शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2024

सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जगाई

बचपन में जब हम सभी दोस्त मिल कर क्रिकेट खेलते थे तो कोई मित्र बैट ले कर आता था तो कोई बॉल। अचानक खेलते हुए जब बैट या बॉल लाने वाला मित्र बिना कोई रन बनाए आउट हो जाता था तो ख़ुद को आउट होना न स्वीकारते हुए ग़ुस्से में वो अपना बैट या बॉल लेकर घर चला जाता था। ऐसा वो इस उम्मीद से करता था कि उसे एक बार और खेलने का मौक़ा मिले। परंतु जैसे ही उसे कोई बड़ा जना यह समझाता कि खेल को खेल की भावना से खेलना चाहिए, हार-जीत तो होती ही रहती है। इसमें बुरा मानने की क्या बात? तो वो मान जाता था। पिछले दिनों देश की सर्वोच्च अदालत ने भी एक समझदार व्यक्ति की भूमिका निभाते हुए न सिर्फ़ बेईमानी कर रहे अधिकारी को आईना दिखाया बल्कि पूरे देश में एक संदेश भी भेजा कि जो भी हो नियम और क़ानून की हद में हो।


चंडीगढ़ के मेयर के चुनाव को लेकर जो विवाद सुर्ख़ियों में था उस पर सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को विराम लगा दिया। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश माननीय डी वाई चंद्रचूड़ ने इस चुनाव के विवादित वीडियो का संज्ञान लेते हुए पीठासीन अधिकारी, अनिल मसीह को दोषी करार दिया और जिस प्रत्याशी को बहुमत मिला उसी को मेयर घोषित भी किया। देखा जाए तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचना ही नहीं चाहिए था। जैसे ही यह मामला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट पहुँचा इसका निर्णय वहीं हो जाना चाहिए था। परंतु ऐसा न हो पाने के कारण इसे सुप्रीम कोर्ट तक आना पड़ा।

इस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि, “अदालत ये सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया इस तरह के हथकंडों से नष्ट नहीं हो।” अदालत ने यह भी कहा कि, “मेयर चुनाव में अमान्य किए गए आठ बैलट पेपर मान्य माने जाएंगे। इसके साथ ही रिटर्निंग ऑफिसर अनिल मसीह को कोर्ट की अवमानना का नोटिस जारी किया। अब आने वाले तीन सप्ताह में इस अधिकारी को यह साबित करना होगा कि उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्यवाही क्यों न की जाए?


जिस तरह से चंडीगढ़ के मेयर के चुनाव के मामले ने सुप्रीम कोर्ट पहुँच कर तूल पकड़ा, देश भर की जनता में एक उम्मीद की किरण जागी है। बात यहाँ किसी भी दल की नहीं है। परंतु जिस तरह एक अधिकारी ने पहले तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर बेईमानी की। इतना ही नहीं सुप्रीम में सुनवाई के दौरान उस अधिकारी ने ग़लत बयान भी दिया। अनिल मसीह की इस ग़ैर-क़ानूनी हरकत से जनता के बीच यह संदेश गया कि सीधी-सादी चुनावी प्रक्रिया में धांधली कैसे की जाती है। इसके साथ ही कोर्ट के कड़े रुख़ से यह बात भी साफ़ हो गई कि मामला चाहे एक मेयर के छोटे से चुनाव का ही क्यों न हो, लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता होना बहुत ज़रूरी है।

उल्लेखनीय है कि इस चुनाव में धांधली इसलिए सामने आई क्योंकि जब यह चुनाव चल रहा था तब पूरी कार्यवाही को वहाँ पर लगे सीसीटीवी में रिकॉर्ड किया जा रहा था। जैसे ही इस धांधली के वीडियो दुनिया भर में घूमने लगे तो ये सवाल भी उठने लगे कि जिस प्रत्याशी को बहुमत मिला है उसे मेयर के पद पर बैठाने में चुनावी अधिकारी को क्या आपत्ति है?


