शुक्रवार, 29 नवंबर 2024

जहां चाह वहाँ राह!


बीते कुछ सप्ताह से दिल्ली एनसीआर और उत्तर भारत को प्रदूषण के बादल इस कद्र घेर रखा है कि आम जीवन अस्त-व्यस्त हो चुका है। प्रदूषण की रोकथाम को लेकर सरकार ने कई तरह की पाबंदियाँ लगा दी हैं। इसके चलते एक असमंजस की स्थिति बनी हुई है। लोग इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इन पाबंदियों के चलते कई रोज़गारों पर भी असर पड़ने लगा है। निर्माण कार्य में लगे दिहाड़ी मज़दूर वर्ग इन पाबंदियों के चलते सबसे अधिक पीड़ित हुआ है। तमाम टीवी चैनलों पर प्रदूषण के बिगड़ते स्तर पर काफ़ी बहस हो रही है। परंतु क्या किसी ने हमारे देश में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सही व ठोस कदम उठाने की बात की है? क्या केवल निर्माण कार्यों और वाहनों पर प्रतिबंध से प्रदूषण के स्तर में कमी आएगी? ऐसे अनेकों कारण हैं जिन पर अगर सरकार ध्यान दे तो प्रदूषण में नियंत्रण पाया जा सकता है। 

सबसे पहले बात करें वाहन प्रदूषण की। इस बात पर इसी कॉलम में कई बार लिखा जा चुका है कि एक विशेष आयु या श्रेणी के वाहन को प्रतिबंध करने से क्या प्रदूषण में कमी आएगी? इसका उत्तर हाँ और नहीं दोनों ही है। यदि कोई वाहन, जो कि पुराने माणकों पर चल रहा है और उसके पास वैध पीयूसी प्रमाण पत्र नहीं है तो निश्चित रूप से ऐसे वहाँ को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। परंतु यदि वही वाहन प्रदूषण के तय माणकों की सीमा में पाया जाता है तो उसे प्रतिबंधित करने का क्या औचित्य?


हम और आप जब भी कोई वाहन ख़रीदते हैं तो हम उस वाहन की क़ीमत के साथ-साथ रोड टैक्स, जीएसटी आदि टैक्स भी देते हैं। इन सब टैक्स देने का मतलब हुआ कि यह सब राशि सरकार की जेब में जाएगी और घूम कर जनता के विकास के लिए इस्तेमाल की जाएगी। परंतु रोड टैक्स के नाम पर ली जाने वाली मोटी रक़म क्या वास्तव में जनता पर ख़र्च होती है? क्या हमें अपनी महँगी गाड़ियों को चलाने के लिए साफ़-सुथरी और बेहतरीन सड़कें मिलती हैं? क्या टूटी-फूटी सड़कों की समय-समय पर मरम्मत होती है? क्या देश भर में सड़कों की मरम्मत करने वाली एजेंसियाँ अपना काम पूरी निष्ठा से करतीं हैं? इनमें से अधिकतर सवालों के जवाब आपको नहीं में ही मिलेंगे।

टूटी-फूटी सड़कों पर वाहन अवरोधों के साथ चलने पर मजबूर होते हैं, नतीजा जगह-जगह ट्रैफ़िक जाम हो जाता है। ऐसे जाम में खड़े रहकर आप न सिर्फ़ अपना समय ज़ाया करते हैं बल्कि महँगा ईंधन भी ज़ाया करते हैं। जितनी देर तक जाम लगा रहेगा, आपका वाहन बंपर-टू-बंपर चलेगा और बढ़ते हुए प्रदूषण की आग में घी का काम करेगा। ऐसे में जिन वाहनों को पुराना समझ कर प्रतिबंधित किया जाता है, उनसे कहीं ज़्यादा मात्रा में नये वाहनों द्वारा प्रदूषण होता है। इसलिए लोक निर्माण विभाग या अन्य एजेंसियों की यह ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि वह सड़कों को दुरुस्त रखें जिससे प्रदूषण को बढ़ावा न मिले।


