किसी भी अपराध के संबंध में निर्दोषता की धारणा एक कानूनी सिद्धांत है। जिसके अनुसार किसी भी अपराध के लिए आरोपी प्रत्येक व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक कि उसे दोषी साबित न कर दिया जाए। देश की शीर्ष अदालत ने अपने कई आदेशों में यह भी स्पष्ट किया है कि ‘ज़मानत देना नियम है और जेल में रखना अपवाद।’ परंतु आये दिन यह देखने को मिलता है कि जब भी किसी आरोपी को निचली अदालत से ज़मानत दी जाती है तो सरकारी एजेंसियाँ तुरंत उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट पहुँच कर रोक लगवा लेती हैं। बीते मंगलवार सुप्रीम कोर्ट ने इस चलन पर आपत्ति जताते हुए एक अहम फ़ैसला दिया।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अभय सिंह ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने धन शोधन के मामले में आरोपी परविंदर सिंह खुराना की याचिका पर सुनवाई करते हुए देश भर के हाई कोर्टों को यह निर्देश दिया कि, “कोर्ट को स्टे लगाने का अधिकार होता है, लेकिन किसी की जमानत पर यूं ही रोक नहीं लगाई जा सकती। सिर्फ असामान्य मामलों और असाधारण परिस्थितियों में ही ऐसा करना चाहिए। हाई कोर्ट को ऐसे मामलों में सोच समझकर फैसला देना चाहिए। सामान्य तौर पर हाई कोर्ट को जमानत के आदेशों पर रोक नहीं लगानी चाहिए।”
उल्लेखनीय है कि मनी लॉड्रिंग के आरोपी परविंदर सिंह खुराना को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 2023 में गिरफ़्तार किया था। लेकिन खुराना को ट्रायल कोर्ट से जून 2023 में ही बेल मिल गई थी, जिसके खिलाफ ईडी ने हाई कोर्ट में याचिका लगाई थी। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बेल ऑर्डर पर रोक लगा दी। जिसे चुनौती देते हुए खुराना सुप्रीम कोर्ट पहुँचे। सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनकी स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि, “एक साल तक एक शख्स बिना किसी कारण के जेल में सड़ रहा है।” केस की पिछली सुनवाई पर ईडी की तरफ़ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से कहा कि खुराना को ज़मानत मिलते ही वो देश छोड़ कर जा सकता है। यदि वो देश छोड़ कर चला गया तो ज़मानत के क्या मायने? सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए यह स्पष्ट किया कि, “ज़मानत पर रोक केवल बहुत ही दुर्लभ मामलों में लगाई जा सकती है। यदि आरोपी पर देशद्रोह, आतंकवाद या एनईए जैसे संगीन मामले दर्ज हों तभी ज़मानत पर रोक लगाई जानी चाहिए।”
ग़ौरतलब है कि देश भर की जेलों में लगभग 6 लाख क़ैदी बंद हैं। इनमें से बहुत सारे क़ैदी ऐसे हैं जिनका आरोप सिद्ध भी नहीं हुआ है। ऐसे में उन्हें यदि ज़मानत मिल जाती है तो जाँच एजेंसियाँ या सरकारी पक्ष इसके विरोध में खड़ी हो जाती है। परंतु वहीं दूसरी तरफ़, जिन मामलों में सीबीआई या अन्य जाँच एजेंसियों को तत्तपर्ता दिखानी होती है वहाँ तो रातों-रात गिरफ़्तारी भी हो जाती है और कार्यवाही भी गति पकड़ती है। परंतु जहां ढील देने का मन होता है या ऊपर से ढील देने के ‘निर्देश’ होते हैं, वहाँ विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहूल चौकसी जैसे आर्थिक अपराधियों को देश छोड़ कर भाग जाने का मौक़ा भी दे दिया जाता है।
यदि जाँच एजेंसियाँ वास्तव में संगीन अपराधों को गंभीरता से लें तो उन्हें देश में लंबित पड़े सैंकड़ों मामलों में तेज़ी दिखानी चाहिए। केवल चुनिंदा मामलों में तेज़ी दिखाने से जाँच एजेंसियों पर सवाल तो उठेंगे ही। अब बनी फ्रॉड के मामलों को ही लें तो पिछली लोक सभा में एक सवाल का उत्तर देते हुए भारत सरकार के वित्त राज्य मंत्री डॉ भागवत कराड ने बताया था कि 31 मार्च 2022 को ख़त्म होने वाले वित्तीय वर्ष में ‘टॉप 50 विल्फुल लोन डिफ़ॉल्टरों’ ने बैंकों के साथ 5,40,958 करोड़ धोखाधड़ी की है। परंतु सीबीआई, ईडी व इनकम टैक्स विभाग ने इन मामलों में काफ़ी ढुलमुल रवैया अपनाया।
