शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

बाल उत्पीड़न: समस्या कितनी गहरी है?

कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने बाल यौन शोषण पर दायर एक याचिका सुनते हुए कड़ी टिप्पणी की और संबंधित क़ानूनी एजेंसियों को इन शिकायतों को गंभीरता से लेने के लिए कहा। भारत में आध्यात्मिक–धार्मिक–शैक्षणिक संस्थानों में हो रहे बाल उत्पीड़न का प्रश्न सिर्फ अपराध का नहीं, बल्कि सत्ता, आस्था और चुप्पी के गठजोड़ का सवाल है। यह समस्या अपवाद नहीं, एक संरचनागत विकृति बन चुकी है, जिस पर त्वरित और कड़े हस्तक्षेप की जरूरत है।

राष्ट्रीय स्तर पर हुए अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में बच्चों के बड़े हिस्से ने किसी न किसी रूप में यौन शोषण का अनुभव किया है। कई अध्ययनों में यह अनुपात 40–50 प्रतिशत तक बताया गया है। आध्यात्मिक आश्रमों, धार्मिक आवासीय विद्यालयों, मदरसों, कॉन्वेंट्स, हॉस्टलों और कोचिंग संस्थानों जैसे बंद व अनुशासित माहौल में, जहां गुरु–शिष्य या शिक्षक–छात्र संबंध में भारी शक्ति-असमानता होती है, वहां यह जोखिम और अधिक बढ़ जाता है।
 

इन संस्थानों में धर्म, राष्ट्रवाद या ‘संस्कार’ की भाषा के सहारे एक ऐसी पवित्रता की छवि गढ़ी जाती है, जिसके कारण पीड़ित, परिवार और समाज शिकायत को ‘पाप’ या ‘अविश्वास’ मानकर दबा देते हैं। नतीजा यह कि जो अपराध सामान्य समाज में भी कम ही रिपोर्ट होते हैं, वे इन संस्थागत दीवारों के भीतर लगभग अदृश्य हो जाते हैं। 



बड़ी संस्थाओं पर कार्रवाई न होने का पहला कारण है इन संगठनों की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक पकड़; बड़े आश्रमों, पंथों या प्रतिष्ठित स्कूलों के संचालक अक्सर राजनीतिक दलों, नौकरशाही और स्थानीय पुलिस से गहरे जुड़े होते हैं, जिससे शुरुआती शिकायत दर्ज कराना ही कठिन हो जाता है। कई मामलों में देखा गया है कि जब पीड़ित या सामाजिक संगठन शिकायत लेकर जाते हैं तो पुलिस पहले ‘समझौता’, ‘प्रतिष्ठा’ और ‘छवि’ का हवाला देकर मामला दबाने की कोशिश करती है। दूसरा कारण है हमारे समाज की ‘अंध-श्रद्धा’; कई अनुयायी या अभिभावक खुद यह मानने को तैयार नहीं होते कि उनके पूजनीय गुरु, फादर, मौलवी या प्रिंसिपल ऐसा अपराध कर सकते हैं। कभी-कभी तो वे ही संस्थान के पक्ष में खड़े होकर पीड़ित को ही झूठा साबित करने लगते हैं। तीसरा, इन संस्थाओं का प्रशासन अक्सर यह तर्क देता है कि “पूरा संगठन बदनाम न हो, सिर्फ व्यक्ति पर दिखावटी कार्रवाई ही हो”। इसी सोच के चलते संस्थागत जवाबदेही, सिस्टम में सुधार और संरचनागत जांच टलती रहती है।


यूँ तो कागज पर भारत के पास कई मजबूत कानून हैं। बाल यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO Act, 2012) हर तरह के यौन शोषण, उत्पीड़न और पोर्नोग्राफी को अपराध मानता है और 18 वर्ष से कम आयु के हर बच्चे को लैंगिक रूप से तटस्थ सुरक्षा देता है। यह कानून ‘विश्वास की स्थिति’ में बैठे व्यक्ति – जैसे शिक्षक, धार्मिक गुरु, वार्डन या डॉक्टर – द्वारा किए गए अपराध को ‘गंभीर’ श्रेणी में रखता है और सख्त सज़ा का प्रावधान करता है। फिर भी, दिक्कतें प्रक्रियागत हैं। जांच एजेंसियों की संवेदनशीलता की कमी, पीड़ित के बार-बार बयान होना, ट्रायल में देरी और गवाहों पर सामाजिक–आर्थिक दबाव के कारण बहुत से मामले या तो दर्ज नहीं हो पाते या अदालत तक पहुंचते-पहुंचते कमजोर हो जाते हैं। कई बार स्थानीय पुलिस या बाल अधिकार आयोगों तक गई शिकायतों पर भी महीनों कार्रवाई नहीं होती, जैसा हाल में कुछ बड़े धार्मिक संस्थानों से जुड़े मामलों में याचिकाकर्ताओं ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष भी उठाया।


