शुक्रवार, 26 अप्रैल 2024

चुनाव आयोग की नज़र में सब बराबर हों !

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक क्लिप काफ़ी चर्चा में था। इस क्लिप में दिखाया गया कि तेलंगाना राज्य में एक ग़रीब सब्ज़ी विक्रेता सड़क के किनारे अपनी छोटी सी दुकान लगाए बैठी थी। तभी एक रईसज़ादे ने उसके पीछे अपनी महँगी गाड़ी को कुछ इस तरह से पार्क कर दिया कि महिला की साड़ी का पल्लू गाड़ी के पिछले पहिये के नीचे दब गया। कुछ ही क्षण बाद जैसे ही महिला को इस बात का पता चला, तो वो गाड़ी मालिक से दुहाई करने लगी पर उसने एक न सुनी और एक भवन के अंदर चला गया। मजबूरी में उस महिला ने पुलिस से मदद माँगी। पुलिस ने भी काफ़ी प्रयास किया कि उसकी साड़ी का पल्लू किसी तरह से पहिये से मुक्त हो जाए। लेकिन पुलिस जो उपाय खोजा वह काफ़ी सराहनीय है।


पुलिस ने एक मिस्त्री बुलाया और गाड़ी में जैक लगा कर महिला के पल्लू को मुक्त करवा दिया। परंतु तेलंगाना की पुलिस ने इस मनचले को सबक़ सिखाने की भी सोची। पुलिसवाले उस गाड़ी के पहिये को उतरवा कर अपने साथ पुलिस थाने ले जाने लगे। जैसे ही गाड़ी का पहिया उतारा जा रहा था तभी वो मनचला हड़बड़ाता हुआ बाहर आया। पुलिस के इस एक्शन पर घबराहट में उनके पैरों में गिरने लगा और माफ़ी माँगने लगा। परंतु तेलंगाना पुलिस ने उसकी एक न सुनी और पहिया उतार कर अपने साथ थाने ले गई। इस बिगड़े मनचले के पास सिवाय अपना सर खुजाने के और कोई उपाय न था। शायद वो इस तरह से गाड़ी पार्क करने से पहले इंसानों की तरह सोचता तो ऐसा न होता। परंतु पैसे के घमंड में चूर इसे कुछ दिखाई नहीं दिया। यदि यहाँ पुलिस उस व्यक्ति से उलझती तो वो अवश्य अपने पैसे व रुतबे की धौंस दिखाता। ग़ौरतलब है कि इस पूरे वीडियो को सोशल मीडिया पर ‘स्क्रिप्टेड वीडियो’ या नाटकीय वीडियो कहा जा रहा है। परंतु जो भी हो वीडियो डालने वाले ने जो संदेश देना चाहा वह देश के अन्य राज्यों की पुलिस के लिए एक अच्छा उदाहरण बना।


चुनावों के मौसम में तेलंगाना के इस विडियो क्लिप से देश के केंद्रीय चुनाव आयोग को भी प्रेरणा लेनी चाहिए। सोशल मीडिया पर शायद ही कोई ऐसी राजनैतिक पार्टी होगी जिसने अपने चुनावी भाषण में किसी न किसी तरह से आचार संहिता व लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के नियमों का उल्लंघन न किया हो। परंतु जिस तरह भारत का चुनाव आयोग एक तरफ़ा कार्यवाही करते हुए दिखाई दे रहा है उससे तो यही लगता है कि चुनाव आयोग दोहरे मापदंड अपना रहा है। ईवीएम और वीवीपैट को लेकर चुनाव आयोग पहले से ही विवादों में है। इसके बाद से चुनावी भाषणों को लेकर चुनाव आयोग की एक तरफ़ा कार्यवाही एक बार फिर से पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषण व उनके बाद नियुक्त हुए कुछ चुनाव आयुक्तों की याद दिलाती है जो नियम और कायदों के पक्के माने जाते थे। चुनावों के मौसम में हर राजनैतिक दल चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, चुनाव आयोग से कभी नहीं उलझता था। परंतु बीते कुछ वर्षों में जिस तरह चुनाव आयोग की जग हसाई हुई है उससे यह प्रतीत होता है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं रहा। फिर वो चाहे चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के सुझावों की अनसुनी हो या किसी बड़े राजनैतिक दल द्वारा किए गए उल्लंघन की अनदेखी हो। चुनाव आयोग विवादों में बना ही रहा।


