शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2023
चुनावी मौसम में ईवीएम पर फिर उठे सवाल
पाँच राज्यों में विधान सभा चुनावों की गर्मी चरम पर है। कहाँ सत्ता परिवर्तन होगा या नहीं होगा यह तो नतीजों के बाद ही पता चलेगा। बीते कुछ चुनावों में यह देखा गया है कि इलाक़े की जनता की नाराज़गी के बावजूद वहाँ के मौजूदा विधायक या सांसद ने पिछले चुनावों के मुक़ाबले काफ़ी अधिक संख्या से जीत हासिल की। ऐसे में चुनावी मशीनरी पर सवाल खड़े होना ज़ाहिर सी बात है। जो भी नेता हारता है वो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) या चुनावी मशीनरी को दोषी ठहराता है। ताज़ा मामला मध्य प्रदेश का है जहां ईवीएम के ट्रायल के दौरान गड़बड़ पाई गई। इस पर वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री दिग्विजय सिंह ने चुनाव आयोग को एक सुझाव दिया है जिससे ऐसी गड़बड़ी पर कुछ हद तक लगाम लगाई जा सकती है।
ऐसा नहीं है कि किसी एक दल के नेता ही ईवीएम की गड़बड़ी या उससे छेड़-छाड़ का आरोप लगाते आए हैं। इस बात के अनेकों उदाहरण हैं जहां हर प्रमुख दलों के नेताओं ने कई चुनावों के बाद ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप लगाया है। चुनाव आयोग की बात करें तो वो इन आरोपों का शुरू से ही खंडन कर रहा है। आयोग के अनुसार ईवीएम में गड़बड़ी की कोई गुंजाइश ही नहीं है। 1998 में दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश के विधान सभा की कुछ सीटों पर ईवीएम का इस्तेमाल हुआ था। परंतु 2004 के आम चुनावों में पहली बार हर संसदीय क्षेत्र में ईवीएम का पूरी तरह से इस्तेमाल हुआ। 2009 के चुनावी नतीजों के बाद इसमें गड़बड़ी का आरोप भाजपा द्वारा लगा। ग़ौरतलब है कि दुनिया के 31 देशों में ईवीएम का इस्तेमाल हुआ परंतु ख़ास बात यह है कि अधिकतर देशों ने इसमें गड़बड़ी कि शिकायत के बाद वापस बैलट पेपर के ज़रिये ही चुनाव किये जाने लगे।
किसी भी समस्या की शिकायत करने से उसका हल नहीं खोजा जाता। परंतु जब शिकायत के साथ समाधान का सुझाव भी दिया जाए तो उस पर गौर करना चाहिए। हाल ही में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने आगामी विधान सभा चुनावों में ईवीएम की गड़बड़ी पर आरोप लगाए और उन्हें रोकने के लिए सुझाव भी दिया। सिंह ने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश में ईवीएम के ट्रायल के दौरान इसमें गड़बड़ी पायी गई। उन्होंने चुनाव आयो को सुझाव दिया कि यदि ईवीएम से निकलने वाली VVPAT की पर्ची को मतदाता को दे दिया जाए। इन पर्चियों को अलग से रखी मतपेटी में डाल दिया जाए। मतगणना के पहले ऐसी किसी भी दस पेटियों के वोट गिन लिए जाएँ और बाद में उनका मिलान काउंटिंग यूनिट के साथ कर लिया जाए। यदि नतीजे मेल खाते हैं तो काउंटिंग यूनिट के नतीजे को घोषित कर दिया जाए। दिग्विजय सिंह के इस सुझाव पर सोशल मीडिया पर हज़ारों प्रतिक्रियाएँ आई हैं। अधिकतर लोगों ने इस सुझाव को व्यावहारिक माना है।
जब भी कभी कोई प्रतियोगिता होती है तो उसका संचालन करने वाले शक के घेरे में न आएँ इसलिए उस प्रतियोगिता के हर कृत्य को सार्वजनिक रूप से किया जाता है। आयोजक इस बात पर ख़ास ध्यान देते हैं कि उन पर पक्षपात का आरोप न लगे। इसीलिए जब भी कभी आयोजकों को कोई सुझाव दिये जाते हैं तो यदि वे उन्हें सही लगें तो उसे स्वीकार लेते हैं। ऐसे में उन पर पक्षपात का आरोप नहीं लगता। ठीक उसी तरह एक स्वस्थ लोकतंत्र में होने वाली सबसे बड़ी प्रतियोगिता चुनाव हैं। उसके आयोजक यानी चुनाव आयोग को उन सभी सुझावों को खुले दिमाग़ से और निष्पक्षता से लेना चाहिए। चुनाव आयोग एक संविधानिक संस्था है, इसे किसी भी दल या सरकार के प्रति पक्षपात होता दिखाई नहीं देना चाहिए। यदि चुनाव आयोग ऐसे सुझावों को जनहित में लेती है तो मतदाताओं के बीच भी एक सही संदेश जाएगा, कि चाहे ईवीएम पर गड़बड़ियों के आरोप लगें पर चुनाव आयोग किसी भी दल के साथ पक्षपात नहीं करता।