मिसाल के तौर पर लोक सभा में दिये गये इसी उत्तर में देश के ‘टॉप 50 विल्फुल लोन डिफ़ॉल्टरों’ की सूची में छटे नंबर पर एक नाम ‘फ्रॉस्ट इंटरनेशनल लिमिटेड’ का भी है। सूची के अनुसार इनके बैंक फ्रॉड की रक़म 3311 करोड़ है। इस कंपनी पर 14 बैंकों के एक समूह के साथ धोखाधड़ी का आरोप है। इस कंपनी के निर्देशकों में उदय देसाई, सुजय देसाई, सुनील वर्मा व अन्य हैं। ग़ौरतलब है कि बैंक ऑफ़ इंडिया और इण्डियन ओवरसीज़ बैंक ने 2020 में उदय देसाई और 13 अन्य लोगों के ख़िलाफ़ सीबीआई में धोखाधड़ी के मामलों की एफ़आईआर लिखवाई थी। इतना ही नहीं बैंकों द्वारा इस समूह के निर्देशकों के ख़िलाफ़ ‘लुक आउट नोटिस’ भी जारी करवाया गया था। परंतु इस मामले की जाँच कर रही एजेंसियाँ किन्हीं कारणों से इस गंभीर मामले में फुर्ती नहीं दिखा रही हैं। 2020 में जब इस मामले की एफ़आईआर दर्ज हुई थी तब यह मामला नीरव मोदी और मेहूल चौकसी के 13,000 करोड़ के बैंक फ्रॉड मामले के बाद दूसरा सबसे बड़ा मामला था। लेकिन इतने संगीन मामले के अपराधी आज तक खुले घूम रहे हैं। वहीं इससे कई छोटे अपराध के मामले में यदि अपराधी ज़मानत लेता है तो जाँच एजेंसियाँ इसका विरोध करने हाई कोर्ट पहुँच जाती हैं।
ऐसे में देश की शीर्ष अदालत के आदेश के बाद जाँच एजेंसियों द्वारा अपनाए गए दोहरे मापदंड का भी पर्दाफ़ाश होता है। इसलिए जाँच एजेंसियों को संगीन मामलों में फुर्ती दिखानी चाहिए न कि चुनिंदा मामलों में ज़मानत का विरोध कर सुप्रीम कोर्ट की लताड़ का सामना करना चाहिए। यदि जाँच एजेंसियाँ सभी आरोपियों को एक ही पैमाने से माँपेंगी तो जनता के बीच सही संदेश जाएगा, खुराना हो, केजरीवाल हो या देसाई बंधु हों, क़ानून की नज़र में सभी एक समान हैं।
शुक्रवार, 26 जुलाई 2024
शुक्रवार, 19 जुलाई 2024
सोशल मीडिया पर रील्स का दिखावा पड़ सकता है महँगा
सोशल मीडिया के इस युग में आजकल जिसे देखो वो अपने स्मार्ट फ़ोन पर रील्स बनाते रहते हैं। कभी-कभी तो कुछ लोग इतने जोखिम भरे रील्स बनाते हैं जो जानलेवा हो जाते हैं। क्योंकि कई बार रील्स बनाने वाले दुर्घटनाओं के शिकार हो जाते हैं। लेकिन फिर भी इसकी लत उनका पीछा नहीं छोड़ती। परंतु आज सोशल मीडिया पर रील्स व पोस्टों से होने वाले जिस नुक़सान की बात हम करेंगे वह इन सब से अलग है।
दरअसल सोशल मीडिया पर डाले जाने वाली पोस्ट और रील्स के चलते अब देश की संस्थाओं पर भी सवाल उठने लगे हैं। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि सरकारी नौकरी पर तैनात लोगों ने या नए-नए भर्ती हुए अभ्यर्थी सोशल मीडिया पर कुछ ऐसा पोस्ट करते हैं जो उन्हें नहीं करना चाहिए। ये शौक़ उन्हें बहुत महँगा पड़ जाता है।
मामला एक महिला प्रशिक्षार्थी आईएएस अधिकारी का है, जिसने नयी मिली सत्ता के नशे में कुछ ऐसा कर डाला कि संघ लोक सेवा आयोग की प्रतिष्ठा भी दाव पर लग गयी। पुणे ज़िला मुख्यालय में प्रशिक्षण के लिए नियुक्ति के दौरान अपनी अनुचित मांगों और अभद्र व्यवहार के कारण 2023 बैच की आईएएस पूजा खेडकर आजकल काफ़ी चर्चा में हैं। इन पर आरोप है कि बतौर प्रोबेशन आईएएस अधिकारी रहते हुए इन्होंने सत्ता का दुरुपयोग किया। हद तो तब हुई जब पूजा की अनुचित माँगों को प्रशासन द्वारा स्वीकारा नहीं गया तो उन्होंने अपनी निजी विदेशी लक्ज़री कार का इस्तेमाल किया और उसी पर लाल बत्ती लगवा डाली। उन पर यह भी आरोप है कि एडिश्नल कलेक्टर के छुट्टी पर रहने के दौरान खेडकर ने उनके चेंबर पर कब्जा कर लिया और अपनी नेमप्लेट तक लगा दी। इस तरह ताक़त का प्रदर्शन करने के शौक़ ने उन्हें इस हद तक गिरा दिया कि वे नियम और क़ानून की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाने लग गईं।
