक्ति जितनी कम हो जाती है। भारत में पहले भी कई घटनाएं हुई हैं जहां पायलट कोकपिट में बेहोश हो गए या स्वास्थ्य समस्या आई। 2025 में इंडिगो के फ्लाइट कैंसिलेशन के दौरान भी पायलट थकान की चर्चा हुई थी। अब 2026 में दो मौतें इस समस्या को और गंभीर बना रही हैं। एएलपीए इंडिया ने डीजीसीए से मांग की है कि एफ़डीटीएल छूटों को तुरंत बंद किया जाए, एक समयबद्ध रोडमैप बनाया जाए और सभी एयरलाइंस पर एक समान नियम लागू हों।
यह मुद्दा केवल पायलट यूनियन की शिकायत का नहीं है। यह यात्रियों, एयरलाइंस और सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर डीजीसीए अब भी देरी करता रहा तो भविष्य में बड़े हादसे का खतरा बढ़ जाएगा। याद रखें, एयर इंडिया एक्सप्रेस या अन्य एयरलाइंस के पायलट पहले भी थकान के शिकार हो चुके हैं। 2025 में इंडिगो और एयर इंडिया के पायलट कोकपिट में गिरने की घटनाएं सामने आई थीं। हर बार यही बहाना दिया जाता है कि पायलट कमी है, ट्रेनिंग स्लॉट कम हैं या ऑपरेशनल दबाव है। लेकिन क्या ये बहाने सुरक्षा से ऊपर हो सकते हैं? एयरलाइंस को चाहिए कि वे अधिक पायलटों की भर्ती करें, बेहतर शेड्यूलिंग करें और फेटिग रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम (FRMS) को सख्ती से लागू करें। ऐसे में डीजीसीए को भी अपनी निगरानी बढ़ानी होगी।
वैश्विक उदाहरण देखें तो यूरोप और अमेरिका में एफ़डीटीएल के नियम बहुत सख्त हैं। वहां पायलटों को पर्याप्त आराम मिलता है और थकान रिपोर्टिंग रियल-टाइम होती है। भारत, जो विश्व का तीसरा सबसे बड़ा एविएशन मार्केट बनने जा रहा है, वहां ऐसे लापरवाह रवैये की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। एएलपीए इंडिया का पत्र सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक गंभीर विषय है जिस पर तुरंत करवाई होनी चाहिए। डीजीसीए को चाहिए कि वह इस पत्र पर तुरंत संज्ञान ले, सभी एयरलाइंस से फीडबैक और सुझाव ले और एफ़डीटीएल के नियमों को 100 प्रतिशत लागू करने की समयसीमा घोषित करे। साथ ही, पायलटों के स्वास्थ्य जांच को अनिवार्य और नियमित बनाया जाए।
गौरतलब है कि इस समस्या का समाधान केवल नियम बनाने से नहीं होगा। एयरलाइंस को अपनी संस्कृति बदलनी होगी। जहां लाभ के बजाय सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए। सरकार को भी एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट पर निवेश बढ़ाना होगा। पायलट ट्रेनिंग स्कूलों को बढ़ावा दें, विदेशी पायलटों पर निर्भरता कम करें और घरेलू टैलेंट को प्रोत्साहित करें।
ऐसा कहना ग़लत नहीं होगा कि दो पायलटों की मौत एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता का संकेत है। अगर हम आज चुप रहे तो कल का हादसा पूरे देश को महंगा पड़ेगा। एएलपीए इंडिया ने जो आवाज उठाई है, उसे डीजीसीए अविलंब को सुनना चाहिए। उड़ानें सुरक्षित हों, तभी विकास सार्थक होगा। डीजीसीए और सरकार को अब जागना होगा, जहाँ देरी की कोई गुंजाइश नहीं है। पायलट थकान रोकना सिर्फ एक नियम नहीं, बल्कि सैकड़ों जिंदगियों को बचाने का वादा है।

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