शुक्रवार, 27 जून 2025

लाइलाज बीमारी डीएमडी से जूझते बच्चे

ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (डीएमडी) एक ऐसी दुर्लभ और लाइलाज जेनेटिक बीमारी है, जो मुख्य रूप से लड़कों को प्रभावित करती है। यह बीमारी मांसपेशियों को धीरे-धीरे कमजोर करती है, जिससे रोगी का चलना-फिरना, सांस लेना और अंततः जीवित रहना मुश्किल हो जाता है। भारत में हर 3500 पुरुष जन्मों में से एक बच्चा इस बीमारी का शिकार होता है। इसका इलाज इतना महंगा है कि यह सामान्य परिवारों की पहुंच से बाहर है। ऐसी ही एक मार्मिक कहानी है अमृतसर के जंडियाला गुरु निवासी हरप्रीत सिंह और उनकी पत्नी की, जो अपने 9 वर्षीय बेटे इशमीत को बचाने के लिए दिन-रात संघर्ष कर रहे हैं। इशमीत को डीएमडी है और उसके इलाज के लिए 27 करोड़ रुपये की जरूरत है, एक ऐसी राशि जो किसी सामान्य परिवार के लिए असंभव-सी प्रतीत होती है।

हरप्रीत सिंह भारतीय सेना में सैनिक हैं और उनकी पत्नी का जीवन तब तक सामान्य था, जब तक उनके इकलौते बेटे इशमीत में कुछ असामान्य लक्षण दिखाई नहीं दिए। इशमीत जब चार साल का था तब उसके माता-पिता ने देखा कि वह ठीक से चल नहीं पाता, बार-बार गिरता है और अन्य बच्चों की तरह दौड़-भाग नहीं कर पाता। शुरू में उन्होंने इसे सामान्य कमजोरी समझा, लेकिन जब लक्षण बढ़ने लगे, तो वे उसे स्थानीय डॉक्टरों के पास ले गए। कई जांचों और अस्पतालों के चक्कर काटने के बाद, दिल्ली के एम्स में डॉक्टरों ने पुष्टि की कि इशमीत डीएमडी से पीड़ित है। यह खबर सुनकर हरप्रीत और उनकी पत्नी के पैरों तले जमीन खिसक गई।


डीएमडी एक अनुवांशिक बीमारी है, जो डिस्ट्रोफिन जीन में उत्परिवर्तन के कारण होती है। यह जीन शरीर में डिस्ट्रोफिन प्रोटीन का निर्माण करता है, जो मांसपेशियों को मजबूत रखने के लिए जरूरी होता है। इस प्रोटीन की कमी से मांसपेशियां कमजोर होकर धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं। डीएमडी से पीड़ित बच्चों की औसत आयु 11 से 21 वर्ष तक होती है और ज्यादातर मरीज किशोरावस्था के अंत तक व्हीलचेयर पर निर्भर हो जाते हैं।

जब हरप्रीत को पता चला कि उनके बेटे का इलाज संभव है तो उनके चेहरे पर उम्मीद की किरण जगी। एम्स के डॉक्टरों ने बताया कि अमेरिका में एक जीन थेरेपी उपलब्ध है, जिसमें एक विशेष इंजेक्शन ज़ोल्जेंस्मा (या समकक्ष दवा) के जरिए डीएमडी का इलाज किया जा सकता है। डॉक्टरों ने आश्वासन दिया कि यह इंजेक्शन इशमीत को पूरी तरह स्वस्थ कर सकता है। लेकिन इस उम्मीद के साथ एक ऐसी सच्चाई भी सामने आई जिसने परिवार को हताश कर दिया। इस इंजेक्शन की कीमत 27 करोड़ रुपये है।

27 करोड़ रुपये की यह राशि किसी मध्यमवर्गीय परिवार के लिए कल्पनातीत है। हरप्रीत सिंह ने अपनी सारी जमा-पूंजी, जमीन, और अन्य संसाधनों को बेचने की कोशिश की, लेकिन इससे भी इस राशि का एक छोटा सा हिस्सा ही जुट पाया। भारत में डीएमडी का कोई किफायती इलाज उपलब्ध नहीं है और स्टेरॉयड जैसी दवाएं केवल लक्षणों को कुछ समय के लिए नियंत्रित कर सकती हैं, जिनके गंभीर दुष्प्रभाव भी हैं।


