शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

दिल्ली एनसीआर में बढ़ता प्रदूषण और बेबस सरकारी तंत्र

हर साल की तरह दिल्ली–एनसीआर की हवा एक बार फिर ज़हरीली हो चुकी है। दिसंबर 2025 में एक बार फिर AQI ‘बहुत खराब’ से ‘गंभीर’ और ‘सीवियर प्लस’ श्रेणी तक पहुंचा, जिसने सरकार की नीतियों, इच्छाशक्ति और क्षमता—तीनों पर कठोर सवाल खड़े कर दिए हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और रीयल-टाइम मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म के आंकड़े दिखाते हैं कि दिसंबर के पहले पखवाड़े में दिल्ली का औसत AQI लगातार ‘बहुत खराब’ (259–372) के बीच रहा। 13–14 दिसंबर को कई इलाकों में AQI 450 से ऊपर चला गया, जिससे हवा ‘सीवियर’ और कुछ घंटों के लिए ‘सीवियर प्लस’ श्रेणी में दर्ज हुई। वहीं सरकार यह तर्क दे रही है कि 2016 की तुलना में ‘बेहतर रुझान’ दिख रहे हैं और औसत AQI कुछ घटा है, लेकिन नागरिक के फेफड़ों के लिए यह सांख्यिकी नहीं, सांस की लड़ाई है।

कागज़ पर सरकार ने कड़े कदमों का एक पूरा ढांचा बनाया है, लेकिन ज़मीनी असर सीमित है। यह वही कहानी है, जिसमें ज़िम्मेदारी सबकी है और जवाबदेही किसी की नहीं। ग्रेप की पाबंदी(GRAP), स्मॉग टावर, एंटी–स्मॉग गन, पानी का छिड़काव, निर्माण पर रोक, स्कूलों की छुट्टियाँ, डीज़ल गाड़ियों पर पाबंदी जैसे ‘आपात’ उपाय हर साल दोहराए जा रहे हैं, पर हवा हर सर्दी में उतनी ही घुटन भरी रहती है। केंद्र और राज्य सरकारें पराली, उद्योगों, थर्मल पावर, डीज़ल जेनरेटर, निर्माण धूल और वाहनों की भूमिका पर एक-दूसरे को कटघरे में खड़ा करती हैं, पर दीर्घकालिक समाधान—जैसे स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेज़ संक्रमण, सार्वजनिक परिवहन का आक्रामक विस्तार और इंडस्ट्रियल क्लस्टर का सख्त नियमन—धीमी रफ्तार में चलते हैं। यह बेबसी महज़ संसाधन समस्या नहीं, राजनीतिक प्राथमिकताओं की भी कहानी है। चुनावी बहस में प्रदूषण अभी भी हाशिये का मुद्दा है। इसलिए ‘आपातकालीन’ प्रेस कांफ्रेंस तो दिखती हैं, लेकिन संरचनात्मक सुधारों का साहस नदारद है।


दिल्ली–एनसीआर की हवा की कहानी अरावली की पहाड़ियों और जंगलों से कटकर नहीं देखी जा सकती। अरावली दिल्ली–एनसीआर के लिए प्राकृतिक फेफड़े और धूल–तूफानों के खिलाफ ढाल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में केंद्र सरकार की ऊंचाई–आधारित परिभाषा को स्वीकार करते हुए अरावली हिल्स और रेंज की नई परिभाषा तय की है और साथ ही एक ‘सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान’ तैयार होने तक नई खनन लीज़ पर रोक लगाई है। कोर्ट ने कहा है कि कोर/इनवायलेट और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील इलाकों में खनन पर सख्त पाबंदियाँ रहेंगी, और सिर्फ वैज्ञानिक रूप से उचित अपवादों में ही सीमित खनन की इजाज़त दी जा सकेगी। 

