शुक्रवार, 30 अगस्त 2024

दबाव मुक्त हों जाँच एजेंसियाँ


2014 से जब नरेंद्र मोदी ने देश के प्रधान मंत्री बनने की तैयारी में अपना अभियान शुरू किया तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनका आह्वान था, “न खाऊँगा न खाने दूँगा”। उनके प्रधान मंत्री बनने के बाद इसका असर भी फ़ौरन दिखाई दिया। केंद्र सरकार की नौकरशाही में यह संदेश गया तो ऐसा लगा जैसे अब जल्दी ही लाल फ़ीताशाही ख़त्म होगी। पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, ये शुरुआती लक्षण ठंडे पड़ते गये। हालाँकि मोदी जी दो बार अपने बूते पर और तीसरी बार अन्य दलों की मदद लेकर सरकार की तीसरी पारी खेल रहे हैं। पर इन वर्षों में जिस बात ने सबको चौंकाया वो ये कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोदी जी का ये अभियान केवल विपक्षी दलों तक ही सिमट कर रह गया है। उनमें से भी भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे जिस विपक्षी दल के नेता मोदी जी और अमित शाह के शरणागत हो जाते हैं उनके सौ खून भी माफ़ कर दिये जाते हैं। इतना ही नहीं उन्हें संसद या मंत्री बना कर पुरुस्कृत भी किया जाता है।


मोदी-शाह की इस रणनीति के हथियार बने हैं केंद्रीय जाँच एजेंसियाँ, जो लगातार ‘हिज़ मास्टर्स वॉइस’ की तर्ज़ पर काम कर रही हैं। इसलिए लगातार विपक्ष उन पर जाँच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगा रहा है, संसद में भी और संसद के बाहर भी। वैसे तो सीबीआई, आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय की छवि बड़े-बड़े मामलों को लम्बा खींचने या दबाए रखने की है। पर मोदी राज में ये चमत्कार हो रहा है कि सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों पर तो प्राथमिक कार्यवाही भी नहीं होती किंतु विपक्ष के नेताओं पर हवा की गति से कार्यवाही होती है। कई मामलों में तो केवल गवाह के बयान पर ही मुख्य मंत्री और बड़े-बड़े नेताओं को सीखचों के पीछे महीनों और सालों के लिए डाल दिया जाता है। यह आश्चर्यजनक है। हाल ही में सरकार की इस प्रवृत्ति पर कुछ रोक लगती नज़र आई है।


बीते कुछ महीनों में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के कई मामलों पर देश की जाँच एजेंसियों और सरकार को आड़े हाथों लिया है उससे यह संदेश गया है कि जाँच एजेंसियाँ राजनैतिक दबाव में काम कर रहीं हैं, निष्पक्षता से क़ानून के दायरे में नहीं। मान्य सिद्धांत यह है कि आरोपी चाहे किसी भी दल या विचारधारा को क्यों न हो, यदि उसने अपराध किया है तो उसकी जाँच निष्पक्षता से ही की जानी चाहिए। बेवजह किसी भी आम या ख़ास अपराधी को क़ानून की ग़लत धारा लगा कर जेल में रखना ग़लत है। उसी तरह किसी ख़ास रुतबे वाले कुख्यात अपराधी को भी क़ानून की धाराओं का ग़लत इस्तेमाल कर पैरोल दिलवाना भी ग़लत है। ज़ाहिर सी बात है कि जाँच एजेंसियों द्वारा ऐसी ग़लतियाँ बिना किसी दबाव के नहीं होती।


ताज़ा उदाहरण दिल्ली शराब नीति घोटाले का है। जिस तरह शराब नीति घोटाले को लेकर आरोपी नेता एक के बाद एक ज़मानत पर छूट रहे हैं उससे जाँच एजेंसियों की ‘जाँच’ को लेकर सवाल उठ रहे हैं। चुनावों से पहले और चुनावों के दौरान यह माहौल बनाया जा रहा था कि इन नेताओं का अपराध काफ़ी संगीन है, इसीलिए इन्हें ज़मानत नहीं मिल रही। परंतु लंबे समय तक कछुए की चाल चल रही इस मामले की ‘जाँच’ ने इन एजेंसियों की क्षमता को शक के घेरे में अवश्य खड़ा कर दिया है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख़ और सख़्त आदेश के बाद जाँच एजेंसियों द्वारा अपनाए गए दोहरे मापदंड का भी पर्दाफ़ाश हुआ। यदि जाँच एजेंसियाँ सभी आरोपियों को एक ही पैमाने से माँपेंगी तो जनता के बीच सही संदेश जाएगा, सिसोदिया हो, केजरीवाल हो, संजय राउत हो, या अन्य कोई आम आदमी, क़ानून की नज़र में सभी एक समान हैं। पर यह भी विचारणीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने इन वीआईपी आरोपियों के मामले में ये रुख़ पहले क्यों नहीं अपनाया?