हरप्रीत और उनकी पत्नी ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने बेटे को बचाने के लिए क्राउड फंडिंग का सहारा लिया। सोशल मीडिया, स्थानीय समुदाय और विभिन्न संगठनों के माध्यम से उन्होंने लोगों से मदद की अपील की। श्री हरिमंदिर साहिब के बाहर खड़े होकर उन्होंने गुहार लगाई, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उनकी कहानी सुन सकें। उनकी मेहनत रंग लाई और अब तक करीब दो करोड़ रुपये जमा हो चुके हैं। लेकिन अभी भी पच्चीस करोड़ रुपये की जरूरत है और समय तेजी से बीत रहा है।

डीएमडी जैसी दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए भारत में कोई ठोस नीति या सरकारी सहायता नहीं है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2021 में दिल्ली हाईकोर्ट में बताया था कि देश में करीब पांच लाख लोग डीएमडी से पीड़ित हैं और प्रत्येक मरीज के इलाज पर सालाना पांच करोड़ रुपये का खर्च आता है। लेकिन बजट की कमी के कारण सरकार इस दिशा में कोई कदम नहीं उठा पा रही। हरप्रीत ने कई बार सरकार से मदद की गुहार लगाई, लेकिन उन्हें केवल आश्वासन ही मिले। डीएमडी के मरीजों के लिए न तो मुफ्त दवाएं उपलब्ध हैं, न ही फिजियोथेरेपी जैसी सहायक सेवाएं। ऐसे में परिवार अकेले ही इस जंग को लड़ने के लिए मजबूर हैं।

डीएमडी के बारे में भारत में जागरूकता का अभाव भी एक बड़ी समस्या है। बहुत कम लोग इस बीमारी को समझते हैं, जिसके कारण मरीजों और उनके परिवारों को सामाजिक समर्थन नहीं मिल पाता। 2023 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर डीएमडी जागरूकता के लिए एक रैली निकाली गई थी जिसमें 21 राज्यों से करीब 500 परिवार शामिल हुए। इस रैली में माता-पिता ने सरकार से सस्ती दवाओं, शोध के लिए फंड और मुफ्त इलाज की मांग की थी। हरप्रीत जैसे परिवारों का मानना है कि अगर समाज इस बीमारी को समझे और सरकार इसमें शोध को प्रोत्साहित करे, तो शायद भविष्य में इलाज किफायती हो सके।

हरप्रीत और उनकी पत्नी का संघर्ष केवल इशमीत के लिए नहीं, बल्कि उन सभी परिवारों के लिए एक मिसाल है, जो डीएमडी जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं। उनकी कहानी यह सवाल उठाती है कि क्या भारत जैसे देश में, जहां स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही चुनौतियों से भरी हैं, दुर्लभ बीमारियों के मरीजों को जीने का हक मिलेगा? क्या समाज और सरकार मिलकर इन परिवारों के लिए कोई रास्ता निकाल सकते हैं? यह न केवल हृदयविदारक है, बल्कि यह समाज और सरकार के लिए एक आंख खोलने वाली सीख भी है। 27 करोड़ रुपये का इलाज एक असंभव लक्ष्य जरूर है, लेकिन अगर समाज एकजुट हो जाए और सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाए, तो इशमीत जैसे बच्चों को नया जीवन मिल सकता है। डीएमडी से जूझ रहे बच्चों के लिए जागरूकता, शोध और किफायती इलाज की जरूरत है।


*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 20 जून 2025

क्या विमान हादसों का सच सामने आएगा?

अहमदाबाद में हुए दर्दनाक विमान हादसे के बाद हर किसी के मन में यह डर बैठ गया है कि भारत में विमान यात्रा सुरक्षित है या नहीं। विमान कंपनियों की बात करें तो वे आज भी विमान यात्रा को यात्रा का सबसे सुरक्षित साधन मानते हैं। परंतु वहीं यदि एविएशन के जानकारों की मानें तो उनकी राय अलग ही है। हादसा चाहे अहमदाबाद का हो या केदारनाथ में होने वाले एक के बाद एक हेलीकॉप्टर हादसों का हो, सवाल उठता है कि इन हादसों की जांच में क्या सत्य कभी बाहर आएगा? क्या जांच करने वाली समितियां या एजेंसियाँ हादसों के असली कारण को जनता के सामने लाएँगे? क्या ऐसे हादसों के दोषियों को सज़ा देकर एक ऐसी नज़ीर बनेगी जिससे ऐसे हादसों को टाला जा सके?


