शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

भारत के विमानन क्षेत्र को सुरक्षित कैसे बनाया जाए?

हाल ही में निजी चार्टर विमानन कंपनियों से जुड़ी विमान दुर्घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया है। महाराष्ट्र के बरामती में 28 जनवरी 2026 को एक निजी चार्टर कंपनी के लीअरजेट क्रैश में पांच लोगों की मौत, जिसमें उप-मुख्यमंत्री अजित पवार शामिल थे, ने निजी चार्टर क्षेत्र की कमियों को उजागर कर दिया है। इसी तरह कुछ दिन पहले झारखंड में एयर एम्बुलेंस क्रैश और अंडमान में हेलीकॉप्टर हादसे ने भी कई सवाल खड़े किए हैं कि आखिर नॉन-स्केड्यूल्ड ऑपरेटर्स परमिट (NSOP) धारक कंपनियां सुरक्षा मानकों की अनदेखी क्यों कर रही हैं?
 

जहाँ एक ओर भारत में निजी चार्टर विमानन क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है, वहीं इस क्षेत्र में सुरक्षा मानकों का पालन ठीक से नहीं हो रहा। डीजीसीए की ऑडिट में पाया गया कि एक निजी चार्टर कंपनी में एयरवर्थिनेस, फ्लाइट ऑपरेशंस और मेंटेनेंस में गंभीर उल्लंघन थे, जिसके चलते चार विमान ग्राउंड कर दिए गए। गौरतलब है कि पिछले एक दशक में 20 से अधिक दुर्घटनाएं NSOP ऑपरेटर्स से जुड़ी पाई गईं, जिनकी मुख्य वजहें स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर्स का पालन न करना, अपर्याप्त फ्लाइट प्लानिंग और ट्रेनिंग की कमी रही हैं। उल्लेखनीय है कि प्राइवेट चार्टर कंपनियों द्वारा पुराने विमानों का रखरखाव न करना, फ्यूल लॉग्स में हेरफेर और अनधिकृत उड़ानें आम हैं। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी ख़ामियाँ व्यावसायिक दबाव के कारण ही होती हैं।
 

अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी है जो 193 देशों को आपसी सहयोग और साझा हवाई परिवहन के माध्यम से पारस्परिक लाभ प्राप्त करने में मदद करती है। भारत में भी निजी चार्टर कंपनियां ICAO और डीजीसीए दिशानिर्देशों पर आधारित हैं। लेकिन अफ़सोस की बात है कि इनका पूर्ण अनुपालन नहीं होता। क्योंकि इस क्षेत्र में काफ़ी विविधता है, कॉर्पोरेट ट्रैवल से लेकर पर्यटन तक। ऑपरेटर्स न्यूनतम अनुपालन पर ही टिके रहते हैं, जबकि इन कंपनियों से भी शेड्यूल्ड एयरलाइंस जैसे उच्च मानक अपेक्षित हैं। सेफ्टी मैनेजमेंट सिस्टम प्रक्रियागत है, न कि भविष्यवाणी करने वाला। परंतु देखा गया है कि डीजीसीए की कमजोर निगरानी के कारण निजी चार्टर ऑपरेटर्स स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर्स को बड़े आराम से नजरअंदाज कर देते हैं, खासकर घने कोहरे या खराब मौसम में।
 

जानकारों की मानें तो डीजीसीए में बढ़ता हुआ भ्रष्टाचार सुरक्षा मानदंडों को कमजोर कर रहा है। हाल ही में कैप्टन अनिल गिल जैसे वरिष्ठ अधिकारी पर उड़ान प्रशिक्षण संगठनों (FTOs) से रिश्वत लेने के आरोप लगे, जिसमें विमान सस्ते में लेना और ऑडिट में छूट देना शामिल था। पुराने मामलों में भी जॉइंट डायरेक्टर जनरल के पदों पर तैनात अधिकारियों पर फ्लाइंग स्कूलों को अनियमित एक्सटेंशन देने के आरोप सिद्ध हुए। यह भ्रष्टाचार सुरक्षा उल्लंघनों को बढ़ावा देता है, क्योंकि ऑपरेटर्स रिश्वत देकर मानक टाल देते हैं। जिससे विमान यात्रा और यात्रियों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है।  
 
