शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

क्या रियलिटी शो आपको भावुक करते हैं?


जब भी कभी आप टीवी पर किसी रियलिटी शो को देखते हैं तो आप उसमें दिखाए गए कुछ विषयों से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि आप भावुक हो उठते हैं। ऐसा होना स्वाभाविक है। परंतु यदि आपको पता चले कि टीवी पर दिखाए जाने वाले ऐसे कुछ रियलिटी शो पहले से ही नियोजित किए जाते हैं तो क्या आप तब भी भावुक होंगे? यह कुछ ऐसा ही है जैसा फ़िल्मों में दिखाया जाता है। सभी जानते हैं कि जैसे फ़िल्मों में चलने वाली बंदूक़ असली नहीं होती और कलाकारों के शरीर से निकालने वाला खून भी असली नहीं होता। उसी तरह फ़िल्मों को लोकप्रिय करने कि दृष्टि से उसमें ऐसी कहानी ली जाती है जो श्रोताओं को भाव-विभोर कर सके।

आजकल टीवी पर भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। रियलिटी शो और टैलेंट शो के नाम पर टीवी पर अक्सर ऐसा कुछ दिखाया जाता है जिससे कि श्रोता उसे देख कर भावुक हो उठें और इन चर्चा करने लगें। इन शो पर आने वाले दिनों में क्या होगा इसका अनुमान लगाने लगें। इतना ही नहीं एक घर में रहने वाले परिवार के सदस्य ही ऐसे रियलिटी शो के विरोधी और समर्थक गुट में बंट जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि वे उस शो को वास्तविक मान लेते हैं। जबकि वास्तविकता में ऐसा नहीं होता। जो भी लोग ऐसे शो में भाग लेते हैं वो इसकी सच्चाई जानते हैं।


आप तक ऐसे रियलिटी शो रिकॉर्ड और एडिट होने के बाद ही पहुँचते हैं। इनका सीधा प्रसारण नहीं होता। इसलिए इन्हें ‘रियलिटी शो’ कहना ठीक नहीं होगा। बिग बॉस, इण्डियन आइडल, कौन बनेगा करोड़पति, डांस इंडिया डांस जैसे अनेकों रियलिटी शो आपने देखे होंगे। ऐसे सभी शो में भाग लेने वाले प्रतियोगियों को लेकर अक्सर कुछ ऐसा दिखाया जाता है जो उनके निजी जीवन से संबंधित होता है। उसे देख करोड़ों दर्शक भावुक हो उठते हैं और उस प्रतियोगी का समर्थन करने लगते हैं। आजकल के सोशल मीडिया के युग में उस प्रतियोगी को लेकर छोटे-छोटे वीडियो भी वायरल होने लगते हैं। ऐसा होने से कार्यक्रम की लोकप्रियता बढ़ती है, जिसे टीआरपी भी कहते हैं। जैसे ही किसी रियलिटी शो की टीआरपी बढ़ने लगती है टीवी चैनल पर विज्ञापन की आय भी बढ़ने लगती है। ऐसा होने पर टीवी चैनल का उद्देश्य पूरा हो जाता है।

आजकल कुछ ऐसा ही काम कुछ न्यूज़ चैनल भी कर रहे हैं। आपको याद होगा कि जब एक राजनैतिक दल की राष्ट्रीय प्रवक्ता के बयान पर विवाद खड़ा हुआ था देश में आग सी लग गई थी। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने टीवी एंकरों को आड़े हाथों लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे टीवी चैनलों को ऐसी अराजकता फैलाने का गुनहगार माना जो अपनी टीआरपी बढ़ाने के लालच में आये दिन इसी तरह के विवाद पैदा करते रहते है। कुछ चुनिंदा चैनल जानबूझ कर ऐसे विषयों को लेते है जो विवादास्पद हों। न्यूज़ चैनल के ऐंकर या पत्रकार पर्दे पर या मौक़े पर कुछ ऐसा करते हैं जिसे देख भोली-भाली जानता विश्वास कर लेती है।

