शुक्रवार, 31 जनवरी 2025

कुंभ के आयोजन से सीख लें

बीते कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में महाकुंभ जैसे भव्य और जटिल आयोजन के सफल प्रबंधन को लेकर मीडिया में खबरों की भरमार थी। सोशल मीडिया में भी तमाम विशिष्ट व्यक्तियों और जानीमानी हस्तियों के वीडियो भी वायरल हो रहे थे। राज्य सरकार भी इस आयोजन को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रही थी। इतने बड़े आयोजन का बिना किसी हादसे के सफल होना न केवल गर्व की बात है बल्कि इससे राज्य सरकार की प्रबंधन क्षमता का प्रमाण भी मिलता है। परंतु महा कुंभ में मौनी अमावस्या को हुई भगदड़ ने इस कार्यक्रम की कई कमियों की पोल खोल दी। राज्य में सरकार किसी भी दल की क्यों न हो यदि इतने बड़े स्तर पर होने वाले आयोजन किए जाएँ तो इससे प्रदेश सरकार की संगठनात्मक दक्षता, प्रशासनिक क्षमता और आपातकालीन स्थितियों से निपटने की तत्परता की परीक्षा भी होती है। यदि कोई भी अप्रिय घटना न घटे तो यह निःसंदेह प्रशंसनीय कार्य होता है। वहीं यदि कोई छुट-पुट घटना भी घट जाए तो हर कोई आयोजकों की बुराई करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। करोड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति, बुनियादी सुविधाओं का प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाओं का संचालन, यातायात नियंत्रण, और सुरक्षा प्रबंध, प्रदेश के प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती होती है।

ऐसे में इतने बड़े स्तर पर होने वाले कार्यक्रम में ‘वीआईपीयों’ को झेलना प्रशासन के लिये एक बड़ी समस्या बन जाता है।परंतु सोचने वाली बात यह है कि जो सरकारी तंत्र आम जनता के लिए इतने बड़े स्तर पर आयोजन करती है, उसी तनाव के बीच यदि उसे वीआईपी बंदोबस्त भी करना पड़े तो उनके हाथ-पाँव फूलना असाधारण नहीं माना जाएगा। ठीक इसी तरह यदि वही सरकारी ढाँचा उसी दक्षता और इच्छाशक्ति से आम जनता की सेवा में भी उत्साहित दिखाई दे तो शायद किसी भी वीआईपी को भीड़ को चीरते हुए आगे निकलने की ज़रूरत ही न पड़े। लेकिन क्या ऐसा होता है? क्या यही तत्परता और तेज़ी जनता की समस्याओं, जैसे भ्रष्टाचार, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, महंगाई, और असमानता को हल करने में उपयोग की जाती है? यदि ऐसा हो तो देश का हर राज्य वहाँ के विकास में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।

कुंभ में हुई भगदड़ की गहराई से जाँच होने पर ही असल कारण का पता चलेगा। परंतु यहाँ सवाल उठता है कि यदि इतने बड़े स्तर पर आयोजन किए गए तो क्या प्रशासन को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि मेले में इतनी ज़्यादा भीड़ आएगी? यदि शुरुआती दौर में इस बात का अंदाज़ा नहीं था तो जब कुंभ में इतनी ज़्यादा भीड़ आने लगी तो प्रशासन ने इस दिशा में क्या कदम उठाए? विपक्षी पार्टियों का प्रश्न है कि क्या पूरा प्रशासन केवल वीआईपी बंदोबस्त में ही लगा था? यदि प्रशासन को यह पता था कि इस ऐतिहासिक आयोजन में करोड़ों श्रद्धालुओं के अलावा सैंकड़ों वीआईपी भी आएँगे तो इस स्थिति से निपटने के लिए क्या इंतज़ाम किए गए? इन सभी बिंदुओं पर जवाबदेही को तय करना भी अनिवार्य होना चाहिए। ये सब तभी कामयाब होंगे जब इनमें जन भागीदारी भी बढ़ेगी।

जिस तरह कुंभ जैसे आयोजन में सीमित समय और संसाधनों का कुशल उपयोग किया गया। यही मॉडल देश में गरीबी और बेरोजगारी के समाधान में भी लागू किया जा सकता है। इसके लिए कौशल विकास केंद्र बनाए जाएँ जहां युवाओं को रोजगारपरक प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार के अवसर प्रदान किए जाएँ। स्थानीय उद्योगों का विकास करके प्रदेश के हर जिले में स्थानीय कुटीर उद्योग और कृषि आधारित व्यवसायों को बढ़ावा देना चाहिए। रोजगार सृजन योजनाएं लागू करके सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए विशेष योजनाएं शुरू की जाएँ। केवल चुनावी घोषणाओं से जनता प्रभावित नहीं होती।

