शुक्रवार, 26 सितंबर 2025

एआई : अवसरों और चुनौतियों का नया युग

आज का युग तकनीकी नवाचारों का युग है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) इस परिवर्तन का केंद्र बिंदु बन चुकी है। एआई ने विभिन्न उद्योगों में अभूतपूर्व बदलाव लाए हैं जिससे दक्षता, नवाचार और विकास की नई संभावनाएं सामने आई हैं। स्वास्थ्य सेवा से लेकर वित्त, शिक्षा, परिवहन और मनोरंजन तक, एआई ने हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ी है। लेकिन इस तकनीकी क्रांति के साथ एक गंभीर चुनौती भी उभर कर सामने आई है, रोजगार का नुकसान। जैसे-जैसे मशीनें और एल्गोरिदम मानव द्वारा किए जाने वाले कार्यों को अपने कब्जे में ले रहे हैं, लाखों कर्मचारी खुद को बेरोजगार और नई आर्थिक परिस्थितियों में अनुकूलन के लिए संघर्ष करते हुए पा रहे हैं। फिर भी, यह चुनौती एक अनूठा अवसर भी प्रदान करती है। हमें अपने कार्य और रोजगार के दृष्टिकोण को पुनर्विचार करने का मौका देती है।


एआई ने उद्योगों को पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी और सटीकता के साथ कार्य करने में सक्षम बनाया है। उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य सेवा में, एआई-संचालित उपकरण रोगों का शीघ्र निदान कर रहे हैं और व्यक्तिगत उपचार योजनाएं बना रहे हैं। विनिर्माण क्षेत्र में, स्वचालित मशीनें और रोबोट उत्पादन प्रक्रियाओं को तेज और लागत प्रभावी बना रहे हैं। वित्तीय क्षेत्र में, एआई धोखाधड़ी का पता लगाने और निवेश रणनीतियों को अनुकूलित करने में मदद कर रहा है। यहां तक कि रचनात्मक क्षेत्रों जैसे लेखन, कला और संगीत में भी, एआई नए रास्ते खोल रहा है। ये प्रगतियां न केवल उत्पादकता बढ़ा रही हैं, बल्कि उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाएं और अनुभव भी प्रदान कर रही हैं।

हालांकि, इन फायदों के साथ एक कड़वी सच्चाई भी जुड़ी है। एआई और स्वचालन ने कई पारंपरिक नौकरियों को अप्रचलित कर दिया है। डेटा प्रविष्टि, विनिर्माण, ग्राहक सेवा और यहां तक कि कुछ विश्लेषणात्मक कार्य अब मशीनों द्वारा किए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार, अगले कुछ दशकों में विश्व स्तर पर लाखों नौकरियां स्वचालन के कारण खत्म हो सकती हैं। भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी कार्यबल में शामिल है, यह चुनौती और भी गंभीर है। विशेष रूप से, निम्न-कौशल और मध्यम-कौशल वाली नौकरियां सबसे अधिक जोखिम में हैं। ड्राइवर, फैक्ट्री वर्कर और कॉल सेंटर कर्मचारी जैसे पेशे अब तेजी से मशीनों द्वारा प्रतिस्थापित किए जा रहे हैं।


एआई के कारण होने वाला रोजगार नुकसान केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती भी है। बेरोजगारी न केवल व्यक्तियों की आय को प्रभावित करती है, बल्कि उनके आत्मसम्मान और सामाजिक स्थिति को भी ठेस पहुंचाती है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां पहले से ही बेरोजगारी और अंडरएंप्लॉयमेंट की समस्या है, एआई-प्रेरित नौकरी हानि स्थिति को और जटिल बना सकती है। इसके अलावा, नई तकनीकों को अपनाने की गति और कौशल की कमी के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। कई श्रमिकों के पास नई तकनीकों को सीखने के लिए आवश्यक संसाधन या अवसर नहीं हैं, जिसके परिणामस्वरूप वे आर्थिक मुख्यधारा से बाहर हो रहे हैं।

