शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

उपराष्ट्रपति का ऐतिहासिक इस्तीफ़ा !

22 जुलाई 2025 को भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से अचानक इस्तीफा दे दिया। यह भारत के इतिहास में पहली बार है जब किसी उपराष्ट्रपति ने अपने कार्यकाल के दौरान इस्तीफा दिया है। यह घटना न केवल राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में भी कई सवाल खड़े करती है। इस्तीफे के कारणों पर अटकलों का बाज़ार भी गर्म है। एक अनुमान यह भी है कि जिस तरह भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा ने राज्यसभा के सभापति के अधिकार क्षेत्र में अनाधिकृत रूप से विपक्ष की ओर इशारा करते हुए ये कहा कि, “नथिंग विल गो ऑन रिकॉर्ड व्हाटएवर आई विल से दैट विल गो ऑन रिकॉर्ड यू शुड नो।”

भारत के संविधान में उपराष्ट्रपति का पद दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद है, जो राष्ट्रपति के बाद आता है। 1950 में संविधान लागू होने के बाद से, 13 उपराष्ट्रपतियों ने इस पद को सुशोभित किया है। हालांकि, पहले कभी किसी उपराष्ट्रपति ने अपने कार्यकाल के दौरान इस्तीफा नहीं दिया। कुछ उपराष्ट्रपतियों, जैसे वी.वी. गिरी, ने राष्ट्रपति चुनाव में भाग लेने के लिए इस्तीफा दिया था। जगदीप धनखड़ का इस्तीफा, जो उन्होंने 21 जुलाई 2025 को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन दिया, इस दृष्टिकोण से एक ऐतिहासिक व अप्रत्याशित घटना है।

भारत का संविधान उपराष्ट्रपति के पद के लिए कई प्रावधानों को परिभाषित करता है, जो भाग V (संघ) के अनुच्छेद 63 से 71 के तहत दिए गए हैं। उपराष्ट्रपति के इस्तीफे और इसके बाद की प्रक्रिया के लिए कई महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। संविधान के अनुच्छेद 67(a) के अनुसार, उपराष्ट्रपति अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रपति को हस्तलिखित पत्र के माध्यम से अपना इस्तीफा सौंपना होता है। यह इस्तीफा तत्काल प्रभाव से स्वीकार किया जाता है, जैसा कि जगदीप धनखड़ के मामले में भी हुआ। इस्तीफे के स्वीकार होने के बाद उपराष्ट्रपति का पद रिक्त हो जाता है।

वहीं अनुच्छेद 68 के तहत, उपराष्ट्रपति के पद में रिक्ति, चाहे वह इस्तीफा, निधन, हटाने या अन्य कारणों से हो, को यथासंभव शीघ्र भरना आवश्यक है। संविधान के अनुसार, नए उपराष्ट्रपति का चुनाव 60 दिनों के भीतर होना चाहिए। नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति पूरे पांच वर्ष के कार्यकाल के लिए पद संभालेगें। भारत के उपराष्ट्रपति, राज्यसभा के पदेन सभापति होते है। उनके इस्तीफे के बाद, राज्यसभा की जिम्मेदारियां अस्थायी रूप से उपसभापति (डिप्टी चेयरमैन) या राष्ट्रपति द्वारा अधिकृत किसी अन्य सदस्य को सौंपी जाती हैं।

गौरतलब है कि, संविधान के अनुच्छेद 65 के अनुसार, यदि राष्ट्रपति का पद रिक्त हो या वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हों, तो उपराष्ट्रपति उनके कर्तव्यों का निर्वहन करता है। हालांकि, उपराष्ट्रपति के पद रिक्त होने की स्थिति में, संविधान इस बारे में मौन है कि उपराष्ट्रपति के कर्तव्यों का निर्वहन कौन करेगा, सिवाय इसके कि राज्यसभा के सभापति के कर्तव्यों को उपसभापति संभाल सकता है।

उपराष्ट्रपति का चुनाव लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों से मिलकर बने एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है। यह चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के माध्यम से एकल हस्तांतरणीय मत (सिंगल ट्रांसफरेबल वोट) के आधार पर होता है। इसमें नामांकन के लिए कम से कम 20 सांसदों को प्रस्तावक और 20 सांसदों को समर्थक के रूप में होना आवश्यक है।

जगदीप धनखड़ के इस्तीफे ने कई संवैधानिक और राजनीतिक सवाल खड़े किए हैं। यह पहली बार है जब उपराष्ट्रपति ने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया है, जिसके कारण इसकी प्रक्रिया और प्रभावों पर चर्चा तेज हो गई है। धनखड़ का इस्तीफा संसद के मानसून सत्र के पहले दिन हुआ, जो राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय है। यह सत्र आमतौर पर महत्वपूर्ण विधायी कार्यों और नीतिगत चर्चाओं के लिए जाना जाता है। उपराष्ट्रपति के इस्तीफे से राज्यसभा की कार्यवाही में अस्थायी व्यवधान हो सकता है, क्योंकि उपसभापति को सभापति की जिम्मेदारियां संभालनी होंगी। यह स्थिति सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के बीच नए राजनीतिक समीकरणों को जन्म दे सकती है।

उल्लेखनीय है कि, संविधान उपराष्ट्रपति के इस्तीफे के बाद की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है, लेकिन कुछ अस्पष्टताएं हैं। उदाहरण के लिए, यदि उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा हो और वह इस्तीफा दे दे, तो इस स्थिति में कर्तव्यों का निर्वहन कौन करेगा, इस बारे में संविधान मौन है। ऐसी स्थिति में, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठतम उपलब्ध न्यायाधीश को राष्ट्रपति के कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ सकता है, जैसा कि 1969 में राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद हुआ था।

जगदीप धनखड़ के इस्तीफे ने भारत के संवैधानिक ढांचे की मजबूती को परखने का अवसर प्रदान किया है। संविधान में स्पष्ट प्रावधानों के कारण, इस रिक्ति को भरने की प्रक्रिया व्यवस्थित रूप से शुरू हो चुकी है। हालांकि, यह घटना कुछ दीर्घकालिक सवाल भी खड़े करती है। क्या उपराष्ट्रपति के कर्तव्यों के निर्वहन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था को और स्पष्ट करने की आवश्यकता है? नए उपराष्ट्रपति के चुनाव में राजनीतिक दलों के बीच सहमति और तनाव का स्तर क्या होगा? यह सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष के बीच एक नई राजनीतिक जंग का कारण बन सकता है?

जगदीप धनखड़ का इस्तीफा भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है, जो संविधान की लचीलापन और मजबूती को दर्शाती है। अनुच्छेद 67(a) और 68 जैसे प्रावधान इस स्थिति को संभालने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश प्रदान करते हैं। हालांकि, यह घटना कुछ अस्पष्टताओं को भी उजागर करती है, जो भविष्य में संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। नए उपराष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया और इसके राजनीतिक प्रभाव निश्चित रूप से भारत की संसदीय प्रणाली की गतिशीलता को प्रभावित करेंगे। यह समय भारत के लिए न केवल एक नया उपराष्ट्रपति चुनने का है, बल्कि अपनी संवैधानिक प्रक्रियाओं की मजबूती को और परखने का भी है।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

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