शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

ऐसा देश है मेरा


मशहूर फ़िल्म निर्माता यश चोपड़ा द्वारा बनाई गई फ़िल्म ‘वीर ज़ारा’ में भारतीय वायु सेना के एक सैनिक और पाकिस्तानी महिला की प्रेम कथा को दर्शाया गया। इसी फ़िल्म के एक गाने में भारत का ये सैनिक अपनी प्रेमिका को भारत की खूबियाँ गिनाता है। परंतु आज हम जिस विषय को इस कॉलम में उठाएँगे वह हमारे देश की गंगा - जमुनी तहज़ीब की विशेषता पर आधारित है। बरसों से हमारा देश बिना किसी भेद-भाव के सभी धर्मों का सम्मान करते हुए एकजुटता से रहता आया है। परंतु सत्ता के लोभी, चाहे किसी भी दल के क्यों न हों, हमेशा से इस एकता के ख़िलाफ़ षड्यंत्र रचते आए हैं। बिना इस बात का अंदाज़ा लगाए कि चुनावी राजनीति तो अस्थाई है जबकि आपसी मेल-मिलाप हमेशा से ही स्थाई रहा है।
 

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक ऐसी पोस्ट देखी जिसने इस लेख का विषय प्रेरित किया। हमारे देश के गौरव माने जाने वाले उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान और उस्ताद विलायत ख़ान की एक जुगलबंदी यूट्यूब पर देखी। इस जुगलबंदी में उस्ताद विलायत ख़ान का सितार और उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान की शहनाई जिस लोक गीत को बजा रहे थे वह ब्रज में गोपियों द्वारा माँ यशोदा को नंदगोपाल की शिकायत को दर्शाता है। गीत के बोल कुछ इस प्रकार हैं, ‘मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे’। इस जुगलबंदी को देख कर इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं होता कि मुस्लिम कलाकारों द्वारा गाए व बजाए गये इस लोक गीत में कोई भेदभाव है। ग़ौरतलब है कि यह लोक गीत बॉलीवुड की सुपर हिट फ़िल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ से लिया गया है। उल्लेखनीय है कि इस गीत को बॉलीवुड के मशहूर गीतकार शकील बदायूनी ने लिखा है और इसका संगीत नौशाद द्वारा दिया गया है। यह फ़िल्म मुग़ल बादशाह अकबर के बेटे शहज़ादे सलीम और एक कनीज़ की प्रेम कहानी पर आधारित है। 
 
यदि आप यूट्यूब पर इस जुगलबंदी को खोजेंगे तो आप इस जुगलबंदी में दोनों कलाकारों द्वारा बजाए जाने वाले साज़ों की मधुर आवाज़ के साथ-साथ कलाकारों के चेहरे के भाव को अनदेखा नहीं कर सकते। ग़ौरतलब है कि मुग़ल-ए-आज़म फ़िल्म हो या कोई अन्य फ़िल्म, जब भी कभी किसी भी कलाकार को, बिना उसके धर्म के भेद-भाव किए जो भी किरदार दिया जाता है वह उसे बखूबी निभाता है। चूँकि फ़िल्में समाज का आईना मानी जाती हैं, वह अपनी अच्छी-बुरी कहानियों के द्वारा हमारे समाज में एक छाप छोड़ देती हैं। फिर वो चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक। आपको ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएँगे जहां कलाकार बिना अपने धर्म की परवाह किए, दूसरे धर्म का किरदार बखूबी निभाते हुए नज़र आएँगे। ऐसे किरदारों को निभाते हुए वह उस किरदार में इस कदर घुल-मिल जाते हैं कि आप उन्हें वास्तव में उस किरदार के नाम से ही पहचानने लग जाते हैं। 
 
कलाकार किसी भी धर्म और जाति के क्यों न हों वह अपने किरदार और उससे संबंधित गीत-संगीत में कभी भी भेद-भाव नहीं करते। बल्कि अक्सर ऐसा देखा गया है कि एक धर्म के कलाकार ने दूसरे धर्म के किरदार को इतना बढ़िया निभाया है कि वह किरदार यदि उसी धर्म के किसी कलाकार द्वारा निभाया गया होता तो शायद इतना बेहतर ना होता। बॉलीवुड से जुड़े जितने भी लोगों से मेरा संपर्क हुआ है, उन सभी ने इस बात को स्पष्ट रूप से कहा है कि वे धर्म व जाति के आधार पर आपस में किसी भी तरह का भेद-भाव नहीं करते। यहाँ सवाल उठता है कि यदि फ़िल्म अभिनेता आपस में किसी धर्म या जाति विशेष को लेकर इतने संवेदनशील नहीं होते तो हमारा समाज किस आधार पर बट रहा है? क्या हमारे समाज में सदियों से चले आ रहे इस भेद-भाव के प्रति चेतना को केवल राजनैतिक मंशा से ही बढ़ावा दिया जा रहा है?
 
