शुक्रवार, 26 जनवरी 2024

पैरोल को न बनाएँ मखौल


जब भी किसी अपराधी का अपराध सिद्ध हो जाता है तो उसे अदालत उचित सज़ा सुनाकर जेल भेज देती है। जेल में हर अपराधी, जो दोषी करार दिया जाने के बाद सज़ा काटता है उसे जेल के नियम के तहत अपनी सज़ा पूरी करनी पड़ती है। अपराधी चाहे पेशेवर गुंडा हो, कोई आम आदमी हो जिसके द्वारा किसी विशेष परिस्थिति में अपराध हुआ हो या फिर कोई रसूखदार व्यक्ति हो, क़ानून सबके लिए एक समान है। परंतु क्या ऐसा वास्तव में होता है? क्या हमारे देश की जेलों में सभी के साथ एक जैसा व्यवहार होता है? रसूखदार क़ैदियों के संदर्भ में इस सवाल का जवाब आपको ‘नहीं’ ही मिलेगा।ऐसा क्या कारण है कि जेल के नियम और कायदों को तोड़-मरोड़ कर रसूखदार क़ैदियों को ‘विशेष शिष्टाचार’ दिया जाता है?

आए दिन हमें ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं जब किसी रसूखदार अपराधी के ख़िलाफ़ कोर्ट में केस चलता है और उसे सज़ा सुना कर जेल भेज दिया जाता है। परंतु आम जनता के मन में यही शक रहता है कि जेल में जा कर भी वो रसूखदार व्यक्ति ऐशो-आराम की ज़िंदगी ही जियेगा। हद तो तब हो जाती है जब यह प्रभावशाली अपनी सज़ा के दौरान ही कई बार पैरोल या फरलो मिल जाती है। रसूखदार क़ैदियों को दिये जाने इस विशेष व्यवहार पर जब राजनैतिक तड़का लगता है तो यह व्यवहार कई गुना बढ़ जाता है। यदि यह रसूखदार क़ैदी किसी ऐसे धार्मिक पंथ का मुखिया हो जिसके करोड़ों भक्त हों, तो राज्य सरकार हर चुनाव से पहले उसे पैरोल या फरलो पर छोड़ने में देर नहीं करती।


यहाँ पर पैरोल और फरलो को समझना भी ज़रूरी होगा। जेल नियम के तहत एक साल में अधिकतम 100 दिन तक किसी भी क़ैदी को जेल से बाहर रहने दिया जा सकता है। इसमें 30 दिन की फरलो और 70 दिन का पैरोल शामिल है। राजनैतिक पार्टी कोई भी सत्ता में हो, हर पार्टी अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए इस प्रावधान का दुरुपयोग करती आई है। आपको ऐसे कई उदाहरण मिल जाएँगे जहां सत्ताधारी दल ने ऐसे रसूखदार क़ैदियों के लिए अधिकतम कदम उठा कर उसे अधिक से अधिक समय तक जेल से बाहर रखा है। ऐसे हालात में, ऐसे किसी भी क़ैदी, जिसे कैद-ए-बामशक्कत की सज़ा सुनाई गई हो उससे आप जेल में किसी भी तरह के श्रम की उम्मीद कैसे लगा सकते हैं? जब-जब ऐसे दुर्दांत अपराधियों को जेल के नियम का दुरुपयोग कर जेल के बाहर भेजा जाता है तो पीड़ित परिवार ख़ुद को बेबस महसूस करते हैं।


ताज़ा मामला डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम का है। डेरा प्रमुख को दो हत्याओं और दो बलात्कार के मामलों में अदालत द्वारा दोषी पाया गया है। परंतु उल्लेखनीय है कि बीते दो वर्षों में यह अपराधी लगभग 250 से अधिक दिनों तक जेल के बाहर रहा। ग़ौरतलब है कि जिस अपराधी पर इतने संगीन आरोप लगे हों और वो दोषी भी ठहराया गया हो उस पर इतनी मेहरबानी क्यों की जा रही है? डेरा प्रमुख के 6 करोड़ से ज़्यादा भक्त हैं जो इनके एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। ऐसे में यदि इनके डेरे का झुकाव किसी एक राजनैतिक दल के साथ हो तो उस दल को इनके अनुयाइओं का वोट मिलना तो तय ही माना जाएगा। इसीलिए कई राजनैतिक दल इनका आशीर्वाद लेने की क़तार में रहते हैं।