कुंभ के आयोजन में जिस प्रकार जागरूकता अभियान चलाए गए, उसी तरह अशिक्षा के खिलाफ भी आंदोलन चलाया जा सकता है। इसके लिए प्रत्येक गांव और क़स्बे में ऐसे स्कूल खुलें जो प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करें। इसके साथ ही ग्रामीण इलाक़ों में डिजिटल शिक्षा को भी बढ़ावा दिया जाए।

कुंभ के दौरान सीमित बजट में बड़े आयोजन को सफलतापूर्वक पूरा किया गया। यही रणनीति महंगाई और आर्थिक असमानता को दूर करने में उपयोगी हो सकती है। इसके लिए सरकार को मूलभूत वस्तुओं की सस्ती उपलब्धता पर ज़ोर देना चाहिए और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को और मजबूत करना चाहिए। आज के दौर में आम जनता बढ़ती हुई महंगाई से काफ़ी त्रस्त है। सरकारों को चाहिए कि वे मुफ़्त की रेवड़ी के बजाए आर्थिक समानता पर ज़ोर दे जिससे कि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को नई योजनाओं से सहारा मिलेगा। इसके साथ ही कृषि नियमों में सुधार लाकर किसानों को सशक्त बनाया जाए और कृषि उत्पादकता और उनकी आय बढ़ावा भी मिले।

आशावादी होना अच्छा है। महाकुंभ के प्रबंधन ने यह साबित कर दिया है कि उत्तर प्रदेश का प्रशासन किसी भी बड़ी चुनौती से निपटने की क्षमता रखता है। अगर यही इच्छाशक्ति और कुशलता भ्रष्टाचार, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, महंगाई, और असमानता जैसी जन समस्याओं को हल करने में लगाई जाए, तो उत्तर प्रदेश एक नए युग की शुरुआत कर सकता है। यह समय है कि कुंभ प्रबंधन से सीखे गए सबकों को जनहित में लागू किया जाए और एक ऐसा समाज बनाया जाए, जहां हर व्यक्ति को समान अवसर और सुविधाएं प्राप्त हों। प्रदेश के तेजस्वी मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यह संभव है, बशर्ते सरकार इस दिशा में ठोस और स्थायी कदम उठाए। जन समस्याओं का समाधान केवल एक प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक सामाजिक कर्तव्य है। इसके लिए सरकार को जनता का और बदले में जनता को सरकार का पूर्ण सहयोग प्राप्त हो तभी एक नया उदाहरण स्थापित होगा। यदि एक प्रदेश में ऐसा हो सकता है तो संपूर्ण भारत में ऐसा होने में देर नहीं लगेगी।

       

शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

फ़र्ज़ी कॉलेजों के जाल में फँसते मासूम छात्र


देश में सूचना क्रान्ति, उदारीकरण और उपभोक्ता संस्कृति तीनों ने मिलकर गांव और कस्बों के नौजवानों के मन में कुछ नया सीखने और व्यावसायिक जगत में आगे बढ़ने की ललक पैदा कर दी है। उनकी इस ललक को बढ़ाने का काम कर रहे हैं देश भर में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हजारों देसी व विदेशी उच्च शिक्षा संस्थान। इनकी दुकान जितनी ऊंची है, उतनी फीकी भी। यह किसी से छिपा नहीं है कि देश के बहुसंख्यक विद्यार्थियों को शिक्षा का सही वातावरण तक नहीं मिलता। शिक्षा के नाम पर खानापूर्ति ही ज्यादा होती है। ऐसे में कमजोर नींव पर खड़े इन नौजवानों को यह शिक्षा संस्थान सपने दिखाकर, झूठे वायदे करके और भ्रामक सूचनाएं देकर आकर्षित कर लेते हैं। इनके जाल में फंसने वाले नहीं जानते कि जिन फर्जी सर्टिफिकेट या डिग्रियों को बांटकर यह लोग सुनहरे भविष्य के सपने दिखा रहे हैं, उन्हें लेकर वे सिर्फ धक्के ही खाएंगे। इनकी बदौलत कोई ढंग की नौकरी मिलना मुश्किल नहीं तो आसान भी नहीं है। अगर एमबीए करके कपड़े की दुकान पर पन्द्रह सौ रुपये महीने की सेल्समैनशिप मिली, तो कौन सा तीर मार लिया। इतना ही नहीं, प्रोफेशनल कोर्स की पढ़ाई से आने वाला आत्मविश्वास भी यह डिग्रियां नहीं दे पातीं।