उल्लेखनीय है कि केंद्रीय जाँच एजेंसियों पर निगरानी रखने के लिए 1997 के ‘विनीत नारायण बनाम भारत सरकार' (जैन हवाला कांड केस) के फ़ैसले ने केंद्रीय सतर्कता आयोग का पुनर्गठन किया था। जाँच एजेंसियों को निष्पक्ष और राजनैतिक दबाव से मुक्त करने की दृष्टि से यह एक ऐतिहासिक फ़ैसला था। ज़ाहिर सी बात है कि तमाम राजनैतिक दलों ने इसका विरोध भी किया। लेकिन उसके फ़ौरन बाद ही से जिस तरह जाँच एजेंसियों को ‘पिंजरे में बंद तोता’ और ‘सत्तापक्ष के हथियार’ के नामों से नवाज़ा गया है, यह लोकतंत्र के लिए उचित नहीं था। इसलिए यदि जाँच एजेंसियों को अपनी छवि सुधारनी है तो उन्हें भय मुक्त हो कर ही कार्य करना होगा। जाँच अधिकारी, चाहे छोटे पद पर हो या बड़े पद पर, उसे इस बात के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए कि यदि उसने किसी केस की जाँच को लेकर, किसी नेता के मन की नहीं मानी तो हद से हद उस अधिकारी का तबादला ही हो होगा। परंतु यदि वो अधिकारी केस की फाइल पर सभी क़ानूनी तथ्यों को सही से दर्ज कर देता है तो कोई भी अधिकारी उसके ख़िलाफ़ नहीं जा सकता। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश में आज भी ऐसे ईमानदार अधिकारी होंगे जो तबादले के डर से भयभीत हुए बिना अपना काम निष्ठा से करना जानते हैं। समय की माँग है कि ऐसे अधिकारी महत्वपूर्ण केसों में सही तथ्यों को दर्ज कर केस फाइल के ज़रूरी पन्नों पर अपनी निष्पक्ष राय अवश्य दर्ज कराएँ। भविष्य में जब भी कभी केस फाइल की जाँच किसी निष्पक्ष समिति द्वारा की जाएगी तो दूध का दूध और पानी का पानी अपने आप सामने आ जाएगा। ऐसे में एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जाँच एजेंसियों का निष्पक्ष और दबाव मुक्त होना अनिवार्य है। 

शुक्रवार, 23 अगस्त 2024

नमक और चीनी में प्लास्टिक


पिछले सप्ताह एक एनजीओ द्वारा किए गए शोध से पता चला कि देश में अधिकतर नमक और चीनी निर्माता हमें प्लास्टिक के छोटे-छोटे कण खिला रहे हैं। ‘टॉक्सिक्स लिंक’ नाम की एक एनजीओ के पर्यावरण अनुसंधान विभाग द्वारा किए गए एक शोध के बाद यह दावा किया। जबसे यह खबर उजागर हुई तो उपभोक्ताओं के मन में कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। भारत में बढ़ते हुए कैंसर रोग के मरीज़ों, दिल के रोग के मरीज़, मोटापे और अन्य बीमारियों का कारण भी कहीं रोज़मर्रा खाने वाले नमक और चीनी में मौजूद ये प्लास्टिक के कण तो नहीं? यदि ऐसा है तो यह एक गंभीर मामला  है।


घरेलू नमक और चीनी में पाये जाने वाले माइक्रोप्लास्टिक के कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि इन्हें आप अपनी आँख से देख भी नहीं सकते। चिंता की बात यह है कि प्लास्टिक के इतने सूक्ष्म कण आपके शरीर में कई सालों तक रह सकते हैं। इतने वर्ष तक यदि ऐसे कण आपके शरीर में रह जाएँगे तो इनका आपकी सेहत पर दुष्प्रभाव तो पड़ेगा ही। अब चूँकि यह शोध सामने आया है तो इसे गंभीरता से लेते हुए इसकी विस्तृत जाँच भी होनी चाहिए और साथ ही दोषियों के ख़िलाफ़ उचित क़ानूनी कार्यवाही भी की जानी चाहिए।


आज के दौर में हम जितना भी सादा भोजन करें हम किसी न किसी मात्रा में नमक और चीनी तो लेते ही होंगे। यदि इन ज़रूरी तत्वों के सेवन से हमें कैंसर और दिल के रोग होने लग जाएँ तो इंसान कहाँ जाए ? यदि मिलावटी मसालों की बात होती है तो हम अपनी दादी-नानी के घरेलू नुस्ख़े आज़मा कर रोज़मर्रा के मसालों को घर में ही कूट-पीस सकते हैं। यदि दूषित पानी और कीटनाशक से उगी सब्ज़ियों और फलों की शिकायत मिले तो हम जैविक खेती की मदद से शुद्ध सब्ज़ियों और फलों का सेवन कर लेते हैं। परंतु यदि हर घर में इस्तेमाल होने वाले नमक और चीनी में ही इस क़दर मिलावट होने लगे तो आपक्या करेंगे ? लालच इंसान को किस हद तक ले जाता है कि मुनाफ़े के चक्कर में कुछ चुनिंदा  उद्योगपति आम जनता को ज़हर परोस  रहे हैं।

