एआई ने उद्योगों को पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी और सटीकता के साथ कार्य करने में सक्षम बनाया है। उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य सेवा में, एआई-संचालित उपकरण रोगों का शीघ्र निदान कर रहे हैं और व्यक्तिगत उपचार योजनाएं बना रहे हैं। विनिर्माण क्षेत्र में, स्वचालित मशीनें और रोबोट उत्पादन प्रक्रियाओं को तेज और लागत प्रभावी बना रहे हैं। वित्तीय क्षेत्र में, एआई धोखाधड़ी का पता लगाने और निवेश रणनीतियों को अनुकूलित करने में मदद कर रहा है। यहां तक कि रचनात्मक क्षेत्रों जैसे लेखन, कला और संगीत में भी, एआई नए रास्ते खोल रहा है। ये प्रगतियां न केवल उत्पादकता बढ़ा रही हैं, बल्कि उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाएं और अनुभव भी प्रदान कर रही हैं।
हालांकि, इन फायदों के साथ एक कड़वी सच्चाई भी जुड़ी है। एआई और स्वचालन ने कई पारंपरिक नौकरियों को अप्रचलित कर दिया है। डेटा प्रविष्टि, विनिर्माण, ग्राहक सेवा और यहां तक कि कुछ विश्लेषणात्मक कार्य अब मशीनों द्वारा किए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार, अगले कुछ दशकों में विश्व स्तर पर लाखों नौकरियां स्वचालन के कारण खत्म हो सकती हैं। भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी कार्यबल में शामिल है, यह चुनौती और भी गंभीर है। विशेष रूप से, निम्न-कौशल और मध्यम-कौशल वाली नौकरियां सबसे अधिक जोखिम में हैं। ड्राइवर, फैक्ट्री वर्कर और कॉल सेंटर कर्मचारी जैसे पेशे अब तेजी से मशीनों द्वारा प्रतिस्थापित किए जा रहे हैं।
एआई के कारण होने वाला रोजगार नुकसान केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती भी है। बेरोजगारी न केवल व्यक्तियों की आय को प्रभावित करती है, बल्कि उनके आत्मसम्मान और सामाजिक स्थिति को भी ठेस पहुंचाती है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां पहले से ही बेरोजगारी और अंडरएंप्लॉयमेंट की समस्या है, एआई-प्रेरित नौकरी हानि स्थिति को और जटिल बना सकती है। इसके अलावा, नई तकनीकों को अपनाने की गति और कौशल की कमी के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। कई श्रमिकों के पास नई तकनीकों को सीखने के लिए आवश्यक संसाधन या अवसर नहीं हैं, जिसके परिणामस्वरूप वे आर्थिक मुख्यधारा से बाहर हो रहे हैं।
इस संकट का सामना करने के लिए, पुनः कौशल विकास और कौशल उन्नयन सबसे प्रभावी समाधान के रूप में उभर कर सामने आए हैं। पुनः कौशल विकास का अर्थ है श्रमिकों को पूरी तरह से नए कौशल सिखाना, जो उन्हें बदलते नौकरी बाजार में प्रासंगिक बनाए रखे। दूसरी ओर, कौशल उन्नयन मौजूदा कौशलों को और उन्नत करने पर केंद्रित है ताकि श्रमिक अपनी वर्तमान भूमिकाओं में अधिक प्रभावी हो सकें। उदाहरण के लिए, एक फैक्ट्री कर्मचारी को रोबोटिक्स या डेटा विश्लेषण में प्रशिक्षित किया जा सकता है, जबकि एक ग्राहक सेवा प्रतिनिधि को एआई-संचालित चैटबॉट्स के प्रबंधन में प्रशिक्षण दिया जा सकता है।
इसके लिए सरकार, शैक्षणिक संस्थान और निजी क्षेत्र को एकजुट होकर काम करना होगा। सरकार को नीतियां बनानी होंगी जो प्रशिक्षण कार्यक्रमों को सुलभ और सस्ता बनाएं। भारत में, 'स्किल इंडिया' जैसे कार्यक्रम पहले से ही इस दिशा में काम कर रहे हैं, लेकिन इनकी पहुंच और प्रभाव को और बढ़ाने की आवश्यकता है। विशेष रूप से, ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए, जहां अधिकांश निम्न-कौशल श्रमिक रहते हैं।
शैक्षणिक संस्थानों को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। स्कूलों और कॉलेजों को अपने पाठ्यक्रमों को अद्यतन करना होगा ताकि वे डेटा साइंस, मशीन लर्निंग, साइबर सुरक्षा और अन्य उभरते क्षेत्रों पर ध्यान दें। इसके अलावा, ऑनलाइन शिक्षण मंचों और मूक (MOOCs) जैसे संसाधनों को बढ़ावा देना होगा ताकि लोग घर बैठे नई तकनीकों को सीख सकें।
निजी क्षेत्र की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। कंपनियों को अपने कर्मचारियों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए। कई वैश्विक कंपनियां, जैसे कि गूगल और माइक्रोसॉफ्ट, पहले से ही अपने कर्मचारियों को एआई और डिजिटल कौशल सिखाने के लिए निवेश कर रही हैं। भारतीय कंपनियों को भी इस दिशा में कदम उठाने होंगे। इसके अलावा, स्टार्टअप और छोटी कंपनियां, जो भारत की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, को भी अपने कर्मचारियों के कौशल विकास में योगदान देना चाहिए।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक दोधारी तलवार है, यह अभूतपूर्व अवसर प्रदान करती है, लेकिन साथ ही गंभीर चुनौतियां भी लाती है। रोजगार का नुकसान एक ऐसी चुनौती है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, पुनः कौशल विकास और कौशल उन्नयन के माध्यम से, हम इस संकट को एक अवसर में बदल सकते हैं। भारत, जिसके पास दुनिया की सबसे अधिक युवा कार्यबल आबादी है, इस बदलाव का नेतृत्व कर सकता है। बशर्ते सरकार, शैक्षणिक संस्थानों और निजी क्षेत्र इसके लिए संयुक्त प्रयास करें। भारत एक ऐसी कार्यबल तैयार कर सकता है, जो न केवल एआई-प्रधान दुनिया में प्रासंगिक रहे, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभाए। समयकी माँग है कि हम इस चुनौती को स्वीकार करें और एक समावेशी, कौशल-प्रधान भविष्य की दिशा में कदम बढ़ाएं।
*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।



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