जहां तक इवीएम पर दिग्विजय सिंह के सुझाव की बात है, सभी राजनैतिक दलों को इस सुझाव का सम्मान करना चाहिए। इसके साथ ही हर प्रमुख राजनैतिक दल को भी ऐसे सुझाव देने चाहिए जिससे कि चुनाव आयोग को भी उन सुझावों को लागू करने में दिक़्क़त न हो। यदि ईवीएम की गुणवत्ता पर और उसकी कार्य पद्धति पर चुनाव आयोग को पूरा विश्वास है तो चुनाव आयोग को इस सुझाव पर एक सर्वेक्षण भी करा लेना चाहिए। इससे यदि मतदाता को भी कुछ सुझाव देने होंगे तो वो भी चुनाव आयोग के पास आ जाएँगे। ऐसे में निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए जाने जाने वाली संस्था भी जनता के बीच अपना पक्ष रख पाएगी। यदि चुनाव आयोग को दिग्विजय सिंह के सुझाव पर आपत्ति नहीं है तो आगामी पाँच राज्यों के चुनावों में ऐसा प्रयोग कर लेना चाहिए। ऐसा करने से दूध का दूध और पानी का पानी सामने आ जाएगा। इतना ही नहीं भारत जैसे मज़बूत लोकतंत्र को और मज़बूती भी मिलेगी।
शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2023
निठारी काण्ड: सीबीआई पर फिर उठे सवाल
जब भी कभी कोई न सुलझने वाला अपराध होता है तो मामला देश की सर्वोच्च जाँच एजेंसी, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया जाता है। इसी उम्मीद से कि यह एजेंसी देश की सबसे काबिल और श्रेष्ठ जाँच एजेंसी है। परंतु क्या सीबीआई में कार्य करने वाले अधिकारी हर अपराध की तह तक आसानी से पहुँच पाते हैं? क्या इन जाँच अधिकारियों को अपराध के सभी प्रमाण व अन्य जानकारियाँ आसानी से मिल जाती है? क्या अपराध के सीन पर सबसे पहले पहुँची स्थानीय पुलिस अपना काम पूरी तत्पर्ता से करती है और क्राइम सीन पर किसी भी तरह के सुबूत को मिटाती नहीं है? क्या दोषी को सज़ा दिलवाने के लिए पुलिस और सीबीआई एक ठोस केस बना पाते हैं जो अदालत में टिका रहे और आरोपी को सज़ा मिल जाए? अफ़सोस की बात है कि ऐसे सवालों का जवाब प्रायः हमें ‘नहीं’ में मिलता है। ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएँगे जहां अपराध के कई चर्चित मामलों सीबीआई को कोर्ट के आगे शर्मिंदा होना पड़ा और सुबूतों की कमी के कारण आरोपी आसानी से छूट गए।
पिछले दिनों इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2006 के चर्चित निठारी हत्या कांड के दोनों आरोपियों को बरी कर दिया। जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस एसएएच रिजवी की खंडपीठ ने कहा कि, “निठारी हत्याकांड की जांच करने में अभियोजन पक्ष की विफलता, जांच एजेंसियों द्वारा जनता के भरोसे के साथ विश्वासघात से कम नहीं है।” परंतु इस निर्मम हत्या कांड में जिन बच्चों ने अपनी जान गँवाई उनके माता-पिता के मन में यह सवाल उठना वाजिब है कि अगर निठारी कांड के आरोपी मनिंदर सिंह पंढेर और सुरेंद्र कोली बेक़सूर हैं तो इतनी सारी हत्याएँ किसने की? वहीं दूसरी तरफ़ यह भी सवाल उठ रहे हैं कि यदि ये दोनों आरोपी निर्दोष थे तो निचली अदालत ने इन्हें किस आधार पर फाँसी की सज़ा सुनाई? क्या निचली अदालत से कोई त्रुटि हुई या हाई कोर्ट में जाँच एजेंसियों ने सभी तथ्यों को मज़बूती से पेश नहीं किया?