गौरतलब है कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीन डीजीसीए में 50% से अधिक स्टाफ की कमी है। डीजीसीए में 1630 पदों पर केवल 829 ही भरे हैं। इनमें एयरवर्थिनेस विंग में 44 और एयर सेफ्टी विंग में 30 वैकेंसी हैं। इन सबका कारण स्पष्ट है, स्वायत्तता की कमी, जो निर्णय लेने में देरी करती है। वहीं संघ लोक सेवा आयोग व स्टाफ सिलेक्शन कमीशन द्वारा भर्ती में देरी, आकर्षक वेतन का न होना और विशेषज्ञ पायलट/इंस्पेक्टर्स का न मिलना भी एक अहम कारण है। दूसरी ओर कॉन्ट्रैक्ट स्टाफ पर निर्भरता जवाबदेही को घटाती है, जिससे निगरानी कमजोर पड़ती है।
 

विदेशों की तरह भारत में भी निजी चार्टर क्षेत्र को सुरक्षित बनाने के लिए ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अपनानी होगी। हाल ही के हादसों के बाद डीजीसीए ने कमर कसी और NSOP ऑपरेटर्स के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं। जैसे कि वेबसाइट पर विमान, पायलट डिटेल्स और सेफ्टी रैंकिंग अनिवार्य करना; कॉकपिट वॉइस रिकॉर्डर/फ्लाइट डेटा का ऑडिट बढ़ाना; पायलटों को सुरक्षा आधार पर फ्लाइट कैंसल करने का पूर्ण अधिकार देना। पुराने विमानों पर सख्त जांच करना, मैनेजमेंट की व्यक्तिगत जिम्मेदारी और लाइसेंस सस्पेंशन जैसे कदम उठाना। मानकीकृत नियमों को एयरलाइंस स्तर का बनाना, फ्लाइट डेटा मॉनिटरिंग अनिवार्य करना। यह ‘कड़े’ नियम यदि सख्ती से लागू किए जाएँ तो शायद ही कोई निजी चार्टर कंपनी इस क्षेत्र में बनी रह पाएगी। यहाँ पर एक अहम सवाल यह भी उठता है कि क्या डीजीसीए के पास इन नियमों को लागू करवाने के लिए योग्य और अनुभवी विशेषज्ञ हैं? इसका उत्तर है ‘नहीं’। कल्पना कीजिए कि यदि किसी विमान हादसे या विमान कंपनी द्वारा की जी अनियमितता की जांच डीजीसीए का कोई ऐसा अधिकारी करे जिसे प्रशासन चलाने का अनुभव तो हो परंतु एविएशन उद्योग का अनुभव न के बराबर हो। जो व्यक्ति किसी अन्य मंत्रालय से स्थानांतरण हो कर आया हो वो इस संवेदनशील क्षेत्र के बारे में क्या ही जानता होगा? नतीजतन योग्यता के ऊपर भ्रष्टाचार हावी हो जाएगा।     
 
इसलिए सरकार को इस बात पर विचार करना चाहिए कि डीजीसीए को स्वायत्त भर्ती अधिकार दिए जाएँ। विशेषज्ञों के लिए बाजार-आधारित वेतन और ट्रेनिंग प्रदान की जाए। भ्रष्टाचार रोकने के लिए सीबीआई जैसी एजेंसियों से सतत जांच और व्हिसलब्लोअर की सुरक्षा सुनिश्चित करें। भारत का विमानन क्षेत्र दुनिया का सबसे तेज बढ़ने वाला क्षेत्र है, लेकिन अभी भी निजी चार्टर में सुरक्षा की लापरवाही घातक साबित हो रही है। सरकार, डीजीसीए और ऑपरेटर्स मिलकर सुधार करें तो ही यात्रियों का भरोसा बहाल हो सकेगा। भ्रष्टाचार मुक्त, विशेषज्ञों से लैस डीजीसीए और कड़े अनुपालन से नागरिक उड्डयन क्षेत्र सुरक्षित बनेगा। समय रहते कदम उठाएं, वरना और हादसे होंगे और पूरी दुनिया के आगे भारत शर्मसार होता रहेगा। 

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।
 

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

एआई: जीवनसाथी या रचनात्मकता का शत्रु?