जब भी कभी कोई प्रतियोगिता आयोजित की जाती है तो उसका संचालन करने वाले शक के घेरे में न आएँ इसलिए उस प्रतियोगिता के हर कृत्य को सार्वजनिक रूप से किया जाता है। आयोजक इस बात पर ख़ास ध्यान देते हैं कि उन पर पक्षपात का आरोप न लगे। इसीलिए जब भी कभी आयोजकों को किसी कमी की शिकायत की जाती है या उन्हें कोई सकारात्मक सुझाव दिये जाते हैं तो यदि वे उन्हें सही लगें तो वे उसे स्वीकार लेते हैं। ऐसे में उन पर पक्षपात का आरोप भी नहीं लगता। ठीक उसी तरह एक स्वस्थ लोकतंत्र में होने वाली सबसे बड़ी प्रतियोगिता चुनाव हैं। उसके आयोजक यानी केंद्रीय चुनाव आयोग को उन सभी सुझावों व शिकायतों को खुले दिमाग़ से और निष्पक्षता से लेना चाहिए। चुनाव आयोग एक संविधानिक संस्था है, इसे किसी भी दल या सरकार के प्रति पक्षपात होता दिखाई नहीं देना चाहिए। यदि चुनाव आयोग ऐसे सुझावों और शिकायतों को जनहित में लेती है तो मतदाताओं के बीच भी एक सही संदेश जाएगा, कि चाहे ईवीएम पर गड़बड़ियों के आरोप लगें या आचार संहिता के नियमों का उल्लंघन की शिकायत हो, चुनाव आयोग किसी भी दल के साथ पक्षपात नहीं करेगा।

जिस तरह पहले चरण के चुनावों में मतदान के प्रतिशत कम होने के बाद कुछ राजनैतिक दल घबराहट में अपने भाषणों में ग़लत बयानी कर रहे हैं, चुनाव आयोग को इन सभी का स्वतः संज्ञान लेना चाहिए और नियम अनुसार उचित कार्यवाही करनी चाहिए। यदि चुनाव आयोग किसी भी राजनैतिक दल को उसके क़द और आकार को नज़रअंदाज़ कर नियम और क़ायदे के अनुसार उस पर कार्यवाही करेगा तो जनता के बीच चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा और बढ़ेगी। मतदाता को भी वोट करने पर गर्व होगा। यदि चुनाव आयोग ऐसा करता है तो आने वाले शेष चरणों में हो सकता है कि मतदान का प्रतिशत बढ़ भी जाए। यदि मतदाता का चुनाव मशीनरी से विश्वास डगमगाया तो नागालैंड जैसी स्थिति न पैदा हो जाए। जहां राज्य के छह पूर्वी जिलों में नौ घंटे इंतजार के बावजूद, क्षेत्र के चार लाख मतदाताओं में से एक भी वोटर मतदान करने नहीं आया। चुनाव आयोग को इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि चाहे आप कितने भी बड़े क्यों न हों, कानून आपसे ऊपर है। 


शुक्रवार, 19 अप्रैल 2024

हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया


1961 की बहुचर्चित फ़िल्म ‘हम दोनों’ का ये गाना सबने सुना होगा। धूम्रपान करने वाले सभी व्यक्तियों ने भी इस अवश्य सुना होगा। फ़िल्म में गाने के बोल इस तरह दर्शाये गये कि फ़िल्म का हीरो अपने सभी फ़िक्र और चिंताओं को धुएँ के कश में उड़ा देता है और चिंता मुक्त हो जाता है। परंतु क्या ये सही है कि मात्र सिग्रेट के कश भरने और धुआँ उड़ाने से आपकी चिंताएँ ख़त्म हो जाएँगी? इसका उत्तर है नहीं। बल्कि यदि आपको धूम्रपान की लत लग जाए तो आपकी स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ बढ़ ज़रूर जाएँगी।