सवाल उठता है कि क्या देश का क़ानून मामूली क़ैदियों और रसूखदार क़ैदियों के लिए अलग है? इस पर क़ानून के जानकारों का कहना है कि देश की सर्वोच्च अदालत ने ऐसे कई फ़ैसले सुनाए हैं जहां पर पैरोल और फरलो दिये जाने के लिए निर्देश दिये गये हैं कि किन-किन परिस्थितियों में क़ैदियों को पैरोल और फरलो दिया जा सकता। इतने अधिक समय के लिए पैरोल और फरलो दिये जाने से क़ैदी को दी गई सज़ा के मायने ही कम हो जाते हैं। ऐसा सिर्फ़ इसलिए क्योंकि कोई रसूखदार क़ैदी बलात्कार और हत्या जैसे संगीन अपराध करने के बावजूद अपने राजनैतिक संपर्कों के चलते जेल प्रशासन को अपना ‘अच्छा चाल चलन’ दिखाने में कामयाब हो जाता है।


देश भर की जेलों में लगभग 6 लाख क़ैदी बंद हैं। इनमें से 75 प्रतिशत क़ैदियों का अभी तक ट्रायल भी पूरा नहीं हुआ है। ऐसे सवाल उठता है कि जिन क़ैदियों का ट्रायल पूरा नहीं हुआ उनके मानवाधिकार का हनन क्यों किया जा रहा है? उन्हें पैरोल और फरलो क्यों नहीं मिल रही? एक टीवी डिबेट में बोलते हुए महाराष्ट्र सरकार में जेल विभाग के प्रमुख रहीं पूर्व आईपीएस अधिकारी मीरा बोरवणकर ने कहा किसी भी राज्य के प्रिजन मैन्युअल को देखें तो पैरोल और फरलो दिये जाने के नियम साफ़-साफ़ लिखे हैं। पैरोल केवल आपात स्थिति में दिया जाता है जब क़ैदी की निजी मौजूदगी अनिवार्य होती है। जैसे किसी परिवार के सदस्य की मृत्यु हो जाना या परिवार के सदस्य का विवाह। गुरमीत राम रहीम को लगातार दिये जाने वाले पैरोल पर सवाल उठाते हुए उनका कहना है कि ऐसी कौन सी आपात स्थिति थी जिसके चलते उन्हें इतनी बार पैरोल दिया गया? यदि गुरमीत राम रहीम द्वारा कोई भी पीड़ित व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाए तो इसे तुरंत रद्द किया जा सकता है। गुरमीत राम रहीम जैसे रसूखदार क़ैदियों को चुनावों के आसपास ही पैरोल और फरलो क्यों मिलती है इस बात पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है। देखना यह है कि क्या देश की सर्वोच्च अदालत चुनावों के आसपास होने वाले इस संयोग का संज्ञान स्वयं लेती है या नहीं? 

शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

जानलेवा हो सकते हैं खर्राटे !


आपको अक्सर किसी सोते हुए व्यक्ति के मुँह से खर्राटों की आवाज़ ने परेशान अवश्य किया होगा। अक्सर हम इसे यह समझकर टाल देते हैं कि वो दिन भर की थकान के बाद चैन की नींद सो रहा है इसलिए खर्राटे सुनाई दे रहे हैं। परंतु मेडिकल भाषा में ऐसा नहीं है। लम्बे समय तक चलने वाली खर्राटों की आदत को डॉक्टर एक बीमारी मानते हैं। यदि समय पर इसका इलाज न किया जाए तो यह बीमारी इतनी ख़तरनाक है कि यह जानलेवा भी हो सकती है। मेडिकल भाषा में इसे ‘ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया’ कहते हैं।