आजकल कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है। स्मार्टफोन से लेकर स्मार्ट होम तक, हर जगह एआई की छाप दिखाई देती है। इस सप्ताह नई दिल्ली में शुरू हुए अंतरराष्ट्रीय एआई प्रभाव शिखर सम्मेलन में विश्व के नेता और विशेषज्ञ इसी पर चर्चा कर रहे हैं। इस शिखर सम्मेलन का उद्देश्य एआई के वैश्विक प्रभावों को समझना और नीतियां बनाना है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हम एआई को अपनाते हुए अपनी स्वतंत्रता और रचनात्मकता को खो नहीं रहे? एआई ने सुविधाएं तो दी हैं, लेकिन साथ ही हमें इतना आश्रित बना दिया है कि बिना इसके सोचना भी मुश्किल हो गया है। सोचने वाली बात यह भी है कि कैसे एआई जीवन को सरल बना रहा है, लेकिन रचनात्मकता को नष्ट कर रहा है।


एआई की निर्भरता अब दैनिक जीवन का हिस्सा बन गई है। कल्पना कीजिए, सुबह उठते ही गूगल असिस्टेंट या सिरी आपको मौसम, ट्रैफिक और समाचार बता देता है। कार्यालय में ईमेल लिखने से लेकर डेटा विश्लेषण तक, चैटजीपीटी जैसे टूल्स सब कुछ तुरंत कर देते हैं। भारत में, जहां डिजिटल इंडिया अभियान ने 80 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता पैदा किए हैं, एआई आधारित ऐप्स जैसे उबर, जोमैटो, ब्लिंकिट आदि ने जीवन को अभूतपूर्व सरलता प्रदान की है। दिल्ली में चल रहे अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन में अमेरिकी विशेषज्ञों ने बताया कि एआई ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में 15 ट्रिलियन डॉलर का योगदान दिया है, लेकिन यह निर्भरता खतरनाक साबित हो रही है। एक सर्वे के अनुसार, 70% युवा बिना एआई टूल्स के रिसर्च नहीं कर पाते। समस्या तब गंभीर हो जाती है जब बिजली चली जाए या इंटरनेट कनेक्टिविटी बाधित हो जाए तो लोग हतप्रभ रह जाते हैं।

यह निर्भरता शिक्षा क्षेत्र में सबसे अधिक दिखाई दे रही है। छात्र अब निबंध लिखने के बजाय एआई से कॉपी-पेस्ट कर लेते हैं। कोटा के कोचिंग संस्थानों से लेकर आईआईटी तक, एआई टूल्स ने होमवर्क को आसान बना दिया, लेकिन समझ की गहराई कम कर दी। शिखर सम्मेलन के एक सत्र में यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी कि एआई जनित सामग्री से छात्रों की आलोचनात्मक सोच 30% घटी है। भारत में एनसीईआरटी ने एआई उपयोग पर दिशानिर्देश जारी किए हैं, लेकिन फ़िलहाल इसका अमल कमजोर है। परिणामस्वरूप, आने वाली पीढ़ी समस्या-समाधान के बजाय ‘प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग’ सीख रही है, यानी एआई को सही सवाल कैसे पूछें। यह निर्भरता मानसिक आलस्य को जन्म दे रही है, जहां स्वयं सोचने की क्षमता क्षीण हो रही है।