ग़ौरतलब है कि 2006 के इस हत्या कांड की जाँच को सीबीआई ने 11 जनवरी 2007 को अपने हाथ में लिया था। 26 जुलाई 2007 को सीबीआई ने अदालत में चार्जशीट पेश की। इस मामले की सुनवाई सीबीआई कोर्ट में 305 दिन तक चली। सुनवाई के दौरान कुल 38 गवाह पेश किए गए। शायद निचली अदालत को इस मामले में पर्याप्त सुबूत और गवाह मिले होंगे तभी इन आरोपियों को फाँसी की सज़ा सुनाई गई। परंतु जैसा अधिकतर मामलों में होता आया है, जैसे ही यह मामला हाई कोर्ट पहुँचा, सीबीआई की जाँच संतोषजनक नहीं पाई गई। पाठकों को याद होगा कि जाँच के दौरान दोनों आरोपियों ने अपने-अपने जुर्म क़ुबूले भी थे। तमाम सबूतों के आधार पर आरोपियों को फाँसी कि सज़ा सुनाई गई थी। परंतु हाई कोर्ट ने इन सब तथ्यों को काफ़ी नहीं माना और आरोपियों की रिहाई के आदेश दे दिये।
हाई कोर्ट के फ़ैसले के विरुद्ध सीबीआई सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा कब खटखटाएगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा। परंतु यदि हाई कोर्ट ने सीबीआई की जाँच में कमियाँ पाईं हैं तो इसका मतलब स्पष्ट है कि सीबीआई जैसी श्रेष्ठ जाँच एजेंसी ने अपना काम पूरी तत्पर्ता से नहीं किया। यदि किया होता तो आज ऐसी नौबत नहीं आती। क्या सीबीआई ने जानबूझकर अपनी जाँच में कुछ ऐसी कमियाँ छोड़ी जिससे कि आरोपियों की रिहाई का रास्ता साफ़ हो सके? यदि कोई ऐसा सोचे कि क्या निचली अदालत ने जनता व मीडिया के दबाव में आरोपियों को सज़ा सुनाई, तो यह सही नहीं होगा। यदि आरोपी मनिंदर सिंह पंढेर और सुरेंद्र कोली निर्दोष थे तो उनके नोएडा स्थित मकान में इस अपराध के कई अहम सुबूत कैसे मिले? जब दोनों आरोपी अपने कुबूलिया बयान में इस निर्मम हत्या कांड को अंजाम देने की बात स्वीकार चुके हैं तो फिर निचली अदालत का फ़ैसला ग़लत कैसे हुआ? यहाँ सवाल उठता है कि क्या सीबीआई को इस जाँच में ढुलमुल रवैया अपनाने को ‘ऊपर से आदेश’ मिले थे?