ऐसे में पीड़ितों व उनके परिवार की सबसे पहली और कठिन जिम्मेदारी है चुप्पी तोड़ना; बच्चों को यह बताया जाना जरूरी है कि कोई भी ‘गुरु’, ‘फादर’, ‘मौलवी’, ‘भाईया’ या ‘दीदी’ यदि उनकी मर्यादा का उल्लंघन करे, शरीर को ग़लत  तरीके से छुए, तो यह गलती नहीं, अपराध है। माता–पिता और अभिभावकों को बच्चों की बात को गंभीरता से सुनना, उनके व्यवहार में अचानक आए बदलाव (डर, चिड़चिड़ापन, किसी स्थान या व्यक्ति से घबराहट) को संकेत मानना चाहिए। उन्हें धार्मिक या संस्थागत प्रतिष्ठा से ऊपर अपने बच्चों की सुरक्षा को रखना चाहिए।


घटना होने पर तुरंत स्थानीय पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई को सूचना देना और पॉक्सो एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कराने पर जोर देना आवश्यक है। क्योंकि कानून यह भी कहता है कि शिकायत मिलते ही बच्चे की सुरक्षा, चिकित्सा और पुनर्वास के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं। साथ ही, बाल अधिकार आयोगों, विश्वसनीय बाल अधिकार संगठनों या कानूनी सहायता समूहों से संपर्क कर पीड़ित के लिए परामर्श, सुरक्षित ठिकाना और कानूनी सहयोग सुनिश्चित किया जा सकता है।


अदालतें सिर्फ व्यक्तिगत मामलों में सज़ा देने तक सीमित न रहकर संस्थागत जवाबदेही तय कर सकती हैं। जैसे किसी बड़े आश्रम, कॉन्वेंट या स्कूल में दोहराए जा रहे आरोपों के मामले में स्वत: संज्ञान लेकर स्वतंत्र जांच कमेटी, विशेष जांच दल या मॉनिटरिंग मेकनिज्म बनाने के निर्देश देना। न्यायालय समयबद्ध ट्रायल, पीड़ित गवाहों की सुरक्षा, मुआवजा और मनो–सामाजिक पुनर्वास को अनिवार्य करने वाले विस्तृत दिशानिर्देश जारी कर सकते हैं, ताकि हर निचली अदालत में एक समान मानक लागू हो।


साथ ही, सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय सरकारों को बाध्य कर सकते हैं कि सभी धार्मिक–आध्यात्मिक–शैक्षणिक संस्थानों के लिए बाल सुरक्षा नीति और आंतरिक शिकायत तंत्र कानूनी रूप से अनिवार्य हो, जिसकी नियमित ऑडिटिंग हो और उल्लंघन पर पंजीकरण रद्द करने तक की कार्यवाही हो सके।


जब तक आस्था का आवरण, सत्ता का संरक्षण और समाज की चुप्पी मिलकर अपराधियों के लिए ढाल बने रहेंगे, तब तक कानून की धार भी कुंद रहेगी। यह लड़ाई सिर्फ अदालतों की नहीं, परिवार, मीडिया, नागरिक समाज और जिम्मेदार धार्मिक–शैक्षणिक नेतृत्व की है, जो बच्चों की गरिमा और सुरक्षा को किसी भी ‘पवित्र’ संस्था से ऊपर रख सके।


*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

बार-बार क्यों उठ रहे चुनाव आयोग पर सवाल?

हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में चुनाव आयोग की भूमिका और उस पर उठते सवालों ने एक बार फिर चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर बहस छेड़ दी है। एनडीए की ऐतिहासिक जीत और महागठबंधन (इंडिया एलायंस) की करारी हार के बीच, मुख्य सवाल यही उठा कि क्या चुनाव आयोग ने अपने संवैधानिक कर्तव्यों का सही तरह से निर्वहन किया? साथ ही, आचार संहिता के उल्लंघन, राजनीतिक दलों के आचरण और आयोग पर दोहरे मानदंडों के आरोपों ने भी चुनावी निष्पक्षता की मूल भावना को चुनौती दी है।

हाल के चुनावों में चुनाव आयोग पर पक्षपात और दोहरे मानदंड अपनाने के आरोप लगे। खास तौर पर, कांग्रेस और महागठबंधन ने वोटर लिस्ट, अधिकारियों की नियुक्ति और निष्पक्ष मतदान पर गंभीर सवाल खड़े किए। आरोप है कि कुछ विधानसभा क्षेत्रों में वोटर लिस्ट से लाखों नाम हटा दिए गए या मनमाने ढंग से जोड़े-घटाए गए। कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया कि आयोग ने भाजपा शासित राज्यों से चयनित नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों को चुनावी पर्यवेक्षक नियुक्त कर पक्षपातपूर्ण रवैया दिखाया। विपक्ष ने मतदान प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करते हुए कहा कि आयोग की प्रक्रिया आम जनता का भरोसा कायम नहीं रख पा रही है।


इस चुनाव में लगभग सभी प्रमुख दलों के सोशल मीडिया पर भड़काऊ, जातिवादी और भ्रामक कंटेंट साझा होने के आरोप लगे। बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने ऐसे लगभग 21 एफआईआर दर्ज किए, जिनमें भाजपा, राजद और कांग्रेस जैसे बड़े दलों के खिलाफ भी कार्रवाई हुई। कई सोशल मीडिया हैंडल्स पर तो गुमराह करने वाले AI-जनित वीडियो और दीपफेक कंटेंट डालने के आरोप मिले, जिन्हे तुरंत हटवाया गया। आयोग द्वारा आचार संहिता के पालन के लिए सोशल मीडिया पर निगरानी करने की व्यवस्था थी, परंतु बड़ी संख्या में भड़काऊ और गुमराह करने वाले पोस्ट सामने आए, जिससे आयोग की प्रभावशीलता को लेकर सवाल भी उठे।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में चुनाव आयोग की सबसे अहम जिम्मेदारी है, चुनाव प्रक्रिया को स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी बनाना। आयोग को अपने हर कदम पर समानता और पारदर्शिता का पालन करना चाहिए। आयोग की साख को बहाल करने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने चाहिए। जैसे कि सभी दलों की शिकायतों की सार्वजनिक व स्वतंत्र जाँच। पर्यवेक्षकों और चुनावी कर्मियों की निष्पक्ष नियुक्ति जो कि राजनीतिक झुकाव से दूर रहते हुए की जाए। वोटर लिस्ट की शुद्धता और अद्यतन प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाना। सोशल मीडिया व डिजिटल प्रचार पर कठोर निगरानी और दोषियों पर तत्काल कार्रवाई। आचार संहिता उल्लंघन पर बिना किसी भेदभाव के उचित व सख़्त न्यायिक कार्यवाही। 

वहीं देखा जाए तो महागठबंधन (इंडिया एलायंस) रणनीतिक स्तर पर संगठित नहीं हो सका। सीट शेयरिंग, यानी सीटों का बँटवारा, चुनाव से ठीक पहले तय हुआ, जिससे अभियान की गति और एकता दोनों प्रभावित रहीं। तेजस्वी यादव के देर से सक्रिय चुनाव प्रचार, गठबंधन में सहयोगी दलों के मतभेद और साझा विजन की कमी ने विपक्ष की प्रभावशीलता कम कर दी। साथ ही, कांग्रेस जैसी सहयोगी दल ज़मीनी स्तर पर मतदाताओं को लामबंद करने में नाकाम रही। ऐसे समय में जब एनडीए अपनी एकजुटता दिखा रहा था, महागठबंधन अपनी आंतरिक समस्याओं में उलझ कर रह गया।