जिस किसी ने बीबीसी के टीवी समाचार सुने होगें उन्हें इस बात का खूब अनुभव होगा कि चाहें विषय कितना भी विवादास्पद क्यों न हो, कितना ही गम्भीर क्यों न हो, बीबीसी के ऐंकर या पत्रकार संतुलन नहीं खोते। हर विषय पर गहरा शोध करके आते है और ऐसे प्रवक्ताओं को बुलाते है जो विषय के जानकार होते है। हर बहस शालीनता से होती है। जिन्हें देखकर दर्शकों को उत्तेजना नहीं होती बल्कि विषय को समझने का संतोष मिलता है।

पिछले दिनों एक ‘बाबा’ विवाद में आए। विवाद का विषय ‘चमत्कार’ था। उस चमत्कार को एक समाजिक संस्था द्वारा चुनौती दी गई थी। बाबा पर आरोप है की वे उस चुनौती से बच कर भाग लिये। इस विवाद को आस्था का चोला पहना कर पहले एक धार्मिक चैनल ने और फिर कुछ चुनिंदा न्यूज़ चैनलों ने जनता के सामने परोसा। दरअसल एक राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल के एक पत्रकार को जब इस ‘चमत्कारी’ बाबा ने भरे पंडाल में कुछ अप्रिय ढंग से पुकारा तो सभी चौंक गये। बाबा ने पहले उनके चाचा का नाम लिया, फिर उनकी भतीजी का बताया और फिर उनके भाई के बारे में कुछ बताया। ऐसा होने पर वो पत्रकार महोदय जो इस ‘चमत्कार’ का सच जानने के लिये गये थे, बाबा के प्रति समर्पित हो कर जयकारे लगाने लग गए। परंतु कुछ अन्य न्यूज़ चैनलों ने इसकी पड़ताल की तो पाया कि जो-जो उस बाबा ने उस पत्रकार के प्रति कहा था वो पहले से ही सोशल मीडिया पर पहले से ही उपलब्ध था। तो फिर ‘चमत्कार’ कैसा? जैसे ही मामले ने तूल पकड़ा तो बाबा का समर्थन करने वाले कुछ अन्य न्यूज़ चैनल भी सतर्क हो गये।

वे न्यूज़ चैनल भी संतुलन बनाने की नीयत से कुछ धार्मिक व्यक्तियों, मनोवैज्ञानिकों, वैज्ञानिकों व अन्य संबंधित लोगों से चर्चा करते दिखाई दिये। मनोविज्ञान के विशेषज्ञों, शंकराचार्य व कुछ संतों ने अपना तर्क देते हुए इस ‘चमत्कार’ को नहीं स्वीकारा। तो क्या ऐसे बाबा भी टीवी पर दिखाये जाने वाले रियलिटी शो की तरह, लोकप्रियता पाने के लिए, अंधविश्वास को चमत्कार का चोला पहना कर केवल जनता की भावनाओं के साथ  खेलने के लिए ही ऐसा करते हैं? वैसे भी पुरानी कहावत है ‘पानी पीजे छान के, गुरू कीजे जान के।’ इसलिये टीवी पर आपको परोसी जा रही नक़ली भावुकता के प्रभाव से बचें और ऐसे शो को चैनल की मार्केटिंग स्किल मानकर शो की तरह ही देखें हक़ीक़त की तरह नहीं।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

नेपाल विमान हादसा: दोष किसका?


नेपाल के नागर विमानन के लिए 2023 की शुरुआत अच्छी नहीं हुई। पिछले 23 सालों में नेपाल की एयर स्पेस में 17 विमान हादसे हो चुके हैं जिनमें 300 से ज़्यादा लोगों ने जान गवाई है। ऐसे हादसों के लिए क्या केवल मौसम और पहाड़ी इलाक़ा ही ज़िम्मेदार होता? क्या विमान की आयु, पायलट का अनुभव और विमान के रखरखाव ज़िम्मेदार नहीं होते? क्या मुनाफ़े के लालच से जन्मा भ्रष्टाचार ऐसे हादसों को दोषी नहीं होता?