सोते समय नाक और गले में उत्पन्न होने वाली कर्कश आवाज को खर्राटे कहा जाता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, यह समस्या भी बढ़ती जाती है। एक शोध के अनुसार लगभग 57% पुरुष और 40% महिलाएं खर्राटे लेती हैं। हालांकि, खर्राटे क्या हैं, यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है जो इनको सुनता है, और कोई व्यक्ति कितनी जोर से और कितनी देर तक खर्राटे लेता है, यह हर रात अलग-अलग होता है। नींद के दौरान मांसपेशियों के रिलैक्सेशन के कारण गले में कोमल टिश्यू (ऊतकों) के फड़कने से खर्राटे आते हैं। विशेष रूप से कोमल तालु (मुंह के तालु का पिछला हिस्सा) के फड़कने से ऐसा होता है। रिलैक्सेशन से टिश्यू की कोमलता में कमी होती है, जिसके कारण इसके और अधिक फड़कने की संभावना पैदा हो जाती है। जैसे लोहे की तुलना में कपड़े के झंडे के हवा में फड़फड़ाने की संभावना अधिक होती है। साथ ही, टिश्यू रिलैक्सेशन से ऊपरी एयरवे संकीर्ण हो जाता है, और इसलिए फड़फड़ाना और अधिक आसान हो जाता है।


आपने अक्सर सुना होगा कि लोगों की नींद में मृत्यु हो गई, डॉक्टरों के अनुसार इसका कारण भी खर्राटे हो सकता है। क्योंकि सोते समय खर्राटे अक्सर सांस लेने में समस्या के लक्षण होते हैं। सोते समय सांस लेने में दिक़्क़त को ऊपरी एयरवे प्रतिरोध सिंड्रोम से लेकर ऑब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया कहा जा सकता है। ये स्थिति इस बात पर निर्भर करती हैं कि एयरवे कितना ब्लॉक है तथा ब्लॉकेज कहां पर है। प्रभावों के कारण नींद व एयरफ़्लो संबंधी बाधाएँ हो जाती हैं। ऐसे में उन व्यक्तियों को बहुत उथली सांसें भी आती हैं। इसी कारण उन्हें दिन के समय नींद आना, थकान महसूस होना, ताजगी रहित नींद का होना, वज़न का बेवजह बढ़ना आदि जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। ग़ौरतलब है कि अमरीका समेत कई देशों में स्लीप ऐप्निया के मरीज़ों का वाहन चलाना प्रतिबंधित है।  


खर्राटों लेने वाले हर व्यक्ति को ऑब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया नहीं होता परन्तु ऑब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया से पीड़ित अधिकतर मरीज़ खर्राटे ज़रूर लेते हैं। ऑब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया के जोखिम की बात करें तो जिन मरीज़ों को रात में सोते समय साँस लेने में दिक़्क़त का होना, गले में ख़राश का होना, सुबह उठते ही सर में दर्द होना, शरीर में वज़न बढ़ना और ब्लड प्रेशर की शिकायत होना काफ़ी चिंता जनक माना गया है। जिन लोगों में यह लक्षण दिखाई देते हैं उन्हें तुरंत डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए। आपके लक्षणों को देख कर ही डॉक्टर आपको उचित सलाह देंगे।

वैसे तो शुरुआती दौर में खर्राटों से बचाव के लिए ऐसे कई आसान उपाय हैं जिन्हें किया जा सकता है। इनमें से प्रमुख हैं, सिर को ऊँचा रख कर सोना, पीठ के बल न लेट कर एक साइड पर लेटना, सोने से पहले मदिरा या नींद की दवाओं को न लेना, वज़न कम रखना, आदि। इसके अलावा खर्राटों के चलते ऑब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया के मरीज़ों को सीपीएपी मशीन (कांस्टेंट प्रेशर एयर पंप यानी कि निरंतर दबाव वायु पंप) का भी इस्तेमाल किया जाता है। यह मशीन फेफड़ों में जाने वाली हवा को एक छोटा व निरंतर दबाव प्रदान करती है। यह दबाव गहरी नींद के दौरान श्वास नली को गिरने से रोकता है, और इस से व्यक्ति को सांस लेने में मदद मिलती है। ऑब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया से पीड़ित व्यक्तियों द्वारा सीपेप मशीन का इस्तेमाल ज़्यादा देखा गया है। लेकिन जिनको केवल खर्राटों की समस्या है, वे इसे बिना डाक्टर की सलाह के इस्तेमाल न करें। वहीं जिन लोग इस बीमारी की गंभीर अवस्था के शिकार होते हैं, उन्हें डॉक्टर की सलाह पर ऑपरेशन करवाने की ज़रूरत भी पड़ सकती है।