आज जानते हैं कि ऐसा क्या है इस चंद लम्हे की मामूली सी ख़ुशी में, जो लाखों करोड़ों को इसकी लत लगा देती है। दरअसल सिग्रेट में मौजूद तंबाकू में निकोटीन पाया जाता है जो कश लेते ही बड़ी तेज़ी से यह धुआँ आपके फेंफड़े में समा जाता है और कुछ ही क्षण में दिमाग़ तक पहुँच जाता है। दिमाग़ में पहुँचते ही इसका संपर्क ‘नर्व सेल’ से होता है और इसके असर से डोपामाइन नाम का रसायन बाहर आता है। यह रसायन आपके दिमाग़ को संकेत देता है कि कुछ अच्छा करने से आपको इनाम मिल सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो, यह रसायन आपको ऐसा इशारा देता है कि आप एक बार दोबारा सिग्रेट का कश भर लेते हैं। एक शोध के अनुसार सिग्रेट की लत से प्रभावित लोगों को, जिन्हें गले का कैंसर हुआ था, उनकी गले की नली को काट कर अलग करना पड़ा। उपचार के बाद भी इस लत ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और वे दोबारा धूम्रपान करने को मजबूर थे।


सिग्रेट में मौजूद तंबाकू की लत अन्य नशीले पदार्थों की तरह ही होती है जिससे छुटकारा पाना आसान नहीं होता। विशेषज्ञों के अनुसार दिमाग़ के जिस हिस्से को ‘एनिमल पार्ट’ कहा जाता है उससे ही निकोटीन की लत पर क़ाबू पाया जा सकता है। नशीले पदार्थ हमारे दिमाग़ के ‘एनिमल पार्ट’ को इस कदर उकसाते हैं कि वो ऐसे संदेश भेजता है कि हम ऐसा बार-बार करें। वहीं दिमाग़ का दूसरा हिस्सा हमें ऐसा करने से रोकता भी है। नशे की लत की गिरफ़्त में लोग अक्सर इस संघर्ष से जूझते रहते हैं। इस लत का इस बात से कोई भी लेना-देना नहीं है कि आप कितने समझदार हैं। बल्कि आपका दिमाग़ निकोटीन या अन्य नशीले पदार्थों पर किस तरह प्रतिक्रिया देता है। यदि समय रहते और सही संगति के चलते नशा या धूम्रपान रोक दिया जाए तो बेहतर हो परंतु ऐसा बहुत कम होता है।


सिग्रेट की लत के लिए केवल निकोटीन ही ज़िम्मेदार नहीं होती। इसके लिए एक प्रमुख भूमिका सिग्रेट बनाने वाली कंपनियों और उनके द्वारा जारी किए भ्रामक विज्ञापन भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं। पश्चिमी देशों में जैसे ही निकोटीन की लत को लेकर सवाल उठने लगे तो कुछ लोगों ने इसकी जड़ तक जाने की सोची। उन्होंने वैज्ञानिक तरीक़ों से यह साबित कर दिया कि सिग्रेट के धुएँ में कुछ भी लाभदायक नहीं होता। इतना ही नहीं ये न केवल धूम्रपान करने वाले के लिए बल्कि उसके आस-पास के लोगों के लिए भी काफ़ी हानिकारक साबित हो सकता है। जैसे-जैसे यह अभियान तेज़ी पकड़ने लगा, धूम्रपान पर सार्वजनिक जगहों पर प्रतिबंध भी लगने लगा। इतना ही नहीं सिग्रेट पर अतिरिक्त और बढ़े हुए कर भी लगाए जाने लगे जिससे इसकी क़ीमत में भी बढ़ोतरी हुई। इसके साथ ही सिग्रेट के डब्बों पर भी स्वास्थ्य संबंधित चेतावनियाँ भी छापी जाने लगी।
         