ग़ौरतलब है कि ग़रीब घर से आए ये छात्र अपनी ज़मीन जायदाद को बेच कर या गिरवी रख कर इन संस्थानों में लाखों रुपये देकर पढ़ने आते हैं। इन छात्रों के मन में हमेशा एक डर सा बना रहता है कि कहीं ऐसा न हो कि पढ़कर भी नौकरी न मिले। यदि सर्वेक्षण किया जाए तो यह बात सिद्ध भी हो जाएगी कि लाखों रुपये लेकर दाखिला देने वाले इन इंजीनियरिंग, मेडिकल या मैनेजमेंट कॉलेजों के ज्यादातर छात्रों को बरसों तक माकूल रोजगार नहीं मिलता। यह तो उन लोगों की बात है जो जानते-बूझते हुए ऐसी डिग्रियां लेते हैं। लेकिन भारत में बहुत से ऐसे भी शिक्षण संस्थान भी हैं, जो असली होने का दावा करते हुए लाखों लोगों को सर्टिफिकेट और डिग्रियां बांट चुके हैं। जबकि है ये पूरे फर्जी। इनके काम करने के तौर तरीके देखकर कोई भी इन्हें असली मान लेता है। पर, वास्तव में यह असली नहीं होते। कहने के लिए इनके पास देश की जानी-मानी संस्थाओं से संबद्धता के भी प्रमाण होते हैं और यह अपने यहां पढ़ने वाले लोगों को देश-विदेश की बेहतरीन कंपनियों में नौकरी दिलाने का भी पक्का वायदा करते हैं। इसी झांसे में आकर प्रतिवर्ष लाखों लोग इनके चंगुल में फंस जाते हैं और मोटी रकम चुकाकर एक डिग्री हासिल करते हैं, जो वास्तव में जाली होती है, जिसे जारी करने का भी अधिकार इन संस्थानों को नहीं होता।


विश्व विद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम 1956 की धारा 22 के मुताबिक, डिग्री प्रदान करने का अधिकार केवल उन्हीं विश्वविद्यालयों को है जो केन्द्र अथवा राज्य के कानूनों के तहत स्थापित किए गए हों या यूजीसी अधिनियम की धारा 3 के तहत यूनिवर्सिटी की मान्यता प्राप्त हो अथवा संसद द्वारा विशेष रूप से किसी संस्थान को डिग्री प्रदान करने की अनुमति दी गई हो। इसके अलावा अन्य कोई भी विश्वविद्यालय डिग्री प्रदान नहीं कर सकता। यदि वह ऐसा करता है तो कानूनन गलत है। यूजीसी एक्ट की धारा 23 के मुताबिक केन्द्र, राज्य अथवा प्रांतीय अधिनियम के अंतर्गत गठित विश्वविद्यालयों को छोड़कर किसी भी अन्य संस्थान को अपने नाम के साथ यूनिवर्सिटी या विश्वविद्यालय शब्द प्रयोग करने की अनुमति नहीं है। पर छोटे शहरों की छोडें, प्रांतों की राजधानी तक में ऐसे तमाम फर्जी विश्वविद्यालयों के बोर्ड लगे मिल जाएंगे। स्थानीय सरकारें सब जानते हुए भी खामोश बैठी रहती हैं। कारण साफ है। प्रायः इन कॉलेजों के संस्थापक या प्रबंधक क्षेत्र या प्रांत के प्रतिष्ठित राजनेता होते हैं, जिनकी रुचि शिक्षा के प्रसार में नहीं बल्कि बेरोजगारों की मजबूरी का फायदा उठाकर मोटी कमाई करने में होती है।


प्रायः फर्जी विश्वविद्यालयों तथा जाली डिग्रियों को बांटने से रोकने के लिए संसदीय समिति द्वारा कुछ सुझाव जाते हैं, जैसे यूजीसी या शिक्षा विभाग जाली विश्वविद्यालयों व संस्थानों की एक सूची बनाए, यूजीसी तथा शिक्षा विभाग अखबारों में छपने वाले फर्जी विश्वविद्यालयों के विज्ञापनों के बारे में प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया तथा एडीटर्स गिल्स को अवगत कराकर अखबारों में ऐसे विज्ञापनों को प्रतिबंधित करवाए, यूजीसी को दोषी संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई करने के ज्यादा अधिकार दिए जाएं आदि-आदि। पर, ऐसी कितनी सूचनाएँ हैं जो हम तक पहुँचती हैं?