गत 15 जनवरी को नेपाल के पोखरा में हुए दर्दनाक विमान हादसे से दुनिया भर में सदमे का माहौल है। सोशल मीडिया पर विमान हादसे से ठीक पहले के वीडियो को देख कर हर कोई स्तब्ध है। सभी के मन में यह सवाल उठ रहा है कि कुछ देर पहले ही उसमें सवार जो यात्री उड़ान का आनन्द ले रहे थे, वे कुछ ही पल में आग की लपटों में समा गये। दुनिया भर में इस दर्दनाक हादसे के पीछे के कारणों को लेकर चर्चा चल रही है। पहले मौसम को ज़िम्मेदार बताया गया, फिर तकनीकी ख़राबी को। लेकिन असल कारण तो‘ब्लैक बॉक्स’ की जाँच से ही पता चलेगा।

पहाड़ी इलाक़ों में होने वाले विमान हादसों में प्रायः मौसम को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। लेकिन नेपाल में येती   एयरलाइंस के एटीआर विमान हादसे के समय मौसम साफ़ था। उड़ान के समय अनुकूल मौसम का मतलब होता है कि उस समय विज़िबिल्टी कैसी है। बदल हैं या नहीं, बिजली कड़क रही है या नहीं। यही कारण होते हैं जो विमान में विक्षोम या टरबुलेंस पैदा करते हैं। यदि विमान में कोई तकनीकी ख़राबी नहीं हो और पायलट अनुभवी हो तो छोटी-मोटी टरबुलेंस को आसानी से पार किया जा सकता है।


इस विमान हादसे के वीडियो को देख ऑस्ट्रेलिया के विमानन विशेषज्ञ जेऑफ़ थॉमस ने इसे तकनीकी ख़राबी और पायलट के नियंत्रण खो जाने के मिश्रण को ही कारण माना है। जिस तरह से क्रैश से ठीक पहले विमान हवा में अनियंत्रित हो रहा था, उससे ये बात साफ़ है कि विमान में कोई न कोई तकनीकी ख़राबी ज़रूर थी। असली कारण तो विमान के ब्लैक बॉक्स की विस्तृत जाँच के बाद ही सामने आएगा।

हादसे के बाद नेपाल सरकार ने आनन फ़ानन में पहाड़ी इलाक़ों में सभी उड़ानों से पहले तकनीकी जाँच अनिवार्य कर दी है। यहाँ सवाल उठता है कि क्या अब से पहले ऐसी जाँच नहीं हो रही थी? अगर नहीं तो क्यों? अगर जाँच हो रही थी तो क्या तकनीकी ख़राबी के बावजूद विमान को उड़ान भरने दिया गया? यदि ऐसा हुआ तो इसके पीछे कौन ज़िम्मेदार है? क्या इस विमान और उसमें लगे उपकरणों का समय-समय पर उचित रख-रखाव हो रहा था? क्या येती एयरलाइंस द्वारा विमान के रख-रखाव को गंभीरता से लिया जा रहा था। क्या नेपाल के नागर विमानन प्राधिकरण द्वारा विमान के रख-रखाव की जाँच हुई थी? क्या प्राधिकरण द्वारा किसी मामूली ख़राबी को अनदेखा किया गया था, जो आगे चल कर तकनीकी गड़बड़ का कारण बनी?

नेपाल सरकार इस हादसे की जाँच 5 सदस्यीय कमेटी द्वारा करवा रहा है। जाँच को पूरा करने के लिए इस कमेटी को 45 दिनों का समय दिया गया है। दुर्घटनाग्रस्त एटीआर विमान बनाने वाली कंपनी की एक टीम भी काठमांडू पहुँच चुकी है, जो इस जाँच कमेटी का सहयोग करेगी। जाँच के बाद ही सही कारणों का पता चलेगा।


पहाड़ी इलाक़ों में उड़ान भरने के लिए पायलट को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। यदि नेपाल सरकार पहाड़ी इलाक़ों में उड़ान भरने वाले पायलटों को सही प्रशिक्षण देने में असमर्थ है तो उसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मदद माँगनी चाहिए। इंटरनेशनल फाउंडेशन ऑफ़ एविएशन, एयरोस्पेस और ड्रोन के अध्यक्ष श्री सनत कौल के अनुसार, दुनिया भर में ऐसी कई संस्थाएँ हैं जो ऐसा प्रशिक्षण प्रदान करती हैं। चूँकि नेपाल में ऐसे हादसों का इतिहास रहा है इसलिए नेपाल सरकार को ऐसी संस्थाओं की मदद से इन हादसों की जाँच के सही कारणों का पता लगाना चाहिए।  