'माइक्रोप्लास्टिक्स इन सॉल्ट एंड शुगर' नाम की इस स्टडी में ‘टॉक्सिक्स लिंक’ ने टेबल सॉल्ट, रॉक सॉल्ट, समुद्री नमक और स्थानीय कच्चे नमक सहित 10 प्रकार के नमक और ऑनलाइन तथा स्थानीय बाजारों से खरीदी गई पांच प्रकार की चीनी का टेस्ट करने के बाद इस स्टडी को पेश किया। अध्ययन में यह चौकने वाला सच सामने आया कि नमक और चीनी के सभी नमूनों में अलग-अलग तरह के माइक्रोप्लास्टिक्स शामिल थे। इनमें फाइबर, पेलेट्स, फिल्म्स और फ्रैगमेंट्स पाये गये। शोध के अनुसार इन माइक्रोप्लास्टिक्स का आकार 0.1 मिमी से 5 मिमी के बीच पाया गया। सबसे अधिक माइक्रोप्लास्टिक्स की मात्रा आयोडीन युक्त नमक में पाई गई, जो मल्टीकलर के पतले फाइबर और फिल्म्स के रूप में थे। जाँच रिपोर्ट के अनुसार, चीनी के नमूनों में, माइक्रोप्लास्टिक्स की मात्रा 11.85 से 68.25 टुकड़े प्रति किलोग्राम तक पाई गई, जिसमें सबसे अधिक मात्रा गैर-ऑर्गेनिक चीनी में पाई गई। वहीं ग़ौरतलब है कि नमक के नमूनों में प्रति किलोग्राम माइक्रोप्लास्टिक्स की मात्रा 6.71 से 89.15 टुकड़े तक पाई गई। आयोडीन वाले नमक में माइक्रोप्लास्टिक्स की सबसे अधिक मात्रा (89.15 टुकड़े प्रति किलोग्राम) और ऑर्गेनिक रॉक सॉल्ट में सबसे कम (6.70 टुकड़े प्रति किलोग्राम) पाई गई।

उल्लेखनीय है कि इस विषय पर किए गए पिछले शोधों में पाया गया है कि औसत भारतीय हर दिन 10.98 ग्राम नमक और लगभग 10 चम्मच चीनी का सेवन करता है, जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की तय सीमा से काफी अधिक है। ऐसे में यदि हमारे शरीर में माइक्रोप्लास्टिक भी प्रवेश कर रहा है तो यह हमें कितना नुक़सान पहुँचाएँगे इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। माइक्रोप्लास्टिक के कण मानव शरीर में मिलावटी भोजन के अलावा हवा और पानी के ज़रिये भी प्रवेश कर सकते हैं। एक अन्य शोध में यह भी पता चला कि माइक्रोप्लास्टिक मानव शरीर में फेंफड़े, हृदय जैसे अन्य महत्वपूर्ण अंगों में बड़ी आसानी से प्रवेश कर लेते हैं। इतना ही नहीं एक शोध में यह भी पाया गया कि नवजात व अजन्में बच्चों में भी माइक्रोप्लास्टिक प्रवेश कर चुके हैं।

चिंता का विषय यह है कि भारत में निर्मित चीनी और नमक में इतनी मात्रा में मिलने वाले ऐसे तत्व क्यों पाये जा रहे हैं? क्या ऐसी स्टडी पहली बार हुई है? इससे पहले भी कई तरह के शोध मिलावटी उत्पादों को लेकर हुए हैं। क्या उन पर उचित कार्यवाही की गई? क्या सरकार ने ऐसे कड़े नियम बनाए कि ऐसी गलती करने पर निर्माताओं के ख़िलाफ़ कड़ी क़ानूनी कार्यवाही की जाए? वैज्ञानिक शोध का मतलब स्पष्ट रूप से यही होता है कि जिस भी शोध में कुछ भी हानिकारक पता चले, उसे जनता के सामने पेश किया जाए। परंतु क्या ऐसे शोध को केवल जनता के सामने लाने से ही समस्या का हल निकल जाएगा? यदि उपभोक्ता जागरूक हो जाए और देश के सरकारी विभाग इस बात को सुनिश्चित कर लें कि किसी भी हाल में जनता को मिलावटी उत्पाद नहीं बेचे जा सकते, तो शायद स्थिति कुछ बेहतर हो। परंतु हमारे देश में जहां हर काम भ्रष्टाचार के ‘पेपर वेट’ के सहारे होता है वहाँ कब, क्या और कितना होगा यह बताना मुश्किल है ?