यहीं से भ्रम और चिंता दोनों शुरू होते हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि ऊँचाई–आधारित परिभाषा से अरावली का बड़ा हिस्सा, जो भूगर्भीय और पारिस्थितिक दृष्टि से पहाड़ी तंत्र का भाग है, कानूनी सुरक्षा से बाहर हो सकता है, जिससे खनन और रियल एस्टेट के लिए दरवाज़ा खुलने का खतरा है। अगर अरावली के ‘निम्न’ क्षेत्र और वनांचल में खनन या निर्माण बढ़ता है तो यह न सिर्फ धूल और पार्टिकुलेट मैटर को बढ़ाएगा, बल्कि उन प्राकृतिक वायु–मार्गों को भी बाधित करेगा जो राजस्थान की ओर से आने वाली धूल–भरी हवाओं को रोकते और फ़िल्टर करते हैं। सरकार जहाँ ‘सस्टेनेबल माइनिंग’ और ‘रोज़गार–विकास’ की दलील दे रही है, वहीं पर्यावरणविद इसे दिल्ली–एनसीआर के दीर्घकालिक वायु–सुरक्षा के खिलाफ एक खतरनाक झरोखा मान रहे हैं।

हर साल सर्दियाँ आते ही दिल्ली–एनसीआर गैस–चैंबर क्यों बन जाता है? इस पर वैज्ञानिक सहमति अब काफी स्पष्ट है, यह कोई ‘रहस्य’ नहीं, बल्कि कई कारकों का संयुक्त परिणाम है। सर्दियों में ‘टेम्परेचर इनवर्ज़न’ यानी ऊपर गरम और नीचे ठंडी हवा की परत बनती है, जो ज़मीन के पास प्रदूषकों के ऊपर ढक्कन की तरह जम जाती है। न हवा ऊपर उठती है, न जहरीले कण बिखर पाते हैं। हवा की रफ्तार कम, नमी ज़्यादा, बारिश नगण्य—ये सभी मिलकर दिल्ली को एक ऐसी घाटी जैसा बना देते हैं जहाँ प्रदूषण ‘स्टोर’ होता रहता है और सर्दी उसे ‘लॉक’ कर देती है। 

उत्सर्जन के स्रोत भी बहुस्तरीय हैं और यही नीति–निर्माताओं की सबसे बड़ी परीक्षा है। पंजाब, हरियाणा, पश्चिम यूपी में पराली जलाना अक्टूबर–नवंबर में प्रदूषण के ‘स्पाइक’ को तेज़ करता है, कभी–कभी दिल्ली के PM2.5 में 30–40 फीसदी तक योगदान देता है, लेकिन पूरे सीज़न की हवा सिर्फ पराली से खराब नहीं रहती। वाहनों का धुआँ, कोयला–आधारित बिजली घर, औद्योगिक इकाइयाँ, ईंट–भट्टे, ठोस कचरा जलाना, निर्माण–धूल और दिल्ली–एनसीआर के भीतर की डीज़ल–निर्भर अर्थव्यवस्था मिलकर साल भर का ‘बेसलाइन’ प्रदूषण बनाती है, जो सर्दियों में मौसम की वजह से खतरनाक स्तर पर दिखाई देता है।

क्लाइमेट वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ साफ कह रहे हैं कि दिल्ली का संकट ‘एपिसोडिक’ नहीं, स्ट्रक्चरल है—यानी यह सिर्फ पराली या कुछ हफ्तों तक चलने वाली ठंड का नहीं, बल्कि एक गलत तरीके से बढ़े हुए शहरी–औद्योगिक मॉडल का परिणाम है। दिल्ली–एनसीआर की ताज़ा AQI स्थिति यह संकेत देती है कि अब ‘फायर–फाइटिंग’ नहीं, ‘सिस्टम–रीडिज़ाइन’ की ज़रूरत है। प्रदूषण–पॉलिटिक्स का रुख अभी तक आरोप–प्रत्यारोप पर अटका हुआ है—केंद्र बनाम राज्य, पंजाब–हरियाणा बनाम दिल्ली, पर्यावरण मंत्रालय बनाम परिवहन–उद्योग लॉबी—और इस बीच नागरिक का फेफड़ा सबसे कमज़ोर और सबसे अकेला पक्ष बना हुआ है। अरावली की परिभाषा से लेकर खनन नीति, पराली प्रबंधन से लेकर सार्वजनिक परिवहन, एनर्जी ट्रांज़िशन से लेकर शहरी नियोजन—सभी मोर्चों पर ऐसे फैसलों की ज़रूरत है जो GDP नहीं, जन–स्वास्थ्य को प्राथमिक सूचक बनाएँ।