इतना ही नहीं जैसे ही इनकी अनुचित माँगों के क़िस्से मीडिया में आने लगे तो इनके चयन को लेकर भी सवाल उठने शुरू हो गए। उल्लेखनीय है कि, सिविल सेवा परीक्षा के दौरान पूजा खेडकर ने यह दावा किया था कि वह मानसिक रूप से दिव्यांग हैं और उन्हें देखने में भी समस्या है। इसी दावे के चलते पूजा को रियायत मिली और कम अंक पाने के बावजूद उन्हें आईएएस में चुन लिया गया। परंतु हैरानी की बात यह है कि बिना मेडिकल जांच के ही उनका प्रशासनिक सेवा में चयन कैसे हुआ? नियम के अनुसार जब भी कोई उम्मीदवार यह दावा करता है कि वह दिव्यांग है तो मेडिकल विशेषज्ञों द्वारा इसकी जाँच की जाती है।
पूजा की बात करें तो दिल्ली के एम्स अस्पताल में उनकी जाँच अप्रैल 2022 में होनी थी। परंतु पूजा ने कोरोना संक्रमित होने का हवाला दे कर जाँच में भाग नहीं लिया। एक महीने बाद जब उन्हें जाँच के लिए दुबारा एम्स बुलाया गया तब भी वे नहीं पहुँची। ग़ौरतलब है कि पाँच बार मेडिकल जाँच को चकमा देने के बाद, कुछ सप्ताह बाद उन्होंने एक निजी क्लिनिक की जाँच रिपोर्ट जमा करवाई जिसे संघ लोक सेवा आयोग ने अस्वीकार कर दिया। इस सबके बावजूद न सिर्फ़ पूजा का चयन आईएएस में हुआ बल्कि नियमों के विरुद्ध उन्हें ट्रेनिंग के लिए उनके गृह राज्य में ही भेज दिया गया। जबकि गृह राज्य में पोस्टिंग सेवाकाल के अंत में विशेष परिस्थितियों में दी जाती है। मामले के तूल पकड़ने पर पूजा को उनकी ट्रेनी पोस्ट से हटा कर वापस मसूरी के लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी भेज दिया गया है जहां पूजा को उन पर लगे आरोपों की जाँच होने तक रहना होगा।
यहाँ सवाल पूजा का नहीं है बल्कि आईएएस बनने या प्रशासनिक सेवा में चुने जाने वाले हर उस उम्मीदवार का है जिसके माता-पिता प्रभावशाली अफ़सर या बड़े नेता हैं। वरना क्या वजह है कि किसी बड़े नेता के बेटा-बेटी का सामान्य से भी कम बुद्धिमता होने के बावजूद आईएएस जैसी कठिन परीक्षा में एक बार में ही चयन हो जाता है? जबकि मेहनत और ईमानदारी से यूपीएससी की तैयारी करने वाले लाखों साधारण युवाओं का कई-कई प्रयासों के बाद भी चयन नहीं हो पाता? इन सब परतों से परदा तब उठता है जब प्रभावशाली अभिभावकों के ऐसे ‘होनहार’ बालक सोशल मीडिया पर कुछ ऐसा पोस्ट कर देते हैं जो उनके मानसिक स्तर को दर्शाता है।
आपको याद होगा कि उत्तर प्रदेश के एक आईएएस अधिकारी अभिषेक सिंह द्वारा गुजरात चुनाव में ड्यूटी के दौरान सरकारी कार के आगे खड़े होकर खिंचवाई गई फोटो सोशल मीडिया पर काफ़ी वायरल हुई थी। इसका संज्ञान लेते हुए केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने उनके आचरण को अनुचित माना और उन्हें चुनाव की ड्यूटी से हटा दिया था। परंतु अभिषेक जैसे आपको कई अधिकारी मिल जाएँगे जो कि चर्चा में बने रहने के लिए अपने पद की गरिमा का ध्यान न करके सोशल मीडिया पर ना जाने क्या-क्या डालते हैं ।
मामला पूजा खेडकर का हो या किसी प्रभावशाली माँ-बाप के बेटे-बेटी का हो, ऐसी क्या मजबूरी है कि इन ‘होनहारों’ को यूपीएससी के चयन में एक के बाद एक छूट दे दी जाती है? जबकि किसी भी साधारण उम्मीदवार के साथ किसी भी तरह की रियायत नहीं दिखाई जाती। पूजा के मामले के बाद ऐसे कई और उदाहरण भी सामने आए हैं जहां फ़र्ज़ी दस्तावेज़ों के आधार पर कई उम्मीदवारों ने सिविल सेवा में बड़ी आसानी से भर्ती पाई। इस सबसे संघ लोक सेवा आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठने लगे हैं। देखना यह होगा कि ऐसी अनियमितताओं के लिए किस-किस को दोषी पाया जाता है?