एआई का सबसे घातक प्रभाव रचनात्मकता पर पड़ रहा है। पहले कलाकार, लेखक और संगीतकार अपनी कल्पना से कृतियां रचते थे। अब मिडजर्नी या डैल-ई जैसे टूल्स प्रॉम्प्ट पर चित्र बना देते हैं, वो भी सुंदरता भरे। लेकिन क्या यह रचनात्मकता है? शिखर सम्मेलन में भारतीय कलाकारों ने प्रदर्शन किया कि एआई जनित कला में आत्मा का अभाव है। यह डेटा पर आधारित नकल मात्र है। उदाहरणस्वरूप, बॉलीवुड में एआई स्क्रिप्ट राइटर आ रहे हैं, जो पुरानी फिल्मों के पैटर्न दोहराते हैं। नतीजा? नवीनता का लोप। एक अध्ययन बताता है कि एआई सहायता से बनी कहानियां 40% कम मूल होती हैं। लेखन में भी यही समस्यादिखाई दी जाती है। एआई से उत्पन्न संपादकीय या कविताएं सतही लगती हैं, क्योंकि उनमें व्यक्तिगत अनुभव का पुट नहीं।

रचनात्मकता नष्ट होने का एक कारण एआई की ‘परफेक्शन’ है। यह त्रुटिरहित उत्तर देता है, जिससे मानव प्रयास कमजोर लगने लगते हैं। कल्पना कीजिए एक चित्रकार को, वह घंटों ब्रश चलाता है, गलतियां सुधारता है और यही प्रक्रिया रचनात्मकता को परिपक्व बनाती है। परंतु एआई में यह संघर्ष नहीं होता। शिखर सम्मेलन के दौरान रिलीज हुई एक रिपोर्ट में कहा गया कि एआई ने वैश्विक पेटेंट आवेदनों में 25% वृद्धि की, लेकिन अधिकांश ‘इंक्रीमेंटल’ हैं, यानी नई खोजें कम हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां स्टार्टअप संस्कृति फल-फूल रही है, एआई निर्भरता नवाचार को कुचल सकती है। उदाहरण के तौर पर, फिनटेक क्षेत्र में एआई एल्गोरिदम ऋण स्वीकृति करते हैं, लेकिन सृजनात्मक समाधान गायब हैं।

इसके अलावा, एआई नैतिक दुविधाओं को भी जन्म दे रहा है। डीपफेक वीडियो से राजनीतिक हेरफेर भी हो रहे हैं। 2024 के अमेरिकी चुनावों में एआई ने काफ़ी अफवाहें फैलाईं। इसे देखते हुए भारत में भी आगामी चुनावों से पहले सतर्कता बरतना सार्थक बन जाता है। शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने एआई के ‘जिम्मेदार उपयोग’ पर जोर दिया, लेकिन निर्भरता रोकने के उपाय कम चर्चित हुए। क्या हम एआई को मास्टर बना लेंगे?

एआई की निर्भरता का एक नमूना आज हर घर में दिखाई देता है। बच्चे आजकल हर ज़रूरत का सामान ऑनलाइन मंगवा लेते हैं। दुकान पर जाए बिना, किसी वस्तु की गुणवत्ता व मोल-भाव का युग अब बहुत कम दिखाई देता है। मुझे याद है हमारे बचपन में हमें बाज़ार भेजा जाता था और किसी भी वस्तु को खरीदने के बाद सही हिसाब से बच्चे हुए पैसे वापिस लेने में जो संतोष मिलता था उसका अपना ही आनंद था। परंतु आजकल के बच्चों में यह दिखाई नहीं देता। 

