शुक्रवार, 28 जुलाई 2023

निजी चार्टर सेवा पर इतनी मेहरबानी क्यों?



पिछले सप्ताह हमने देश के नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) की लापरवाही का एक उदाहरण दिया था जहां डीजीसीए एक निजी एयरलाइन की ग़लतियों को अनदेखा कर रही थी। देर से ही सही पर डीजीसीए जागी ज़रूर। परंतु देश के नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीन अन्य विभागों के कुछ अधिकारी भारत की एक निजी चार्टर सेवा पर कुछ विशेष मेहरबानियाँ कर रहे हैं। इन मेहरबानियों के चलते अति विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ हो रहा है।      


एआर एयरवेज़ नाम की एक निजी एयर चार्टर कंपनी यह खिलवाड़ कर रही है। इस कंपनी की सेवाओं का उपयोग करने वाले अति विशिष्ट यात्रियों को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं है कि किस तरह उनके जीवन से खिलवाड़ किया जा रहा है। इस कंपनी की सेवाओं का उपयोग उद्योगपतियों, राजनेताओं, नौकरशाहों, फिल्मी सितारों व अन्य मशहूर हस्तियों द्वारा किया जाता है। या इस कंपनी के मालिक अशोक चतुर्वेदी नियमों की धज्जियाँ उड़ा कर, गृह मंत्रालय द्वारा ‘सिक्योरिटी क्लीयरेंस’ (सुरक्षा मंजूरी) की बुनियादी आवश्यकताओं का उल्लंघन करके यह एयरलाइन चला रहे हैं।

किसी भी गैर अनुसूचित एयरलाइन के शीर्ष प्रबंधन को नागरिक उड्डयन आवश्यकताएँ धारा -3, श्रृंखला-सी, भाग-III के पैरा 11 का अनुपालन करना होता है, जिसके अनुसार, “गैर-अनुसूचित ऑपरेटर के परमिट के नवीनीकरण के लिए नई सुरक्षा मंजूरी की आवश्यकता होती है। कंपनी और उसके निदेशकों की व्यक्तिगत सुरक्षा मंजूरी के नवीनीकरण का अनुरोध परमिट की समाप्ति से 180 दिन पहले eSAHAJ पोर्टल के माध्यम से प्रस्तुत किया जाना चाहिए।


इस सुरक्षा मंजूरी को प्राप्त करने के लिए, कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों व निदेशकों को उनके खिलाफ लंबित कानूनी मामलों की घोषणा करना अनिवार्य होता है। इनमें से यदि किसी भी व्यक्ति को, किसी भी मामले में, दोषी पाया जाता है तो उसकी सुरक्षा मंजूरी को तब तक वैध नहीं किया जा सकता जब तक वह कानूनी मामलों से मुक्त नहीं हो जाता। ऐसे  व्यक्ति द्वारा इन तथ्यों को छिपाने पर संबंधित अधिकारियों द्वारा उस पर मुकदमा भी चलाया जा सकता है। सिविल एविएशन रिक्वायरमेंट्स (सीएआर) के प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी कारण से एयरलाइन के उच्च अधिकारियों की सुरक्षा मंजूरी रद्द कर दी जाती है तो एयर ऑपरेटर के परमिट का भी नवीनीकरण नहीं किया जा सकता।

देश के कानून का उल्लंघन करने पर जो भी करवाई होती है वो ज़्यादातर आम नागरिकों पर ही होती है। परंतु यदि किसी के सत्ता में ऊँचे संपर्क हैं तो वो प्रायः कानूनी करवाई से बच निकलते हैं। यही किया है भारत के नामी उद्योगपति अशोक चतुवेर्दी ने। उनकी एआर एयरवेज के नाम से जो निजी चार्टर कंपनी है उसे ‘क्लब वन’ के नाम से भी जाना जाता है। चूँकि ये एयरलाइन देश के जाने-माने और प्रभावशाली व्यक्तियों को अपनी सेवाऐं प्रदान करती है, इसलिए श्री चतुर्वेदी के उच्च पदासीन अधिकारियों के साथ गहरे संपर्क हैं।