महागठबंधन ने मुख्य रूप से सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इन्कम्बेंसी) पर ज्यादा दांव लगाया, जबकि एनडीए ने अपनी स्थिरता, विकास, और समावेशिता के एजेंडा के साथ मतदाताओं को बेहतर तरीके से साधने में सफल रहा। जातिगत समीकरणों को लेकर महागठबंधन ने पारंपरिक रणनीति अपनाई, परंतु दलित, महिला, और अति पिछड़ा वर्ग को खास तौर पर टार्गेट करके एनडीए ने अपने पुराने वोट बैंक के दायरे को काफी विस्तार दिया। जो एनडीए की ऐतिहासिक जीत का कारक बना। इसके साथ ही महिलाओं को लुभाने के लिए दिए गए अनुदान ने भी इस चुनाव परिणाम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
 
बहरहाल चुनाव चाहे किसी राज्य की सरकार का हो या केंद्र की सरकार का, हर राजनैतिक दल मतदाताओं को लुभाने की मंशा से ऐसे कई वादे करते हैं जो वास्तव में सच नहीं किए जाते। यदि जनता को चुनावों में किए गए वादों और उन्हें पूरा किए जाने के अंतर की देखा जाए तो यह अंतर काफ़ी बड़ी संख्या में पाया जाएगा। चुनावों से पहले ऐसे वादे हर राजनैतिक दल द्वारा किए जाते हैं। जिस तरह बिहार की जनता ने एक बार फिर से नीतीश कुमार में अपना विश्वास जताया है उससे यह बात तो तय है कि जनता को किए गए चुनावी वादे काफ़ी लुभावने थे। परंतु मतदाताओं यह सोचना होगा कि वादों की सूची और उन्हें पूरा करने में जिस भी दल का अंतर सबसे कम हो वही दल जनता के हित की सोचता है, तभी उसी दल को चुना जाता है। यदि सभी दल एक समान हैं तो जनता को चुनावी वादों से भ्रमित होकर इनमें फँसना नहीं चाहिए। 

बिहार चुनाव में चुनाव आयोग की निष्पक्षता, राजनीतिक दलों का आचरण और विजेता की रणनीति सभी गंभीर चर्चा का विषय रहे। आयोग को चाहिए कि वह अपने हर निर्णय में पारदर्शिता, कठोरता और समान व्यवहार बनाए रखे, तभी वह जनता का भरोसा लौटाने में कामयाब होगा। साथ ही, विपक्ष को चुनावी रणनीति बनाने और आंतरिक समन्वय में अपनी कमियों से सीख लेनी होगी, ताकि वे सशक्त विकल्प बन सकें और लोकतंत्र को मजबूती दे सकें।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

और कितना गिरेंगे टीवी चैनल?

हाल ही में बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र की मौत की झूठी खबर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा फैलाई गई, जिसने न केवल उनके परिवार और प्रशंसकों को दुखी किया, बल्कि देश के लाखों नागरिकों को भी भ्रमित कर दिया। यह घटना आज के मीडिया की विश्वसनीयता, जिम्मेदारी और नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। आज का मीडिया, ख़ासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अक्सर सच्चाई की जगह टीआरपी और लोकप्रियता के लिए खबरें तेजी से प्रचारित करता है, बिना उसकी पुष्टि किए। इसके चलते न केवल सेलिब्रिटीज या किसी चर्चित व्यक्ति की निजता का उल्लंघन होता है, बल्कि आम जनता को भी गलत सूचना देकर भ्रमित किया जाता है। धर्मेंद्र की मौत की झूठी खबर तेजी से सोशल मीडिया और कई इलेक्ट्रॉनिक चैनलों पर फैल गई, जिसके बाद उनकी पत्नी हेमा मालिनी और बेटी ईषा देओल ने खुद सामने आकर इस खबर को गलत बताया। इस घटना ने दिखाया कि आज के मीडिया की जल्दबाजी और बिना जांच के खबर छापने की आदत कितनी खतरनाक है। इंडियन फिल्म एंड टेलीविजन डायरेक्टर्स एसोसिएशन (IFTDA) ने भी इस तरह की झूठी खबरों की निंदा करते हुए मीडिया से जिम्मेदारी और संयम का आह्वान किया है। 