विमान दुर्घटना के कारणों में एक ऐसा कारण भी होता है जिसकी चर्चा बहुत कम होती है। ‘पायलट की थकान’ के बारे में बहुत कम बात की जाती है। नागर विमानन में ऐसे क़ानून हैं जो पायलट को एक निश्चित विश्राम की बात करते हैं। जिससे कि पायलट थकी हुई अवस्था में विमान कभी न उड़ाए। दुर्घटना का यह कारण यदि सामने आता है तो स्पष्ट है कि एयरलाइन और नागर विमानन विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों के बीच एक गुप्त समझौता है। इस समझौते के चलते विमान में यात्रा कर रहे भोले-भाले यात्री अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। फिर वो गुप्त समझौता नामी एयरलाइन के साथ हो या निजी चार्टर सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों के साथ हो। दोनों ही स्थितियों में विमान में सवार यात्री ही बलि का बकरा बनते हैं।


भारत को ही लें तो हमारे यहाँ जिस कदर हवाई यात्राओं में बढ़ोतरी हुई है, उससे मुनाफ़ा कमाने का लालच भी बढ़ा है। ऐसे में एयरलाइन कंपनियाँ और निजी चार्टर सेवा कहीं न कहीं समझौता ज़रूर करती है। नेपाल के इस हादसे से भारत के नागर विमानन मंत्रालय को भी सतर्क हो जाना चाहिए। भारत के नागर विमानन मंत्रालय और उसके अधीन नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) में व्याप्त भ्रष्टाचार के बारे में इस कॉलम में पहले भी कई बार लिखा जा चुका है। परंतु इस मंत्रालय के भ्रष्ट अधिकारी दोषी एयरलाइन या निजी चार्टर सेवा प्रदान करने वाली कंपनी को मामूली सज़ा देकर केवल औपचारिकता निभाते हैं। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सरकार की कमान संभलते ही कहा था “न खाऊँगा न खाने दूँगा”। परंतु क्या उनके इस कथन का नागर विमानन मंत्रालय में सही से पालन हो रहा है? इसकी जाँच यदि समय-समय पर होती रहे तो हमारे यहाँ नेपाल जैसे हादसों को होने से पहले टाला जा सकता है।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

उपद्रवी हवाई यात्रियों पर लगे कड़ा अंकुश


2017 में देश के नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने हंगामा करने वाले हवाई यात्रियों को नियंत्रित करने की मंशा से ‘नो फ़्लाई लिस्ट’ की शुरुआत की थी। परंतु इस सबके बावजूद हंगामा करने वाले उपद्रवी यात्रियों के नये-नये किस्से  रोज़ देखे जाते हैं।

एयर इंडिया की न्यू यॉर्क से दिल्ली आ रही फ्लाइट की बिज़नेस क्लास में एक वृद्ध महिला के साथ हुए शर्मनाक हादसे ने दुनिया भर में भारत को शर्मसार किया है। ऐसा नहीं है कि ऐसे क़िस्से केवल भारत में या भारतीयों द्वारा ही किए जाते हैं। यदि आप गूगल पर खोजेंगे तो ऐसे मामलों की एक लंबी सूची आपको मिल जाएगी। परंतु ऐसे मानसिक रोगियों के साथ सरकारें और एयरलाइंस ऐसा क्या करें जिससे इन पर अंकुश लग सके?

यदि ऐसे हादसे उड़ान भरने से पहले होते हैं तो एयरलाइन ऐसे उपद्रवी यात्री को विमान से उतार सकती है। इसके साथ ही उसे ‘नो फ़्लाई लिस्ट’ में भी डाल सकती है। परंतु यदि ऐसा बीच हवा में हो तो एयरलाइन को क्या करना चाहिए?