अगर अरावली को कागज़ पर सिकोड़ दिया गया, अगर ‘सस्टेनेबल माइनिंग’ के नाम पर पहाड़ियों की आखिरी हरियाली भी कंक्रीट और खदानों के हवाले कर दी गई, तो दिल्ली–एनसीआर की सर्दियाँ सिर्फ ठंडी नहीं, और भी ज़्यादा घुटन भरी, बीमार और अमानवीय हो जाएँगी। क्या सरकारें हवा को भी ‘जगह की राजनीति’ और ‘फेडरल झगड़े’ के बीच बांटती रहेंगी, या वह दिन आएगा जब दिल्ली–एनसीआर की सांस को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाएगा, जितनी स्टॉक मार्केट के सूचकांकों को दी जाती है? जवाब अभी धुंध में छिपा है—ठीक उसी तरह, जैसे हर सर्दी दिल्ली का आसमान।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

बॉन्डी बीच हमला पर दिखी एक साधारण इंसान की वीरता

हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के सिडनी स्थित बॉन्डी बीच पर हुआ आतंकी हमला पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। 14 दिसंबर 2025 को हनुक्का उत्सव के दौरान यह दिल दहला देने वाली घटना घटी, जब दो आतंकवादियों ने अंधाधुंध गोलीबारी की। इस हमले में 15 निर्दोष लोगों की जान चली गई और दर्जनों घायल हो गए। आतंकवादी साजिद अक्रम और उनके बेटे नवेद अक्रम थे, जो इस्लामिक स्टेट की विचारधारा से प्रेरित थे। यह हमला न केवल यहूदियों पर लक्षित था, बल्कि मानवता पर एक बड़ा आघात था। ऐसे में जब चारों तरफ अफरा-तफरी और डर का माहौल था, एक साधारण इंसान ने जो साहस दिखाया, वह न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि हमें यह सिखाता है कि संकट की घड़ी में आम आदमी भी असाधारण बहादुरी दिखा सकता है।

एक साधारण नागरिक, अहमद अल-अहमद ने जो साहस दिखाया, वह इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। जब चारों तरफ लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे, उस वक्त अहमद ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने एक हमलावर की ओर दौड़ लगाई, उससे बंदूक छीनी और उसे निरस्त्र कर दिया। इस संघर्ष में अहमद खुद घायल हो गए, लेकिन उनकी इस बहादुरी से अनगिनत जानें बच गईं। वीडियो फुटेज में साफ दिखता है कि कैसे एक आम इंसान ने मौत को आँखों में झाँककर आतंकवादी का मुकाबला किया।

अहमद अल-अहमद कोई प्रशिक्षित सैनिक नहीं हैं और न ही कोई पुलिस अधिकारी हैं। 43 वर्षीय अहमद एक सीरिया मूल के मुस्लिम हैं, जो ऑस्ट्रेलिया में फल बेचने का साधारण काम करते हैं। लेकिन, जब संकट आया तो उन्होंने सोचा नहीं, बस आगे बढ़ गए। यह वीरता हमें याद दिलाती है कि साहस दिल में होता है, पद या हथियार में नहीं। आज की दुनिया में जहां आतंकवाद जैसे खतरे बढ़ते जा रहे हैं, ऐसे उदाहरण दुर्लभ लेकिन बेहद जरूरी हैं। अहमद की यह बहादुरी न केवल बॉन्डी बीच के पीड़ितों के लिए बल्कि पूरी मानवता के लिए प्रेरणा बन गई है।