आज के मीडिया में टीआरपी (टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट्स) की दौड़ इतनी तेज है कि अक्सर सच्चाई और नैतिकता को पीछे छोड़ दिया जाता है। मनमाने दामों पर अधीक से अधिक विज्ञापन पाने की होड़ में, कुछ चैनलों को छोड़ कर ज़्यादातर चैनल्स अपनी रेटिंग बढ़ाने के लिए ऐसी खबरें दिखाते हैं जो दर्शकों का ध्यान तुरंत खींचती हैं, चाहे वह सच हो या न हो। इसके चलते सेलिब्रिटीज या मशहूर हस्तियों की निजता का उल्लंघन होता है। उनकी निजी जिंदगी को खुले आम उजागर किया जाता है और उनकी तस्वीरें, वीडियो बिना अनुमति के शेयर की जाती हैं। यह न केवल अनैतिक है, बल्कि कानूनी दृष्टि से भी गलत है। आज के मीडिया में ऐसी खबरें छापने या प्रसारित करने का उद्देश्य केवल टीआरपी और लोकप्रियता की भूख होता है, न कि सच्चाई को जनता तक पहुंचाना। किसी की भी निजी जानकारी का खुलासा करने से पहले यह जांच अवश्य करनी चाहिए कि उससे सार्वजनिक हित में कोई बड़ा लाभ होगा या नहीं। यदि नहीं है, तो उसका खुलासा नहीं किया जाना चाहिए।


पुराने जमाने में जब टीवी चैनलों की भीड़ नहीं होती थी, मीडिया की जिम्मेदारी और नैतिकता बहुत ज्यादा थी। खबरें छापने व प्रसारित करने से पहले उनकी भरपूर पुष्टि की जाती थी और बिना जांच के कोई भी खबर नहीं छापी या दिखाई  जाती थी। तब मीडिया का उद्देश्य सच्चाई और जानकारी देना होता था, न कि टीआरपी या लोकप्रियता बढ़ाना। आज की तुलना में तब की खबरें अधिक विश्वसनीय और जिम्मेदार थीं। तब के पत्रकार अपनी जिम्मेदारी को समझते थे और खबरों को छापने से पहले उनकी सत्यता की जांच करते थे। आज के मीडिया के एक विशेष वर्ग में इस तरह की जिम्मेदारी लगभग खत्म हो गई है। उनका उद्देश्य केवल अपने चैनल मालिकों या राजनैतिक आकाओं को खुश करना है। 

गौरतलब है कि सेलिब्रिटी की प्राइवेसी बचाने के लिए भारत में अभी तक कोई विशेष कानून नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में न्यायपालिका ने इस मुद्दे पर बहुत ज्यादा जोर दिया है। आज के डिजिटल युग में सेलिब्रिटीज की तस्वीरें, आवाज़, नाम और व्यक्तित्व का बिना अनुमति के उपयोग आम हो गया है, खासकर एआई और डीपफेक तकनीक के चलते। जिससे इन सेलिब्रिटीज का काफ़ी दुष्प्रचार होने लगा है। इसलिए नए कानूनों की जरूरत है, जो सेलिब्रिटीज या किसी अन्य चर्चित व्यक्ति की प्राइवेसी और व्यक्तित्व के अधिकारों की सुरक्षा करें। सार्वजनिक हित और निजी गोपनीयता के बीच संतुलन बनाने के लिए स्पष्ट कानूनी दिशा-निर्देश बनाए जाने चाहिए, जिसमें निजी जानकारी के खुलासे की शर्तें और सीमाएं स्पष्ट हों। 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है, लेकिन इसकी व्याख्या और लागू करने के लिए और स्पष्ट नियम बनाए जाने चाहिए। इसमें सेलिब्रिटीज या मशहूर व्यक्तियों की निजी जानकारी, चिकित्सा इतिहास और व्यक्तिगत जीवन की जानकारी को बिना अनुमति के प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। ऐसे कानूनों का उल्लंघन करने वालों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्यवाही का प्रावधान भी होना चाहिए, जिससे भविष्य में कि कोई भी ऐसी गलती करने से पहले कई बार सोचे।  