फ़िलहाल हर उपभोक्ता को जागरूक होना ज़रूरी है। इसके साथ ही देश में ‘टॉक्सिक्स लिंक’ या अन्य सचेत एनजीओ का होना भी ज़रूरी है जो जनहित में ऐसे शोध जनता के सामने लाते हैं। आनेवाले समय में देखना यह होगा कि देश भर में काम कर रही ऐसी तमाम एनजीओ के शोध को सरकार कितनी गंभीरता से लेती है और दोषियों के ख़िलाफ़ क्या क़ानूनी कार्यवाही की जाती है। तब तक के लिए हमें सचेत रहना चाहिए और जहां तक संभव हो मिलावटी उत्पादों से बचना चाहिए।

शनिवार, 17 अगस्त 2024

राम रहीम को फरलो: क़ानून का मखौल!


जब भी किसी अपराधी का अपराध सिद्ध हो जाता है तो उसे अदालत उचित सज़ा सुनाकर जेल भेज देती है। जेल में हर अपराधी, जो दोषी करार दिया जाने के बाद सज़ा काटता है उसे जेल के नियम के तहत अपनी सज़ा पूरी करनी पड़ती है। अपराधी चाहे पेशेवर गुंडा हो, कोई आम आदमी हो जिसके द्वारा किसी विशेष परिस्थिति में अपराध हुआ हो या फिर कोई रसूखदार व्यक्ति हो, क़ानून सबके लिए एक समान है। परंतु क्या ऐसा वास्तव में होता है? क्या हमारी जेलों में सभी के साथ एक जैसा व्यवहार होता है? रसूखदार क़ैदियों के संदर्भ में इस सवाल का जवाब प्रायः आपको ‘नहीं’ में ही मिलेगा।ऐसा क्या कारण है कि जेल के नियम और कायदों को तोड़-मरोड़ कर रसूखदार क़ैदियों को ‘विशेष सुविधाएँ’ दी जाती है? आए दिन हमें ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं ।

जब कभी रसूखदार अपराधी को अदालत से सजा मिलती है तो आम लोगों के मन में यही शक रहता है कि जेल में जा कर भी वो व्यक्ति ऐशो-आराम की ज़िंदगी ही जियेगा। हद तो तब हो जाती है जब इस प्रभावशाली व्यक्ति को अपनी सज़ा के दौरान ही कई बार पैरोल या फरलो मिल जाती है। रसूखदार क़ैदियों को दिये जाने वाले इस विशेष व्यवहार पर जब राजनैतिक तड़का लगता है तो यह व्यवहार कई गुना बढ़ जाता है। यदि यह रसूखदार क़ैदी किसी ऐसे धार्मिक पंथ का मुखिया हो जिसके लाखों या करोड़ों भक्त हों, तो राज्य सरकार हर चुनाव से पहले उसे पैरोल या फरलो पर छोड़ने में देर नहीं करती।डील  यही होती है कि तुम अपने चेलों से हमें वोट दिलवओ और बदले में जेल के भीतर और बाहर मौज मारो।


ताज़ा मामला डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम का है। डेरा प्रमुख को एक हत्या और दो बलात्कार के मामलों में अदालत द्वारा दोषी पाया गया है। परंतु उल्लेखनीय है कि बीते वर्षों में यह अपराधी लगभग 300 से अधिक दिनों तक जेल के बाहर रहा। ग़ौरतलब है कि जिस अपराधी पर इतने संगीन आरोप लगे हों और वो दोषी सिद्ध हो गया हो उस पर बार-बार इतनी मेहरबानी क्यों की जा रही है? डेरा प्रमुख के 6 करोड़ से ज़्यादा भक्त हैं, जो राम -रहीम के एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। ऐसे में यदि इनके डेरे का झुकाव किसी एक राजनैतिक दल के साथ हो तो उस दल को इनके अनुयाइओं का वोट मिलना तो तय ही माना जाएगा। इसीलिए कई राजनैतिक दल इनका आशीर्वाद लेने की क़तार में खड़े रहते हैं। यहाँ ये चर्चा करना बेमानी है कि इतना सब काला सच सामने आने के बाद भी उनके चेलों की आस्था उनमें कैसे बनी रहती है?