अहमदाबाद के विमान हादसे के बाद केंद्र सरकार ने एक उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया है। इस समिति में कई बड़े मंत्रालयों के उच्च अधिकारी शामिल हैं। यहाँ सवाल उठता है कि इन सभी वरिष्ठ अधिकारियों में कितने अधिकारी ऐसे हैं जिन्हें नागरिक उड्डयन का अनुभव है? ऐसे कितने अधिकारी हैं जो कि एविएशन के हर पहलू की जानकारी रखते हैं? इस इस समिति की संरचना को देखते हैं, तो स्थिति तुरंत स्पष्ट हो जाती है। केंद्रीय गृह सचिव, ये एक नौकरशाह हैं जिन्हें नागरिक उड्डयन का कोई विशेष ज्ञान नहीं। सचिव, नागरिक उड्डयन मंत्रालय ये अभी कुछ समय पहले ही मंत्रालय में नियुक्त किए गए हैं। इन्हें भी उड्डयन का कोई पूर्व अनुभव नहीं है। संयुक्त सचिव, गृह मंत्रालय, गुजरात राज्य गृह विभाग के प्रतिनिधि, राज्य आपदा प्रतिक्रिया विभाग के प्रतिनिधि, पुलिस आयुक्त, अहमदाबाद, इन सभी को भी नागरिक उड्डयन का अनुभव नहीं है। ऐसे में यह भी सवाल उठता है कि क्या ऐसे विमान हादसों की जांच के लिए भारत में कोई सक्षम एजेंसी है या नहीं?  

वहीं जिस तरह अहमदाबाद हादसे को लेकर दुनिया भर के लोगों की निगाहें इसके असल कारणों के इंतज़ार पर टिकी हुई हैं तो यह कहना ग़लत नहीं होगा कि विमान निर्माता बोइंग इस बात पर पूरा ध्यान देगी कि उसके रसूख पर कोई आंच न आए। यहाँ इस बात का उल्लेख आवश्यक होगा कि बोइंग अपने विमानों में आने वाली तकनीकी कमियों के चलते काफ़ी समय से सवालों के घेरे में पहले से ही है। तो ऐसे में हादसे के पीछे बोइंग कंपनी की कमी के अलावा अन्य कारण खोजा जाएगा। यह कारण विमान के रख-रखाव को लेकर भी हो सकता है। विमान में मिलावटी ईंधन का होना भी एक कारण हो सकता है। इसके अलावा विमान हादसे में मारे गए दोनों पायलटों पर भी गाज गिर सकती है। मानवीय गलती बता कर पायलटों पर गाज गिराना सबसे आसान लगता है क्योंकि जो व्यक्ति इस दुनिया में है ही नहीं वो अपना पक्ष कैसे रखेगा। बहरहाल इस हादसे की जांच में आगे क्या होता है ये तो आने वाला समय ही बताएगा।