धर्मेंद्र की मौत की झूठी खबर ने एक बार फिर दिखाया कि आज का मीडिया अपनी जिम्मेदारी और नैतिकता को भूल चुका है। टीआरपी और लोकप्रियता के लिए खबरें छापना और सेलिब्रिटीज की निजता का उल्लंघन करना अब आम बात हो गई है। इससे न केवल सेलिब्रिटीज को नुकसान होता है, बल्कि आम जनता को भी गलत सूचना देकर भ्रमित किया जाता है। मीडिया को अपनी जिम्मेदारी और नैतिकता को फिर से याद करना चाहिए और खबरें छापने से पहले उनकी पुष्टि करनी चाहिए। इससे ही मीडिया की विश्वसनीयता बनी रहेगी और जनता को सही जानकारी मिलेगी। नए कानूनों के साथ-साथ मीडिया और जनता के लिए जागरूकता अभियान भी जरूरी है, ताकि वे सेलिब्रिटीज की प्राइवेसी का सम्मान करें और उनकी निजी जानकारी को बिना अनुमति के न फैलाएं।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 7 नवंबर 2025

विद्यार्थी जीवन में अनुशासन का महत्व

विद्यार्थी जीवन को जीवन का स्वर्णकाल कहा जाता है। यही वह समय होता है जब व्यक्ति का चरित्र, सोच और भविष्य की दिशा तय होती है। इस अवस्था में यदि कोई एक गुण सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, तो वह है अनुशासन। अनुशासन केवल समय पर विद्यालय जाने, पढ़ाई करने या नियमों का पालन करने तक सीमित नहीं है; यह जीवन की एक सोच और आदत है जो व्यक्ति को आत्मसंयम, जिम्मेदारी और सम्मान सिखाती है। 

अनुशासन वह मार्गदर्शक है जो विद्यार्थी को उसके लक्ष्यों तक पहुँचने में मदद करता है। यदि विद्यार्थी अपने समय, ऊर्जा और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सीख ले, तो वह किसी भी चुनौती का सामना साहस और विवेक से कर सकता है। परंतु आज के समय में, जब विद्यार्थी विभिन्न सामाजिक, शैक्षणिक और मानसिक दबावों से गुजर रहे हैं, अनुशासन का पालन पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। ऐसे में माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।


अनुशासन विद्यार्थियों के चरित्र-निर्माण की नींव रखता है। यह उन्हें आलस्य, असंगठितता और गैर-जिम्मेदारी से बचाता है। नियमित अध्ययन, समय पर कार्य पूरा करना, नियमों का सम्मान करना और स्वयं के प्रति ईमानदार रहना, ये आदतें उसी अनुशासन का परिणाम हैं। एक अनुशासित विद्यार्थी न केवल अकादमिक सफलता प्राप्त करता है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में संतुलित और आत्मविश्वासी व्यक्ति के रूप में उभरता है।

जब विद्यार्थी अपने दैनिक जीवन में अनुशासन अपनाता है, तो वह जीवन की कठिन परिस्थितियों से जूझने की क्षमता भी विकसित करता है। वह समय की कीमत समझता है, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना सीखता है और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी पहचानता है।

आज के दौर में विद्यार्थी अध्ययन के साथ-साथ प्रतियोगिता, सहपाठियों की तुलना, सोशल मीडिया और अन्य कई दबावों से गुजरते हैं। कई बार ये दबाव मानसिक थकान, असंतोष और असफलता की भावना जन्म देते हैं। ऐसे में माता-पिता की भूमिका केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भावनात्मक सहारा और मानसिक स्थिरता प्रदान करना भी आवश्यक हो जाता है। 

माता-पिता को अपने बच्चों की समस्याओं और भावनाओं को समझने की कोशिश करनी चाहिए। संवाद के द्वार खुले रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है ताकि बच्चा अपनी चिंताओं को बिना डर के व्यक्त कर सके। यदि माता-पिता केवल अंकों या रैंकों पर ध्यान देंगे, तो बच्चा अनुशासन को भय या दबाव के रूप में देखने लगेगा। लेकिन जब वही अनुशासन प्रेम, समझ और प्रेरणा से जोड़ा जाएगा, तो विद्यार्थी उसे जीवन का हिस्सा बना लेगा।