इस संदर्भ में यहाँ पैरोल और फरलो को समझना ज़रूरी होगा। जेल नियम के तहत एक साल में अधिकतम 100 दिन तक किसी भी क़ैदी को जेल से बाहर रहने दिया जा सकता है। इसमें 30 दिन की फरलो और 70 दिन का पैरोल शामिल है। जो भी राजनैतिक पार्टी सत्ता में होती है वो हर पार्टी अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए इस प्रावधान का दुरुपयोग करती आई है। आपको ऐसे कई उदाहरण मिल जाएँगे जहां सत्ताधारी दल ने ऐसे रसूखदार क़ैदियों के लिए विशेष कदम उठा कर उसे अधिक से अधिक समय तक जेल से बाहर रखा है। ऐसे हालात में, ऐसे किसी भी क़ैदी, जिसे कैद-ए-बामशक्कत की सज़ा सुनाई गई हो, उससे आप जेल में किसी भी तरह के श्रम की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? जब-जब ऐसे दुर्दांत अपराधियों को जेल के नियम का दुरुपयोग कर जेल के बाहर भेजा जाता है तब तब उस अपराधी से पीड़ित रहे परिवार ख़ुद को बेबस महसूस करते हैं।

हाल ही में एक टीवी डिबेट में बोलते हुए जम्मू कश्मीर के पूर्व डीजीपी डॉ एस पी वैद ने गुरमीत राम रहीम के बार-बार पैरोल या फरलो पर बाहर आने को एक ‘क्लासिकल केस’ बताया। इतना ही नहीं उनके अनुसार, “यह देश का अकेला ऐसा मामला है जहां एक दुर्दांत अपराधी को इतनी बार जेल से बाहर रखा गया है। ऐसे मामले को तो किसी विश्वविद्यालय या पुलिस अनुसंधान विभाग द्वारा एक ‘केस स्टडी’ बनाया जाना चाहिए। जहां ये अध्ययन हो कि कैसे इस मामले में क़ानून की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। इस रसूखदार दुर्दांत अपराधी को हर राजनैतिक दल का समर्थन प्राप्त है। इसलिए ये खुलेआम देश के क़ानून का मज़ाक़ बना रहा है। यदि गुरमीत राम रहीम द्वारा कोई भी पीड़ित व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाए तो इसे मिली इस विशेष सुविधा को तुरंत रद्द किया जा सकता है। गुरमीत राम रहीम जैसे रसूखदार क़ैदियों को चुनावों के आसपास ही पैरोल और फरलो क्यों मिलती है इस बात पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है।”

सवाल उठता है कि क्या देश का क़ानून मामूली क़ैदियों और रसूखदार क़ैदियों के लिए अलग है? क्या दोनों का अपराध मापने के दो मापदंड हैं। इस पर क़ानून के जानकारों का कहना है कि देश की सर्वोच्च अदालत ने ऐसे कई फ़ैसले सुनाए हैं जहां पर पैरोल और फरलो दिये जाने के लिए स्पष्ट निर्देश दिये गये हैं कि किन-किन परिस्थितियों में क़ैदियों को पैरोल और फरलो दिया जा सकता। इतने अधिक समय के लिए पैरोल और फरलो दिये जाने से क़ैदी को दी गई सज़ा के मायने ही कम हो जाते हैं। ऐसा सिर्फ़ इसलिए क्योंकि कोई रसूखदार क़ैदी बलात्कार और हत्या जैसे संगीन अपराध करने के बावजूद अपने राजनैतिक संपर्कों के चलते जेल प्रशासन को अपना ‘अच्छा चाल चलन’ दिखाने में कामयाब हो जाता है।

देश भर की जेलों में लगभग 6 लाख क़ैदी बंद हैं। इनमें से 75 प्रतिशत क़ैदियों का अभी तक ट्रायल भी पूरा नहीं हुआ है। ऐसे में सवाल उठता है कि जिन क़ैदियों का ट्रायल भी  पूरा नहीं हुआ उनके मानवाधिकार का हनन क्यों किया जा रहा है? उन्हें पैरोल और फरलो क्यों नहीं मिल रही? जिस तरह राम रहीम जैसे एक रसूखदार अपराधी को चुनावों के आसपास ऐसे लाभ बार-बार मिल रहे हैं, तो ऐसे में देखना यह होगा कि क्या देश की सर्वोच्च अदालत इस ‘विशेष छूट’ का स्वतः संज्ञान लेती है या नहीं?


शुक्रवार, 9 अगस्त 2024

नजूल विधेयक पर बवाल क्यों?


