शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

दिल्ली में पुरानी कारें ख़रीदने-बेचने वाले सावधान!


बॉलीवुड में ठग और ठगी करने वालों पर अनेकों फ़िल्में बनी हैं। इनमें से 1958 में बनी एक फ़िल्म का नाम था ‘दिल्ली का ठग’ जिसमें यह दिखाया गया था कि ठगी करने का आदि एक ठग दिल्ली छोड़ मुंबई जा कर ठगी करने लगता है। ठगी करने वाले चाहे दिल्ली के हों या किसी अन्य शहर के, वे पकड़े जाने के डर से अपना नाम और हुलिया बदल कर अलग-अलग शहरों में जाते हैं और अपना मक़सद पूरा करते हैं। पर आज के युग में पेशेवर ठगों को कहीं जाना नहीं होता। सोशल मीडिया ने उनका काम काफ़ी आसान कर दिया है। जिन लोगों को लुटने का शौक़ होता है वे किसी न किसी तरह से इन ठगों के जाल में फँस कर उनका शिकार बन ही जाते हैं।

आज कल ‘दिल्ली के ठग’ आपको सोशल मीडिया पर बिना ज़्यादा मेहनत के बड़ी आसानी से मिल जाएँगे। इनका नया रूप खोजने के लिए आपको दिल्ली के सेकंड हैंड कार बाज़ार को खोजना होगा। इतना करते ही आप इनके बिछाए जाल में बड़े आराम से फँस जाएँगे। हां यदि आपको पुरानी गाड़ियों की पहचान है, ऐसे लोगों से बात करने का अनुभव है तो शायद आप बच जाएं। वरना दिल्ली के इन ठगों से लुटने के लिए लोग देश भर से अपना पैसा खर्च कर खुद ही दौड़े चले आते हैं। सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर इनकी एक अच्छी ख़ासी पकड़ है। ये ठग खुद को सोशल मीडिया के ‘इंफलुएंसर’ बता कर बड़ी होशियारी से गंजों को कंघी तक बेचने की कला रखते हैं।


इन सोशल मीडिया के ठगों की एक बात बड़ी ख़ास है। ये लोग दिल्ली जैसे महानगरों में बिकने वाली सेकंड हैंड गाड़ियों के बाज़ार के डीलरों को इस कदर अपने जाल में फँसा लेते हैं कि उनके पास घर बैठे ही ग्राहक आने शुरू हो जाते हैं। सोशल मीडिया पर ये इंफलुएंसर्स दिल्ली के नामी डीलर्स पर खड़ी सैंकड़ों पुरानी गाड़ियों को इस कदर आकर्षित बताते हैं कि दूर दराज के शहरों में रहने वाले भोले-भाले लोग इन गाड़ियों की ओर खिचे चले आते हैं। जब से राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने दिल्ली जैसे महानगरों में वाहनों की आयु सीमा तय कर दी है तब से पुरानी गाड़ियों को दिल्ली के बाहर छोटे शहरों में बेचने के बाज़ार में काफ़ी उछाल आया है। इसी बात का फ़ायदा उठा कर इन ठगों की चाँदी होने लग गई है।


सोशल मीडिया पर एक ओर जहां आपको इन ठगों के गाड़ी बेचने वाले तमाम विडीयो नज़र आएँगे, वहीं आपको इन ठगों के शिकार लोगों के भी अनेकों विडीयो मिल जाएँगे। इन लोगों में आपको यह एक  बात आम मिलेगी। वह ये कि ये सभी लोग छोटे शहरों से आए हुए भोले-भाले लोग हैं जो कम पैसों में आलीशान गाड़ी रखने का सपना देखते हैं। गाड़ी की चमक-धमक देख इन लोगों को शायद इस बात का भी ध्यान नहीं रहता कि चमकने वाली हर चीज सोना नहीं होती। वे बेचारे तो इन ठगों के झाँसे में आकर कम क़ीमत पर महंगी गाड़ी ख़रीद लेते हैं। असलियत का पर्दा तब उठता जब ये गाड़ी लेकर अपने घर पहुँचते हैं और कुछ दिन इस्तेमाल करने के बाद गाड़ी के अंजर-पंजर ढीले हो जाते हैं। फिर वो आलीशान गाड़ी केवल एक ‘शो-पीस’ बन कर रह जाती है।

