शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2023

क्या पेट्रोल डीज़ल पर लगेगा जीएसटी ?


2014 के चुनाव अभियान में महंगाई कम करने की वकालत करने वाली भाजपा व उनके समर्थक इस बात पर बहुत ज़ोर दे रहे थे कि यदि उनका दल सत्ता में आता है तो पेट्रोल डीज़ल के दामों में भारी कमी कि जाएगी। वोटरों को लुभाने के लिए यहाँ तक कह दिया गया था कि पेट्रोल का दाम 35 रुपये तक लाया जाएगा। परंतु पिछले 9 सालों में पेट्रोल डीज़ल के दाम कम करने की दिशा में केंद्र सरकार द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। लेकिन कुछ दिनों पहले देश की वित्त मंत्री ने पेट्रोल डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाने की बात कह कर जनता के मन में उम्मीद फिर से जगा दी है। यदि ऐसा होता है तो पेट्रोलियम उत्पादों के दाम काफ़ी कम हो जाएँगे और बढ़ती हुई महंगाई पर इसका सीधा असर पड़ेगा।

दरअसल कुछ दिनों पहले पीएचडी चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने को लेकर प्रावधान पहले से उपलब्ध है। इसके साथ ही उन्होंने इसकी ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों पर डालते हुए कहा कि अगर राज्यों के बीच इस पर समझौता हो तो इस पर कदम उठाया जा सकता है।


ग़ौरतलब है कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने की माँग काफ़ी समय से उठ रही है। यदि ऐसा होता है तो यह मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने में यह कदम मददगार साबित होगा। 1 जुलाई 2017 से भारत में अधिकतर चीज़ों पर जीएसटी लागू किया गया। परंतु पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी से बाहर रखा गया। इन पर अभी भी वैट, केंद्रीय बिक्री कर और केंद्रीय उत्पाद शुल्क जैसे पारंपरिक करों को लगाया जाता है। इससे इनके दाम काफ़ी ज़्यादा हो जाते हैं। सोचने वाली बात यह है कि यदि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाया जाता है तो राज्य व केंद्र सरकार को इससे होने वाले नुकसान की भरपाई कहां से की जाएगी?

वर्तमान में पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा क़ीमतों पर एक बड़ा हिस्सा केंद्र और राज्य करों का लगाया जाता है। यदि जीएसटी का अधिकतम स्लैब भी इन उत्पादों पर लगाया जाए तो भी इनके दाम काफ़ी गिर जाएँगे। इसका सीधा लाभ जानता को मिलेगा। केंद्र सरकार के अनुसार पेट्रोलियम उत्पादों का दाम बाज़ार के दामों पर निर्भर करता है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम लगातार गिरने पर भी देश की जनता को इसका लाभ नहीं पहुँचाया गया। आँकड़ों के अनुसार जून 2022 में कच्चे तेल का दाम 116 डॉलर प्रति बैरल था। दिसम्बर 2022 आते-आते 78 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई थी। परंतु कच्चे तेल के दाम 35 से 40 प्रतिशत कम होने के बावजूद इनका लाभ जनता को आज तक नहीं मिला। जनता वही महँगे दाम देती रही।


राज्यों की बात करें तो भारतीय स्टेट बैंक की इकोनॉमिक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, अगर पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाया जाता है तो सबसे ज्यादा नुकसान महाराष्ट्र को हो सकता है। महाराष्ट्र के राजस्व में 10,424 करोड़ रुपए की कमी आ सकती है। वहीं राजस्थान को 6388 करोड़ और मध्य प्रदेश को 5489 करोड़ रुपए का घाटा हो सकता है। यदि पेट्रोलियम उत्पादों के जीएसटी के दायरे में आने पर फ़ायदे की बात करें तो उत्तर प्रदेश को 2,419 करोड़, हरियाणा को 1,832 करोड़, पश्चिम बंगाल को 1,746 करोड़ और बिहार को 672 करोड़ रुपए का फ़ायदा हो सकता है। पेट्रोलियम उत्पादों पर केंद्र सरकार को एक्साइज ड्यूटी से होने वाली कमाई कि बात करें तो 2014 के बाद से इसमें कई गुना इजाफ़ा हुआ है। शायद यही वजह है कि केंद्र व राज्य सरकारें अपनी कमाई के इस स्रोत में कोई बदलाव करना नहीं चाहेंगी। 

जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है वहाँ पर भी पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी में न लाने का कारण कोई समझ नहीं पाया है। वहीं हाल ही में आटे और दूध दही जैसी बुनियादी वस्तुओं को जीएसटी के दायरे में लाने पर विपक्षी दलों की राज्य सरकारों ने इसका पुरज़ोर विरोध किया था। लेकिन केंद्र सरकार ने इनकी अनसुनी कर दी और जनता को महंगाई का एक और झटका दे दिया।

