शुक्रवार, 28 जून 2024
‘जय फ़िलिस्तीन’ का नारा क्यों?
लोकसभा की सदस्यता की शपथ लेते समय हैदराबाद के सांसद अससुद्दीन ओवैसी ने एक ऐसा नारा लगाया जिस पर पूरा देश चौक गया। उन्होंने ‘जय भीम’, ‘जय मीम’, ’जय तेलंगाना’ और ‘जय फ़िलिस्तीन’ का नारा लगाया। जहां तक ‘जय भीम’ और ‘जय तेलंगाना’ जैसे नारों की बात है तो ये देश के सीमाओं के दायरे में आते हैं। पर एक दूसरे देश की जयकार बोलना, वो भी संसद के भीतर, ये किसी के गले नहीं उतरा। ओवैसी ने एक बहुत ही ग़लत परंपरा की शुरुआत की है। आनेवाले वर्षों में कोई सांसद ‘जय अमरीका’, ‘जय पाकिस्तान’ या ‘जय चीन’ का भी नारा लगा सकता है। इस तरह भारत की संसद संयुक्त राष्ट्र का अखाड़ा जैसी बन जाएगी। इसलिए इस ख़तरनाक प्रवृत्ति पर लोकसभा और राजसभा के अध्यक्षों को फ़ौरन रोक लगानी चाहिए।
सब जानते और मानते हैं कि भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है। धर्म निरपेक्ष का मतलब नास्तिक होना नहीं है। बल्कि इसका भाव है, सर्व धर्म समभाव, यानी हर धर्म के प्रति सम्मान का भाव। पर देखने में यह आया है कि भारत में रहने वाले मुसलमानों और हिंदुओं के कुछ नेता सांप्रदायिकता को भड़काने के उद्देश से धार्मिक उन्माद बढ़ाने वाले नारे लगवाते हैं। जिससे उनके वोटों का ध्रुवीकरण हो। जहां एक तरफ़ बरसों से मुसलमानों को अल्पसंख्यक बता कर उनके पक्ष में ऐसे काम किये गये जो संविधान की मूल भावना के विरुद्ध थे। जैसे रमज़ान में सरकारी स्तर पर इफ़्तार की दावतें आयोजित करना। अगर ऐसी दावतें अन्य धर्मों के उत्सवों पर भी की जातीं तो किसी को बुरा नहीं लगता। पर ऐसा नहीं हुआ। नतीजा यह हुआ कि हिंदुत्व की राजनीति करने वालों को अपने समर्थकों को उकसाने का आधार मिल गया। शायद इसी का परिणाम है कि पिछले दस वर्षों में भाजपा के सांसदों और विधायकों ने संसद और विधान सभाओं में ज़ोर-ज़ोर से व सामूहिक रूप से धार्मिक नारे लगाना शुरू कर दिया। इसका परिणाम ये हो रहा है कि अब मुसलमानों के बीच भी उत्तेजना और अक्रमकता पहले से ज़्यादा बढ़ गई है। जबकि ये एक ख़तरनाक प्रवृत्ति है, जिसे सख़्ती से रोका जाना चाहिए वरना समाज में गतिरोध और हिंसा बढ़ेगी। वैसे इस तरह का वातावरण असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए भी तैयार किया जाता है। इसलिए समझदार हिंदू और मुसलमान अपने धर्म के प्रति आस्थावान होते हुए भी इस हवा में नहीं बहते हैं।
हिंदुत्व का समर्थक कोई पाठक मुझसे तर्क कर सकता है कि हिंदुस्तान में भाजपा के सांसदों और विधायकों को अगर हिन्दुवादी नारे लगाने से रोका जाएगा तो क्या हम फ़िलिस्तीन में जा कर ये नारे लगाएँगे? मेरा उत्तर है कि मैं एक सनातन धर्मी हूँ और मेरा परिवार और पूर्वज शुरू से आरएसएस से जुड़े रहे हैं। लेकिन पिछले 30 वर्षों में हिंदुत्व की राजनीति का जो चेहरा मैंने देखा है उससे मन में कई सवाल खड़े हो गये हैं। जब देश की आबादी 141 करोड़ है, इनमें से 97 करोड़ वोटर हैं। उसमें से केवल 36.6 प्रतिशत वोटरों ने ही इस चुनाव में भाजपा को वोट दिया है। मतलब ये कि कुल 111 करोड़ हिंदुओं में से केवल 35 करोड़ हिंदुओं ने बीजेपी को वोट दिया। तो भाजपा सारे हिन्दू समाज के प्रतिनिधित्व का दावा कैसे कर सकती है? चूँकि देश की आबादी में 78.9 प्रतिशत हिंदू हैं और उनमें से एक छोटे से हिस्से ने बीजेपी को वोट दिया है। मतलब बहुसंख्यक हिंदू भाजपा की नीतियों से सहमत नहीं हैं।
हम सब मानते हैं कि हमारा धर्म सनातन धर्म है। जिसका आधार है वेद, पुराण, गीता, भागवत, रामायण आदि ग्रंथ। क्या भाजपा इनमें से किसी भी ग्रंथ के अनुसार आचरण करती है? अगर नहीं तो वे कैसे हिंदू धर्म के पुरोधा होने का दावा करती है?