इस संकट का सामना करने के लिए, पुनः कौशल विकास और कौशल उन्नयन सबसे प्रभावी समाधान के रूप में उभर कर सामने आए हैं। पुनः कौशल विकास का अर्थ है श्रमिकों को पूरी तरह से नए कौशल सिखाना, जो उन्हें बदलते नौकरी बाजार में प्रासंगिक बनाए रखे। दूसरी ओर, कौशल उन्नयन मौजूदा कौशलों को और उन्नत करने पर केंद्रित है ताकि श्रमिक अपनी वर्तमान भूमिकाओं में अधिक प्रभावी हो सकें। उदाहरण के लिए, एक फैक्ट्री कर्मचारी को रोबोटिक्स या डेटा विश्लेषण में प्रशिक्षित किया जा सकता है, जबकि एक ग्राहक सेवा प्रतिनिधि को एआई-संचालित चैटबॉट्स के प्रबंधन में प्रशिक्षण दिया जा सकता है।

इसके लिए सरकार, शैक्षणिक संस्थान और निजी क्षेत्र को एकजुट होकर काम करना होगा। सरकार को नीतियां बनानी होंगी जो प्रशिक्षण कार्यक्रमों को सुलभ और सस्ता बनाएं। भारत में, 'स्किल इंडिया' जैसे कार्यक्रम पहले से ही इस दिशा में काम कर रहे हैं, लेकिन इनकी पहुंच और प्रभाव को और बढ़ाने की आवश्यकता है। विशेष रूप से, ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए, जहां अधिकांश निम्न-कौशल श्रमिक रहते हैं।

शैक्षणिक संस्थानों को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। स्कूलों और कॉलेजों को अपने पाठ्यक्रमों को अद्यतन करना होगा ताकि वे डेटा साइंस, मशीन लर्निंग, साइबर सुरक्षा और अन्य उभरते क्षेत्रों पर ध्यान दें। इसके अलावा, ऑनलाइन शिक्षण मंचों और मूक (MOOCs) जैसे संसाधनों को बढ़ावा देना होगा ताकि लोग घर बैठे नई तकनीकों को सीख सकें।

निजी क्षेत्र की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। कंपनियों को अपने कर्मचारियों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए। कई वैश्विक कंपनियां, जैसे कि गूगल और माइक्रोसॉफ्ट, पहले से ही अपने कर्मचारियों को एआई और डिजिटल कौशल सिखाने के लिए निवेश कर रही हैं। भारतीय कंपनियों को भी इस दिशा में कदम उठाने होंगे। इसके अलावा, स्टार्टअप और छोटी कंपनियां, जो भारत की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, को भी अपने कर्मचारियों के कौशल विकास में योगदान देना चाहिए।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक दोधारी तलवार है, यह अभूतपूर्व अवसर प्रदान करती है, लेकिन साथ ही गंभीर चुनौतियां भी लाती है। रोजगार का नुकसान एक ऐसी चुनौती है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, पुनः कौशल विकास और कौशल उन्नयन के माध्यम से, हम इस संकट को एक अवसर में बदल सकते हैं। भारत, जिसके पास दुनिया की सबसे अधिक युवा कार्यबल आबादी है, इस बदलाव का नेतृत्व कर सकता है। बशर्ते सरकार, शैक्षणिक संस्थानों और निजी क्षेत्र इसके लिए संयुक्त प्रयास करें। भारत एक ऐसी कार्यबल तैयार कर सकता है, जो न केवल एआई-प्रधान दुनिया में प्रासंगिक रहे, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभाए। समयकी माँग है कि हम इस चुनौती को स्वीकार करें और एक समावेशी, कौशल-प्रधान भविष्य की दिशा में कदम बढ़ाएं।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

सड़क सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलते सड़क हादसे!

दिल्ली, भारत की राजधानी, जो तेजी से विकसित हो रही है, वहां सड़कें न केवल प्रगति का प्रतीक हैं, बल्कि मौत का भी सैलाब बन चुकी हैं। 14 सितंबर 2025 को दिल्ली में एक बार फिर दिल दहला देने वाली घटना घटी, जब एक लग्जरी बीएमडब्ल्यू कार ने एक बाइक को जोरदार टक्कर मार दी। इस हादसे में वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि उनकी पत्नी गंभीर रूप से घायल हो गईं। पुलिस ने दोषपूर्ण हत्या के तहत मामला दर्ज कर लिया है। आए दिन हमें देश के अलग अलग शहरों से ऐसी घटनाओं की खबर मिलती है जो भारत की सड़क सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल कर रख देती हैं। हर साल लाखों दुर्घटनाएं हो रही हैं, जिनमें से अधिकांश रोकथाम योग्य हैं। लेकिन क्यों? इसका मुख्य कारण है आपातकालीन सेवाओं की घोर कमी, जनता द्वारा यातायात नियमों की अवहेलना करना और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की सुस्ती।