ऐसे में इसका समाधान क्या है? सबसे पहले, शिक्षा में एआई को सहायक न मानकर चुनौती बनाएं। स्कूलों में ‘एआई-मुक्त’ घंटे रखें, जहां बच्चे स्वयं रचें। दूसरा, नीतियां बनाएं; जैसे यूरोप का जीडीपीआर, जो एआई पारदर्शिता सुनिश्चित करता है। भारत को शिखर सम्मेलन से प्रेरणा लेनी चाहिए और ‘एआई साक्षरता’ अभियान चलाना चाहिए। तीसरा, रचनाकारों को प्रोत्साहित करें, उन्हें सरकारी अनुदान दें जो एआई-रहित कला को बढ़ावा दें। व्यक्तिगत स्तर पर, हमें ‘डिजिटल डिटॉक्स’ को भी अपनाना होगा। एआई जीवन का हिस्सा बने रहना चाहिए, लेकिन इस पर निर्भरता और रचनात्मक विनाश को रोकना होगा। रचनात्मकता मानव का मूल गुण है, इसे बचाना हमारा कर्तव्य है।


*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

पुलिस की मनमानी गिरफ्तारियों पर रोक लगाता सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में पुलिस की मनमानी गिरफ्तारियों पर सख्त अंकुश लगाया है। यह फैसला उन अपराधों से संबंधित है जहां सजा की अधिकतम अवधि सात साल तक की कैद है। सतेंद्र कुमार एंटिल बनाम सीबीआई मामले में न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारी अपवाद है, जबकि नोटिस जारी करना नियम। यह निर्णय न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार लाएगा, बल्कि आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करेगा। फैसले के बाद इस मामले की पृष्ठभूमि, कानूनी प्रावधानों, गिरफ्तारी की आवश्यकता और आम नागरिकों पर इसके प्रभाव पर चर्चा होने लगी है। जिससे कि नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जा रहा है।


पहले समझते हैं कि यह फैसला ऐतिहासिक क्यों है। भारत में आपराधिक न्याय प्रणाली में गिरफ्तारी एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी का अधिकार था, लेकिन इसका अक्सर दुरुपयोग होता था। विशेष रूप से कम गंभीर अपराधों में, जहां सजा सात साल से कम थी, पुलिस बिना सोचे-समझे लोगों को हिरासत में ले लेती थी। इससे न केवल जेलों में भीड़ बढ़ती थी, बल्कि निर्दोष नागरिकों का जीवन बर्बाद होता था। 2014 में अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार दिशानिर्देश जारी किए थे, जिसमें कहा गया था कि ऐसे अपराधों में गिरफ्तारी निश्चित नहीं होनी चाहिए। पुलिस को पहले जांच करनी चाहिए और गिरफ्तारी केवल आवश्यक होने पर ही करनी चाहिए।

लेकिन अब नई व्यवस्था में, 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) ने इस प्रक्रिया को और मजबूत किया है। बीएनएसएस धारा 35 सीआरपीसी की धारा 41 का स्थान लेती है, जबकि बीएनएसएस धारा 35(3) सीआरपीसी की धारा 41ए के समान है। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 35 भी गिरफ्तारी से संबंधित है, लेकिन मुख्य रूप से प्रक्रियात्मक पहलू बीएनएसएस में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीएनएसएस धारा 35(1) पुलिस को गिरफ्तारी का अधिकार देती है, लेकिन शब्द "मे" (may) का प्रयोग दर्शाता है कि यह विवेकाधीन है, न कि अनिवार्य। धारा 35(1)(बी) में कहा गया है कि पुलिस को विश्वास होना चाहिए कि आरोपी ने अपराध किया है और गिरफ्तारी जांच के लिए जरूरी है। लेकिन धारा 35(3) के तहत पुलिस द्वारा पहले नोटिस जारी करना अनिवार्य है, जिसमें आरोपी को पुलिस स्टेशन में हाजिर होने और सहयोग करने को कहा जाता है।