हमारे धर्म के चार स्तंभ हैं, उन चारों पीठों के शंकराचार्य जिन्हें आदि शंकराचार्य जी ने सदियों पहले भारत के चार कोनों में स्थापित किया था। क्या भाजपा इन चारों शंकराचार्यों को यथोचित सम्मान देती है और इनके ही मार्ग निर्देशन में अपनी धार्मिक नीति बनाती है? अगर नहीं तो फिर बीजेपी हिंदू धर्म के पुरोधा कैसे हुए?
सनातन धर्म में साकार और निराकार दोनों ब्रह्म की उपासना स्वीकृत है। इस तरह उपासना के अनेक मार्ग व अधिकृत संप्रदाय हैं। इसलिए पूरे देश में व्याप्त सनातन धर्म का कोई एक झंडा या एक जय घोष नहीं होता। जैसे ‘जय श्री राम’ किसी अधिकृत संप्रदाय का जयघोष नहीं है। प्रभु श्री राम को लोग ‘जय सिया राम’, ‘राम-राम’ ‘जय रामजी की’ आदि अनेक संबोधनों से पुकारते हैं। ‘जाकी रही भावना जैसी हरि मूरत देखी तिन तैसी’। फिर केवल ‘जय श्री राम’ धार्मिक उदघोष कैसे हुआ?
ऐसी तमाम अन्य सब बातों को भी देख सुनकर कर यह स्पष्ट होता है कि भाजपा का हिंदुत्व सनातन धर्म नहीं है। ये इनकी राजनीति के लिये एक अस्त्र मात्र है। इसका अर्थ यह हुआ कि संसद में चाहे “जय श्री राम” का नारा लगे और चाहे “अल्लाह हो अकबर” का दोनों ही राजनैतिक उद्देश्य से लगाए जाने वाले नारे हैं जिनका उद्घोष संसद में नहीं होना चाहिए। जय फ़िलिस्तीन का नारा तो और भी ख़तरनाक प्रवृत्ति को दर्शाता है। आशा की जानी चाहिए कि संसद के दोनों सदनों के अध्यक्ष इस विषय पर गंभीरता से विचार करके संविधान और संसद की गरिमा बचाने का काम करेंगे।
शुक्रवार, 21 जून 2024
भारतीय रेल: मंत्रि जी कृपया ध्यान दें!
शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने कभी ना कभी रेल यात्रा न की हो। रेलवे स्टेशन पर सुनाई देने वाली घोषणा की शुरुआत ‘यात्रीगण कृपया ध्यान दें’ से ही होती है। इसका उद्देश्य सभी मौजूद यात्रियों का ध्यान आकर्षित करना होता है। यह तो हुई एक साधारण बात। परंतु बीते कुछ वर्षों में हो रहे रेल हादसों के बाद से अब इस घोषणा का सीधा सम्बंध भारतीय रेल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े मंत्रियों और अफ़सरों से है। बढ़ते हुए रेल हादसों के चलते अब भी अगर संबंधित मंत्री और अधिकारी नहीं जागेंगे तो कब जागेंगे?