अब चूँकि सुप्रीम कोर्ट ने इस चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर अनिल मसीह के इस ग़ैर-क़ानूनी कृत पर कड़ा रुख़ लेते हुए उनको कारण बताओ नोटिस भी जारी किया है तो इससे एक बात तो तय लगती है कि कोर्ट इस मामले की तह तक जा सकता है। यहाँ यह सवाल भी उठता है कि क्या यह रिटर्निंग ऑफिसर ऐसा किसी के कहने पर कर रहा था? क्या यह अधिकारी इतना मासूम था कि उसे नियमों का ज्ञान ही नहीं था? ऐसा इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि जब भी किसी व्यक्ति को ‘रिटर्निंग ऑफिसर’ बनाया जाता है तो उसे उस पद से संबंधित सभी क़ायदे-क़ानून समझाए भी जाते हैं। इसलिए यह कहना ग़लत नहीं होगा कि चंडीगढ़ के मेयर के चुनाव में जो भी हुआ वो किसी सोची-समझी साज़िश के तहत ही हुआ। देखना यह है कि तीन सप्ताह बाद जब इस दोषी अधिकारी पर कार्यवाही होगी तब जाँच एजेंसी या पुलिस इसकी तह तक जाएगी या नहीं?

जो भी हो जिस तरह से देश की शीर्ष अदालत ने हाल ही के कुछ फ़ैसलों में कड़ा रुख़ अपनाते हुए सभी को क़ानून की हद में रहने की हिदायत दी है, उससे देश भर में एक सही संदेश गया है। इन मामलों में सुनवाई करते हुए अदालत ने यह बात स्पष्ट कर दी है कि कोर्ट की जिम्मेदारी है कि वो लोकतांत्रिक सिद्धांतों और मूल्यों को बहाल करे। देश के करोड़ों मतदाताओं को यह संदेश भी दिया है कि कोई भी व्यक्ति या दल कितना ही बड़ा क्यों न हो क़ानून उससे भी बड़ा है। देश की अदालतें लोकतंत्र का मज़ाक़ उड़ने नहीं देंगी। देखना यह है कि आगामी लोक सभा चुनावों पर कोर्ट के कड़े रुख़ का देश के चुनाव आयोग, मतदाताओं और राजनैतिक दलों पर क्या असर पड़ेगा? जिस तरह से विपक्षी दल चुनावी प्रक्रिया में ईवीएम को लेकर शोर मचा रहे हैं क्या देश की शीर्ष अदालत इस मामले का भी संज्ञान लेगी? यह तो आने वाला समय ही बतायेगा कि विधायिका और न्यायपालिका का ऊँठ किस करवट बैठेगा। कुल मिलाकर देखा जाए तो कोर्ट इस कड़े रुख़ से यह बात सिद्ध हो गई है कि स्वस्थ लोकतंत्र में पारदर्शिता का होना कितना अनिवार्य है।

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2024

प्रतिकूल क़ब्ज़े पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फ़ैसला


यदि आप अपने मकान में किसी को किरायेदार रखते हैं तो प्रायः आप ग्यारह महीनों के लिए एक अनुबंध करते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि इस अवधि के बीच आप किरायेदार की नीयत से वाक़िफ़ हो जाएँ। यदि उसका रहन-सहन ठीक लगे तो आप इस अनुबंध को अगले ग्यारह महीनों के लिए बढ़ा भी सकते हैं। परंतु कोई भी मकान मालिक किसी भी किरायेदार को लम्बे समय तक अपने मकान में रहने नहीं देता। इसके पीछे का कारण है प्रतिकूल क़ब्ज़ा या ‘एडवर्स पज़ेशन’ क़ानून। इसके क़ानून के तहत यदि कोई व्यक्ति किसी मकान या ज़मीन पर बारह वर्ष या उससे अधिक तक रहता है या उस जगह पर उसका क़ब्ज़ा होता है तो प्रतिकूल क़ब्ज़े क़ानून के तहत वो व्यक्ति उस जगह पर अपने मालिकाना हक़ का दावा कर सकता है। परंतु हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने प्रतिकूल क़ब्ज़े को लेकर मकान मालिक और किरायेदार के संबंध में एक बड़ा फ़ैसला दिया है।