परंतु इन सबके चलते भी पश्चिमी देशों की बड़ी-बड़ी सिग्रेट कंपनियों ने हार नहीं मानी। ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने की नीयत से इन कंपनियों ने विकासशील देशों और उन देशों का रुख़ करना शुरू कर दिया जहां नियम और क़ानून सख़्त नहीं थे। इन देशों में आम नागरिक धीरे-धीरे इन कंपनियों की मार्केटिंग के मायाजाल में बड़ी आसानी से फँस गये। देखते ही देखते इन कंपनियों की फिर से चाँदी होने लग गई। पर सोचने वाली बात यह है कि लोग धूम्रपान के आदी कैसे बन जाते हैं?


कुछ लोग सिग्रेट पीने को एक ‘स्टेटस सिंबल’ या सामाजिक स्थिति का संकेतक मानते हैं। वो समझते हैं कि धूम्रपान करना एक ऐसी आदत है जो किसी विशेष वर्ग में आपको बड़ी आसानी से स्थान देती है। परंतु इस स्थान पाने की होड़ में आप अपनी सेहत से खिलवाड़ कर लेते हैं। इस लत के चलते न सिर्फ़ आप अनी सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं परंतु अपने घरेलू बजट का भी नुक़सान कर रहे हैं। ज्यों-ज्यों आपकी यह लत बढ़ती जाएगी आपकी जेब पर भार भी बढ़ेगा। इतना ही नहीं धूम्रपान करने से मिलने वाले आंशिक ‘सुकून’ एक बड़ी मात्रा में आपके स्वास्थ्य पर असर करता है और यह जानलेवा भी साबित हो सकता है। इसलिए आप जब भी किसी धूम्रपान करते हुए व्यक्ति को देखें या स्वयं अगला कश लगाने लगें तो ये सवाल अवश्य पूछें कि क्या वास्तव में धूम्रपान करने से फ़िक्र धुएँ में उड़ रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं फ़िक्र उड़ने के बजाए और बढ़ रहे हैं?

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2024

नॉमिनी या बेनिफ़िशियरी कौन है असली उत्तराधिकारी?


जब भी आप किसी बैंक में अपना खाता खुलवाते हैं, किसी निवेश योजना में निवेश करते हैं या अपना जीवन बीमा करवाते हैं तो बैंक या बीमा कंपनी आपसे यह अवश्य पूछती है कि आपका नॉमिनी कौन होगा? आप उसी व्यक्ति को अपना नॉमिनी बनाते हैं जिसे आप चाहते हैं कि आपकी मृत्यु के बाद वह राशि मिले। परंतु क्या क़ानून के हिसाब से नॉमिनी को ही वह राशि मिलती है? क्या नॉमिनी ही आपके बाद आपकी राशि का उत्तराधिकारी बन सकता है? इसका जवाब है ‘नहीं’। क़ानूनी भाषा में नॉमिनी का मतलब उत्तराधिकारी नहीं होता। नॉमिनी वह व्यक्ति होता है जिसे आप अपनी मृत्यु के बाद आपकी राशि की देखभाल करने के लिए मनोनीत करते हैं। परंतु ज़्यादातर लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है कि नॉमिनी असली उत्तराधिकारी नहीं होता।


बैंक खातों में हमारी जमा पूँजी, शेयर मार्केट या म्यूचुअल फंड में निवेश, बीमा की राशि या अन्य किसी भी तरह का निवेश हो तो हमारी मृत्यु के बाद उसका नॉमिनी ही उसका उत्तराधिकारी बने यह बात क़ानूनी रूप से सही नहीं है। असली उत्तराधिकारी वह व्यक्ति होता है जो इस राशि का ‘बेनिफ़िशियरी’ यानी लाभार्थी हो। ऐसे में किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके द्वारा नामित नॉमिनी को मृत व्यक्ति की राशि मिलती तो ज़रूर है परंतु वह नॉमिनी उस राशि का इस्तेमाल नहीं कर सकता। वह केवल उस राशि की देखभाल कर सकता, वह भी तब तक जब तक उस राशि का लाभार्थी उस पर अपना दावा न करे। ऐसे में भारत के क़ानून काफ़ी स्पष्ट हैं कि किसी की मृत्यु के बाद, उसके धर्म के अनुसार, उस पर उत्तराधिकारी क़ानून की धाराओं के तहत ही उत्तराधिकारी तय किया जाता है।

