शुक्रवार, 30 मई 2025

धोखेबाज़ कंपनियों से ग्राहक परेशान

भारत का ‘कैब’ उद्योग, जो कुछ वर्षों पहले तक तकनीकी नवाचार और सुविधा का प्रतीक माना जाता था, आज गंभीर विवादों और वित्तीय अनियमितताओं के कारण चर्चा में है। ब्लूस्मार्ट और ओला जैसी प्रमुख कंपनियों पर लगे धोखाधड़ी और कर चोरी के आरोपों ने न केवल उनके कारोबारी मॉडल पर सवाल उठाए हैं, बल्कि लाखों ग्राहकों के बीच अविश्वास और निराशा की भावना भी पैदा की है। ऐसी कंपनियां, जो कभी शहरी गतिशीलता का पर्याय थीं, अब अपने ग्राहकों को ठगा हुआ महसूस करा रही हैं।

ब्लूस्मार्ट, जो 2019 में एक इलेक्ट्रिक वाहन-आधारित कैब सेवा के रूप में शुरू हुई थी, ने अपनी पर्यावरण-अनुकूल नीतियों और ग्राहक-केंद्रित दृष्टिकोण के कारण तेजी से लोकप्रियता हासिल की थी। दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु और मुंबई जैसे शहरों में इसकी सेवाएं शुरू होने के बाद, कंपनी ने कई बड़े निवेशकों से भारी फंडिंग प्राप्त की। हालांकि, अप्रैल 2025 में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा किए गए खुलासे ने ब्लूस्मार्ट की मूल कंपनी जेनसोल इंजीनियरिंग की वित्तीय प्रथाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए।

सेबी ने पाया कि जेनसोल के प्रमोटरों, अनमोल सिंह जग्गी और पुनीत सिंह जग्गी ने कंपनी को दिए गए 977.75 करोड़ रुपये के ऋण का दुरुपयोग किया। यह राशि, जो इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद और बेड़े के विस्तार के लिए थी, कथित तौर पर आलीशान फ्लैट, गोल्फ किट, और अन्य व्यक्तिगत खर्चों पर खर्च की गई। सेबी की जांच के अनुसार, कंपनी ने केवल 4,704 वाहन खरीदे, जबकि 6,400 वाहनों का वादा किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप 262.13 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितता सामने आई। इस घोटाले का सबसे बड़ा झटका ब्लूस्मार्ट की अचानक सेवा बंदी के रूप में सामने आया, जिसने अप्रैल 2025 में इसके संचालन को ठप कर दिया।


इस बंदी का असर हजारों ड्राइवरों, लाखों ग्राहकों व इनसे जुड़े कई लोगों पर पड़ा। ड्राइवरों को बिना किसी पूर्व सूचना के बेरोजगार छोड़ दिया गया। जबकि ग्राहकों के वॉलेट में जमा राशि, जो लाखों रुपये में थी, फंस गई। कंपनी ने घोषणा की कि यदि 90 दिनों के भीतर सेवाएं बहाल नहीं हुईं, तो रिफंड शुरू किया जाएगा। हालांकि, इस अनिश्चितता ने ग्राहकों में भारी असंतोष पैदा किया। दिल्ली के एक नियमित ग्राहक के अनुसार उन्होंने ब्लूस्मार्ट की सुविधा और पर्यावरण-अनुकूल सेवाओं की हमेशा प्रशंसा की थी, लेकिन अब उनके वॉलेट में 4,500 रुपये फंसे हुए हैं और उन्हें रिफंड की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल रही है।

दूसरी ओर, ओला कैब्स, जो भारत के कैब बाजार में अग्रणी रही है, भी हाल के वर्षों में कई विवादों में उलझी हुई है। हाल ही में, कंपनी पर कर चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगे हैं। आयकर विभाग की एक जांच में पता चला कि ओला ने अपने ड्राइवरों के भुगतान और किराए की राशि पर टैक्स की गणना में अनियमितताएं बरतीं। इसके अलावा, कंपनी पर आरोप है कि उसने अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से फंड को गलत तरीके से स्थानांतरित किया, ताकि कर देनदारियों को कम किया जा सके।