यदि कोई व्यक्ति ऑब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया से पीड़ित है और इसको केवल खर्राटों जैसी एक आम समस्या समझ लेता है उसे इस बात पर गौर करना चाहिए कि अनुपचारित ऑब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया के कारण ऐसे कई लक्षण भी सामने आ  सकते हैं जो घातक साबित हो सकते हैं। इनमें अहम हैं दिल की धड़कन से जुड़ी समस्याएं तथा स्ट्रोक का जोखिम बढ़ जाना। परंतु सौ बात की एक बात है कि यदि हम एक संतुलित जीवन जियें और नियमित कसरत आदि करते रहें तो खर्राटों जैसी छोटी-छोटी समस्याएँ ख़ुद-ब-ख़ुद ही ठीक हो सकती हैं। सुबह-सुबह नियमित सैर पर जाने से पूरा शरीर खुल जाता है। इसलिए जहां तक हो सके हमें प्रतिदिन कम से कम आधे घंटे तक सैर करनी चाहिए। सैर करते समय अपने आधुनिक उपकरणों से दूर रहना चाहिए। आज के युग में मोबाइल फ़ोन जिस तरह से हमारी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है। जहां तक हो सके सुबह की सैर पर जाएँ तो इसे अपने साथ लेकर न जाएँ। ऐसा करने से आप केवल अपने शरीर पर ही ध्यान देंगे। सुबह-सुबह मोबाइल फ़ोन पर आने वाले फ़िज़ूल संदेशों पर नहीं। बढ़ती उम्र में शरीर में होने वाले ऐसे बदलावों पर समय रहते ध्यान देना ज़रूरी है वरना इन मामूली बदलावों के चलते कहीं बहुत देर न हो जाए। कहीं साधारण से दिखने वाले खर्राटे वास्तव में ख़तरनाक साबित न हो जाएँ। 

शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

जापान विमान हादसे से सबक़

दुनिया भर में विमान यात्राएँ हर दिन बढ़ती जा रहीं हैं। विमान में यात्रा करते समय आपको आपातकाल के नियमों से परिचित भी कराया जाता है। परंतु जो भी हवाई यात्री अधिक यात्राएँ करते हैं वो विमान में दिये जाने वाले सुरक्षा व आपात नियमों को न तो ध्यान से पढ़ते हैं और न ही ऐसी जानकारियों को ध्यान से सुनते हैं। इसलिए जब भी कभी कोई हादसा होता है तो उस समय अफ़रा-तफ़री का माहौल बन जाता है। परंतु कुछ दिन पहले हुए एक ख़तरनाक विमान हादसे में केवल 5 लोगों की मौत हुई जबकि 379 यात्रियों को आग के गोले में तब्दील हुए एक विमान से सुरक्षित निकाला गया। ऐसा केवल इसलिए संभव हो सका क्योंकि विमान के क्रू ने अपनी ट्रेनिंग में जो कुछ भी सीखा था, उस पर उस स्थिति में पूरी तरह से अमल किया। इसके साथ ही संयमित यात्रियों ने भी सभी सेफ्टी प्रोटोकॉल्स के पालन करने में कोई कमी नहीं छोड़ी।
 

गत 2 जनवरी को जापान एयरलाइंस के फ्लाइट 516 जैसे ही हनेदा एयरपोर्ट पर लैंड कर रही थी, उसकी टक्कर वहां खड़े कोस्ट गार्ड के विमान से हो गई। कुछ ही क्षणों में जापान एयरलाइंस का विमान में भयंकर आग लग गई। संयमित यात्रियों और विमान के क्रू की सूझबूझ के कारण उसमे सवार सभी की जान बच गई। जबकि कोस्ट गार्ड का विमान जो कि तुलनात्मक रूप से छोटा था, उस में सवार 6 में से 5 लोगों की मौत हो गई। जहां एक ओर हादसे की जाँच की जा रही है वहीं जापान एयरलाइंस के यात्रियों को जीवित निकालने की प्रशंसा दुनिया भर में हो रही है। 
 