सबसे पहले, हालिया दुर्घटना को समझें। नवजोत सिंह जैसे सम्मानित अधिकारी की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया। पुलिस जांच से पता चला कि कार की रफ्तार निर्धारित गति सीमा से काफ़ी अधिक थी। लेकिन हादसे के बाद जो सबसे बड़ी लापरवाही सामने आई, वह थी प्राथमिक चिकित्सा सहायता की अनुपस्थिति। दुर्भाग्यवश, दिल्ली जैसे महानगर में भी एम्बुलेंस पहुंचने में 20-30 मिनट लग जाते हैं। यदि ‘गोल्डन ऑवर’— यानी हादसे के पहले घंटे में उचित उपचार मिल जाता, तो शायद नवजोत की जान बच सकती थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में सड़क दुर्घटनाओं में 50 प्रतिशत मौतें प्री-हॉस्पिटल चरण में ही हो जाती हैं, क्योंकि भारत में आपातकालीन सेवाएं अपर्याप्त हैं।


भारत में आपातकालीन सेवाओं की स्थिति बेहद दयनीय है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 1,55,622 सड़क मौतें हुईं, जिनमें से 69,240 दोपहिया वाहनों से जुड़ी थीं। वहीं, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, 2022 में 4,64,910 दुर्घटनाओं में 1,47,913 मौतें हुईं। समस्या यह है कि भारत में एम्बुलेंस सेवाएं, जैसे 108 या 102, अक्सर ओवरलोडेड होती हैं। ग्रामीण और राजमार्गीय इलाकों में तो स्थिति और खराब है। यहां एम्बुलेंस पहुंचने में औसतन 45 मिनट से एक घंटा लग जाता है। एक अध्ययन के अनुसार, राष्ट्रीय राजमार्गों पर दुर्घटना स्थल से ट्रॉमा सेंटर तक पहुंचने में देरी से 40 प्रतिशत मौतें बढ़ जाती हैं। दिल्ली में, जहां वाहनों की संख्या 1 करोड़ से अधिक है, ट्रैफिक जाम एम्बुलेंस को रोक देता है। फोरेंसिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्री-हॉस्पिटल इमरजेंसी केयर मजबूत होती, तो 30-50 प्रतिशत जानें बच सकतीं। लेकिन सरकार की ‘5ई’ रणनीति—इंजीनियरिंग, एजुकेशन, एनफोर्समेंट, इमरजेंसी केयर, में इमरजेंसी केयर पर निवेश न्यूनतम है। नतीजा? हर दिन 405 मौतें और 1,290 घायल। यह राष्ट्रीय संकट है, जो विकास की राह में बड़ा रोड़ा है।


अब जनता द्वारा यातायात नियमों की अवहेलना की बात करें। इसका एक बड़ा कारण है ‘चलता है’ वाली मानसिकता। इंटरनेट पर कई प्लेटफॉर्म्स पर चर्चाओं से साफ है कि लोग नियमों को ‘सजावटी’ मानते हैं। ओवरस्पीडिंग, बिना हेलमेट या सीटबेल्ट के ड्राइविंग, गलत लेन तोड़ना, ये आम हैं। क्यों? पहला, जागरूकता की कमी, स्कूलों में ट्रैफिक नियमों की शिक्षा पर्याप्त मात्रा में नहीं दी जाती, नतीजा बच्चे बड़े होकर भी नियमों को महत्व नहीं देते। दूसरा, जनसंख्या घनत्व 1.3 अरब आबादी वाले देश में सड़कें ओवरलोड हैं, लोग सोचते हैं, ‘एक-दो नियम तोड़ लूंगा, क्या फर्क पड़ेगा?’ तीसरा, सामाजिक दबाव, यदि कोई रेड लाइट पर रुकता है, तो पीछे से हॉर्न बजते हैं, गालियां पड़ती हैं। लोग जल्दबाजी में रहते हैं, ट्रैफिक में समय की कमी से तनाव बढ़ता है और नियम तोड़ना ‘स्मार्ट’ लगता है। चौथा, सांस्कृतिक पक्ष, भारत में ‘जुगाड़’ संस्कृति प्रचलित है। नियम तोड़ना ‘चालाकी’ माना जाता है। एक सर्वे के अनुसार, अधिकांश ड्राइवरों को नियमों की पूरी जानकारी ही नहीं। परिणामस्वरूप, 2023 में 35,000 पैदल यात्री और 10,000 बच्चे दुर्घटनाओं का शिकार बने। यदि जनता जागरूक होती, तो ये आंकड़े कम होते।