गौरतलब है कि ओला कैब्स की मूल कंपनी एएनआई टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड ने भारत में एक अग्रणी इलेक्ट्रिक स्कूटर निर्माता कंपनी ‘ओला इलेक्ट्रिक’ शुरू की। परंतु हाल के वर्षों में अपने ग्राहकों व आपूर्तिकर्ताओं के साथ वित्तीय अनियमितताओं के कारण चर्चा में रही है। ओला ने अपने सप्लायरों और लॉजिस्टिक्स पार्टनर्स को समय पर भुगतान करने में देरी की, जिसके परिणामस्वरूप कई प्रमुख सप्लायरों ने कंपनी के साथ संबंध तोड़ लिए। बीबीसी की एक रिपोर्ट में पूर्व कर्मचारियों और उद्योग सूत्रों ने खुलासा किया कि भुगतान में देरी के कारण सप्लायरों के बीच असंतोष बढ़ा। एक सप्लायर ने तो ओला के खिलाफ दिवालियापन की याचिका भी दायर की, जिसे बाद में कंपनी ने सुलझाने का दावा किया।

इसके अलावा, ओला की लागत कम करने की रणनीति, जैसे कि वाहन पंजीकरण एजेंसियों के साथ अनुबंधों की पुन: बातचीत, ने बिक्री और पंजीकरण के आंकड़ों में भारी विसंगति पैदा की। फरवरी 2025 में, ओला ने 25,000 स्कूटर बेचने का दावा किया, लेकिन वाहन पोर्टल पर केवल 8,390 पंजीकृत हुए। इन वित्तीय और परिचालन चुनौतियों ने ओला की बाजार हिस्सेदारी को प्रभावित किया, जो सितंबर 2024 में 27% तक गिर गई।

ब्लूस्मार्ट और ओला से जुड़े इन विवादों ने ऐसे उद्योगों में ग्राहकों का विश्वास कमजोर किया है। ये कंपनियां, जो कभी सुविधा और नवाचार का प्रतीक थीं, अब वित्तीय कुप्रबंधन और अनैतिक प्रथाओं के लिए जानी जा रही हैं। ग्राहकों के बीच यह धारणा बढ़ रही है कि उनके पैसे का उपयोग न केवल उनकी सेवा में, बल्कि प्रमोटरों के व्यक्तिगत लाभ के लिए भी किया जा रहा है।

इन घोटालों से भारत में ऐसे उद्योगों के लिए सख्त नियामक ढांचे की आवश्यकता को उजागर किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करने और ग्राहकों व इनसे जुड़े अन्य लोगों के हितों की रक्षा के लिए कड़े नियम लागू करने चाहिए। आयकर विभाग और सेबी जैसे नियामक निकायों को ऐसी कंपनियों की निगरानी बढ़ानी चाहिए, जो बड़े पैमाने पर फंडिंग जुटाती हैं और लाखों ग्राहकों की निर्भरता का हिस्सा हैं।

इसके साथ ही, उपभोक्ता संरक्षण कानूनों को और सशक्त करने की आवश्यकता है, ताकि ग्राहकों को रिफंड और मुआवजे के लिए लंबी कानूनी प्रक्रियाओं से न गुजरना पड़े। इस स्थिति को सुधारने के लिए, कंपनियों को अपनी वित्तीय प्रथाओं में पारदर्शिता लानी होगी और नियामक निकायों को कड़े कदम उठाने होंगे। जब तक ऐसा नहीं होता, ग्राहकों और ऐसी कंपनियों से जुड़े अन्य लोगों का विश्वास जीतना इन कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 23 मई 2025

इस्कॉन के हुए दो फाड़: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला


16 मई 2025 को देश की सर्वोच्च अदालत ने एक 25 साल पुराने विवाद पर अंतिम फैसला सुनाया, जिसमें इस्कॉन बेंगलुरु को बेंगलुरु के प्रसिद्ध हरे कृष्ण मंदिर का स्वामित्व प्रदान किया गया। जबकि इस्कॉन मुंबई के इस संपत्ति पर दावे को ख़ारिज कर दिया गया। इस ऐतिहासिक जीत पर इस्कॉन बेंगलुरु के अध्यक्ष और अक्षय पात्र फाउंडेशन के संस्थापक, मधु पंडित दास ने कहा कि, यह विवाद संपत्तियों के स्वामित्व का नहीं था, बल्कि हमारा संघर्ष उन स्व-घोषित गुरुओं के खिलाफ था, जिन्होंने श्रील प्रभुपाद की इच्छा का उल्लंघन किया और प्रभुपाद के लिखित आदेश के विरुद्ध ख़ुद को आध्यात्मिक गुरु घोषित कर दिया। पहले वे ‘ज़ोनल आचार्य’ बने फिर संस्था में पनपे विरोध के दबाव में उन्होंने दर्जनों गुरु बना डाले। इससे इस्कॉन का बहुत पतन हुआ। आज यह फैसला उन हजारों भक्तों की जीत है जो श्रील प्रभुपाद को ही इस्कॉन का एकमात्र आचार्य मानते हैं। हम अपनी सारी संपत्तियां इस्कॉन मुंबई के हवाले करने को पहले दिन से तत्पर रहे हैं। हमारी केवल एक ही शर्त है कि इस्कॉन में केवल प्रभुपाद ही आचार्य माने जाएँ बाक़ी उनके आदेशानुसार ‘ऋत्विक’ की भूमिका निभाएँ।


