शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

उपराष्ट्रपति का ऐतिहासिक इस्तीफ़ा !

22 जुलाई 2025 को भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से अचानक इस्तीफा दे दिया। यह भारत के इतिहास में पहली बार है जब किसी उपराष्ट्रपति ने अपने कार्यकाल के दौरान इस्तीफा दिया है। यह घटना न केवल राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में भी कई सवाल खड़े करती है। इस्तीफे के कारणों पर अटकलों का बाज़ार भी गर्म है। एक अनुमान यह भी है कि जिस तरह भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा ने राज्यसभा के सभापति के अधिकार क्षेत्र में अनाधिकृत रूप से विपक्ष की ओर इशारा करते हुए ये कहा कि, “नथिंग विल गो ऑन रिकॉर्ड व्हाटएवर आई विल से दैट विल गो ऑन रिकॉर्ड यू शुड नो।”

भारत के संविधान में उपराष्ट्रपति का पद दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद है, जो राष्ट्रपति के बाद आता है। 1950 में संविधान लागू होने के बाद से, 13 उपराष्ट्रपतियों ने इस पद को सुशोभित किया है। हालांकि, पहले कभी किसी उपराष्ट्रपति ने अपने कार्यकाल के दौरान इस्तीफा नहीं दिया। कुछ उपराष्ट्रपतियों, जैसे वी.वी. गिरी, ने राष्ट्रपति चुनाव में भाग लेने के लिए इस्तीफा दिया था। जगदीप धनखड़ का इस्तीफा, जो उन्होंने 21 जुलाई 2025 को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन दिया, इस दृष्टिकोण से एक ऐतिहासिक व अप्रत्याशित घटना है।

भारत का संविधान उपराष्ट्रपति के पद के लिए कई प्रावधानों को परिभाषित करता है, जो भाग V (संघ) के अनुच्छेद 63 से 71 के तहत दिए गए हैं। उपराष्ट्रपति के इस्तीफे और इसके बाद की प्रक्रिया के लिए कई महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। संविधान के अनुच्छेद 67(a) के अनुसार, उपराष्ट्रपति अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रपति को हस्तलिखित पत्र के माध्यम से अपना इस्तीफा सौंपना होता है। यह इस्तीफा तत्काल प्रभाव से स्वीकार किया जाता है, जैसा कि जगदीप धनखड़ के मामले में भी हुआ। इस्तीफे के स्वीकार होने के बाद उपराष्ट्रपति का पद रिक्त हो जाता है।

वहीं अनुच्छेद 68 के तहत, उपराष्ट्रपति के पद में रिक्ति, चाहे वह इस्तीफा, निधन, हटाने या अन्य कारणों से हो, को यथासंभव शीघ्र भरना आवश्यक है। संविधान के अनुसार, नए उपराष्ट्रपति का चुनाव 60 दिनों के भीतर होना चाहिए। नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति पूरे पांच वर्ष के कार्यकाल के लिए पद संभालेगें। भारत के उपराष्ट्रपति, राज्यसभा के पदेन सभापति होते है। उनके इस्तीफे के बाद, राज्यसभा की जिम्मेदारियां अस्थायी रूप से उपसभापति (डिप्टी चेयरमैन) या राष्ट्रपति द्वारा अधिकृत किसी अन्य सदस्य को सौंपी जाती हैं।

गौरतलब है कि, संविधान के अनुच्छेद 65 के अनुसार, यदि राष्ट्रपति का पद रिक्त हो या वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हों, तो उपराष्ट्रपति उनके कर्तव्यों का निर्वहन करता है। हालांकि, उपराष्ट्रपति के पद रिक्त होने की स्थिति में, संविधान इस बारे में मौन है कि उपराष्ट्रपति के कर्तव्यों का निर्वहन कौन करेगा, सिवाय इसके कि राज्यसभा के सभापति के कर्तव्यों को उपसभापति संभाल सकता है।

उपराष्ट्रपति का चुनाव लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों से मिलकर बने एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है। यह चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के माध्यम से एकल हस्तांतरणीय मत (सिंगल ट्रांसफरेबल वोट) के आधार पर होता है। इसमें नामांकन के लिए कम से कम 20 सांसदों को प्रस्तावक और 20 सांसदों को समर्थक के रूप में होना आवश्यक है।