ग़ौरतलब है कि एआर एयरवेज को एयर ऑपरेटर परमिट 2005 में दिया गया था। जिसे समय-समय पर नवीनीकृत किया गया। इसका आख़िरी नवीनीकरण 2019 से 2024 तक किया गया। इस बीच कंपनी के मालिक अशोक कुमार चतुर्वेदी को 2010 में एक आपराधिक मामले में सीबीआई द्वारा दोषी ठहराया गया। चतुर्वेदी को 13 दिसम्बर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश द्वारा जमानत पर रिहा कर दिया गया। परंतु आरोप मुक्त नहीं किया गया। इस मामले में उनकी याचिका अभी भी उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है। उल्लेखनीय है कि इसी मामले में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव श्रीमती निरा यादव को जेल जाना पड़ा था।

नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने 30 जुलाई 2020 को एआर एयरवेज़ को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। जिसमें बताया गया कि गृह मंत्रालय से प्राप्त इनपुट के आधार पर, नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने अपने पत्र दिनांक 26.06.2020 के माध्यम से अशोक चतुर्वेदी की सुरक्षा मंजूरी के नवीनीकरण से इनकार कर दिया है। नोटिस में यह उल्लेख किया गया कि सुरक्षा मंजूरी से इनकार के मद्देनजर, अशोक चतुर्वेदी नागरिक उड्डयन आवश्यकताओं का अनुपालन में नहीं रहे, इसलिए उन्हें यह नोटिस जारी किया गया कि क्यों न उनका एयर ऑपरेटर परमिट भी रद्द कर दिया जाए।

अशोक चतुर्वेदी व उनकी कंपनी द्वारा संतोषजनक उत्तर न मिलने पर मंत्रालय ने दिनांक 03.09.2020 और 04.09.2020 के आदेशों के अनुसार, उन्हें सुरक्षा मंजूरी देने से इनकार करने और उनके कर्मचारियों के हवाई अड्डे के प्रवेश परमिट भी रद्द कर दिये। इसी आधार पर चतुर्वेदी के एयर ऑपरेटर की सुरक्षा मंजूरी को भी अस्वीकार कर दिया गया। चूंकि एयर ऑपरेटर परमिट के अनुदान/नवीनीकरण के लिए सुरक्षा मंजूरी एक पूर्व-आवश्यकता है, इसलिए दिनांक 07.09.2020 के आदेश के अनुसार डीजीसीए ने एआर एयरवेज का एयर ऑपरेटर परमिट भी रद्द कर दिया।

इन नोटिसों को चुनौती देते हुए अशोक चतुर्वेदी ने दिल्ली उच्च न्यायालय से नोटिस की करवाई पर रोक लगवा ली। परंतु माननीय उच्च न्यायालय के 15 फ़रवरी 2021 के आदेश अनुसार सरकार को निर्देश दिये कि यदि क़ानूनी सलाह ली जाए तो सरकार कानून के अनुसार चतुर्वेदी के खिलाफ आगे बढ़ने को स्वतंत्र है। यानी सरकार यदि चाहे तो इस कंपनी व इसके मालिकों के ख़िलाफ़ उचित क़ानूनी करवाई भी कर सकती है।

चतुर्वेदी के रसूख और संबंधों के चलते, उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनके लंबित पड़े भ्रष्टाचार के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय को किसी न किसी आधार पर टाला जाए और वह जमानत पर बने रहें। इसी तरह, नागरिक उड्डयन मंत्रालय में हर स्तर पर अपने संबंधों के चलते, वे यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि अधिकारी दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती न दें या माननीय अदालत के फैसले के अनुसार, उनके खिलाफ कार्रवाई न करें।

यह राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करने और अति विशिष्ट यात्रियों के जीवन से खिलवाड़ करने का एक स्पष्ट मामला है। जहां कंपनी के निदेशक इस अपराध के दोषी हैं वहीं नियम पुस्तिका की अनदेखी करने पर नागरिक उड्डयन मंत्रालय, उसकी सहयोगी एजेंसियां और अन्य संबंधित मंत्रालय भी समान रूप से जिम्मेदार हैं। देखना यह है कि इतने बड़े मामले को कब तक दबाया जाता है?

शुक्रवार, 21 जुलाई 2023

इतनी देर से क्यों जागा डीजीसीए?



