शुक्रवार, 29 दिसंबर 2023

नए आपराधिक क़ानून क्यों हैं सवालों के घेरे में?


देश की संसद ने भारतीय दंड संहिता, 1860, आपराधिक प्रक्रिया अधिनियम, 1898 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 को बदल कर भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम का नाम दिया है जहां इन नए क़ानूनों में कई अहम प्रावधान लाए गए हैं। वहीं इनकी ख़ामियों को लेकर विवाद भी पैदा हो रहे हैं। देश भर में हर दल में मौजूद बड़े-बड़े वकील या क़ानून के विशेषज्ञ एक ओर इसका समर्थन कर रहे हैं वहीं इन क़ानूनों को लागू करने में आने वाली दिक़्क़तों की बात भी कर रहे हैं।


“जब भी कभी कोई नया क़ानून लाया जाता है या इस से संबंधित कोई विधेयक पास होता है तो आम जनता में यह उम्मीद जगती है कि स्थिति पहले से बेहतर होगी और उन्हें न्याय मिलने में देरी नहीं होगी।” ऐसा मानना है देश के पूर्व वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आज़ाद का। एक टीवी चैनल पर बोलते हुए उन्होंने मोदी सरकार की इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि, “यह एक अच्छी शुरुआत है, इसमें एक अहम बात है कि जिस तरह सूचना प्रौद्योगिकी को इन क़ानूनों में प्रमुखता दी गई है, यह न्याय प्रणाली में तेज़ी लाने की ओर एक अच्छी पहल है। परंतु देश में लंबित पड़े 4.5 करोड़ मुक़दमों को पहले तेज़ी से निपटना होगा तभी नये क़ानूनों को लागू किया जा सकेगा क्योंकि नये क़ानूनों की धाराओं में भी परिवर्तन किया गया है। जो धारा पहले लागू होती थी, नये क़ानूनों में वह धारा बदल गई है और उससे संबंधित सज़ा में भी बदलाव आया है।”


इसके साथ ही श्री आज़ाद का मानना है कि, “जब भी कभी आपराधिक न्यायिक व्यवस्था में सुधार लाए जाते हैं तो यह स्वाभाविक है कि इस प्रणाली के हर अंग का भी सुधार हो। जैसे कि पुलिस, जेल, अभियोजन और कोर्ट। जब तक इस तंत्र के हर अंग का सुधार नहीं होगा तब तक आपराधिक न्यायिक व्यवस्था में सुधार का क्या फ़ायदा? मिसाल के तौर पर पुलिस सुधार की सिफ़ारिशें 1978 से लंबित पड़ी हैं। जिस तरह मौजूदा न्यायिक व्यवस्था में पुलिस हिरासत में दिया गया कोई भी बयान कोर्ट में वैध नहीं माना जाता, उससे लोगों का पुलिस पर विश्वास नहीं बैठता। उसी तरह देश की जेलों में भी कई तरह के सुधार होने अनिवार्य हैं। इसलिए जब तक आपराधिक न्यायिक व्यवस्था के सभी अंगों में सुधार नहीं होंगे तब तक इन बदलावों से कुछ विशेष फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।”                


देश के नामी वकील और राज्य सभा सांसद कपिल सिब्बल ने इन नये क़ानूनों को पास किए जाने के तरीक़े पर सवाल उठाए हैं। वे कहते हैं कि, “जो संवैधानिक संस्थाएँ हैं उन्हें इन बिलों को इस तरह से पास नहीं करना चाहिए था। जहां लोक सभा में से 100 सांसदों को और राज्य सभा में से 46 सांसदों को निलंबित कर, बिना किसी चर्चा के इन विधेयकों को पारित किया है वह नियमों के विरुद्ध है। इन विधेयकों को पास करने से पहले जो कमेटी बनाई गई वहाँ पर क़ानून जानने वाले दिग्गजों की राय नहीं ली गई। जो बिल इस तरह से आम जनता के सांविधानिक हक़ों के ख़िलाफ़ पास किए जाते हैं वो असंवैधानिक कहलाते हैं।” सिब्बल आगे कहते हैं कि, इन नये क़ानूनों में 90 प्रतिशत क़ानून औपनिवेशिक काल के ही हैं जिनका केवल अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद ही किया गया है। यानी कि जो बात अंग्रेजों ने नहीं की वो आज की मौजूदा सरकार द्वारा की जा रही है।” कपिल सिब्बल ने इन बिलों का विरोध करते हुए इन्हें “मानवाधिकार विरोधी” बताया।


देश के पूर्व एएसजी अमन लेखी कहते हैं कि “इन नए क़ानूनों को बदलने की कोई ज़रूरत नहीं थी। इनमें बदलाव कर सरकार ने केवल आम जनता की भावनाओं को जागृत किया है। यह बात सही है कि ये क़ानून ब्रिटिश सरकार द्वारा लाए ज़रूर गये थे परंतु समय के चलते इन्हीं क़ानूनों को हमारे द्वारा ही विकसित किया गया था। इनमें एक आधुनिक न्यायशास्त्र है जो औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर है और आज के मौजूदा लोकतांत्रिक दौर का अभिन्न हिस्सा है। जब भी किसी राजनैतिक बयान की बात होती है तो वहाँ तो कुछ भी कहा जा सकता है। परंतु जब किसी क़ानून के बारे में बात की जाए तो बहुत सोच समझ कर, सही ढंग से और क़ानून के दायरे में रह कर ही की जानी चाहिए।” लेखी के अनुसार, “यह बदलाव आने वाली कई सदियों के लिए किए जाएँगे इसलिए इनको यदि बदलना ही है तो इनके हर पहलू पर काफ़ी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।” लेखी आगे कहते हैं कि, “जिस तरह इन विधेयकों को पास किया गया है वह अलोकतांत्रिक है। इसमें सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही दोषी हैं। क्योंकि जिस तरह की हरकत विपक्षी नेताओं ने की वह निलंबन के ही हक़दार थे। उधर संसद से विपक्षी नेताओं के निलंबन के चलते सरकार द्वारा ऐसे विधेयक को पास करना भी ग़लत था।”