अहमद की यह वीरता इसलिए और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हमला इस्लामिक स्टेट की विचारधारा से प्रेरित था और अहमद खुद एक मुस्लिम हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। यह घृणा और हिंसा की विचारधारा है, जो किसी भी समुदाय को निशाना बना सकती है, लेकिन साहस और मानवता की भावना हर धर्म और समुदाय में मौजूद है। अहमद ने न केवल यहूदियों की जान बचाई, बल्कि पूरे मुस्लिम समुदाय को एक संदेश दिया कि सच्चा धर्म सेवा और सुरक्षा में है, न कि हिंसा में। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री और पुलिस ने उन्हें 'हीरो' करार दिया है। अस्पताल में भर्ती अहमद ने कहा कि वे फिर से वही करेंगे, क्योंकि उन्होंने निर्दोषों को मरते देखा और चुप नहीं रह सके। दुनिया भर के नेताओं ने उनकी प्रशंसा की और ‘गोफंडमी’ जैसे प्लेटफॉर्म पर उनके लिए सहायता राशि जुटाई जा रही है। यह सम्मान उन्हें इसलिए मिला क्योंकि उन्होंने साबित किया कि एक साधारण व्यक्ति भी बड़ा बदलाव ला सकता है।

आतंकवाद आज वैश्विक समस्या है। भारत हो या ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस हो या अमेरिका – कहीं न कहीं नफरत की यह आग भड़कती रहती है। ऐसे में सरकारें, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियाँ अपना काम करती हैं, लेकिन कभी-कभी स्थिति इतनी तेजी से बिगड़ती है कि आम नागरिक को ही आगे आना पड़ता है। बॉन्डी बीच की घटना हमें यही सिखाती है। अगर हम डरकर चुप रहें, भागें या नजर फेर लें, तो आतंकवादी अपने मकसद में कामयाब हो जाते हैं। लेकिन अगर एक व्यक्ति भी खड़ा हो जाए, तो पूरी स्थिति बदल सकती है। अहमद ने यही किया। उनकी वीरता ने न केवल हमलावर को रोका बल्कि अन्य लोगों को भी प्रेरित किया कि संकट में एकजुट होकर मुकाबला करें।

भारत जैसे देश में, जहाँ हम आए दिन आतंकी खतरों का सामना करते हैं, अहमद की यह कहानी विशेष रूप से प्रासंगिक है। याद कीजिए 26/11 के मुंबई हमलों में ताज होटल के कर्मचारियों ने कैसे जान जोखिम में डालकर मेहमानों को बचाया था। यानी आम नागरिकों की बहादुरी भी कम नहीं। बॉन्डी बीच की घटना हमें बताती है कि साहस कोई जन्मजात गुण नहीं, बल्कि परिस्थिति में लिया गया निर्णय है। हमें अपने बच्चों को यही सिखाना चाहिए – कि गलत के खिलाफ खड़ा होना जरूरी है, चाहे परिणाम कुछ भी हो।

आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया और आराम की जिंदगी में डूबी है। ऐसे में अहमद जैसे उदाहरण उन्हें जगाते हैं। वे दिखाते हैं कि हीरो फिल्मों में नहीं, असल जिंदगी में पैदा होते हैं। एक साधारण इंसान, जब फैसला लेता है कि अब बस बहुत हुआ, तो वह असाधारण बन जाता है। अहमद की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि विविधता में एकता ही हमारी ताकत है। ऑस्ट्रेलिया एक बहुसांस्कृतिक देश है, ठीक भारत की तरह। वहाँ मुस्लिम नागरिक ने यहूदी समुदाय को बचाया – यह संदेश दुनिया भर में फैलना चाहिए कि नफरत की विचारधारा को हराने के लिए हमें सीमाओं से ऊपर उठना होगा।

सरकारों को भी इस घटना से सबक लेना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया में बंदूक कानूनों को और सख्त करने की बात हो रही है। भारत में भी आतंकवाद विरोधी नीतियों को मजबूत करना जरूरी है। लेकिन साथ ही, नागरिकों में जागरूकता और साहस का संचार भी आवश्यक है। स्कूलों में, सामुदायिक कार्यक्रमों में ऐसी कहानियाँ सुनाई जानी चाहिए जो लोगों को प्रेरित करें। अहमद अल-अहमद की वीरता को दुनिया भर में सम्मानित किया जाना चाहिए, जैसे कि कोई पुरस्कार या कोई स्मारक। क्योंकि ऐसे लोग समाज के असली रक्षक होते हैं।

बॉन्डी बीच हमला दर्दनाक है, लेकिन अहमद की बहादुरी इसे उम्मीद की कहानी बना देती है। यह हमें याद दिलाती है कि अंधेरे में भी प्रकाश होता है, बशर्ते हम दिया जलाने की पहल करें। हर आम इंसान में एक हीरो छिपा है। जब कभी संकट आए, तो डरें नहीं, आगे बढ़ें। अहमद की तरह साहस दिखाएँ। यही हमारी जीत होगी – केवल आतंकवाद पर नहीं, बल्कि मानवता की जीत।


*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

इंडिगो: एक मानव-निर्मित संकट !