जब भी कभी आप सोशल मीडिया पर विडीओ देख कर पुरानी गाड़ी ख़रीदने का प्लान बनाते हैं तो हमेशा इन बातों का ध्यान रखें। गाड़ी ख़रीदने से पहले गाड़ी की जाँच करने अवश्य जाएं। सोशल मीडिया पर दिखाई गाड़ियों की चमक-धमक के झाँसे में न आएँ। आपको पुरानी गाड़ी की जाँच करने की पर्याप्त जानकारी न हो तो किसी जानकर को अपने साथ ज़रूर ले जाएं। गाड़ी के दस्तावेज़ों की भी जाँच कर पता लगाया जा सकता है कि गाड़ी असल में कितनी चली है और उसका मीटर सच बोल रहा है या नहीं। सोशल मीडिया में भी जब ऐसी गाड़ियों का विडीयो डाला जाता है तो उसी के नीचे दी गई कमेंट्स को ज़रूर पढ़ें। इन कमेंट्स में आपको गाड़ी बेचने वाले डीलर के धोखे के शिकार लोग भी मिल जाएँगे। किसी भी सूरत में बिना गाड़ी को अपनी आँखों से देखे हुए एक रुपया एडवांस न दें।


ये तो हुई गाड़ी ख़रीदने वालों की बात। ऐसा ही कुछ पुरानी गाड़ी बेचने के बाज़ार में भी चल रहा है। यहाँ फ़र्क़ इतना है कि दिल्ली के डीलरों के अलावा कुछ नामी कम्पनियाँ भी ग्राहक को चूना लगाने में पीछे नहीं हटती हैं। जब सोशल मीडिया पर इन नामी कम्पनियों की धोखाधड़ी के विडीयो देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि इन कम्पनियों की ऐप पर आपके द्वारा बेचे जाने वाली गाड़ी का रेट कुछ और आता है। परंतु जब आप गाड़ी लेकर इनके पास जाते हैं तो रेट कुछ और आता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे छिपे हुए चार्ज होते हैं जिनका खुलासा तभी होता है जब आप गाड़ी बेचने को तैयार हो जाते हैं।

कुलमिलाकर बात यह निकलती है कि दिल्ली के ये नए ठग आज काफ़ी हाईटेक हो चुके हैं। ये ठग इस विश्वास से पुरानी गाड़ियों की खरीद-फरोख्त करते हैं कि इनके जाल में फँसने के लिए आप खुद ही खिंचे चले आते हैं। सरकार को कुछ ऐसा करना चाहिए कि जिससे पुरानी गाड़ियों के बाज़ार के भी कुछ  नियम और क़ानून बनें। इनका क़ानूनों का पालन इस व्यापार से जुड़े लोगों को करना अनिवार्य हो और देश की जनता इनकी ठगी से बच सके।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

दिल है कि मानता नहीं


जब भी कभी कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेना हो तो अक्सर यह देखा गया है कि दिल का पलड़ा दिमाग़ पर भारी पड़ता है। ऐसा ज़्यादातर मोह माया के लोभ के कारण होता है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि लोभ में फंसकर व्यक्ति नीति के विरूद्ध कार्य करता है। परंतु जिस भी व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में जब लोभ एक अहम स्थान ग्रहण कर लेता है तो वो हर तरह के प्रयास से अपने मोह से जुड़े लक्ष्यों की पूर्ति में जुट जाता है।


प्रायः यह देखा गया है कि जब भी कभी किसी उच्च पद पर तैनात सरकारी अफ़सर, सासंद, विधायक आदि की सेवा निवृत्ति का समय आता है तो सरकारी बंगले और अन्य सुविधाओं का मोह उन्हें घेर लेता है। इसके विपरीत ऐसे भी व्यक्ति देखे गए हैं जो अतिसंवेदनशील पदों पर रहने के बावजूद, अपना सेवाकाल पूरा होते ही सरकारी बंगला छोड़ देते हैं। ऐसे लोग आप उँगलियों पर गिन सकते हैं जो रिटायर होने के दूसरे दिन ही सरकारी बंगला छोड़ देते हैं। उनका मानना है कि जब वे इस बंगले में रहने के योग्य बने थे तो उनकी यही इच्छा थी कि वे सरकारी बंगले में जल्द-से-जल्द शिफ़्ट हो जाएं। यदि उनसे पहले रहने वाले व्यक्ति ने समय पर बंगला ख़ाली न किया होता तो उनकी ये इच्छा कैसे पूरी होती? ठीक उसी तरह इनके बाद उसी पद पर आने वाले व्यक्ति की भी इसी इच्छा का सम्मान करते हुए उन्हें भी सरकारी बंगला समय पर ख़ाली कर देना चाहिए।