जब भी कभी कोई विमान हादसा होता है या होते-होते टल जाता है तो भारत का नागर विमानन महानिदेशालय यानी डीजीसीए ऐसी घटना की जाँच करता है। ऐसे मामलों में जाँच पूरी होने तक डीजीसीए उस विमान के पायलट व क्रू को ‘ग्राउंड’ कर देता है यानी उड़ान भरने पर रोक लगा देता है। सवाल है कि क्या डीजीसीए का सिर्फ़ इतना ही फ़र्ज़ है? सवाल ये भी है कि क्या ऐसी दुर्घटनाओं के बाद की जाने वाली ऐसी जाँच में केवल एयरलाइन के स्टाफ़ की ही गलती क्यों सामने आती है? क्या डीजीसीए के अधिकारियों को हवाई जहाज़ की नियमित जाँच और रख-रखाव की पड़ताल नहीं करनी चाहिए, जो उनका फ़र्ज़ है? यदि डीजीसीए द्वारा ऐसे निरीक्षण समय-समय पर होते रहें तो ऐसे हादसे टाले जा सकते हैं।

आज हम देश की एक नामी एयरलाइन इंडिगो के बारे में बात करेंगे। निजी क्षेत्र की यह एयरलाइन पिछले महीने काफ़ी सुर्ख़ियों में रही। कारण था इसके विमानों में लैंडिंग के समय होने वाली टेलस्ट्राइक। जब भी कभी विमान का पिछला हिस्सा जमीन से टकरा जाता है उसे टेलस्ट्राइक कहते हैं। अक्सर एयरलाइन कंपनियाँ ऐसी घटनाओं को रिपोर्ट नहीं करतीं। ग़ौरतलब है कि टेलस्ट्राइक की घटना जानलेवा होने के साथ-साथ विमान में हवा का दबाव को स्थिर रखने वाले ढाँचे को भी नुक़सान पहुँचा सकती है। टेलस्ट्राइक विमान के टेकऑफ़ या लैंडिंग के समय होती है। जब भी कभी किसी भी विमान के साथ ऐसा हादसा होता है तो उसे मरम्मत करने के लिए ग्राउंड कर दिया जाता है। भारत के नागरिक उड्डयन इतिहास में टेलस्ट्राइक की घटनाएँ काफ़ी कम हैं।


इंडिगो के विमानों ने बीते एक साल में केवल चार घटनाओं को ही रिपोर्ट किया। जबकि सूत्रों के अनुसार यह संख्या इससे दोगुनी है। जैसे ही इंडिगो द्वारा चार घटनाओं की पुष्टि हुई तो डीजीसीए हरकत में आया। यहाँ सवाल उठता है कि क्या डीजीसीए द्वारा की जाने वाली इस अनदेखी के लिये केवल इंडिगो ही ज़िम्मेदार है? क्या डीजीसीए ने इंडिगो के विमानों का नियमित ऑडिट किया था? ऐसी घटनाओं के बाद ही डीजीसीए को क्यों ऑडिट करने की सूझी? यदि डीजीसीए के अधिकारी एयरलाइन की न सुनकर, क़ानून के हिसाब से हर एयरलाइन का नियमित व विस्तृत ऑडिट करते रहें तो डीजीसीए पर उँगलियाँ नहीं उठेंगी। पर पता नहीं किस लालच या दबाव में ये जाँच नहीं होती।   


अब प्रश्न ये है कि टेलस्ट्राइक की घटनाएँ क्यों होती हैं? विमान को लैंड करते समय, यात्रियों को ज़ोर का झटका न लगे इसलिए अक्सर पायलट विमान को नीचे उतारते समय विमान के पिछले हिस्से को थोड़ा झुका लेते हैं और अगले हिस्से को उठा लेते हैं। ऐसे में विमान की ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ होती है। यदि विमान लैंड होते समय ज़ोर से झटका लगाता है तो उसे ‘हार्ड लैंडिंग’ कहा जाता है। विमान में लगे यंत्रों में तयशुदा मापदंडों से अधिक लगने वाले झटके से ‘हार्ड लैंडिंग’ की रिपोर्ट स्वतः ही विमान के सिस्टम में दर्ज हो जाती है। जिसका ख़ामियाजा पायलट को भुगतना पड़ता है। इसलिए एयरलाइन अपने पायलटों को ‘हार्ड लैंडिंग’ से हमेशा बचने की हिदायत देतीं हैं। जबकि 2010 के मैंगलोर हादसे के बाद से ही डीजीसीए ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि एयरलाइन कंपनियाँ पायलटों को ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ करने के लिए दबाव न डालें। यदि ज़रूरी हो तो ‘हार्ड लैंडिंग’ की इजाज़त भी दें।