भारतीय विमानन क्षेत्र ने हाल ही में अपने सबसे अंधकारमय दौर से गुजरा है, जब प्रमुख निजी एयरलाइन इंडिगो की अनुपालन न करने की वजह से एक बड़ा संकट उत्पन्न हुआ। इस संकट ने न केवल आकाश में बल्कि जमीन पर भी अफरा-तफरी मचा दी, जिससे भारतीय विमानन की वैश्विक छवि को गहरा धक्का लगा। इंडिगो का वर्तमान संकट, जिसमें 3,000 से अधिक उड़ानों के रद्द होने और व्यापक परिचालन पक्षाघात शामिल है, 2019 में जेट एयरवेज के ग्राउंडिंग के बाद भारतीय विमानन में सबसे गंभीर व्यवधान है। यह एयरलाइन, जो लंबे समय से दक्षता और समय की पाबंदी का प्रतीक मानी जाती थी, अब नए फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशंस (एफडीटीएल) नियमों की पूर्वानुमान और तैयारी में विफलता के कारण विश्वास के संकट का सामना कर रही है। पुरानी अंडर-स्टाफिंग और दुबली-पतली मैनपावर रणनीति के साथ मिलकर, एयरलाइन को आपातकालीन योजनाओं के लिए हाथ-पांव मारने पड़े, जिससे देश भर में हजारों यात्री फंसे रह गए।

यह संकट पूरी तरह से टाला जा सकता था, यदि एयरलाइन ने नियामक के निर्देशों का पालन किया होता। इंडिगो के प्रबंधन ने पायलट यूनियनों और उद्योग विशेषज्ञों की बार-बार चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया, जो हायरिंग फ्रीज और नो-पोचिंग समझौतों के जोखिमों के बारे में थीं। लालच के चलते एयरलाइन ने अपनी मौजूदा फ्लाइटों बढ़ोतरी भी की जिसने आग में घी डालने का काम किया। नए एफडीटीएल नियम लागू होने पर एयरलाइन कॉकपिट और केबिन क्रू की गंभीर कमी सामने आई। लागत कटौती के लिए स्टाफ संख्या को न्यूनतम रखने की रणनीति तब उलटी पड़ गई। संकट को और गहरा किया खराब रोस्टर प्लानिंग और नियामकीय चूकों ने। इंडिगो के सीईओ पीटर एलबर्स ने स्वीकार किया कि सामान्य परिचालन धीरे-धीरे ही बहाल हो पाएगा, क्योंकि एयरलाइन नए पायलट ड्यूटी नियमों से अस्थायी छूट मांग रही है। सवाल यह उठता है कि जब डीजीसीए ने सभी ऑपरेटरों को नए नियमों का अनुपालन करने के लिए पर्याप्त समय दिया था, तो इंडिगो ने उन्हें नजरअंदाज करने का फैसला क्यों लिया?



भारत के विमानन इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां निजी एयरलाइनों का पतन प्रबंधन की विफलताओं और बाहरी दबावों के कारण हुआ। किंगफिशर एयरलाइंस, जो कभी देश की सबसे चमकदार कैरियर थी, वित्तीय कुप्रबंधन और अत्यधिक कर्ज के कारण 2012 में अचानक बंद हो गई। जेट एयरवेज, जो भारत के निजी विमानन युग का अग्रदूत था, 2019 में नियम पुस्तिका के उल्लंघनों, खराब वित्तीय नियंत्रणों, बढ़ते घाटे और बदलते बाजार हालातों से अनुकूलन में असमर्थता के कारण इसी भाग्य का शिकार हुआ। 