इस अवहेलना का एक प्रमुख कारण है कानून प्रवर्तन एजेंसियों की सुस्ती। ट्रैफिक पुलिस की कमी भयानक है। ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के अनुसार, 85,144 ट्रैफिक पुलिस पदों में 30 प्रतिशत और 58,509 कांस्टेबल पदों में 39 प्रतिशत रिक्त हैं। बिना सख्ती के, लोग नियम तोड़ते हैं। क्यों आलसी हैं एजेंसियां? पहला, संसाधनों की कमी। कैमरे, स्पीड गन्स, बॉडी कैमरे, आदि जैसे उपकरण अपर्याप्त हैं। मोटर व्हीकल एक्ट 2019 में सख्त जुर्माने जोड़े गए, लेकिन लागू नहीं होते। दूसरा, भ्रष्टाचार, छोटे-मोटे उल्लंघनों पर 50-100 रुपये में सेटलमेंट हो जाता है, जिससे डर समाप्त हो जाता है। तीसरा, प्राथमिकताएं, पुलिस अन्य अपराधों पर फोकस करती है, ट्रैफिक को सेकेंडरी मानती है। चौथा, प्रशिक्षण की कमी, अधिकारी सड़क डिजाइन या व्यवहार समझ नहीं पाते। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, खराब सड़क डिजाइन और साइनेज भी दुर्घटनाएं बढ़ाते हैं, लेकिन प्रवर्तन कमजोर है। विदेशों की तरह यदि भारत में भी सख्ती हो, तो सुधार संभव है।

ये समस्याएं परस्पर जुड़ी हैं। अवहेलना से दुर्घटनाएं बढ़ती हैं, सेवाओं की कमी से मौतें। समाधान? पहला, आपातकालीन सेवाओं को मजबूत करें हर 10 किमी पर ट्रॉमा सेंटर हों। एकीकृत हेल्पलाइन ‘112’ को मजबूत बनाया जाए। दूसरा, शिक्षा, स्कूलों में ट्रैफिक जागरूकता अभियान चलाए जाएँ। तीसरा, प्रवर्तन, पुलिस भर्ती बढ़ाएं, ई-मॉनिटरिंग लागू करें, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे। चौथा, बुनियादी ढांचा, सड़कें सुधारें, साइनेज बढ़ाएं। सरकार की ‘रोड सेफ्टी’ योजना को गति दें। नवजोत सिंह जैसी मौतें हमें झकझोरती है, यदि हम नहीं चेते, तो और कितने परिवार बिखरेंगे?

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

गोपनीयता की शपथ और नौकरशाही की भूमिका

भारतीय नौकरशाही देश की शासन व्यवस्था की रीढ़ है। नौकरशाहों को अपने कार्यकाल के दौरान ऐसी गोपनीय जानकारी और दस्तावेजों तक पहुंच प्राप्त होती है, जो देश की सुरक्षा, नीति निर्माण और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से संबंधित होती हैं। ये दस्तावेज और जानकारी अक्सर संवेदनशील प्रकृति की होती हैं, जिनका सार्वजनिक खुलासा राष्ट्रीय हितों, कूटनीतिक संबंधों, या आंतरिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और अन्य उच्च पदों पर कार्यरत नौकरशाहों को यह जिम्मेदारी दी जाती है कि वे इस गोपनीयता का सम्मान करें और इसे अपने कार्यकाल के बाद भी बनाए रखें। हालांकि, कुछ सेवानिवृत्त नौकरशाह, विशेष रूप से असंतुष्ट या नाराज, अपने अनुभवों या जानकारी के कुछ हिस्सों को सार्वजनिक करने का निर्णय लेते हैं, जिसके परिणामस्वरूप विवाद उत्पन्न होते हैं। यह सवाल उठता है कि क्या ऐसा करना नैतिक रूप से उचित है? क्या इसमें कोई अपवाद हो सकते हैं?