इन धोखेबाज संस्थाओं के जाल में अक्सर वही छात्र फंसते हैं, जो छोटे शहरों या कस्बों में रहते हैं, जिन्हें ऐसी संस्थाओं के कारनामों की जानकारी नहीं होती। कई बार तो बहुत से विश्वविद्यालय, कॉलेज अथवा स्कूल अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर कहते हैं कि उनकी डिग्रियां फलाने संस्थान से मान्यता प्राप्त हैं, फलाने संस्थान से संबद्ध है। कई तो कुछ कदम आगे बढ़कर जाली नाम वाली विदेशी संस्थाओं से भी अपनी संबद्धता दिखा देते हैं। असलियत से बेखबर भोले भाले नौजवान इन संस्थाओं के तड़क-भड़क वाले जाल में फंसकर अपना पैसा तो बरबाद करते ही हैं, साथ ही अपने भविष्य में भी पलीता लगा लेते हैं।

यह सही है कि इन निजी संस्थाओं में छात्रों को सुविधाएँ अधिक दी जाती हैं, परंतु सही और वैधानिक संस्थाओं की आड में कुछ नकली संस्थाएँ भी छात्रों का शोषण करती हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। कुछ मामलों में तो देश के नामी विश्वविद्यालयों के उच्च पदस्थ अधिकारी भी इन संस्थाओं के कामकाज में शामिल पाए गए। यूजीसी और अन्य रेग्यूलेटरी  अथारिटी, एडवर्टाइजमेंट स्टेंडर्डस काउंसिल ऑफ़ इंडिया (एएससीआई), इंडियन न्यूजपेपर्स सोसायटी तथा मोनोपोलीज एंड रेस्ट्रिक्टिव ट्रेड प्रेक्टिसेज कमीशन को एकसाथ मिलकर एक ऐसी प्रक्रिया तैयार करनी चाहिए, जिनसे ऐसे धोखेबाज विज्ञापनों पर रोक लग सके। 

शुक्रवार, 17 जनवरी 2025

मरीज़ों की मजबूरी का फ़ायदा उठाते अस्पताल


आज से क़रीब पैंतीस वर्ष पहले दिल्ली के एक पाँच सितारा होटल में नेत्र विशेषज्ञों की एक अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए देश के पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह ने बड़े शायराना अन्दाज़ में डॉक्टरों को सम्मान दिया। अपने भाषण में उन्होंने एक शेर सुनाया, ‘तुमको ख़ुदा कहूँ या ख़ुदा को ख़ुदा कहूँ, दोनों की शक्ल एक है किसको ख़ुदा कहूँ’। पूरे हॉल में बज रही तालियों से यह बात स्पष्ट हो गई कि ज्ञानी जी जो संदेश देना चाहते थे वह सही जगह पहुँचा। दरअसल डॉक्टरों का सम्मान हर कोई इसी उम्मीद से करता है कि भगवान और माता-पिता के बाद यदि कोई पूजनीय है तो वह डॉक्टर भी हैं। परंतु यदि कुछ चुनिंदा और लालची डॉक्टर अपने पेशे से बेईमानी करने लगें तो लोगों का डॉक्टरों की पूरी जमात पर से ही विश्वास उठने लगेगा।

आये दिन हमें यह देखने को मिलता है कि जब किसी मरीज़ को इलाज के लिए किसी बड़े प्राइवेट अस्पताल में जाना पड़ता है तो उसे काफ़ी खर्च करना पड़ता है। हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाएँ अभी इतनी बेहतर नहीं हुई है कि हर नागरिक को अच्छे से अच्छा इलाज कम से कम दर पर मिले। यदि आपके पास मेडिक्लेम न हो तो इलाज करवाना आसान नहीं। परंतु मेडिक्लेम का नाम सुनते ही अस्पताल वाले आपसे अनाप-शनाप पैसे लेने लग जाते हैं। साथ ही आपके इलाज में जुटे डॉक्टर भी ऐसे तमाम टेस्ट आदि लिखवा देते हैं जिनकी शायद ज़रूरत ही न हो। बीमा कंपनियों और कुछ निजी अस्पतालों के द्वारा चल रहे ‘मेडिक्लेम’ के गोरखधंधे के बारे में आये दिन शोर मचाता रहता है। क्या यह कहना सही नहीं होगा कि सेवा भाव से चलने वाले कुछ चैरिटेबल अस्पतालों को छोड़ कर कई नामी प्राइवेट अस्पताल मरीज़ों को केवल कमाई का ज़रिया ही मानते हैं?