एविएशन के जानकारों के अनुसार टेलस्ट्राइक हो या विमान के इंजन में होने वाली कोई ख़राबी, इसका कारण नियमित रख-रखाव का न होना, विमान के स्पेयर पार्ट की गुणवत्ता और पायलट की उचित ट्रेनिंग का न होना है। इसके साथ ही डीजीसीए के अधिकारियों द्वारा ऐसी कमियों को अनदेखा करना भी एक प्रमुख कारण है। यदि डीजीसीए के अधिकारी एयरलाइन के दबाव या अन्य लालच के चलते इस बात पर ज़ोर न दें कि यात्रियों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा और शायद ऐसी घटनाएँ न हों।


कोविड महामारी के बाद नागरिक उड्डयन क्षेत्र धीरे-धीरे अपने पैरों पर फिर से खड़ा होने का प्रयास कर रहा है। एयरलाइन कंपनियों का मुनाफ़ा भी अब धीरे-धीरे ऊँचाई छूने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में एयरलाइन कंपनियों को विमानों के रख-रखाव में और पायलटों के प्रशिक्षण में किसी भी तरह का समझौता नहीं करना चाहिए।

विमान के इंजीनियर हों, पायलट हों या अन्य कर्मचारी, उनसे क्षमता से अधिक काम न लिया जाए कि वो थकी अवस्था में भी काम करने को मजबूर न हों। पैसा बचाने व ज्यादा मुनाफ़ा कमाने की मंशा से एयरलाइन को यात्रियों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए।


एक अनुमान के तहत आनेवाले दो दशकों में भारत का नागर विमानन ट्रैफ़िक 5 गुना बढ़ने की संभावना है। यदि इस क्षेत्र में हमें एक अच्छी पहचान बनानी है तो डीजीसीए के अधिकारियों को अपने स्वार्थों को दरकिनार करते हुए यात्रियों की सुरक्षा और एयरलाइन कम्पनी के विमानों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। डीजीसीए के ‘एयर सेफ़्टी डिपार्टमेंट’, ‘फ्लाइट स्टेण्डर्ड्स डिपार्टमेंट’, ‘एयरक्राफ्ट इंजीनियरिंग’ व ‘एयरवर्थिनेस डिपार्टमेंट’  जैसे विभागों को विमानों की जाँच के हर पहलू को कड़ाई से लागू करने को गम्भीरता से लेना होगा। ऐसा करने से एक ओर हवाई यात्रा करने वाले यात्री अपने को सुरक्षित महसूस करेंगे। वहीं दूसरी ओर एयरलाइन कम्पनियों को भी इस बात का ख़ौफ़ बना रहेगा कि छोटी सी भूल के चलते उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्यवाही भी हो सकती है।     

शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

प्राकृतिक आपदा या मानव निर्मित तबाही?



इंद्र देव के क़हर के कारण देश के उत्तरी भाग से काफ़ी दर्दनाक दृश्य सामने आए। हर तरफ़ से तबाही के विचलित करने वाले दृश्यों को देख मन में यही सवाल उठा की इस साल के मानसून से जो हाल हुआ क्या वो वास्तव में प्राकृतिक आपदा है? क्या इस तबाही के पीछे इंसान का कोई हाथ नहीं? क्या भ्रष्ट सरकारी योजनाओं के चलते ऐसा नहीं हुआ? कब तक हम ऐसी तबाही को कुदरत का क़हर मानेंगे?

बीते सप्ताह जब देश के उत्तरी भाग से वर्षा के कारण होने वाली तबाही के दृश्य सामने आए तो हर किसी के मन में ऐसे ही कुछ सवाल उठे। क्या ऐसी तबाही को रोका जा सकता है? क्या ऐसी तबाही के लिए अधिक वर्षा ही ज़िम्मेदार है? विकास के नाम पर पर्यावरण की होने वाली तबाही को किस हद तक ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? सरकार द्वारा बनाई जाने वाली सभी विकास की योजनाएँ क्या पर्यावरण के संतुलन के हिसाब से बनती हैं?