जगदीप धनखड़ के इस्तीफे ने कई संवैधानिक और राजनीतिक सवाल खड़े किए हैं। यह पहली बार है जब उपराष्ट्रपति ने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया है, जिसके कारण इसकी प्रक्रिया और प्रभावों पर चर्चा तेज हो गई है। धनखड़ का इस्तीफा संसद के मानसून सत्र के पहले दिन हुआ, जो राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय है। यह सत्र आमतौर पर महत्वपूर्ण विधायी कार्यों और नीतिगत चर्चाओं के लिए जाना जाता है। उपराष्ट्रपति के इस्तीफे से राज्यसभा की कार्यवाही में अस्थायी व्यवधान हो सकता है, क्योंकि उपसभापति को सभापति की जिम्मेदारियां संभालनी होंगी। यह स्थिति सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के बीच नए राजनीतिक समीकरणों को जन्म दे सकती है।

उल्लेखनीय है कि, संविधान उपराष्ट्रपति के इस्तीफे के बाद की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है, लेकिन कुछ अस्पष्टताएं हैं। उदाहरण के लिए, यदि उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा हो और वह इस्तीफा दे दे, तो इस स्थिति में कर्तव्यों का निर्वहन कौन करेगा, इस बारे में संविधान मौन है। ऐसी स्थिति में, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठतम उपलब्ध न्यायाधीश को राष्ट्रपति के कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ सकता है, जैसा कि 1969 में राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद हुआ था।

जगदीप धनखड़ के इस्तीफे ने भारत के संवैधानिक ढांचे की मजबूती को परखने का अवसर प्रदान किया है। संविधान में स्पष्ट प्रावधानों के कारण, इस रिक्ति को भरने की प्रक्रिया व्यवस्थित रूप से शुरू हो चुकी है। हालांकि, यह घटना कुछ दीर्घकालिक सवाल भी खड़े करती है। क्या उपराष्ट्रपति के कर्तव्यों के निर्वहन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था को और स्पष्ट करने की आवश्यकता है? नए उपराष्ट्रपति के चुनाव में राजनीतिक दलों के बीच सहमति और तनाव का स्तर क्या होगा? यह सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष के बीच एक नई राजनीतिक जंग का कारण बन सकता है?

जगदीप धनखड़ का इस्तीफा भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है, जो संविधान की लचीलापन और मजबूती को दर्शाती है। अनुच्छेद 67(a) और 68 जैसे प्रावधान इस स्थिति को संभालने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश प्रदान करते हैं। हालांकि, यह घटना कुछ अस्पष्टताओं को भी उजागर करती है, जो भविष्य में संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। नए उपराष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया और इसके राजनीतिक प्रभाव निश्चित रूप से भारत की संसदीय प्रणाली की गतिशीलता को प्रभावित करेंगे। यह समय भारत के लिए न केवल एक नया उपराष्ट्रपति चुनने का है, बल्कि अपनी संवैधानिक प्रक्रियाओं की मजबूती को और परखने का भी है।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं के बीच झूलता आम आदमी

भारत में स्वास्थ्य सेवा एक ऐसा क्षेत्र है, जहां लाखों लोग अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए दवाओं पर निर्भर हैं। लेकिन दवाओं के बाजार में एक बड़ा सवाल हमेशा चर्चा में रहता है, ब्रांडेड दवाएं या जेनेरिक दवाएं? इन दोनों के बीच का अंतर और इनका महत्व समझना न केवल आम जनता के लिए जरूरी है, बल्कि यह भी जानना जरूरी है कि कैसे फार्मास्युटिकल कंपनियां भोले-भाले ग्राहकों का शोषण कर रही हैं। यह एक ऐसा विषय है जिसने दर्द के व्यापार को काफ़ी बढ़ावा दिया है।