1966 में न्यूयॉर्क में एक गौड़ीय वैष्णव संत श्रील प्रभुपाद द्वारा ‘इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस’ (इस्कॉन), की स्थापना की गई थी। जिसे आज पूरा विश्व ‘हरे कृष्ण आंदोलन’ के नाम से जानता है। इस्कॉन ने विश्व भर में भगवान कृष्ण की भक्ति और वैदिक संस्कृति को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।


श्रील प्रभुपाद ने 9 जुलाई 1977 को एक लिखित निर्देश जारी किया था, जिसमें उन्होंने दीक्षा (शिष्य दीक्षा) के लिए एक ‘ऋत्विक’ प्रणाली की स्थापना की थी। इसके तहत, उनके द्वारा नियुक्त 11 वरिष्ठ शिष्य (‘ऋत्विक’) नए भक्तों को दीक्षा देने के लिए उनके प्रतिनिधि के रूप में कार्य करेंगे और सभी भावी भक्त केवल श्रील प्रभुपाद के ही शिष्य होंगे। श्रील प्रभुपाद ने स्पष्ट किया था कि वे इस्कॉन के एकमात्र आचार्य बने रहेंगे और उनके बाद कोई भी शिष्य स्वयं को आचार्य या गुरु घोषित नहीं करेगा।

1977 में वृन्दावन में श्रील प्रभुपाद की महासमाधि के बाद, उनके कुछ वरिष्ठ शिष्यों (मुख्य रूप से पश्चिमी) ने उनके निर्देशों की अवहेलना की और स्वयं को उत्तराधिकारी आचार्य घोषित कर लिया। उन्होंने स्वयं दीक्षा देना शुरू किया, भव्य जीवनशैली अपनाई और अपने लिए सम्मानजनक उपाधियाँ और गीत रचवाए, जो श्रील प्रभुपाद की सादगीपूर्ण जीवनशैली के विपरीत था। इस स्व-घोषित गुरु प्रणाली का विरोध करने वाले भक्तों को उत्पीड़न, मंदिरों से निष्कासन, और यहाँ तक कि हिंसा का सामना करना पड़ा। एक चरम मामले में, वर्जीनिया में एक भक्त सुलोचना दास की 1984 में हत्या कर दी गई। अंग्रेज़ी में छपी एक पुस्तक, ‘मंकी ऑन द स्टिक’ में इस हत्या में शामिल इस्कॉन के आज कुछ मशहूर नेतृत्व की ओर खुल कर लिखा गया है।  

नवंबर 1998 में, इस्कॉन बेंगलुरु में देश-विदेश के अनेक वरिष्ठ भक्त जमा हुए और उन्होंने ‘इस्कॉन रिफार्म मूवमेंट’ की स्थापना की। जिसका लक्ष्य स्व-घोषित गुरु प्रणाली का विरोध करना था। इस समूह ने श्रील प्रभुपाद को इस्कॉन का एकमात्र आचार्य मानने और ‘ऋत्विक’ प्रणाली का पालन करने का संकल्प लिया। इस रुख के कारण, इस्कॉन मुंबई, जो स्व-घोषित गुरुओं द्वारा नियंत्रित थी, ने इस्कॉन बेंगलुरु के भक्तों को संगठन से निष्कासित करने और उनके मंदिर पर नियंत्रण करने का असफल प्रयास किया। बाद में ‘इस्कॉन रिफार्म मूवमेंट’ की बैठकें कुआलालम्पुर और फ्लोरिडा जैसे शहरों में भी हुई।

बेंगलुरु और मुंबई केंद्रों के बीच संपत्ति विवाद की शुरुआत 2000 में हुई, जब इस्कॉन मुंबई ने बेंगलुरु के हरे कृष्ण हिल मंदिर पर नियंत्रण का कानूनी दावा किया। इस्कॉन बेंगलुरु 1978 में कर्नाटक सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत एक स्वतंत्र संस्था के रूप में पंजीकृत थी, जबकि इस्कॉन मुंबई 1860 के सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट और 1950 के बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के तहत पंजीकृत थी। इस्कॉन मुंबई ने दावा किया कि बेंगलुरु केंद्र केवल उनकी शाखा है और मंदिर की संपत्ति पर उनका अधिकार है।

