शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2025

ईवीएम एक बार फिर विवादों में

अमरीका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने पिछले दिनों एक बयान देकर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर फिर से सवाल खड़े कर दिये हैं। उन्होंने अपने बयान में कहा कि “चुनावों के लिए सबसे सुरक्षित माध्यम बैलट पेपर ही है।” राष्ट्रपति ट्रम्प ने टेक्नोलॉजी दिग्गज एलोन मस्क के साथ हुई बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि मस्क का भी यही मानना है कि “कंप्यूटर वोटिंग के लिए नहीं है।” ट्रंप के बैलेट पेपर के समर्थन के बयान पर भारत में लगभग सभी विपक्षी दलों ने खूब शोर मचाना शुरू कर दिया। कांग्रेस लंबे समय से चुनाव में बैलेट पेपर की वापसी की मांग कर रही है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल लगातार ईवीएम से चुनाव में हेरफेर का आरोप लगाते रहे हैं। ऐसे में अमरीका जैसे देश के राष्ट्रपति के बयान ने तो आग में घी डालने का काम किया है।


जब भी कभी देश में चुनाव होते हैं तो ईवीएम फिर से चर्चा में ज़रूर आती है। चुनावों के बाद सत्ता परिवर्तन होगा या नहीं होगा यह तो नतीजों के बाद ही पता चलता है। परंतु बीते कुछ चुनावों में यह देखा गया है कि इलाक़े की जनता की नाराज़गी के बावजूद वहाँ के मौजूदा विधायक या सांसद ने पिछले चुनावों के मुक़ाबले काफ़ी अधिक संख्या से जीत हासिल की। ऐसे में चुनावी मशीनरी पर सवाल खड़े होना ज़ाहिर सी बात है। जो भी नेता हारता है वो ईवीएम या चुनावी मशीनरी को दोषी ठहराता है।     

ऐसा नहीं है कि किसी एक दल के नेता ही ईवीएम की गड़बड़ी या उससे छेड़-छाड़ का आरोप लगाते आए हैं। इस बात के अनेकों उदाहरण हैं जहां हर प्रमुख दलों के नेताओं ने कई चुनावों के बाद ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप लगाया है। चुनाव आयोग की बात करें तो वो इन आरोपों का शुरू से ही खंडन कर रहा है। आयोग के अनुसार ईवीएम में गड़बड़ी की कोई गुंजाइश ही नहीं है। 1998 में दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश के विधान सभा की कुछ सीटों पर ईवीएम का इस्तेमाल हुआ था। परंतु 2004 के आम चुनावों में पहली बार हर संसदीय क्षेत्र में ईवीएम का पूरी तरह से इस्तेमाल हुआ। 2009 के चुनावी नतीजों के बाद इसमें गड़बड़ी का आरोप भाजपा द्वारा लगा। ग़ौरतलब है कि दुनिया के 31 देशों में ईवीएम का इस्तेमाल हुआ परंतु ख़ास बात यह है कि अधिकतर देशों ने इसमें गड़बड़ी कि शिकायत के बाद वापस बैलट पेपर के ज़रिये ही चुनाव किये जाने लगे।


किसी भी समस्या की शिकायत करने से उसका हल नहीं खोजा जाता। परंतु जब शिकायत के साथ समाधान का सुझाव भी दिया जाए तो उस पर गौर करना चाहिए। 2023 में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने विधान सभा चुनावों में ईवीएम की गड़बड़ी पर आरोप लगाए और उन्हें रोकने के लिए सुझाव भी दिया। सिंह ने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश में ईवीएम के ट्रायल के दौरान इसमें गड़बड़ी पायी गई। उन्होंने केंद्रीय चुनाव आयोग को सुझाव दिया कि यदि ईवीएम से निकलने वाली VVPAT की पर्ची को मतदाता को दे दिया जाए और इन पर्चियों को अलग से रखी मतपेटी में डाल दिया जाए। तो न सिर्फ़ मतदाता को इस बात की संतुष्टि हो जाएगी कि उसके द्वार चुने गये उम्मीदवार को ही उसका वोट मिला। मशीनों से किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं हुई। इसके साथ ही मतगणना के पहले ऐसी किसी भी दस पेटियों के वोट गिन लिए जाएँ और बाद में उनका मिलान काउंटिंग यूनिट के साथ कर लिया जाए। यदि नतीजे मेल खाते हैं तो काउंटिंग यूनिट के नतीजे को घोषित कर दिया जाए। दिग्विजय सिंह के इस सुझाव पर सोशल मीडिया पर हज़ारों प्रतिक्रियाएँ आई और अधिकतर लोगों ने इस सुझाव को व्यावहारिक माना है।