कुछ हफ़्तों पहले ऐसा भी देखने को मिला जब एक राज्य सरकार में महत्वपूर्ण पद पर तैनात एक अधिकारी ने अपनी सेवानिवृत की तारीख़ से पहले ही पूरे सरकारी तंत्र में ऐसा माहौल बनाना शुरू कर दिया कि उसका एक्सटेंशन तय है। परंतु अटकलों का बाज़ार तब शांत हुआ जब उस अधिकारी की विदाई की पार्टी के लिए तमाम इंतेजाम करने के आदेश जारी हुए। लेकिन आदत से मजबूर ये अधिकारी अपनी रिटायरमेंट के बाद भी ज़िले के अधिकारियों पर अपनी धौंस दिखाता रहा और मौखिक फ़रमान जारी करने लग गया। मीडिया में इस बात को लेकर काफ़ी चर्चा रही। ज़ाहिर सी बात है कि इन महाशय से बंगले और नौकर गाड़ियों का मोह नहीं छूट रहा था। ऐसे अधिकारी किसी न किसी ढंग से अपनी सेवा विस्तार करा ही लेते हैं। अगर सेवा विस्तार न हो पाए तो वे अपने लिए कोई एक ऐसा पद बनवा लेते हैं जो उन्हें मुख्य मंत्री के क़रीब ही रखता है। मतलब ये कि रिटायरमेंट के बाद भी अपने पद पर बने रहने का जुगाड़ कर लेते हैं।


ऐसा नहीं है कि ऐसा लालच केवल नौकरशाही में ही देखा जाता है। पिछले हफ़्ते खबर छपी कि राज्य सभा के एक वरिष्ठ सदस्य महोदय से भी दिल्ली के लुटियन ज़ोन का बंगला ख़ाली नहीं हो रहा है। सासंद महोदय ने सुरक्षा कारण बताते हुए बंगला ख़ाली न करने की गुहार दिल्ली उच्च न्यायालय में भी लगा दी। माननीय उच्च न्यायालय ने उनकी दरखास्त को निरस्त करते हुए उन्हें 6 सप्ताह के भीतर अपना बंगला ख़ाली करने के आदेश दे दिए। आपने ठीक पहचाना, इन सांसद महोदय का नाम डॉ॰ सुब्रमण्यम स्वामी है। राज्य सभा के पूर्व सांसद डॉ सुब्रमण्यम स्वामी हमेशा विवादों में रहे हैं। लेकिन सत्ता के गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि मोदी सरकार भी इनके झाँसे में आ गई और इन्हें राज्य सभा सांसद बना दिया। चुनावी वादों की तरह डॉ॰ स्वामी ने भी भाजपा को एक ऐसा सपना दिखाया जिससे वो स्वामी के कहने में आ गए। उधर स्वामी को जब कोई मंत्री पद नहीं मिला तो उन्होंने अपने वादे पूरा करना तो दूर, मोदी सरकार की नीतियों पर ही सवाल उठा दिए। बस होना क्या था स्वामी भाजपा की सरकार की आँख की किरकिरी बन गए। चूँकि राज्य सभा के सदस्य का निलम्बन कर भाजपा को विपक्ष के प्रहारों को सहना पड़ता शायद इसीलिए मोदी सरकार ने डॉ स्वामी को नज़रंदाज़ करना शुरू कर दिया। मोदी सरकार के मंत्री या भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ स्वामी के बयानों पर भी कोई टिप्पणी नहीं करते थे।

2022 में जब मोदी सरकार ने डॉ सुब्रमण्यम स्वामी राज्य सभा टिकट नहीं दी तो इस बात पर मुहर लग गयी कि भाजपा स्वामी से कन्नी काट रही है। राजनैतिक पंडितों द्वारा ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि जिस ‘जेड’ श्रेणी की सुरक्षा का हवाला देते हुए स्वामी अपने सरकारी बंगले को बरकरार रखना चाहते हैं, शायद वो भी हटा ली जाएगी। यदि ऐसा होता है तो स्वामी के पास सरकारी बंगला रखने का बहाना भी नहीं रहेगा। देखना यह है कि जनता के कर के पैसे पर सुरक्षा लेने वाले ऐसे कितने राजनेता हैं जो झूठे वादों के भरोसे बड़े राजनैतिक दलों से जुड़ जाते हैं और बाद में उन्हीं के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करते हैं। ऐसे में यदि उन नेताओं को सरकार द्वार दी गई सुरक्षा और बंगले आदि की सुविधा वापिस ली जाती है तो इन नेताओं का दिल उसे छोड़ने की इजाज़त नहीं देता।