बीते सप्ताह उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विधान सभा में नजूल संपत्ति अधिनियम पेश किया गया। इस बिल को विधान सभा में तो पास कर दिया गया परंतु उत्तर प्रदेश विधान परिषद में इसका भारी विरोध हुआ जिसके चलते बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष भूपेन्द्र चौधरी की मांग पर इसे सदन ने पास करने की जगह प्रवर समिति को भेजने का फैसला लेकर इसे फ़िलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया। उत्तर प्रदेश में कड़े और विवादास्पद फ़ैसले लेने के लिए प्रसिद्ध मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा लिया गया यह फ़ैसला सही ज़रूर प्रतीत होता है। परंतु जिस तरह इस विधेयक का विरोध उन्हीं की पार्टी द्वारा किया जा रहा है, तो ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में शायद कुछ संशोधन के साथ इसे पुनः पेश किया जाएगा।


उल्लेखनीय है कि जिस भी ज़मीन का कोई वारिस न हो और वो सरकार के अधीन हो, उसे नजूल जमीन कहते हैं। ग़ौरतलब है कि औपनिवेशिक शासन में अंग्रेजों द्वारा भारत में बड़ी मात्रा में ज़मीनों पर क़ब्ज़ा किया गया था। लेकिन आज़ादी के बाद जिस भी नागरिक के पास उसकी ज़मीन के दस्तावेज थे उन्हें उनकी ज़मीन वापिस मिल गई। परंतु ऐसी कई ज़मीनें थीं जिनकी मिलकियत के प्रमाण या जीवित स्वामी उपलब्ध नहीं थे। ऐसी ज़मीनों को सरकार ने अपने पास रखा, जिसे नजूल ज़मीन कहा गया। आज़ादी के बाद इस नजूल ज़मीन पर यदि कोई रह रहा था तो उससे सरकार ने किराया वसूलना शुरू किया और उस ज़मीन को लंबे समय के लिए लीज़ पर देना शुरू कर दिया। इसके बावजूद ऐसी कई नजूल ज़मीनें हैं जिन पर लोग अवैध क़ब्ज़ा कर रह रहे हैं। कुछ लोग तो निचले स्तर के अधिकारियों से साँठ-गाँठ कर नजूल ज़मीन के पट्टे भी अपने नाम करवा लेते थे। ऐसी कई ज़मीनों पर खेती, मंदिर, दुकानें या अन्य प्रतिष्ठान भी बनने लगे।         


परंतु जैसे ही उत्तर प्रदेश में नजूल संपत्ति अधिनियम पेश हुआ, तो सरकार ने इस बात को स्पष्ट कर दिया कि जिस-जिस नजूल ज़मीन पर लोग ग़ैर क़ानूनी ढंग से रह रहे हैं या जिन नजूल ज़मीनों की लीज़ का किराया सरकार को नहीं दिया जा रहा, उस नजूल ज़मीन को उत्तर प्रदेश की सरकार वापिस ले लेगी और इस भूमि को सरकारी विकास कार्य के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। योगी जी द्वारा उठाया गया ये कदम सही था। परंतु विपक्ष को इस बात पर शक है कि विकास कार्य के नाम पर कहीं प्रदेश की लाखों करोड़ की हज़ारों एकड़ ज़मीन को अपने ख़ास चुनिंदा लोगों के बीच बाँट दिया जाएगा।

इतना ही नहीं भाजपा के विधायक भी इस अधिनियम के विरोध में उतर आये हैं। उनका कहना है कि प्रदेश में ऐसी कई ज़मीनें हैं जिन पर शागिर्द-पेशा वाले परिवार रह रहे हैं, जो सदियों से वहाँ रह रहे हैं परंतु उनके पास कोई भी प्रमाण नहीं है। ऐसे में उनका क्या होगा? कई भाजपा विधायकों का तो यह भी कहना है कि एक तरफ़ तो प्रधान मंत्री आवास योजना से बेघर लोगों को घर दिये जा रहे हैं और वहीं दूसरी ओर जो ग़रीब दशकों से यहाँ रह रहे हैं उन्हें बेघर किया जा रहा है। तो भला ऐसे बिल का क्या औचित्य?

जैसे ही इस अधिनियम पर राजनीति तेज हुई विपक्ष भी खुलकर सामने आया। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर इसका विरोध जताते हुए लिखा, “नजूल लैंड का मामला पूरी तरह से ‘घर उजाड़ने’ का फ़ैसला है क्योंकि बुलडोज़र हर घर पर नहीं चल सकता है। भाजपा घर-परिवार वालों के ख़िलाफ़ है। जनता को दुख देने में भाजपा अपनी ख़ुशी मानती है। जब से भाजपा आई है, तब से जनता रोजी-रोटी-रोज़गार के लिए भटक रही है, और अब भाजपाई मकान भी छीनना चाहते हैं। कुछ लोगों के पास दो जगह का विकल्प है, पर हर एक उनके जैसा नहीं है। बसे बसाये घर उजाड़कर भाजपा वालों को क्या मिलेगा। क्या भू-माफ़ियाओं के लिए भाजपा जनता को बेघर कर देगी? अगर भाजपा को लगता है कि उनका ये फ़ैसला सही है तो हम डंके की चोट पर कहते हैं, अगर हिम्मत है तो इसे पूरे देश में लागू करके दिखाएं क्योंकि नजूल लैंड केवल यूपी में ही नहीं पूरे देश में है।”