इंटरनेट पर इस हादसे के जितने भी वीडियो दिखाई दे रहे हैं उनमें से किसी भी वीडियो में एक भी यात्री को अपना सामान साथ लिए नहीं देखा गया। ज़रा सोचिए कि अगर उस दुर्घटनाग्रस्त विमान के यात्री अपनी-अपनी सीट के ऊपर रखे सामान को निकालने की कोशिश करते तो ये कितना ख़तरनाक हो सकता था? यदि यात्री ऐसा करते तो विमान से बाहर निकालने की प्रक्रिया भी धीमी हो जाती। ग़ौरतलब है कि दुर्घटनाग्रस्त हुए विमान एयरबस 350 की स्थिति ने भी इवैकुएशन (आपात स्थिति में यात्रियों को निकालने की प्रक्रिया) को मुश्किल बना डाला। अन्य आपात लैंडिंग की तरह ये लैंडिंग वैसी नहीं थी। वरिष्ठ पायलट कैप्टेन पी सिंह के अनुसार, “विमान आग की लपटों से घिरा हुआ था। ऐसे में विमान के क्रू ने समझदारी का प्रदर्शन करते हुए केवल तीन आपातकालीन दरवाज़े ही खोले। यदि अन्य आपातकालीन द्वार भी खोले जाते तो यात्रियों को आपात स्थिति में बाहर निकालने के लिए लगाए गए इन्फ्लैटेबल स्लाइड्स शायद ठीक से नहीं खुल पाते।” 
 

हवाई यात्रा करने वाले यदि आपातकाल परिस्थितियों में इवैकुएशन की प्रक्रिया के बारे में सोच कर देखें तो उनके मन में भय और घबराहट आना स्वाभाविक है। जापान में जिस तरह से ये दो विमान आपस में टकरा कर आग में तब्दील हुए, हालात इससे कहीं अधिक बुरे हो सकते थे। वास्तविक स्थिति में ये सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है कि दुर्घटना या आपातकाल की स्थिति के समय यात्री नहीं घबराएंगे। इसलिए फ्लाइट 516 के यात्रियों ने बिना घबराए जो कर दिखाया, उससे सभी को सबक़ लेने की ज़रूरत है। ऐसा संभव इसलिए हुआ क्योंकि विमान के क्रू और उनके निर्देशों का पालन कर रहे यात्रियों के बीच सही समन्वय था। विमान के चालक दल के सभी सदस्यों को इवैकुएशन और रेस्क्यू की कड़ी ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है। कमर्शल फ्लाइट्स में तैनाती से पहले विमान के क्रू को हफ़्तों तक चलने वाली ऐसी ट्रेनिंग लेनी अनिवार्य है। इतना ही नहीं, नियमों के अनुसार उन्हें ऐसी ट्रेनिंग हर साल लेनी पड़ती है। 
 
इसके साथ ही विमान के क्रू को एक लिखित परीक्षा भी देनी पड़ती है। विमान हादसों की केस स्टडीज़ पर चर्चा भी होती है और अलग-अलग परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रैक्टिकल ट्रेनिंग भी कराई जाती है। इसमें कई तरह के हालात को समझाया जाता है। जैसे कि पानी पर आपात लैंडिंग कराने की हालत में क्या किया जाना चाहिए। यदि विमान में आग लग जाए, तब क्या करना चाहिए। 
 
उल्लेखनीय है कि एविएशन के माणकों के तहत किसी भी यात्री विमान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता लेने के लिए, उसे बनाने वाली कंपनी को यह भी साबित करना पड़ता है कि ज़रूरत पड़ने पर विमान में सवार प्रत्येक व्यक्ति को विमान में लगे आधे आपातकालीन द्वारों का इस्तेमाल कर, मात्र 90 सेकेंड में सुरक्षित बाहर निकाला जा सकता है। ऐसे में इवैकुएशन टेस्ट के समय कभी-कभी असली यात्रियों का भी इस्तेमाल किया जाता है। 
 