इस्कॉन की गुरु प्रणाली संगठन के इतिहास में एक विवादास्पद मुद्दा रही है। परंपरागत रूप से, गौड़ीय वैष्णव परंपरा में गुरु को परम आध्यात्मिक अधिकार प्राप्त होता है, जो शास्त्रों और पूर्ववर्ती आचार्यों के अनुसार शिक्षण देता है। भविष्य में अनाधिकृत और अयोग्य लोग स्वयं को गुरु बता कर इस्कॉन के भक्तों को गुमराह न कर सकें इसलिए श्रील प्रभुपाद ने इस्कॉन में ‘ऋत्विक’ प्रणाली लागू की थी ताकि उनकी मृत्यु के बाद भी वे एकमात्र दीक्षा गुरु बने रहें।

1977 के बाद, इस्कॉन की गवर्निंग बॉडी कमीशन (जीबीसी) ने नई गुरु प्रणाली शुरू की, जिसमें वरिष्ठ भक्तों को ‘दीक्षा गुरु’ नियुक्त किया गया। यह प्रणाली ईसाइयों के वेटिकन मॉडल की तरह सहमति और मतदान पर आधारित थी, जिसे उन्होंने ‘लोकतांत्रिक’ कहा। जबकि भारत की सनातन परंपरा में गुरु का पद भगवान के समान माना जाता है और ऐसा पद प्राप्त करने के लिए गहरी साधना और उस संप्रदाय की परंपरा के आचार्य का आदेश सर्वोपरि होता है। अपना प्रचार करके चुनाव में ज़्यादा वोट पा कर गुरु बनना सनातन धर्म के मूल सिद्धांत का भद्दा मज़ाक है। इस्कॉन के लाखों भक्तों को इस तथ्य का पता नहीं है इसलिए वे जीबीसी में होने वाले आंतरिक चुनाव को जीतने वाले लोगों को ही अपना गुरु माने बैठे हैं। उल्लेखनीय है कि इस्कॉन जीबीसी द्वारा बनाए गए ऐसे दर्जनों गुरुओं का पिछले वर्षों में नैतिक पतन हो चुका है और वे संन्यास लेने के बाद फिर से गृहस्थ बन गए हैं। ये भी सन्यास प्रणाली का विद्रूप स्वरूप है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस्कॉन बेंगलुरु के लिए केवल एक कानूनी जीत नहीं है, बल्कि यह श्रील प्रभुपाद की रित्विक प्रणाली और उनकी आध्यात्मिक विरासत को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 16 मई 2025

दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों में हो रही मनमानी!


जो विद्यालय ज्ञान प्राप्त करने का केन्द्र होते थे आज व्यापारिक दुकान बन कर रह गए हैं। 2025 में, दिल्ली के कई प्रमुख प्राइवेट स्कूलों ने बिना उचित अनुमति के फीस में भारी वृद्धि की, जिसके परिणामस्वरूप अभिभावकों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए। एक सर्वेक्षण के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में भारत भर में 44% अभिभावकों ने स्कूल फीस में 50 से 80% तक की वृद्धि की शिकायत की, जबकि 8% ने इसे 80% से अधिक बताया। दिल्ली में, कुछ स्कूलों ने 2020 से 2025 तक 7% से 45% तक की वृद्धि की, जिससे वार्षिक फीस 1.4 लाख रुपये तक पहुंच गई। दिल्ली के निजी स्कूलों में फीस वृद्धि की समस्या ने अभिभावकों, छात्रों और नीति निर्माताओं के बीच गंभीर चिंता का विषय बन गया है। स्कूलों का यह रवैया न केवल आर्थिक बोझ को बढ़ाता है, बल्कि शिक्षा की पहुंच और गुणवत्ता पर भी सवाल उठाता है।


यह वृद्धि विशेष रूप से उन स्कूलों में देखी गई जो दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) द्वारा रियायती दरों पर दी गई जमीन पर संचालित होते हैं। इन स्कूलों को गैर-लाभकारी मॉडल पर काम करना चाहिए, लेकिन कई स्कूलों ने इस नियम का उल्लंघन किया। अप्रैल 2024 में दिल्ली उच्च न्यायालय के एक अंतरिम आदेश ने शिक्षा निदेशालय (डीओई) के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें इन स्कूलों को फीस वृद्धि के लिए पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता थी। इस फैसले ने स्कूलों को मनमानी वृद्धि के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे अभिभावकों का गुस्सा भड़क उठा।