नागर विमान मंत्रालय को इस विषय को गंभीरता से लेते हुए इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। यदि बीच यात्रा के दौरान विमान में किसी यात्री की तबियत बिगड़ जाती है तो यदि विमान में कोई डॉक्टर मौजूद होता है तो वो मदद करने के लिए आगे बढ़ता है। उसी प्रकार से यदि कोई भी यात्री मदिरा पान करके या स्वभाववश ही उपद्रव मचाता है तो सह-यात्रियों को भी एयरलाइन क्रू की मदद के लिए आगे आना चाहिए।

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर ऐसे अनेकों मामले दिखाई दिये जहां उपद्रवी यात्री लड़ते झगड़ते दिखाई दिये। फिर वो मामला चाहे थाईलैण्ड से दिल्ली आने वाली अंतर्राष्ट्रीय फ्लाइट का हो या भारत में ही उड़ने वाली डोमेस्टिक फ्लाइट का हो। मानसिक दारिद्रता से ग्रस्त ऐसे यात्रियों ने सह यात्रियों को और एयरलाइन को काफ़ी परेशान किया।

काश सुरक्षा जाँच की तरह मानसिक जाँच की भी कोई मशीन हवाई अड्डों पर होती तो शायद ऐसे हादसों पर कुछ हद तक अंकुश लगाया जा सकता था। अफ़सोस की बात है कि ऐसी कोई भी मशीन अभी तक ईजाद नहीं हुई। ऐसी हरकत करने से पहले व्यक्ति को ख़ुद ही सोचना चाहिए कि क्या जो वो कर रहा है वो सही है?


विदेशों में हवाई यात्रा के दौरान यदि कोई ऐसा उपद्रव करता है तो, या तो सह-यात्री उसे नियंत्रित करते हैं या फ्लाइट में मौजूद मार्शल उसे हथकड़ी पहना कर अन्य यात्रियों से अलग बिठा देते हैं। हमारे देश में भी क्या ऐसा हो सकता है? जिस तरह विमान में मौजूद सह-यात्री ऐसे हादसों का वीडियो बनाने में देरी नहीं करते, उसी तरह सह-यात्रियों को ऐसे उपद्रवियों को बलपूर्वक नियंत्रित करने की पहल भी करनी चाहिए।

इन उपद्रवियों पर अंकुश लगाने के लिए नागरिक उड्डयन मंत्रालय और एयरलाइंस को मिल कर कुछ ठोस उपाय खोजने होंगे। यदि ऐसे यात्रियों पर अंकुश लगाना है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना है तो कुछ अनूठी पहल करनी होगी। सरकार को हर फ्लाइट में मार्शल की तैनाती भी करने पर विचार करना चाहिए। इसके साथ ही उस यात्री को ‘नो फ़्लाई लिस्ट’ के अलावा आर्थिक दंड देने के प्रावधान होने चाहिए। उस उपद्रवी द्वारा हर सह यात्री को एक टोकन राशि चालान के रूप में दी जाए, जिससे कि उसे ऐसा उपद्रव मचाना वास्तव में महँगा पड़े।


ऐसा नहीं है कि केवल यात्रियों द्वारा ही उपद्रव मचाया जाता है। कभी-कभी एयरलाइन का स्टाफ़ भी यात्रियों से बदसलूकी करता है। आपको पाँच वर्ष पहले का यह क़िस्सा तो याद होगा जब इंडिगो एयरलाइंस के स्टाफ ने एक यात्री को बस में चढ़ने से रोकने के लिए मारपीट की थी। एयरलाइन स्टाफ़ की इस हरकत की काफ़ी निंदा की  गई थी। ऐसे मामलों को नियंत्रित करने के लिए नागर विमानन महानिदेशालय बना है जो एयरलाइन को आदि हाथों लेता है। परंतु यहाँ भी दोहरे मापदंड अपनाए जाते हैं। इन दोहरे मापदंड के विषय में कई बार इसी कॉलम में लिखा जा चुका है। परंतु एयरलाइन स्टाफ़ के हंगामों में कोई कमी नहीं आई है। जबकि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए तमाम क़ानून मौजूद हैं।

जब नागरिक उड्डयन मंत्रालय इस दिशा में कुछ कठोर कार्यवाही करेगा तभी सुधार ज़मीन पर दिखाई देगा। चालान का डर लोगों में अधिक होता है। जैसे ही लोगों पता चलता है कि उनके किसी कृत से उन्हें दंडित किया जा सकता है, वो ख़बरदार हो जाते हैं। हवाई यात्रा में उपद्रव मचाने के लिए कठोर दंड का ऐलान जल्द से जल्द किया जाए और उन पर अमल भी सख़्ती से हो। दुनिया भर में ऐसा संदेश जाए कि हवाई यात्रा में उपद्रव मचाने से पहले ऐसे लोग कई बार सोचें कि ऐसा करना उनको कितना महँगा पड़ सकता है।  