विमान दुर्घटनाओं की श्रृंखला में उत्तराखण्ड में स्थित केदारनाथ धाम में एक के बाद एक दो हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएँ हुई। रुद्रप्रयाग में हेलीकॉप्टर दुर्घटना धार्मिक पर्यटन, विशेष रूप से केदारनाथ जैसे ऊंचाई वाले और भीड़भाड़ वाले तीर्थस्थलों में उपयोग होने वाले हेलीकॉप्टरों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंता को उजागर करती है। पीक सीजन के दौरान अधिक उड़ानें भरने का दबाव अक्सर सुरक्षा प्रोटोकॉल से समझौता करने की ओर ले जाता है। कई ऑपरेटर लाइसेंस प्राप्त इंजीनियरों द्वारा अनिवार्य पोस्ट-फ्लाइट निरीक्षणों के बजाय तेज़ी से उड़ानें दोहराने को प्राथमिकता देते हैं। यह खास तौर पर चिंताजनक है, क्योंकि इस क्षेत्र में कठिन भूभाग और अप्रत्याशित मौसम की स्थिति होती है। ऐसे में न सिर्फ अनुभवी इंजीनियरों द्वारा इन हेलीकॉप्टरों की जांच की जानी चाहिए बल्कि ऐसे क्षेत्र में उड़ान भरने के लिए भी अनुभवी पायलटों की नियुक्ति की जानी चाहिए। इन बुनियादी पहलुओं को कभी भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। इन ऑपरेशनों में डीजीसीए द्वारा सख्त नियामक निगरानी की कमी जोखिम को और बढ़ा देती है। कई ऑपरेटर अस्थायी अनुमतियों के साथ काम करते हैं और अक्सर जमीन पर कोई निगरानी या औचक निरीक्षण भी नहीं होने देते। रोटर ब्लेड, हाइड्रोलिक सिस्टम और इंजन की गुणवत्ता जैसे महत्वपूर्ण हिस्सों की हर उड़ान के बाद कड़ाई से जांच होनी चाहिए, न कि दिन में केवल एक बार। जब इन निरीक्षणों को छोड़ दिया जाता है या जल्दबाज़ी में किया जाता है, तो हर विमान उड़ता हुआ खतरा बन जाता है।

भारत में विमान परिचालन की गुणवत्ता और नियमों के अनुपालन की ज़िम्मेदारी डीजीसीए की होती है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ डीजीसीए ने किसी किसी ऑपरेटर को मामूली सी गलती के लिए कड़ी से कड़ी सज़ा दी है तो वहीं दूसरी और किसी अन्य ऑपरेटर को बड़ी से बड़ी गलती के चलते मामूली सी चेतावनी देकर ही छोड़ दिया है। डीजीसीए में बढ़ते भ्रष्टाचार को लेकर कई बार इसी कॉलम में पहले भी लिखा जा चुका है। लेकिन डीजीसीए नींद से जागने का नाम नहीं लेता। ऐसे में बढ़ते हुए हादसों के चलते डीजीसीए को तुरंत सख्त सुरक्षा अनुपालन लागू करना चाहिए, जिसमें निरीक्षणों का डिजिटल लॉगिंग, उड़ान संचालन की रीयल-टाइम निगरानी और गैर-अनुपालन पर उड़ान रद्द करने की सजा शामिल हो। इसके अलावा, उत्तराखंड या अन्य राज्य सरकारों को भी प्रतिदिन की उड़ानों की संख्या सीमित करनी चाहिए। तीर्थयात्रियों या साधारण यात्रियों की सुरक्षा के साथ कभी भी लाभ के लिए समझौता नहीं करना चाहिए। उम्मीद है कि केंद्र व राज्य सरकार विमान यात्राओं में होने वाली लापरवाहियों को गंभीरता से लेगी और दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा देगी।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 13 जून 2025

वायरल और प्रसिद्ध होने के लिए कुछ भी!

आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने लोगों को अपनी बात दुनिया तक पहुंचाने का एक शक्तिशाली मंच प्रदान किया है। यह मंच जहां एक ओर रचनात्मकता, ज्ञान और सकारात्मक संदेशों को फैलाने का अवसर देता है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इस मंच का दुरुपयोग भी कर रहे हैं। एक चिंताजनक प्रवृत्ति जो हाल के वर्षों में उभरी है, वह है सार्वजनिक स्थानों पर अश्लीलता के जरिए वायरल होने और प्रसिद्धि हासिल करने की कोशिश। यह न केवल सामाजिक मूल्यों को ठेस पहुंचाता है, बल्कि समाज में नैतिकता और संस्कृति के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करता है।

सोशल मीडिया पर वायरल होने की होड़ ने कई लोगों को गलत रास्ते पर धकेल दिया है। कुछ लोग त्वरित प्रसिद्धि के लिए सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील व्यवहार, अभद्र भाषा, अनुचित कपड़े या आपत्तिजनक हरकतें करते हैं और इसे रिकॉर्ड करके ऑनलाइन डाल देते हैं। उदाहरण के तौर पर, कुछ युवा सार्वजनिक स्थानों जैसे मेट्रो, बस, पार्क या बाजारों में अश्लील नृत्य, अशोभनीय टिप्पणियां या विवादास्पद कृत्य करते हैं, ताकि लोग उनकी वीडियो देखें, शेयर करें और वे रातोंरात प्रसिद्ध हो जाएं।


इस तरह की सामग्री को अक्सर ‘क्लिकबेट’ के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि यह लोगों का ध्यान तुरंत खींचती है। लेकिन यह प्रवृत्ति समाज के लिए हानिकारक है, क्योंकि यह न केवल नैतिकता को कमजोर करती है, बल्कि युवा पीढ़ी को भी गलत संदेश देती है। यह सवाल उठता है कि क्या प्रसिद्धि के लिए नैतिकता और सामाजिक मर्यादाओं को ताक पर रखना उचित है?