और कुछ नहीं तो आप इस जुगलबंदी के वीडियो को देखें तो किस क़दर दोनों कलाकार जो कई अन्य धर्म के मानने वाले हैं वे भगवान श्री कृष्णा की बाललीलाओं का गायन पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कर रहे हैं। इतना ही नहीं जुगलबंदी के समय वे एक दूसरे को पूरा सम्मान देते हुए ख़ुशी-ख़ुशी तारीफ़ भी करते हैं। जबकि बीते कुछ वर्षों से यह देखा गया है कि यदि कोई भी नौजवान अपने धर्म से इतर होकर दूसरे धर्म के लोगों का साथ देता है तो उसे सामाजिक कुरीतिओं का हवाला देते हुए पंथ-निकाला दिया जाता है। इतना ही नहीं उसकी फ़िल्मों को न देखने का ऐलान तक बड़े आक्रामक तरीक़े से भी किया जाता है। ऐसे में उसे न चाहते हुए, मजबूरी में अपने ही धर्म का साथ देना पड़ता है। 
 
मुझे अच्छे से याद है कि शायद ही कोई ऐसा स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्रता दिवस हुआ हो जब हमने सुबह सबसे पहले उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान की शहनाई न सुनी हो। लेकिन बीते कुछ वर्षों से जिस तरह एक विशेष धर्म और समाज को लेकर भेद-भाव फैलाया जा रहा है वह हमें सही दिशा में नहीं ले जा रहा। ऐसे में हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को क्या समझा कर जाएँगे? यह एक अहम मुद्दा है। इसलिए निहित स्वार्थों के बहकावे में आए बिना हमें सदियों से चली आ रही गंगा-जमनी तहज़ीब का पालन करना चाहिए, जो हमारे देश की परंपरा रही है। क्योंकि ‘मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।’    


*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2024

निजी विमानन कंपनियाँ और यात्री सुरक्षा

आज की व्यस्त जिंदगी में हम सभी समय को काफ़ी महत्व देते हैं। कहीं भी यात्रा करनी हो तो हम कोशिश करते हैं कि यात्रा जल्द से जल्द पूरी हो। ऐसे में जो भी लोग हवाई यात्रा का वहन कर सकते हैं वे फ्लाइट से यात्रा करना ही पसंद करते हैं। इसी तरह जो भी व्यक्ति हवाई यात्रा में भी विशिष्ट सेवा लेना चाहते हैं वे निजी चार्टर कंपनियों की सेवा लेते हैं और अपनी सुविधानुसार यात्रा करना पसंद करते हैं। बीते कुछ दशकों में हमारे देश में हवाई यात्रा के आँकड़े काफ़ी तेज़ी से बढ़े हैं। इसके लिए निजी कंपनियों का नागरिक उड्डयन क्षेत्र में आना एक अहम कारण माना जाता है। अधिक से अधिक निजी एयरलाइन के आने से हवाई यात्रियों को अपनी सुविधानुसार यात्रा करने का विकल्प भी मिला है। परंतु जिस तरह निजी क्षेत्र के यह ऑपरेटर प्रायः मुनाफ़ा कमाने की मंशा से यात्रियों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर जाते हैं वह चिंताजनक है। आए दिन हमें इस बात की खबरें मिलती हैं कि पुराने इंजन या पुर्ज़ों के चलते कई निजी कंपनियों के विमानों को ‘ग्राउंड’ होना पड़ा। कल्पना कीजिए कि यदि किसी विमान में ख़राब इंजन या अयोग्य पाइलट की वजह से कोई हादसा हो जाए तो दोष किसका होगा, विमान कंपनी का या नागरिक उड्डयन मंत्रालय का, या दोनों का?