देश हो या विदेश आपको ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएँगे जहां महत्वपूर्ण सरकारी पद छोड़ते ही अधिकारी या नेता अपने निजी आवास में चले जाते हैं। ये अलग बात है कि पुलिस का दरोग़ा हो या निम्न स्तर का सरकारी कर्मचारी कभी-कभी उनके निजी मकान उनके आला अधिकारियों से कहीं ज़्यादा बड़े और आलीशान होते हैं। जबकि ईमानदारी से कार्य करने वाले वरिष्ठ अधिकारी, जज, या नेता प्रायः आपको छोटे से फ़्लैट या अपने पुश्तैनी मकान में ही पाए जाएँगे, किसी पॉश कालोनी के महल में नहीं। इसलिए हमेशा दिल के आगे मजबूर होने से बेहतर है दिमाग़ कि भी सुनें और लोभ न करें। 

शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

दिल दा मामला है


मशहूर पंजाबी गायक गुरदास मान का दुनिया भर में चर्चित गाना ‘दिल दा मामला है’ आज एक बार फ़िर से चर्चा में है। इसलिए नहीं कि अचानक यह गाना फिर से लोकप्रिय होने लगा है। इसलिए कि आजकल सोशल मीडिया में ऐसी तमाम ख़ौफ़नाक खबरें सामने आ रही हैं जिनमें हंसते-खेलते लोगों को अचानक दिल का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई।

ज़्यादातर देखा गया है कि दिल का दौरा या हार्ट अटैक 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों आता है। दिल का दौरा पड़ने के और कारणों में से प्रमुख है मधुमय या शुगर के मरीज़ और ब्लड प्रेशर के मरीज़। इन मरीज़ों में हार्ट अटैक की संभावना काफ़ी अधिक होती है। इसके साथ ही धूम्रपान करने वाले व्यक्ति भी दिल के मरीज़ कब बन जाते हैं इसका पता नहीं चलता। इसका कारण यह है कि धूम्रपान करने से दिल का दौरा पड़ने की संभावना तीन गुना बढ़ जाती है। धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को जब पता चलता है कि वो दिल का मरीज़ बन गया है तब तक काफ़ी देर हो जाती है। 40 वर्ष की आयुवर्ग के लोगों को दिल का दौरा पड़ना अधिक धूम्रपान करने की वजह से होता है। साथ ही जो व्यक्ति तनाव की ज़िंदगी जीते हैं, नियमित व्यायाम नहीं करते, बेवजह और हर समय जंक फ़ूड का सेवन करते हैं। वे भी इस जानलेवा बीमारी की चपेट में आ जाते हैं।


क्या कभी आप ने सुना है किसी हट्टे-कट्टे व्यक्ति को अचानक दिल का दौरा पड़ा और उसकी मौत हो गई? आजकल ऐसी तमाम खबरें सामने आ रही हैं जहां व्यक्ति अपने रोज़मर्रा के काम या आराम के समय अचानक बेहोश हो गया और उसकी मौत हो गई। मृत्यु का कारण दिल का दौरा। कुछ लोग इसे चीन से आए कोरोना के वायरस का साइड इफ़ेक्ट बता रहे हैं। एक शोध के अनुसार अमरीका में कोविड से ठीक हुए व्यक्तियों में 20 तरह  के हृदय रोग के लक्षण पाए गए। इनमें उन लोगों के मुक़ाबले, जिन्हें कोविड नहीं हुआ, हृदय गति रुक जाने या हार्ट फेल होने की संभावना 72 फ़ीसद अधिक पाई गई। इनमें औरों के मुक़ाबले स्ट्रोक आने की संभावना भी 17 प्रतिशत अधिक पाई गई।


एक शोध के अनुसार कोविड के बाद होने वाली दिक्कतों के कारण इसे ‘लॉग कोविड’ यानी लम्बा चलने वाला कोविड कहा जा रहा है। इसके आम लक्षण थकान, दिल की तेज धड़कन, साँस फूलना, संज्ञानात्मक कठिनाइयाँ, मांसपेशियों में कमज़ोरी, पुराना दर्द हैं। डाक्टरों के अनुसार इन आम लक्षणों के अलावा पेट के रोग भी हो सकते हैं। यह लक्षण अलग-अलग आयुवर्ग भी अलग ही पाए जाते हैं। शोध के अनुसार ये लक्षण सप्ताह से ज़्यादा नहीं रहते हैं। इनका सही समय पर उपचार करके इन पर क़ाबू पाया जा सकता है। यदि आपको ये लक्षण ज़्यादा समय तक महसूस होते हैं तो आप क्या करें? डाक्टरों के अनुसार 90 फ़ीसदी तक के मामले माइल्ड पाए गए हैं। इनका घर पर ही उपचार किया जा सकता है। माइल्ड लक्षण की परिभाषा में आने वाले लक्षण सिर दर्द, मांसपेशियों का दर्द और ऐसिडीटी हैं। डाक्टरों के मुताबिक़ यदि आपको ऐसे लक्षण हैं तो अधिक मात्रा में तरल पदार्थ लें। खाने में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाएँ। ऐसा करने से इन लक्षणों से निजाद पाई जा सकती है। यदि फिर भी आप इन लक्षणों के शिकार होते हैं तो डाक्टर की सलाह लें।