सबसे पहले, हमें यह समझना होगा कि ब्रांडेड और जेनेरिक दवाएं क्या हैं? ब्रांडेड दवाएं वे होती हैं, जो किसी फार्मास्युटिकल कंपनी द्वारा अपने ब्रांड नाम के तहत बेची जाती हैं। ये दवाएं आमतौर पर महंगी होती हैं, क्योंकि इनमें कंपनी का ब्रांड वैल्यू, मार्केटिंग लागत और अनुसंधान और विकास का खर्च शामिल होता है। दूसरी ओर, जेनेरिक दवाएं वही दवाएं होती हैं, जिनमें वही सक्रिय रासायनिक तत्व (Active Pharmaceutical Ingredient) होते हैं, जो ब्रांडेड दवाओं में होते हैं, लेकिन इन्हें किसी ब्रांड नाम के तहत नहीं बेचा जाता। जेनेरिक दवाएं आमतौर पर सस्ती होती हैं, क्योंकि इनमें मार्केटिंग और ब्रांडिंग का खर्च नहीं होता। उदाहरण के तौर पर, क्रोसिन का जेनेरिक विकल्प पैरासिटामोल है, जो उसी तरह काम करता है, लेकिन इसकी कीमत बहुत कम होती है।


भारत जैसे देश में, जहां अधिकांश आबादी मध्यम और निम्न-आय वर्ग से आती है, जेनेरिक दवाओं का महत्व बहुत अधिक है। ये दवाएं न केवल सस्ती होती हैं, बल्कि गुणवत्ता में भी ब्रांडेड दवाओं के समान होती हैं। भारत सरकार ने जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने के लिए ‘जन औषधि योजना’ शुरू की है, जिसके तहत देश भर में जन औषधि केंद्र खोले गए हैं। इन केंद्रों पर जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 50-90% तक सस्ती मिलती हैं।

उदाहरण के लिए, एक ब्रांडेड दवा, जैसे कि टेल्मिसार्टन जो उच्च रक्तचाप के लिए उपयोग की जाती है, की 10 गोलियों की कीमत 200-300 रुपये हो सकती है। वहीं, टेल्मिसार्टन की जेनेरिक दवा की कीमत 20-50 रुपये हो सकती है। यह अंतर गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों के लिए बहुत बड़ा है, जो अपनी जिंदगी बचाने के लिए इन दवाओं पर निर्भर हैं।


जानकारों के मुताबिक फार्मास्युटिकल कंपनियों की लूट का सबसे बड़ा कारण उनकी मार्केटिंग रणनीति और ब्रांडिंग है। ये कंपनियां ब्रांडेड दवाओं को बढ़ावा देने के लिए भारी मात्रा में पैसा खर्च करती हैं। डॉक्टरों को मुफ्त नमूने, विदेश यात्राएं और अन्य प्रलोभन दिए जाते हैं ताकि वे मरीजों को ब्रांडेड दवाएं लिखें। इसका नतीजा यह होता है कि मरीज, जो ज्यादातर दवाओं की तकनीकी जानकारी से अनजान होते हैं, महंगी दवा खरीदने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

इसके अलावा, कई फार्मा कंपनियां एक ही दवा को अलग-अलग ब्रांड नामों से भी बेचती हैं, जिससे बाजार में भ्रम पैदा होता है। उदाहरण के लिए, पैरासिटामोल को विभिन्न कंपनियां क्रोसिन, कैल्पॉल वी डोलो आदि नामों से बेचती हैं, लेकिन इन सभी में एक ही सक्रिय तत्व होता है। मरीजों को लगता है कि ब्रांडेड दवा ज्यादा प्रभावी होगी, जबकि हकीकत में जेनेरिक दवा भी उतनी ही प्रभावी होती है।

भारत में जेनेरिक दवाओं के प्रति कई मिथक प्रचलित हैं, जो फार्मा कंपनियों द्वारा फैलाए गए हैं। एक आम धारणा है कि जेनेरिक दवाएं कम गुणवत्ता वाली होती हैं। यह पूरी तरह गलत है। भारत में जेनेरिक दवाओं का निर्माण ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत सख्त नियमों के अधीन होता है। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया यह सुनिश्चित करता है कि जेनेरिक दवाएं गुणवत्ता और प्रभावशीलता में ब्रांडेड दवाओं के बराबर हों।