स्कूल प्रशासन अक्सर फीस वृद्धि को उचित ठहराने के लिए परिचालन घाटे, शिक्षकों के वेतन, बुनियादी ढांचे के उन्नयन और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के छात्रों के लिए सरकारी प्रतिपूर्ति में देरी का हवाला देता है। हालांकि अभिभावक और कार्यकर्ता इस तर्क को पारदर्शिता की कमी के कारण खारिज करते हैं। दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम और नियम (डीएसईएआर), 1973 के तहत सरकारी जमीन पर संचालित स्कूलों को फीस वृद्धि के लिए डीओई से अनुमति लेनी होती है। हालांकि कई स्कूलों ने उच्च न्यायालय के आदेशों का लाभ उठाकर इस आवश्यकता को दरकिनार किया। इसके अलावा डीओई की ओर से स्कूलों के वित्तीय रिकॉर्ड की नियमित जांच में देरी और लापरवाही ने समस्या को और जटिल किया। फीस वृद्धि का मुद्दा राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है। आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी एक-दूसरे पर निष्क्रियता और निजी स्कूलों के साथ सांठगांठ का आरोप लगाते हैं।

फीस वृद्धि का सबसे गहरा प्रभाव मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग के परिवारों पर पड़ा है। दिल्ली के एक अभिभावक के अनुसार उसकी दो बेटियों की स्कूल फीस हर महीने 34,000 रुपये है, जो उसकी मासिक आय का लगभग आधा हिस्सा है। इस तरह की वृद्धि ने ज़्यादातर परिवारों को वित्तीय तनाव में डाल दिया है। इसके अलावा, स्कूलों ने उन छात्रों को परेशान करना शुरू कर दिया, जिनके अभिभावकों ने बढ़ी हुई फीस का भुगतान करने से इनकार किया। कुछ स्कूलों में तो बच्चों को लाइब्रेरी में अलग-थलग कर दिया गया। कैंटीन तक पहुंच से वंचित कर दिया गया और सहपाठियों के साथ बातचीत करने से भी रोका गया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इसे “अमानवीय और शर्मनाक” करार दिया और स्कूलों को शिक्षा को “पैसे कमाने की मशीन” के रूप में उपयोग करने के लिए स्कूल संचालकों को फटकार भी लगाई। इस तरह की हरकतों का बच्चों पर भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है।

अप्रैल 2025 में, दिल्ली की नई मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने फीस वृद्धि की शिकायतों की जांच के लिए 600 से अधिक स्कूलों का ऑडिट शुरू किया और 11 स्कूलों को कारण बताओ नोटिस जारी किया। सरकार ने डीओई के तहत जिला-स्तरीय समितियों का गठन किया, जिन्हें उप-मंडल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) के नेतृत्व में स्कूलों की जांच करने और 18-सूत्रीय प्रश्नावली के आधार पर अनुपालन की जांच करने का निर्देश दिया गया।

इसके अलावा दिल्ली कैबिनेट ने 29 अप्रैल, 2025 को दिल्ली स्कूल शिक्षा (फीस निर्धारण और विनियमन में पारदर्शिता) विधेयक, 2025 को मंजूरी दी। इस विधेयक का उद्देश्य 1,677 निजी स्कूलों में फीस वृद्धि को विनियमित करना, तीन-स्तरीय समितियों का गठन करना, और गैर-अनुपालन के लिए 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाना है। विधेयक में अभिभावकों, विशेष रूप से महिलाओं और एससी/एसटी समुदायों के प्रतिनिधियों को समितियों में शामिल करने का प्रावधान है, जो पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देता है। यह कितना प्रभावशाली होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा।  

सरकार को डीएसईएआर, 1973 को और सख्त करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी स्कूल, चाहे वे सरकारी या निजी जमीन पर हों, फीस वृद्धि से पहले डीओई से अनुमति लें। नियमित ऑडिट और पारदर्शी वित्तीय रिपोर्टिंग अनिवार्य होनी चाहिए। फीस निर्धारण समितियों में अभिभावकों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाना चाहिए। महाराष्ट्र जैसे राज्यों के मॉडल, जहां दो साल में 15% से अधिक वृद्धि के लिए तीन-चौथाई अभिभावकों की सहमति आवश्यक है, को लागू किया जा सकता है। स्कूलों को उन छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने से रोकने के लिए सख्त दिशानिर्देश लागू किए जाने चाहिए, जिनके अभिभावक फीस का भुगतान करने में असमर्थ हैं। बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार संधि (यूएनसीआरसी) के सिद्धांतों को लागू करना चाहिए। फीस वृद्धि को राजनीतिक मुद्दा बनाने के बजाय, सभी दलों को एकजुट होकर दीर्घकालिक समाधान खोजने चाहिए। अन्य राज्यों, जैसे हरियाणा और उत्तर प्रदेश, में लागू उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित समायोजन को दिल्ली में भी लागू किया जा सकता है।