ताज़ा उदाहरण देश की एक नई निजी एयरलाइन का है जिसके पास मात्र 25 हवाई जहाज़ ही हैं। हाल ही में उनमें से 14 हवाई जहाज़ों में ‘रडर कंट्रोल सिस्टम’ (पतवार नियंत्रण सिस्टम) को लेकर नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीन डीजीसीए द्वारा नोटिस दिया गया। ग़ौरतलब है कि ‘रडर कंट्रोल सिस्टम’ विमान को इंजन फेल होने की स्थिति में उसके निर्धारित मार्ग में चलने में सहायता करता है। इसके अलावा विमान के टेक-ऑफ और लैंडिंग के समय भी विमान को सही दिशा में रखने में सहायक होता है। ‘रडर कंट्रोल सिस्टम’ का इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक व मैन्युअल दोनों तरीक़ों से किया जा सकता है। अधिकतर परिस्थितियों में ‘रडर कंट्रोल सिस्टम’ का इस्तेमाल मिड-एयर या यात्रा के दौरान नहीं किया जाता। मिसाल के तौर पर यदि आप सड़क पर अपनी गाड़ी को 100 की स्पीड से चला रहे हैं और ऐसे में यदि आप अपनी गाड़ी का स्टीयरिंग ज़रा सा भी दाँय या बाएँ करेंगे तो कितनी गंभीर दुर्घटना हो सकती है आप इसका अनुमान लगा सकते हैं। ऐसे में यदि ‘रडर कंट्रोल सिस्टम’ जाम हो जाए या सही रख-रखाव न होने के कारण उसमें कोई तकनीकी दिक़्क़त आ जाए तो विमान दुर्घटना ग्रस्त भी हो सकता है।


यदि किसी भी एयरलाइन में, फिर वो चाहे शेड्यूल एयरलाइन हो या नॉन-शेड्यूल एयरलाइन, अनुभवी पायलट न हों तो वो इस आपात स्थिति से निपट नहीं पाएगा। यहाँ पर सवाल उठता है कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय व डीजीसीए चुनिंदा निजी विमान कंपनियों व कुछ निजी चार्टर कंपनियों के प्रति इतनी उदार क्यों होती हैं कि उनके विमान व पायलटों की कड़ी जाँच नहीं करती? जाँच केवल कड़ी ही नहीं औचक भी होनी चाहिए जिससे कि हर विमान कंपनी चलाने वाले के दिल में इस बात का डर बैठा रहे कि मुनाफ़े के लालच में और भ्रष्टाचार के चलते वह यात्रियों की सुरक्षा से खिलवाड़ न कर सके। वहीं डीजीसीए में ऐसे तकनीकी विशेषज्ञ अवश्य हों जो ख़ानापूर्ति की नीयत से नहीं बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से ही विमानों और पायलटों की नियम अनुसार जाँच करें। सरकारी तंत्र का हिस्सा बनकर ख़ानापूर्ति करने वाले भ्रष्ट अधिकारियों की भी जाँच मंत्रालय के सतर्कता विभाग से की जानी चाहिए।


हाल ही में फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (एफएए) ने एक सुरक्षा चेतावनी जारी की, जिसमें कोलिन्स एयरोस्पेस एसवीओ-730 रडर रोलआउट गाइडेंस एक्चुएटर्स (आरआरजीए) से लैस कुछ बोइंग 737 विमानों में प्रतिबंधित या जाम ‘रडर कंट्रोल सिस्टम’ की संभावना के बारे में ऑपरेटरों को चेतावनी दी गई। इस चेतावनी में आगे कहा गया कि नमी जमा होने से, ‘रडर कंट्रोल सिस्टम’ उड़ान के दौरान जाम हो सकता है। इतना ही नहीं लैंडिंग के दौरान भी ‘रडर कंट्रोल सिस्टम’ जाम हो सकता है। फ्लाइट क्रू को सलाह दी जाती है कि वे प्रतिबंधित ‘रडर कंट्रोल सिस्टम’ स्थितियों से निपटने के लिए बोइंग की प्रक्रियाओं का पालन करें और ऑटोपायलट सिस्टम का उपयोग करके जांच करें। सुरक्षित परिचालन सुनिश्चित करने के लिए एयरलाइंस को अलर्ट और प्रासंगिक बोइंग मार्गदर्शन से परिचित होना चाहिए। बोइंग ने अगस्त में ‘रडर कंट्रोल सिस्टम’ की समस्या से प्रभावित बोइंग 737 ऑपरेटरों को पहले ही सूचित कर दिया था। अब एफएए ने इस बात पर जोर दिया कि मौजूदा स्वचालित जांच लैंडिंग से पहले ‘रडर कंट्रोल सिस्टम’ की सीमाओं का पता लगा सकती है।