हालांकि, कुछ छोटी दवा कंपनियां, जो जेनेरिक दवाएं बनाती हैं, गुणवत्ता नियंत्रण में कमी कर सकती हैं। लेकिन यह समस्या केवल जेनेरिक दवाओं तक सीमित नहीं है, कुछ ब्रांडेड दवाओं में भी गुणवत्ता की कमी देखी गई है। इसलिए, मरीजों को चाहिए कि वे केवल विश्वसनीय जन औषधि केंद्रों या लाइसेंस प्राप्त फार्मेसी से ही दवाएं खरीदें।

भारत सरकार ने जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। जन औषधि केंद्रों की संख्या बढ़ाने, जागरूकता अभियान चलाने और डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखने के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है। साथ ही, मरीजों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। उन्हें अपने डॉक्टर से पूछना चाहिए कि क्या जेनेरिक दवा उपलब्ध है और क्या वह ब्रांडेड दवा का विकल्प हो सकती है।

फार्मा कंपनियों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। मुनाफा कमाना गलत नहीं है, लेकिन मरीजों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करना अनैतिक है। सरकार को ऐसी नीतियां लागू करनी चाहिए, जो फार्मा कंपनियों को जेनेरिक दवाओं के उत्पादन और वितरण में प्रोत्साहित करें। साथ ही, दवाओं की कीमतों पर सख्त नियंत्रण होना चाहिए ताकि मरीजों को उचित मूल्य पर दवाएं मिल सकें।

ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं के बीच का अंतर केवल नाम और कीमत का है, प्रभावशीलता का नहीं। भारत जैसे देश में, जहां स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही कई लोगों के लिए सुलभ नहीं हैं, जेनेरिक दवाएं एक वरदान हैं। लेकिन फार्मा कंपनियों के  लालच और भ्रामक मार्केटिंग के कारण मरीजों को अनावश्यक रूप से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं। यह समय है कि हम जागरूक हों, जेनेरिक दवाओं को अपनाएं और सरकार से मांग करें कि वह दवा बाजार में पारदर्शिता और नियंत्रण सुनिश्चित करे। केवल जागरूकता और सही नीतियों के माध्यम से ही हम इस लूट को रोक सकते हैं और हर भारतीय को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रदान कर सकते हैं।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 11 जुलाई 2025

पुराने वाहनों पर प्रतिबंध कितना असरदार?

दिल्ली, भारत की राजधानी, जो अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक समृद्धि के साथ-साथ वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या के लिए भी जानी जाती है, एक बार फिर चर्चा में है। इस बार चर्चा का विषय है दिल्ली सरकार का पुराने डीजल और पेट्रोल वाहनों पर ईंधन आपूर्ति रोकने और उनकी जब्ती का फैसला। इस नीति का उद्देश्य वायु प्रदूषण को कम करना था, लेकिन इसके लागू होने और फिर स्थगित होने की प्रक्रिया ने जनता के बीच भ्रम और असंतोष को जन्म दिया। क्या यह फैसला जल्दबाजी में लिया गया या जन दबाव का परिणाम था? क्या सरकारें ऐसे फ़ैसले बिना सोचे-समझे लेती हैं?

दिल्ली सरकार ने 1 जुलाई 2025 से 10 वर्ष से अधिक पुराने डीजल वाहनों और 15 वर्ष से अधिक पुराने पेट्रोल वाहनों को ईंधन देने पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया। यह निर्णय कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (CAQM) के निर्देश पर आधारित था, जो 2014 के नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) और 2018 के सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से प्रेरित था। इन आदेशों में दिल्ली में पुराने वाहनों के उपयोग और सार्वजनिक स्थानों पर पार्किंग पर रोक लगाने की बात कही गई थी। इस नीति के तहत, ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन कैमरों का उपयोग कर वाहनों की उम्र की पहचान की जानी थी, और जो वाहन ‘एंड ऑफ लाइफ’ श्रेणी में आते, उन्हें ईंधन देने से मना किया जाता। साथ ही, उल्लंघन करने वाले वाहनों को जब्त करने और स्क्रैप करने का भी प्रावधान था।

इस नीति का प्राथमिक उद्देश्य दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण को कम करना था। आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में वाहनों से होने वाला प्रदूषण स्थानीय प्रदूषण का लगभग 50% हिस्सा है। पुराने वाहन, जो आधुनिक उत्सर्जन मानकों का पालन नहीं करते, PM2.5 और अन्य हानिकारक प्रदूषकों के प्रमुख स्रोत हैं। इस नीति को लागू करने के पीछे पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार का लक्ष्य था।