जब भी कभी हम कोई मकान या ज़मीन ख़रीदते हैं तो इस बात को सुनिश्चित कर लेते हैं कि जो भी व्यक्ति हमें अपना मकान या अपनी ज़मीन बेच रहा है वही उसका मालिक है और वो प्रॉपर्टी उसी के क़ब्ज़े में है। परंतु यदि कोई आपको अंधेरे में रख कर कोई विवादित ज़मीन बेच दे तो आप ठगा महसूस करेंगे। ऐसा ही कुछ हुआ बृज नारायण शुक्ला के साथ। 1966 में उत्तर प्रदेश के हरदोई में शुक्ला ने एक ज़मीन राय बहादुर मोहन लाल से ख़रीदी। जब 1975 में वे उस ज़मीन पर कुछ निर्माण करने लगे तो उन्हें निर्माण करने से सुदेश कुमार ने यह कह कर रोक दिया कि इस भूमि के मालिकाना और क़ब्ज़े को लेकर एक विवाद 1944 से चल रहा है। इसी कारण प्रतिकूल क़ब्ज़े क़ानून के तहत वह ज़मीन सुदेश कुमार के क़ब्ज़े में है। मामला ज़िला अदालत में पहुँचा और फ़ैसला बृज नारायण शुक्ला के पक्ष में आया। इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुदेश कुमार इलाहाबाद उच्च न्यायालय गये जहां फ़ैसला उनके हक़ में आया।


जैसे ही यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा तो कोर्ट ने यह बात स्पष्ट कर दी कि मकान मालिक और किरायेदार विवाद में प्रतिकूल क़ानून लागू नहीं होता। इस मामले में कोर्ट ने तीन अहम बातें कहीं। पहला यह कि जिस भी व्यक्ति ने ज़मीन को उसकी क़ीमत अदा करके अपने सौदे को रजिस्टर करवाया है वही उसका मालिक है। किरायेदार और मकान मालिक के पुराने चलते आ रहे विवाद में किरायेदार मालिक कभी नहीं हो सकता। इस ऐतिहासिक फ़ैसले में दूसरी अहम बात यह कही गई कि इस विवाद के अनुसार जो किरायेदार उस ज़मीन पर क़ाबिज़ है उसने उच्च न्यायालय में यह तर्क दिया कि वे 1944 से उस ज़मीन के किरायेदार हैं इसलिए उन पर प्रतिकूल क़ब्ज़े का क़ानून लागू होता है। उच्च न्यायालय ने भी इस तर्क को मान लिया। परंतु सुप्रीम कोर्ट द्वारा उच्च न्यायालय के इस तर्क को ग़लत करार दिया गया और यह बात स्पष्ट कर दी गई कि ऐसा कोई क़ानून किरायेदार पर लागू नहीं होता।


दरअसल जब भी कोई व्यक्ति किसी प्रॉपर्टी पर किरायेदार बन कर रहता है तो उस स्थिति में प्रतिकूल क़ब्ज़े का क़ानून लागू इसलिए नहीं होता क्योंकि वह एक रज़ामंदी के तहत किए गए अनुबंध के तहत वहाँ रहता है। यानी मकान मालिक को इस बात से कोई आपत्ति नहीं होती कि उसकी प्रॉपर्टी पर कोई व्यक्ति किराया दे कर रह रहा है। इसलिए कोई भी किरायेदार जब तक अपने मकान मालिक के साथ किए गए अनुबंध का पालन कर रहा है और नियमित रूप से किराया दे रहा है तो वह कितने भी समय तक उस प्रॉपर्टी पर रह सकता है। यदि वह किरायेदार अनुबंध के नियम और शर्तों का पालन नहीं कर रहा तो उस स्थिति में मकान मालिक उसे नोटिस दे कर प्रॉपर्टी ख़ाली करवा सकता है। ठीक इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भी यह बात स्पष्ट कर दी कि सुदेश कुमार उस ज़मीन पर ज़मीन के मालिक की मर्ज़ी से एक किरायेदार की हैसियत से थे जिस पर किसी बात को लेकर विवाद हुआ। इसलिए इस मामले में प्रतिकूल क़ब्ज़े का क़ानून लागू नहीं होता।


इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीसरी अहम बात यह कही गई कि इस विवाद में समय बाधिता (टाइम बार) भी लागू नहीं होती। जब 1966 में इस ज़मीन का सौदा हुआ उस दिन से बारह वर्ष के भीतर ही यह मामला कोर्ट के सामने आया तो समय बाधिता का नियम लागू नहीं होगा। सुदेश कुमार का यह दावा कि क्योंकि यह ज़मीनी विवाद 1944 से चल रहा है, इसलिए इस पर समय बाधिता लागू होगी, यह ग़लत है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि जिस तारीख़ को किसी ज़मीन का सौदा होता है उस दिन से बारह वर्ष के भीतर यदि कोई उस पर हुए क़ब्ज़े को लेकर आपत्ति ज़ाहिर न करे तो केवल उसी स्थिति में प्रतिकूल क़ब्ज़ा या ‘एडवर्स पज़ेशन’ क़ानून लागू हो सकता है।


जनवरी 2024 के सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फ़ैसले से सभी मकान मालिकों और किरायेदारों के बीच एक अच्छा संदेश गया है। इस फ़ैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि किन परिस्थितियों में प्रतिकूल क़ब्ज़े का क़ानून लागू होगा। अब हर मकान मालिक और किरायेदार को बरसों से चले आ रहे दस्तूर को भी त्याग देना चाहिए, जहां वे अपना अनुबंध रजिस्टर नहीं करवाते थे। यदि वे अपना अनुबंध रजिस्टर करवा लेंगे तो इस फ़ैसले के बाद उन्हें फ़िज़ूल की कोर्ट-कचहरी से भी निजाद मिल जाएगी। मकान मालिक और किरायेदार यदि एक दूसरे का सम्मान करें तो बिना किसी विवाद के लम्बे समय तक अपना रिश्ता बनाए रख सकते हैं।

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2024

स्वास्थ्यकर्मी: गुमनाम सिपाहियों को सलाम


एक पुरानी कहावत है, ‘लड़ती है फ़ौज और नाम कप्तान का होता है।’ यह बात काफ़ी हद्द तक सही है, क्योंकि वो फ़ौज का कप्तान ही होता है जो सारी रणनीति बनाता है। हर कप्तान को अपनी फ़ौज पर पूरा विश्वास होता है और उसी विश्वास पर वह जंग में जीत हासिल कर लेता है। यह बात हर उस जंग के लिए कही जा सकती है जहां एक टीम के साथ उसका एक कप्तान होता है। परंतु हर टीम में कुछ ऐसे गुमनाम सिपाही होते हैं जिन्हें हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं। आज हम ऐसे ही कुछ गुमनाम सिपाहियों का ज़िक्र करेंगे जिनके योगदान के बिना देश भर की स्वास्थ्य सेवा अधूरी है। यह स्वास्थ्यकर्मी आपको हर अस्पताल या बड़े क्लिनिक में दिखाई तो देते होंगे पर आपने इनकी सेवा पर इतना गौर नहीं किया होगा।


पिछले सप्ताह मुझे कुछ दिनों के लिए दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में परिवार के एक सदस्य की तीमारदारी के लिये रुकना पड़ा। वहाँ पर हुए कुछ अनुभव के आधार पर ऐसा लगा कि अस्पतालों में काम कर रहे स्वास्थ्यकर्मियों के बारे में पाठकों को जानकारी दी जाए। यह अस्पताल देश के कई बड़े अस्पतालों में से एक था, इसलिए वहाँ पर मरीज़ों और उनके रिश्तेदारों में एक विश्वास का माहौल दिखाई दे रहा था। ज़्यादातर लोगों के पास मेडिक्लेम या सीजीएचएस की सुविधा होने के कारण उनके माथे पर अस्पताल के बिल को लेकर कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं दिखाई दी। परंतु वहीं दूसरी ओर कुछ मरीज़ों में महँगे इलाज को लेकर चिंता भी दिखाई दी। परंतु आज का विषय मेडिक्लेम और महंगे इलाज का नहीं है।