ये तो हुई माइल्ड लक्षणों वाले 90 प्रतिशत लोगों की बात। यदि आप उन 10 प्रतिशत लोगों की श्रेणी में आते हैं जिन्हें लगातार खांसी हो रही हो, साँस फूल रही हो, हृदय रोग के लक्षण हों या घबराहट होती हो वे तुरंत डाक्टर से संपर्क करें। उनके लक्षण अनुसार उनका एक्सरे या सीटी स्कैन किया जाएगा और उसी मुताबिक़ इलाज होगा। किसी भी सूरत में बिना डाक्टर की सलाह के, खुद डाक्टर बन कर, कोई भी ऐसी जाँच न कराएँ। यह बात जग ज़ाहिर है कि जाँच करते समय जो भी किरण हमारे शरीर में जाती है उसका कोई न कोई साइड इफ़ेक्ट ज़रूर होता है। इसलिए केवल डाक्टर की सलाह के बाद ही ऐसा कोई कदम उठाएँ।

जिस तरह पिछले कुछ दिनों में देश-विदेश से ऐसी खबरें सामने आई हैं जिनमें लोगों को अचानक दिल का दौरा पड़ा और वे परलोक सिधार गए उससे यह भी लगता है कि कोविड का असर दिल पर भी पड़ रहा है। घटना चाहे दक्षिण कोरिया की हो जहां सड़क किनारे चलते-चलते जम्मू के अनिल कुमार को दिल का दौरा पड़ा और उनका जीवन समाप्त हो गया। ठीक उसी तरह सितम्बर के पहले सप्ताह में देश के अलग-अलग हिस्सों से भी ऐसी ही कुछ घटनाएँ सामने आई, बरेली, जम्मू और मैनपुरी में तीन लोगों की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई, वो उस समय जब वे मंच पर नाच रहे थे। गया नगर निगम के मेयर गणेश पासवान को हाल ही में मॉनिंग वाक करते हुए सीने में दर्द हुई और अस्पताल ले जाया गया, जहां पता चला कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा है। गणेश की उम्र 35-40 के बीच की है। वे अपने स्वास्थ्य के प्रति भी खूब सचेत रहते हैं। पासवान नियमित मॉनिंग वाक के साथ-साथ वर्क आउट भी करते हैं। ऐसी दुर्घटना आपका पद और रुतबा नहीं देखती। आप चाहे नामी खिलाड़ी हों, नेता हों या हॉलीवुड के मशहूर गायक, कोविड के बाद आपको दिल का दौरा आ सकता है। इसलिए इस बात को भी ध्यान में रखना ज़रूरी है कि अभि कोविड का ख़तरा पूरी तरह टला नहीं। हृदय रोग विशेषज्ञों के अनुसार दिल के मामले को हल्के में न लें और दिल के प्रति सतर्क रहें। फ़िट रहने की चाह में बहुत अधिक थकने वाले व्यायाम न करें। दिल को मज़बूत रखें और अपने हौसलों को भी। 

शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

सावधानी हटी दुर्घटना घटी


मशहूर उद्यमी और टाटा समूह के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री का बीते रविवार मुंबई-अहमदाबाद हाईवे पर एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। दुर्घटना का कारण तेज रफ़्तार को बताया जा रहा है। खबरों के अनुसार मिस्त्री जिस मर्सिडीज कार में सवार थे, दुर्घटना के समय उसकी स्पीड करीब 130 किलोमीटर प्रति घंटा थी। दुर्घटना के कई और कारण भी सामने आए हैं। जैसे कि जिस जगह पर यह हादसा हुआ उसकी चौड़ाई कम थी जिस कारण  गाड़ियों के निकलने में दिक्कत आती है। इसके साथ ही गाड़ी में पीछे की सीट पर सवार दोनों लोगों ने सीट बेल्ट नहीं पहनी थी। असल कारण तो पूरी जाँच के बाद ही सामने आएगा। पर यह स्पष्ट है कि सड़क सुरक्षा के नियम का पालन न करने से अक्सर ऐसी दुर्घटनाएँ होती हैं जो जानलेवा साबित होती हैं। इसलिए सभी को ज़िम्मेदारी से गाड़ी चलानी चाहिए या उसमें सफ़र करना चाहिये।