हालांकि इस नीति का उद्देश्य सराहनीय था, लेकिन इसके कार्यान्वयन ने जनता के बीच व्यापक भ्रम और असंतोष पैदा किया। 1 जुलाई को नीति लागू होने के कुछ ही दिनों बाद, पेट्रोल पंपों पर पुराने वाहनों को ईंधन देने से मना किया जाने लगा और कुछ मामलों में वाहनों को जब्त भी किया गया। इससे मध्यम वर्ग और निम्न-मध्यम वर्ग के लोगों में खलबली मच गई, जो अपनी आजीविका के लिए इन पुराने वाहनों पर निर्भर हैं।

दिल्ली में लगभग 62 लाख वाहन इस नीति से प्रभावित होने वाले थे, जिनमें कार, दोपहिया वाहन, ट्रक और यहां तक कि विंटेज वाहन भी शामिल थे। कई लोगों के लिए, ये वाहन केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिरता का आधार थे। उदाहरण के लिए, छोटे व्यापारी, डिलीवरी कर्मचारी और ऑटो-रिक्शा चालक जैसे लोग इन वाहनों पर निर्भर हैं। अचानक ईंधन की आपूर्ति बंद होने से उनकी आजीविका पर संकट मंडराने लगा।

इसके अलावा, नीति के कार्यान्वयन में तकनीकी खामियां भी सामने आईं। ANPR कैमरों की स्थापना और उनके संचालन में समस्याएं थीं, जैसे कि गलत सेंसर, डेटाबेस के साथ एकीकरण की कमी और हाई सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट्स की पहचान में असमर्थता। इन तकनीकी समस्याओं ने नीति को और जटिल बना दिया।

पर्यावरण के दृष्टिकोण से, पुराने वाहनों पर प्रतिबंध लगाना एक तार्किक कदम था। लेकिन इसके साथ ही यह भी तर्क दिया जा रहा था कि यदि कोई पुराना वाहन मौजूदा प्रदूषण के मानकों में ‘पास’ पाया जाता है, उसके पास वैध प्रदूषण प्रमाण पत्र है तो वह प्रदूषण नहीं कर रहा। तो ऐसी स्थित में इस श्रेणी की गाड़ी को प्रतिबंधित क्यों किया जाए?

नीति के लागू होने के कुछ ही दिनों बाद, 3 जुलाई को दिल्ली सरकार ने इसे स्थगित कर दिया और इसे 1 नवंबर 2025 तक टाल दिया। इस फैसले के पीछे जनता का तीव्र विरोध और तकनीकी चुनौतियां प्रमुख कारण थे। दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मंजिंदर सिंह सिरसा ने CAQM को पत्र लिखकर इस नीति को “समय से पहले और संभावित रूप से प्रतिकूल” बताया, और तकनीकी और बुनियादी ढांचे की कमियों का हवाला दिया। इसके अलावा, एक सर्वेक्षण में 79% दिल्लीवासियों ने इस नीति का विरोध किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जन दबाव ने सरकार को पीछे हटने के लिए मजबूर किया। पेट्रोल डीलर्स एसोसिएशन ने भी दिल्ली हाई कोर्ट में इस नीति की व्यवहार्यता को चुनौती दी, जिसने भ्रम को और बढ़ाया।

क्या यह फैसला जल्दबाजी में लिया गया? निश्चित रूप से, नीति के कार्यान्वयन से पहले पर्याप्त जन जागरूकता अभियान, वैकल्पिक परिवहन समाधान और स्क्रैपिंग सुविधाओं की कमी ने इसे जल्दबाजी का फैसला साबित किया। साथ ही, तकनीकी बुनियादी ढांचे की अपर्याप्तता ने इसकी विफलता को और उजागर किया।

दिल्ली सरकार का पुराने वाहनों पर ईंधन प्रतिबंध और जब्ती का फैसला पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक साहसिक कदम था, लेकिन इसकी खराब योजना और कार्यान्वयन ने इसे जनता के लिए परेशानी का सबब बना दिया। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए दीर्घकालिक समाधान जैसे इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों को बढ़ावा देना, सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना और उत्सर्जन-आधारित नीतियां अपनाना अधिक प्रभावी हो सकता है।