देखा जाए तो इस अधिनियम के विरुद्ध में हो रहे विवाद में भाजपा और विपक्षी नेताओं द्वारा सही एतराज़ उठाया जा रहा है। यदि सरकार को ऐसा अधिनियम लाना ही था तो उसे नजूल भूमि पर सदियों से बसे हुए परिवारों को पुनर्वास करने की योजना भी बनानी चाहिए थी। यदि नजूल भूमि को अवैध क़ब्ज़े से मुक्त ही कराना है तो इसके हर पहलू पर गहन विचार के बाद ही इसे पेश किया जाना चाहिए था। चूँकि उत्तर प्रदेश और केंद्र में दोनों ही जगह भाजपा की सरकार है तो योगी जी को प्रधान मंत्री मोदी के साथ इस पर चर्चा करनी चाहिए थी। इसे भाजपा शासित किसी छोटे राज्य में लागू करना चाहिए था। इस अधिनियम को लाने से पहले सरकार द्वारा यहाँ पर बसे लोगों को पुनर्वास करने की योजना बना लेनी चाहिए थी। सरकार को इन नजूल भूमि पर किए जाने वाले विकास कार्यों की सूची भी बना लेनी चाहिए थी। सरकार द्वारा नजूल भूमि पर अवैध रूप से पट्टे जारी करने वाले भ्रष्ट अधिकारियों को दंड देने का भी प्रावधान बनाना चाहिए था। यदि इन सब पहलुओं पर सरकार द्वारा नहीं सोचा गया तो ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ को सलाह देने वाले अधिकारियों ने आनन-फ़ानन में इस अधिनियम को पेश करवाया। देखना यह होगा कि आने वाले समय में प्रवर समिति इस अधिनियम पर क्या सुझाव देती है? 

शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

क्या केवल कोचिंग सेंटर ही ज़िम्मेदार हैं?


देश की राजधानी दिल्ली में कोचिंग सेंटर में हुए हादसे ने सभी को हिला दिया है। जिसे देखो वो कोचिंग सेंटर के संचालकों पर उँगली उठा रहा है। जबकि ऐसे हादसों में केवल उनकी गलती नहीं होती। यह बात जग-ज़ाहिर है कि हर एक कोचिंग सेंटर के साथ एक संगठित क्षेत्र जुड़ा होता है। फिर वो चाहे वहाँ पढ़ने वाले विद्यार्थियों के रहने के लिए हॉस्टल व्यवस्था हो, भोजन व्यवस्था वाले हों, किताब की दुकानें हों या अन्य संबंधित व्यवस्था प्रदान करने वाले हों। परंतु जब भी कभी कोई हादसा होता है तो केवल कोचिंग सेंटर को ही कटघरे में क्यों लाया जाता है? क्या कोचिंग सेंटर चलाने की अनुमति प्रदान करने वाली एजेंसियाँ इसकी ज़िम्मेदार नहीं हैं?


दिल्ली के राजेंद्र नगर में हुए राउस आईएएस स्टडी सेंटर के हादसे के बाद से ही देश भर में कोचिंग सेंटर चलाने वाली कई नामी संस्थाएँ सवालों के घेरे में आ गई हैं। इन पर आरोप है कि ये नियम और क़ानून के अनुसार अपने कोचिंग सेंटर नहीं चलाते। एक-एक कक्षा में क्षमता से ज़्यादा विद्यार्थी भर्ती कर लेते हैं। दिल्ली जैसे महानगर में देश के कोने-कोने से आए हुए विद्यार्थियों को छोटे-छोटे पिंजरों में रहने को मजबूर होना पड़ता है। दिल्ली के रिहायशी इलाक़ों की तंग गलियों में भी क्षमता से अधिक लोग दिखाई देते हैं। ऐसे में कोचिंग सेंटर और उनसे जुड़े अन्य उद्योग, जैसे कि ‘पेइंग गेस्ट’, हॉस्टल, किताब घर, छोटे-छोटे ढाबे आदि नियम और क़ानून की परवाह किए बिना अधिक से अधिक विद्यार्थियों की सेवा में लग जाते हैं। यहाँ सवाल उठता है कि क्या ये सब रातों-रात हो जाता है? क्या स्थानीय पुलिस, नगर निगम आदि सोते रहते हैं? क्या इन सभी को कोई टोकता नहीं है?


सबसे पहले बात करें पुलिस की। एक पुलिस अधिकारी से बात करने पर पता चला कि जैसे ही कोई अपने रिहायशी मकान में या नगर निगम द्वारा मान्यता प्राप्त दुकान में कुछ भी छेड़-छाड़ करता है, तो पुलिस की ज़िम्मेदारी केवल नगर निगम को इत्तला देने की होती है। इस इत्तला की जानकारी पुलिस को अपने रोज़नामचे में भी करनी चाहिए। पुलिस के अनुसार यदि इत्तला देने के बावजूद नगर निगम अधिकारी कोई कार्यवाही नहीं करते तो पुलिस उसी हिसाब से रोज़नामचे में एंट्री कर देती है। जब तक कि किसी भी तरह की क़ानून व्यवस्था की समस्या न हो पुलिस अपनी सीमित ज़िम्मेदारी निभाती है। परंतु क्या ऐसा वास्तव में ज़मीनी स्तर पर होता है?