‘नो फ़्लाई लिस्ट’ एक अच्छी पहल है। इसमें भी परिवर्तन की ज़रूरत है। जैसे ड्राइविंग लाइसेंस में एक से अधिक बार चालान होने पर उसे दर्ज किया जाता है। कई बार जुर्माना होने पर लाइसेंस रद्द किया जाने कि प्रथा होती है। उसी तरह उपद्रवी यात्री पर आजीवन बैन लगने का प्रावधान भी होना चाहिए जिसे केवल कोर्ट द्वारा ही हटाया जा सके। 

शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

कंझावला कांड और दिल्ली पुलिस


नए साल में देश की राजधानी दिल्ली में हुई दरिंदगी से पूरा देश ख़ौफ़ में है। हादसे के बाद दिल्ली पुलिस पर जाँच की अहम ज़िम्मेदारी पड़ गई है। इस मामले में सही दिशा में जाँच ही आरोपियों को सज़ा दिलवा पाएगी। यदि पुलिस की जाँच में कोई भी कोताही बरती गई तो अपराधी अदालत द्वारा छोड़े भी जा सकते हैं।

दिल्ली पुलिस के अनुसार यह हादसा केवल एक दुर्घटना का है जो कार चालकों की लापरवाही के कारण हुआ। परंतु क़ानून के जानकारों के अनुसार जिस तरह दिल्ली पुलिस इस मामले की जाँच में कोताही बरत रही है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि या तो दिल्ली पुलिस के अधिकारी मौजूदा तथ्यों की अनदेखी कर रहे हैं या उन पर किसी तरह का दबाव है। जिस  तरह इस मामले की एफ़आईआर में भारतीय दंड संहिता की धारा 304, 304ए, 279 और 120-बी, दर्ज की गई है उससे तो यह लगता है कि दिल्ली पुलिस इस मामले को गंभीरता से नहीं ले रही। देश भर से ये सवाल उठ रहे हैं कि इस मामले में धारा 302 व अन्य धाराएँ क्यों नहीं लगाई गई?

भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 304 में अंतर देखा जाए तो वो है हत्या करने का इरादा या इस बात का ज्ञान होना कि आरोपी के ऐसे कृत से पीड़ित की हत्या भी हो सकती है। धारा 304 के तहत यदि आरोपी को इस बात का ज्ञान न हो या उसके पास हत्या का कोई इरादा न हो तो उस आरोपी पर धारा 304 के तहत ही मामला दर्ज होता है। इस मामले में इस बात को नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता कि आरोपी इतने नासमझ थे कि पीड़िता को 12 किलोमीटर तक घसीटते रहे। उन्होंने यह सोचा ही नहीं कि ऐसा करने से उसकी मौत भी हो सकती है।


अब यदि इरादे की बात करें, तो जिस तरह आरोपी पीड़िता के शव का गाड़ी से अलग होते ही घटना स्थल भाग गये, इस बात की पुष्टि करता है कि उनका इरादा क्या था। यदि इरादा हत्या का नहीं था तो स्कूटर की गाड़ी से टक्कर होने के बाद वे तुरंत वहाँ से भाग सकते थे। ऐसे में शायद पीड़िता जीवित होती। आरोपियों पर केवल ‘हिट एंड रन’ का केस बनता, जिसे ‘दुर्घटना’ कहा जा सकता था। पर यहाँ ऐसा नहीं हुआ। इसलिए क़ानून के जानकारों के अनुसार इस मामले में पुलिस को धारा 302 व अन्य धाराओं को भी जोड़ लेना चाहिए।