इंडिगो का नए एफडीटीएल नियमों को नजरअंदाज करने का तरीका भी जेट एयरवेज की याद दिलाता है, जो इसी तरह के घमंड के चलते अपनी सुविधा के लिए नियमों को अनदेखा करती रही। ये उदाहरण एक दोहरावदार पैटर्न को रेखांकित करते हैं: वे एयरलाइंस जो अल्पकालिक लागत बचत को पायलटों और यात्रियों की सुरक्षा तथा नियामकीय अनुपालन आवश्यकताओं से ऊपर रखती हैं, वे एक ब्रेकिंग पॉइंट पर पहुंचकर अचानक ढह जाती हैं।

इंडिगो संकट, एयरलाइन प्रबंधन और नियामकीय निगरानी दोनों की व्यापक विफलता को उजागर करता है। डीजीसीए द्वारा नए नियमों के तहत क्रू उपलब्धता की जांच किए बिना सर्दी के शेड्यूल को मंजूरी देना, ऑडिट की कमी को दर्शाता है। अन्य एयरलाइंस, जैसे एयर इंडिया, अकासा और यहां तक कि स्पाइसजेट ने नियाम परिवर्तनों की प्रत्याशा में रोस्टर समायोजित करके और अतिरिक्त स्टाफ भर्ती करके इसी तरह के व्यवधानों से बचाव किया। सोचने वाली बात है कि यह संकट कम किया जा सकता था या पूरी तरह टाला भी जा सकता था, यदि इंडिगो ने स्टाफिंग और अनुपालन के लिए अधिक पारदर्शी और सक्रिय दृष्टिकोण अपनाया होता। डीजीसीए द्वारा सख्त अनुपालन ऑडिट की अनुपस्थिति ने भी इस अराजकता में भूमिका निभाई।

भविष्य के संकटों को रोकने के लिए, एयरलाइंस को परिचालन लचीलेपन को प्राथमिकता देनी चाहिए, पर्याप्त स्टाफिंग में निवेश करना चाहिए और नियामकीय निकायों तथा कर्मचारी यूनियनों के साथ खुले संवाद बनाए रखने चाहिए। सरकार को भी इन पर निगरानी रखनी चाहिए ताकि उड़ान शेड्यूल केवल परिचालन और सुरक्षा मानदंडों के अनुपालन की जांच के बाद ही मंजूर किए जाएं। परिचालन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए, डीजीसीए को ऑपरेटरों से सुझाव भी लेने चाहिए ताकि उनकी मांगों को समायोजित किया जा सके। इंडिगो का संकट सिर्फ एक एयरलाइन की गलतियों की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे भारतीय विमानन क्षेत्र के लिए एक चेतावनी है।

इंडिगो संकट के मद्देनजर डीजीसीए द्वारा सख्त नियामकीय कार्रवाई भारत में एयरलाइन उल्लंघनों के लिए एक शक्तिशाली मिसाल कायम कर सकती है। डीजीसीए ने पहले ही सामूहिक रद्दीकरणों की परिस्थितियों की जांच के लिए एक व्यापक जांच शुरू कर दी है, जिसमें चार सदस्यीय पैनल को 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने का काम सौंपा गया है ताकि प्रवर्तन कार्रवाइयों और संस्थागत सुधारों की सिफारिश की जा सके। पिछले उदाहरण दिखाते हैं कि नियामक ने अनुपालन न करने के लिए कठोर दंड लगाने में संकोच नहीं किया, जिसमें 10 लाख से 90 लाख रुपये या इससे अधिक के वित्तीय जुर्माने, ऑपरेटर अनुमतियों का निलंबन और बार-बार या गंभीर उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को हटाना भी शामिल है।

उदाहरण के लिए, डीजीसीए ने हाल ही में एयर इंडिया को एक पायलट को अनिवार्य नियामकीय आवश्यकताओं को पूरा किए बिना उड़ान संचालित करने की अनुमति देने के लिए 30 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। डीजीसीए ने पहले क्रू शेड्यूलिंग और सुरक्षा निगरानी में गंभीर और दोहरावदार चूकों के लिए एयर इंडिया के वरिष्ठ अधिकारियों को हटाया है। ऐसे दंडों को लागू करके और एयरलाइंस तथा उनके प्रबंधन को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराकर, डीजीसीए एक स्पष्ट संदेश देता है: परिचालन शॉर्टकट, नियामकीय अनुपालन न करने और लापरवाही को त्वरित और सख्त परिणामों से सामना करना पड़ेगा। इंडिगो का संकट बताता है कि परिचालन उत्कृष्टता सिर्फ दक्षता और समय की पाबंदी के बारे में नहीं है, बल्कि एयरलाइन क्रू व यात्री सुरक्षा, तैयारी और जिम्मेदारी के बारे में भी है।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

असुरक्षित होती हवाई यात्रा !