अब बात करें नगर निगम की। क्या पुलिस द्वारा इत्तला किए जाने पर निगम के अधिकारी ‘उचित क़ानूनी कार्यवाही’ करते हैं या देश भर के नगर निगमों में व्याप्त भ्रष्टाचार के मकड़ जाल का हिस्सा बन वे भी अनदेखी कर देते हैं। यदि कभी कार्यवाही करनी भी पड़े तो केवल औपचारिकता निभा कर छोटा-मोटा हथौड़ा चला देते हैं। परंतु वास्तविकता कुछ और ही है। क़रीब तीस वर्षों से एक निजी कोचिंग सेंटर चालाने वाले मेरे एक मित्र ने मुझे जो बताया वो हतप्रभ करने वाली जानकारी है। उनके अनुसार जब भी और जहां भी एक कोचिंग सेंटर खुलता है वहाँ एक पूरा तंत्र सक्रिय हो जाता है। इस तंत्र का हिस्सा हर वो व्यक्ति होता है जो कोचिंग सेंटर के चलने के हर पहलू का ध्यान रखता है।

भारत जैसे देश में जहां किसी भी क्षेत्र में अगर कोई कामयाब हो जाता है तो उस दिशा में भेड़-चाल शुरू हो जाती है। हमारे देश में विभिन्न एजेंसियों के अधिकारियों पर लापरवाही करने पर कड़ी सज़ा का प्रावधान क्यों नहीं है, जिससे सबक़ लेकर अन्य अधिकारी ऐसी गलती न करें? इस हादसे की यदि एक निष्पक्ष जाँच हो तो सभी तथ्य सामने आ जाएँगे। यदि ऐसा होता है तो बरसों से चले आ रहे इस भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा बने अधिकारी और नेताओं का भी भंडाफोड़ हो सकता है।

ग़ौरतलब है कि देश की शिक्षा व्यवस्था में ऐसी क्या कमी है कि विद्यार्थियों को एक्स्ट्रा कोचिंग लेनी पड़ती है? स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम को ऐसा क्यों नहीं बनाया जाता कि जिस भी विद्यार्थी को सिविल सेवाओं या अन्य किसी विशेष सेवा में जाना हो तो उसे उसी के कॉलेज में वह शिक्षा मिले? यदि एक्स्ट्रा कोचिंग ज़रूरी हो तो भी तमाम कोचिंग सेंटर को मौजूदा स्कूल और कॉलेजों में ही क्यों न चलाया जाए? यदि ऐसा किया जाए तो कोचिंग सेंटर चलाने वालों को भी एक व्यवस्थित जगह मिल जाएगी और विद्यार्थियों को भी एक खुले वातावरण में पढ़ने का मौक़ा मिलेगा। मौजूदा कोचिंग सेंटर में जहां प्रति कक्षा लगभग 500 विद्यार्थी बैठते हैं उस पर भी रोक लगेगी। अच्छे व काबिल शिक्षकों को भी रोज़गार मिलेगा। यदि अतिरिक्त शिक्षक भर्ती न किए जा सकें तो आजकल के सूचना प्रौद्योगिकी के युग में एक नियंत्रित ढंग से उसी बिल्डिंग में वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के माध्यम से विभिन्न कक्षाओं को एक साथ चलाया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो स्कूल/कॉलेज की छुट्टी होने पर दूसरी शिफ्ट में कोचिंग सेंटर चलाए जा सकते हैं। इससे स्कूल/कॉलेजों को किराये के रूप में अतिरिक्त आय भी मिलेगी और कोचिंग सेंटर वालों को सस्ते दर पर जमा-जमाया कोचिंग सेंटर भी मिल जाएगा।

यदि ऐसे हादसों को रोकना है तो देश में नियम बनाने की ज़रूरत है जहां नियमों के तहत ही कोचिंग सेंटर चल पाएँ मन माने तरीक़े से नहीं। जिस तरह एक बड़ा अस्पताल, होटल या मॉल खुलता है तो उसे तमाम विभागों से अनुमति लेना अनिवार्य होता है। उसी तरह यदि सरकार चाहे तो कोचिंग सेंटर के इस तंत्र को नियंत्रित कर सकती है। ऐसे में यदि कोचिंग सेंटर और संबंधित एजेंसियाँ पारदर्शिता से अपना कर्तव्य निभाएँ तो ऐसे हादसों पर काफ़ी हद तक रोक लग सकेगी।