आज के समय में, सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स और व्यूज को सफलता का पैमाना माना जाता है। लोग मानते हैं कि वायरल होने से उन्हें प्रसिद्धि, पैसा और अवसर मिलेंगे। इस लालच में वे अश्लीलता का सहारा भी ले लेते हैं, क्योंकि यह तेजी से ध्यान आकर्षित करता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम विवादास्पद और सनसनीखेज सामग्री को अधिक प्रचारित करते हैं। अश्लील वीडियो या पोस्ट को ज्यादा लाइक्स, शेयर और कमेंट्स मिलते हैं, जिससे वे ट्रेंडिंग लिस्ट में आ जाते हैं। यह क्रिएटर्स को ऐसी सामग्री बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। आधुनिक समाज में कुछ हद तक नैतिकता और सामाजिक मूल्यों में कमी आई है। लोग व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर अनुचित व्यवहार को सही ठहराने लगे हैं। सोशल मीडिया पर लाखों कंटेंट क्रिएटर्स हैं और उनमें से अलग दिखने के लिए कुछ लोग गलत रास्ते चुन लेते हैं। अश्लीलता एक आसान और तेज तरीका लगता है।


सार्वजनिक अश्लीलता के जरिए वायरल होने की प्रवृत्ति समाज पर कई नकारात्मक प्रभाव डाल रही है। जब लोग सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील व्यवहार करते हैं, तो यह समाज की नैतिकता और मर्यादाओं को कमजोर करता है। खासकर बच्चे और युवा जो सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, वे ऐसी सामग्री से प्रभावित हो सकते हैं और इसे सामान्य मानने लगते हैं। अश्लील व्यवहार सार्वजनिक स्थानों पर मौजूद अन्य लोगों के लिए असुविधा और असहजता का कारण बनता है। इससे सामाजिक तनाव और विवाद पैदा हो सकते हैं। कई बार अश्लील वीडियो में महिलाओं या बच्चों को अनुचित तरीके से दिखाया जाता है, जिससे उनकी गरिमा और सुरक्षा को खतरा होता है। भारत जैसे देश में, जहां संस्कृति और परंपराओं का विशेष महत्व है, ऐसी गतिविधियां सांस्कृतिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाती हैं। यह सामाजिक एकता और सम्मान को कमजोर करता है।


भारत में सार्वजनिक अश्लीलता को रोकने के लिए कई कानून मौजूद हैं। भारतीय न्याय संहिता के तहत, सार्वजनिक स्थान पर अश्लील कृत्य या शब्दों का उपयोग दंडनीय अपराध है। इसके अलावा, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत भी ऑनलाइन अश्लील सामग्री को फैलाना भी गैरकानूनी है। फिर भी, इन कानूनों का सख्ती से पालन नहीं हो पाता, क्योंकि सोशल मीडिया पर सामग्री की मात्रा इतनी अधिक है कि हर पोस्ट की निगरानी करना मुश्किल है।

इस समस्या से निपटने के लिए समाज, सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को मिलकर काम करना होगा। सार्वजनिक अश्लीलता और ऑनलाइन अश्लील सामग्री के खिलाफ कानूनों का सख्ती से पालन करना जरूरी है। दोषियों को उचित सजा मिलनी चाहिए, ताकि दूसरों के लिए नज़ीर बने। सोशल मीडिया कंपनियों को अपने एल्गोरिदम में बदलाव करना चाहिए, ताकि अश्लील और विवादास्पद सामग्री को बढ़ावा न मिले। ऐसी सामग्री को तुरंत हटाने और क्रिएटर्स के अकाउंट पर प्रतिबंध लगाने की नीति लागू करनी चाहिए। समाज में नैतिकता और सामाजिक मर्यादाओं के महत्व को समझाने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में युवाओं को सोशल मीडिया के सही उपयोग के बारे में शिक्षित करना जरूरी है। वहीं माता-पिता को अपने बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर नजर रखनी चाहिए और उन्हें सही-गलत का अंतर समझाना चाहिए। सोशल मीडिया पर सकारात्मक, रचनात्मक और प्रेरणादायक सामग्री को बढ़ावा देना चाहिए। सरकार और गैर-सरकारी संगठन ऐसी पहल शुरू कर सकते हैं, जो युवाओं को सही दिशा में प्रेरित करें।