देश में पुलिस सुधार के सुझावों को विधि आयोग की कई रिपोर्टों में दर्ज किया गया है। इसके साथ ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय के कई ऐसे फ़ैसले भी हैं जहां पुलिस सुधार की बात की गई है। इन पुलिस सुधारों में एक अहम बात है कि अभियोजन और जांच को एक दूसरे से अलग किया जाए। परंतु इन नये विधेयकों में ऐसा कुछ भी नहीं है। यदि इन विधेयकों में ऐसे कुछ अहम बदलाव लाए गए होते तो यह पुराने क़ानूनों से बेहतर होते। ब्रिटिश काल के कई ऐसे क़ानून हैं जहां गंभीर कृत्यों में मामूली सी सज़ा का प्रावधान है। वहीं इसके उलट कुछ कम गंभीर अपराधों में कड़ी से कड़ी सज़ा का प्रावधान है। इन पहलुओं को भी नहीं देखा गया है और न ही इनमें समावेश किया गया है। इन विधेयकों में एक अच्छी बात यह है कि ‘कम्युनिटी सर्विस’ को भी सज़ा का दर्जा दिया गया है। पश्चिम देशों की तरह कुछ अपराधियों को उनके अपराध का एहसास दिलाने में यह एक अच्छी पहल साबित होगी। यह नये क़ानून कितने उपयोगी सिद्ध होंगे यह तो आनेवाला समय ही बताएगा।

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2023

जागरूक भक्तों ने बचाया ओशो आश्रम


जब भी कभी कोई आध्यात्मिक गुरु या संगठन काफ़ी विख्यात हो जाता है तो उसमें विवाद भी पैदा होने लगते हैं। ऐसा ही कुछ हुआ विश्व भर के प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु ओशो के संगठन के साथ। कुछ दिनों पहले ओशो रजनीश का पुणे स्थित आश्रम भी ऐसे ही कारणों के चलते सुर्ख़ियों में रहा। विवाद का कारण पुणे के ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिसॉर्ट की ज़मीन में से 3 एकड़ जमीन को ओशो के ही कुछ अनुयायियों और पूर्व ट्र्स्टी द्वारा मिलकर बेचना था। इससे ओशो विद्रोही गुट की बेचैनी बढ़ गई, जिसने अपने “गुरु” की विरासत को खत्म करने के किसी भी कदम का कड़ा विरोध किया। मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुँच गया और इस ग़ैर-क़ानूनी बिक्री पर रोक लगी।    
 
देश भर में विभिन्न संप्रदायों और पंथों के आध्यात्मिक साधना केंद्रों की तरह पुणे का ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिसॉर्ट भी ओशो के अनुयायियों के लिए एक तीर्थ के समान है। ओशो को मानने वाले यहाँ ध्यान-साधना करने आते हैं। परंतु बीते कुछ वर्षों से यह आश्रम विवादों में रहा है। ओशो के भक्तों के अनुसार ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन (ओआईएफ) पुणे के कोरेगांव पार्क में बने इस रिसॉर्ट की ज़मीन को एक औद्योगिक घराने को कौड़ियों के भाव में बेचने का निर्णय ले चुका था। उनका यह भी आरोप है कि ओआईएफ़ विदेशी ताकतों के हाथ में है और स्विटजरलैंड से संचालित हो रहा है। ग़ौरतलब है कि पुणे के आश्रम की ज़मीन की क़ीमत लगभग ₹ 1500 करोड़ है। इसमें से एक हिस्सा ₹ 107 करोड़ में एक औद्योगिक घराने को बेचने का प्रयास किया जा रहा था। इस ‘गुप्त सौदे’ के बारे में जैसे ही ओशो के शिष्य योगेश ठक्कर को पता चला तो उन्होंने इस पर पुणे के चैरिटी कमिश्नर के पास आपत्ति दर्ज करवाई। 
 

जैसे ही यह बात ओशो के अन्य भक्तों के बीच फैली तो कई और भक्त भी इसका विरोध करने पहुँच गए। उल्लेखनीय है कि ओआईएफ़ ने स्वयं माना कि वो इसे बेचने की सोच रहा था। लेकिन इसके पीछे कोरोना के कारण ओशो कम्यून को हुए नुकसान की भरपाई करना था। उनका कहना था कि कोरोना के कारण ओशो कम्यून को काफी नुकसान हुआ। इसके अलावा सीमाएं बंद होने के कारण विदेशी अनुयायी नहीं आ सके, जिससे नुकसान और बहुत बढ़ गया और वित्तीय वर्ष 2020-21 में यह 3.37 करोड़ तक पहुँच गया। इसी वजह से उन्होंने प्रॉपर्टी बेचने की बात सोची। वकील वैभव मेठा के अनुसार, “ओआईएफ एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट है। यदि कोई सार्वजनिक ट्रस्ट कोई जमीन बेचना चाहता है, तो चैरिटी आयुक्त कार्यालय की अनुमति लेना अनिवार्य है। परंतु भक्तों के अनुसार इस ‘गुप्त सौदे’ के ‘एमओयू’ होने के बाद केवल औपचारिकता निभाने की मंशा से ही अनुमति माँगी गई। परंतु ओशो के भक्तों को इसकी भनक लग गई। देखते ही देखते दुनिया भर के हज़ारों भक्तों ने ईमेल के द्वारा चैरिटी कमिश्नर को अपनी आपत्ति जताई। 
 