दिल्ली के निजी स्कूलों में फीस वृद्धि की समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी है। यह शिक्षा के मौलिक अधिकार को कमजोर करती है और मध्यम वर्ग के परिवारों पर अनुचित बोझ डालती है। दिल्ली सरकार का हालिया विधेयक एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इसकी सफलता सख्त प्रवर्तन और सभी हितधारकों के सहयोग पर निर्भर करती है। शिक्षा को लाभ का साधन बनाने के बजाय इसे सभी के लिए सुलभ और किफायती बनाने की दिशा में केंद्र सरकार को भी ठोस प्रयास करने चाहिए।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 9 मई 2025

ऑपरेशन सिंदूर: आतंकवाद पर एक रणनीतिक चोट

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम की बैसरन घाटी में हुए आतंकी हमले ने पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया। इस हमले में 25 भारतीय और एक नेपाली नागरिक सहित 26 लोगों की जान चली गई, जबकि 17 अन्य घायल हुए। आतंकियों ने पर्यटकों से उनकी धार्मिक पहचान पूछकर निशाना बनाया, जिससे देश में आक्रोश की लहर दौड़ गई। भारत ने इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों, जैसे लश्कर-ए-तैयबा और द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF), पर डाली। इस बर्बर घटना के जवाब में भारत ने 6-7 मई 2025 की आधी रात को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया, जिसने आतंकवाद के खिलाफ भारत की जीरो टॉलरेंस नीति को एक बार फिर दुनिया के सामने स्पष्ट कर दिया। विपक्षी पार्टियों समेत पूरे विश्व की निगाहें भारतीय सरकार पर थीं कि वो इस आतंकी हमले का कब और क्या जवाब देंगे?


‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना का एक संयुक्त अभियान था, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की देखरेख में अंजाम दिया गया। इस ऑपरेशन में भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में 9 आतंकी ठिकानों पर सटीक मिसाइल हमले किए। ये हमले बहावलपुर, कोटली, मुजफ्फराबाद, मुरिदके और कराची जैसे क्षेत्रों में किए गए, जहां जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों के ठिकाने थे। भारतीय सेना ने 24 मिसाइलों का इस्तेमाल किया, जिसमें ब्रह्मोस और स्कैल्प मिसाइलें शामिल थीं, और करीब 70 से 100 आतंकियों को मार गिराया गया।

रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि यह ऑपरेशन पूरी तरह से आतंकी ढांचों को नष्ट करने के उद्देश्य से था, और इसमें किसी भी पाकिस्तानी सैन्य ठिकाने को निशाना नहीं बनाया गया। भारत ने लक्ष्य चयन और हमले के तरीकों में अत्यधिक संयम बरता, ताकि तनाव को बढ़ाने से बचा जा सके। बीते मंगलवार को यह हमला रात 1:44 बजे शुरू हुआ और भारतीय सुखोई-30 और राफेल फाइटर जेट ने प्रिसिजन स्ट्राइक वेपंस और लॉइटरिंग म्यूनिशन का इस्तेमाल किया।


‘ऑपरेशन सिंदूर’ का नाम अपने आप में एक शक्तिशाली सांस्कृतिक और भावनात्मक संदेश देता है। पहलगाम हमले में कई नवविवाहित जोड़ों की जान गई, जिससे कई महिलाओं का सुहाग उजड़ गया। भारतीय संस्कृति में सिंदूर विवाहित महिलाओं के लिए पति की लंबी उम्र और सौभाग्य का प्रतीक है। इस हमले ने न केवल निर्दोष लोगों की जान ली, बल्कि कई परिवारों को भावनात्मक रूप से तोड़ दिया। इसलिए, इस ऑपरेशन का नाम ‘सिंदूर’ रखकर भारत ने न केवल पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी, बल्कि यह भी संदेश दिया कि अब हर सुहाग को महफूज रखा जाएगा। इस नाम का सुझाव खुद पीएम मोदी ने दिया था, जो इस ऑपरेशन के प्रतीकात्मक महत्व को दर्शाता है।