ग़ौरतलब है कि अमरीका की फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन कि यह चेतावनी दुनिया भर की एयरलाइन को गई है कि वह इस तकनीकी ख़राबी की गहन जाँच करें। हालाँकि भारत की इस निजी एयरलाइन ने यह स्पष्टीकरण दिया है कि इस नोटिस से उसके विमान परिचालन पर कोई असर नहीं पड़ेगा और वह कमी दूर करने का प्रयास करेगी। परंतु एविएशन विशेषज्ञों के मुताबिक़, भारत में एक ही कंपनी के 25 में से 14 विमानों में ऐसा पाया जाना एक गंभीर समस्या है। लेकिन यहाँ सवाल उठता है कि क्या इस नई कंपनी द्वारा कम समय में अधिक मुनाफ़ा कमाने के चलते ऐसा हुआ? क्या इस कंपनी के पास तकनीकी विशेषज्ञों की कमी है? क्या भारत सरकार के डीजीसीए कुछ चुनिंदा अधिकारियों द्वारा इस त्रुटि का जानबूझकर अनदेखा किया गया? जो भी कारण हो इसकी जाँच अवश्य होनी चाहिए क्योंकि निजी एयरलाइन हो या निजी चार्टर कंपनी किसी को भी यात्रियों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने का कोई हक़ नहीं है। देखना यह है कि आनेवाले समय में नागरिक उड्डयन मंत्रालय या डीजीसीए इन कमियों की कैसे जाँच करती है और ऐसी ग़लतियों पर इन एयरलाइन कंपनियों को क्या सज़ा देती है?       


*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2024

अपने क्या सच में अपने होते हैं?


आधी दुनिया पर विजय पाने वाला सिकंदर-ए-आज़म जब अपने देश वापिस लौट रहा था तो उसका स्वास्थ्य इतना  बिगड़ा की वह मरणासन्न स्थिति में पहुँच गया। अपनी मृत्यु से पहले सिकंदर ने अपने सेनापतियों और सलाहकारों को बुलाया और कहा की मेरी मृत्यु के पश्चात् मेरी तीन इच्छाएँ पूरी की जाएँ। उन तीन इच्छाओं में से एक इच्छा थी। “मेरी अर्थी में मेरे दोनों हाथ बाहर की ओर रखे जाएं - इससे लोग समझ सकें की जब मैं दुनिया से गया तो मेरे दोनों हाथ खाली थे। इंसान आता भी खाली हाथ है और जाता भी खाली हाथ है।” परंतु इस बात को बिना समझे, हम हर पल अधिक से अधिक संपत्ति और धन अर्जित करने की दौड़ में लग जाते हैं।    


आए दिन हमें यह देखने को मिलता है कि किसी बुजुर्ग को, पैसे और संपत्ति के लालच में उसी की संतान ने घर से बेघर कर दिया। ऐसा अक्सर उन परिस्थितियों में होता है जब बच्चों को सही संस्कार नहीं दिये जाते। ऐसा अक्सर तब भी होता है जब घर के बड़े-बुजुर्ग अपने मोह और स्नेह के चलते, अपने जीते-जी ही अपनी चल-अचल संपत्ति के सभी उत्तराधिकार अपने बच्चों को दे देते हैं। जो संतान संस्कारी होती है वे बिना किसी लोभ या स्वार्थ के, अंतिम समय तक  अपने माता-पिता की सेवा करते हैं। परंतु ऐसी भी संतान होतीं हैं जिन्हें जैसे ही इस बात का पता चलता है कि माता-पिता ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बना दिया है, वैसे ही उनका अपने माता-पिता के प्रति व्यवहार बदलने लगता है। परंतु सभी वरिष्ठ नागरिकों शायद इस बात की जानकारी नहीं है कि ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007’ के तहत वे अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार और अपमान के ख़िलाफ़ न्याय लेने के लिए कोर्ट भी जा सकते हैं।


माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007, भारत सरकार का एक अधिनियम है जो वरिष्ठ नागरिकों और माता-पिता के भरण-पोषण और देखभाल के लिए कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। इस अधिनियम के तहत, बच्चों और उत्तराधिकारियों द्वारा वरिष्ठ नागरिकों को भरण-पोषण देना कानूनी दायित्व है। इस अधिनियम के तहत, राज्य सरकारों को हर ज़िले में वृद्धाश्रम स्थापित करने के प्रावधान भी हैं। अगर कोई वरिष्ठ नागरिक अपनी आय या संपत्ति से अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, तो वह अपने बच्चों या रिश्तेदारों से भरण-पोषण के लिए आवेदन कर सकता है। अगर कोई व्यक्ति, किसी वरिष्ठ नागरिक की देखभाल या संरक्षण प्राप्त करने के बाद उसे उपेक्षित किसी जगह छोड़ देता है, तो उसे तीन महीने तक की जेल हो सकती है या पांच हज़ार रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।