हवाई यात्राएँ आधुनिक युग में दुनिया की रीढ़ बनी हुई है। यह न केवल यात्रियों को दुनिया के कोने-कोने से जोड़ता है, बल्कि व्यापार, पर्यटन और वैश्विक अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करती हैं। लेकिन क्या नागरिक उड्डयन उद्योग उतना मजबूत है जितना दिखता है? हाल के वर्षों में, विभिन्न संकटों ने इसकी कमजोरियों को उजागर किया है। 2025 में एयरबस के हालिया संकट ने इस बहस को फिर से जीवित कर दिया है। एयरबस, जो बोइंग के साथ मिलकर विश्व के अधिकांश यात्री विमानों का निर्माण करता है, ने हाल ही में अपने A320 फैमिली एयरक्राफ्ट में एक गंभीर सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी की वजह से वैश्विक स्तर पर उथल-पुथल मचा दी। इससे कई सवाल उठने लगे कि क्या हवाई यात्राएँ सुरक्षित हैं?



नवंबर 2025 में, एयरबस ने घोषणा की कि A320 फैमिली के एक विमान में हुई घटना के विश्लेषण से पता चला कि तीव्र सौर विकिरण (रेडिएशन) महत्वपूर्ण डेटा को बिगाड़ सकता है। यह गड़बड़ी फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम को प्रभावित करती है, जो विमान की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। परिणामस्वरूप, कंपनी ने लगभग 6,000 A320 सीरीज के विमानों के लिए तत्काल सॉफ्टवेयर अपडेट और पूर्व-सतर्कता कार्रवाई का आदेश दिया। इसने वैश्विक विमान यात्राओं में भारी व्यवधान पैदा किया। हजारों यात्री हवाई अड्डों पर फंस गए, उड़ानें रद्द हुईं और एयरलाइनों को करोड़ों का नुकसान हुआ। दिसंबर की शुरुआत तक, एयरबस ने दावा किया कि अधिकांश विमानों को ठीक कर लिया गया है, लेकिन अभी भी कई विमानों पर काम चल रहा है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि सॉफ्टवेयर समस्या के ठीक बाद, कंपनी ने A320 के कुछ विमानों के धातु पैनलों में औद्योगिक गुणवत्ता की समस्या पाई, जो फ्यूजलेज को प्रभावित करती है। यह कुछ ही विमानों तक सीमित है, लेकिन यह दर्शाता है कि एक समस्या दूसरी को जन्म दे सकती है।



यह संकट हवाई उद्योग की कमजोरियों को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। सबसे बड़ी कमजोरी है बाजार का एकाधिकार। एयरबस और बोइंग मिलकर 90% से अधिक यात्री विमानों का उत्पादन करते हैं। यदि एक कंपनी में कोई समस्या आती है, तो पूरा उद्योग प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए, 2019 में बोइंग 737 मैक्स की दुर्घटनाओं ने पूरे उद्योग को हिला दिया था और अब एयरबस का संकट उसी कड़ी का हिस्सा लगता है। दूसरी कमजोरी है तकनीकी निर्भरता। आधुनिक विमान सॉफ्टवेयर, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पर आधारित हैं। सौर विकिरण जैसी बाहरी घटनाएं, जो जलवायु परिवर्तन के साथ बढ़ रही हैं, इन सिस्टमों को प्रभावित कर सकती हैं। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरी भी एक बड़ा मुद्दा है। IATA के अनुसार, 2025 में हवाई यात्रा में 5% की वृद्धि की उम्मीद थी, लेकिन एयरबस संकट ने इसे प्रभावित किया। एयरलाइनों की लाभप्रदता कम हो गई और निवेशकों का विश्वास डगमगाया। पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ रहा है; कार्बन उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों में, नई तकनीकों को अपनाने में जोखिम है। कुल मिलाकर, यह उद्योग एक जटिल जाल में फंसा है जहां एक छोटी गड़बड़ी वैश्विक संकट पैदा कर सकती है।