वहीं पाकिस्तान ने इस हमले को अपनी संप्रभुता पर हमला करार दिया और इसे “कायराना” बताया। पाकिस्तान की इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने कहा कि पाकिस्तान अपने चुने हुए समय और स्थान पर इसका जवाब देगा। पाकिस्तानी मीडिया ने दावा किया कि हमले में एक बच्चे की मौत हुई और दो लोग घायल हुए, लेकिन भारत ने स्पष्ट किया कि केवल आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। पाकिस्तान के प्रधान मंत्री शहबाज शरीफ और रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी इस हमले की निंदा की और जवाबी कार्रवाई की धमकी दी। भारत सरकार ने सभी सीमावर्ती राज्यों में ‘मॉक ड्रिल’ की शुरुआत कर दी है। इससे आम जनता को आपात स्थिति के लिए तैयार किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भारत ने अपनी कार्रवाई को जिम्मेदार और नियंत्रित बताया। भारत ने स्पष्ट किया कि यह आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई थी, न कि पाकिस्तान के साथ युद्ध की शुरुआत।   

उल्लेखनीय है कि पहलगाम हमले के बाद भारत ने त्वरित कदम उठाए, जिसे पाकिस्तान ने “युद्ध की कार्रवाई” करार दिया। केवल 15 दिनों में भारत ने खुफिया जानकारी एकत्र की और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की रणनीति तैयार की। 6 मई की देर रात, जब पाकिस्तान सो रहा था, भारत ने ऑपरेशन शुरू किया। यह हमला इतना गोपनीय था कि केवल कुछ चुनिंदा लोगों को ही इसकी जानकारी थी। गौरतलब है कि जिस तरह अमरीका ने विदेशी धरती पर आतंकी ओसामा बिन लादेन का खात्मा एक सोची समझी रणनीति के तहत किया था, भारत ने भी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को उसी ढंग से अंजाम दिया है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ को देश भर में व्यापक समर्थन मिला। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने इस कार्रवाई की सराहना की। सोशल मीडिया पर ‘भारत माता की जय’ और ‘जय हिंद’ जैसे नारे ट्रेंड करने लगे। यह ऑपरेशन पहलगाम हमले का सटीक जवाब था, जिसने आतंकी नेटवर्क को करारा झटका दिया। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ न केवल एक सैन्य कार्रवाई थी, बल्कि यह भारत की आतंकवाद के खिलाफ दृढ़ प्रतिबद्धता और रणनीतिक ताकत का प्रतीक था। इसने दुनिया को दिखाया कि भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। यह ऑपरेशन उन मासूमों के खून का बदला था, जिन्होंने पहलगाम में अपनी जान गंवाई। साथ ही, यह एक चेतावनी भी थी कि भारत आतंकवाद को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगा। उम्मीद है कि जो भी राष्ट्र आतंकियों को पनाह देते हैं उन सभी के लिए यह ऑपरेशन एक कड़ा संदेश देगा।  

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 2 मई 2025

भारत में बढ़ता रोड रेज

भारत की सड़कों पर रोड रेज (सड़क पर गुस्सा) की घटनाएँ दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं। बेंगलुरु में कुछ समय पहले रोड रेज घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह न केवल एक सामाजिक समस्या है, बल्कि एक गंभीर अपराध भी बनता जा रहा है, जो लोगों की जान और संपत्ति को खतरे में डाल रहा है। रोड रेज का मतलब है सड़क पर वाहन चालकों या पैदल यात्रियों के बीच छोटी-मोटी घटनाओं के कारण उत्पन्न होने वाला गुस्सा, जो कभी-कभी हिंसक रूप ले लेता है। यह गुस्सा गाली-गलौज, मारपीट, संपत्ति को नुकसान, और यहाँ तक कि हत्या तक जा सकता है।


रोड रेज की घटनाएँ कई कारणों से होती हैं। भारत में भीड़भाड़ वाली सड़कें, अपर्याप्त बुनियादी ढांचा, और ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन प्रमुख कारक हैं। इसके अलावा, मानसिक तनाव, जल्दबाजी, और अहंकार भी रोड रेज को बढ़ावा देते हैं। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अवसाद, चिंता, और नशे की स्थिति में लोग अपनी भावनाओं पर नियंत्रण खो देते हैं, जिससे हिंसक व्यवहार सामने आता है। इसके अलावा, कुछ लोग सड़क पर अपनी ‘प्रतिष्ठा’ बनाए रखने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं।