देश की जीवन रेखा माने जाने वाली भारतीय रेल हर ख़ास-ओ-आम आदमी के लिए देश के किसी भी कोने से दूसरे कोने तक यात्रा करने का सस्ता और भरोसेमंद साधन है। हर यात्री को इस बात का भरोसा होता था कि देर-सेवर वो अपने गंतव्य तक पहुँच ही जाएगा। ज्यों-ज्यों देश की आबादी बढ़ी सरकार ने रेल यात्रा में उचित सुधार भी किए। आज भारत में रेलवे की कुल लंबाई 1,15,000 किलोमीटर है। भारतीय रेल रोजाना करीब 2 करोड़ 31 लाख यात्रियों और 33 लाख टन माल को ढोती है। यह दुनिया की चौथी सबसे बड़ी रेलवे सेवा है। 12.27 लाख कर्मचारियों के साथ, भारतीय रेलवे दुनिया की आठवीं सबसे बड़ी व्यावसायिक इकाई है। भारतीय रेल के कार्यचालन के विभिन्न पहलुओं की देखभाल करने के लिए इसने 11 सरकारी क्षेत्र के उपक्रम भी स्थापित किये। भारत जैसे देश के लिए इतने बड़े स्तर पर यात्रा का साधन मुहैया कराने वाली भारतीय रेल पर देश को गर्व है। परंतु हर सिक्के के दो पहलू होते हैं।
बीते कुछ वर्षों में रेल मंत्रालय द्वारा कई ट्रेनों में जो बदलाव किए गए हैं वह एक ओर जहां यात्रियों द्वारा बधाई प्राप्त कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पूरे सिस्टम में फैली अव्यवस्था को लेकर भारी विरोध भी झेल रहे हैं। यात्रियों की सुविधा की दृष्टि से रेल मंत्रालय ने अनेकों आधुनिक गाड़ियाँ भी चलाईं। जैसे-जैसे रेल यात्रा में सुविधा बढ़ी वैसे-वैसे किराये में भी वृद्धि हुई। उल्लेखनीय है कि जिस कदर रेल के किरायों में वृद्धि हुई है उसमें यात्रा केवल वही लोग कर पा रहे हैं जो उस बढ़े हुए किराए का वहन कर सकते हैं। आम जनता जो कि साधारण श्रेणी में यात्रा करती है उसके लिये कोई भी नई सुविधा नहीं दी गई है। आबादी के बढ़ने पर आम जनता के लिए आम श्रेणी की गाड़ियों में भी बढ़ौतरी की जानी चाहिए थी, परंतु ऐसा नहीं हुआ।
आँकड़ों के अनुसार बीते वित्तीय वर्ष में 2.70 करोड़ यात्री टिकट होने के बावजूद रेल में यात्रा नहीं कर पाए, क्योंकि उनका टिकट कन्फर्म नहीं हो पाया। इसी का नतीजा हुआ कि आए दिन हमें यह देखने को मिलता है कि ट्रेन में सफ़र करने वाले लोग ट्रेन की क्षमता से ज़्यादा पाए जाते हैं। इससे आरक्षित टिकट प्राप्त कर यात्रा करने वालों को काफ़ी असुविधा का सामना करना पड़ता है। क्या रेल मंत्रालय के अधिकारियों इस बात की जानकारी नहीं थी कि देश में बढ़ती हुई आबादी के चलते आवागमन में भी वृद्धि होगी? क्या जिन यात्रियों की टिकट कन्फर्म नहीं हुई और उन्हें उनके किराए की राशि वापिस की गई, इसकी संख्या में होती वृद्धि पर किसी का ध्यान नहीं गया? क्या जिन साधारण श्रेणी के डिब्बों को उच्च श्रेणी में तब्दील किया जाना उचित था? क्या उच्च श्रेणी की आधुनिक ट्रेनों को चलाने के लिए साधारण श्रेणी की ट्रेनों को रद्द करना उचित था? यदि समय रहते सही निर्णय लिया गया होता तो रेल में भीड़ के चिन्ताजनक दृश्य सामने नहीं आते।