इसके साथ ही ट्रैफ़िक नियंत्रण की समस्या भी एस समस्या है जिससे प्रदूषण को बढ़ावा मिलता है। मिसाल के तौर पर आपको आपके शहर में ऐसे कई चौराहे मिल जाएँगे जहां लाल-बत्ती की अवधि ज़रूरत और ट्रैफ़िक के प्रवाह के अनुसार मेल नहीं खाती। नतीजा, ऐसे चौराहों पर ट्रैफ़िक की लंबी क़तारें। ऐसा नहीं है कि पूरा दिन ही ऐसे चौराहों पर लंबी क़तारें लगती हैं। ज़्यादातर क़तारें पीक हॉर पर लगती हैं। यदि उस समय ट्रैफ़िक पुलिस द्वारा चुनिंदा चौराहों को नियंत्रित किया जाए तो जाम की समस्या पर आसानी से क़ाबू पाया जा सकता है। इसके लिए कुछ मामूली से ही परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। आज गूगल मैप पर आप घर बैठे ही हर गली नुक्कड़ का ट्रैफ़िक देख सकते हैं। यदि हम इसे देख कर अपनी यात्रा को प्लान कर सकते हैं तो ट्रैफ़िक कंट्रोल रूम के अधिकारी, संबंधित इलाक़े के ट्रैफ़िक अधिकारी को इस समस्या के प्रति झकझोर क्यों नहीं सकते?
 
ट्रैफ़िक को नियंत्रित करने के जैसे, ही प्रदूषण के अन्य कारकों पर भी लगाम कसी जा सकती है। ज़रूरत है तो इच्छा शक्ति की। यहाँ आपको याद दिलाना चाहूँगा कि 2010 में जब हमारे देश में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन हुआ था तो दिल्ली में एक ऐसी व्यवस्था बनाई गई थी कि ट्रैफ़िक जाम नहीं होते थे। जगह-जगह पर ट्रैफ़िक पुलिस के सिपाही ट्रैफ़िक पर पैनी नज़र बनाए हुए थे। यानी डंडे के ज़ोर पर व्यवस्था को नियंत्रित किया जा रहा था। यदि एक ट्रैफ़िक की समस्या को डंडे के ज़ोर पर, किसी विशेष इंतज़ाम के लिए नियंत्रित जा सकता है तो आम दिनों में क्यों नहीं?

अब बात करें दीपावली के बाद हर वर्ष होने वाली पराली जलाए जाने की। यह बात जाग-ज़ाहिर है कि पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान हर वर्ष इन्हीं दिनों पराली जलाते हैं। यह समस्या हर वर्ष प्रदूषण का कारण बनती है। हर वर्ष बड़ी-बड़ी बातें और घोषणाएँ की जाती हैं लेकिन इस समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते। यदि कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन हो या कोविड के दौरान लॉकडाउन लागू करना हो, जब इन्हें सख़्ती से लागू किया जा सकता है तो पराली को जलाने से क्यों नहीं रोका जा सकता? ठीक उसी तरह कारख़ानों से निकलने वाले धुएँ को भी नियंत्रित करना असंभव नहीं है। सरकार चाहे तो इस राह में ठोस कदम उठा कर प्रदूषण को नियंत्रण में ला सकती है। केवल नारों, घोषणाओं और प्रतिबंधों से नहीं इच्छा शक्ति से ही नियंत्रित हो सकेगा प्रदूषण। जहां चाह वहाँ राह!            

शुक्रवार, 22 नवंबर 2024

कैसे रुकें राजमार्गों पर हादसे?


जब भी कभी हम विदेशों की सड़कें और राजमार्गों पर फ़र्राटे से दौड़तीं गाड़ियों को देखते हैं तो मन में यही सवाल उठते हैं कि हमारे देश में ऐसे दृश्य कब दिखेंगे। आज़ादी के इतने दशकों बाद भी हमारे देश की सड़कों के हाल बेहाल हैं। राजनैतिक दल सत्ता में आते जाते रहते हैं पर इन बुनियादी सुविधाओं पर किसी भी दल का ध्यान नहीं जाता। लेकिन बीते कुछ वर्षों में सड़कों व राजमार्गों के बनने में तेज़ी अवश्य आई है। वो अलग बात है कि चुनावी घोषणाओं के दबाव में और जल्दबाज़ी में इन सड़कों की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। राजनैतिक दल कोई भी हो राजमार्ग बनाने की जल्दी में किसी ने भी राजमार्गों पर होने वाले हादसों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। जबकि विदेशों में राजमार्गों पर होने वाले हादसों के प्रति वहाँ की सरकारी और नागरिक काफ़ी संवेदनशील हैं।