जब भी कभी आप अस्पताल गए होंगे तो आपका सामना सबसे पहले वहाँ पर तैनात सुरक्षाकर्मियों से होता है। ये सुरक्षाकर्मी व्यवस्था बनाए रखने की नीयत से अस्पताल में आने वाले हर व्यक्ति को कभी प्यार से और कभी डाँट से समझाते हुए दिखाई देते हैं। आपने अक्सर देखा होगा कि अस्पताल में आने वाले लोग प्रायः इन सुरक्षाकर्मियों से बुरा व्यवहार करते हैं। परंतु देखा जाए तो अस्पतालों में तैनात तमाम सुरक्षाकर्मी केवल अपनी ड्यूटी कर रहे होते हैं। उनके लिए अस्पतालों में आनेवाले सभी लोग एक समान हैं। जब भी कभी किसी विशिष्ट व्यक्ति को अस्पताल में आना होता है तो उसका एक प्रोटोकॉल होता है, जिसका पालन वे अपने वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में करते हैं। परंतु अस्पताल में आने वाला हर व्यक्ति यदि ख़ुद को वीआईपी समझे और इन सुरक्षाकर्मियों को अपना सेवक तो यह ठीक नहीं। यदि अस्पतालों में व्यवस्था नहीं बनी रहेगी तो क्या वहाँ पर इलाज करने वाले डॉक्टर अपना काम शांति से कर पाएँगे? ज़रा सोचिए कि आप ख़ुद को एक वरिष्ठ डॉक्टर को दिखा रहे हों और बिना किसी सुरक्षाकर्मी की तैनाती के, दरवाज़े पर दूसरे मरीज़ कोहराम मचा रहे हों। ऐसे में क्या डॉक्टर आपकी बीमारी पर ध्यान देगा या बाहर खड़ी भीड़ पर?


ठीक इसी तरह हर अस्पताल में भर्ती मरीज़ों से मिलने वालों के लिए भी नियम तय किए गए हैं। इन नियमों को सुचारू  रूप से लागू किया जाए इसलिए अस्पतालों के वार्ड में जाने वाले हर मार्ग पर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की जाती है। इन सुरक्षाकर्मियों की यह ड्यूटी होती है कि केवल पास धारक या अधिकृत व्यक्तियों को ही प्रवेश दिया जाए। परंतु फिर भी आपने अक्सर कई लोगों को इन सुरक्षाकर्मियों से उलझते हुए देखा होगा। क्या यह सही है? अस्पताल में मरीज़ अपना इलाज करवाने और आराम करने आता है। यदि यहाँ भी मिलने वालों का ताँता लगा रहे तो अस्पताल और घर में फ़र्क़ ही क्या रहेगा? इतना ही नहीं कुछ मरीज़ों को संक्रमण का ख़तरा भी होता है, जो आगंतुकों के आने से बढ़ भी सकता है। इसलिए अस्पतालों में कुछ विशेष वार्डों में आगंतुकों का प्रवेश पूरी तरह से वर्जित होता है। ऐसे कड़े नियम केवल मरीज़ के हित में ही होते हैं। इसलिए अगली बार यदि आपको किसी सुरक्षाकर्मी द्वारा रोका या टोका जाए तो इस बात का ध्यान दें कि वो सुरक्षाकर्मी अपनी ड्यूटी कर रहा है और इसमें आपको बुरा नहीं मानना चाहिए।