एक ओर जहां किसी नई और आधुनिक रेल के उद्घाटन के समय जिस कदर मंत्री और अफ़सर श्रेय लेने के लिए आगे आते हैं, वह रेल में हो रही लापरवाहियों का ज़िम्मा लेने से बचते नज़र आते हैं। आँकड़ों के अनुसार 2014 से 31 मार्च 2023 तक 1117 रेल हादसे हो चुके हैं। इनमें सैंकड़ों लोगों की जानें गई, हज़ारों की तादाद में लोग घायल हुए और करोड़ों की संपत्ति का भी नुक़सान हुआ। परंतु इन हादसों से कोई सबक़ नहीं लिया गया। ग़ौरतलब है कि पिछले साल जून 2023 में देश में एक भीषण रेल हादसा बालासोर में हुआ था जहां लगभग 300 लोगों की जान गई और क़रीब 900 घायल हुए। इसके बाद इसी सप्ताह पश्चिम बंगाल में एक ओर रेल हादसा हुआ जिसने रेल सुरक्षा की पोल खोल कर रख दी। यहाँ एक तथ्य का उल्लेख करना आवश्यक होगा कि सीएजी की एक रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष में 20 हज़ार करोड़ रुपये आने थे। जिसमें 15 हज़ार करोड़ केंद्र सरकार द्वारा दिये जाते और 5 हज़ार करोड़ रेल मंत्रालय देता। परंतु चार साल बाद मात्र 4225 करोड़ ही आए और इन्हें भी ग़ैर ज़रूरी मदों पर खर्च किया गया रेलवे सुरक्षा पर नहीं।
सोचने वाली बात यह है कि अधिकतर दुर्घटनाओं में मानवीय त्रुटि बताई जाती है। यानी ट्रेन चलाने वाले या रेल की पटरियों और रेल ट्रैफ़िक को संचालित करने वाले, दुर्घटना के ज़िम्मेदार होते हैं। रेल मंत्री द्वारा संसद में दिये गये उत्तर के मुताबिक़ रेलवे में 3.12 लाख रिक्त पद पड़े हैं। ग़ौरतलब हैं कि ट्रेन चलाने वाले लोकोपायलट के 70093 पद स्वीकृत हैं जिनमें से 21 प्रतिशत पद ख़ाली पड़े हैं। इसी के चलते मौजूदा लोकोपायलटों को लंबे समय तक ड्यूटी पर रहना पड़ता है। थकान और नींद के चलते ऐसे हादसे होना स्वाभाविक है। परंतु क्या देश में बढ़ती बेरोज़गारी के चलते सरकार को इस ओर ध्यान नहीं देना चाहिए था? विपक्ष द्वारा बार-बार यह सवाल उठाया जा रहा है कि एक के बाद एक हादसे होने के बावजूद किसी भी तरह की नैतिक ज़िम्मेदारी लेने से बचने वाले रेल मंत्री का अपनी कुर्सी पर बने रहना कहाँ तक उचित है? क्या मंत्री जी इस बात पर ध्यान देंगे?
शुक्रवार, 14 जून 2024
उत्तर प्रदेश: भाजपा क्यों हारी-सपा क्यों जीती?