मामला किसी बड़े घोटाले की जाँच का हो, निठारी, आरुषि या मधुमिता शुक्ला जैसे चर्चित हत्या कांड की जाँच का हो, इन मामलों की जाँच कर रही सीबीआई का ढीला और सुस्त रवैया ही अपराधियों को रिहा होने का मौक़ा देता है। अगर सही वक्त पर पुलिस, सीबीआई व अन्य एजेंसियों द्वारा कड़ी कार्यवाही की जाती है तो ऐसा नहीं होता। जब भी कभी ऐसे अपराधों के हर पहलू की सही जाँच होती है तो पीड़ितों के परिजनों और जनता के बीच यह संदेश जाता है कि जाँच एजेंसियाँ अपना काम स्वायत्तता और निष्पक्ष रूप से कर रहीं हैं। देश की शीर्ष जाँच एजेंसियों का सिद्धांत यह होना चाहिये कि जघन्य अपराधों के किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। फिर वो चाहे किसी भी विचारधारा या राजनैतिक पार्टी का समर्थक ही क्यों न हो। परंतु हमारे देश में ऐसा कब और कैसे होगा यह देखने वाली बात होगी।
शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2023
बैंक फ्रॉड: क्या सही रफ़्तार से हो रही जाँच?
बैंक फ्रॉड के मामलों में जाँच एजेंसियों के ढुलमुल रवैये पर सवाल उठे आए हैं। संसद में भी इन मामलों को लेकर विपक्ष द्वारा सवाल उठते रहे हैं कि देश में ऐसे कितने लोग या कंपनियाँ हैं जिन्होंने देश के बैंकों के साथ धोखाधड़ी की है? इसके साथ ही ऐसे कई मामले हैं जिन पर सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, इनकम टैक्स और अन्य वित्तीय घोटालों की जाँच एजेंसियां ढुलमुल रवैया अपना रही हैं? देश भर में ऐसे कई शातिर दिमाग़ के व्यापारी हैं जो बैंकों को हज़ारों करोड़ का चूना लगा कर देश या विदेश में खुलेआम घूम रहे हैं। जाँच एजेंसियाँ केवल चंद लोगों पर ही शिकंजा कसे हुए है। क्या जाँच एजेंसियों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं? क्या उन्हें गिने-चुने मामलों पर जाँच करने के ही आदेश हैं? क्या सालों से लंबित पड़े हज़ारों करोड़ के अन्य मामले उनकी प्राथमिकता सूची पर नहीं हैं?
गौरतलब है कि जिन मामलों में सीबीआई या अन्य जाँच एजेंसियों को तत्तपर्ता दिखानी होती है वहाँ तो रातों-रात गिरफ़्तारी भी हो जाती है और कार्यवाही भी गति पकड़ती है। परंतु जहां ढील देने का मन होता है या ऊपर से ढील देने के ‘निर्देश’ होते हैं, वहाँ विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहूल चौकसी जैसे आर्थिक अपराधियों को देश छोड़ कर भाग जाने का मौक़ा भी दे दिया जाता है।
बैंक फ्रॉड के मामलों में, बिना बैंक के अधिकारियों की साँठ-गाँठ के कोई भी बैंक को धोखा नहीं दे सकता। आरबीआई के आँकड़े बताते हैं कि देश के ‘टॉप 50 विल्फुल लोन डिफ़ॉल्टरों’ के ऋण की राशि हज़ारों करोड़ रुपये बैठती है। ये रक़म इतनी ज़्यादा कैसे हो गई? क्या बैंक के अधिकारी सो रहे थे? यदि कोई आम आदमी अपनी नई गाड़ी या नए घर के लिये बैंक से छोटा सा ऋण लेता है तो तमाम दस्तावेज़ों पर साइन कराए जाते हैं। गारंटी के तौर पर उसकी चल-अचल संपत्ति के दस्तावेज़ों को भी बैंक अपने पास गिरवी रख लेता है। परंतु देश के नामी बैंक लुटेरों के लिए सभी नियम और क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ा दी जाती हैं। ऐसा केवल इसीलिए होता है कि क़र्ज़ लेने वाला बैंक अधिकारियों को क़र्ज़ लेने की एवज़ में मोटी रिश्वत देता है। क़र्ज़ और ब्याज की राशि जब बहुत बड़ी हो जाती है और बैंक अधिकारी की नौकरी पर बन आती है तो शिकायत और जाँच का नाटक शुरू हो जाता है। परंतु इन भ्रष्ट बैंक अधिकारियों पर कोई करवाई नहीं होती।