मिसाल के तौर पर, हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 के तहत किसी भी पुरुष की मृत्यु के बाद प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी, उस पुरुष की पत्नी, बच्चे और माँ के बीच पूरी जायदाद व जमा पूँजी बटेगी। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि किसी की मृत्यु के बाद उसकी जमा पूँजी पर उसके नॉमिनी का हक़ नहीं होता, बल्कि उसके असली उत्तराधिकारियों का ही हक़ होता होता है। यदि उसका नॉमिनी भी इसी श्रेणी में आता हो, तो भी वह उस जमा पूँजी का संपूर्ण उत्तराधिकारी नहीं हो सकता। जब भी किसी की मृत्यु होती है और उसका नॉमिनी बैंक या बीमा कंपनी के पास मृत व्यक्ति के पैसे का दावा करने जाते हैं तो बैंक या बीमा कंपनी उनसे कोर्ट द्वारा दिये गये उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की माँग करता है। बिना इस प्रमाणपत्र के कोई भी बैंक या बीमा कंपनी यह राशि किसी को भी नहीं देती।


इससे यह बात तो स्पष्ट है कि नॉमिनी नहीं बल्कि बेनिफ़िशियरी (लाभार्थी) ही असली उत्तराधिकारी होता है। परंतु कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि नॉमिनी ही बेनिफ़िशियरी होता है। इसलिए आप जब भी अपनी जमा पूँजी के लिए किसी को नॉमिनी बनाएँ तो इस बात को सुनिश्चित कर लें कि आप सोच समझ कर ही ऐसा निर्णय ले रहे हैं। क्योंकि ऐसे कई कोर्ट केस सामने आए हैं जहां नॉमिनी और बेनिफ़िशियरी के बीच विवाद हुए हैं। बेनिफ़िशियरी को नॉमिनी से अपने हक़ का पैसा निकलवाने में काफ़ी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ऐसा कोई अपवाद है कि जहां नॉमिनी को ही लाभार्थी मान लिया जाए? बीमा कानून (संशोधन) अधिनियम, 2015 के तहत धारा 39(7) को जोड़ा गया। इस धारा के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए जहां अपने ही जीवन पर बीमा पालिसी का धारक अपने माता-पिता या अपने पति या अपनी पत्नी या अपने बच्चों या अपने पति या अपनी पत्नी और बच्चों या उनमें से किसी को नामनिर्देशित करता है वहां नामनिर्देशिती बीमाकर्ता द्वारा उपधारा (6) के अधीन उसे या उनको संदेय रकम के फायदा पाने का हकदार होगा या होंगे। यह नियम केवल बीमा स्कीम में ही लागू होगा अन्य किसी भी वित्तीय योजना पर नहीं।


इसके साथ इस पूरे मामले में एक अपवाद और भी है, वह है आपकी वसीयत। आपकी वसीयत या ‘विल’ को ही आपकी अंतिम इच्छा माना जाता है। इसमें आप अपने जीवन में कमाई तमाम पूँजी व जायदाद का ज़िक्र करते हैं। इसमें आप अपनी मृत्यु के पश्चात, अपनी इच्छा अनुसार अपनी संपत्ति को जिसे चाहें दे सकते हैं। यदि आप अपनी वसीयत में ही यह बात स्पष्ट कर दें कि जहां-जहां आपने जिस-जिस व्यक्ति को जमा पूँजी का नॉमिनी बनाया हुआ है वही उस पूँजी का लाभार्थी भी हो तो इसमें किसी भी तरह का कोई विवाद नहीं उठ सकता। भारत के क़ानून के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की वसीयत है तो उसे ही उसकी अंतिम इच्छा मान कर बटवारा किया जाएगा। यदि किसी की कोई वसीयत न हो, तो उसी स्थिति में उत्तराधिकार अधिनियम लागू होगा।