दरअसल वाहन को गति सीमा में चलाने की बात हो या गाड़ी चलाते हुए सीट बेल्ट पहनने की बात हो, प्रायः ऐसा देखा गया है कि इन नियमों का पालन केवल चालान से बचने के लिए ही होता है। विदेशों के मुक़ाबले हमारे देश में पीछे की सीट पर सवार लोग ज़िम्मेदारी से सीट बेल्ट पहने ऐसा चलन अभी देखने में नहीं आया है।ऐसा केवल कुछ चुनिंदा लोग ही करते हैं। जबकि कार में पीछे बैठी सवारियों को भी अपनी सुरक्षा के लिए सीट बेल्ट पहननी चाहिए। आपात स्थिति में ब्रेक लगने पर पीछे बैठी सवारी को ज़्यादा चोट लगने की संभावना होती है। भारत में केंद्रीय मोटर वाहन नियम की धारा 381 (1) के तहत, गाड़ी चलते वक्‍त आगे और पीछे की सीटों पर बैठे हुए यात्रियों का सीट बेल्‍ट लगाना अनिवार्य है। यह नियम अक्‍टूबर 2002 में लागू हुआ था। इसी क़ानून की धारा 125 (1A) के तहत सभी चार पहिया वाहन निर्माताओं के लिए फ्रंट और रियर सीट्स पर बेल्‍ट देना भी अनिवार्य किया गया है। साइरस मिस्त्री की मृत्यु के बाद सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गड़करी ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि उन्होंने एक आदेश जारी किया है जिसके तहत अब से कार में पीछे बैठने वाले अगर सीट बेल्ट नहीं लगाएँगे तो उनका भी चालान होगा। ये एक अच्छी पहल होगी। परंतु जब तक नियमों को सख़्ती से लागू नहीं किया जाएगा तब तक ऐसे नियमों का असर नहीं दिखेगा।


गाड़ी की गति सीमा के उलंघन के मामलों में भी कुछ ऐसा ही देखा गया है। आज देश में कई जगह गाड़ी की गति सीमा के उलंघन को पकड़ने के लिए ट्राफ़िक पुलिस ने स्पीड कैमरे लगा रखे हैं। जिन लोगों को इन कैमरों के लगे होने की जानकारी होती है, वे लोग चालान से बचने को  कैमरे की रेंज में आने से पहले ही अपनी गाड़ी की स्पीड कम कर लेते हैं। ऐसा करने से वे न सिर्फ़ चालान से बच जाते हैं बल्कि कुछ क्षण के लिए सुरक्षित भी हो जाते हैं। पर फिर तेज स्पीड पकड़ लेते हैं। अपने गंतव्य पर जल्दी पहुँचने की होड़ में लोग यह भी भूल जाते हैं कि तेज गति से चलने पर न सिर्फ़ ईंधन की खपत अधिक होती है बल्कि वाहन की घिसाई भी अधिक होती है। इससे दुर्घटना होने की संभावना भी बढ़ जाती है। तेज रफ़्तार से गाड़ी चलाने पर अक्सर जब ओवरटेक किया जाता है तो चालक की जजमेंट भी ग़लत हो जाती है जो दुर्घटना को अंजाम देती है। ऐसा ही कुछ मिस्त्री की गाड़ी चला रही अनायता पंडोले से भी हुआ।  

साइरस मिस्त्री का हादसा हो या 25 वर्ष पूर्व 1997 में हुई ब्रिटेन की राजकुमारी डायना स्पेन्सर की कार दुर्घटना में मौत का मामला हो, इन दोनों में यही समानता है कि पीछे बैठी सवारियों ने सीट बेल्ट नहीं लगाई थी। जिस कारण इनकी मौत हो गई।

जानकारों के अनुसार जब भी कभी तेज गति से चल रही गाड़ी में टक्कर होती है या अचानक ब्रेक लगाई जाती है तो आगे बैठी सवारियों को सीट बेल्ट रोक लेती है। ऐसे में आगे बैठी सवारियों को कम चोट आती है। वहीं यदि पीछे बैठी सवारियों ने सीट बेल्ट नहीं लगाई होती है तो ब्रेक लगने की स्थिति में वे तेज गति से आगे की ओर टकराते हैं, जिससे उनको ज़्यादा चोट लगती है। राजमार्गों और एक्सप्रेसवे जैसी सड़कों पर चलते समय यदि पीछे बैठी सवारियाँ भी सीट बेल्ट पहन कर यात्रा करें तो दुर्घटना के समय निश्चित रूप से चोट की संभावना कम होगी।

