शुक्रवार, 26 जनवरी 2024
पैरोल को न बनाएँ मखौल
जब भी किसी अपराधी का अपराध सिद्ध हो जाता है तो उसे अदालत उचित सज़ा सुनाकर जेल भेज देती है। जेल में हर अपराधी, जो दोषी करार दिया जाने के बाद सज़ा काटता है उसे जेल के नियम के तहत अपनी सज़ा पूरी करनी पड़ती है। अपराधी चाहे पेशेवर गुंडा हो, कोई आम आदमी हो जिसके द्वारा किसी विशेष परिस्थिति में अपराध हुआ हो या फिर कोई रसूखदार व्यक्ति हो, क़ानून सबके लिए एक समान है। परंतु क्या ऐसा वास्तव में होता है? क्या हमारे देश की जेलों में सभी के साथ एक जैसा व्यवहार होता है? रसूखदार क़ैदियों के संदर्भ में इस सवाल का जवाब आपको ‘नहीं’ ही मिलेगा।ऐसा क्या कारण है कि जेल के नियम और कायदों को तोड़-मरोड़ कर रसूखदार क़ैदियों को ‘विशेष शिष्टाचार’ दिया जाता है?
आए दिन हमें ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं जब किसी रसूखदार अपराधी के ख़िलाफ़ कोर्ट में केस चलता है और उसे सज़ा सुना कर जेल भेज दिया जाता है। परंतु आम जनता के मन में यही शक रहता है कि जेल में जा कर भी वो रसूखदार व्यक्ति ऐशो-आराम की ज़िंदगी ही जियेगा। हद तो तब हो जाती है जब यह प्रभावशाली अपनी सज़ा के दौरान ही कई बार पैरोल या फरलो मिल जाती है। रसूखदार क़ैदियों को दिये जाने इस विशेष व्यवहार पर जब राजनैतिक तड़का लगता है तो यह व्यवहार कई गुना बढ़ जाता है। यदि यह रसूखदार क़ैदी किसी ऐसे धार्मिक पंथ का मुखिया हो जिसके करोड़ों भक्त हों, तो राज्य सरकार हर चुनाव से पहले उसे पैरोल या फरलो पर छोड़ने में देर नहीं करती।
यहाँ पर पैरोल और फरलो को समझना भी ज़रूरी होगा। जेल नियम के तहत एक साल में अधिकतम 100 दिन तक किसी भी क़ैदी को जेल से बाहर रहने दिया जा सकता है। इसमें 30 दिन की फरलो और 70 दिन का पैरोल शामिल है। राजनैतिक पार्टी कोई भी सत्ता में हो, हर पार्टी अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए इस प्रावधान का दुरुपयोग करती आई है। आपको ऐसे कई उदाहरण मिल जाएँगे जहां सत्ताधारी दल ने ऐसे रसूखदार क़ैदियों के लिए अधिकतम कदम उठा कर उसे अधिक से अधिक समय तक जेल से बाहर रखा है। ऐसे हालात में, ऐसे किसी भी क़ैदी, जिसे कैद-ए-बामशक्कत की सज़ा सुनाई गई हो उससे आप जेल में किसी भी तरह के श्रम की उम्मीद कैसे लगा सकते हैं? जब-जब ऐसे दुर्दांत अपराधियों को जेल के नियम का दुरुपयोग कर जेल के बाहर भेजा जाता है तो पीड़ित परिवार ख़ुद को बेबस महसूस करते हैं।
ताज़ा मामला डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम का है। डेरा प्रमुख को दो हत्याओं और दो बलात्कार के मामलों में अदालत द्वारा दोषी पाया गया है। परंतु उल्लेखनीय है कि बीते दो वर्षों में यह अपराधी लगभग 250 से अधिक दिनों तक जेल के बाहर रहा। ग़ौरतलब है कि जिस अपराधी पर इतने संगीन आरोप लगे हों और वो दोषी भी ठहराया गया हो उस पर इतनी मेहरबानी क्यों की जा रही है? डेरा प्रमुख के 6 करोड़ से ज़्यादा भक्त हैं जो इनके एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। ऐसे में यदि इनके डेरे का झुकाव किसी एक राजनैतिक दल के साथ हो तो उस दल को इनके अनुयाइओं का वोट मिलना तो तय ही माना जाएगा। इसीलिए कई राजनैतिक दल इनका आशीर्वाद लेने की क़तार में रहते हैं।
सवाल उठता है कि क्या देश का क़ानून मामूली क़ैदियों और रसूखदार क़ैदियों के लिए अलग है? इस पर क़ानून के जानकारों का कहना है कि देश की सर्वोच्च अदालत ने ऐसे कई फ़ैसले सुनाए हैं जहां पर पैरोल और फरलो दिये जाने के लिए निर्देश दिये गये हैं कि किन-किन परिस्थितियों में क़ैदियों को पैरोल और फरलो दिया जा सकता। इतने अधिक समय के लिए पैरोल और फरलो दिये जाने से क़ैदी को दी गई सज़ा के मायने ही कम हो जाते हैं। ऐसा सिर्फ़ इसलिए क्योंकि कोई रसूखदार क़ैदी बलात्कार और हत्या जैसे संगीन अपराध करने के बावजूद अपने राजनैतिक संपर्कों के चलते जेल प्रशासन को अपना ‘अच्छा चाल चलन’ दिखाने में कामयाब हो जाता है।
देश भर की जेलों में लगभग 6 लाख क़ैदी बंद हैं। इनमें से 75 प्रतिशत क़ैदियों का अभी तक ट्रायल भी पूरा नहीं हुआ है। ऐसे सवाल उठता है कि जिन क़ैदियों का ट्रायल पूरा नहीं हुआ उनके मानवाधिकार का हनन क्यों किया जा रहा है? उन्हें पैरोल और फरलो क्यों नहीं मिल रही? एक टीवी डिबेट में बोलते हुए महाराष्ट्र सरकार में जेल विभाग के प्रमुख रहीं पूर्व आईपीएस अधिकारी मीरा बोरवणकर ने कहा किसी भी राज्य के प्रिजन मैन्युअल को देखें तो पैरोल और फरलो दिये जाने के नियम साफ़-साफ़ लिखे हैं। पैरोल केवल आपात स्थिति में दिया जाता है जब क़ैदी की निजी मौजूदगी अनिवार्य होती है। जैसे किसी परिवार के सदस्य की मृत्यु हो जाना या परिवार के सदस्य का विवाह। गुरमीत राम रहीम को लगातार दिये जाने वाले पैरोल पर सवाल उठाते हुए उनका कहना है कि ऐसी कौन सी आपात स्थिति थी जिसके चलते उन्हें इतनी बार पैरोल दिया गया? यदि गुरमीत राम रहीम द्वारा कोई भी पीड़ित व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाए तो इसे तुरंत रद्द किया जा सकता है। गुरमीत राम रहीम जैसे रसूखदार क़ैदियों को चुनावों के आसपास ही पैरोल और फरलो क्यों मिलती है इस बात पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है। देखना यह है कि क्या देश की सर्वोच्च अदालत चुनावों के आसपास होने वाले इस संयोग का संज्ञान स्वयं लेती है या नहीं?
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