लोक सभा के पिछले सत्र में एक सवाल का उत्तर देते हुए भारत सरकार के वित्त राज्य मंत्री डॉ भागवत कराड ने बताया कि 31 मार्च 2022 को ख़त्म होने वाले वित्तीय वर्ष में ‘टॉप 50 विल्फुल लोन डिफ़ॉल्टरों’ ने बैंकों के साथ 5,40,958 करोड़ धोखाधड़ी की है।
लोक सभा में दिये गये इसी उत्तर में देश के ‘टॉप 50 विल्फुल लोन डिफ़ॉल्टरों’ की सूची में छटे नंबर पर एक नाम फ्रॉस्ट इंटरनेशनल लिमिटेड का भी है। सूची के अनुसार इनके बैंक फ्रॉड की रक़म 3311 करोड़ है। इस कंपनी पर 14 बैंकों के एक समूह के साथ धोखाधड़ी का आरोप है। इस कंपनी के निर्देशकों में उदय देसाई, सुजय देसाई, सुनील वर्मा, अनूप कुमार, बलदेव राज वढ़ेरा और अन्य हैं। ग़ौरतलब है कि बैंक ऑफ़ इंडिया और इण्डियन ओवरसीज़ बैंक ने 2020 में उदय देसाई और 13 अन्य लोगों के ख़िलाफ़ सीबीआई में धोखाधड़ी के मामलों की एफ़आईआर लिखवाई थी। इतना ही नहीं बैंकों द्वारा इस समूह के निर्देशकों के ख़िलाफ़ ‘लुक आउट नोटिस’ भी जारी करवाया गया। परंतु इस मामले की जाँच कर रही एजेंसियाँ किन्हीं कारणों से इस गंभीर मामले पर फुर्ती नहीं दिखा रही हैं। 2020 में जब इस मामले की एफ़आईआर दर्ज हुई थी तब यह मामला नीरव मोदी और मेहूल चौकसी के 13000 करोड़ के बैंक फ्रॉड मामले के बाद दूसरा सबसे बड़ा मामला था।
बैंक की एफ़आईआर में उदय देसाई और उनके सहयोगियों पर आरोप है कि बैंक से लोन लेने के लिये इन्होंने फ़र्ज़ी दस्तावेज जमा कराए। देसाई बंधुओं के खाते में तनाव के संकेत तब दिखाई देने लगे जब निर्यात आय प्राप्त नहीं होने के कारण बैंकों के साथ साख पत्र हस्तांतरित होना शुरू हो गए। देसाई की कंपनी के खाते को अंततः बैंक कंसोर्टियम द्वारा गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) के रूप में वर्गीकृत किया गया। बैंक द्वारा कंपनी के खातों का ‘फॉरेंसिक ऑडिट’ भी करवाया गया, जिसमें यह पाया गया कि किसी भी माल का कोई वास्तविक निर्यात हुआ ही नहीं था। लोडिंग और डिस्चार्ज पोर्ट की तुलना में जहाज की आवाजाही के आँकड़े भी बेमेल थे। फॉरेंसिक जाँच में यह भी पता चला कि देसाई समूह ने अपने ही चिर-परिचित लोगों को असुरक्षित ऋण प्रदान कर धन शोधन भी किया है।
बैंक फ्रॉड जैसे बड़े घोटालों की जाँच कर रही एजेंसियों का ढीला रवैया ही ऐसे अपराधियों को देश छोड़ने का मौक़ा देते हैं। अगर सही वक्त पर एजेंसियों द्वारा कड़ी कार्यवाही की जाती है तो जनता के बीच यह संदेश जाता है कि जाँच एजेंसियाँ अपना काम स्वायत्तता और निष्पक्ष रूप से कर रहीं हैं। देश की शीर्ष जाँच एजेंसियों का सिद्धांत यह होना चाहिये कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। फिर वो चाहे किसी भी विचारधारा या राजनैतिक पार्टी का समर्थक ही क्यों न हो। ऐसा करने से अपराधियों के बीच भी ख़ौफ़ का संदेश जाएगा और लोगों का इन एजेंसियों पर विश्वास भी बढ़ेगा।
शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2023
‘हेल्थ फ़ूड’ के नाम पर हमें क्या खिलाया जा रहा है?