2024 की शुरुआत में जापान के हानेडा अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट पर जो हुआ वह एक अच्छी ट्रेनिंग और जापानी यात्रियों के संयम और आपात स्थिति का सामना करने की गंभीरता के चलते ही संभव हुआ। यहाँ एक सवाल उठता है कि क्या ऐसे हादसों से दुनिया भर के अन्य यात्री, फिर वो चाहे हवाई यात्री हों या अन्य साधनों से यात्रा करने वाले, क्या कोई सबक़ लेंगे? क्या विमान, रेल, मेट्रो या बस में सफ़र करते समय सभी यात्री आपात सुरक्षा निर्देशों को गंभीरता से लेंगे और उनका पालन बिना घबराए करेंगे? कोई भी हादसा या दुर्घटना पूर्व नियोजित नहीं होते। इसलिए ऐसी अनहोनी का सामना करने के लिए यदि हम तैयार रहेंगे तो न सिर्फ़ हम अपनी जान बचा सकेंगे बल्कि औरों की जान बचाने में मददगार साबित होंगे।

शुक्रवार, 5 जनवरी 2024

व्लॉगर्स: मिलिए नए युग के ‘ज्ञानियों’ से


सोशल मीडिया के इस आधुनिक युग में आजकल जिसे भी कोई जानकारी चाहिए होती है वो तुरंत अपने स्मार्टफ़ोन पर इंटरनेट की मदद से उसे खोज लेता है। परंतु कभी-कभी कुछ विशेष जानकारी पाने के लिए आपकी सहायता करने कुछ अनजाने लोग भी आ जाते हैं, जो आपको संबंधित वस्तु या स्थान के बारे में हर पहलू से वाक़िफ़ कर देते हैं। ऐसा काम पहले ब्लॉगर करते थे, जो विभिन्न विषयों पर उपयुक्त जानकारी को जनहित में किसी वेबसाइट पर प्रकाशित कर देते थे। आजकल के युग में ब्लॉगर की जगह व्लॉगर्स ने ले ली है। यह ब्लॉगिंग का ही आधुनिक रूप है जिसमें एक ब्लॉगर स्वतंत्र माध्यम से लोगों के साथ अपनी बात, ज्ञान, कौशल, अनुभव इत्यादि को वीडियो के माध्यम से शेयर करता है।


व्लॉगिंग शब्द अंग्रेजी भाषा के दो शब्द ‘वीडियो’ और ‘लॉग’ को मिलाकर बनाया गया है। इस तरह से यह पूरा शब्द वीडियोलोग बना जिसका मतलब वीडियो की क्रमानुसार एंट्री होता है। जब से लोगों के हाथों में स्मार्टफ़ोन आए हैं वे सोशल मीडिया के विशाल सागर में किसी न किसी माध्यम से डुबकी लगा रहे हैं। फिर वो चाहे अजीबो-ग़रीब रील्स का बनाना हो या किसी न किसी विषय पर व्लोगिंग करना हो। सोशल मीडिया के इस युग में हर कोई अपनी जगह बनाना चाहता है। सोशल मीडिया में काफ़ी समय से अपना स्थान बनाए हुए जाने माने प्लेटफार्म में सबसे ऊपर है यूट्यूब। यह एक ऐसा माध्यम है जहां आप किसी भी विषय पर जानकारी को साझा कर सकते हैं। यदि आपकी जानकारी वाला वीडियो यूट्यूब के मानकों पर सही उतरता है तो आप इस माध्यम से कमाई भी कर सकते हैं।


आज के युग में लोग किसी भी जानकारी को पढ़ने से ज्यादा देखना पसंद करते हैं। वीडियो के माध्यम से उन्हें चीजें जल्दी समझ में भी आती हैं। व्लॉगिंग के माध्यम से व्लॉगर अपने विचारों को दर्शकों तक वीडियो के माध्यम से बहुत आसानी के साथ पहुंचा सकते हैं। व्लॉगर अपनी रूचि या इच्छा के अनुसार किसी भी विषय पर वीडियो बना सकते हैं और अगर वे किसी सामाजिक मुद्दे पर अपनी राय देना चाहते हैं तो वह भी दे सकते हैं।