सार्वजनिक अश्लीलता के जरिए वायरल होने और प्रसिद्धि हासिल करने की प्रवृत्ति एक गंभीर सामाजिक समस्या है, जो न केवल व्यक्तिगत नैतिकता को प्रभावित करती है, बल्कि समाज और संस्कृति पर भी गहरा असर डालती है। यह समय की मांग है कि हम इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए सामूहिक प्रयास करें। कानूनी कार्रवाई, जागरूकता और सकारात्मक सामग्री को बढ़ावा देकर हम एक स्वस्थ और नैतिक समाज का निर्माण कर सकते हैं। प्रसिद्धि का असली मोल तब है, जब वह मेहनत, रचनात्मकता और नैतिकता के आधार पर हासिल की जाए, न कि सस्ते और अनुचित तरीकों से।


*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 6 जून 2025

भारत की विशाल जनसंख्या कैसे बने वरदान?

1.4 अरब से अधिक आबादी वाले देश भारत को दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश माना जाता है। यह जनसंख्या, विशेष रूप से इसकी युवा शक्ति, देश के लिए एक अभूतपूर्व अवसर प्रस्तुत करती है, जिसे जनसांख्यिकीय लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) के रूप में जाना जाता है। लेकिन यह लाभांश तभी प्राप्त किया जा सकता है जब इसे सही नीतियों, शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार सृजन के माध्यम से उपयोग किया जाए। यदि इसका प्रबंधन ठीक नहीं किया गया, तो यह विशाल जनसंख्या अभिशाप बन सकती है। जिससे बेरोजगारी, गरीबी और सामाजिक अस्थिरता बढ़ सकती है।


जनसांख्यिकीय लाभांश उस आर्थिक विकास की संभावना को दर्शाता है जो तब उत्पन्न होती है जब किसी देश की कार्यशील आयु (15-64 वर्ष) की जनसंख्या, गैर-कार्यशील आयु (14 वर्ष से कम और 65 वर्ष से अधिक) की जनसंख्या से अधिक होती है। भारत में, 2020 तक औसत आयु केवल 28 वर्ष थी, जो इसे विश्व के सबसे युवा देशों में से एक बनाती है। इसके विपरीत, चीन और विकसित देशों जैसे जापान, अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में औसत आयु क्रमशः 37, 45 और 49 वर्ष है। भारत की यह युवा शक्ति अगले कुछ दशकों तक देश की आर्थिक प्रगति को बढ़ावा दे सकती है, बशर्ते इसे सही दिशा में उपयोग किया जाए।

चीन ने 1980 और 1990 के दशक में अपने जनसांख्यिकीय लाभांश को प्रभावी ढंग से उपयोग करके आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर कदम रखा। 1981 में, चीन ने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए एक बच्चा नीति लागू की। इससे जनसंख्या वृद्धि की दर कम हुई और कार्यशील आयु की जनसंख्या का अनुपात बढ़ा। हालांकि, इस नीति के दीर्घकालिक प्रभाव, जैसे कि वृद्ध जनसंख्या और लैंगिक असंतुलन, अब चुनौतियाँ बन गए हैं। चीन ने अपनी युवा जनसंख्या को शिक्षित और कुशल बनाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया। आज, चीन की साक्षरता दर 97% है, जबकि भारत की 75% है। तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा पर ध्यान देने से चीन ने अपने कार्यबल को वैश्विक मांगों के लिए तैयार किया। चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को कृषि से औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित किया। बड़े पैमाने पर विनिर्माण इकाइयों की स्थापना और शहरीकरण ने लाखों लोगों को रोजगार प्रदान किया। यह भारत के लिए एक सबक है, जहां विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार वास्तव में घट रहा है। चीन ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी स्थिति को मजबूत किया और सस्ते श्रम के साथ उच्च उत्पादन क्षमता का लाभ उठाया। इससे न केवल आर्थिक विकास हुआ, बल्कि वैश्विक बाजारों में चीन की हिस्सेदारी भी बढ़ी। चीन ने सड़कों, रेलवे, बंदरगाहों और अन्य बुनियादी ढांचे में भारी निवेश किया, जिसने औद्योगिक विकास को समर्थन दिया और विदेशी निवेश को आकर्षित किया। भारत की तुलना में, जहां बुनियादी ढांचा अभी भी अपर्याप्त है, चीन का दृष्टिकोण अधिक प्रभावी रहा।