आधुनिक जीवन की भाग-दौड़ में हम अपने भोजन पर उतना ध्यान नहीं देते जितना हमें स्वस्थ रहने के लिए देना चाहिए। इसीलिए आए दिन हमारे शरीर में कोई-न-कोई दिक़्क़त उत्पन्न होती रहती है। रोज़मर्रा के खाने में पौष्टिक तत्वों की कमी के कारण अक्सर बीमार पड़ने पर डॉक्टर भी हमें ताज़ी और शुद्ध चीज़ें खाने की ही सलाह देते हैं। इसके साथ हमारी डाइट को ‘हेल्थ फ़ूड’ पर आधारित होने कि भी सलाह देते हैं। अपनी सेहत की चिंता करते हुए हम बाज़ार में ‘हेल्थ फ़ूड’ के नाम पर मिलने वाली वस्तुएँ ख़रीदने की होड़ में लग जाते हैं। परंतु यहाँ सवाल उठता है कि क्या ‘हेल्थ फ़ूड’ के नाम पर बिकने वाले डिब्बा बंद या सील बंद उत्पादन वास्तव में हमारे शरीर के लिए ‘हेल्थी’ हैं?
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादनों ने बाज़ार में एक ऐसा मायाजाल बिछाया है जिसके शिकंजे में हम बड़ी आसानी से फँस जाते हैं। यह कंपनियाँ अपने उत्पादनों को ‘हेल्थ फ़ूड’ का जामा ओढ़ कर उपभोक्ताओं को इसकी लत लगाने में कामयाब हो जाते हैं। आम लोग भी इनके मार्केटिंग और आकर्षक विज्ञापन के झाँसे में बहुत आसानी से आ जाते हैं। बिना यह सोचे-समझे कि क्या इन ‘हेल्थ फूड्स’ में वो सभी पौष्टिक तत्व सही मात्रा में हैं, जो हमारे शरीर के लिए ज़रूरी हैं? क्या हमें जिन तत्वों का परहेज़ करना चाहिए वो इन ‘हेल्थ फूड्स’ में हैं? क्या बाज़ार में अपने प्रतिद्वंदी से आगे निकलने की होड़ में ये कंपनियाँ जनता को ‘जंक फ़ूड’ की आदत डाल रही हैं? ऐसे उत्पादनों का सेवन करने से हमारी सेहत बेहतर होने के बजाए और ख़राब हो जाती है।
सबसे पहले बात करते हैं रोज़मर्रा के खाने में इस्तेमाल होने वाली ऐसी वस्तु की जो आमतौर पर हर घर में पाई जाती है। आज हर घर में सुबह के नाश्ते में ‘ब्राउन ब्रेड’ का चलन बढ़ गया है। विज्ञापनों के कारण इसे ‘व्हाइट ब्रेड’ का एक विकल्प कहा जाने लगा है। जैसा कि इसके नाम से ही जाना जाता है, यह ‘ब्राउन’ है यानी कि यह मैदे से नहीं बल्कि आटे से बनी है। परंतु असल में आप यदि इसका पैकेट देखें तो इसमें आपको कभी भी 100 प्रतिशत आटा नहीं मिलेगा। इसमें आपको आटे के साथ-साथ काफ़ी मात्रा में मैदा, चीनी, नामक, वैजिटेबल आयल और प्रेज़र्वेटिव भी मिलेंगे। यानि दावे से उलट यह आटा ब्रेड वास्तव में 100 प्रतिशत आटे से नहीं बनी। मैदे और चीनी के नुक़सान तो सभी को पता हैं। यह आपके शरीर में वज़न बढ़ाने का काम करते हैं। मैदा खाने से क़ब्ज़ की दिक़्क़त भी होती है। उसी तरह प्रेज़र्वेटिव खाने से शरीर में कैंसर जैसे रोग होने का ख़तरा भी बढ़ जाता है। तो फिर यह हमारे शरीर के लिए हैल्थी कैसे हुई?