सरकार ने इस नीति को 1 नवंबर तक स्थगित कर जनता को राहत तो अवश्य दी है, लेकिन यह स्पष्ट है कि भविष्य में ऐसी नीतियों को लागू करने से पहले बेहतर योजना, जन जागरूकता और बुनियादी ढांचे की जरूरत है। दिल्ली की हवा को साफ करने का लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब पर्यावरण और जनता के हितों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

शुक्रवार, 4 जुलाई 2025

पुलिस स्टेशनों में सड़ते वाहनों की समस्या

भारत में अपराधों की जांच और न्यायिक प्रक्रिया में वाहन अक्सर महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में उपयोग किए जाते हैं। चाहे वह हत्या, चोरी, डकैती, तस्करी या सड़क दुर्घटना का मामला हो, वाहन जैसे कार, मोटरसाइकिल, ट्रक या अन्य साधन अपराध के दृश्य का एक अभिन्न हिस्सा हो सकते हैं। पुलिस द्वारा इन वाहनों को जब्त कर लिया जाता है और इन्हें साक्ष्य के रूप में अदालत में पेश किया जाता है। हालांकि, इन जब्त वाहनों का प्रबंधन और रखरखाव एक ऐसी समस्या बन चुका है, जो न केवल पुलिस प्रशासन के लिए सिरदर्द है, बल्कि यह पर्यावरण, संसाधनों और सामाजिक दृष्टिकोण से भी एक गंभीर चुनौती बन गया है। पुलिस स्टेशनों और मालखानों में ये वाहन वर्षों तक सड़ते रहते हैं, जिससे न केवल जगह की कमी होती है, बल्कि यह व्यवस्था की नाकामी को भी उजागर करता है।


भारत में अपराधों की जांच के दौरान वाहनों की जब्ती एक सामान्य प्रक्रिया है। उदाहरण के लिए, यदि कोई वाहन किसी हिट-एंड-रन मामले में शामिल है, तो उसे फॉरेंसिक जांच के लिए जब्त किया जाता है। इसी तरह, तस्करी या डकैती जैसे मामलों में वाहनों को अपराध के साधन के रूप में देखा जाता है। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 102 के तहत पुलिस को ऐसे वाहनों को जब्त करने का अधिकार है, जो अपराध से संबंधित हों। जब्ती के बाद, इन वाहनों को मालखाने या पुलिस स्टेशन के परिसर में रखा जाता है, जब तक कि मामले की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती।

हालांकि, इस प्रक्रिया में कई खामियां हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि भारत में न्यायिक प्रक्रिया अक्सर लंबी चलती है। कई मामलों में, सुनवाई में वर्षों लग जाते हैं और इस दौरान जब्त वाहन पुलिस स्टेशनों में खड़े रहते हैं। बारिश, धूप और धूल के संपर्क में रहने के कारण ये वाहन खराब हो जाते हैं और धीरे-धीरे कबाड़ में तब्दील हो जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार, भारत के विभिन्न पुलिस स्टेशनों और मालखानों में लाखों वाहन सड़ रहे हैं, जिनमें से कई अब उपयोग के लायक भी नहीं रहे। एक अनुमान के मुताबिक इससे भारत को हर साल लगभग 20000 करोड रुपए का नुकसान हो जाता है


जब्त वाहनों के सड़ने का प्रभाव केवल पुलिस प्रशासन तक सीमित नहीं है, इसका समाज पर भी गहरा असर पड़ता है। कई मामलों में, ये वाहन उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण संपत्ति होते हैं, जो शायद निर्दोष हों या जिनके खिलाफ कोई ठोस सबूत न मिले। उदाहरण के लिए, एक ऑटो-रिक्शा चालक या टैक्सी ड्राइवर के लिए उसका वाहन उसकी आजीविका का मुख्य साधन होता है। जब ऐसे वाहन लंबे समय तक पुलिस हिरासत में रहते हैं, तो मालिक की आर्थिक स्थिति पर बुरा असर पड़ता है। कई बार वाहन मालिकों को अपनी आजीविका खोने के कारण परिवार का पालन-पोषण करने में कठिनाई होती है। यह सामाजिक असमानता को और बढ़ाता है, क्योंकि अधिकांश प्रभावित लोग निम्न या मध्यम वर्ग से होते हैं।


