बैंक फ्रॉड के मामलों में जाँच एजेंसियों के ढुलमुल रवैये पर सवाल उठे आए हैं। संसद में भी इन मामलों को लेकर विपक्ष द्वारा सवाल उठते रहे हैं कि देश में ऐसे कितने लोग या कंपनियाँ हैं जिन्होंने देश के बैंकों के साथ धोखाधड़ी की है? इसके साथ ही ऐसे कई मामले हैं जिन पर सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, इनकम टैक्स और अन्य वित्तीय घोटालों की जाँच एजेंसियां ढुलमुल रवैया अपना रही हैं? देश भर में ऐसे कई शातिर दिमाग़ के व्यापारी हैं जो बैंकों को हज़ारों करोड़ का चूना लगा कर देश या विदेश में खुलेआम घूम रहे हैं। जाँच एजेंसियाँ केवल चंद लोगों पर ही शिकंजा कसे हुए है। क्या जाँच एजेंसियों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं? क्या उन्हें गिने-चुने मामलों पर जाँच करने के ही आदेश हैं? क्या सालों से लंबित पड़े हज़ारों करोड़ के अन्य मामले उनकी प्राथमिकता सूची पर नहीं हैं?
गौरतलब है कि जिन मामलों में सीबीआई या अन्य जाँच एजेंसियों को तत्तपर्ता दिखानी होती है वहाँ तो रातों-रात गिरफ़्तारी भी हो जाती है और कार्यवाही भी गति पकड़ती है। परंतु जहां ढील देने का मन होता है या ऊपर से ढील देने के ‘निर्देश’ होते हैं, वहाँ विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहूल चौकसी जैसे आर्थिक अपराधियों को देश छोड़ कर भाग जाने का मौक़ा भी दे दिया जाता है।
बैंक फ्रॉड के मामलों में, बिना बैंक के अधिकारियों की साँठ-गाँठ के कोई भी बैंक को धोखा नहीं दे सकता। आरबीआई के आँकड़े बताते हैं कि देश के ‘टॉप 50 विल्फुल लोन डिफ़ॉल्टरों’ के ऋण की राशि हज़ारों करोड़ रुपये बैठती है। ये रक़म इतनी ज़्यादा कैसे हो गई? क्या बैंक के अधिकारी सो रहे थे? यदि कोई आम आदमी अपनी नई गाड़ी या नए घर के लिये बैंक से छोटा सा ऋण लेता है तो तमाम दस्तावेज़ों पर साइन कराए जाते हैं। गारंटी के तौर पर उसकी चल-अचल संपत्ति के दस्तावेज़ों को भी बैंक अपने पास गिरवी रख लेता है। परंतु देश के नामी बैंक लुटेरों के लिए सभी नियम और क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ा दी जाती हैं। ऐसा केवल इसीलिए होता है कि क़र्ज़ लेने वाला बैंक अधिकारियों को क़र्ज़ लेने की एवज़ में मोटी रिश्वत देता है। क़र्ज़ और ब्याज की राशि जब बहुत बड़ी हो जाती है और बैंक अधिकारी की नौकरी पर बन आती है तो शिकायत और जाँच का नाटक शुरू हो जाता है। परंतु इन भ्रष्ट बैंक अधिकारियों पर कोई करवाई नहीं होती।
लोक सभा के पिछले सत्र में एक सवाल का उत्तर देते हुए भारत सरकार के वित्त राज्य मंत्री डॉ भागवत कराड ने बताया कि 31 मार्च 2022 को ख़त्म होने वाले वित्तीय वर्ष में ‘टॉप 50 विल्फुल लोन डिफ़ॉल्टरों’ ने बैंकों के साथ 5,40,958 करोड़ धोखाधड़ी की है।
लोक सभा में दिये गये इसी उत्तर में देश के ‘टॉप 50 विल्फुल लोन डिफ़ॉल्टरों’ की सूची में छटे नंबर पर एक नाम फ्रॉस्ट इंटरनेशनल लिमिटेड का भी है। सूची के अनुसार इनके बैंक फ्रॉड की रक़म 3311 करोड़ है। इस कंपनी पर 14 बैंकों के एक समूह के साथ धोखाधड़ी का आरोप है। इस कंपनी के निर्देशकों में उदय देसाई, सुजय देसाई, सुनील वर्मा, अनूप कुमार, बलदेव राज वढ़ेरा और अन्य हैं। ग़ौरतलब है कि बैंक ऑफ़ इंडिया और इण्डियन ओवरसीज़ बैंक ने 2020 में उदय देसाई और 13 अन्य लोगों के ख़िलाफ़ सीबीआई में धोखाधड़ी के मामलों की एफ़आईआर लिखवाई थी। इतना ही नहीं बैंकों द्वारा इस समूह के निर्देशकों के ख़िलाफ़ ‘लुक आउट नोटिस’ भी जारी करवाया गया। परंतु इस मामले की जाँच कर रही एजेंसियाँ किन्हीं कारणों से इस गंभीर मामले पर फुर्ती नहीं दिखा रही हैं। 2020 में जब इस मामले की एफ़आईआर दर्ज हुई थी तब यह मामला नीरव मोदी और मेहूल चौकसी के 13000 करोड़ के बैंक फ्रॉड मामले के बाद दूसरा सबसे बड़ा मामला था।
बैंक की एफ़आईआर में उदय देसाई और उनके सहयोगियों पर आरोप है कि बैंक से लोन लेने के लिये इन्होंने फ़र्ज़ी दस्तावेज जमा कराए। देसाई बंधुओं के खाते में तनाव के संकेत तब दिखाई देने लगे जब निर्यात आय प्राप्त नहीं होने के कारण बैंकों के साथ साख पत्र हस्तांतरित होना शुरू हो गए। देसाई की कंपनी के खाते को अंततः बैंक कंसोर्टियम द्वारा गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) के रूप में वर्गीकृत किया गया। बैंक द्वारा कंपनी के खातों का ‘फॉरेंसिक ऑडिट’ भी करवाया गया, जिसमें यह पाया गया कि किसी भी माल का कोई वास्तविक निर्यात हुआ ही नहीं था। लोडिंग और डिस्चार्ज पोर्ट की तुलना में जहाज की आवाजाही के आँकड़े भी बेमेल थे। फॉरेंसिक जाँच में यह भी पता चला कि देसाई समूह ने अपने ही चिर-परिचित लोगों को असुरक्षित ऋण प्रदान कर धन शोधन भी किया है।
बैंक फ्रॉड जैसे बड़े घोटालों की जाँच कर रही एजेंसियों का ढीला रवैया ही ऐसे अपराधियों को देश छोड़ने का मौक़ा देते हैं। अगर सही वक्त पर एजेंसियों द्वारा कड़ी कार्यवाही की जाती है तो जनता के बीच यह संदेश जाता है कि जाँच एजेंसियाँ अपना काम स्वायत्तता और निष्पक्ष रूप से कर रहीं हैं। देश की शीर्ष जाँच एजेंसियों का सिद्धांत यह होना चाहिये कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। फिर वो चाहे किसी भी विचारधारा या राजनैतिक पार्टी का समर्थक ही क्यों न हो। ऐसा करने से अपराधियों के बीच भी ख़ौफ़ का संदेश जाएगा और लोगों का इन एजेंसियों पर विश्वास भी बढ़ेगा।



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