दो वर्ष पहले जब मशहूर उद्योगपति साइरस मिस्त्री की एक सड़क हादसे में मृत्यु हुई थी तो सड़क नियमों को लेकर काफ़ी चर्चाएँ हुई। इस हादसे के पीछे कई कारण बताए गए, जैसे की तेज गति, हादसे की जगह सड़क का कम चौड़ा होना, आदि। परंतु बुनियादी सवाल यह है कि किसी अमीर व्यक्ति द्वारा चलाई जाने वाली महँगी लक्ज़री कार हो या किसी मामूली ट्रक या बस ड्राइवर द्वारा चलाये जाने वाला साधारण वाहन, क्या वाहन चलाने वाले और परिवहन नियम लागू करने वाले अपने-अपने काम के प्रति ज़िम्मेदार हैं? क्या ये कहना ग़लत नहीं होगा कि हमारे देश में सड़क सुरक्षा और परिवहन के नियम और कानून दोनों ही काफी लचर हैं। यही कारण है कि भारत में सड़क दुर्घटनाएं और देशों की तुलना में काफी ज़्यादा होती हैं? यदि क़ानून की बात करें तो हमारे देश के क़ानून इतने लचर हैं कि सड़क दुर्घटना में यदि किसी की मृत्यु भी हो जाती है तो वाहन चालक को बड़ी आसानी से ज़मानत भी मिल जाती है। ज़्यादातर ट्रक व बस ड्राइवरों को भी इस बात का पता है कि उन्हें कड़ी सज़ा नहीं मिलेगी।

सड़क नियम और क़ानून को सख़्ती से लागू करने की ज़िम्मेदारी केवल ट्रैफ़िक पुलिस की नहीं होनी चाहिए। इनको लागू करने के लिए समय-समय पर जागरूकता अभियान भी चलाए जाने चाहिए। होता यह है कि देश भर में सड़क व यातायात नियमों के लिये केवल साल में एक ही बार ऐसे अभियान चलाए जाते हैं। यदि ऐसे जागरूकता अभियान महीने में एक बार चलाए जाएँ तो ड्राइवरों और आम जनता के बीच जानकारी सही से पहुँचेगी। वे जागरूक होंगे और नियम तोड़ने से पहले कई बार सोचेंगे। इसके साथ ही क़ानून में भी कड़ी सज़ा के प्रावधान होने चाहिए जिससे कि सभी के बीच एक संदेश जाए कि यदि सड़क और यातायात नियमों को अनदेखा किया या उन्हें तोड़ा तो उसका परिणाम महँगा पड़ेगा।

कड़े क़ानून लागू होने की बात करें तो होता यह है कि कई सड़कों पर और राजमार्गों पर कुछ निर्धारित स्थानों पर स्पीड चेक करने वाले कैमरे लगे होते हैं। इनकी जानकारी वहाँ से नियमित रूप से निकालने वाले ड्राइवरों को पहले से ही होती है। इसलिए वे उस जगह पर अपनी गाड़ी को नियंत्रित गति से चलाते हैं। ऐसे में दुर्घटनाएँ टल तो जाती हैं परन्तु जैसे ही वो कैमरे की दृष्टि से दूर होते हैं, वैसे ही गाड़ी के एक्सलेरेटर को ज़ोर से दबा देते हैं। मतलब यह हुआ कि केवल चालान से बचने की नीयत से ही वे गाड़ी को निर्धारित गति से चलाते हैं। जबकि यह तथ्य जगज़ाहिर है कि यदि आप अपनी गाड़ी को नियंत्रित गति से चलाते हैं तो न सिर्फ़ दुर्घटना टलती है बल्कि ईंधन भी कम खर्च होता है।