अगर किसी वरिष्ठ नागरिक के बच्चे नहीं हैं, तो वह भी मेंटेनेंस के लिए दावा कर सकता है। अगर किसी वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति का इस्तेमाल रिश्तेदार कर रहे हैं, तो सम्पत्ति का इस्तेमाल करने वाले या उसके वारिस पर बुज़ुर्ग की देखभाल के लिए दावा किया जा सकता है। इतना सब कुछ होते हुए भी हमें अक्सर यही सुनने को मिलता है कि बुजुर्गों को उन्हीं के खून द्वारा अपमानित व उपेक्षित किया जाता है। ऐसे में कई बुजुर्ग जिन्हें इस अधिनियम की जानकारी नहीं है वे तो अपने अपमान के विरुद्ध ख़ामोश रहते ही हैं। साथ ही ऐसे भी बुजुर्ग हैं जो समाज में अपनी व अपने बच्चों की मर्यादा और इज़्ज़त की ख़ातिर क़ानूनी सलाह या कार्यवाही नहीं करते।


बीते दिनों दिल्ली से सटे नोएडा की एक खबर आई जहां 85 वर्ष के एक वरिष्ठ पत्रकार को अपने ही घर से बेघर होने की स्थित का सामना करना पड़ा। उन्होंने एक-एक पाई जोड़ कर सन् 2000 में एक फ्लैट ख़रीदा। 2015 में जब उनकी इकलौती बेटी शादी विफल हुई तो वो अपने पुत्र के साथ अपने पिता के घर में रहने लगी। कई वर्षों तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा। 2022 में अपनी पुत्री के प्रति स्नेह के चलते उन्होंने अपने फ्लैट को एक ‘गिफ्ट डीड’ के ज़रिये अपनी बेटी के नाम कर दिया। इस ‘गिफ्ट डीड’ होने के कुछ ही महीनों के बाद उनकी बेटी का अपने पिता के प्रति रवैया बदलने लगा। पहले बुरा बर्ताव, फिर मार-पीट और उसके बाद उन्हें कई बार घर से भी निकाला गया। बाद में किसी न किसी तरह उन्हें घर में वापिस लिया गया। परंतु हद तो तब हुई जब बीते अगस्त में उनकी बेटी ने इस फ्लैट को बेच दिया और अब उन्हें इस उम्र में बेघर होने पर मजबूर कर दिया। नोएडा हो या देश का कोई अन्य शहर, ऐसी खबरें आपको लगातार मिलती रहती हैं और आपको सोचने पर मजबूर करती हैं कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा हैं?

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता, अजय गर्ग के अनुसार “ज़्यादातर लोगों को ‘गिफ्ट डीड’ और ‘वसीयत’ के बीच के मूल अंतर की जानकारी ही नहीं होती। कोई भी व्यक्ति अपने जीवन काल में, ‘गिफ्ट डीड’ के माध्यम से अपनी संपत्ति किसी के भी नाम कर सकता है। प्रायः ‘गिफ्ट डीड’ इस उम्मीद से की जाती है कि जिस किसी के भी हक़ में ‘गिफ्ट डीड’ लिखी गई हो वह व्यक्ति दान-दाता की अच्छी देखभाल करेगा। वहीं किसी भी ‘वसीयत’ पर मृत्यु के पश्चात ही अमल किया जा सकता है। दोनों ही स्थितियों में यदि बुजुर्गों को यह लगता है कि उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं हो रहा तो वे इसमें बदलाव या इसे रद्द भी कर सकते हैं।” ग़ौरतलब है कि ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007’ के तहत ऐसे तमाम प्रावधान हैं जहां बुजुर्गों की सुरक्षा व देखभाल का ख़्याल रखा गया है। इस अधिनियम का सही इस्तेमाल उचित क़ानूनी सलाह पर लिया जाए तो न सिर्फ़ बुजुर्गों को अपमानित करने वाली घटनाओं में कमी आएगी बल्कि अपनों का अपनों के प्रति स्नेह बना रहेगा।