जब भी कभी कोई प्रतियोगिता होती है तो उसका संचालन करने वाले शक के घेरे में न आएँ इसलिए उस प्रतियोगिता के हर कृत्य को सार्वजनिक रूप से किया जाता है। आयोजक इस बात पर ख़ास ध्यान देते हैं कि उन पर पक्षपात का आरोप न लगे। इसीलिए जब भी कभी आयोजकों को कोई सुझाव दिये जाते हैं तो यदि वे उन्हें सही लगें तो उसे स्वीकार लेते हैं। ऐसे में उन पर पक्षपात का आरोप नहीं लगता। ठीक उसी तरह एक स्वस्थ लोकतंत्र में होने वाली सबसे बड़ी प्रतियोगिता चुनाव हैं। उसके आयोजक यानी चुनाव आयोग को उन सभी सुझावों को खुले दिमाग़ से और निष्पक्षता से लेना चाहिए।  चुनाव आयोग एक संविधानिक संस्था है, इसे किसी भी दल या सरकार के प्रति पक्षपात होता दिखाई नहीं देना चाहिए। यदि चुनाव आयोग ऐसे सुझावों को जनहित में लेती है तो मतदाताओं के बीच भी एक सही संदेश जाएगा, कि चाहे ईवीएम पर गड़बड़ियों के आरोप लगें पर चुनाव आयोग किसी भी दल के साथ पक्षपात नहीं करता।
 
जहां तक इवीएम पर एक बार फिर से खड़े हुए विवाद की बात है तो सभी राजनैतिक दलों को इस बात को गंभीरता से लेना चाहिए। सभी राजनैतिक दलों को एकजुट हो कर अमरीकी राष्ट्रपति के ताज़ा बयान के चलते चुनाव आयोग के पास एक प्रस्ताव लेकर जाना चाहिए और आगामी विधान सभा चुनावों में ईवीएम के बजाय बैलट पेपर से चुनाव की माँग करनी चाहिए। यदि यह संभव न हो और चुनाव आयोग को ईवीएम की गुणवत्ता और उसकी कार्य पद्धति पर पूरा विश्वास है तो उसे कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह के सुझाव पर एक प्रयोग करा लेना चाहिए। ऐसा प्रयोग करने से दूध का दूध और पानी का पानी सामने आ जाएगा। इतना ही नहीं भारत जैसे मज़बूत लोकतंत्र को और मज़बूती भी मिलेगी। 

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2025

मांसाहार खाने वाले कृपया ध्यान दें !


आप सभी के भी ऐसे दोस्त व रिश्तेदार होते होंगे जो किसी शादी या नए साल के दावत में चिकन-मटन न मिलने पर ऐसा कहते हों, ‘क्या घास-कूड़ा खिला दिया।’ औसत दर्ज़े के लोग बटर चिकन, कढ़ाई चिकन, बोनलैस चिकन, चिकन कोफता, मुर्गा दो प्याजा या मटन की तमाम किस्में खाते हैं। वरना भुना मुर्गा लार टपका कर निगल जाते हैं। जो जरा ज्यादा फैशनेबल हैं उनको सुबह नाश्ते में सासेज, सलामी आदि खाने की आदत पड़ जाती है, लंच में चिकन, लैम्ब सूप या प्रॉन (समुद्री जानवर) वगैरह। डिनर में लॉबस्टर, फिश या कोई और चीनी या समुद्री खाना।

भारत के सभी महानगरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों में यह देखकर आश्चर्य होता है कि किस ललचाई नजरों से लोग मांसाहार के लिए आतुर रहते हैं। जिनके पास साधन हैं वो यह सारी वस्तुएं आयातित मांस से पकाते हैं या पांच सितारा होटलों में ही खाते हैं। वरना दिल्ली के कनॉट पैलेस व अन्य इलाक़ों में कई रेस्टोरेंट व ढाबे हर शहर और राजमार्ग पर बिखरे पड़े हैं जहां सलाखों में मुर्गों की मसाला लगी टांगे टंगी रहती हैं।