सरकार और ट्रैफ़िक पुलिस को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि जो कैमरे तेज़ रफ़्तार से चलने वाली गाड़ियों का चालान करते हैं, उनसे अधिक काम भी लिया जा सकता है। स्पीड कैमरे की तकनीक की बात करें तो उसमें लगे रेडार से एक सिग्नल जाता है जो केवल तेज़ रफ़्तार से चलने वाली गाड़ी की ही फ़ोटो खींचते हैं। यदि इसी तकनीक में थोड़ा सा सुधार किया जाए तो वही कैमरा कई ट्रैफ़िक उल्लंघनों की फ़ोटो भी खींच सकता है। जैसे कि यदि कोई वाहन चालक भले ही नियंत्रित गति से चल रहा हो, पर यदि उसने सीट बेल्ट नहीं लगाई तो उसका भी चालान होना चाहिए। यदि वो वाहन चलाते समय फ़ोन पर बात कर रहा है तो उसका भी चालान होना चाहिए। क्या उस वाहन की नंबर प्लेट सही ढंग से लिखी है या नहीं? क्या रात के समय में उसकी दोनों हेडलाइट जल रही हैं या नहीं? क्या उस गाड़ी में काले शीशे लगे हैं या नहीं, आदि।

ये सब बातें मैं इसलिए कह रहा हूँ कि जब आज से कुछ वर्ष पहले मैं लन्दन की यात्रा पर था तो वहाँ मेरे स्थानीय मित्र ने गाड़ी को राजमार्ग पर लाने से पहले चश्मा लगा लिया। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि, “मेरी गाड़ी और ड्राइविंग लाइसेंस पर जो फ़ोटो लगी है उसमें मैंने मामूली नंबर का नज़र का चश्मा पहना हुआ है। यदि मैं बिना चश्मे के गाड़ी चलाऊँगा तो मेरा चालान हो जाएगा।” उनका मतलब यह था कि जगह-जगह लगे कैमरे हर पहलू को पकड़ लेते हैं। आज के सूचना प्रौद्योगिकी के युग में एक से बढ़कर एक गुणवत्ता वाले कैमरे उपलब्ध हैं जो इन सभी पहलुओं को पकड़ सकते हैं। ज़रूरत केवल सही सोच और पहल करने की इच्छा की है। देखना यह है कि हमारे देश में ऐसे बदलाव कब होंगे? केवल चुनावी घोषणाओं के चलते नये-नये राजमार्ग खोलने से कुछ नहीं होगा। विकास और परिवर्तन तब होगा जब इन राजमार्गों और सड़कों की गुणवत्ता भी सही हो और जनता द्वारा सड़कों पर नियमों का पालन भी हो। सड़क और यातायात  नियमों को सख़्ती से लागू भी किया जाए। शायद तभी हमारे देश में सड़क दुर्घटनाओं में कमी आए। 

शुक्रवार, 15 नवंबर 2024

वायु प्रदूषण: सही कारण का हल ही करेगा नियंत्रण


दीपावली के आस-पास हर साल दिल्ली में वायु प्रदूषण के आँकड़े बढ़ने लग जाते हैं। इस समस्या को हम कई सालों से सुनते आ रहे हैं। एक से एक सनसनीखेज वैज्ञानिक रिपोर्टो की बातों को हमें भूलना नहीं चाहिए। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि दिल्ली से निकलने वाले गंदे कचरे, कूड़ा करकट को ठिकाने लगाने का पुख्ता इंतजाम अभी तक नहीं हो पाया। सरकार यही सोचने में लगी है कि यह पूरा का पूरा कूड़ा कहां फिंकवाया जाए या इस कूड़े का निस्तार यानी ठोस कचरा प्रबंधन कैसे किया जाए? जाहिर है इस गुत्थी को सुलझाए बगैर जलाए जाने लायक कूड़े को चोरी छुपे जलाने के अलावा और क्या चारा बचता होगा? इस गैरकानूनी हरकत से उपजे धुंए और जहरीली गैसों की मात्रा कितनी है जिसका कोई हिसाब किसी भी स्तर पर नहीं लगाया जा रहा है। इन सबके चलते आम नागरिकों पर सरकार द्वारा लगाए जा रहे प्रतिबंधों से असुविधा हो रही है। परंतु सरकार या उसकी प्रदूषण नियंत्रण करने वाली एजेंसियाँ असल कारण तक नहीं पहुँच पा रहीं।