भारत की विशाल और युवा जनसंख्या कई चुनौतियों का सामना कर रही है, जो इसे अभिशाप बनने की ओर ले जा सकती हैं। हर साल लगभग 12 मिलियन युवा भारतीय कार्यबल में शामिल होते हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था केवल 7 मिलियन नौकरियां पैदा कर पाती है। इससे बेरोजगारी और अल्परोजगार की समस्या बढ़ रही है। उदाहरण के लिए, मुंबई में हाल ही में 8,000 पुलिस पदों के लिए 650,000 आवेदन आए, जो नौकरी की कमी को दर्शाता है। भारत में 95% इंजीनियरिंग स्नातक सॉफ्टवेयर विकास जैसे ज्ञान-आधारित रोजगार के लिए अनुपयुक्त हैं। इसके अलावा, तीन-चौथाई से अधिक स्नातकों को बुनियादी अंग्रेजी बोलने में कठिनाई होती है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक बड़ी बाधा है। भारत सरकार शिक्षा पर अपने जीडीपी का केवल 3% और स्वास्थ्य पर 1.2% खर्च करती है, जो चीन (5.5%) और ब्राजील (9%) जैसे देशों से काफी कम है। इससे मानव पूंजी का विकास बाधित होता है। भारत में जनसांख्यिकीय लाभांश विभिन्न राज्यों में अलग-अलग समय पर उपलब्ध है। केरल की जनसंख्या पहले से ही वृद्ध हो रही है, जबकि बिहार में कार्यशील आयु की जनसंख्या 2051 तक बढ़ती रहेगी।


भारत को प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में निवेश बढ़ाना चाहिए। राष्ट्रीय कौशल विकास निगम जैसी पहल को और मजबूत करना होगा। उद्योग-अकादमिक सहयोग से आधुनिक नौकरियों की मांग के अनुरूप शिक्षा प्रदान की जा सकती है। भारत को विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देना होगा, जैसा कि चीन और पूर्वी एशियाई देशों ने किया। श्रम-गहन विनिर्माण को बढ़ावा देने से बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित होंगे। इसके लिए नीतिगत सुधार और व्यापार करने में आसानी पर ध्यान देना होगा। भारत में महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर हाल के वर्षों में घटी है। लचीली नीतियां, जैसे कि ऑनलाइन प्रशिक्षण और घर से काम करने की सुविधा, महिलाओं को कार्यबल में शामिल करने में मदद कर सकती हैं। समान वेतन और कार्यस्थल पर सुरक्षा सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है। भारत को सड़कों, रेलवे, और डिजिटल बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाना होगा। इससे न केवल रोजगार सृजन होगा, बल्कि विदेशी निवेश भी आकर्षित होगा।


बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उत्पादक कार्यबल को सुनिश्चित करती हैं। भारत को सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाना होगा और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों की पहुंच में सुधार करना होगा। हालांकि भारत में प्रजनन दर घट रही है, फिर भी परिवार नियोजन सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने की जरूरत है। शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से अवांछित प्रजनन को कम किया जा सकता है। यदि भारत इन क्षेत्रों में सही नीतियां लागू करता है, तो उसकी जनसंख्या निश्चित रूप से एक वरदान बनेगी, न कि अभिशाप। भारत की विशाल और युवा जनसंख्या एक ऐसी संपत्ति है जो इसे वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बना सकती है। समय की माँग है कि भारत अपनी जनसांख्यिकीय शक्ति को पहचाने और इसे आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए उपयोग करे।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।