पर अब जरा दूसरी तरफ देखिए अगर आप देश के बहुत ही संपन्न लोगों की संगति में बैठे हों तो आप पाएंगे कि बहुत से बड़े लोग मांसाहार छोड़ते जा रहे हैं। और तो और अमरीका और यूरोप के देश जहां दस वर्ष पहले तक शाकाहार का नाम तक नहीं जानते थे। लेकिन आज काफी तादाद में मांसाहार पूरी तरह छोड़ चुके हैं। जानते हैं क्यों? पहली बात तो यह कि मानव शरीर शाकाहार के लिए बना है मांसाहार के लिए नहीं। यह बात हम अपनी तुलना शाकाहारी और मांसाहारी पशुओं से करने पर समझ सकते हैं। शेर, कुत्ता, घडि़याल व भेडि़या मांसाहारी हैं। गाय, बकरी, बंदर व खरगोश शाकाहारी हैं। मांसाहारी पशुओं को कुदरत ने दोनों जबड़ों में तेज नुकीले कीलनुमा दांत और खतरनाक पंजे दिए हैं। जिनसे ये शिकार करके उसमें से मांस नोच कर खा सकें। पर गाय और बंदर की ही तरह मानव को कुदरत ने ऐसे दांतों और पंजों से वंचित रखा है, क्यों ?

मांसाहारी पशु जैसे कुत्ता जीभ से पसीना टपकाता है। इसलिए हाँफता रहता है। शाकाहारी पशुओं और मानव के बदन से पसीना टपकता है। मांसाहारी पशुओं की आँतें काफी छोटी होती है ताकि मांस जल्दी ही पाखाने के रास्ते बाहर निकल जाए जबकि शाकाहारी जानवरों और मानव की आँतें अनुपात में तीन गुनी बड़ी और ज्यादा घुमावदार होती है ताकि अन्न, फल, सब्जियों का रसा अच्छी तरह सोख ले। यदि आप मांसाहारी है तो आपने नोट किया होगा कि फ्रिज के निचले खाने में इतनी ठंडक होने के बावजूद मांस कुछ ही घंटों में सड़ने लगता है। फिर मानव शरीर की गर्मी में मांस के आंत में अटक-अटक चलने में इसकी क्या गति होती होगी, कभी सोचा आपने ? आपने कभी सड़क पर कुचला कुत्ता देखा है कितनी सी देर में उसमें से बदबू आने लगती है तो क्या हमारी आंत में पड़ा मांस तरो-ताजा बना रहता है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि मांसाहारी पशुओं के आमाशय में जो तेजाब रिसता है वह शाकाहारी पशुओं और मानव के आमाशय में रिसने वाले तेजाब से बीस गुना ज्यादा तीखा होता है, ताकि मांस जल्दी गला सके। ऐसे तेजाब के अभाव में हमारे आमाशय में पड़े मांस की क्या हालत होती होगी ?

भारत जैसे देश में, बहुसंख्यक आबादी किसी न किसी रोग से ग्रस्त है। हमारे शरीर में तरह-तरह की बीमारियां पल रही हैं, तो जो जानवर काटे जा रहे हैं उनके वातावरण, भोजन और रख-रखाव में जो नर्क से बदतर जिंदगी होती है, उससे कैसा मांस आप तक पहुंचता है ? फिर आप तो जानते हैं कि भारत में कितना भ्रष्टाचार है। जिन भी इंस्पेक्टरों की ड्यूटी कसाईखानों में लगी होती है उनसे क्या आप राजा हरिशचन्द्र होने की उम्मीद कर सकते हैं ? या वक्त के साथ-साथ चलने वाला होशियार आदमी। मतलब ये हुआ जो हाकिम यह देखने के लिए तैनात किए जाते हैं कि भयानक बीमारियों से घिरे हुए घायल या गंदे पशु मांस के लिए न काटे जाएं वो निरीक्षक ही अगर आंख बंद किए हुए हों तो आपकी क्या हालत हो रही है, आपको क्या पता ?