वहीं नियामक संस्थाएं जैसे यूरोपीय यूनियन एविएशन सेफ्टी एजेंसी (EASA), फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (FAA) अमेरिका में और भारत में डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) उद्योग के मानकों को बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। एयरबस संकट में, EASA ने तत्काल कार्रवाई की मांग की और सॉफ्टवेयर अपडेट को अनिवार्य किया। नियामकों का काम है विमानों के डिजाइन, निर्माण और संचालन की जांच करना। वे सर्टिफिकेशन प्रक्रिया के माध्यम से सुनिश्चित करते हैं कि कोई भी नया विमान या अपडेट सुरक्षा मानकों को पूरा करे। लेकिन क्या वे पर्याप्त हैं? बोइंग 737 मैक्स मामले में FAA की आलोचना हुई कि उन्होंने निर्माता पर ज्यादा भरोसा किया। एयरबस मामले में भी, यदि सौर विकिरण की समस्या पहले पता चल जाती, तो संकट टाला जा सकता था। नियामकों को अधिक सक्रिय होना चाहिए, नियमित ऑडिट, स्वतंत्र जांच और उभरते जोखिमों जैसे साइबर हमलों या जलवायु प्रभावों पर ध्यान देना आदि। वैश्विक समन्वय भी जरूरी है, क्योंकि विमान अंतरराष्ट्रीय होते हैं। भारत जैसे विकासशील देशों में, DGCA को मजबूत बनाना चाहिए ताकि स्थानीय एयरलाइनों पर सख्ती से मानक लागू हों। नियामकों की भूमिका न केवल संकट प्रबंधन में है, बल्कि सकारात्मक उपायों में भी, जो उद्योग की कमजोरियों को कम कर सकती है और हवाई यात्राओं को सुरक्षित बना सकती है। 


एयरलाइनों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वे अंतिम उपयोगकर्ता हैं और यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाती हैं। एयरबस संकट में, अमेरिकन एयरलाइंस जैसी कंपनियों ने तत्काल अपने बेड़े को अपडेट किया। एयरलाइनों को नियमित रखरखाव, पायलट प्रशिक्षण और सुरक्षा प्रोटोकॉल पर जोर देना चाहिए। वे निर्माताओं से पार्ट्स और अपडेट प्राप्त करती हैं, लेकिन अपनी जांच भी करनी चाहिए। उदाहरण के लिए, इंडिगो और स्पाइसजेट जैसी भारतीय एयरलाइनों को, जो कि A320 पर निर्भर हैं, इस संकट से सबक लेना चाहिए। लागत कम करने के चक्कर में सुरक्षा से कोई भी समझौता नहीं करना चाहिए। एयरलाइनों को विविधीकरण अपनाना चाहिए, केवल एक निर्माता पर निर्भर न रहें। साथ ही, यात्री संचार में पारदर्शिता रखें, ताकि विश्वास बना रहे। कुल मिलाकर, एयरलाइनों की जिम्मेदारी है कि वे नियामकों के साथ मिलकर मानकों को लागू करें और संकटों में त्वरित प्रतिक्रिया दें।


एयरबस संकट ने साबित किया कि हवाई उद्योग कितना संवेदनशील है। तकनीकी, आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौतियों से घिरा हुआ है। लेकिन मजबूत नियामक ढांचा और जिम्मेदार एयरलाइंस इसकी रक्षा कर सकती हैं। सरकारों को अनुसंधान में निवेश करना होगा, उद्योग को अधिक लचीला बनाना होगा, ताकि भविष्य के संकटों से निपटा जा सके। आखिरकार  सुरक्षा सर्वोपरि है, क्योंकि आकाश में उड़ान भरना जोखिम भरा है, लेकिन इसे सुरक्षित बनाना सभी की जिम्मेदारी है।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।