‘अचानक कहीं कुछ नहीं होता, अंदर ही अंदर कुछ घिस रहा होता है, कुछ पिस रहा होता है।’ इन पंक्तियों में कवि ने इस बात पर इशारा किया है कि किसी भी काम का विपरीत अंजाम आने पर हमें ऐसा क्यों लगता है कि ऐसा कैसे हो गया? जबकि उसके पीछे के कारणों पर कोई ध्यान नहीं देता। ऐसा ही कुछ हुआ 2024 के उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों के परिणामों के बाद। यहाँ बीजेपी को पहले के मुक़ाबले इस बार बहुत कम सीटें मिलीं। ऐसा क्या कारण था कि भाजपा का प्रदर्शन इतना बुरा रहा? अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण। अनुच्छेद 370 का हटाना। तीन तलाक़ को ख़त्म करना। ये ऐसे कुछ मुद्दे थे जिन पर भाजपा को पूरा विश्वास था कि वह ‘अबकी बार 400 पार’ के अपने नारे को सच कर दिखाएँगे। परंतु ऐसा न हो सका।
ऐसा माना जाता है कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है। इस बार के चुनावों में उत्तर प्रदेश का जो परिणाम रहा उसने सत्तारूढ़ दल को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि ऐसी कौनसी कमी उनकी नीति मे थी जो वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करने में विफल रही? ऐसा क्या हुआ कि पार्टी के कार्यकर्ताओं में वो उत्साह नहीं था जो पिछले दो लोकसभा चुनावों में देखा गया? क्या संगठन के काम करने के ढंग या उनके द्वारा लिये गये ग़लत फ़ैसलों ने ज़मीनी कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित किया? क्या उत्तर प्रदेश में या अन्य राज्यों में, जहां भाजपा का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं था वहाँ पर उम्मीदवारों के चयन में गलती हुई? हिंदुओं के लिए पूजनीय अयोध्या, रामेश्वरम में मिली हार और प्रधान मंत्री को काशी में पिछली बार के मुक़ाबले बहुत कम अंतर से मिली जीत भी सवालों के घेरे में है। इन नतीजों के बाद सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत द्वारा ‘अहंकार’ की ओर इशारा करना भी क्या इस बुरे प्रदर्शन का कारण बना?
सूत्रों के अनुसार इस बार के चुनावों में कम सीट आने के पीछे भाजपा में अंदरूनी कलह ने भी एक बड़ी भूमिका निभाई। जिस तरह केंद्र के नेतृत्व द्वारा राज्य की सरकारों व राज्यों के नेताओं की उपेक्षा की गई और वो फिर जनता के सामने आई वह भी इन नतीजों का कारण बनी। भाजपा और संघ के बीच हुए मतभेदों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। यदि केंद्र और राज्य के नेतृत्व में कोई मतभेद थे तो उन्हें समय रहते एक मर्यादा के तहत हल किया जाना चाहिए था। भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं का इस बार के चुनावों में सक्रिय योगदान नहीं दिखाई दिया उससे देश भर में एक संदेश गया है कि राष्ट्रीय नेतृत्व ज़मीन से कट गया है। इस बार के चुनावों को इतने चरणों में बाँटने से भी कार्यकर्ताओं की सहभागिता में कमी नज़र आई। कार्यकर्ताओं को इस बात का पूर्ण विश्वास था कि पिछले दस वर्षों में देश में ऐसे कई बदलाव आए हैं जो तीसरी बार भी मोदी सरकार को पूर्ण बहुमत दिलाएँगे। शायद इसी के चलते भी कार्यकर्ताओं में उतना उत्साह दिखाई नहीं दिया।
वहीं दूसरी ओर देखें तो समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके कार्यकर्ताओं ने जिस तरह उत्तर प्रदेश के चप्पे-चप्पे पर अपनी नज़र बनाए रखी और खूब भागदौड़ की वो काफ़ी फ़ायदेमंद रहा। सपा के उम्मीदवारों का चयन और ‘इंडिया’ गठबंधन के घटक दलों का उन पर विश्वास, दोनों ही इन चुनावों में सही साबित हुए। चुनाव के दौरान और चुनाव संपन्न होने के बाद जिस तरह अखिलेश यादव की सेना ने चौकन्ना रह कर स्थानीय प्रशासन और चुनाव आयोग पर दबाव बनाए रखा वो फ़ायदेमंद साबित हुआ। यदि समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता इसी ऊर्जा और रणनीति से अभी से जुटे रहेंगे तो 2027 के विधान सभा चुनावों में भी उनका प्रदर्शन बढ़िया रहेगा। उत्तर प्रदेश के अगले विधान सभा चुनावों में यदि सही रणनीति और सही उम्मीदवारों का चयन हो, यदि वहाँ की जनता की समस्याओं के समाधान की एक ठोस योजना हो तो उन मतों को भी अपने पाले में लाया जा सकता है जो बुनियादी मुद्दों से भटका दिये गये हैं।