इस मामले की सुनवाई 2021 में ही ज्वाइंट चैरिटी कमिश्नर के समक्ष शुरू हुई। आपत्तिकर्ताओं ने ओआईएफ ट्रस्टियों, जिन्होंने दो भूखंड बेचने की मांग की थी, उनसे जिरह की मांग की। संयुक्त चैरिटी आयुक्त कार्यालय ने याचिका को बरकरार रखते हुए जिरह की माँग को जायज़ ठहराया। इस पर ओआईएफ ने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, वहाँ भी जिरह की मांग को बरकरार रखा गया। इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ जाते हुए ओआईएफ सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में न केवल जिरह की अनुमति दी, बल्कि संयुक्त चैरिटी आयुक्त के कार्यालय को अपनी जाँच प्रस्तुत करने का भी निर्देश दिया। नतीजतन ओआईएफ को सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका को वापिस लेना पड़ा।  
 
ओशो के भक्त योगेश ठक्कर के अनुसार “संयुक्त चैरिटी आयुक्त के कार्यालय ने मामले में लगातार सुनवाई की। इतना ही नहीं एक विशेष दिन पर, सुनवाई सुबह 11 बजे शुरू हुई और रात 12 बजे के बाद समाप्त हुई,।” अंततः चैरिटी कमिश्नर ने ओआईएफ के आवेदन को खारिज कर दिया, क्योंकि वे विवादित ज़मीन को बेचने के लिए “सम्मोहक आवश्यकता साबित करने में विफल रहे”। इतना ही नहीं चैरिटी कमिश्नर कार्यालय ने यह भी तर्क दिया कि ओआईएफ के पास रिसॉर्ट का प्रबंधन करने के लिए पर्याप्त धन भी मौजूद था। 
 
आदेश के तहत ओआईएफ को न केवल 50 करोड़ की अग्रिम राशि लौटानी पड़ेगी, बल्कि आदेश की तारीख से एक महीने के भीतर, सहायक चैरिटी आयुक्त, ग्रेटर मुंबई क्षेत्र द्वारा नियुक्त किए जाने वाले विशेष लेखा परीक्षकों की एक टीम द्वारा 2005 से 2023 तक ओआईएफ के खातों का विशेष ऑडिट भी किया जाएगा। 
 
इस फ़ैसले के बाद ओशो के साथ रहे उनके वरिष्ठ शिष्य स्वामी चैतन्य कीर्ति ने कहा कि, “यह एक ऐतिहासिक फ़ैसला है जो ओशो की विरासत को बचाने में एक मील का पत्थर सिद्ध होगा।” वे यह भी कहते हैं कि “यह एक लंबी लड़ाई की शुरुआत है जहां कुछ निहित स्वार्थ वाले विदेशी तत्व ओशो की विरासत को हथियाना चाहते हैं, जिसमें ओशो की तमाम लेखनी व अन्य चल-अचल संपत्ति भी शामिल है। जो हम कभी भी होने नहीं देंगे” 
 
आध्यात्मिक संस्थाओं को स्थापित करने वाले गुरुओं के शिष्यों को उनके बताए सिद्धांतों का अनुपालन करना चाहिए वरना गुरुओं के वैकुण्ठ वास के बाद ऐसे विवादों का होना सामान्य है। फिर वो मामला चाहे ओशो के आश्रम की ज़मीन का हो या किसी अन्य आध्यात्मिक संस्था की संपत्ति का, ऐसे विवाद पैदा होते रहे हैं और होते रहेंगे। परंतु ऐसी हर आध्यात्मिक संस्था में जब तक आध्यात्मिक गुरुओं के सच्चे शिष्य इन ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियों का विरोध करते रहेंगे तो ही ऐसे विवादों को रोका जा सकेगा। शायद इसीलिए कहा गया है कि सत्य परेशान ज़रूर हो सकता परंतु पराजित नहीं हो सकता।

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2023

मोदी राज में अटकलों की कोई जगह नहीं


पाँच राज्यों के चुनाव संपन्न होते ही भाजपा द्वारा जीते गये तीन राज्यों में ‘कौन बनेगा मुख्य मंत्री’ को लेकर काफ़ी अटकलें लगने लगी। सभी राजनैतिक पंडित, पत्रकार और विश्लेषक अनुमान लगाने लग गये कि तीन राज्यों में किसका चेहरा सामने आएगा। परंतु इसके साथ ही सभी का यह मानना था कि मोदी राज में किसी भी तरह की अटकलों की कोई भी जगह नहीं है। यह बात भी चर्चा में आती है कि जब भी किसी महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति होने वाली होती है तो यदि व्यक्ति का नाम उस पद के लिए उठने लगता है तो उसे वह पद नहीं मिलता। प्रधान मंत्री मोदी एक ऐसे चेहरे को सामने लाते हैं जिसका किसी को कोई भी अंदाज़ा नहीं होता।


