आज से क़रीब पैंतीस वर्ष पहले दिल्ली के एक पाँच सितारा होटल में नेत्र विशेषज्ञों की एक अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए देश के पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह ने बड़े शायराना अन्दाज़ में डॉक्टरों को सम्मान दिया। अपने भाषण में उन्होंने एक शेर सुनाया, ‘तुमको ख़ुदा कहूँ या ख़ुदा को ख़ुदा कहूँ, दोनों की शक्ल एक है किसको ख़ुदा कहूँ’। पूरे हॉल में बज रही तालियों से यह बात स्पष्ट हो गई कि ज्ञानी जी जो संदेश देना चाहते थे वह सही जगह पहुँचा। दरअसल डॉक्टरों का सम्मान हर कोई इसी उम्मीद से करता है कि भगवान और माता-पिता के बाद यदि कोई पूजनीय है तो वह डॉक्टर भी हैं। परंतु यदि कुछ चुनिंदा और लालची डॉक्टर अपने पेशे से बेईमानी करने लगें तो लोगों का डॉक्टरों की पूरी जमात पर से ही विश्वास उठने लगेगा।
आये दिन हमें यह देखने को मिलता है कि जब किसी मरीज़ को इलाज के लिए किसी बड़े प्राइवेट अस्पताल में जाना पड़ता है तो उसे काफ़ी खर्च करना पड़ता है। हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाएँ अभी इतनी बेहतर नहीं हुई है कि हर नागरिक को अच्छे से अच्छा इलाज कम से कम दर पर मिले। यदि आपके पास मेडिक्लेम न हो तो इलाज करवाना आसान नहीं। परंतु मेडिक्लेम का नाम सुनते ही अस्पताल वाले आपसे अनाप-शनाप पैसे लेने लग जाते हैं। साथ ही आपके इलाज में जुटे डॉक्टर भी ऐसे तमाम टेस्ट आदि लिखवा देते हैं जिनकी शायद ज़रूरत ही न हो। बीमा कंपनियों और कुछ निजी अस्पतालों के द्वारा चल रहे ‘मेडिक्लेम’ के गोरखधंधे के बारे में आये दिन शोर मचाता रहता है। क्या यह कहना सही नहीं होगा कि सेवा भाव से चलने वाले कुछ चैरिटेबल अस्पतालों को छोड़ कर कई नामी प्राइवेट अस्पताल मरीज़ों को केवल कमाई का ज़रिया ही मानते हैं?
कुछ समय पहले मुंबई के सात नामी अस्पतालों के ख़िलाफ़ ऐसा ही नाजायज़ बिलिंग और मरीज़ों से ठगी के मामले में केस दर्ज हुआ। इन अस्पतालों ने मरीज़ों से दवा पर छपे हुए दामों से कहीं अधिक रुपये वसूले। जब मामला जाँच एजेंसियों के पास पहुँचा तो सच सामने आया और इनके ख़िलाफ़ केस दर्ज हुए। जाँच में यह पाया गया कि जिस दर पर दवाइयाँ और अन्य सामग्री अस्पतालों को सप्लाई की जा रही थी, उसमें और मरीज़ों से लिये जाने वाली रक़म में भारी अंतर था। इतना ही नहीं कई दवाओं और ज़रूरी सामग्री पर तो यह भी स्पष्ट रूप से नहीं लिखा था कि इस विदेशी दवा या ज़रूरी वस्तु को किसने आयात किया और कब आयात किया। साथ ही इन पर मैन्यूफ़ैक्चरिंग की तिथि भी नहीं छपी थी। इसके साथ ही कई दवाओं और वस्तुओं पर तो अधिकतम विक्रय दर (एमआरपी) भी नहीं छपा था। अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की तरह मेडिकल वस्तुओं की बिक्री में ऐसा करना ग़ैर-क़ानूनी है। परंतु शायद इन बड़े अस्पतालों के रसूख़ के चलते कोई आवाज़ नहीं उठाता या यदि कोई आवाज़ उठाए तो मामले की तह तक नहीं पहुँचने दिया जाता।
जानकारों के मुताबिक़ हृदय रोग में इस्तेमाल किए जाने वाले स्टेंट की मरीज़ों के लिए औसत मूल्य लगभग 2 लाख रुपए होती है। जबकि इसकी असल क़ीमत 10 से 15 हज़ार ही होती है। दरअसल इस स्टेंट को आयात करने वाला व्यक्ति इसे डिस्ट्रीब्यूटर को 40 हज़ार का बेचता है। अस्पताल को यह स्टेंट 80 से 90 हज़ार का मिलता है। अस्पताल इसे मरीज़ को 1.75 लाख से 2 लाख का बेचते हैं। ज़रा सोचिए जिस वस्तु की क़ीमत 10 से 15 हज़ार होती है और उसमें भी इसे बनाने वाले का मुनाफ़ा शामिल है, उसे कई गुना दामों पर बेच कर न सिर्फ़ मोटा मुनाफ़ा कमाया जा रहा है बल्कि मरीज़ों की मजबूरी का भरपूर फ़ायदा भी उठाया जा रहा है। इसलिए आज के युग में सभी को जागरूक और जानकार होने की ज़रूरत है।
यदि मरीज़ के पास किसी भी तरह का स्वास्थ्य बीमा या मेडिक्लेम है तो आपको भर्ती होने के लिए दबाव डाला जाता है। केवल इसी दृष्टि से कि बिना भर्ती हुए आप मेडिक्लेम की कैशलेस सुविधा का फ़ायदा नहीं उठा पाएँगे। कैशलेस यानी कि मुफ़्त का इलाज। मुफ़्त के इलाज के लालच में मरीज़ और उसके तीमारदार भी अस्पताल के झाँसे में आ जाते हैं और बिना पढ़े कई सारे काग़ज़ों पर हस्ताक्षर भी कर देते हैं। फिर क्या, अस्पताल आपके साथ राजाओं की तरह का व्यवहार करता है। इस दिखावट की आड़ में अस्पताल ऐसे तमाम टेस्ट और जाँच शुरू कर देता है जिनकी इलाज की दृष्टि से ज़रा भी आवश्यकता नहीं होती। ऐसा केवल बीमा कंपनी को एक मोटा बिल भेजने की मंशा से किया जाता है।
जब तक देश में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए तय मापदंड नहीं बनेंगे और उन्हें सख़्ती से लागू नहीं किया जाएगा तब-तब ऐसा होता रहेगा। सरकार को चाहिए कि हर इलाज के लिए मापदंडों को तय किया जाए और देश भर के सभी अस्पतालों में इलाज के मापदंड और उनकी दरों को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाए। इससे अज्ञानी मरीज़ों व उनके रिश्तेदारों को सभी तय नियम और मापदंड के बारे में पता रहेगा और साथ ही उनको इलाज के लिए कितना पैसा देना होगा उसकी भी जानकारी मिल सकेगी। यदि ऐसा होता है तो कभी भी कोई अस्पताल किसी की छोटी सी चोट के लिये प्लास्टिक सर्जरी करने की जुर्रत नहीं करेगा। इससे बीमा कंपनी की ठगी भी कम होगी, स्वास्थ्य सेवाएँ भी बेहतर होंगी और करदाता के पैसे की लूट भी बचेगी।


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