दिल्ली और उसके आसपास के इलाक़ों का जो हाल हुआ उससे तो सभी अचंभे में हैं। जगह-जगह जल भराव के कारण लगे लम्बे ट्रैफिक जाम ने पूरी व्यवस्था की जो पोल खोली उससे कई अन्य सवाल भी उठते हैं। जल भराव के लिये क्या केवल भारी वर्षा ही ज़िम्मेदार है? जल भराव से निपटने के लिए सरकार द्वारा समय-समय पर चलाई जाने वाली योजनाओं को क्या पूरी गुणवत्ता से पूरा किया जाता है? क्या नगर निगम या लोक निर्माण विभाग के अधिकारी अपना काम पूरी ज़िम्मेदारी से करते हैं? क्या सरकार के वरिष्ठ अधिकारी व संबंधित मंत्री इन कार्य योजनाओं की जाँच करते हैं या केवल फ़ीता काटने और श्रेय लेने का ही काम करते हैं? सभी जानते हैं कि इन सभी सवालों का जवाब ‘नहीं’ में ही मिलेगा।


दिल्ली में लगने वाले जाम के लिए केवल जल भराव ही ज़िम्मेदार नहीं था। जल भराव के कारण राज्य परिवहन यानी डीटीसी की कई बसें भी बिगड़ी हुई दिखाई दीं, जो कई जगह ट्रैफ़िक जाम की आग में घी का काम कर रहीं थी। इन बसों के रख-रखाव में होने वाले भ्रष्टाचार को इसका कारण क्यों न माना जाए? प्रायः यह देखा गया है कि डीटीसी की बसें वर्षा के कारण होने वाले जल भराव में अक्सर बिगड़ कर फँस जाती हैं। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि इन बसों का नियमित रख-रखाव सही ढंग से नहीं हो रहा था। जिस कारण इन्हें बीच सड़क बिगड़ने में देर नहीं लगी। ऐसे में हमें केवल ट्रैफिक पुलिस कर्मियों को ही जाम के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराना चाहिए। झमाझम बरसते हुए बादलों के बावजूद दिल्ली जैसे कई अन्य शहरों में पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी करते दिखाई देते हैं।


हिमाचल प्रदेश और अन्य पहाड़ी इलाक़ों में जिस तरह की तबाही के मंज़र दिखाई दिये उसने तो सरकारी योजनाओं की पोल ही खोल कर रख दी। विकास के नाम पर होने वाले पर्यावरण के विनाश की लीला कई सालों से चलती आई है। इसके लिए हर वो सरकार ज़िम्मेदार है जिसने अपने निहित स्वार्थों के चलते पर्यावरण की परवाह किए बिना ‘विकास’ की बेतरतीब योजनाएँ बना डालीं। इतना ही नहीं इन भ्रष्ट योजनाओं के कार्यान्वयन में भी अत्यधिक भ्रष्टाचार हुआ। इसी भ्रष्टाचार का नतीजा रहा कि हर साल साधारण वर्षा में ही सड़कें बुरी तरह तहस-नहस हो गईं। फिर तेज वर्षा के कारण ऐसे निर्माणों का क्या हाल होगा यह तो इसका अंदाज़ा तो कोई भी लगा सकता है।

आज से कुछ साल पहले जब मैं सिंगापुर में था तो वहाँ के जल निकाय प्रबंधन को देख कर प्रसन्नता हुई। सिंगापुर में मेरे मेज़बान ने एक दिन मुझे वहाँ के पब्लिक ट्रांसपोर्ट से घूमने का आग्रह किया। हमने तय किया कि हम एक दिन वहाँ की बसों और मेट्रो में घूमेंगे। सुबह-सुबह हम दोनों अपना-अपना छाता लेकर नज़दीकी बस स्टॉप पर पहुँच गये। कुछ ही समय में मूसलाधार बारिश हुई। सिंगापुर के बस स्टॉप ने हमें भीगने नहीं दिया। परंतु जिस तीव्रता से वर्षा हुई, यदि भारत का कोई भी शहर होता तो घुटने-घुटने पानी भर जाता। लेकिन सिंगापुर में ऐसा नहीं हुआ। देखते ही देखते सड़क के किनारे बनी साफ़ सुथरी नालियों ने पानी को इस कदर खींच लिया मानो कुछ हुआ ही नहीं। मैंने इस पर अपने स्थानीय मित्र से पूछा तो उन्होंने बताया कि यहाँ पर बारिश आम बात है, इसलिए न सिर्फ़ यहाँ रहने वाले बल्कि यहाँ की सरकार भी हर तरह की परिस्थिति से निपटने के लिए हमेशा तैयार रहती है। इसीलिये आपको सिंगापुर में कभी भी जल भराव नहीं मिलेगा।