पिछले दिनों हमारे पड़ौसी देश पाकिस्तान से एक ऐसी खबर आई जिसने काफ़ी चिंता जताई। पाकिस्तान के लाहौर शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) ने 2000 का आँकड़ा छू लिया। इसके चलते वहाँ के प्रशासन ने जनता की भलाई के लिए कई तरह के प्रतबंध लगाने शुरू कर दिये। परंतु पक्सितान ने बढ़ते प्रदूषण के लिए भारत को ज़िम्मेदार ठहराया। पराली जलाए जाने की समस्या हर वर्ष प्रदूषण का कारण बनती है। हर वर्ष बड़ी-बड़ी बातें और घोषणाएँ की जाती हैं लेकिन इस समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी वायु प्रदूषण के आँकड़े चिंताजनक स्थिति तक पहुँच गये हैं। दिल्ली सरकार द्वारा कभी भी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।


इनमें निर्माण कार्य पर रोक लगाना। भवन के तोड़-फोड़ पर रोक लगाना। पुराने डीज़ल और पेट्रोल वाहनों पर रोक लगाना। कूड़े को जलाने पर रोक लगाना आदि। निर्माण कार्यों पर रोक लगाना तो समझ में आता है। परंतु जिन पुराने वाहनों पर रोक लगता है उससे सरकार को क्या हासिल होता है, यह समझ नहीं आता। उदाहरण के तौर पर यदि आपका वाहन दस साल से अधिक पुराना नहीं है और उसमें एक वैध पीयूसी सर्टिफिकेट तो आपका वाहन प्रदूषण के तय माणकों की सीमा में ही हुआ। यानी आपका वाहन अनियंत्रित प्रदूषण नहीं कर रहा। इसके बावजूद अपनी गाड़ियों में नियमित ‘पीयूसी’ जाँच करवाने वालों को प्रतिबंध के चलते वाहन सड़क पर लाने की इजाज़त नहीं दी जाती। क्या ऐसा करना उचित है?     


जब भी कभी कोई उपभोक्ता एक-एक पाई जोड़ कर अपने सपनों का वाहन ख़रीदता है तो उसे उसकी की क़ीमत के साथ-साथ रोड टैक्स, जीएसटी आदि टैक्स भी देने पड़ते हैं। इन सब टैक्सों का मतलब है कि यह सब राशि सरकार की जेब में जाएगी और घूम कर जनता के विकास के लिए इस्तेमाल की जाएगी। परंतु रोड टैक्स के नाम पर ली जाने वाली मोटी रक़म क्या वास्तव में जनता पर ख़र्च होती है? क्या हमें अपनी महँगी गाड़ियों को चलाने के लिए साफ़-सुथरी और बेहतरीन सड़कें मिलती हैं? क्या टूटी-फूटी सड़कों की समय से मरम्मत होती है? क्या देश भर में सड़कों की मरम्मत करने वाली एजेंसियाँ अपना काम पूरी निष्ठा से करतीं हैं? इनमें से अधिकतर सवालों के जवाब आपको नहीं में ही मिलेंगे।

टूटी-फूटी सड़कों पर वाहन अवरोधों के साथ चलने पर मजबूर होते हैं, नतीजा जगह-जगह ट्रैफ़िक जाम हो जाता है। ऐसे जाम में खड़े रहकर आप न सिर्फ़ अपना समय ज़ाया करते हैं बल्कि महँगा ईंधन भी ज़ाया करते हैं। जितनी देर तक जाम लगा रहेगा, आपका वाहन बंपर-टू-बंपर चलेगा और बढ़ते हुए प्रदूषण की आग में घी का काम करेगा। ऐसे में जिन वाहनों को पुराना समझ कर प्रतिबंधित किया जाता है, उनसे कहीं ज़्यादा मात्रा में नये वाहनों द्वारा प्रदूषण होता है। इसलिए लोक निर्माण विभाग या अन्य एजेंसियों की यह ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि वह सड़कों को दुरुस्त रखें जिससे प्रदूषण को बढ़ावा न मिले।

यहाँ एक सवाल यह भी उठता है कि सरकार द्वारा वाहनों प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित रखने की दृष्टि से कई नियम लागू किए गए हैं। इनमें से अहम है कि दस साल पुराने डीज़ल और पंद्रह वर्ष से अधिक पुराने पेट्रोल वाहनों को महानगरों की सड़कों पर चलने की अनुमति न देना। इसके साथ ही जिन-जिन वाहनों को चलने की अनुमति है उन सभी वाहनों में वैध प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र यानी ‘पीयूसी’ होना अनिवार्य भी है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि यदि आपके वाहन में एक वैध प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र है तो आपका वाहन तय माणकों से अधिक प्रदूषण नहीं कर रहा और तभी आपके वाहन को सड़क पर आने की अनुमति है।