आजकल आपने यह भी देखा होगा कि कई उत्पादों पर ‘फैट फ्री या लो फैट’ का ठप्पा लगा होता है। ऐसे कई बिस्किट, स्नैक्स और अन्य उत्पादन बाज़ार में हैं जो ‘फैट फ्री या लो फैट’ होने का दावा करते हैं। ‘फैट फ्री या लो फैट’ के लालच में हम इन उत्पादों के प्रति आकर्षित हो जाते हैं और इनके आदि हो जाते हैं। परंतु क्या आपको पता है कि ऐसे ज़्यादातर उत्पादों में साधारण मात्रा से कहीं अधिक मात्रा में शुगर यानी चीनी का प्रयोग किया जाता है। इसके साथ ही इनमें ‘फैट’ का विकल्प देने के लिए केमिकल द्वारा प्रोसेस की गये तत्व भी डाले जाते हैं। इन केमिकल तत्वों का हमारे शरीर पर बुरा असर पड़ता है। जहां तक हो सके हमें इन चीज़ों से बचना चाहिये।
आजकल के युवा वर्ग में एक नये पेय की माँग बढ़ती जा रही है और वो है ‘एनर्जी ड्रिंक’। आकर्षक विज्ञापन की आढ़ में युवाओं को ऐसे ‘एनर्जी ड्रिंक’ का आदि बनाया जा रहा है। कैफ़ीन होने के कारण, इन्हें पीने से हमें कुछ क्षण के लिये ताज़गी का एहसास होता है। इसमें अधिक मात्रा में चीनी के साथ-साथ अन्य कैमिकल भी होते हैं जो हमारे शरीर के लिए नुक़सानदेह होते हैं। साथ ही में इन ‘एनर्जी ड्रिंक’ में ‘हाई फ़्रक्टोज़ कॉर्न सिरप’ का प्रयोग भी होता है जो हमारे शरीर में बहुत तेज़ी के साथ फैट या चर्बी को पैदा करता है।
इसी तरह बाज़ार में आजकल ‘प्रोटीन बार व प्रोटीन शेक’ की माँग भी बढ़ने लग गई है। जैसा कि नाम से पता लग गया होगा ऐसे उत्पादन आपको प्रोटीन का विकल्प होने का दावा करते हैं। परंतु क्या आपको पता है कि यदि आप शुद्ध और पौष्टिक भोजन पाएँ तो आपको अतिरिक्त प्रोटीन की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। अधिक मात्रा में प्रोटीन लेना भी हमारी सेहत के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। अधिक प्रोटीन केवल ज़्यादा खेल-कूद करने वाले या वेट लिफ़्टिंग करने वालों को किसी विशेषज्ञ की सलाह पर ही लेना चाहिए। आम इंसान को नहीं।
आपको याद होगा कि कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन में हम मजबूरन घर का ख़ाना खा रहे थे। काफ़ी समय तक घर का बना शुद्ध और सात्विक भोजन पाने से हमारा शरीर स्वस्थ रहने लग गया था। कोरोना के डर से हम किसी भी बाज़ारू वस्तु का सेवन नहीं कर रहे थे, केवल घर का बना भोजन ही खा रहे थे। यदि किसी को बाज़ार के बने भोजन या नाश्ते की तलब उठती थी तो वो भी घर पर ही बनाया जाता था। ईश्वर से प्रार्थना है कि ऐसी महामारी दोबारा न आए। परंतु जिस तरह कोरोना ने हमें घर पर बने ख़ाना खाने को मजबूर किया, वो एक वरदान साबित हुआ। इसलिए हमें घर का बना पौष्टिक भोजन ही पाना चाहिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मायाजाल में नहीं फँसना चाहिए।
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