इतना ही नहीं, जिस तरह समाजवादी पार्टी को एक विशेष वर्ग के लोगों की पार्टी माना जाता था, उसका भी भ्रम इस बार के चुनावों में टूटा है। सभी हिंदू तीर्थ स्थलों में सपा ने भाजपा को शिकस्त दी है। समाजवादी पार्टी ने जिस तरह ‘एम-वाई’ फैक्टर को नये रूप में पेश किया वह भी काम कर गया है। इस बार के चुनावों ‘एम-वाई’ फैक्टर को ‘महिला’ एवं ‘युवा’ के रूप में देखा गया। यदि इसी तरह की रणनीति के तहत अखिलेश यादव की पार्टी 2027 के विधान सभा चुनावों की योजना बनाए तो उनको अगली विधान सभा में 300 का आँकड़ा पार करना मुश्किल न होगा। ऐसा करने के लिए उन्हें ‘इंडिया’ गठबंधन के दलों को भी अपने साथ लेकर चलना होगा। जिस तरह भाजपा हर समय चुनावी मूड में रहती है यदि विपक्षी पार्टियाँ भी उसी मूड में रहें तो भाजपा को कड़ी टक्कर दे पायेंगी।
इसके साथ ही सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को ही इस बात पर भी तैयार रहना चाहिए कि यदि किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है तो गठबंधन की सरकार ही विकल्प होता है। यदि कोई भी दल इस अहंकार में रहे कि वो एक बड़ा और प्रभावशाली राजनैतिक दल है और विपक्ष दर्शक दीर्घा में बैठने के लिए है तो फिर उसे तब झटका लगेगा ही जब उसे सरकार बनाने के लिए अन्य दलों के आगे झुकना पड़ेगा। हर दल को जनता के फ़ैसले का सम्मान करना चाहिए और अपनी हार स्वीकार लेनी चाहिए। गठबंधन की सरकार में हर वो दल जिसके पास अच्छी संख्या हो वह किसी न किसी बात पर उखड़ भी सकता है। इसलिए भलाई इसी में है कि अपनी ग़लतियों से सबक़ लिया जाए और सबका साथ और सबका विकास अमल में लाया जाए।
शुक्रवार, 7 जून 2024
न तुम जीते न वो हारे!
2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने सभी चौंका दिया है। सत्तापक्ष के बड़े-बड़े दावे और उसी से मिलते-जुलते एग्जिट पोल के बाद किसी को ऐसी उम्मीद नहीं थी। हालाँकि ‘इंडिया’ गठबंधन के नेताओं के अलावा एक दो ज्योतिषियों ने टीवी चैनलों पर एग्जिट पोल को सिरे से नकार दिया था। पर ‘इंडिया’ गठबंधन पर जिस तरह देश के मतदाताओं ने भरोसा जताया है उससे तो यही सिद्ध हुआ है कि देश में ‘लोक’ का ‘तंत्र’ अभी जीवित है। अब सरकार जिस गठबंधन की भी बने देश की संसद में विपक्ष को भी अच्छी संख्या में स्थान मिलेगा। जो भी सरकार बनाएगा अब उसे विपक्ष के दबाव में रह कर कार्य करने पड़ेंगे। एक स्वस्थ लोकतंत्र में मज़बूत विपक्ष का होना भी अनिवार्य है। इसलिए 2024 का चुनाव सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के लिए ही अच्छा साबित हुआ।
चुनावों के दौरान जिस तरह ‘इंडिया’ गठबंधन चुनाव आयोग की मशीनरी पर कई तरह के सवाल उठा रहा था उससे आम जनता के मन में भी भ्रम पैदा होने शुरू हो गए थे। लेकिन लोकसभा नतीजों ने एक बार फिर से यह विश्वास जगाया है कि चुनावों में मतदाता ही सर्वोपरि होते हैं। इस बार के चुनावों में किसी भी दल या नेता की, किसी भी तरह की, कोई भी लहर नहीं थी। ये चुनाव जनता का चुनाव था। देश भर में फैल रही महंगाई, बेरोज़गारी व अन्य परेशानियों से मतदाता त्रस्त था। इसलिए उसे जो जंचा उसी को उसने वोट दिया। आख़िरी चरण के मतदान के बाद से जो भी एग्जिट पोल आए वो भी एनडीए की ही सरकार बना रहे थे। परंतु एग्जिट पोल केवल पोल-पट्टी साबित हुए।