कुछ समय पहले मुंबई के सात नामी अस्पतालों के ख़िलाफ़ ऐसा ही नाजायज़ बिलिंग और मरीज़ों से ठगी के मामले में केस दर्ज हुआ। इन अस्पतालों ने मरीज़ों से दवा पर छपे हुए दामों से कहीं अधिक रुपये वसूले। जब मामला जाँच एजेंसियों के पास पहुँचा तो सच सामने आया और इनके ख़िलाफ़ केस दर्ज हुए। जाँच में यह पाया गया कि जिस दर पर दवाइयाँ और अन्य सामग्री अस्पतालों को सप्लाई की जा रही थी, उसमें और मरीज़ों से लिये जाने वाली रक़म में भारी अंतर था। इतना ही नहीं कई दवाओं और ज़रूरी सामग्री पर तो यह भी स्पष्ट रूप से नहीं लिखा था कि इस विदेशी दवा या ज़रूरी वस्तु को किसने आयात किया और कब आयात किया। साथ ही इन पर मैन्यूफ़ैक्चरिंग की तिथि भी नहीं छपी थी। इसके साथ ही कई दवाओं और वस्तुओं पर तो अधिकतम विक्रय दर (एमआरपी) भी नहीं छपा था। अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की तरह मेडिकल वस्तुओं की बिक्री में ऐसा करना ग़ैर-क़ानूनी है। परंतु शायद इन बड़े अस्पतालों के रसूख़ के चलते कोई आवाज़ नहीं उठाता या यदि कोई आवाज़ उठाए तो मामले की तह तक नहीं पहुँचने दिया जाता।

जानकारों के मुताबिक़ हृदय रोग में इस्तेमाल किए जाने वाले स्टेंट की मरीज़ों के लिए औसत मूल्य लगभग 2 लाख रुपए होती है। जबकि इसकी असल क़ीमत 10 से 15 हज़ार ही होती है। दरअसल इस स्टेंट को आयात करने वाला व्यक्ति इसे डिस्ट्रीब्यूटर को 40 हज़ार का बेचता है। अस्पताल को यह स्टेंट 80 से 90 हज़ार का मिलता है। अस्पताल इसे मरीज़ को 1.75 लाख से 2 लाख का बेचते हैं। ज़रा सोचिए जिस वस्तु की क़ीमत 10 से 15 हज़ार होती है और उसमें भी इसे बनाने वाले का मुनाफ़ा शामिल है, उसे कई गुना दामों पर बेच कर न सिर्फ़ मोटा मुनाफ़ा कमाया जा रहा है बल्कि मरीज़ों की मजबूरी का भरपूर फ़ायदा भी उठाया जा रहा है। इसलिए आज के युग में सभी को जागरूक और जानकार होने की ज़रूरत है।    

यदि मरीज़ के पास किसी भी तरह का स्वास्थ्य बीमा या मेडिक्लेम है तो आपको भर्ती होने के लिए दबाव डाला जाता है। केवल इसी दृष्टि से कि बिना भर्ती हुए आप मेडिक्लेम की कैशलेस सुविधा का फ़ायदा नहीं उठा पाएँगे। कैशलेस यानी कि मुफ़्त का इलाज। मुफ़्त के इलाज के लालच में मरीज़ और उसके तीमारदार भी अस्पताल के झाँसे में आ जाते हैं और बिना पढ़े कई सारे काग़ज़ों पर हस्ताक्षर भी कर देते हैं। फिर क्या, अस्पताल आपके साथ राजाओं की तरह का व्यवहार करता है। इस दिखावट की आड़ में अस्पताल ऐसे तमाम टेस्ट और जाँच शुरू कर देता है जिनकी इलाज की दृष्टि से ज़रा भी आवश्यकता नहीं होती। ऐसा केवल बीमा कंपनी को एक मोटा बिल भेजने की मंशा से किया जाता है।

जब तक देश में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए तय मापदंड नहीं बनेंगे और उन्हें सख़्ती से लागू नहीं किया जाएगा तब-तब ऐसा होता रहेगा। सरकार को चाहिए कि हर इलाज के लिए मापदंडों को तय किया जाए और देश भर के सभी अस्पतालों में इलाज के मापदंड और उनकी दरों को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाए। इससे अज्ञानी मरीज़ों व उनके रिश्तेदारों को सभी तय नियम और मापदंड के बारे में पता रहेगा और साथ ही उनको इलाज के लिए कितना पैसा देना होगा उसकी भी जानकारी मिल सकेगी। यदि ऐसा होता है तो कभी भी कोई अस्पताल किसी की छोटी सी चोट के लिये प्लास्टिक सर्जरी करने की जुर्रत नहीं करेगा। इससे बीमा कंपनी की ठगी भी कम होगी, स्वास्थ्य सेवाएँ भी बेहतर होंगी और करदाता के पैसे की लूट भी बचेगी। 

शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

असभ्य नेताओं के बिगड़े बोल पर लगे लगाम

चुनावी सभा हो या संसद सदन जब भी नेताओं के बोल बिगड़ते हैं तो सुर्ख़ियाँ बनते देर नहीं लगती। परंतु सोचने वाली बात यह है कि जहां एक ओर हमारे देश में राजनेताओं की एक जमात ऐसी थी जो नैतिकता का पालन करती थी। वहीं दूसरी ओर बीते कुछ वर्षों से राजनेताओं के बयानों में आपको अभद्रता के कई उदाहरण मिलेंगे। दल चाहे कोई भी हो नेताओं की ज़बान फिसलते देर नहीं लगती। फिर वो चाहे किसी पुरुष नेता का महिला के संदर्भ में दिया गया बयान हो, किस धर्म या जाती विशेष के लोगों के ख़िलाफ़ दिया गया बयान हो या किस महिला नेता का किसी आम आदमी को धमकाने वाला बयान हो। नेता अपनी कुर्सी की गर्मी और अहंकार के चलते सभी हदें पार कर देते हैं।


बीते कुछ दिनों में अलग-अलग दलों के नेताओं द्वारा जिस तरह की बयानबाज़ी देखने को मिली है उससे यह बात तो साफ़ है कि नेता सुर्ख़ियों में बने रहने के लिए किसी भी स्तर पर जा सकते हैं। ऐसे में देखना यह है कि राजनैतिक दलों का शीर्ष नेतृत्व ऐसे बेलगाम नेताओं के ख़िलाफ़ क्या कार्यवाही करता है। यदि कोई भी दल इस बात की दुहाई दे कि वे महिला सम्मान के प्रति कटिबद्ध है और वहीं उसी के दल के नेता किसी जनसभा में किसी सड़क की तुलना विपक्षी दल की किसी महिला नेता के ‘गालों’ से करता है तो यह बात न सिर्फ़ निंदनीय होनी चाहिए बल्कि ऐसे नेता को उसके शीर्ष नेतृत्व से कड़ी फटकार और सज़ा भी मिलनी चाहिए जिससे कि अन्य नेताओं को सबक़ मिले। परंतु क्या ऐसा हुआ या ऐसा होता है? यदि इसका उत्तर ‘नहीं’ है तो यह बात स्पष्ट है कि ऐसे अनैतिक नेताओं को उनके शीर्ष नेतृत्व की पूरी हमदर्दी और आशीर्वाद प्राप्त है।


पिछले दिनों में जहां एक दल के नेता ने एक महिला नेता और एक महिला मुख्य मंत्री के लिये अभद्र भाषा का प्रयोग किया वहीं एक अन्य दल के नेता ने एक सभा में अपने क्षेत्र के वोटरों को ही दोषी ठहराया। इतना ही नहीं उनकी तुलना ‘वैश्या’ से भी कर डाली। उसी राज्य में एक अन्य दल के वरिष्ठ नेता ने भी अपने वोटरों को इस तरह धमकाया कि ये बयान भी सुर्ख़ियों में छा गया। इस वरिष्ठ नेता ने तो यहाँ तक कह डाला कि “सिर्फ इसलिए कि आपने वोट दिया इसका मतलब यह नहीं है कि आप मेरे मालिक हैं। क्या आपने मुझे अपना नौकर बना लिया है?” यह बात तो जग-ज़ाहिर है कि चुनावी दिनों में हर नेता अपने वोटरों के आगे-पीछे घूमते हैं। उन्हें रिझाने के लिए क्या-क्या नहीं करते। परंतु जैसे ही वे सत्ता में आते हैं तो अपना असली रंग दिखाने में पीछे नहीं हटते।

ऐसे में कबीर दास जी का यह दोहा याद आता है, ‘ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोये। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।।’ जो हमें बचपन से ही सिखाता आया है कि चाहे कुछ भी हो हमें ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जो सुनने वाले के मन को आनंदित करे। जहां मीठे वचन सुनने वालों को सुख देते हैं, वहीं हमारे मन को भी आनंदित करते हैं। परंतु क्या हमारे द्वारा चुने गये जनप्रतिनिधि इसका अनुसरण कर रहे हैं? या सत्ता के अहंकार में आपा खो रहे हैं।


एक समय था जब नेता अपने क्षेत्र की जनता को सर-आँखों पर बिठा कर रखते थे। उनकी हर छोटी-बड़ी समस्या का हल निकालने के लिए हर कदम उठाते थे। अपने क्षेत्र के वोटर के ख़ुशी और ग़म में भी परिवार की तरह ही शामिल हुआ करते थे। परंतु आजकल कुछ नेताओं को छोड़ कर ऐसे नेता आपको ढूँढे नहीं मिलेंगे। पुरानी पीढ़ी के नेता जिस सादगी से चुनाव के पहले रहते थे, चुनावों में जीतने के बाद भी वे उसी सादगी से ही नज़र आते थे। परंतु आजकल के नेता चुनावों में जितनी भी सादगी दिखाएं, चाहे चुनाव जीतने के बाद सादगी से रहने के जितने भी वादे क्यों न करें, चुनाव जीतते ही अपने किए वादो से मुकरने में क्षण भर भी नहीं लगाते। वे जनता को अपनी मुट्ठी में रखने का झूठा एहसास बनाए बाथ रहते हैं। बिना यह सोचे कि लोकतंत्र में जनता ही मालिक है नेता नहीं। यदि जनता ने मन बना लिया है कि वे झूठा वादा करने वाले नेता या दल को सत्ता में दोबारा नहीं लाएँगे तो नेता वोटर को लुभाने के लिए चाहे कुछ भी क्यों न करे नतीजा उनके ख़िलाफ़ ही जाएगा।