सवाल है कि क्या गिरफ्तारी आवश्यक है? इस पर सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट उत्तर है - ‘नहीं, यह अपवाद है।’ फैसले में कहा गया कि सात साल तक की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी केवल तब की जा सकती है जब आरोपी नोटिस का पालन न करे, या जांच में बाधा डाले, सबूतों से छेड़छाड़ करे, गवाहों को प्रभावित करे, या अदालत में पेश न होने का खतरा हो। पुलिस को गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे। यदि नोटिस के बाद भी आरोपी सहयोग करता है, तो गिरफ्तारी की कोई जरूरत नहीं। यह अर्नेश कुमार फैसले की भावना को दोहराता है, जहां कोर्ट ने कहा था कि गिरफ्तारी जांच का साधन है, न कि सजा। बीएनएसएस धारा 35(6) गिरफ्तारी को धारा 35(1)(बी) के साथ जोड़ती है, लेकिन कोर्ट ने जोर दिया कि पुलिस को सतर्क रहना चाहिए और गिरफ्तारी को अंतिम विकल्प ही मानना चाहिए।


ऐसे में यह फैसला आम नागरिकों के लिए क्या मायने रखता है? सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि अब पुलिस की मनमानी कम होगी। पहले, छोटे-मोटे अपराधों जैसे धोखाधड़ी, मारपीट या संपत्ति विवाद में लोग रातोंरात जेल में डाल दिए जाते थे, जिससे उनका करियर, परिवार और सम्मान प्रभावित होता था। लेकिन अब, नोटिस मिलने पर नागरिक पुलिस के समक्ष पेश होकर अपना पक्ष रख सकते हैं, बिना हिरासत में लिए। इससे जेलों में अनावश्यक भीड़ कम होगी। उल्लेखनीय है कि भारत में जेलों की क्षमता से 130% अधिक कैदी हैं, जिनमें से अधिकांश विचाराधीन हैं। यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूत करता है। महिलाओं, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों के लिए यह विशेष रूप से फायदेमंद है, क्योंकि वे गिरफ्तारी के दौरान अधिक शोषण का शिकार होते हैं।


लेकिन इस फैसले का असली लाभ तभी मिलेगा जब नागरिक अपने अधिकारों से अवगत होंगे। आम आदमी को पता होना चाहिए कि यदि अपराध सात साल से कम सजा वाला है, तो पुलिस सीधे गिरफ्तार नहीं कर सकती। ऐसे में आपको नोटिस मिलने पर आप क्या करें? सबसे पहले, नोटिस को ध्यान से पढ़ें, इसमें अपराध का विवरण, हाजिर होने की तारीख और समय होता है। एक वकील से सलाह लें और पुलिस स्टेशन जाएं। यदि आप जाँच में पुलिस का सहयोग करते हैं, तो गिरफ्तारी की संभावना कम है। यदि पुलिस बिना नोटिस गिरफ्तार करने की कोशिश करे, तो आप इसे कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को चेतावनी दी है कि दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने पर अधिकारी दंडित हो सकते हैं। नागरिकों को यह भी जानना चाहिए कि बीएनएसएस में इलेक्ट्रॉनिक नोटिस (जैसे व्हाट्सएप) अमान्य हैं; नोटिस व्यक्तिगत रूप से या डाक से ही दिया जाना चाहिए।


हालांकि, इस फैसले की कुछ सीमाएं भी हैं। गंभीर अपराधों (सात साल से अधिक सजा वाले) में गिरफ्तारी अभी भी आसान है और पुलिस दुरुपयोग कर सकती है। जांच की गुणवत्ता में सुधार के बिना, अपराधी बच सकते हैं। फिर भी, यह न्यायिक सक्रियता का उदाहरण है, जो पुलिस सुधार की दिशा में एक कदम है। सरकार को पुलिस प्रशिक्षण और जागरूकता अभियान चलाने चाहिए।सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लोकतंत्र की मजबूती है, जहां नागरिक पुलिस से डरें नहीं, बल्कि सहयोग करें। हर नागरिक को अपने अधिकार जानने चाहिए, गिरफ्तारी कोई सजा नहीं, बल्कि जांच का हिस्सा है। यदि हम जागरूक होंगे, तो न्याय व्यवस्था अधिक निष्पक्ष बनेगी। यह फैसला हमें याद दिलाता है कि कानून सबके लिए समान है और स्वतंत्रता हमारा मौलिक हक।


*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: आर्थिक लाभ या जोखिम?