उल्लेखनीय है कि भारतीय नौकरशाहों को अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए गोपनीयता की शपथ लेनी पड़ती है। यह शपथ उन्हें संवेदनशील जानकारी को सुरक्षित रखने और इसे अनधिकृत व्यक्तियों के साथ साझा न करने के लिए बाध्य करती है। यह गोपनीयता न केवल उनके कार्यकाल के दौरान, बल्कि सेवानिवृत्ति के बाद भी लागू रहती है। यह प्रावधान सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए आवश्यक है। उदाहरण के लिए, रक्षा, विदेश नीति या आंतरिक सुरक्षा से संबंधित दस्तावेजों का खुलासा देश के लिए हानिकारक हो सकता है। नौकरशाहों को यह भरोसा दिया जाता है कि वे इस जानकारी का दुरुपयोग नहीं करेंगे और यही कारण है कि उन्हें ऐसी जिम्मेदारी सौंपी जाती है।

हालांकि, यह देखा गया है कि कुछ नौकरशाह, विशेष रूप से वे जो अपने कार्यकाल के दौरान किसी कारण से असंतुष्ट रहे हों, सेवानिवृत्ति के बाद अपनी आत्मकथाओं, साक्षात्कारों या लेखों के माध्यम से ऐसी जानकारी साझा करते हैं, जो पहले गोपनीय मानी जाती थी। ये खुलासे अक्सर सनसनीखेज होते हैं और राजनीतिक, सामाजिक या प्रशासनिक विवादों को जन्म देते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ पूर्व नौकरशाहों ने नीति निर्माण में राजनीतिक हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार, या प्रशासनिक विफलताओं के बारे में खुलासे किए हैं, जिन्होंने सरकारों और व्यक्तियों पर सवाल उठाए हैं।

यह एक जटिल सवाल है कि क्या सेवानिवृत्त नौकरशाहों का गोपनीय जानकारी साझा करना उचित है? एक ओर, नौकरशाहों का यह कर्तव्य है कि वे गोपनीयता की शपथ का पालन करें। इस शपथ का उल्लंघन न केवल कानूनी रूप से गलत है, बल्कि यह प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता को भी कमजोर करता है। यदि नौकरशाह सेवानिवृत्ति के बाद संवेदनशील जानकारी साझा करने लगें, तो इससे भविष्य में सरकार और नौकरशाहों के बीच विश्वास की कमी हो सकती है। इसके अलावा, ऐसे खुलासे अक्सर व्यक्तिगत नाराजगी या बदले की भावना से प्रेरित होते हैं, जिससे उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई नौकरशाह अपने कार्यकाल के दौरान किसी नीति या निर्णय से असहमत था, तो सेवानिवृत्ति के बाद उसका खुलासा करना व्यक्तिगत हितों को प्राथमिकता देने जैसा प्रतीत हो सकता है।

दूसरी ओर, कुछ लोग तर्क देते हैं कि यदि कोई नौकरशाह ऐसी जानकारी का खुलासा करता है जो सार्वजनिक हित में हो, जैसे कि भ्रष्टाचार, शक्ति का दुरुपयोग या मानवाधिकारों का उल्लंघन, तो इसे उचित ठहराया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई नौकरशाह यह देखता है कि किसी नीति या निर्णय से देश को गंभीर नुकसान हुआ है और वह इसे सार्वजनिक करने का निर्णय लेता है ताकि भविष्य में सुधार हो सके, तो इसे नैतिक रूप से उचित माना जा सकता है। ऐसे मामलों में, खुलासा करने का उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ या बदला लेना नहीं, बल्कि समाज और देश के हित में होता है।

क्या हर परिस्थिति में गोपनीयता का पालन अनिवार्य है, या कुछ अपवाद हो सकते हैं? कुछ विशेष परिस्थितियों में, नौकरशाहों के खुलासे को नैतिक रूप से उचित माना जा सकता है। यदि कोई जानकारी भ्रष्टाचार, अवैध गतिविधियों या जनता के अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित है और इसका खुलासा समाज में सुधार ला सकता है, तो इसे उचित ठहराया जा सकता है। कुछ मामलों में, नौकरशाहों को कानूनी रूप से संरक्षित किया जाता है यदि वे व्हिसलब्लोअर के रूप में कार्य करते हैं। भारत में व्हिसलब्लोअर्स प्रोटेक्शन एक्ट, 2014, भ्रष्टाचार या अनैतिक गतिविधियों को उजागर करने वालों को कुछ हद तक संरक्षण प्रदान करता है। हालांकि, इस कानून के तहत सुरक्षा सीमित है और सेवानिवृत्त नौकरशाहों के लिए इसका उपयोग जटिल हो सकता है। कुछ मामलों में, सेवानिवृत्त नौकरशाह ऐतिहासिक घटनाओं या नीतियों के बारे में जानकारी साझा करते हैं जो अब गोपनीय नहीं हैं और जिनका खुलासा समाज के लिए शिक्षाप्रद हो सकता है। उदाहरण के लिए, स्वतंत्रता के बाद की नीतियों या कूटनीतिक निर्णयों के बारे में जानकारी इतिहासकारों और नीति निर्माताओं के लिए उपयोगी हो सकती है।