इसके साथ-साथ अगर कोई व्लॉगर किसी प्रोडक्ट के बारे में लोगों को यह बताना चाहते हैं कि उसके फायदे और नुकसान क्या क्या है तो इसे भी व्लॉगिंग के माध्यम से लोगों के साथ शेयर किया जा सकता है। व्लॉगिंग के द्वारा व्लॉगर अपनी ऑडियंस के साथ सीधे जुड़ जाते हैं । क्योंकि जब वे किसी एक विशेष मुद्दे या विषय पर वीडियो बनाते हैं तो उनके दर्शकों को यह पता होता है कि वे किस विषय में बेहतर हैं और यही विषय उन्हें उनके दर्शकों से जोड़े रखता है।

ज़ाहिर सी बात है कि जैसे ही किसी व्लॉगर के दर्शकों की संख्या बढ़ने लगती है वे उनके बीच मशहूर होने लग जाते हैं।जितने ज़्यादा दर्शक, उतने ही ज़्यादा फ़ायदे। यहाँ से वे यूट्यूब के साथ-साथ अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी अपनी पहचान बनाना शुरू कर सकते हैं। जैसे ही इनके दर्शकों की संख्या हज़ारों-लाखों में पहुँच जाती है तो इन्हें ‘सोशल मीडिया इंफ्ल्यूएंसर’ की उपाधि मिल जाती है। इसके बाद ये किसी भी मुद्दे पर बोलेंगे तो इनकी बात सुनी जाएगी।


जैसे ही कोई व्लॉगर इस उपाधि को पा लेता है तो उसका कमाई का ज़रिया भी खुल जाता है। सोशल मीडिया में ऐसे तमाम ज़रिये हैं जहां पर न सिर्फ़ विज्ञापन के ज़रिये इन व्लॉगर्स को आर्थिक मदद मिलती है बल्कि कई ऐसे उत्पादन भी हैं जिनका विज्ञापन करने से इनको फ़ायदा पहुँचाता है। आज के युग में जहां युवाओं के पास रोज़गार के कुछ ठोस अवसर नहीं हैं तो कम ख़र्च में व्लॉगर बनना एक अच्छा विकल्प है जिससे आप सीमित साधनों से न सिर्फ़ ख़ुद का बल्कि औरों का फ़ायदा भी कर सकते हैं।

अक्सर बड़े-बड़े शहरों में रहते हुए हमें अपने ही शहरों में कई मशहूर जगहों के बारे में मालूम ही नहीं होता। परंतु जब से यह व्लॉगर काल शुरू हुआ है अपने शहर ही नहीं दुनिया भर की मशहूर जगहों को बताने वालों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है। जैसे ही आप सोशल मीडिया पर अपनी रुचि के विषयों को खोजना शुरू करते हैं, उस विषय से संबंधित व्लॉगर के वीडियो ख़ुद-ब-ख़ुद आपके सामने आने लग जाते हैं। इन व्लॉगर्स के वीडियो को कितनी बार देखा गया है या उनके कितने दर्शक हैं, इस बात से आपको इनके बारे में पता चल जाता है। इतना ही नहीं इनके वीडियो के नीचे तमाम दर्शकों की प्रतिक्रिया भी अंकित होती है जो आपको काफ़ी मददगार सिद्ध होती है।

इसके बाद यदि आप इस वीडियो के आधार पर स्वयं उस वस्तु, स्थान या विषय का अनुभव करते हैं तो आपको पता चल जाता है कि उस वीडियो की सच्चाई क्या है। अक्सर ऐसे वीडियो में दी गई जानकारी सही ही साबित होती है। परंतु आज ऐसे भी कई व्लॉगर आ चुके हैं जो अपने स्वार्थ के चलते दर्शकों को भ्रामक जानकारी भी देते हैं। इनका पर्दा तब उठता है जब कोई दर्शक इनके बताए ज्ञान को स्वयं जाँच लेता है। शायद इसीलिए कहा गया है कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। सोच-समझ कर ही इनके कहे पर चलें।