कई बरस पहले दिल्ली के पांच सितारा होटल में पोषण विशेषज्ञों के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था। वहां दोपहर के भोजन के समय शोर मच गया। दुनिया भर से आए पोषण विशेषज्ञ डाक्टरों ने कहा कि लंच में जो मुर्गे परोसे गए वे सड़े हुए हैं। होटल के महाप्रबंधक तक खबर पहुंची। फौरन दौड़े-दोड़े बैंक्वट हॉल में आए। आयोजकों से माफी मांगी। सरकारी नौकरी चले जाने का हवाला देकर खुशामद की। समझौता हुआ कि लंच का जो बीस-तीस हजार रूपया का बिल बना था वो माफ हो जाएगा। तभी होटल वालों को पता चला कि वहां डाक्टरों की भीड़ में एक संवाददाता भी मौजूद था। घबड़ाए हुए वे  उस पत्रकार के पास आए और गिड़गिड़ा कर कहने लगे कि ये खबर मत छापिएगा। लालच देने लगे कि आपके शादी में पचास फीसदी बिल माफ कर देंगे। जब उसी पत्रकार ने इस पर तहकीकात की तो पता चला कि आमतौर पर कमीशन के चक्कर में सबसे सड़े, बासी और बेकार मुर्गे वहां और कई बड़े होटलों में खरीदे जाते हैं। कुछ समय बाद खबर छपी। ‘पोषण विशेषज्ञों को पाँच सितारा होटल ने सड़े मुर्गे परोसे।’ यह दिल्ली के एक प्रतिष्ठित पांच सितारा होटल की कहानी है तो बाकी की बात आप खुद ही समझ लीजिए। 

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

‘इ-कॉमर्स’ कंपनियों का नया खेल


आज के युग में हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां सुविधा ही मुख्य मंत्र है। जहां गति ही सर्वोच्च है। इस नये युग में ‘क्विककॉमर्स’ या ‘इ-कॉमर्स’ की सफलता को इससे बेहतर नहीं समझा जा सकता। आज ‘इ-कॉमर्स’ ने हमारे खरीदारी करने के तरीके में क्रांति ला दी है। अब कुछ ‘इ-कॉमर्स’ वाली कंपनियां एक कदम आगे छलांग लगाने जा रहीं हैं जिससे कई मौजूदा और स्थापित उद्योगों को भारी चोट पहुँच सकती है। ग्राहकों को लुभाने की दृष्टि से कुछ ‘इ-कॉमर्स’ कंपनियाँ अनुचित व्यापार के तरीक़ों से मौजूदा उद्योगों के ग्राहकों को छीनने का प्रयास करने जा रही है। इस क्रम में फ़िलहाल कुछ खाना डिलीवर करने वाली ‘इ-कॉमर्स’ कंपनियों की सूची है जो अपने मौजूदा रेस्टोरेंट मालिकों के साथ सीधी टक्कर लेने को तैयार है।

कल्पना कीजिए कि आप अपना मनचाहा स्वादिष्ट भोजन खाना चाहते हैं। अभी तक आप मौजूदा डिलीवरी ऐप्स के ज़रिए अपने पसंदीदा रेस्टोरेंट से वह भोजन माँगा लेते हैं। रेस्टोरेंट की व्यस्तता, आपके घर से उसकी दूरी और आपके द्वारा मंगाए गये भोजन की मात्रा के अनुसार आपको वह भोजन 20-25 मिनट या उससे अधिक में, घर बैठे ही मिल जाता है। इस व्यवस्था में आपको और आपके पसंदीदा रेस्टोरेंट, दोनों को ही फ़ायदा रहता है। आपको आपका मनपसंद भोजन घर बैठे ही मिल जाता है और आपके पसंदीदा रेस्टोरेंट को उसके जमे-जमाए ग्राहकों से धंधा मिल जाता है। इसके लिए यदि आपको और रेस्टोरेंट मलिक को डिलीवरी वाली ‘इ-कॉमर्स’ कंपनी कुछ कमीशन भी देना पड़े तो वह चुभता नहीं।

जब यह व्यवस्था नई-नई शुरू हुई थी तो ग्राहकों, डिलीवरी करने वाले साथियों और रेस्टोरेंट मालिकों को लुभाने की दृष्टि से, ये कंपनियाँ काफ़ी अच्छे ऑफर्स देते थे। देखते ही देखते इन सभी की संख्या लाखों करोड़ों में पहुँच गई। इसके साथ ही इन डिलीवरी वाली ‘इ-कॉमर्स’ कंपनियों की क्मिशन भी बढ़ी। सभी एक दूसरे के फ़ायदे के लिए ज़रिया भी बने। कोरोना काल में तो ये ‘इ-कॉमर्स’ कंपनियाँ काफ़ी मददगार भी साबित हुईं। परंतु अब कुछ ऐसा सुनने में आया है जिससे कि अधिकतर रेस्टोरेंट मलिक इन डिलीवरी ‘इ-कॉमर्स’ कंपनियों के ख़िलाफ़ अदालत का रुख़ भी करने को मजबूर हो रह हैं।