शुक्रवार, 12 जुलाई 2024
आख़िर किसके दबाव में है नागरिक उड्डयन मंत्रालय?
जब भी किसी बड़े उद्योगपति, अभिनेता, मशहूर हस्ती या राजनेता को हवाई यात्रा करनी पड़ती है तो वे अक्सर निजी चार्टर सेवा को ही चुनते हैं। निजी चार्टर सेवा महँगी तो अवश्य पड़ती है परंतु मशहूर हस्तियों को अपनी सुविधा अनुसार यात्रा करना और समय बचाना काफ़ी सुविधाजनक लगता है। इसी के चलते हमारे देश में निजी चार्टर सेवाएँ प्रदान करने वाली कंपनियों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। साधारण एयरलाइन की तरह निजी चार्टर कंपनियों को भी देश के क़ानून का पालन करते हुए ही ये सेवाएँ चलाने दी जाती हैं। नागरिक उड्डयन के सभी नियम और क़ानून का पालन सही तरह से हो, इसके लिए भारत सरकार के नागरिक उड्डयन मंत्रालय व उसकी विभिन्न एजेंसियाँ यह सुनिश्चित करते हैं कि एयरलाइन इनमें कोई कोताही न बरते। परंतु क्या ऐसा सभी के साथ हो रहा है? क्या किसी निजी चार्टर एयरलाइन के साथ कोई पक्षपात तो नहीं किया जा रहा?
ताज़ा मामला निजी चार्टर सेवा प्रदान करने वाली एक कंपनी का है जिस पर नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधिकारी कुछ विशेष मेहरबानियाँ कर रहे हैं। इन मेहरबानियों के चलते अति विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा के साथ न सिर्फ़ खिलवाड़ हो रहा है, बल्कि दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश की खुलेआम धज्जियाँ भी उड़ाई जा रही हैं। ‘ए आर एयरवेज़’ नाम की एक निजी एयर चार्टर कंपनी यह खिलवाड़ कर रही है।
उल्लेखनीय है कि किसी भी गैर अनुसूचित एयरलाइन के शीर्ष प्रबंधन को नागरिक उड्डयन आवश्यकताएँ धारा -3, श्रृंखला-सी, भाग-III के पैरा 11 का अनुपालन करना होता है, जिसके अनुसार, “गैर-अनुसूचित ऑपरेटर के परमिट के नवीनीकरण के लिए नई सुरक्षा मंजूरी की आवश्यकता होती है। कंपनी और उसके निदेशकों की व्यक्तिगत सुरक्षा मंजूरी के नवीनीकरण का अनुरोध परमिट की समाप्ति से 180 दिन पहले ‘ई-सहज पोर्टल’ के माध्यम से प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
सुरक्षा मंजूरी को प्राप्त करने के लिए, कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों व निदेशकों को उनके खिलाफ लंबित कानूनी मामलों की घोषणा करना अनिवार्य होता है। इनमें से यदि किसी भी व्यक्ति को, किसी भी मामले में, दोषी पाया गया हो, तो उसकी सुरक्षा मंजूरी को तब तक वैध नहीं किया जा सकता जब तक वह कानूनी मामलों से मुक्त नहीं हो जाता। ऐसे व्यक्ति द्वारा इन तथ्यों को छिपाने पर संबंधित अधिकारियों द्वारा उस पर मुकदमा भी चलाया जा सकता है। सिविल एविएशन रिक्वायरमेंट्स (सीएआर) के प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी कारण से एयरलाइन के उच्च अधिकारियों की सुरक्षा मंजूरी रद्द कर दी जाती है तो उस कंपनी के ‘एयर ऑपरेटर परमिट’ का भी नवीनीकरण नहीं किया जा सकता।
देश के कानून का उल्लंघन करने पर जो भी करवाई होती है वो ज़्यादातर आम नागरिकों पर ही होती है। परंतु आपके सत्ता में ऊँचे संपर्क हैं तो आप प्रायः कानूनी करवाई से बच निकलते हैं। यही किया है भारत के नामी उद्योगपति अशोक चतुवेर्दी ने। ‘ए आर एयरवेज’ के नाम से पंजीकृत इनकी निजी चार्टर एयरलाइन को ‘क्लब वन’ के नाम से भी जाना जाता है। चूँकि ये एयरलाइन देश के जाने-माने और प्रभावशाली व्यक्तियों को अपनी सेवाऐं प्रदान करती है। शायद इसलिए श्री चतुर्वेदी नियमों की धज्जियाँ उड़ा कर, गृह मंत्रालय द्वारा ‘सिक्योरिटी क्लीयरेंस’ (सुरक्षा मंजूरी) की बुनियादी आवश्यकताओं का लगातार उल्लंघन करते हुए यह एयरलाइन चला रहे हैं।