जिस तरह हमने विदेशों से कई अच्छी आदतें सीखीं हैं उसी तरह यदि हम जल भराव जैसी स्थितियों को निपटने के लिए भी तैयार हो जाएँ तो ऐसी समस्याएँ नहीं झेलनी पड़ेंगी। जान-माल के नुक़सान के साथ-साथ पर्यावरण को भी बचाया जा सकेगा। परंतु जैसे हर जगह लालच के चलते भ्रष्टाचार ने अपने पाँव पसारे हैं उसने न सिर्फ़ देशवासियों को संकट में डालने का काम किया है बल्कि दुनिया भर में हमारा सर भी नीचा किया है। इसलिए किसी विकास योजना को बनाने से पहले उससे होने वाले नुक़सान का जायज़ा लेना भी अनिवार्य है। वरना ऐसे मंज़र बार-बार देखने को मिलेंगे और हम इसे कुदरत का क़हर मान कर मौन बैठे रहेंगे।  


शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

पर्यावरण संरक्षण में सुप्रीम कोर्ट की पहल


देश की सर्वोच्च अदालत ने बीते सोमवार को ‘पेपरलेस’ होने की शुरुआत की। पर्यावरण संरक्षण की मंशा से की जाने वाली इस पहल का देश भर में स्वागत किया जा रहा है। कोविड महामारी ने जिस तरह ‘वर्क फ्रॉम होम’ क्लचर को बढ़ावा दिया है उससे हर क्षेत्र में डिजिटल तरीक़े अपनाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जाने वाली यह पहल भी इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम है।


पिछले तीस सालों से मुझे देश भर के हर स्तर के न्यायालयों में जाने का मौक़ा मिला है। जैसा कि भारत की हर श्रेणी की अदालत में देखा जाता है, कोर्ट रूम किताबों व याचिकाओं से लदे रहते हैं। न्यायाधीशों, वकीलों, कोर्ट के स्टाफ़ व वहाँ पर आने वाले वादियों को ऐसे दम घोटने वाले माहौल में मजबूरन रहना पड़ता है। परंतु जिस तरह कोविड के लॉकडाउन के दौरान कोर्ट की कार्यवाही ऑनलाइन रूप से भी चली, उसने इस बात पर मुहर लगा दी कि तकनीक की मदद से भी अदालत का काम हो सकता है और वो भी काफ़ी कम ख़र्च में।

सुप्रीम कोर्ट की ‘पेपरलेस ग्रीन कोर्ट रूम’ की शुरुआत के बाद सुप्रीम कोर्ट अब पूरी तरह से हाईटेक होने जा रहा है। अत्याधुनिक तकनीक के प्रयोग होने से माननीय न्यायाधीशों के लिए ढेरों काग़ज़ों के पहाड़ की जगह अब एक पतली सी पॉप-अप स्क्रीन ने ले ली है। जो कि इस्तेमाल में भी काफ़ी यूजर फ्रेंडली बताई जा रही है। इसके साथ ही एक डिजिटल लाइब्रेरी की भी शुरुआत हुई है जहां कानून से संबंधित पुस्तकों को तुरंत देखा जा सकता है। 73 सालों के इतिहास में अब भारतीय न्यायपालिका के पूरी तरह डिजिटल होने की शुरुआत का यह पहला कदम है। फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट की पहली 3 कोर्ट ही ‘ग्रीन कोर्ट’ बनीं हैं। इन तीनों अदालतों में अब ना मोटी-मोटी केस फाइलें होंगी ना ही कोर्ट रूम में पिछले 50 सालों के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की ढेरों किताबें नजर आएंगी।


देश के प्रधान न्यायाधीश माननीय डी वाई चंद्रचूड़ की इस पहल को वकीलों, पत्रकारों व अन्य संबंधित लोगों द्वारा काफ़ी सराहा जा रहा है। ऑनलाइन पेशी के लिए इन अदालतों के कक्षों में बड़े-बड़े एलसीडी भी लगाए गए हैं। इतना ही नहीं वकीलों के लिए भी हाईटेक सुविधाएं शुरू की गई हैं, जिसमें वकीलों को भी केस से संबंधित मोटी-मोटी पेपरबुक नहीं ले जानी होंगी। लैपटॉप और टेबलेट के जरिए कागजात जजों को दिखाए जा सकेंगे, जिन्हें पढ़ने में भी आसानी होगी।