केंद्रीय बजट के बाद जिस तरह से सोने-चाँदी में भारी गिरावट दिखाई दी, उससे निवेशक अभी संभले ही नहीं थे कि हाल ही में घोषित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते ने वैश्विक व्यापार जगत को हिला दिया है। सोशल मीडिया पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा की गई घोषणा के अनुसार, भारत से आयातित वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया गया है, जबकि भारत ने अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ को शून्य करने और रूसी तेल खरीद कम करने का वादा किया है। यह समझौता भारत की अर्थव्यवस्था के लिए मिश्रित परिणाम ला सकता है, जहां निर्यात को बढ़ावा मिलेगा लेकिन कृषि प्रधान देश भारत में, कृषि के क्षेत्र में चुनौतियां अवश्य सामने आएँगी।

माना जाता है कि यह समझौता जुलाई 2025 से चले टैरिफ युद्ध का परिणाम है, जब अमेरिका ने रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर 25% दंडात्मक टैरिफ लगाया था। इस समझौते के बाद अब कुल प्रभावी टैरिफ 18% रहेगा, जो वियतनाम (20%) और चीन (34%) से बेहतर है। समझौते के दावों के अनुसार भारत ने अमेरिकी ऊर्जा, रक्षा, कृषि उत्पादों पर 500 अरब डॉलर की खरीद का वचन दिया है, जिसमें पेट्रोलियम, डेयरी और नट्स शामिल हैं। हालांकि, पूर्ण विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है, केवल सोशल मीडिया पोस्ट और अधिकारियों के बयानों पर ही तमाम ख़बरें और विश्लेषण आ रहे हैं।


उल्लेखनीय है कि यह समझौता भारत के निर्यात को बढ़ावा अवश्य दे सकता है। खासकर वस्त्र, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग उत्पादों में। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, अमेरिकी बाजार में प्रवेश से भारत की जीडीपी में 0.6% वृद्धि से 7.4% तक पहुंच सकती है। सीईए वी. अनंता नागेश्वरन के अनुसार यह समझौता निवेशकों का भरोसा बढ़ाएगा और रुपये को स्थिर भी कर सकेगा। हालांकि, अमेरिकी आयात बढ़ने से व्यापार अधिशेष कम हो सकता है और ऊर्जा आयात बिल बढ़ सकता है क्योंकि रूसी तेल सस्ता था। कुल मिलाकर, लघु अवधि में सकारात्मक लेकिन दीर्घकालिक असंतुलन का खतरा हो सकता है।

फ़िलहाल सरकार ने इस समझौते को लेकर किसी भी तरह की औपचारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं की, जिससे सवाल उठे रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर घोषणा की, जबकि पीएम मोदी ने केवल धन्यवाद दिया। विपक्ष का आरोप है कि संवेदनशील रियायतें, जैसे कि कृषि बाजार खोलना, छिपाई जा रही हैं ताकि किसान आंदोलन न भड़के। यह पारदर्शिता की कमी राष्ट्रीय हितों पर सवाल खड़े करती है, क्योंकि व्यापार संधियों में आमतौर पर पूर्ण खुलासा किया जाता है। जानकारों के अनुसार, यह रणनीतिक गोपनीयता लगती है लेकिन वहीं ये लोकतांत्रिक जवाबदेही को कमजोर करती है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे ‘सरेंडर 2.0’ कहा और आरोप लगाया कि मोदी सरकार दबाव में झुकी और किसानों के हित बेचे। उन्होंने संसद में चर्चा रोकने का आरोप लगाया, जबकि वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने विपक्ष पर हंगामा करने का इल्जाम लगाया। विपक्ष का मुख्य मुद्दा असमानता है: अमेरिका 18% टैरिफ रखे, भारत शून्य दे: यह साफ़ तौर पर  ‘ट्रंप-निरभरता’ है। राजनीतिक रूप से देखा जाए तो यह मौजूदा बजट सत्र में सरकार को घेरने का हथियार है, लेकिन मूल चिंता कृषि और ऊर्जा सुरक्षा की है।