आजकल की नई गाड़ियों में यदि आगे बैठी सवारियों ने सीट बेल्ट न पहनी हो तो गाड़ी में एक बीप की आवाज़ बजने लगती है। यह बीप तब तक बजती रहती है जब तक सवारी सीट बेल्ट न लगा ले। भारत जैसे देश में लोग चालान और बीप की आवाज़ से छुटकारा पाने के लिए मजबूरन सीट बेल्ट लगा ही लेते हैं। लेकिन पीछे की सवारियों के लिए अभी ऐसा कुछ भी नहीं है इसलिए लोग सीट बेल्ट पहन कर यात्रा करने से कतराते हैं। जबकि इन सीटों को भी बीप से जोड़ना चाहिये।

आजकल की गाड़ियों में सवारियों की सुरक्षा के लिए एयरबैग भी लगे होते हैं। मर्सडीज़ जैसी महंगी गाड़ियों में तो कई एयरबैग होते हैं। यह एयरबैग समय पर तभी खुलते हैं जब यात्री सीट बेल्ट पहने हुए होते हैं। यदि किसी सवारी ने सीट बेल्ट नहीं लगा रखी तो एयरबैग देरी से खुलते हैं। ऐसे में गंभीर चोट लगने का ख़तरा काफ़ी बढ़ जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ था साइरस मिस्त्री के साथ। तेज गति से चल रही उनकी गाड़ी अनियंत्रित हुई और पुल की दीवार से जा भिड़ी। ऐसे में तेज़ गति, ग़लत जजमेंट, तंग सड़क और सीट बेल्ट का न पहनना ही कारण नहीं बल्कि गाड़ी चलाते हुए सावधानी न बरतना सबसे अहम कारण है। शायद इसीलिए कहा गया है कि ‘सावधानी हटी दुर्घटना घटी।’    

शुक्रवार, 2 सितंबर 2022

दबावों के बावजूद सही सुराग मिल ही जाता है!


किसी भी क्राइम आधारित धारावाहिक या फ़िल्म में आपने अक्सर ये सुना होगा कि मुजरिम कितना भी शातिर क्यों न हो वो कोई न कोई सुराग ज़रूर छोड़ जाता है। बड़े-बड़े अपराधों की गुत्थी अक्सर छोटे से सुराग से ही सुलझ जाती है। अक्सर वो सुराग अपराध की जाँच कर रहे पुलिसकर्मियों के सामने ही होते हैं परंतु वे दिखाई नहीं देते। अनुभवी और समझदार पुलिस अधिकारी कड़ी से कड़ी जोड़कर देर से ही सही लेकिन अपराधी तक पहुँच ही जाते हैं। शायद इसीलिए कहा गया है कि क़ानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं।


पुलिस फ़ाइलों में पुराने अपराधों और उनको सुलझाने के तरीक़े वर्तमान में होने वाले वैसे ही अपराधों को सुलझाने में काफ़ी कारगर साबित होते हैं। परंतु हमेशा ऐसा नहीं होता। कभी-कभी अपराधी पुलिस को चकमा देने की फ़िराक़ में पुराने अपराधों के तरीक़े का चोला पहन कर अपराधों को अंजाम देता है। ऐसे अपराधों को सुलझाने के लिए पुलिस कुछ समय के लिए अपराधी के जाल में फँसती ज़रूर है परंतु जैसे ही कोई ऐसा सुराग सामने आता है जो जाँच को सही दिशा में ले जाता है, अपराधी का खेल ख़त्म हो जाता है। कुछ ऐसा ही दिखा हाल ही में रिलीज़ हुई वेब सीरिज़ ‘दिल्ली क्राइम’ के दूसरे सीज़न में।


अपने पहले सीज़न में सुर्ख़ियाँ बटोरने के बाद ‘दिल्ली क्राइम’ ने नेटफलिक्स पर पिछले शुक्रवार को ‘दिल्ली क्राइम 2’ रिलीज़ किया। पिछले सीज़न में बहुचर्चित निर्भया कांड की गुत्थी को दिल्ली पुलिस ने किन परिस्थितियों में सुलझाया, इसे नाटकीय ढंग से दिखाया गया था। यह सीज़न काफ़ी हिट रहा। पिछले सीज़न की ही टीम को लेकर फ़िल्माए गए सीज़न 2 के पाँच एपिसोड आपको पूरा धारावाहिक देखने को मजबूर करेंगे। एक अनुशासित डीसीपी का किरदार निभा रही अभिनेत्री शेफाली शाह ने अपने किरदार को बखूबी निभाया है। ‘दिल्ली क्राइम 1’ की ही तरह ‘दिल्ली क्राइम 2’ में भी शेफाली शाह और राजेश तैलंग की जोड़ी काफ़ी हिट रही। वहीं रसिका दुग्गल, सौरभ भारद्वाज व अन्य कलाकारों का अभिनय भी काफ़ी सराहनीय है।