भारत जैसे देश के लिए कहा जाता है कि ‘चार कोस कोस पर पानी बदले आठ कोस पर वाणी’ यानी हमारे देश में विविधताओं का होना प्राचीन युगों से चला आ रहा है। भारत में अनेक धर्मों, जातियों, विचारों, संस्कृतियों और मान्यताओं से सम्बन्धित विभिन्नताएँ हैं। किन्तु उनके मेल से एक खूबसूरत देश का जन्म हुआ है, जिसे हम भारत कहते हैं। भारत की ये विविधताएँ एकता में बदल गई हैं, जिसने इस देश को विश्व का एक सुन्दर और सबल राष्ट्र बना दिया है। शायद इसीलिए भारत के लिए कहा गया है कि ‘अनेकता में एकता: मेरे देश की विशेषता’। इसलिए हमें सभी धर्मों, विचारधाराओं और संस्कृतियों का सम्मान करना चाहिए।

हमारे द्वारा चुने गये नेता, चाहे किसी भी दल के क्यों न हों, चुनाव जीतते ही यदि अपनी असभ्यता का परिचय देने लग जाएँ और उनके दल द्वारा उन्हें किसी भी तरह दंड न दिया जाए। तो अगली बार जब भी ऐसे नेता जनता के सामने याचक बन कर आएँ तो वोटरों द्वारा ऐसे नेताओं का बहिष्कार कर उन्हें आईना ज़रूर दिखाया जाए। ऐसा करने से इन असभ्य नेताओं में एक मज़बूत संदेश जाएगा और वे ऐसी गलती करने से पहले कई बार सोचेंगे। तब शायद उन्हें कबीरदास जी का दोहा याद आएगा।

शुक्रवार, 3 जनवरी 2025

कब लेंगे हम विमान हादसों से सबक़?


2024 के आख़िरी सप्ताह में एक के बाद एक कई विमान हादसों की खबर आई। इनमें कई बेक़सूर लोगों ने अपनी जान भी गवाई। परंतु जब भी कोई विमान हादसा होता है संबंधित जाँच विभाग दुर्घटना के कारणों की जाँच में जुट जाते हैं। ज़ाहिर सी बात है कि हादसे के जाँच होना तो लाज़मी है। परंतु जब-जब विमान हादसे होते हैं और हादसों की जाँच की रिपोर्ट आती है, तो क्या वास्तव में इन रिपोर्टों से सबक़ लिए जाते हैं कि भविष्य में ऐसे हादसे न हों? क्या विश्व भर के नागरिक उड्डयन मंत्रालय व उससे संबंधित विभाग और एयरलाइंस इन रिपोर्टों को गंभीरता से लेते हैं? 

ताज़ा उदाहरण दक्षिण कोरिया के मुआन हवाई अड्डे पर हुए जेजु एयरलाइंस के हादसे का है। इस विमान में 179 यात्रियों और क्रू की दर्दनाक मौत हुई। दक्षिण कोरिया के एविएशन इतिहास में यह अब तक का सबसे बड़ा व दर्दनाक हादसा माना जा रहा है। इस हादसे के पीछे पक्षी टकराने का कारण माना जा रहा है। परंतु एविएशन के विशेषज्ञों के मुताबिक़ केवल पक्षी के टकराने से इतना बड़ा हादसा नहीं हो सकता। ग़ौरतलब है कि जहां-जहां भी एयरपोर्ट बनते हैं वहाँ पर इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि किसी भी तरह के पक्षियों का बसेरा न बन पाए। एयरपोर्ट की व्यवस्था में जुटे विभाग इस बात पर विशेष ध्यान देते हैं कि यदि किसी भी तरह के पक्षी एयरपोर्ट के आसपास दिखाई देते हैं तो वो न सिर्फ़ एटीसी को सावधान करते हैं बल्कि इस बात पर भी ध्यान देते हैं कि पक्षियों को वहाँ से दूर कैसे किया जाए।