इसलिए यदि आप चाहते हैं कि आप अपने प्रियजनों को अपनी इच्छा अनुसार अपनी कमाई पूँजी अपनी मृत्यु के बाद बाँटे तो अपने जीवन काल में ही अपनी वसीयत को सोच समझ कर लिख दें। वसीयत के गवाह भी किसी ऐसे व्यक्ति को बनाएँ जो आपके द्वारा इंगित लाभार्थीयों को स्वीकार्य हों। हर परिवार में घर के मुखिया की मृत्यु के बाद ही पूँजी और जायदाद को लेकर विवाद होते हैं। परंतु यदि किसी ने सही समय पर उचित बटवारा किया हो और उसे अपनी वसीयत में लिख दिया हो तो ऐसे में इस तरह के विवाद नहीं होते। इसलिए सही उत्तराधिकारी को ही चुनें और सही समय पर ही अपनी वसीयत करें।

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

ईवीएम-वीवीपैट: मतदाताओं को है जानने का हक़


पिछले दिनों देश की शीर्ष अदालत ने एक जनहित याचिका का संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। नोटिस में अदालत ने चुनाव आयोग से पूछा कि भारत की चुनाव प्रणाली में इस्तेमाल की जाने वाली ‘इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन’ (ईवीएम) और उसके साथ जुड़ी ‘वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल’ (वीवीपैट) मशीन का शत प्रतिशत मिलान क्यों न किया जाए? चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की दृष्टि से याचिकाकर्ता की इस माँग को उचित मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये नोटिस जारी किया। विपक्षी दलों द्वारा इस मिलान की माँग काफ़ी समय से की जा रही है। परंतु न तो चुनाव आयोग और न ही शीर्ष अदालत ने इन माँगों पर ध्यान दिया। सभी को यही लगता था कि जब भी विपक्ष चुनाव हारता है तभी ईवीएम पर शोर मचाता है।


ऐसा नहीं है कि किसी एक दल के नेता ही ईवीएम की गड़बड़ी या उससे छेड़-छाड़ का आरोप लगाते आए हैं। इस बात के अनेकों उदाहरण हैं जहां हर प्रमुख दलों के नेताओं ने कई चुनावों के बाद ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप लगाया है। चुनाव आयोग की बात करें तो वो इन आरोपों का शुरू से ही खंडन कर रहा है। आयोग के अनुसार ईवीएम में गड़बड़ी की कोई गुंजाइश ही नहीं है। 1998 में दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश के विधान सभा की कुछ सीटों पर ईवीएम का इस्तेमाल हुआ था। परंतु 2004 के आम चुनावों में पहली बार हर संसदीय क्षेत्र में ईवीएम का पूरी तरह से इस्तेमाल हुआ। 2009 के चुनावी नतीजों के बाद इसमें गड़बड़ी का आरोप भाजपा द्वारा लगा। ग़ौरतलब है कि दुनिया के 31 देशों में ईवीएम का इस्तेमाल हुआ परंतु ख़ास बात यह है कि अधिकतर देशों ने इसमें गड़बड़ी कि शिकायत के बाद वापस बैलट पेपर के ज़रिये ही चुनाव किये जाने लगे।


वीवीपैट व्यवस्था के तहत वोट डालने के तुरंत बाद काग़ज़ की एक पर्ची छपती है। इस पर्ची पर वोटर द्वारा जिस उम्मीदवार को वोट दिया गया है, उनका नाम और चुनाव चिह्न छपा होता है। इससे वोटर को इस बात की संतुष्टि हो जाती है कि उसने जिसे वोट दिया उसी को वोट मिला। इसके साथ ही किसी भी तरह के विवाद की स्थिति में ईवीएम में पड़े वोटों का इन पर्चियों से मिलान भी किया जा सके। 2013 में वीवीपैट को भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड द्वारा बनाया गया था। 2014 में चुनाव आयोग ने यह निर्णय लिया कि 2019 के आम चुनावों में सभी इवीएम के साथ वीवीपैट का इस्तेमाल हो। ईवीएम में गड़बड़ी की आशंका को दूर रखने की मंशा से फिलहाल हर निर्वाचन क्षेत्र की किसी भी 5 रैंडम ईवीएम का ही वीवीपैट से मिलान होता है।    