पेट्रोलियम उत्पाद, शराब और तंबाकू उत्पादों पर लगने वाले विभिन्न करों और एक्साइज ड्यूटी से होने वाली कमाई से ही राज्य सरकारों का ख़ज़ाना ख़ाली होने से बच रहा है। ऐसे में टैक्स के पैसे से की जाने वाली विकास योजनाओं और जनता को मुफ़्त में दी जाने वाली सुविधाओं, जैसे मुफ़्त राशन पर भी असर पड़ सकता है। चुनावी मौसम में किसी भी राजनैतिक दल द्वारा वोटरों को लुभाने के लिए ऐसे अलग-अलग शगूफ़े छोड़े जाते हैं। यदि सरकारी ख़ज़ाने में इन शगूफ़ों की भरपाई के लिए धन ही नहीं होगा तो ऐसे शगूफ़ों को छोड़ने का आधार ही नहीं बचेगा।

इसलिए पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने का निर्णय कई वर्षों से लटका हुआ है। न तो केंद्र सरकार और न ही कोई भी राज्य सरकार इसे जीएसटी के दायरे में लेने की इच्छुक दिखाई देती है। चुनावों से पहले एक्साइज ड्यूटी और करों में मामूली सी गिरावट कर जनता को आंशिक लाभ ज़रूर दिया जाता है। परंतु बढ़ती महंगाई के चलते यदि पेट्रोलियम उत्पादों जैसी बुनियादी ज़रूरत वाली वस्तुओं को सस्ता किया जाए तो जनता पर इसका अच्छा असर पड़ेगा। क्योंकि फिर महंगाई भी तेज़ी से कम हो सकेगी। देखना यह है कि केंद्र और राज्य सरकारों की रस्साकशी में जनता को लाभ मिलेगा या नहीं?   

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

जानकार बनें और सुरक्षित रहें


साइबर अपराधों में लिप्त अपराधी हर दिन नये-नये ढंग से अपने शिकारों को फँसाने के तरीक़े खोजते रहते हैं। यदि आप जागरूक हैं तो आप इनके जाल में फँसने से बच सकते हैं। यदि आप घबराहट में कुछ ऐसा-वैसा कर बैठते हैं तो आप इनके जाल में आसानी फँस सकते हैं। आज इस कॉलम में एक ऐसे ही शिकार के बारे में बात करेंगे जो इन साइबर अपराधियों के जाल में फँसते-फँसते बचा।

पिछले सप्ताह मुझे मेरे मित्र विभव का घबराहट में फ़ोन आया। उसकी घबराहट का कारण एक सीबीआई अधिकारी का उसे फ़ोन पर धमकाना था। उसने मुझे फ़ोन पर अपनी जो परेशानी बताई तो पहले तो मुझे हंसी आई फिर मैंने ख़ुद को उसकी जगह में सोच कर उसे क़ानून के कुछ अहम पहलू बताए। मेरी सलाह सुन विभव शांत हुआ और अपने काम में जुट गया। परंतु जो कुछ उसके साथ दो दिनों में हुआ वो आपके साथ साझा करना आवश्यक है । उगाही के इस ढंग को यदि आप जान लेंगे तो शायद आप भी इन जालसाज़ों का शिकार होने से बच सकेंगे।


कुछ दिन पहले विभव के पास ह्वाट्सऐप पर एक वीडियो कॉल आई। उस कॉल में एक लड़की पहले तो काफ़ी मित्रता भरे ढंग से बात करने लगी। फिर कुछ ही क्षण में वो महिला अश्लीलता पर उतर आई। विभव ने तुरंत अपने फ़ोन की स्क्रीन का रुख़ अपनी पत्नी की और किया जो उस समय उसके साथ में बैठी थी। इसके बाद फ़ोन को काट कर विभव ने उस नंबर को ब्लॉक कर दिया और इसे भूल गया। परंतु कुछ ही देर में उसके पास किसी दूसरे नंबर से कुछ संदेश आने लगे जिसमें उसे ब्लैकमेल कर पैसे ऐंठने का प्रयास किया गया। विभव ने इन नंबरों को भी ब्लॉक कर दिया। दो दिनों तक कुछ नहीं हुआ।