जेजु विमान हादसे का वीडियो देखने से यह बात स्पष्ट होती है कि विमान के लैंड होते समय विमान के लैंडिंग गियर खुल नहीं पाए। तेज़ गति के इस विमान को रनवे से फिसलते हुए एक कंक्रीट के ढाँचे में भिड़ते हुए देखा गया, जिस पर भी सवाल उठ रहे हैं। दुनिया भर के एविएशन विशेषज्ञों द्वारा एक अन्य कारण पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। उनका मानना है कि विमान के हाइड्रोलिक सिस्टम को उपयोग में नहीं लाया गया। उल्लेखनीय है कि ऐसे विमानों के डिज़ाइन में एक विशेषता है कि किसी भी आपात स्थिति में यदि विमान के हाइड्रोलिक सिस्टम काम नहीं करते हैं तो ऐसी स्थिति में पायलट के पास एक इमरजेंसी गियर भी होता है जिसकी मदद से विमान के लैंडिंग गियर को खोला जा सकता है। ऐसा क्या कारण था जो कि इस फ्लाइट के पायलट ने लैंडिंग गियर को नहीं खोल पाया। विमान की बात करें तो इस विमान में भी अन्य विमानों की तरह दो इंजन थे। यदि पक्षी के टकराने से एक इंजन फेल भी हो गया तो भी विमान के पास इतनी पॉवर होती है कि वह उसे सुरक्षित लैंड करवा सके। लेकिन ऐसा क्या हुआ और क्यों हुआ यह तो जाँच के बाद ही पता चलेगा।


इस विमान हादसे ने दुनिया भर के हवाई यात्रियों और विमानन विशेषज्ञों के मन में एक बार फिर से कई तरह के सवाल उठा दिए हैं। क्या हवाई यात्रा प्रदान करने वाली एयरलाइन कंपनियाँ यात्री सुरक्षा के साथ समझौता तो नहीं कर रहे? क्या विमान कंपनियों और एयरलाइंस पर निगाह रखने वाले नागरिक उड्डयन मंत्रालय व उसके अधीन विभाग यात्री सुरक्षा और विमानों के रख-रखाव में ढील तो नहीं बरत रहे? मुनाफ़ा कमाने की मंशा से एयरलाइन कंपनियाँ यात्री सुरक्षा से संबंधित किए जाने वाली नियमित जाँच-परख को केवल औपचारिकता के तहत ही कर रहे हैं? क्या एयरलाइन के पायलट अपनी निर्धारित ड्यूटी को ही निभा रहे है या तय समय से अधिक, बिना ज़रूरी विश्राम के विमान को उड़ा रहे हैं? यदि इनमें से किसी भी एक सवाल का उत्तर ‘हाँ’ है तो यह एक गंभीर विषय है जिसे हर देश के नागरिक उड्डयन मंत्रालय को गंभीरता से ही लेना चाहिए।

भारत की बात करें तो हमें ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएँगे जहां देश के नागरिक उड्डयन मंत्रालय और उसके अधीन डीजीसीए किस तरह मामूली सी चूक होने पर किसी एयरलाइन के क्रू को बहुत कड़ी सज़ा देता है और वहीं किसी  एयरलाइन की बड़ी-से-बड़ी गलती को भी अनदेखा कर देता है। फिर चाहे वो कोई निर्धारित एयरलाइन कंपनी हो या निजी चार्टर सेवा प्रदान करने वाली कंपनी। यदि मंत्रालय के भ्रष्ट अधिकारियों ने मन बना लिया है कि वो क़ानून की धज्जियाँ उड़ा कर उस कंपनी के प्रति अपनी वफ़ादारी साबित करेंगे, तो वे ऐसा ही करेंगे। एक अनुमान के तहत आनेवाले दो दशकों में भारत का नागर विमानन ट्रैफ़िक 5 गुना बढ़ने की संभावना है। यदि इस क्षेत्र में हमें एक अच्छी पहचान बनानी है तो नागरिक उड्डयन मंत्रालय, डीजीसीए व अन्य संबंधित विभागों के अधिकारियों को अपने स्वार्थों को दरकिनार करते हुए यात्रियों की सुरक्षा और एयरलाइन कम्पनी के विमानों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। डीजीसीए के ‘एयर सेफ़्टी डिपार्टमेंट’, ‘फ्लाइट स्टेण्डर्ड्स डिपार्टमेंट’, ‘एयरक्राफ्ट इंजीनियरिंग’ व ‘एयरवर्थिनेस डिपार्टमेंट’ जैसे विभागों को विमानों की जाँच के हर पहलू को कड़ाई से लागू करने को गम्भीरता से लेना होगा। ऐसा करने से एक ओर हवाई यात्रा करने वाले यात्री अपने को सुरक्षित महसूस करेंगे। वहीं दूसरी ओर एयरलाइन कम्पनियों को भी इस बात का ख़ौफ़ बना रहेगा कि छोटी सी भूल के चलते उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्यवाही भी हो सकती है।