अब बात करें उन स्वास्थ्यकर्मियों की जो चुपचाप अपना काम करते हैं और इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि अस्पताल और अस्पताल में भर्ती सभी मरीज़ एकदम स्वच्छ रहें। आप इन्हें अस्पताल के सफ़ाई कर्मियों, वार्ड बॉय, हाउसकीपर जैसे नामों से जानते हैं। इनका काम है अस्पताल के पूरे वातावरण को एकदम साफ़ सुथरा और व्यवस्थित रखना। किसी भी मरीज़ को वार्ड से किसी भी तरह की जाँच के लिए ले जाना हो। मरीज़ों के बिस्तर बदलने हों। मरीज़ों के स्नान व सफ़ाई की बात हो। मरीज़ों के ऑपरेशन से पहले की तैयारी हो। मरीज़ों को टॉयलेट ले कर जाना हो। ये स्वास्थ्यकर्मी मरीज़ों की सेवा करने से नहीं चूकते। वे हर मरीज़ के साथ अपनों जैसा ही व्यवहार करते दिखाई देते हैं। परंतु इसके बावजूद इन्हें मरीज़ों और उनके रिश्तेदारों से शायद ही कभी सराहा जाता होगा। ज़्यादातर स्वास्थ्यकर्मी मरीज़ों की सेवा करने के बावजूद बुरे बरताव का ही सामना करते हैं और फिर भी मुस्कुराते हुए अपना काम करते रहते हैं।

हम लोग अक्सर अस्पतालों से छुट्टी के समय केवल डॉक्टरों और नर्सों का आभार प्रकट कर वहाँ से चल देते हैं। जबकि यह बात उल्लेखनीय है कि अस्पतालों में तैनात हर वो व्यक्ति स्वास्थ्यकर्मी है जो पूरी व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग देता है। फिर वो चाहे सुरक्षाकर्मी हो, वार्ड बॉय हो या सफ़ाई कर्मचारी। सभी का योगदान प्रशंसनीय होता है। आख़िरकार वे भी इंसान हैं और उनके साथ न तो बुरा व्यवहार होना चाहिए और न ही उनकी उपेक्षा की जानी चाहिए।

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2024

नीतीश कुमार: कोई कारण होगा


‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता।’ मशहूर शायर बशीर बद्र का यह शेर देश की राजनीति में हुए हालिया बदलाव पर एकदम सही बैठता है। बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर पाला बदल कर यह बात सिद्ध कर दी है कि या तो ‘इंडिया’ गठबंधन ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया या ‘एनडीए’ गठबंधन ने उन्हें कुछ ज़्यादा ही गंभीरता से ले लिया। राजनैतिक गलियारों में इस बात को लेकर काफ़ी अटकलें लग रहीं हैं कि नीतीश कुमार के इस कदम के पीछे का कारण क्या हो सकता है। कारण जो भी हो 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले ही वोटरों को काफ़ी हलचल  दिखाई दे रही है।

बिहार में जो कुछ भी हुआ उसके पीछे के कारणों में जहां एक ओर ‘इंडिया’ गठबंधन में न होने वाले समझौते हैं। वहीं दूसरी ओर विपक्षी दलों के ‘इंडिया’ गठबंधन के कुछ नेताओं में किसी न किसी तरह का ‘ख़ौफ़’ भी है। उन नेताओं को लगता है कि उन्हें बेवजह किसी न किसी विवाद में फँसा दिया जाएगा और इसका लाभ सत्तापक्ष आनेवाले चुनावों में लेगा। परंतु नीतीश कुमार की बात करें तो जिस तरह उन्होंने विपक्षी दलों को जोड़ने में पहल की थी, उनसे ऐसी उम्मीद किसी को भी नहीं थी। परंतु यहाँ एक बात अहम है कि नीतीश कुमार जैसे अनुभवी और क़द्दावर नेता ने जो ‘इंडिया’ गठबंधन के साथ किया उसके पीछे कोई ठोस वजह ज़रूर रही होगी।

जैसा कि हमने इस कॉलम में कुछ हफ़्तों पहले लिखा था कि मोदी सरकार में किसी भी तरह की अटकलों की कोई जगह नहीं है। प्रधान मंत्री के मन में जो होता है वे उसे हर संभव कोशिश के सहारे पूरा कर ही लेते हैं। इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण अयोध्या में श्री राम मंदिर का निर्माण और उद्घाटन है। इसलिए यदि विपक्षी दल नीतीश कुमार के पाला बदलने को लेकर जो अटकलें लगा रहे हैं हो सकता है वह सही न हों। क्या पता प्रधान मंत्री जी ने नीतीश कुमार के लिए कुछ बड़ा सोच रखा हो। जिसका पता केवल अमित शाह जी को और शायद नीतीश जी को ही हो, तभी तो उन्होंने यह कदम उठाया।