उल्लेखनीय है कि कुछ डिलीवरी ‘इ-कॉमर्स’ कंपनियों ने अपने ही ब्रांड के कुछ व्यंजनों को बाज़ार में उतारने की तैयारी कर ली है। इस नये प्रयोग के तहत जो भी मशहूर व स्वादिष्ट व्यंजन की माँग ग्राहकों से अधिक मिलती थी उन सबसे मिलते-जुलते व्यंजनों को ये कंपनियाँ अपने ही लेबल और ब्रांड का बता कर बाज़ार में उतारने जा रही है। ऐसे में अपने ब्रांड के व्यंजनों को ग्राहकों के बीच लोकप्रिय करने की दृष्टि से वह इन व्यंजनों को मात्र दस से पंद्रह मिनट में ही पहुँचाने का दावा करने जा रही है। ये सब व्यंजन ‘रेडी-टू-ईट’ की श्रेणी में पहले से ही इन कंपनियों के द्वारा इकट्ठा किए जाएँगे और जैसे ही किसी ग्राहक को इससे मिलते जुलते भोजन का ऑर्डर देना होगा तो ये कंपनियाँ ग्राहकों को मौजूदा रेस्टोरेंट से कम दाम और कम समय में डिलीवर करने की ऑफर देंगी। निश्चित रूप से ज़्यादातर ग्राहक सस्ती और जल्दी के चक्कर में पड़ ही जाएँगे।

सोचने वाली बात यह है कि यदि आप अपने मनपसंद पराँठे को खाना चाहें लेकिन जितना समय आपको उसे बनाने में लगेगा उससे आधे समय में यदि गरमा-गर्म पराँठा आप तक पहुँच जाए तो आप अपनी जेब ढीली करने में देर नहीं लगाएँगे। आजकल के दौर में जब समय ही सब कुछ है और अधिकतर काम आपको कंप्यूटर पर ही करना होता है तो बिना समय बर्बाद किए काम के साथ-साथ भोजन भी मिल जाए तो क्या कहने। परंतु जहां रेस्टोरेंट मलिक इन डिलीवरी ‘इ-कॉमर्स’ कंपनियों के मौजूदा व्यवस्था से खुश थे वहीं वे इन कंपनियों के नये अवतार में आने की खबर से काफ़ी चिंतित हैं।
 

भारत की नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन (एन॰आर॰ए॰आई) ने डिलीवरी ऐप्स की ‘इ-कॉमर्स’ कंपनियों के ख़िलाफ़ अदालत जाने की पूरी तैयारी कर ली है। वे इसे अनुचित व्यापार प्रथा मानते हैं। एनआरएआई के मुताबिक़ इन डिलीवरी ऐप्स की ‘इ-कॉमर्स’ कंपनियों के पास सभी ग्राहकों के विस्तृत जानकारी होती है। जैसे कि उनके नाम, पता, फ़ोन नम्बर इत्यादि। इतना ही नहीं ग्राहकों द्वारा बार-बार या कब-कब कौनसा भोजन मंगाया जाता है इस सबकी भी जानकारी होती है जो वे रेस्टोरेंट से कभी साझा नहीं करते। एनआरएआई के मुताबिक़ चूँकि रेस्टोरेंट मालिकों के पास उसके डिलीवरी ऐप्स वाले  ग्राहकों की सूची नहीं होती, इसलिए उनको यह नहीं पता चलता कि खाना किस ग्राहक ने मंगाया है। ऐसे में यदि ये डिलीवरी ऐप्स वाली ‘इ-कॉमर्स’ कंपनियाँ रेस्टोरेंट के ग्राहकों को तोड़ने का काम कर रही है तो यह अनुचित व्यापार प्रथा है।