दो दिन के बाद विभव के पास किसी विक्रम गोस्वामी नाम के व्यक्ति का फ़ोन आया। गोस्वामी ने ख़ुद को सीबीआई का अधिकारी बताया। सीबीआई का नाम सुनते ही विभव ने चौंक कर पूछा कि क्या बात है? विक्रम गोस्वामी ने विभव को दो दिन पहले आई ह्वाट्सऐप कॉल के अश्लील वीडियो की बात की। विभव पर इस अश्लील वीडियो को यूट्यूब पर अपलोड करने का आरोप लगा कर एक शिकायत का हवाला देते हुए गोस्वामी ने पहले तो सच्चाई पूछी। विभव ने उसे सब बात सच-सच बता डाली। जैसे ही गोस्वामी को लगा कि विभव थोड़ा घबराया हुआ है, उसने विभव को एक नंबर दिया और कहा कि यदि उसने ये वीडियो अपलोड नहीं किया तो इस नंबर पर यूट्यूब वालों को कह कर वीडियो को डिलीट करवाएँ और उसकी पुष्टि का प्रमाण आधे घंटे में गोस्वामी को दे। ऐसा न करने पर शाम तक विभव को गिरफ़्तार कर लिया जाएगा।

विभव के लाख समझाने पर भी वो अधिकारी उसकी किसी बात का यक़ीन नहीं कर रहा था। बल्कि परिवार और समाज का हवाला देकर उसे और धमकाने लग गया। विभव ने विक्रम गोस्वामी का फ़ोन रखते ही मुझे फ़ोन किया और पूरा क़िस्सा बयान किया। मैंने विभव को समझाया कि यदि उसने कुछ नहीं किया तो उसे घबराने की बिलकुल भी ज़रूरत नहीं है। क़ानून का थोड़ा-बहुत ज्ञान होने के चलते मैंने उसे जो-जो बताया वो आप सभी के लिये भी समझना ज़रूरी है।


पहला, यदि आपने सोशल मीडिया पर कुछ भी आपत्तिजनक अपलोड नहीं किया है तो आपको घबराने की कोई ज़रूरत नहीं। दूसरा, किसी भी सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म पर कुछ भी अश्लील या आपत्तिजनक पोस्ट नहीं किया जा सकता। इस मामले में यूट्यूब की बात करें तो यूट्यूब के नियम इतने सख़्त हैं कि अश्लील वीडियो उस पर नहीं डाले जा सकते। उन्हें यूट्यूब का एडमिन स्वीकृत नहीं करेगा। तीसरा, यूट्यूब या सोशल मीडिया पर होने वाले अपराध साइबर अपराध की श्रेणी में आते हैं और इनसे केवल पुलिस का साइबर सेल ही निपटता है। सीबीआई का हस्तक्षेप संगीन अपराधों में केवल राज्य सरकार के अनुरोध पर ही होता है। इसलिए यदि कोई भी अधिकारी ख़ुद को सीबीआई का अधिकारी कहता है तो वो झूठ बोल रहा है। इस बात को ध्यान में रखते हुए पहले उस व्यक्ति का पूरा परिचय माँग लें। इसके साथ ही अपने जानकार मित्रों की मदद से यदि संभव हो तो उस अधिकारी की पहचान की पुष्टि करें।


जैसे ही विभव ने ये सब बातें सुनी उसकी घबराहट कम होने लगी। विभव ने मेरे कहने पर सीबीआई अधिकारी, विक्रम गोस्वामी का नंबर ट्रू-कॉलर नाम की ऐप पर खोजा और उसका स्क्रीनशॉट मुझे भेजा। स्क्रीनशॉट देख वही हुआ जिसका अंदाज़ा था। विक्रम गोस्वामी ने अपने नाम के साथ दिल्ली पुलिस के पूर्व पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना की फ़ोटो लगाई हुई थी। मैंने विभव को कहा कि वो गूगल पर पूर्व पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना को खोजे और इस अधिकारी की प्रोफ़ाइल पिक्चर को मिला ले तो उसे इस नक़ली सीबीआई अधिकारी की असलियत पता चल जाएगी।

इसी दौरान मैंने दिल्ली पुलिस की आईएफएसओ यूनिट पूर्व डीसीपी, केपीएस मल्होत्रा से इस क़िस्से को साझा किया। उन्होंने ऐसे गोरखधंधों से सभी को सावधान रहने को कहा। डीसीपी मल्होत्रा के अनुसार, कभी भी अनजान नंबर से आने वाली वीडियो कॉल को न उठाएँ। कॉल करने वाले के लाख कहने पर भी उनकी बातों में न आएँ। अपने बैंक खाते या अन्य ज़रूरी जानकारी को कभी भी ऐसे जालसाज़ों के साथ शेयर न करें। ऐसे नंबरों को तुरंत ‘रिपोर्ट एंड ब्लॉक’ करें। यदि आप इनके शिकार हो भी जाते हैं तो नज़दीकी पुलिस थाने को इसकी जानकारी तुरंत दें। आप जानकार रहेंगे तभी तो सुरक्षित रहेंगे।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2023

कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है !