‘दिल्ली क्राइम 2’, 90 के दशक में चर्चित ‘कच्छा बनियान गैंग’ की आड़ में एक नए गैंग द्वारा किए गए हत्या कांडों पर आधारित है। यह गैंग दिल्ली के पॉश इलाक़ों में बुजुर्गों को अपनी लूट का शिकार बना कर उनकी निर्मम हत्या कर देता है। दिल्ली पुलिस को गुमराह करने के लिए यह गिरोह ‘कच्छा बनियान’ पहन कर इन वारदातों को अंजाम देता है। एक के बाद एक होने वाले लूट और हत्या कांड से दिल्ली की पुलिस भी भौचक्की रह जाती है। दिल्ली वासियों में भी एक ख़ौफ़ की लहर उठ जाती है। मजबूरी में दिल्ली पुलिस के अधिकारी इसे ‘कच्छा बनियान गिरोह’ का ही काम मानकर गिरोह की जाती से संबंधित हिस्ट्रीशीटर्स को उठा लेती है। कई दिनों तक पूछताछ का सिलसिला जारी रहता है। कहानी में मोड़ तब आता है जब शक की बिनाह पर उठाए गए इन्हीं लोगों में से एक लड़की डीसीपी के दफ़्तर में जबरन घुसकर अपना पक्ष रखने की कोशिश करती है।

सुर्ख़ियों में आने के बाद ऐसे बड़े अपराधों में, राजनैतिक दबाव के चलते, कभी-कभी पुलिस के आला अधिकारी भी ऐसी गलती कर बैठते हैं जो केस कि जाँच को ग़लत दिशा में ले जाता है। ‘दिल्ली क्राइम 2’ में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला जब पुलिस अधिकारी अपराधियों द्वारा बिछाए गए जाल में फँस गए और जाँच को सही दिशा में ले जाने में देरी हुई।

संगीन अपराधों में पुलिस के निचले अधिकारियों द्वारा मीडिया में गुप्त सूचनाओं का लीक होना, जाँच कर रही टीम के लिए किस कदर भारी पड़ता है इसे भी बखूबी दर्शाया गया है। पुलिस पर राजनैतिक दबाव के चलते जल्दबाज़ी में लिए गए निर्णय केस की जाँच के लिए घातक साबित होते हैं। परंतु सही सूझ-बूझ, तकनीकी सहयोग और अनुभव के चलते जुर्म की कड़ियों को जोड़ते हुए एक छोटे से सुराग से कैसे इस संगीन हत्या कांड को सुलझाया गया, यह देखने योग्य है।

दरअसल ऐसे बड़े अपराधों में पुलिस पर हर ओर से दबाव होता है। पुलिस के बड़े अधिकारी हों या छोटे अधिकारी, सभी चाहते हैं कि सुर्ख़ियों में आने के बाद केस जल्द से जल्द सुलझाया जाए और अपराधी सलाख़ों के पीछे हो। परंतु पुलिस को अंजाम तक पहुँचने में जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं। फिर वो दबाव, राजनैतिक हो, आला अधिकारियों का हो, मीडिया का हो या फिर पारिवारिक समस्याओं का हो। जाँच कर रहे अधिकारियों का ध्यान बटाने के लिए काफ़ी होता है।

एक रिसर्च के आधार पर यह पाया गया है कि भारत में प्रत्येक लाख की आबादी पर औसतन 156 पुलिसकर्मी हैं। ऐसे में पुलिस को अपने रोज़मर्रा के काम और क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ संगीन अपराधों की जाँच भी करनी पड़ती है। ऐसे में पुलिस पर दबाव से या तो जाँच पर असर पड़ता है या रोज़मर्रा के कामों पर। सरकार को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए कि पुलिस फ़ोर्स में भर्तियों को प्राथमिकता दी जाए। ऐसा करने से  अपराध रोकने में आसानी होगी। जब भर्तियाँ बढ़ेंगी तो ज़ाहिर सी बात है युवाओं को रोज़गार भी मिलेगा। नई भर्तियों के चलते एक लाख की आबादी पर औसतन 156 पुलिसकर्मियों का आँकड़ा भी बड़ जाएगा। इससे देशवासी खुद को सुरक्षित महसूस कर सकेंगे। साथ ही संगीन मामलों की जाँच के लिए विशेष दस्ते भी बनाए जा सकेंगे, जिनका ध्यान केवल अपराधों की जाँच करने में रहेगा। देश में क़ानून व्यवस्था भी सुधरेगी।