कुछ वर्ष पहले जब ‘राडिया टेप्स’ का खुलासा हुआ था तो, काफ़ी हंगामा मचा था कि किस तरह महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों को कुछ पत्रकार और कॉर्पोरेट जगत के लोग नियंत्रित करते हैं। इसके चलते उस समय की सरकार विपक्ष के सवालों के घेरे में थी। परंतु किसी भी दल की सरकार हो वह बिना कॉर्पोरेट के सहयोग के नहीं चलती। जो भी कॉर्पोरेट घराने जिस भी सरकार का सहयोग करते हैं स्वाभाविक है कि वो बदले में कुछ न कुछ तो लेंगे ही। इसलिए हर नियुक्ति पर उनकी सलाह को अहमियत दी जाती है। परंतु मोदी सरकार में ऐसा कोई भी प्रमाण नहीं मिला है जहां नियुक्तियों को लेकर किसी कॉर्पोरेट घराने का दख़ल दिखाई दिया हो। अलबत्ता विपक्षी दल भाजपा सरकार पर कुछ कॉर्पोरेट घरानों के प्रति ‘नज़दीकी’ का आरोप लगाती आई है।


जिस तरह तीन राज्यों में मोदी सरकार ने नये चेहरों को राज्य के मुखिया के रूप में पदासीन किया है उससे पूरे भाजपा काडर में दो तरह के संदेश गये हैं। पहला यह कि भले ही आप पहली बार ही चुनाव जीते हों आप राज्य के मुख्य मंत्री भी बन सकते हैं। दूसरा यह कि भले ही आपकी लोकप्रियता बहुत अधिक हो, होगा वही जो पार्टी की आला कमान तय करेगी, आप तो पार्टी के कार्यकर्ता ही रहेंगे। ऐसे में जो भी स्थानीय नेता पार्टी के बैनर तले अपनी राजनीति करते हैं उन्हें यह समझना होगा कि जब तक उनके सर पर भाजपा जैसे किसी बड़े दल का हाथ है तभी तक उनकी राजनीति बढ़ती रहेगी। जैसे ही कोई लोकप्रिय नेता पार्टी आला कमान के साथ नाफ़रमानी करेगा उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। फिर वो नेता चाहे किसी भी राज्य का मुख्य मंत्री रह चुका हो और अपने समर्थकों द्वारा हंगामा खड़ा करवाए या मीडिया में अपने समर्थकों द्वारा भावुक वीडियो डलवाए। इन हथकंडों से कुछ नहीं होने वाला।


किसी भी क्षेत्र में जब नये चेहरों को सामने लाया जाता है तो यही समझा जाता है कि उस क्षेत्र के वरिष्ठ लोगों ने अपना उत्तराधिकारी चुनने का फ़ैसला कर लिया है और सभी लोग उसे स्वीकार लेते हैं। ऐसा आप हर क्षेत्र में देखते हैं फिर वो चाहे खेल जगत हो, कॉर्पोरेट जगत हो या राजनीति। परिवर्तन हों तो तय ही है। परंतु जब भी किसी क्षेत्र के एक लोकप्रिय चेहरे को किसी महत्वपूर्ण पद से हटाया जाता है तो कभी-कभी वो विद्रोह का रास्ता भी अपनाने की सोचता है। इसलिए आए दिन आपको कॉर्पोरेट जगत, खेल जगत या राजनीति में ऐसे विद्रोह दिखाई देते हैं जो विभाजन करने पर मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में एक मज़बूत घराना चाहे वो कॉर्पोरेट या राजनैतिक ही क्यों न हो बिखराव की ओर चल देता है। ऐसा होना उस परिवार के लिए बहुत घातक साबित होता है।

राजनीति में जब भी किसी बड़े क़द्दावर नेता को मुख्य धारा की राजनीति से हटाना होता है तो उन्हें काफ़ी सम्मान के साथ या तो ‘मार्गदर्शक मंडल’ में भेज दिया जाता है या किसी राज्य का राज्यपाल बना दिया जाता है। ऐसे में उस नेता को समझ लेना चाहिए कि उनकी राजनैतिक पारी की समाप्ति हो चुकी है और उन्हें इस ‘राजनैतिक वनवास’ को स्वीकार लेना चाहिए। पिछले कुछ दशकों में ऐसे कुछ उदाहरण सामने आए हैं जहां विभिन्न दलों के कुछ क़द्दावर नेताओं ने बग़ावत करने की तो सोची, परंतु किन्ही कारणों से या तो उन्हें भरपूर समर्थन नहीं मिला या समर्थकों ने भी इस बात का अंदाज़ा लगा लिया कि नई पीढ़ी के साथ चलने में ही भलाई है। नतीजा यह होता है कि इन बाग़ी नेताओं को पहले जो पद सहज मिल रहा था अब उन्हें उस पद के लिए काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ेगी। ऐसे में जब ‘चिड़िया दाना चुग लेती है’ तो पछताने से कुछ भी हाथ नहीं लगता।

मोदी सरकार में किसी भी पद पर नियुक्ति की भविष्यवाणी का नहीं किए जाना एक सीधा संदेश है कि प्रधान मंत्री मोदी की हर कार्यकर्ता पर नज़र है और उसे उसकी मेहनत के अनुसार ही उचित इनाम या दंड दिया जाएगा। यदि कोई भी कार्यकर्ता अपनी क्षमता से अधिक महत्वाकांक्षी होगा तो उसे उसके परिणाम के लिए तैयार रहना चाहिए। भाजपा जैसे एक मज़बूत दल को किसी कार्यकर्ता द्वारा चुनौती देना आसान नहीं होगा। वहीं किसी भी बड़े दल के राष्ट्रीय नेतृत्व को भी यह समझ लेना चाहिए कि स्थानीय क़द्दावर नेताओं को उनका उचित सम्मान भी दिया जाए और टिकट बँटवारे में उनके अनुभव को भी सही स्थान मिले। हर राजनैतिक दल एक परिवार की तरह होता है और परिवार के हर सदस्य को पूरी अहमियत दी जानी चाहिए। कोई भी सरकार या दल केवल अटकलों के आधार पर नहीं चल सकता उसके लिए सभी पहलुओं को देखना आवश्यक होता है।

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2023

मांसाहार से परहेज़ क्यों?