ग़ौरतलब है कि ‘ए आर एयरवेज’ को एयर ऑपरेटर परमिट 2005 में दिया गया था। जिसका समय-समय पर नवीनीकरण किया गया। इसका आख़िरी नवीनीकरण 2019 से 2024 तक किया गया। परंतु इस कंपनी के मालिक अशोक कुमार चतुर्वेदी को 2010 में एक आपराधिक मामले में सीबीआई द्वारा दोषी ठहराया गया। चतुर्वेदी को 13 दिसम्बर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश के तहत जमानत पर रिहा अवश्य किया गया, परंतु आरोप मुक्त अभी तक नहीं किया गया। इस मामले में उनकी याचिका अभी भी उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है। उल्लेखनीय है कि इसी मामले में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव श्रीमती नीरा यादव को भी जेल जाना पड़ा था।
उल्लेखनीय है कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने 30 जुलाई 2020 को ‘ए आर एयरवेज़’ को एक ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया। जिसमें बताया गया कि गृह मंत्रालय से प्राप्त इनपुट के आधार पर, नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने अपने पत्र दिनांक 26 जून 2020 के माध्यम से अशोक चतुर्वेदी की सुरक्षा मंजूरी के नवीनीकरण से इनकार कर दिया है। नोटिस में यह भी उल्लेख किया गया कि सुरक्षा मंजूरी से इनकार के मद्देनजर, अशोक चतुर्वेदी नागरिक उड्डयन आवश्यकताओं का अनुपालन में नहीं कर रहे, इसलिए उन्हें यह नोटिस जारी किया गया कि उनका एयर ऑपरेटर परमिट भी क्यों न रद्द कर दिया जाए?
अशोक चतुर्वेदी व उनकी कंपनी द्वारा संतोषजनक उत्तर न मिलने पर मंत्रालय ने दिनांक 03.09.2020 और 04.09.2020 के आदेशों के अनुसार, उन्हें सुरक्षा मंजूरी देने से इनकार करने पर उनके कर्मचारियों के हवाई अड्डे के प्रवेश परमिट भी रद्द कर दिये। इसी आधार पर चतुर्वेदी की एयरलाइन की एयर ऑपरेटर की सुरक्षा मंजूरी को भी अस्वीकार कर दिया गया। चूंकि एयर ऑपरेटर परमिट के अनुदान/नवीनीकरण के लिए सुरक्षा मंजूरी एक ज़रूरी पूर्व-आवश्यकता है, इसलिए दिनांक 7 सितंबर 2020 के आदेश के अनुसार डीजीसीए ने ‘ए आर एयरवेज’ का ‘एयर ऑपरेटर परमिट’ भी रद्द कर दिया।
इन नोटिसों को चुनौती देते हुए ‘ए आर एयरवेज़’ ने दिल्ली उच्च न्यायालय से नोटिस की करवाई पर रोक तो लगवा ली, परंतु माननीय उच्च न्यायालय के 15 फ़रवरी 2021 के आदेश अनुसार सरकार को यह स्पष्ट निर्देश दिये कि क़ानूनी सलाह के आधार पर सरकार कंपनी के खिलाफ उचित कार्यवाही के लिए स्वतंत्र है। चतुर्वेदी के रसूख और संबंधों के चलते व नागरिक उड्डयन मंत्रालय में हर स्तर पर अपने संबंधों के चलते, 2021 से आजतक उन्होंने यह सुनिश्चित कर लिया है कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को न तो चुनौती दे और ना ही अदालत के फैसले के अनुसार, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करे। बल्कि नागरिक उड्डयन के नियमों के विरुद्ध वे ‘ए आर एयरवेज़’ के एयर ऑपरेटर परमिट का एक के बाद एक अस्थाई तौर पर नवीनीकरण किए जा रहे हैं, जिसके आधिकारिक प्रमाण लेखक के पास मौजूद हैं।
यह राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करने का एक स्पष्ट और संवेदनशील मामला है। जहां कंपनी के निदेशक इस अपराध के दोषी हैं वहीं नियम पुस्तिका की अनदेखी करने पर नागरिक उड्डयन मंत्रालय, उसकी सहयोगी एजेंसियां और अन्य संबंधित मंत्रालय भी समान रूप से जिम्मेदार हैं। ये आश्चर्य की बात है कि मीडिया में इस मामले के बार-बार उठने के बावजूद मंत्रालय जाग नहीं रहा है। अब देखना यह है कि इतने बड़े मामले को कब तक दबाया जाता है?