इस मुद्दे को संतुलित करने के लिए, सरकार को व्हिसलब्लोअर संरक्षण को और मजबूत करना चाहिए ताकि नौकरशाह अपने कार्यकाल के दौरान ही गलत कार्यों को उजागर कर सकें, वो भी बिना किसी डर के। साथ ही, सेवानिवृत्त नौकरशाहों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश होने चाहिए कि किन परिस्थितियों में जानकारी साझा की जा सकती है। अंततः, नौकरशाहों को यह समझना होगा कि उनकी जिम्मेदारी देश और जनता के प्रति है, न कि व्यक्तिगत हितों या नाराजगी के लिए। गोपनीयता और पारदर्शिता के बीच संतुलन बनाए रखना ही एक मजबूत और विश्वसनीय प्रशासन की कुंजी है। 

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

गुरुग्राम में जलभराव: दोषी कौन?

 आज के गुरुग्राम, जिसे ‘मिलेनियम सिटी’ और ‘साइबर सिटी’ जैसे गौरवशाली नामों से नवाज़ा जाता है, हर साल मानसून के आगमन के साथ एक जलमग्न नरक में तब्दील हो जाता है। महज दो घंटे की बारिश इस शहर को घुटनों तक पानी में डुबो देती है। सड़कों पर घंटों लंबा ट्रैफिक जाम लग जाता है। करोड़ों रुपये की कीमत वाले आलीशान घरों में रहने वाले लोग बुनियादी सुविधाओं के अभाव में त्रस्त हो उठते हैं। यह विडंबना है कि एक ओर गुरुग्राम भारत के सबसे महंगे रियल एस्टेट बाजारों में से एक है, जहां लोग भारी-भरकम टैक्स और किराए चुकाते हैं, वहीं दूसरी ओर सरकारी विभागों की लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी के कारण यह शहर हर बारिश में डूब जाता है। इस संकट ने न केवल शहर की छवि को धूमिल किया है, बल्कि निवासियों के बीच गुस्सा और निराशा को भी बढ़ावा दिया है।

हाल ही में, प्रसिद्ध लेखक और उद्यमी सुहेल सेठ ने एक सार्वजनिक मंच पर हरियाणा सरकार और स्थानीय प्रशासन की कड़ी आलोचना की। उन्होंने गुरुग्राम की स्थिति को ‘शर्मनाक’ करार देते हुए कहा, “गुरुग्राम खत्म हो चुका है। आप कल्पना भी नहीं कर सकते। इसकी शुरुआत पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने की और वर्तमान मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी इस स्थिति को संभाल नहीं पा रहे। बीजेपी को गंभीर आत्ममंथन की जरूरत है। वे 11 साल से इस राज्य को चला रहे हैं, अब नेहरू को दोष नहीं दे सकते।” सेठ की यह टिप्पणी न केवल गुरुग्राम की बदहाल स्थिति को उजागर करती है, बल्कि सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही की कमी को भी रेखांकित करती है।


सुहेल सेठ ने अपनी एक अन्य टिप्पणी में कहा, “क्या नालों की सफाई के लिए रॉकेट साइंस चाहिए? नहीं, बिल्कुल नहीं।” उनकी यह बात सटीक है। गुरुग्राम जैसे शहर, जो गूगल, मेटा और सैमसंग जैसे बड़े कॉरपोरेट्स का घर है, को बुनियादी ढांचे के मामले में इतना पिछड़ा होना न केवल शर्मनाक है, बल्कि यह एक गंभीर प्रशासनिक विफलता को भी दर्शाता है। निवासियों का गुस्सा जायज है, क्योंकि वे अपनी मेहनत की कमाई से भारी टैक्स और किराए चुकाते हैं, लेकिन बदले में उन्हें बारिश में डूबता शहर और घंटों का ट्रैफिक जाम मिलता है।