कोर्ट में हत्या को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को इस मामले में या तो सांयोगिक साक्ष्य या कोई चश्मदीद गवाह पेश करना होगा। ग़ौरतलब है कि दीपक दहिया नाम के एक व्यक्ति ने ख़ुद को इस मामले का चश्मदीद बताते हुए पुलिस को इस मामले की सूचना दी। इसलिए इस मामले में दीपक की अहम भूमिका रहेगी। पुलिस को इस बात को सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि दीपक कोर्ट में गवाही ज़रूर दे। इस बात को भी नहीं नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता कि बचाव पक्ष दीपक जैसे चश्मदीद को गवाही न देने के लिए भी मजबूर कर सकता है। यदि दिल्ली पुलिस अपनी साख को बचा कर रखना चाहती है तो उसे अपराधियों के ख़िलाफ़ एक मज़बूत मामला बनाना होगा जो कोर्ट में टिक सके।          

पीड़िता के पोस्टमॉर्टम से पहले ही दिल्ली पुलिस के अधिकारी ने मीडिया में बयान दिया कि यह मामला ‘हत्या’ का नहीं बल्कि ‘दुर्घटना’ का है। इसके साथ ही बलात्कार से भी इनकार किया। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार, जिस तरह दिल्ली पुलिस के डीसीपी हरिंदर सिंह ने जल्दबाज़ी में इस मामले पर मीडिया से बातचीत की है वो सरकारी आचरण व अनुशासन नियमों के अनुसार दंडनीय है। ऐसे हादसों पर केवल पुलिस के अधिकृत प्रवक्ता ही मीडिया से बात कर सकते हैं। बिना पोस्टमॉर्टम के बयान देना एकतरफ़ा लगता है और मामले की जाँच को ग़लत दिशा में ले जा सकता है।  

ऐसे मामलों में सही ढंग से की गई शुरुआती जाँच ही मामले की सच्चाई उजागर करती है। यदि शुरुआती जाँच में ही कोताही बरती जाए तो सच उजागर कैसे होगा? मिसाल के तौर पर एक तथ्य यह भी सामने आया है कि स्कूटर पर पीड़िता के साथ एक अन्य लड़की भी थी। दुर्घटना होने पर उसे भी मामूली चोट आई और वो घटनास्थल से घर चली गई। ये बात गले नहीं उतरती। यदि दो लड़कियाँ एक साथ थी और गाड़ी ने उनके स्कूटर को टक्कर मारी तो वो पीड़िता को घायल अवस्था में छोड़ कर वहाँ से क्यों चली गई? यह लड़की इस हादसे की चश्मदीद है। ऐसे कई और पहलू हैं जिन पर पुलिस को गंभीरता से जाँच करनी चाहिए।

इस मामले के चश्मदीद दीपक दहिया द्वारा 20 बार पीसीआर को फ़ोन करने पर भी पुलिस द्वारा फुर्ती नहीं दिखाई गई।इसके पीछे क्या कारण था? आरोपियों की गिरफ़्तारी के बाद भी कई घंटों तक उनकी मेडिकल जाँच क्यों नहीं हुई? पाँचों आरोपी के अनुसार वे दिल्ली से सटे मूर्थल से आ रहे थे, क्या किसी भी टोल से इस बात की पुष्टि हुई है? उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह के अनुसार महिला अपराध व अन्य संगीन अपराधों की जाँच में कोताही को लेकर भारतीय दंड संहिता में धारा 166-ए को जोड़ा गया था। इस धारा के अनुसार, यदि कोई पुलिस अधिकारी या अन्य सरकारी अधिकारी किसी मामले की जाँच को ऐसे ढंग से करेगा, जिसका जाँच पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है, तो उस  अधिकारी को इस धारा के तहत कम से कम 6 महीने की सज़ा हो सकती है। क्या दिल्ली पुलिस इस दिशा में कोई कार्यवाही करेगी?  

एक ओर दिल्ली पुलिस नागरिकों की सुरक्षा के लिए समर्पित होने का दावा करती है। परंतु पुलिस कंट्रोल रूम में 20 बार फ़ोन करने के बावजूद फुर्ती नहीं दिखा पाती। क्या इस सब के पीछे दिल्ली पुलिस की पीसीआर व्यवस्था में हाल ही में हुए बदलाव, संसाधन व पुलिस बल की कमी ही कारण हैं? नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े ऐसे कई और सवाल हैं जिनका जवाब दिल्ली पुलिस और सरकार को देना होगा।