जयपुर के हवा महल विधान सभा क्षेत्र से चुनाव जीते बाबा बालमुकुंद आचार्य, विधान सभा में शपथ लेने के पहले ही मीडिया की सुर्ख़ियों में छा गये। अपने इलाक़े के ‘नॉन-वेजीटेरियन’ होटलों और ‘नॉन-वेजीटेरियन’ पकवान बेचने वाले ठेलों को बंद कराने के लिए उन्होंने निगम और पुलिस के अधिकारियों को सरेआम लताड़ना शुरू कर दिया। होटल मालिकों और ठेले वालों को भीड़ के सामने धमकाते हुए उनका वीडियो सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हुआ। लगता है उनके इस कारनामे की खबर भाजपा के बड़े नेताओं तक भी पहुँच गई। क्योंकि अगले ही दिन बाबा बालमुकुंद आचार्य ने उसी होटल में भोजन भी किया और लंबी दाढ़ी वाले होटल के मालिक मौलाना के साथ गलबइयाँ देते हुए फ़ोटो खिंचवाया।


ये पहली घटना नहीं है। अक्सर मांसाहार को लेकर भाजपा और संघ के कार्यकर्ता इस तरह के हंगामें देश भर में खड़े करते रहते हैं। ख़ासकर बीफ का व्यापार करने वालों के ख़िलाफ़। उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया में बीफ के निर्यात का दूसरा सबसे बड़ा देश है। इस कारोबार में 60 प्रतिशत से ज़्यादा हिंदू व्यापारी लगे हुए हैं। अगर भाजपा का लक्ष्य मांसाहार को बंद करवाना है तो पहले बीफ के इन हिंदू निर्यातकों के कारोबार बंद करवाये जाने चाहिए। पर इस दिशा में आजतक कोई प्रयास नहीं किया गया। बल्कि भारत सरकार का तो घोषित लक्ष्य बीफ के व्यापार में तेज़ी से वृद्धि करना है।


एक और पक्ष महत्वपूर्ण है। देश के अलग-अलग प्रांतों में रहने वाले करोड़ों हिंदू, जिनमें ब्राह्मण भी शामिल हैं, मांसाहारी हैं। कश्मीर के ब्राह्मण मटन खाते हैं और जगन्नाथ पुरी के ब्राह्मण मछली को जल तोरई कहते हैं। भारत के प्रधान मंत्री रहे पंडित अटल बिहारी वाजपेयी जी भी मांसाहार के बेहद शौक़ीन थे। दिल्ली के पंडारा पार्क इलाक़े के नॉन-वेजीटेरियन  होटलों से अक्सर उनके लिए चिकन, मटन और कबाब जाया करते थे। इतना ही नहीं आरएसएस की प्रेरणा के स्रोत स्वामी विवेकानंद जी भी मांसाहारी थे। ये सब तथ्य शायद आम जनता को मालूम नहीं हैं। इसीलिए ये राजनैतिक कार्यकर्ता ऐसी वाहियात हरकतें करते रहते हैं।

अपनी ताक़त का इस्तेमाल करने से पहले क्या विधायक जी यह भूल गये थे कि अभी तक उन्होंने विधायक की शपथ भी नहीं ली? क्या विधायक जी को उनके सलाहकारों ने भारत के क़ानून के तहत उनकी सभी ज़िम्मेदारियों की जानकारी कुछ ही घंटों में दे दी, जिसके तहत उन्होंने वर्दी में तैनात पुलिस अधिकारियों तक को धमका डाला? क्या विधायक जी ने ऐसी तेज़ी अपने क्षेत्र की जनता की अन्य समस्याओं को निपटाने में भी दिखाई? विधायक जी के वीडियो में साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है कि जिस सड़क पर वो ये कार्यवाही कर रहे हैं उस सड़क का बुरा हाल है और वो जगह-जगह से खुदी पड़ी है। क्या विधायक जी ने नगर निगम के अधिकारियों को इस समस्या के चलते हो रही असुविधा का ज़िम्मेदार ठहराते हुए कोई कार्यवाही की? यदि विधायक जी का उद्देश प्रचार पाना ही था तो वो इसे एक बेहतर ढंग से भी पा सकते थे। ग़ौरतलब है कि प्रधान मंत्री मोदी जी ने भी, पाँच राज्यों में हुए चुनावों के नतीजों के बाद अपने भाषण में कहा था कि “आज की विजय ऐतिहासिक है, अभूतपूर्व है। आज सबका साथ, सबका विकास की जीत हुई है...आज ईमानदारी, पारदर्शिता और सुशासन की जीत हुई है।” यानी प्रधान मंत्री भी सभी का साथ और सभी का विकास चाहते हैं। परंतु विधायक जी द्वारा की गई कार्यवाही तो केवल एक समुदाय विशेष के विरुद्ध ही दिखाई दी।


