शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

पुलिस की मनमानी गिरफ्तारियों पर रोक लगाता सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में पुलिस की मनमानी गिरफ्तारियों पर सख्त अंकुश लगाया है। यह फैसला उन अपराधों से संबंधित है जहां सजा की अधिकतम अवधि सात साल तक की कैद है। सतेंद्र कुमार एंटिल बनाम सीबीआई मामले में न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारी अपवाद है, जबकि नोटिस जारी करना नियम। यह निर्णय न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार लाएगा, बल्कि आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करेगा। फैसले के बाद इस मामले की पृष्ठभूमि, कानूनी प्रावधानों, गिरफ्तारी की आवश्यकता और आम नागरिकों पर इसके प्रभाव पर चर्चा होने लगी है। जिससे कि नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जा रहा है।


पहले समझते हैं कि यह फैसला ऐतिहासिक क्यों है। भारत में आपराधिक न्याय प्रणाली में गिरफ्तारी एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी का अधिकार था, लेकिन इसका अक्सर दुरुपयोग होता था। विशेष रूप से कम गंभीर अपराधों में, जहां सजा सात साल से कम थी, पुलिस बिना सोचे-समझे लोगों को हिरासत में ले लेती थी। इससे न केवल जेलों में भीड़ बढ़ती थी, बल्कि निर्दोष नागरिकों का जीवन बर्बाद होता था। 2014 में अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार दिशानिर्देश जारी किए थे, जिसमें कहा गया था कि ऐसे अपराधों में गिरफ्तारी निश्चित नहीं होनी चाहिए। पुलिस को पहले जांच करनी चाहिए और गिरफ्तारी केवल आवश्यक होने पर ही करनी चाहिए।

लेकिन अब नई व्यवस्था में, 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) ने इस प्रक्रिया को और मजबूत किया है। बीएनएसएस धारा 35 सीआरपीसी की धारा 41 का स्थान लेती है, जबकि बीएनएसएस धारा 35(3) सीआरपीसी की धारा 41ए के समान है। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 35 भी गिरफ्तारी से संबंधित है, लेकिन मुख्य रूप से प्रक्रियात्मक पहलू बीएनएसएस में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीएनएसएस धारा 35(1) पुलिस को गिरफ्तारी का अधिकार देती है, लेकिन शब्द "मे" (may) का प्रयोग दर्शाता है कि यह विवेकाधीन है, न कि अनिवार्य। धारा 35(1)(बी) में कहा गया है कि पुलिस को विश्वास होना चाहिए कि आरोपी ने अपराध किया है और गिरफ्तारी जांच के लिए जरूरी है। लेकिन धारा 35(3) के तहत पुलिस द्वारा पहले नोटिस जारी करना अनिवार्य है, जिसमें आरोपी को पुलिस स्टेशन में हाजिर होने और सहयोग करने को कहा जाता है।


सवाल है कि क्या गिरफ्तारी आवश्यक है? इस पर सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट उत्तर है - ‘नहीं, यह अपवाद है।’ फैसले में कहा गया कि सात साल तक की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी केवल तब की जा सकती है जब आरोपी नोटिस का पालन न करे, या जांच में बाधा डाले, सबूतों से छेड़छाड़ करे, गवाहों को प्रभावित करे, या अदालत में पेश न होने का खतरा हो। पुलिस को गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे। यदि नोटिस के बाद भी आरोपी सहयोग करता है, तो गिरफ्तारी की कोई जरूरत नहीं। यह अर्नेश कुमार फैसले की भावना को दोहराता है, जहां कोर्ट ने कहा था कि गिरफ्तारी जांच का साधन है, न कि सजा। बीएनएसएस धारा 35(6) गिरफ्तारी को धारा 35(1)(बी) के साथ जोड़ती है, लेकिन कोर्ट ने जोर दिया कि पुलिस को सतर्क रहना चाहिए और गिरफ्तारी को अंतिम विकल्प ही मानना चाहिए।


ऐसे में यह फैसला आम नागरिकों के लिए क्या मायने रखता है? सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि अब पुलिस की मनमानी कम होगी। पहले, छोटे-मोटे अपराधों जैसे धोखाधड़ी, मारपीट या संपत्ति विवाद में लोग रातोंरात जेल में डाल दिए जाते थे, जिससे उनका करियर, परिवार और सम्मान प्रभावित होता था। लेकिन अब, नोटिस मिलने पर नागरिक पुलिस के समक्ष पेश होकर अपना पक्ष रख सकते हैं, बिना हिरासत में लिए। इससे जेलों में अनावश्यक भीड़ कम होगी। उल्लेखनीय है कि भारत में जेलों की क्षमता से 130% अधिक कैदी हैं, जिनमें से अधिकांश विचाराधीन हैं। यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूत करता है। महिलाओं, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों के लिए यह विशेष रूप से फायदेमंद है, क्योंकि वे गिरफ्तारी के दौरान अधिक शोषण का शिकार होते हैं।


लेकिन इस फैसले का असली लाभ तभी मिलेगा जब नागरिक अपने अधिकारों से अवगत होंगे। आम आदमी को पता होना चाहिए कि यदि अपराध सात साल से कम सजा वाला है, तो पुलिस सीधे गिरफ्तार नहीं कर सकती। ऐसे में आपको नोटिस मिलने पर आप क्या करें? सबसे पहले, नोटिस को ध्यान से पढ़ें, इसमें अपराध का विवरण, हाजिर होने की तारीख और समय होता है। एक वकील से सलाह लें और पुलिस स्टेशन जाएं। यदि आप जाँच में पुलिस का सहयोग करते हैं, तो गिरफ्तारी की संभावना कम है। यदि पुलिस बिना नोटिस गिरफ्तार करने की कोशिश करे, तो आप इसे कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को चेतावनी दी है कि दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने पर अधिकारी दंडित हो सकते हैं। नागरिकों को यह भी जानना चाहिए कि बीएनएसएस में इलेक्ट्रॉनिक नोटिस (जैसे व्हाट्सएप) अमान्य हैं; नोटिस व्यक्तिगत रूप से या डाक से ही दिया जाना चाहिए।


हालांकि, इस फैसले की कुछ सीमाएं भी हैं। गंभीर अपराधों (सात साल से अधिक सजा वाले) में गिरफ्तारी अभी भी आसान है और पुलिस दुरुपयोग कर सकती है। जांच की गुणवत्ता में सुधार के बिना, अपराधी बच सकते हैं। फिर भी, यह न्यायिक सक्रियता का उदाहरण है, जो पुलिस सुधार की दिशा में एक कदम है। सरकार को पुलिस प्रशिक्षण और जागरूकता अभियान चलाने चाहिए।सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लोकतंत्र की मजबूती है, जहां नागरिक पुलिस से डरें नहीं, बल्कि सहयोग करें। हर नागरिक को अपने अधिकार जानने चाहिए, गिरफ्तारी कोई सजा नहीं, बल्कि जांच का हिस्सा है। यदि हम जागरूक होंगे, तो न्याय व्यवस्था अधिक निष्पक्ष बनेगी। यह फैसला हमें याद दिलाता है कि कानून सबके लिए समान है और स्वतंत्रता हमारा मौलिक हक।


*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

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