रही बात अटकलों की तो एक बात जो सत्ता और मीडिया के गलियारों में घूम रही है वो यह है कि शायद प्रधान मंत्री ने नीतीश कुमार को देश का अगला उपराष्ट्रपति बनाना तय किया है। परंतु ऐसा संभव इसलिए नहीं लगता क्योंकि मौजूदा उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ जी का कार्यकाल अभी अगस्त 2022 में ही शुरू हुआ है, जो कि 2027 तक चलेगा। ऐसे में समय से पहले उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा तो उसके पीछे कोई ठोस वजह होनी चाहिए। परंतु वहीं एक खबर और है जो काफ़ी ज़ोरों से राजनैतिक गलियारों में घूम रही है, कि नीतीश कुमार 2024 में बनने वाली मोदी सरकार में लोकसभा के अध्यक्ष बनाए जाएँगे। इस पूर्वानुमान को इसलिए सही माना जा सकता है क्योंकि 2024 में बनने वाली सरकार में लोकसभा अध्यक्ष बिना किसी मौजूदा पद पर तैनात व्यक्ति का कार्यकाल कम किए हुए नियुक्त किया जाएगा। देखा जाए तो लोकसभा अध्यक्ष का पद भी राज्यसभा अध्यक्ष के पद की तरह एक संवैधानिक पद होता है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना होता है कि राज्यसभा अध्यक्ष हमेशा देश का उपराष्ट्रपति ही होता है। इसलिए नीतीश जी को यदि लोकसभा अध्यक्ष बनाना तय किया गया है तो इस बात में दम हो सकता है कि यह भी एक कारण हो सकता है नीतीश जी का पाला बदलने का। देखना यह होगा कि 2024 के चुनावों में राजनीति का ऊँठ किस करवट बैठेगा। परंतु यदि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ तो ये बात तो तय है कि नीतीश जी के जेडीयू का बिहार में आधार ही समाप्त हो जाएगा। यानी ‘न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम न इधर के हुए न उधर के हुए।’


हाल ही में संपन्न हुए पाँच राज्यों के चुनाव के बाद तमाम टीवी चर्चाओं में राजनैतिक विश्लेषक इस बात पर ख़ास ज़ोर दे रहे हैं कि विपक्षी दलों को आपस में एकजुट हो कर चुनावी मैदान में उतरना चाहिये था। जो भी क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में एक मज़बूत स्थिति में हैं उन्हें 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले जनता के बीच अभी से प्रचार करना चाहिए। इसके साथ ही उन्हें उन दलों का सहयोग भी करना चाहिए जहां दूसरे दल मज़बूत हैं। विपक्षी दल यदि एक दूसरे के वोट नहीं काटेंगे तो उनकी एकता के चक्रव्यूह को भेदना भाजपा के लिए मुश्किल होगा। ऐसा केवल तभी हो सकता है जब सभी विपक्षी दल एकजुट हो जाएँ और एक आम सहमति पर पहुँच कर चुनाव लड़ें। सफल लोकतंत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष का मज़बूत होना ज़रूरी है। विपक्ष मज़बूत तभी होगा जब एकजुट होगा।

परंतु जिस तरह विपक्षी दलों के ‘इंडिया’ गठबंधन ने शुरुआत में एक मज़बूत रूप धारण करने की कोशिश की वहीं इसके प्रमुख दलों का ‘इंडिया’ गठबंधन से अलग होना अच्छे संकेत नहीं दे रहा। चुनावों से पहले होने वाली राजनीति केवल धारणाओं का खेल है। जो भी दल ऐसी धारणा को प्रचारित करने में कामयाब हो जाता है वही जनता के दिलोदिमाग़ में अपनी छाप छोड़ कर सफल हो जाने की सोचता है। सोचना तो मतदाता को है कौनसा दल या गठबंधन उनके हित में है। ये तो आनेवाला समय ही बताएगा कि नीतीश कुमार किस कारण से वापिस एनडीए का हिस्सा बने।