कुछ वर्ष पहले बनी एक फ़िल्म ‘नायक’ आज तक चर्चा में है। इस फ़िल्म में दिखाया गया कि किस तरह एक दिन का मुख्य मंत्री जनता के विकास के लिए वो सब करता है जो एक मुख्य मंत्री को वास्तव में करना चाहिए। स्वाभाविक है कि फ़िल्म का लोकप्रिय होना निश्चित ही था। परंतु जो ‘रील लाइफ’ में दिखाया गया क्या ऐसा ‘रियल लाइफ’ में हो सकता है? जवाब है, जहां चाह, वहाँ राह। यदि हमारे देश के सभी नेता जनता के विकास के बारे सोचेंगे और ऐसे ठोस कदम उठाएँगे तो जो नायक फ़िल्म में हुआ वो वास्तव में भी हो सकता है। परंतु क्या आजकल के नेताओं में ऐसी इच्छा शक्ति दिखाई देती है? मात्र 600 मतों से जीते विधायक बाबा बालमुकुंद आचार्य ने चुनाव जीतते ही जिस तरह क़ानून की परवाह किए बिना अवैध दुकानें बंद करनी शुरू कर दी उससे जनता और विधायक जी के समर्थकों को यह लगने लगा कि ये विधायक जी तो क्रांति ले आएँगे।


बात जयपुर की हो या देश के अन्य किसी नगर की, तमाम तरह के सामान बेचने वाले अवैध दुकानें और ठेले, हर शहर में बढ़ते जा रहे हैं। इनके कारण जगह-जगह ट्रैफ़िक जाम भी हो जाता है। स्थानीय निवासियों को इन दुकानों से असुविधा भी होती है। क़ानून व्यवस्था में भी दिक़्क़त आती है। परंतु भ्रष्टाचार के चलते नगर निगम और पुलिस के अधिकारी ऐसी अवैध दुकानों को न सिर्फ़ लगने देते हैं बल्कि उनसे नियमित रूप से ‘सुविधा शुल्क’ भी लेते हैं। इसीलिए यदि कोई भी इन अवैध दुकानों को हटाने की शिकायत भी करता है तो कोई कार्यवाही नहीं की जाती। जिस तरह राजस्थान के विधायक बाबा बालमुकुंद आचार्य ने बिना विधायक की शपथ लिए, चुनाव जीतते ही केवल मांस बेचने वालों की अवैध दुकानों पर कार्यवाही की है उन्हें अपने चुनावी क्षेत्र में ऐसी कार्यवाही हर उस दुकान पर करनी चाहिए जो अवैध हो। तभी यह संदेश जाएगा कि विधायक जी और उनका दल किसी धर्म विशेष के ख़िलाफ़ नहीं है, केवल ग़ैर-क़ानूनी धंधों के ख़िलाफ़ हैं ।            


आग लगने की स्थिति में घबराएँ नहीं


आए दिन हम आगज़नी के हादसों के बारे में सुनते रहते हैं। ऐसी दुर्घटनाओं में कई लोग अपनी जान भी गँवा देते हैं। अक्सर जान-माल के नुक़सान का कारण अज्ञानता और जागरूकता होती है। अग्निकांड जैसे हादसों में यदि धैर्य और सूझबूझ से काम लिया जाए तो बड़े हादसे और जान-माल का नुक़सान टाला जा सकता है। परंतु पश्चिमी देशों की तुलना में हमारे देश की आपदा प्रबंधन एजेंसियाँ उतनी तत्त्पर्ता से काम नहीं करतीं। यदि स्कूली बच्चों और सभी नागरिकों को आपदा प्रबंधन की प्राथमिक जानकारी व्यापक रूप से दे दी जाए तो दुर्घटनाओं के समय यह जानकारी जान-माल का अधिक नुक़सान होने से बचा सकती है।

पाठकों को याद दिला दें कि 1986 में दिल्ली के पाँच सितारा होटल सिद्धार्थ में भीषण आग लगी थी। इस दुर्घटना में 37 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और 40 से अधिक लोग घायल हुए थे। ग़ौरतलब है कि इस हादसे में मरने वाले केवल भारतीय ही थे जबकि उस होटल में अमरीका और जापान के मेहमान भी रह रहे थे। विदेशी मेहमानों को केवल मामूली चोट ही आई थी। क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों हुआ?

सभी विदेशियों ने अपने-अपने कमरों के दरवाज़ों के नीचे वाली जगह पर गीले तौलिये लगा दिये थे। ऐसा करने से धुएँ को कमरे के अंदर आने का मार्ग नहीं मिला। यदि धुआँ किसी कारण कमरे में घुसा भी तो काफ़ी कम मात्रा में। इसके साथ ही सभी विदेशियों ने अपनी नाक को एक गीले कपड़े से बांध रखा था जिससे कि धुआँ उनके फेंफड़ों में न जा सके। चूँकि इन सभी विदेशियों को आपदा प्रबंधन की प्राथमिक जानकारी थी, ये सभी अपने-अपने कमरों में ज़मीन पर लेट गए। क्योंकि धुआँ हमेशा ऊपर की ओर ही उठता है। ऐसा करने से इन विदेशियों ने, अग्निशमन दल के पहुँचने तक ख़ुद को जीवित रखा। जबकि भारतीयों को ऐसी प्राथमिक जानकारी न होने के कारण आग और धुएँ का शिकार होना पड़ा। हड़बड़ी में सभी भारतीय यहाँ-वहाँ भागने लगे और फेंफड़ों में धुआँ घुसने के कारण उनका दम घुटा।