यदि किसी भी व्यापार में एक से अधिक व्यापारी होते हैं और उन्हें अपने उत्पादन को ग्राहकों तक पहुँचाना है तो सभी को बराबरी का अवसर मिलना चाहिए। ऐसे में यदि कोई व्यापारी जिसके पास ग्राहकों की ज़रूरी जानकारी पहले से ही मौजूद है, कोई अनुचित रास्ता अपनाता है, तो वह चोरी की श्रेणी में ही आएगा। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि जब इन डिलीवरी वाली ‘इ-कॉमर्स’ कंपनियों को किसी अदालत या अन्य क़ानूनी पटल द्वारा लताड़ा न गया हो। लेकिन इस ताज़ा मामले में क्या होता है यह तो आने वाला समय ही बताएगा परंतु एक बात तो तय है कि व्यापार चाहे रेस्टोरेंट का हो या रोज़मर्रा के सामान की ख़रीदारी का, सभी को एक समान अवसर ही मिलना चाहिए। ग्राहक जिसे भी चुने मर्ज़ी उसी की। छल और कपट से किया गया व्यापार ज़्यादा दिन तक नहीं चलता।

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2025

परीक्षाओं में अंकों की होड़ क्यों?

देश में वार्षिक परीक्षाएँ छात्रों के भविष्य को निर्धारित करने का प्रमुख माध्यम हैं। लेकिन हाल के वर्षों में, शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान अर्जन से हटकर केवल उच्च अंक प्राप्त करने तक ही सीमित होता जा रहा है। खासकर देहाती क्षेत्रों के विद्यार्थी अब नियमित कक्षाओं में पढ़ने की बजाय कोचिंग सेंटरों पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं, क्योंकि वहाँ कम समय में अधिक अंक प्राप्त करने के आसान तरीके बताए जाते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल शिक्षा प्रणाली को प्रभावित कर रही है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों के समग्र विकास के लिए भी एक चुनौती बनती जा रही है।


देश के गाँवों के छात्रों में एक नई होड़ देखी जा रही है। देहाती छात्र काफ़ी मात्रा में विद्यालय से विमुख हो रहे हैं। इसके पीछे शिक्षा प्रणाली की कई खामियाँ ज़िम्मेदार मानी जा सकती हैं। इनमें अहम हैं ग्रामीण स्कूलों में शिक्षकों की कमी, कमजोर आधारभूत संरचना और अपर्याप्त शिक्षण सामग्री के कारण विद्यार्थी नियमित कक्षाओं में रुचि नहीं लेते। इसके अलावा कोचिंग संस्कृति का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि छात्रों को लगता है कि विद्यालय में पढ़ने की तुलना में कोचिंग सेंटरों में परीक्षा के लिए विशेष तरीके सिखाए जाते हैं। जिससे वे कम समय में अधिक अंक प्राप्त कर सकते हैं। यह धारणा दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। इतना ही नहीं गाँव के भोले भाले युवकों को लुभाने की मंशा से कई कोचिंग सेंटर यह दावा भी करते हैं कि वे छात्रों को परीक्षा में अधिक अंक दिलाने में मदद करेंगे। जिससे अभिभावक भी अपने बच्चों को विद्यालय भेजने की बजाय कोचिंग में दाखिला दिलाने के लिए प्रेरित होते हैं। ऐसे में यदि शिक्षक भी उदासीन रवैया अपनाना शूर कर दें तो वह आग में घी का काम करता है। ऐसा भी देखने में आया है कि ग्रामीण इलाक़ों के कई सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी या उनकी लापरवाही के कारण कक्षाओं का स्तर गिरता जा रहा है। ऐसे में छात्र कोचिंग का विकल्प चुनने को मजबूर हो जाते हैं।