केस से संबंधित क़ानूनी दस्तावेज़ों तक आसानी से पहुंचने के लिए न्यायाधीशों के पास दस्तावेज़ आलोकन तकनीक भी होगी। जिसके उपयोग से दस्तावेज़ को मशीन पर रखा जा सकता है, जिसे वकील अपनी स्क्रीन और कोर्ट में लगी बड़ी स्क्रीन पर भी देख सकेंगे। वकीलों के पास फ़ाइलें और दस्तावेज़ पढ़ने के लिए स्मार्ट स्क्रीन भी होंगी।


कोर्ट में मौजूद न्यायाधीश महोदय भी अब कानून की मोटी-मोटी किताबों की जगह डिजिटल ढंग से विभिन्न पुराने फैसले व क़ानून की धाराओं को देख सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट में कोर्ट 1 से 5 के कॉरिडोर के अलावा, मीडिया रूम, वेटिंग रूम आदि में वादियों, वकीलों और मीडियाकर्मियों के लिए मुफ़्त वाई-फाई की शुरुआत भी की गई है। इस तरह का बदलाव अभी कुछ कोर्ट में ही किया गया है, जो आने वाले समय में अन्य अदालतों में भी दिखाई देगा।

गौरतलब है कि अदालत कक्षों में बदलाव का सुझाव भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने ही दिया था, जो चाहते हैं कि अदालतें अधिक तकनीक-अनुकूल बनें। वह यह भी चाहते थे कि अदालती कार्यवाही कागज रहित हो। सुप्रीम कोर्ट ने कागज बचाने के लिए कई योजनाएँ भी बनाई हैं, जैसे याचिकाओं को ‘बैक-टू-बैक’ प्रिंट करना (काग़ज़ के दोनों तरफ़ छापना), ई-फाइलिंग करना आदि।

इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट की अधिकतर अदालतों की कार्यवाही का सीधा प्रसारण करना। कोर्ट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण देखने से सबसे अधिक लाभ यह हुआ है कि हमें ये पता चल जाता है कि कोर्ट में किस वकील ने क्या दलील पेश की और इस पर न्यायाधीश महोदय ने क्या प्रतिक्रिया दी। यह जानकारी पहले आसानी से नहीं मिल पाती थी। परंतु अब जो भी इस सीधे प्रसारण को देखने के लिए अधिकृत होता है वो बिना किसी काट-छाँट के पूरी कार्यवाही को आराम से देख सकता है। कोर्ट की कार्यवाही देखने के लिए यह एक सराहनीय कदम है।


इसी तरह कोर्ट के ‘डिस्प्ले बोर्ड’ को भी आप अपने मोबाइल फ़ोन या कंप्यूटर पर बड़ी आसानी से देख सकते हैं। इससे बोर्ड पर यह पता चल जाता है कि किस कोर्ट में कौनसा केस चल रहा है। यदि किसी वकील को एक से अधिक कोर्ट में पेश होना होता है तो इस तकनीक की मदद से उसे पूरी जानकारी अपने फ़ोन पर ही मिल जाती है। पहले ऐसा नहीं होता था, वकील के क्लर्क कोर्ट के आँगन में लगे बोर्ड पर नज़र बनाए रखते थे और वकील को अन्य कोर्टों की प्रगति कि सूचना देने के लिए दौड़ते रहते थे।


ज़ाहिर सी बात है कि आज के तकनीकी युग में हमें समय के साथ चलना आवश्यक हो चुका है। ऐसी कई सेवाएँ हैं जिनका लाभ हम आज घर बैठे ही ले सकते हैं। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाया गया यह कदम जहां न सिर्फ़ पर्यावरण का संरक्षण करेगा, समय भी बचाएगा, साथ ही कोर्ट में भीड़ भी कम होगी। मोटी-मोटी किताबों की जगह सिर्फ़ लैपटॉप ही नज़र आएँगे और कोर्ट के ऑर्डर की प्रति भी जल्द प्राप्त हो सकेगी। सुप्रीम कोर्ट की यह पहल स्वागत योग्य है।