हर वर्ष नवम्बर के महीने में दिल्ली सरकार अपने आदेश के तहत बिना वैध प्रदूषण प्रमाण पत्र के चलने वाले वाहनों पर 10,000 का मोटा जुर्माना लगाने के आदेश जारी कर देती है। इनका पालन भी सख़्ती से होता हुआ दिखाई देता है। दिल्ली की सड़कों पर परिवहन विभाग व ट्रैफ़िक पुलिस के अधिकारी इसे सख़्ती से लागू करते हुए भी नज़र आते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ, नेता और संबंधित सरकारी विभागों के अफसर हर साल की तरह इस साल भी इस समस्या को लेकर सिर खपा रहे हैं। उन्होंने अब तक के अपने सोच विचार का नतीजा यह बताया है कि खेतों में फसल कटने के बाद जो ठूंठ बचते हैं उन्हें खेत में जलाए जाने के कारण ये धुंआ बना है जो एनसीआर के उपर छा गया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि यह तो हर साल ही होता है तो नए जवाबों की तलाश क्यों हो रही है? सरकार को प्रदूषण की समस्या से छुटकारा पाना है तो उसे इसके असल कारणों पर वार करना होगा तभी हमारा पर्यावरण स्वच्छ हो पाएगा।

शनिवार, 9 नवंबर 2024

चुनाव आयोग के फ़ैसले निष्पक्ष दिखाई दें!


2024 के लोकसभा चुनावों के बाद होने वाले कई विधान सभा के चुनावों में केंद्रीय चुनाव आयोग की भूमिका पर कई सवाल उठे हैं। परंतु चुनाव आयोग अपने फ़ैसलों को बदलना तो दूर, अपनी प्रतिक्रिया भी नहीं दी। विवादों में घिरी ‘ईवीएम’ हो या चुनावों के बाद पड़ने वाले मतों की संख्या, चुनाव आयोग हमेशा ही चर्चा में रहा। परंतु हाल ही में चुनाव आयोग ने आने वाले विधान सभा के चुनावों में कुछ ऐसे निर्णय लिये जिन्हें कड़ी निंदा का सामना करना पड़ा। ऐसे में यह देखना ज़रूरी है कि केंद्रीय चुनाव आयोग जिसकी कार्यशैली पर कई सवाल उठे, वह इन चुनाव के चलते लिए गये विवादित निर्णयों को कैसे सार्थक करेगा?

देश का आम चुनाव हो या विधान सभा के चुनाव, मतदाता इसे हमेशा से ही एक पर्व की तरह मनाता है। इसमें हर राजनैतिक दल अपने अपने वोटरों के पास अगले पाँच साल के लिए उनके मत की अपेक्षा में उन्हें बड़े-बड़े वादे देकर लुभाने की कोशिश करते हैं। परंतु देश की जनता भी यह जान चुकी है कि दल चाहे कोई भी हो, राजनैतिक वादे सभी दल ऐसे करते हैं कि मानो जनता उनके लिए पूजनीय है और ये नेता उनके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। परंतु क्या वास्तव में ऐसा होता है कि चुनावी वादे पूरे किए जाते हैं? क्यों नेताओं को केवल चुनावों के समय ही जनता की याद आती है? इन वादों को लेकर भी कई राजनैतिक दल अपने-अपने नेताओं को चेतावनी दे रहे हैं कि वे वही वादे करें जो पूरे किए जा सकते हैं। ख़ैर ये तो रही नेताओं की बात। आज जिस मुद्दे पर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जा रहा है वो है चुनावों में पारदर्शिता।


सरकार चाहे किसी भी दल की क्यों न बने। चुनावों का आयोजन करने वाली सर्वोच्च संविधानिक संस्था केंद्रीय चुनाव आयोग इन चुनावों को कितनी पारदर्शिता से कराती है इसकी बात बीते कई महीनों से सभी कर रहे हैं। चुनाव आयोग की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि हर दल को पूरा मौक़ा दिया जाए और निर्णय देश की जनता के हाथों में छोड़ दिया जाए। बीते कुछ महीनों में चुनाव आयोग पर, पहले ईवीएम को लेकर और फिर वीवीपैट को लेकर काफ़ी विवाद रहा। हर विपक्षी दल ने एक सुर में यह आवाज़ लगाई कि देश से ईवीएम को हटा कर बैलट पेपर पर ही चुनाव कराया जाए। परंतु देश की शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश देते हुए अधिक सावधानी बरतने को कहा और ईवीएम को जारी रखा।