दिल्ली हो या देश का अन्य कोई भी शहर जब भी किसी इमारत या भवन में आग लगती है तो वहाँ अफ़रा-तफ़री का माहौल बन जाता है। लोग अज्ञानता और घबराहट के चलते यहाँ-वहाँ भागते हैं और अपने शरीर में धुएँ को बड़ी आसानी से प्रवेश दे देते हैं। ग़ौरतलब है कि आग लगने की स्थिति में यदि हम इधर-उधर दौड़ते हैं तो हमारी सांस लेने की गति भी बड़ जाती है और धुआँ काफ़ी अधिक मात्रा में हमारे फेंफड़ों में घुस जाता है, नतीजतन हम बेहोश हो कर गिर जाते हैं और आग की लपटें हमें जला देती हैं। आँकड़ों के अनुसार अग्निकांड में ज़्यादा मौतें दम घुटने के कारण होती हैं।

इसलिए यदि आप कभी ऐसी स्थिति में फँस जाएँ तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें। सबसे पहली बात बिलकुल भी घबराएँ नहीं। यदि आप होश में रहेंगे और हिम्मत से काम लेंगे तो आप औरों की मदद भी कर पायेंगे। अपने मुँह पर एक गीला रूमाल या कपड़ा बांध लें और ज़मीन पर लेटे रहें। यदि आप किसी बंद कमरे में फँस जाते हैं तो उस कमरे में जहां से भी धुआँ आने की संभावना हो उस रास्ते को किसी गीले कपड़े से जाम कर दें। जब तक अग्निशमन दल के कर्मी आप तक पहुँचें, ऐसी ही सलाह अपने आस-पास के लोगों को भी दें। यदि आपका मोबाइल फ़ोन काम कर रहा हो तो आपातकालीन नम्बरों पर कॉल करके अपनी सही लोकेशन बताएँ जिससे कि आप तक सहायता पहुँच सके।

इसके साथ ही देश में आपदा प्रबंधन की एजेंसियों को भी नागरिकों के बीच जागरूकता को बढ़ाना चाहिए। दमकल विभाग को भी पुलिस कंट्रोल रूम की तर्ज़ पर छोटी-छोटी अग्निशमन की गाड़ियों को मुख्य स्थानों पर खड़ा कर देना चाहिए। ऐसा करने से ट्रैफ़िक जाम के चलते अग्निशमन की गाड़ियों को पहुँचने में देरी भी नहीं लगेगी। इन छोटों गाड़ियों में तैनात कर्मियों को अग्नि हादसों में प्राथमिक कार्यवाही करने की पूरी ट्रेनिंग भी हो। दुर्घटना की स्थिति में ऐसे कर्मियों का नज़दीकी अग्निशमन केंद्र से संपर्क हो और वे सही स्थिति का जायज़ा लेकर उचित मदद मँगवा सकें। आज के सूचना क्रांति के युग में काफ़ी मदद सोशल मीडिया से भी मिल सकती है। जैसे पुलिस की मदद के लिए सिविल डिफ़ेंस के स्वयंसेवी त्योहारों और अन्य बड़े आयोजनों पर तैनात किए जाते हैं तो आपदा प्रबंधन के लिए भी ऐसा ही कुछ किया जाना चाहिए। ये सब तभी संभव है जब आपदा प्रबंधन विभाग नागरिकों के बीच व्यापक जागरूकता फैलाये और संबंधित सरकारें भी आपदा प्रबंधन को पूरी सहायता प्रदान करें। जब भी कोई दुर्घटना होती है तो उस पर राजनैतिक रोटियाँ न सेकीं जाएँ। जहां तक हो सके दुर्घटना के प्रबंधन की दिशा में काम हो न कि आरोप प्रत्यारोप लगाए जाएँ। पश्चिम की तुलना में हमें भी आपदा स्थिति से जागरूक हो कर लड़ने की ज़रूरत है।

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2023

घरों को बर्बाद करता सट्टा


चुनावी मौसम हो या कोई टूर्नामेंट, सटोरियों की हमेशा मौज ही रहती है। इस आधुनिक जुए के खेल ने अपनी गिरफ़्त में करोड़ों घर बर्बाद किए हैं। आए दिन अख़बारों में खबर छपती हैं कि किसी ने सट्टे में हारी हुई रक़म न अदा कर पाने के चलते या तो अपनी ज़मीन, वाहन या ज़ेवर बेच दिये या परिवार सहित आत्महत्या कर ली। सवाल उठता है कि सीधे-सादे लोग जो मेहनत कर अपनी घर का चूल्हा-चौका चला रहे होते हैं उन्हें सट्टे की आदत कैसे पड़ती है? दूसरों की बर्बादी देखने के बावजूद सट्टेबाज़ी इतनी लोकप्रिय क्यों हो रही है? मशहूर खिलाड़ी और अभिनेता इस खेल के बदले हुए स्वरूप ‘गेमिंग ऐप’ के लिए विज्ञापन कर बेक़सूर लोगों को क्यों इस चक्रव्यूह में फँसा रहे हैं? क्या इसके लिए सूचना क्रांति को ज़िम्मेदार ठहराया जाए?