पिछले कुछ महीनों में भारत में रोड रेज की कई चौंकाने वाली घटनाएँ सामने आई हैं, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाती हैं। 2025 में बेंगलुरु में भारतीय वायु सेना के विंग कमांडर शिलादित्य बोस और एक कॉल सेंटर कर्मचारी विकास कुमार के बीच सड़क पर हुई झड़प ने इस समस्या को गहराई से सामने लाया। इस घटना में बोस ने विकास कुमार पर हिंसक हमला किया, जबकि प्रारंभिक दावे में बोस ने खुद को पीड़ित बताया था। पुलिस द्वारा जारी सीसीटीवी फुटेज ने यह स्पष्ट किया कि बोस ने ही पहले हमला शुरू किया था, जबकि विकास कुमार ने केवल अपनी रक्षा की थी। अक्टूबर 2024 में दिल्ली में एक 20 वर्षीय युवक की रोड रेज की घटना में मौत हो गई। यह विवाद रास्ता देने को लेकर शुरू हुआ और जल्द ही हिंसक रूप ले लिया। उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ महीनों में दिल्ली में रोड रेज की 10 घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनमें पाँच लोगों की मौत हुई और आठ घायल हुए। 2024 में बेंगलुरु में एक कार चालक की लापरवाह ड्राइविंग के कारण ऑटो चालकों ने उसकी कार को तोड़ दिया। बेंगलुरु में ट्रैफिक जाम और लेन अनुशासन की कमी रोड रेज के प्रमुख कारण हैं। 2024 में मुंबई में अभिनेता राघव तिवारी पर एक बाइक सवार ने रोड रेज की घटना में चाकू और लोहे की रॉड से हमला किया। 2024 में उत्तर प्रदेश के कानपुर में बीजेपी पार्षद सौम्या शुक्ला के पति अंकित शुक्ला ने रोड रेज की एक घटना में एक व्यक्ति की आँख फोड़ दी। यह घटनाएँ रोड रेज की गंभीरता और इसके सामाजिक प्रभाव को दर्शाती है।


रोड रेज केवल व्यक्तिगत विवाद तक सीमित नहीं है; इसका व्यापक सामाजिक प्रभाव पड़ता है। यह सड़क दुर्घटनाओं और मौतों की संख्या को बढ़ाता है। 2015 के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़ों के अनुसार, भारत में रोड रेज और लापरवाह ड्राइविंग के 4.09 लाख मामले दर्ज किए गए, जिनमें 4.79 लाख लोग घायल हुए। हाल के वर्षों में यह संख्या और बढ़ी है, विशेष रूप से बड़े शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, और बेंगलुरु में।कानूनी दृष्टिकोण से, भारत में रोड रेज के लिए कोई विशिष्ट कानून नहीं है। हालांकि, भारतीय दंड संहिता की धारा 281 और मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 184 के तहत लापरवाह ड्राइविंग के लिए सजा का प्रावधान है। पहली बार अपराध करने पर 6 महीने से 1 साल की जेल या 1,000 से 5,000 रुपये का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। फिर भी, विशेषज्ञों का मानना है कि रोड रेज को नियंत्रित करने के लिए एक अलग कानून की आवश्यकता है।

रोड रेज की समस्या से निपटने के लिए भारत को अन्य देशों से प्रेरणा लेनी चाहिए, जहाँ इस समस्या पर काबू पाने के लिए प्रभावी उपाय किए गए हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में रोड रेज और सुरक्षित ड्राइविंग के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। भारत में भी स्कूलों और कॉलेजों में ट्रैफिक सुरक्षा शिक्षा को अनिवार्य करना चाहिए। सिंगापुर और जापान में रोड रेज को अपराध माना जाता है, और दोषियों को कड़ी सजा दी जाती है। भारत में भी रोड रेज के लिए विशिष्ट कानून बनाए जाने चाहिए, साथ ही सीसीटीवी और डैशकैम के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए। रोड रेज को कम करने के लिए मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी है। सिंगापुर में ‘रोड सेफ्टी मंथ’ के दौरान गुस्सा प्रबंधन पाठ्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। सड़कों की स्थिति, ट्रैफिक प्रबंधन, और लेन अनुशासन को बेहतर करने से रोड रेज की घटनाएँ कम हो सकती हैं।

भारत में बढ़ती शहरी आबादी और वाहन संख्या के मद्देनजर, सड़क सुरक्षा और शांति बनाए रखना एक चुनौतीपूर्ण लेकिन अनिवार्य कार्य है। रोड रेज भारत में एक बढ़ती हुई समस्या है, जो न केवल व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालती है, बल्कि सामाजिक सद्भाव को भी प्रभावित करती है। इसे रोकने के लिए कानूनी सुधार, जागरूकता अभियान, और बेहतर ट्रैफिक प्रबंधन जरूरी हैं। प्रत्येक नागरिक को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और सड़क पर धैर्य और अनुशासन बनाए रखना होगा। सड़कें प्रतिस्पर्धा का मैदान नहीं, बल्कि साझा स्थान हैं, जहाँ सभी की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।