साथ ही, बच्चों को यह भी समझना चाहिए कि माता-पिता की अपेक्षाएँ केवल सफलता के लिए नहीं होतीं, बल्कि उनके उज्जवल भविष्य के लिए होती हैं। माता-पिता अपने जीवन के अनेक सुख-त्याग कर बच्चों के सपनों को पूरा करने का प्रयास करते हैं। इसलिए विद्यार्थियों के लिए यह समझना जरूरी है कि उनके माता-पिता द्वारा दिए गए अनुशासनात्मक सुझाव विरोध नहीं, बल्कि मार्गदर्शन हैं। 

हर विद्यार्थी का स्वभाव और क्षमताएँ अलग होती हैं। अतः सभी पर समान दबाव डालना अनुचित है। माता-पिता को यह समझना चाहिए कि बच्चों की तुलना किसी और से नहीं की जानी चाहिए, बल्कि उन्हें अपने व्यक्तिगत विकास और रुचि के आधार पर बढ़ने देना चाहिए। दूसरी ओर, विद्यार्थियों को यह सिखाया जाना भी आवश्यक है कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि नई शुरुआत का अवसर होती है। अनुशासन का संबंध मानसिक संतुलन से भी है। उचित नींद, संतुलित भोजन, खेलकूद और योगाभ्यास विद्यार्थियों को मानसिक रूप से सशक्त रखते हैं। जब मन शांत और संतुलित होगा, तभी अनुशासन का पालन भी सहज बनेगा।

वहीं शिक्षक का दायित्व केवल पाठ पढ़ाना नहीं है। वे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व और सोच का निर्माण करते हैं। शिक्षक वह आदर्श प्रस्तुत करते हैं जिसे विद्यार्थी अनजाने में अपनाते हैं। जब शिक्षक अपने व्यवहार और कार्यशैली में अनुशासन दिखाते हैं, तो विद्यार्थी भी उसे अपने जीवन में उतारने के लिए प्रेरित होते हैं। शिक्षकों को चाहिए कि वे अनुशासन को दंड के रूप में नहीं, बल्कि आत्म-विकास के साधन के रूप में प्रस्तुत करें। कठोर नियमों से भय नहीं, बल्कि स्नेह और संवाद से अनुशासन स्थापित किया जा सकता है। एक प्रेरणादायक शिक्षक विद्यार्थियों के भीतर आत्म-नियंत्रण, टीम भावना और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना जगाता है।

विद्यालय, परिवार और समाज मिलकर ही अनुशासन की सुदृढ़ नींव बना सकते हैं। यदि समाज में सफल व्यक्तियों को केवल धन या पद की दृष्टि से नहीं, बल्कि उनके चरित्र और अनुशासन के आधार पर सम्मान मिले, तो विद्यार्थी भी सही आदर्श अपनाने के लिए प्रेरित होंगे। शिक्षा व्यवस्था में भी अनुशासन को सिलेबस का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। केवल नियमों के रूप में नहीं, बल्कि व्यवहारिक अभ्यास के तौर पर। सामूहिक कार्य, सामाजिक सेवा और आत्म-अनुशासन संबंधी प्रायोगिक गतिविधियों से विद्यार्थी में जिम्मेदारी और आत्मसंयम की भावना विकसित की जा सकती है।

अनुशासन विद्यार्थी जीवन का सबसे विश्वसनीय साथी है। यह वह मूल्य है जो व्यक्ति को सफलता, सम्मान और आत्मनिर्भरता प्रदान करता है। माता-पिता यदि प्रेमपूर्वक दिशा दें, शिक्षक अनुशासन का आदर्श प्रस्तुत करें, और विद्यार्थी उसे आत्मसात करें, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहेगा। अनुशासन वही पुल है जो शिक्षा को व्यक्तित्व से जोड़ता है और सपनों को वास्तविकता में बदलता है। समाज को प्रगतिशील और जिम्मेदार नागरिकों की आवश्यकता है, और यह तभी संभव है जब विद्यार्थी जीवन में अनुशासन को अपनाया जाए. अनुशासन जीवन में सफलता की नींव है, जो विद्यार्थियों को ज्ञान, कौशल और चरित्र प्रदान कर उन्हें विश्व का नेतृत्व करने योग्य बनाता है. प्रत्येक छात्र को चाहिए कि वह अनुशासन की महत्ता को समझे और अपने जीवन में इसे अपनाकर समाज, राष्ट्र और स्वयं के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करे।  

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।