जब भी कभी क्रिकेट, फुटबॉल या अन्य किसी लोकप्रिय खेल के टूर्नामेंट की धूम मचती है वैसे ही सट्टा बाज़ार भी अपने पाँव पसार लेता है। आधुनिकता के चलते ऐसे कई गेमिंग ऐप सामने आ चुके हैं जो लुभावने विज्ञापन बना कर सीधे-सादे लोगों को इस काले कारोबार के मायाजाल में फँसा लेते हैं। शुरुआत में एक छोटी सी जीत ही काफ़ी होती है किसी को इस जाल में आसानी फँसाने के लिए। मिसाल के तौर पर यदि कोई व्यक्ति किसी मित्र या जानकार को जीतता हुआ देखता है तो उत्सुकतावश वो भी एक छोटी सी रक़म किसी खिलाड़ी या टीम पर लगा देता है। यदि मित्र की सलाह काम कर जाए और बताई गई टीम या खिलाड़ी पर लगी बाज़ी जीत में बदल जाती है तो लगता है कि बिना कुछ परिश्रम किए घर बैठे ही पैसे कमा लिए। बस इतना ही काफ़ी होता है सट्टे की लत लगने के लिये।


ऐसा ही कुछ होता है चुनावों के नतीजों के अनुमानों को लेकर। जैसे ही चुनाव संपन्न हो जाते हैं सट्टा बाज़ार गर्म होना शुरू हो जाता है। कभी-कभी तो कई चरणों में संपन्न होने वाले चुनावों को सट्टा बाज़ार के भाव और उससे संबंधित खबरें प्रभावित भी करने का काम करते हैं। ऐसे में कभी-कभी चुनावी उम्मीदवारों और राजनैतिक पार्टी का समर्थन करने वाले भी इस पशोपेश में हो जाते हैं कि कहीं उनके द्वारा दिया गया मत ज़ाया तो नहीं गया? परंतु चुनावों में ऐसा नहीं होता कि चुनावी नतीजों को सट्टा बाज़ार नियंत्रित करे। चुनावों में जिस भी पार्टी या उम्मीदवार की हवा होती है वही विजयी होता है क्योंकि उसके काम को ही जनता का समर्थन मिलता है। सट्टा बाज़ार के आँकलन को तो केवल मनोरंजन की दृष्टि से देखना चाहिए। अभी तक ऐसा कोई भी उदाहरण नहीं मिला है जहां सट्टा बाज़ार ने चुनावी नतीजों को प्रभावित कर उन्हें बदल दिया हो।

वहीं अगर खेलों की बात करें तो ज्यादातर सट्टेबाजी अंडरवर्ल्ड के माफियाओं द्वारा संचालित होती है। वो किसी न किसी रूप में खेल और खिलाड़ियों दोनों को अपने तरीके से प्रभावित करने की कोशिश में लगे रहते हैं। वो अपने फायदे में मैचों को फिक्स कराना भी चाहते हैं। उनके द्वारा खिलाड़ियों को फांसने की कोशिश भी की जाती है। ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जब कोई खिलाड़ी उनके जाल में नहीं फँसना चाहता तो उन्हें धमकियां भी मिली हैं। पिछले कुछ बरसों में एशियाई मुल्कों में मैच फिक्सिंग और स्पाट फिक्सिंग की घटनाएं भी बढ़ी हैं।


ऐसा नहीं है कि जाँच एजेंसियों के पास इस ख़तरनाक खेल की कोई जानकारी नहीं है। पिछले दिनों कई गेमिंग ऐप की शिकायतें मिलने पर जाँच एजेंसियों ने कड़ी कार्यवाही भी की। परंतु इन गोरखधंधों को चलाने वाले कभी पकड़े नहीं जाते। केवल उनके प्यादे ही बलि का बकरा बनते हैं। एक अनुमान के तहत भारत का सट्टा बाजार करीब तीन लाख करोड़ या इससे अधिक रकम का है। क्रिकेट के खेल को ही लें तो इस खेल में सट्टेबाजी का धंधा हर मैच पर करीब दो सौ करोड़ रुपए का है। परंतु अघोषित तौर पर ये आंकड़ा सात सौ करोड़ रुपए का बताया जाता है। सट्टेबाजी के गैरकानूनी माफिया सिंडिकेट, आधुनिक मैच फिक्सर्स क्रिकेट में अपने पैर जमा चुके हैं। कारोबार इतने सुव्यवस्थित तरीके से चलता है कि कोई सोच भी नहीं सकता।

परंतु इस गोरखधंधे में हारने वाले मासूम लोग यह नहीं जानते कि लालच के चलते जल्दी ज़्यादा पैसा कमाने के चक्कर में वे अपने बाप-दादा की मेहनत से बनाई हुई ज़मीन जायदाद को गिरवी या बेचने में क्षण बाहर भी नहीं लगाते। बहकावे में आकर जब यह सट्टा हार जाते हैं तो या तो मज़दूरी करने को मजबूर हो जाते हैं या आत्महत्या कर लेते हैं। सोचने वाली बात है कि सट्टे या जुए के खेल में कोई हारता है तो कोई जीतता है। परंतु सट्टा खिलाने वालों का घर हमेशा भरा रहता है। सट्टा चलाने वाले माफिया अपने प्यादों की मदद से मासूमों को फँसाते हैं और अपने धंधे को बढ़ाते हैं। परंतु एक बात इस खेल में एक बात अहम है कि ‘सट्टे की जीत बुरी है’। क्योंकि सट्टे की जीत ही है जो उसकी लत लगाती है, यदि कोई सट्टे के शुरुआती दौर में हारने लग जाए तो वो सचेत हो जाएगा और आगे नहीं खेलेगा। इसलिए सट्टे की यह कड़वी सच्चाई जानने के बाद जहां तक हो सके सट्टे से बच कर रहें और बर्बादी की ओर न जाएँ।