जानकार मानते हैं कि इस समझौते के कुछ संकेत स्पष्ट हैं। 2025 में 50% टैरिफ से भारत के निर्यात में गिरावट आई। अगस्त में 6.86 अरब डॉलर से अक्टूबर में 6.30 अरब। ट्रंप की ‘आर्थिक ब्लैकमेल’ नीति ने रूसी तेल खरीद को निशाना बनाया। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘भारी कीमत चुकाने को तैयार’ कहा था। सेवानिवृत अफसरों ने सलाह दी कि बुरा समझौता न करें। यह दबाव रणनीतिक था, चीन के विकल्प के रूप में भारत को मजबूत करना तो ठीक था, लेकिन भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर सवाल भी उठने लगे। अगर शर्तें एकतरफा हों तो समझौता न करना ही बेहतर था।

वहीं इस समझौते को लेकर अर्थशास्त्री विभाजित हैं। ब्लूमबर्ग के अनुसार, निर्यात 64% बढ़ सकता है, लेकिन अगर समझौता विफल होता है तो जीडीपी पर 0.7% नुकसान संभव है। आशावादी अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जीडीपी  7.4% तक बढ़ सकती है। लेकिन वजाहत हबीब जैसे विशेषज्ञ असमानता पर सवाल उठाते हैं: 0 बनाम 18% टैरिफ, किस दृष्टि से सही है? एक रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि डेयरी को 1.03 लाख करोड़ का नुकसान हो सकता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो विनिर्माण को फायदा लेकिन कृषि को खतरा संभव है इसलिए संतुलित सुधार जरूरी हैं।

गौरतलब है कि भारत जैसे देश में कृषि क्षेत्र सबसे संवेदनशील है। समझौते के मुताबिक अमेरिका बादाम, सोयाबीन तेल, कपास और डेयरी निर्यात बढ़ाएगा। डेयरी में, वर्तमान 60% टैरिफ कम होने से कीमतें 15% गिर सकती हैं, जिससे किसानों को 1.03 लाख करोड़ का वार्षिक नुकसान हो सकता है। आयात 25 मिलियन टन बढ़ सकता है, 1-2 गाय वाले छोटे किसानों को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। अमूल जैसे कोऑपरेटिव भी प्रभावित होंगे। पूर्व व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि इससे किसान का विरोध भड़क सकता है। वहीं सकारात्मक पक्ष इस बात का दावा भी कर रहे हैं कि प्रोसेस्ड एग्री निर्यात बढ़ सकता है, लेकिन इस क्षेत्र में संरक्षण जरूरी है। यह आम नागरिकों की आजीविका को जोखिम में डालता सकता है, जहां 80% कृषि छोटे किसानों पर निर्भर है।

भू-रणनीतिक की दृष्टि से यह समझौता जरूरी था, क्योंकि चीन के मुकाबले भारत को मजबूत करना, एक अच्छी रणनीति अवश्य है लेकिन यह आर्थिक रूप से असंतुलित है। एक ओर टेक्सटाइल और फार्मा आदि क्षेत्रों में निर्यात अवश्य बढ़ेगा, लेकिन ‘बाय अमेरिकन’ की नीति से घरेलू उद्योग अवश्य दब सकते हैं। कृषि में अमेरिकी सब्सिडी उत्पाद सस्ते आयात से ग्रामीण संकट बढ़ा सकते हैं। ऐसे में पारदर्शिता की कमी जनता के बीच विश्वास घटाती है। आत्मनिर्भर भारत के लिए यह अवसर अवश्य हो सकता है लेकिन ध्यान रहे कि देश की आर्थिक नीति की सुरक्षा के लिए सावधानी अवश्य बरतनी होगी, कोई भी देश सर्वोच्च नहीं है। 


*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।