ताज़ा मामला चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित तारीख़ों को बदलने को लेकर हुआ। चुनाव आयोग ने यूपी, पंजाब और केरल की विधानसभा सीटों के उपचुनाव के लिए तारीख़ों को बदलने का निर्णय लिया है। ग़ौरतलब है कि तारीख़ बदलने का काम पहली बार नहीं हुआ है, बल्कि एक ही साल में तीन बार ऐसा निर्णय लिया गया है। एक बार मतगणना की तारीख़ बदली गई तो दो बार मतदान की तारीख़ बदली गई। तारीख़ बदलने से मतदान और परिणामों पर क्या असर पड़ेगा यह तो एक अलग विषय है। परंतु चुनाव की तारीख़ घोषित करने के बाद उसे बदलना, मतदाता के मन में कई तरह के सवाल उठाता है।

केंद्रीय चुनाव आयोग एक बहुत बड़ी संस्था है जिसका एकमात्र लक्ष्य देश में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराना है। जब भी चुनावों की तारीख़ें घोषित की जाती हैं तो उसके पीछे एक कड़ा अभ्यास होता है। जैसे कि चुनाव की तारीख़ पर स्कूल के इम्तिहान न हों। यदि ऐसा होता है तो मतदान के लिए स्कूल उपलब्ध नहीं हो सकते। न ही इन तारीख़ों पर चुनाव ड्यूटी के लिए अध्यापक व अन्य स्कूली स्टाफ़ उपलब्ध हो सकता है। जिन तारीख़ों पर चुनाव होने हैं उन दिनों में कोई त्योहार या पर्व न आते हों। ऐसा होने से भी मतदान की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। चुनाव की तारीख़ों को तय करने से पहले ऐसे कई पहलू होते हैं जिनका संज्ञान लिया जाता है।     

यदि चुनाव आयोग एक बार मतदान की तारीख़ों की घोषणा कर देता है तो उसमें बदलाव की गुंजाइश केवल अप्रिय घटनाओं के चलते ही हो सकती है। यदि फिर भी चुनाव आयोग घोषणा के बाद तारीख़ों में बदलाव करता है तो इसका मतलब यह हुआ कि चुनाव आयोग तारीखों की घोषणा से पहले इन सब बातों पर समग्रता से विचार नहीं हुआ। इसके अलावा क्या राज्यों के निर्वाचन अधिकारी केंद्रीय चुनाव आयोग को क्षेत्र की धार्मिक सांस्कृतिक परंपरा की सही जानकारी नहीं देते? यदि त्योहारों की बात करें तो किसी भी धर्म का कोई भी ऐसा पर्व नहीं है, जिसकी तिथि पहले से तय नहीं होती। तो क्या चुनाव आयोग सभी धर्मों के धार्मिक व सांस्कृतिक कैलेंडर या पंचांग का संज्ञान नहीं लेता? क्या पर्वों की महत्ता का आकलन आयोग अपने मन से करता है? यह एक तथ्य है कि चुनाव आयोग चुनाव घोषित करने से पहले हर राजनैतिक दल से चर्चा अवश्य करता है। क्या उस चर्चा में यह विषय नहीं उठाए जाते? यदि किसी राजनैतिक दल ने चुनाव की तारीख़ों को लेकर आपत्ति जताई तो उस पर चुनाव आयोग ने देर से निर्णय क्यों लिया?

जिस तरह केंद्रीय चुनाव आयोग इवीएम और वीवीपैट को लेकर पहले से ही विवादों में घिरा हुआ है, उसे चुनावों में पारदर्शिता का न केवल दावा करना चाहिए बल्कि पारदर्शी दिखाई भी देना चाहिए। इसलिए चुनाव आयोग को इन सवालों को गंभीरता से लेना चाहिए और ख़ुद को संदेह से दूर रखने का प्रयास करना चाहिए। एक स्वस्थ लोकतंत्र मज़बूती के लिए निष्पक्ष व पारदर्शी चुनाव और चुनावी प्रक्रिया का होना ही समय की माँग है।