आज से कई वर्ष पूर्व ‘थ्री इडिअट्स’ फ़िल्म में भी यह दिखाया गया था कि अधिक अंकों की होड़ का छात्रों पर काफ़ी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जबकि होना यह चाहिए कि अगर हर नौजवान को अपने दिल की आवाज सुनकर अपनी जिंदगी की राह तय करनी चाहिए। यदि वो अइस करता है तो वह खुश भी होता है और सही मायने में सफल भी। केवल ज्यादा पैसे कमाने के लिए बिना समझे रट्टा मारने वाले कोल्हू के बैल ही होते हैं। जिनकी जिंदगी में रस नहीं आ पाता। यही कारण है कि आईआईटी जैसी प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़कर सैकड़ों नौजवान आज देश में ऐसे काम कर रहे हैं जिसका उनकी डिग्री से कोई लेना देना नहीं है। मसलन झुग्गीयों में बच्चों को पढ़ाना, आध्यात्मिक आन्दोलनों में भगवत्गीता का प्रचारक बनना या गांव के नौजवानों के लिए छाटे-छोटे कुटीर उद्योग स्थापित करने में मदद करना। दूसरी तरफ इंजीनियरिंग की डिग्री की भूख इस कदर बढ़ गयी है कि एक-एक शहर में दर्जनों प्राईवेट इंजीनियरिंग  कॉलेज खुलते जा रहे हैं। जिनमें दाखिले का आधार योग्यता नहीं मोटी रकम होता है। इन कॉलेजों में योग्य शिक्षकों और संसाधनों की भारी कमी रहती है। फिर भी यह छात्रों से भारी रकम फीस में लेते हैं। बेचारे छात्र अधिकतर ऐसे परिवारों से होते हैं जिनके लिए यह फीस देना जिंदगी भर की कमाई को दाव पर लगा देना होता है। इतना रूपया खर्च करके भी जो डिग्री मिलती है उसकी बाजार में कीमत कुछ भी नहीं होती। तब उस युवा को पता चलता है कि इतना रूपया लगाकर भी उसने दी गयी फीस के ब्याज के बराबर भी पैसे की नौकरी नहीं पाई। तब उनमें हताशा आती है। आज हालत यह है कि एम.बी.ए. की डिग्री प्राप्त लड़के साडि़यों की दुकानों पर सेल्समैन का काम कर रहे हैं। समय और पैसे का इससे बड़ा दुरूपयोग और क्या हो सकता है?


इसलिए समझ की बजाय रटने की प्रवृत्ति को समाप्त करने में ही समझदारी है। लेकिन देखा यह गया है कि कुछ कोचिंग संस्थान परीक्षा पास कराने के लिए रटने पर जोर देते हैं। जिससे छात्रों की तार्किक और विश्लेषणात्मक क्षमता विकसित नहीं हो पाती। ऊपर से कोचिंग सेंटरों की बढ़ती फीस ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए एक अतिरिक्त बोझ बन रही है। सोचने वाली बात यह है कि जब छात्र स्कूल की पढ़ाई को महत्व नहीं देते, तो विद्यालयों की गुणवत्ता और भी गिरती जाती है। इससे शिक्षा प्रणाली कमजोर होती है। वहीं परीक्षा में अच्छे अंक पाने के दबाव में कई छात्र नकल और अन्य अनुचित तरीकों का सहारा भी लेने लगते हैं।

ऐसे में विद्यालयों की शिक्षा और गुणवत्ता में सुधार की बहुत ज़रूरत है। सभी ग्रामीण स्कूलों में शिक्षकों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए और विद्यालयों में शिक्षण सामग्री व संसाधनों को बेहतर किया जाना चाहिए। यदि सरकार विद्यालयों में परीक्षा की अच्छी तैयारी के लिए विशेष कक्षाएँ संचालित करेगी तो विद्यार्थियों को कोचिंग सेंटर जाने की जरूरत ही नहीं  पड़ेगी। परीक्षाओं को केवल अंकों के आधार पर तय करने की बजाय, प्रायोगिक ज्ञान, परियोजना कार्य और गतिविधि-आधारित मूल्यांकन को बढ़ावा देना चाहिए। शिक्षकों को इस बात पर विशेष ज़ोर देना चाहिए कि उन्हें विद्यार्थियों को अंकों की होड़ में धकेलने की बजाय, उन्हें वास्तविक ज्ञान अर्जित करने और रचनात्मकता विकसित करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

देहाती क्षेत्रों के विद्यार्थियों का विद्यालयों से विमुख होकर कोचिंग संस्थानों की ओर बढ़ना शिक्षा व्यवस्था की एक गंभीर समस्या को दर्शाता है। यदि शिक्षा प्रणाली को अधिक प्रभावी और समावेशी नहीं बनाया गया, तो यह प्रवृत्ति शिक्षा के व्यवसायीकरण को और अधिक बढ़ावा देगी। आवश्यक है कि विद्यालयों में गुणवत्ता सुधार के साथ-साथ परीक्षाओं में सफलता का मूल्यांकन केवल अंकों के आधार पर न किया जाए, बल्कि छात्रों की संपूर्ण योग्यता और कौशल को ध्यान में रखा जाए। जब शिक्षा का असली उद्देश्य ज्ञानार्जन बनेगा, तभी समाज का वास्तविक विकास संभव होगा।