चुनाव परिणाम के बाद एग्जिट पोल करने वाली एक संस्था के अध्यक्ष जिस तरह एक राष्ट्रीय टीवी चैनल पर फूट-फूट कर रोने लगे उससे तो यह लगा कि उन्हें अपनी करनी पर पछतावा है। पर कई बार जो सामने दिखाई देता है वो असल में सच नहीं होता। उसके पीछे का सच कुछ और होता है। इन सज्जन के विषय में आज ऐसी शंका देश भर में जताई जा रही है। इसका एक कारण यह है कि बिना सर्वेक्षण तकनीकी की बारीकी बताए, बिना सैंपल साइज बताए, बिना प्रश्नावली के प्रश्न बताए, केवल अपना आँकलन प्रचारित कर देना अनैतिक होता है। सोचने वाली बात यह है कि जो भी संस्था एग्जिट पोल करती है उसे यह बताने में क्या गुरेज़ होता है कि उसने एग्जिट पोल करने की मानक प्रक्रिया को अपनाया या नहीं? ऐसा तो नहीं है कि ये एग्जिट पोल निहित स्वार्थों के किसी एजेंडा के तहत किए गए? क्या ऐसे सर्वे कराने में किसी मीडिया संस्थान की भी संदिग्ध भूमिका रही?
मिसाल के तौर पर जिस तरह 2024 के लोकसभा चुनावों के एग्जिट पोल दिखाए गए और उसकी प्रतिक्रिया को लेकर देश के शेयर मार्केट में एकदम से भारी उछाल आया उससे आकर्षित हो कर देश के करोड़ों आम निवेशकों ने विश्वास करके बाज़ार में निवेश कर डाला। परंतु नतीजों के रुझान आने पर शेयर मार्केट बुरी तरह लुढ़का और आम निवेशकों के करोड़ों रुपये स्वाहा हो गये। इससे तो यह साफ़ प्रतीत होता है कि एकतरफ़ा नतीजे को प्रचारित करके किसी विशेष उद्देश्य से ही एग्जिट पोल को इतना प्रचारित किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि अब जब कोई भी संस्था ईमानदारी से भी एग्जिट पोल या सर्वे करेगी तो उस पर भी संदेह किया जाएगा। शायद गुमराह करने वाले एग्जिट पोल और उसी का प्रचार करने वाले पक्षपाती मीडिया संस्थानों को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि नतीजे उनके सर्वेक्षण के विपरीत भी आ सकते हैं। यदि उन्हें ये मालूम था और इस सबके बावजूद एग्जिट पोल वाली संस्था ने ऐसा एग्जिट पोल राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर परोसा तो वो संस्था व चैनल देश की जनता साथ धोखाधड़ी करने के दोषी हैं। जिसकी जाँच की जानी चाहिए।
चुनावों के दौरान जिस तरह ‘इंडिया’ गठबंधन चुनाव आयोग की मशीनरी पर कई तरह के सवाल उठा रहा था उससे आम जनता के मन में भी भ्रम पैदा होने शुरू हो गए थे। लेकिन लोकसभा नतीजों ने एक बार फिर से यह विश्वास जगाया है कि चुनावों में मतदाता ही सर्वोपरि होते हैं। इस बार के चुनावों में किसी भी दल या नेता की, किसी भी तरह की, कोई भी लहर नहीं थी। ये चुनाव जनता का चुनाव था। देश भर में फैल रही महंगाई, बेरोज़गारी व अन्य परेशानियों से मतदाता त्रस्त था। इसलिए उसे जो जंचा उसी को उसने वोट दिया। आख़िरी चरण के मतदान के बाद से जो भी एग्जिट पोल आए वो भी एनडीए की ही सरकार बना रहे थे। परंतु एग्जिट पोल केवल पोल-पट्टी साबित हुए।
चुनाव परिणाम के बाद एग्जिट पोल करने वाली एक संस्था के अध्यक्ष जिस तरह एक राष्ट्रीय टीवी चैनल पर फूट-फूट कर रोने लगे उससे तो यह लगा कि उन्हें अपनी करनी पर पछतावा है। पर कई बार जो सामने दिखाई देता है वो असल में सच नहीं होता। उसके पीछे का सच कुछ और होता है। इन सज्जन के विषय में आज ऐसी शंका देश भर में जताई जा रही है। इसका एक कारण यह है कि बिना सर्वेक्षण तकनीकी की बारीकी बताए, बिना सैंपल साइज बताए, बिना प्रश्नावली के प्रश्न बताए, केवल अपना आँकलन प्रचारित कर देना अनैतिक होता है। सोचने वाली बात यह है कि जो भी संस्था एग्जिट पोल करती है उसे यह बताने में क्या गुरेज़ होता है कि उसने एग्जिट पोल करने की मानक प्रक्रिया को अपनाया या नहीं? ऐसा तो नहीं है कि ये एग्जिट पोल निहित स्वार्थों के किसी एजेंडा के तहत किए गए? क्या ऐसे सर्वे कराने में किसी मीडिया संस्थान की भी संदिग्ध भूमिका रही?