गुरुग्राम में जलभराव की समस्या कोई नई बात नहीं है। हर साल मानसून के दौरान शहर की सड़कें नदियों में बदल जाती हैं, और प्रमुख मार्ग जैसे गोल्फ कोर्स रोड, सोहना रोड, और दिल्ली-जयपुर हाईवे पर घंटों तक ट्रैफिक रेंगता रहता है। 1 सितंबर 2025 को, महज चार घंटे की बारिश में 100 मिलीमीटर से अधिक वर्षा दर्ज की गई, जिसने शहर को पूरी तरह ठप कर दिया। नेशनल हाईवे-48 पर 7 किलोमीटर लंबा जाम लग गया। लोग घंटों तक सड़कों पर फंसे रहे। सोशल मीडिया पर निवासियों ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए तस्वीरें और वीडियो साझा किए, जिसमें गोल्फ कोर्स रोड जैसे पॉश इलाकों में गहरे पानी में डूबी गाड़ियां और फंसे हुए लोग दिखाई दिए।

गुरुग्राम में जन्में और वहीं पर बसे एक सफल उद्यमी और समाज सेवी शरद गोयल ने हाल ही में एक चैनल में दिए इंटरव्यू में कहा कि, “इस संकट का मूल कारण है शहर की अनियोजित शहरीकरण और सरकारी विभागों का आपसी तालमेल का अभाव। आज गुरुग्राम अनियंत्रित निर्माण और बुनियादी ढांचे की कमी का शिकार है। गुरुग्राम की पुरानी भौगोलिक संरचना में कई प्राकृतिक जलाशय और नाले थे, जो बारिश के पानी को संचित करते थे। लेकिन तेजी से हुए निर्माण ने इन जल निकायों को नष्ट कर दिया।” वे आगे कहते हैं कि “जनता बारिश और जल भरवा से त्रस्त होती है लेकिन जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि कभी भी ऐसे मौकों पर सड़क पर दिखाई नहीं देते। नेताओं को छोड़िये निगम के अधिकारी भी ईद  का चाँद बने हुए हैं जो केवल अनियमितताओं के चलते ही हरकत में आते हैं। अपने ग़ैर ज़िम्मेदाराना रवैये के लिए कभी भी जनता के बीच नहीं दिखाई देते। सरकारी विभागों के बीच जवाबदेही का अभाव इस समस्या को और गंभीर बनाता है। म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ गुरुग्राम (एमसीजी), हरियाणा अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (हुडा) और गुरुग्राम मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी (जीएमडीए) जैसे विभिन्न निकाय एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हैं, लेकिन कोई भी पूर्ण रूप से समस्या का समाधान नहीं करता। गुरुग्राम हो या देश अन्य कोई शहर, सभी को इंदौर से सबक लेना चाहिए जहाँ के अधिकारी और जनता सभी अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूर्णतः निभाते हैं और सुखी रहते हैं।”  

समाधान के लिए दीर्घकालिक और टिकाऊ शहरी नियोजन की जरूरत है। प्राकृतिक जल निकायों को पुनर्जनन, आधुनिक ड्रेनेज सिस्टम का निर्माण, रेन वाटर हार्वेस्टिंग के कुओं का निर्माण और अवैध निर्माण पर सख्त कार्रवाई जैसे कदम उठाए जाने चाहिए। साथ ही, सरकारी विभागों के बीच बेहतर तालमेल और जवाबदेही सुनिश्चित करने की भी आवश्यकता है। हर वो अधिकारी जो गुरुग्राम जैसे क्षेत्र में तैनाती पाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाता है वो यहाँ आते ही काम करने से क्यों बचता है? यदि किसी भी अधिकारी पर काम न करने पर तबादले की तलवार लटका दी जाए या कुछ आलसी अधिकारियों का तबादला कर दिया जाए तो इससे बाक़ी अधिकारियों के बीच एक सही संदेश जाएगा। 

गुरुग्राम को ‘मिलेनियम सिटी’ का दर्जा बनाए रखने के लिए केवल आलीशान इमारतें और कॉरपोरेट कार्यालय पर्याप्त नहीं हैं, इसे एक ऐसा शहर बनाना होगा जो अपनी जनता को बुनियादी सुविधाएं और सम्मानजनक जीवन प्रदान कर सके। जब तक ये कदम नहीं उठाए जाते, तब तक गुरुग्राम हर मानसून में डूबता रहेगा और निवासियों की निराशा बढ़ती रहेगी।  

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।