ताज़ा मामला निजी चार्टर सेवा प्रदान करने वाली एक कंपनी का है जिस पर नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधिकारी कुछ विशेष मेहरबानियाँ कर रहे हैं। इन मेहरबानियों के चलते अति विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा के साथ न सिर्फ़ खिलवाड़ हो रहा है, बल्कि दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश की खुलेआम धज्जियाँ भी उड़ाई जा रही हैं। ‘ए आर एयरवेज़’ नाम की एक निजी एयर चार्टर कंपनी यह खिलवाड़ कर रही है।
उल्लेखनीय है कि किसी भी गैर अनुसूचित एयरलाइन के शीर्ष प्रबंधन को नागरिक उड्डयन आवश्यकताएँ धारा -3, श्रृंखला-सी, भाग-III के पैरा 11 का अनुपालन करना होता है, जिसके अनुसार, “गैर-अनुसूचित ऑपरेटर के परमिट के नवीनीकरण के लिए नई सुरक्षा मंजूरी की आवश्यकता होती है। कंपनी और उसके निदेशकों की व्यक्तिगत सुरक्षा मंजूरी के नवीनीकरण का अनुरोध परमिट की समाप्ति से 180 दिन पहले ‘ई-सहज पोर्टल’ के माध्यम से प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
सुरक्षा मंजूरी को प्राप्त करने के लिए, कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों व निदेशकों को उनके खिलाफ लंबित कानूनी मामलों की घोषणा करना अनिवार्य होता है। इनमें से यदि किसी भी व्यक्ति को, किसी भी मामले में, दोषी पाया गया हो, तो उसकी सुरक्षा मंजूरी को तब तक वैध नहीं किया जा सकता जब तक वह कानूनी मामलों से मुक्त नहीं हो जाता। ऐसे व्यक्ति द्वारा इन तथ्यों को छिपाने पर संबंधित अधिकारियों द्वारा उस पर मुकदमा भी चलाया जा सकता है। सिविल एविएशन रिक्वायरमेंट्स (सीएआर) के प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी कारण से एयरलाइन के उच्च अधिकारियों की सुरक्षा मंजूरी रद्द कर दी जाती है तो उस कंपनी के ‘एयर ऑपरेटर परमिट’ का भी नवीनीकरण नहीं किया जा सकता।
देश के कानून का उल्लंघन करने पर जो भी करवाई होती है वो ज़्यादातर आम नागरिकों पर ही होती है। परंतु आपके सत्ता में ऊँचे संपर्क हैं तो आप प्रायः कानूनी करवाई से बच निकलते हैं। यही किया है भारत के नामी उद्योगपति अशोक चतुवेर्दी ने। ‘ए आर एयरवेज’ के नाम से पंजीकृत इनकी निजी चार्टर एयरलाइन को ‘क्लब वन’ के नाम से भी जाना जाता है। चूँकि ये एयरलाइन देश के जाने-माने और प्रभावशाली व्यक्तियों को अपनी सेवाऐं प्रदान करती है। शायद इसलिए श्री चतुर्वेदी नियमों की धज्जियाँ उड़ा कर, गृह मंत्रालय द्वारा ‘सिक्योरिटी क्लीयरेंस’ (सुरक्षा मंजूरी) की बुनियादी आवश्यकताओं का लगातार उल्लंघन करते हुए यह एयरलाइन चला रहे हैं।
ग़ौरतलब है कि ‘ए आर एयरवेज’ को एयर ऑपरेटर परमिट 2005 में दिया गया था। जिसका समय-समय पर नवीनीकरण किया गया। इसका आख़िरी नवीनीकरण 2019 से 2024 तक किया गया। परंतु इस कंपनी के मालिक अशोक कुमार चतुर्वेदी को 2010 में एक आपराधिक मामले में सीबीआई द्वारा दोषी ठहराया गया। चतुर्वेदी को 13 दिसम्बर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश के तहत जमानत पर रिहा अवश्य किया गया, परंतु आरोप मुक्त अभी तक नहीं किया गया। इस मामले में उनकी याचिका अभी भी उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है। उल्लेखनीय है कि इसी मामले में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव श्रीमती नीरा यादव को भी जेल जाना पड़ा था।
उल्लेखनीय है कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने 30 जुलाई 2020 को ‘ए आर एयरवेज़’ को एक ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया। जिसमें बताया गया कि गृह मंत्रालय से प्राप्त इनपुट के आधार पर, नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने अपने पत्र दिनांक 26 जून 2020 के माध्यम से अशोक चतुर्वेदी की सुरक्षा मंजूरी के नवीनीकरण से इनकार कर दिया है। नोटिस में यह भी उल्लेख किया गया कि सुरक्षा मंजूरी से इनकार के मद्देनजर, अशोक चतुर्वेदी नागरिक उड्डयन आवश्यकताओं का अनुपालन में नहीं कर रहे, इसलिए उन्हें यह नोटिस जारी किया गया कि उनका एयर ऑपरेटर परमिट भी क्यों न रद्द कर दिया जाए?