याचिका में माँग की गई कि भारत के चुनाव आयोग ने लगभग 24 लाख वीवीपैट खरीदने के लिए 5 हजार करोड़ रुपये खर्च किए हैं, परंतु केवल 20,000 वीवीपैट की पर्चियों का ही मिलान होता है। जनता के कर से दिये गये पैसों से बनी इन मशीनों का जब सभी मतदान केंद्रों पर इस्तेमाल होता है तो इसका मिलान करने में दिक़्क़त क्या है? आख़िर मतदाता को इस बात की जानकारी लेने का पूरा हक़ है कि उसके द्वारा दिये गये वोट, उसी के द्वारा चुने गये उम्मीदवार को मिले किसी अन्य को नहीं। याचिका में कहा गया है कि चुनाव न केवल निष्पक्ष होना चाहिए बल्कि निष्पक्ष दिखना भी चाहिए क्योंकि सूचना के अधिकार को भारत के संविधान के आर्टिकल 19(1)(ए) और 21 के संदर्भ में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हिस्सा माना गया है। कोर्ट ने इसी अधिकार के तहत इस याचिका को स्वीकार किया और नोटिस जारी किया।


जब भी कभी कोई प्रतियोगिता होती है तो उसका संचालन करने वाले शक के घेरे में न आएँ इसलिए उस प्रतियोगिता के हर कृत्य को सार्वजनिक रूप से किया जाता है। आयोजक इस बात पर ख़ास ध्यान देते हैं कि उन पर पक्षपात का आरोप न लगे। इसीलिए जब भी कभी आयोजकों को कोई सुझाव दिये जाते हैं तो यदि वे उन्हें सही लगें तो उसे स्वीकार लेते हैं। ऐसे में उन पर पक्षपात का आरोप नहीं लगता। ठीक उसी तरह एक स्वस्थ लोकतंत्र में होने वाली सबसे बड़ी प्रतियोगिता चुनाव हैं। उसके आयोजक यानी चुनाव आयोग को उन सभी सुझावों को खुले दिमाग़ से और निष्पक्षता से लेना चाहिए। चुनाव आयोग एक संविधानिक संस्था है, इसे किसी भी दल या सरकार के प्रति पक्षपात होता दिखाई नहीं देना चाहिए। यदि चुनाव आयोग ऐसे सुझावों को जनहित में लेती है तो मतदाताओं के बीच भी एक सही संदेश जाएगा, कि चाहे ईवीएम पर गड़बड़ियों के आरोप लगें पर चुनाव आयोग किसी भी दल के साथ पक्षपात नहीं करता।

यदि ईवीएम की गुणवत्ता पर और उसकी कार्य पद्धति पर चुनाव आयोग को पूरा विश्वास है तो इस याचिका पर अपनी प्रतिक्रिया सर्वोच्च अदालत में अविलंब दे देनी चाहिए। इसके साथ ही संपूर्ण वीवीपैट के मिलान की माँग पर एक समयबद्ध ऑनलाइन सर्वेक्षण भी करा लेना चाहिए। इससे यदि मतदाता को भी कुछ सुझाव देने होंगे तो वो भी चुनाव आयोग के पास आ जाएँगे। ऐसे में निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए जाने जाने वाली संस्था भी जनता के बीच अपना पक्ष रख पाएगी। यदि चुनाव आयोग को याचिका की माँगों पर आपत्ति नहीं है तो आगामी लोकसभा चुनावों में ऐसा प्रयोग कर ही लेना चाहिए। ऐसा करने से दूध का दूध और पानी का पानी सामने आ जाएगा। इतना ही नहीं भारत जैसे मज़बूत लोकतंत्र को और मज़बूती भी मिलेगी।