इसके अलावा, पुलिस स्टेशनों के बाहर खड़े वाहन अक्सर आस-पास के निवासियों के लिए परेशानी का कारण बनते हैं। ये वाहन सड़कों को अवरुद्ध करते हैं, पार्किंग की समस्या पैदा करते हैं और कई बार असामाजिक तत्वों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं। ऐसा देखा गया है कि, जब्त वाहनों की देखभाल के लिए कोई जिम्मेदार व्यक्ति नियुक्त नहीं होता। परिणामस्वरूप, वाहनों के महत्वपूर्ण हिस्से, जैसे बैटरी, टायर या इंजन के पुर्जे, गायब हो जाते हैं। यह न केवल भ्रष्टाचार को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ हो रही है, जो न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करता है।

इस समस्या के समाधान के लिए नीतिगत और संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। पहला कदम यह हो सकता है कि वाहनों की जब्ती और रिहाई की प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए। प्रत्येक जब्त वाहन का रिकॉर्ड एक केंद्रीकृत डेटाबेस में दर्ज किया जाना चाहिए, जिसमें वाहन की स्थिति, जब्ती की तारीख और मामले की प्रगति की जानकारी हो। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित होगा कि वाहन अनावश्यक रूप से लंबे समय तक हिरासत में न रहें।

दूसरा, फॉरेंसिक जांच की प्रक्रिया को और तेज करना होगा। वर्तमान में, कई पुलिस स्टेशनों में फॉरेंसिक सुविधाओं की कमी है, जिसके कारण वाहनों को लंबे समय तक रखना पड़ता है। सरकार को क्षेत्रीय स्तर पर फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं की स्थापना करनी चाहिए, ताकि जांच जल्दी पूरी हो सके। इसके साथ ही, डिजिटल साक्ष्य, जैसे वाहन की तस्वीरें और 3डी स्कैन, को अदालतों में स्वीकार करने की नीति बनानी चाहिए। इससे भौतिक वाहन को लंबे समय तक रखने की आवश्यकता कम होगी।

जब वाहन साक्ष्य के रूप में उपयोग के लिए आवश्यक न हों, तो उनकी नीलामी या वैकल्पिक उपयोग की प्रक्रिया को तेज करना होगा। एक ऑनलाइन नीलामी पोर्टल, जहां वाहनों की स्थिति और नीलामी की प्रक्रिया सार्वजनिक हो, इस समस्या को हल कर सकता है। इसके अलावा, कुछ मामलों में, जब्त वाहनों को सरकारी उपयोग, जैसे पुलिस या आपातकालीन सेवाओं के लिए, पुन: उपयोग में लाया जा सकता है, बशर्ते वे कार्यशील स्थिति में हों।

पर्यावरणीय दृष्टिकोण से, सड़ते वाहनों को रीसाइक्लिंग के लिए भेजा जाना चाहिए। भारत में वाहन रीसाइक्लिंग उद्योग अभी प्रारंभिक अवस्था में है, लेकिन इसे बढ़ावा देने से न केवल पर्यावरण को लाभ होगा, बल्कि यह आर्थिक अवसर भी पैदा करेगा। इसके साथ ही, इन वाहनों को सुरक्षित रखने की दृष्टि से हर ज़िले के स्तर पर एक बड़ा मालखाना होना चाहिए जहाँ इन्हें रखा जाए, न कि पुलिस थानों में।

इस समस्या का समाधान तभी संभव है, जब नीतिगत सुधार और तकनीकी नवाचार को एक साथ लागू किया जाए। वाहनों को साक्ष्य के रूप में उपयोग करने की प्रक्रिया को और अधिक कुशल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाना होगा। केवल एक समग्र दृष्टिकोण ही इस समस्या को जड़ से खत्म कर सकता है। जिससे यह भी सुनिश्चित होगा कि अपराध में शामिल वाहन न केवल न्याय प्रक्रिया में सहायक हों, बल्कि समाज और पर्यावरण पर भी बोझ न बनें।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।