अशोक चतुर्वेदी व उनकी कंपनी द्वारा संतोषजनक उत्तर न मिलने पर मंत्रालय ने दिनांक 03.09.2020 और 04.09.2020 के आदेशों के अनुसार, उन्हें सुरक्षा मंजूरी देने से इनकार करने पर उनके कर्मचारियों के हवाई अड्डे के प्रवेश परमिट भी रद्द कर दिये। इसी आधार पर चतुर्वेदी की एयरलाइन की एयर ऑपरेटर की सुरक्षा मंजूरी को भी अस्वीकार कर दिया गया। चूंकि एयर ऑपरेटर परमिट के अनुदान/नवीनीकरण के लिए सुरक्षा मंजूरी एक ज़रूरी पूर्व-आवश्यकता है, इसलिए दिनांक 7 सितंबर 2020 के आदेश के अनुसार डीजीसीए ने ‘ए आर एयरवेज’ का ‘एयर ऑपरेटर परमिट’ भी रद्द कर दिया।
इन नोटिसों को चुनौती देते हुए ‘ए आर एयरवेज़’ ने दिल्ली उच्च न्यायालय से नोटिस की करवाई पर रोक तो लगवा ली, परंतु माननीय उच्च न्यायालय के 15 फ़रवरी 2021 के आदेश अनुसार सरकार को यह स्पष्ट निर्देश दिये कि क़ानूनी सलाह के आधार पर सरकार कंपनी के खिलाफ उचित कार्यवाही के लिए स्वतंत्र है। चतुर्वेदी के रसूख और संबंधों के चलते व नागरिक उड्डयन मंत्रालय में हर स्तर पर अपने संबंधों के चलते, 2021 से आजतक उन्होंने यह सुनिश्चित कर लिया है कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को न तो चुनौती दे और ना ही अदालत के फैसले के अनुसार, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करे। बल्कि नागरिक उड्डयन के नियमों के विरुद्ध वे ‘ए आर एयरवेज़’ के एयर ऑपरेटर परमिट का एक के बाद एक अस्थाई तौर पर नवीनीकरण किए जा रहे हैं, जिसके आधिकारिक प्रमाण लेखक के पास मौजूद हैं।
यह राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करने का एक स्पष्ट और संवेदनशील मामला है। जहां कंपनी के निदेशक इस अपराध के दोषी हैं वहीं नियम पुस्तिका की अनदेखी करने पर नागरिक उड्डयन मंत्रालय, उसकी सहयोगी एजेंसियां और अन्य संबंधित मंत्रालय भी समान रूप से जिम्मेदार हैं। ये आश्चर्य की बात है कि मीडिया में इस मामले के बार-बार उठने के बावजूद मंत्रालय जाग नहीं रहा है। अब देखना यह है कि इतने बड़े मामले को कब तक दबाया जाता है?
शुक्रवार, 5 जुलाई 2024
विकास की योजनाओं का हो ‘सोशल ऑडिट’
आज से कई दशकों पहले देश के पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने सार्वजनिक रूप से यह बात स्वीकार की कि जनता के विकास के लिए आवंटित धनराशि का जो प्रत्येक 100 रूपया दिल्ली से जाता है, वह जमीन तक पहुँचते-पहुँचते मात्र 14 रूपये रह जाता है। 86 रूपये रास्ते में भ्रष्टाचार की बलि चढ़ जाते हैं। सारा विकास केवल कागजों पर ही होता है। परंतु बीते दशकों में प्रशासनिक भ्रष्टाचार के बावजूद नागरिकों को कुछ सुविधाएँ अवश्य मिली हैं। लेकिन बीते वर्षों में जिस तरह के विकास का जो प्रचार हुआ उसने एक बार फिर से पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी की कही बात याद दिला दी।
इंद्र देव के क़हर के कारण देश के कई भागों से काफ़ी दर्दनाक दृश्य सामने आए। हर तरफ़ से तबाही के विचलित करने वाले दृश्यों को देख मन में यही सवाल उठा की इस साल मानसून की पहली बारिश से जो हाल हुआ है क्या वो वास्तव में प्राकृतिक आपदा मानी जाए? क्या इस तबाही के पीछे इंसान का कोई हाथ नहीं? क्या भ्रष्ट सरकारी योजनाओं के चलते ऐसा नहीं हुआ? कब तक हम ऐसी तबाही को कुदरत का क़हर मानेंगे?