मिसाल के तौर पर जिस तरह 2024 के लोकसभा चुनावों के एग्जिट पोल दिखाए गए और उसकी प्रतिक्रिया को लेकर देश के शेयर मार्केट में एकदम से भारी उछाल आया उससे आकर्षित हो कर देश के करोड़ों आम निवेशकों ने विश्वास करके बाज़ार में निवेश कर डाला। परंतु नतीजों के रुझान आने पर शेयर मार्केट बुरी तरह लुढ़का और आम निवेशकों के करोड़ों रुपये स्वाहा हो गये। इससे तो यह साफ़ प्रतीत होता है कि एकतरफ़ा नतीजे को प्रचारित करके किसी विशेष उद्देश्य से ही एग्जिट पोल को इतना प्रचारित किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि अब जब कोई भी संस्था ईमानदारी से भी एग्जिट पोल या सर्वे करेगी तो उस पर भी संदेह किया जाएगा। शायद गुमराह करने वाले एग्जिट पोल और उसी का प्रचार करने वाले पक्षपाती मीडिया संस्थानों को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि नतीजे उनके सर्वेक्षण के विपरीत भी आ सकते हैं। यदि उन्हें ये मालूम था और इस सबके बावजूद एग्जिट पोल वाली संस्था ने ऐसा एग्जिट पोल राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर परोसा तो वो संस्था व चैनल देश की जनता साथ धोखाधड़ी करने के दोषी हैं। जिसकी जाँच की जानी चाहिए।
दरअसल जब तक ऐसा सर्वे करने वाली संस्थाएँ अपनी वेबसाइट व अन्य प्रचार सामग्री पर इस बात को पूरी तरह से प्रकाशित न करें कि उस संस्था का किसी भी राजनैतिक दल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई संबंध नहीं है या अपनी तकनीकी का खुलासा न करें, तब तक उस संस्था द्वारा किए गये एग्जिट पोल को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। परंतु हमारे देश में जिस तरह से एग्जिट पोल की भेड़-चाल होती है, वो किसी मनोरंजन से कम नहीं होती।
कुछ भी हो 2024 का चुनाव भी भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में अपनी जगह बना चुका है। एक ओर जहां एनडीए का ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा विफल हुआ है, वहीं विपक्षी एकता का ‘इंडिया’ गठबंधन भी कई बार बिगड़ते-बिगड़ते मज़बूती से उभर कर आया। विपक्षी दल हों या सत्तापक्षी दल, सभी ने जनता के सामने भी बड़े-बड़े वादे किए हैं और उनको पूरा करने का प्रण भी किया है। तो उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले वक्त में वे अपने वायदों को पूरा करेंगे, उन्हें ‘जुमला’ कह कर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ेंगे। जहां तक नई लोकसभा के गठन का सवाल है तो यह कहना ग़लत नहीं होगा कि ‘न तुम जीते न वो हारे’।
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