सरकार चाहे किसी भी दल या राज्य की क्यों न हो जनता के वोट पाने के लिए विकास के कार्यों की अनेक जनोपयोगी व क्रांतिकारी योजनाओं की घोषणाएँ की जाती हैं। ऐसी घोषणाओं को सुन कर हर कोई मानता है कि नेता जी ने एक बड़ा सपना देखा है और ये सारी योजनाएँ उसी सपने को पूरा करने की तरफ एक-एक कदम है। बीते कुछ वर्षों में घोषित की गई योजनाओं में से कुछ योजनाओं का निश्चित रूप से लाभ आम आदमी को मिला है। वहीं दूसरी ओर घोषित की गई कई योजनाएँ केवल काग़ज़ों पर ही दिखाई दी। यदि कोई प्रधान मंत्री या किसी भी राज्य के मुख्य मंत्री जनता के कल्याण हेतु अनेक दकियानूसी परंपराओं तोड़कर क्रांतिकारी योजनाएँ लाते हैं, तो यह भी जरूरी है कि समय-समय पर वे इस बात का जायजा भी लेते रहें कि उनके द्वारा घोषित कार्यक्रमों का क्रियान्वयन कितने फीसदी हो रहा है।
तीसरी बार प्रधान मंत्री बने मोदी जी हों या किसी भी राज्य के मुख्य मंत्री ही क्यों न हों, उन्हें जमीनी सच्चाई जानने के लिए गैर पारंपरिक साधनों का प्रयोग करना पड़ेगा। ऐसे में मौजूदा सरकारी ख़ुफ़िया एजेंसियाँ या सूचना तंत्र उनकी सीमित मदद ही कर पाएँगे। प्रशासनिक ढांचे का अंग होने के कारण इनकी अपनी सीमाएँ होती हैं। इसलिए देश या सूबे के मुखिया को गैर पारंपरिक ‘फीड-बैक मैकेनिज्म’ का सहारा लेना पड़ेगा, जैसा आज से हज़ारों साल पहले भारत के पहले सबसे बड़े मगध साम्राज्य के शासक सम्राट अशोक किया करते थे। जो जादूगरों और बाजीगरों के वेश में अपने विश्वासपात्र लोगों को पूरे साम्राज्य में भेजकर जमीनी हकीकत का पता लगवाते थे और उसके आधार पर अपने प्रशासनिक निर्णय लेते थे।
आज के सूचना प्रौद्योगिकी के युग में ये बहुत आसानी से किया जा सकता है। यदि मोदी जी या देश के अन्य मुख्य मंत्री ऐसा कुछ करते हैं, तो उन्हें इसका बहुत बड़ा लाभ होगा। यदि वे ऐसा करते हैं तो उन्हें उपलब्धियों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर आँकड़े प्रस्तुत करने वाली अफसरशाही और खुफिया तंत्र गुमराह नहीं कर पाएँगे। क्योंकि उनके पास समानान्तर स्रोत से सूचना पहले से ही उपलब्ध होगी। ऐसी अप्रत्याशित स्थिति से निपटने का यही तरीका है कि अफसरशाही के अलावा जमीनी लोगों से भी हकीकत जानने की गंभीर कोशिश की जाए। ये पहल प्रशासनिक मुखिया को ही करनी होगी, फिर वो चाहे देश के प्रधान मंत्री हों या किसी भी राज्य के मुख्य मंत्री।
मिसाल के तौर पर इस साल की पहली बारिश के चलते देश के कई एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, ट्रेनों, सड़कों, पुलों आदि पर हुए नुक़सान को गंभीरता से लेना चाहिए। विपक्ष चाहे जैसे भी हमले करे पर केंद्र व राज्य सरकार को इन दुर्घटनाओं से सबक़ लेते हुए संबंधित राज्य सरकारों, मंत्रालयों, विभागों और अफ़सरशाही से समय बाधित रिपोर्ट लेनी चाहिए और दोषियों के ख़िलाफ़ कड़ी से कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए। इतना ही नहीं, घोषित की गई विकास की योजनाओं का ‘सोशल ऑडिट’ भी बहुत ज़रूरी है। इसके लिए देश के मुखिया या राज्य के मुख्य मंत्रियों को अपने विश्वसनीय सेवानिवृत अधिकारियों, पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं और स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों की एक संयुक्त टीम बनानी चाहिए जो वस्तु स्थिति का मूल्यांकन करें और उन तक निष्पक्ष रिपोर्ट भेजे। यदि वे ऐसा करते हैं तो वे विपक्ष के हमले का कड़ा उत्तर दे पायेंगे।
‘सोशल ऑडिट’ करने का यह तरीका किसी भी लोकतंत्र के लिए बहुत ही फायदे का सौदा होता है। इसलिए जो भी प्रधान मंत्री या मुख्य मंत्री ईमानदार होगा, पारदर्शिता में जिसका विश्वास होगा और जो वास्तव में अपने लोगों की भलाई और तरक्की देखना चाहेगा, वो सरकारी तंत्र के दायरे के बाहर इस तरह का ‘सोशल ऑडिट’ करवाना अपनी प्राथमिकता में रखेगा। चूंकि चुनावी सभा में हर दल के नेता बार-बार ‘जवाबदेही’ व ‘पारदर्शिता’ पर जोर देते हैं, इसलिए निर्वाचित होने के बाद उन्हें यह सुझाव अवश्य ही पसंद आएगा। आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में देश के कोने-कोने से जागरूक नागरिकों द्वारा प्रधान मंत्री व राज्यों के मुख्य मंत्रियों को इस तरह का ‘सोशल ऑडिट’ करवाने के लिए आह्वान किया जाएगा। इससे देश में नई चेतना और राष्ट्रवाद का संचार होगा और बरसों से चली आ रही भ्रष्टाचार पर लगाम भी कसेगी। नेताओं द्वारा जनहित की योजनाओं की घोषणाएँ भी केवल काग़ज़ों पर नहीं बल्कि ज़मीन पर सफल होती नज़र आएँगी।
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