देश के नामी उद्योगपति गौतम अडानी और उनकी कंपनियों को लेकर शेयर मार्केट, संसद और टीवी चर्चाओं में मची अफ़रा-तफ़री ने मिर्ज़ा ग़ालिब के इस मशहूर शेर की पंक्ति की याद दिलाई। अडानी की कंपनियों को लेकर खड़े हुए विवाद पर जिस तरह भारत सरकार की एजेंसियों ने चुप्पी साध रखी है उसे लेकर वे संदेह के घेरे में आती हैं। हर कोई यही सोच रहा है कि इसके पीछे कुछ न कुछ कारण तो है।

जब से न्यूयॉर्क स्थित हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी समूह पर 106 पन्नों की रिपोर्ट जारी की है, तब से दुनिया भर में भारत के इस औद्योगिक समूह पर उँगलियाँ उठने लग गई हैं। रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद ऐसा होना तो लाज़मी था। दुनिया भर के निवेशक अब भारतीय उद्योगपतियों को शक की नज़र से देखेंगे। जिस तरह अडानी समूह के शेयर लुढ़कने लगे, उससे निवेशकों के मन में भी भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। सभी निवेशक सोच रहे हैं कि क्या उनका निवेश सुरक्षित है? क्या जिन सरकारी बैंकों ने अडानी समूह में निवेश किया था वो डूबेंगे तो नहीं? क्या भारतीय जीवन बीमा निगम व भारतीय स्टेट बैंक द्वारा अडानी समूह में लगाया गया जनता का पैसा स्वाहा तो नहीं हो जाएगा?


हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के जवाब में अडानी समूह ने इसे भारत पर हमले का नाम दिया। अडानी ने अपने जवाब में कहा, “यह केवल किसी विशिष्ट कंपनी पर एक अवांछित हमला नहीं है, बल्कि एक सोची समझी साजिश है। यह भारत, भारतीय संस्थानों की स्वतंत्रता, अखंडता और गुणवत्ता और भारत की विकास की कहानी और महत्वाकांक्षा पर हमला है।” अडानी के इस बयान को देश के विपक्षी नेता बेतुका बता रहे हैं।

दरअसल हिंडनबर्ग ने ऐसा ही खुलासा 16 अन्य कंपनियों का भी किया है। वे कंपनियाँ अमरीका, चीन व जापान जैसे देशों की कंपनियाँ हैं। विपक्षी नेताओं का ये सवाल है कि अगर अडानी समूह पर आई इस रिपोर्ट को भारत सरकार भारतीय अर्थव्यवस्था पर हमला मानती है तो फिर वे इस मामले पर चुप्पी क्यों साधे बैठे हैं? एजेंसियों द्वारा इस मामले की जाँच क्यों नहीं की जा रही?


ग़ौरतलब है कि इस रिपोर्ट के आने पर अडानी समूह ने हिंडनबर्ग पर क़ानूनी कार्यवाही करने की घोषणा कर दी थी। उस घोषणा का स्वागत करते हुए हिंडनबर्ग ने अडानी समूह को ऐसा अमरीका में करने की सलाह दे डाली। हिंडनबर्ग का कहना है कि चूँकि वो अमरीका में स्थापित हैं इसलिए अडानी वहीं आकर उनपर क़ानूनी कार्यवाही कर सकते हैं। अमरीका में कार्यवाही का मतलब अडानी समूह को वे सभी काग़ज़ात कोर्ट के सामने पेश करने होंगे जिन दस्तावेज़ों में गड़बड़ी की आशंका जताई गई है। जब से हिंडनबर्ग ने ऐसा कहा है तब से अडानी समूह द्वारा क़ानूनी कार्यवाही की बात पर ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया गया।

इधर भारत में अडानी समूह की प्रमुख कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज के फॉलोऑन पब्लिक ऑफर (एफ़पीओ) से खुदरा निवेशक बचता रहा। केवल कुछ नामी बड़े निवेशकों ने ही इसमें निवेश किया। पर इस विवाद के चलते गौतम अडानी ने एक वीडियो संदेश के माध्यम से एफ़पीओ को मार्केट से वापस लेने की घोषणा कर डाली। अडानी के समर्थक इसे नैतिकता के आधार पर लिया हुआ फ़ैसला बता रहे हैं। जबकि विपक्षी दल इस एफ़पीओ को अधिक मूल्य पर ख़रीदने पर भी सवाल उठा रहे हैं। इस आरोप पर अडानी समूह की कोई भी औपचारिक घोषणा नहीं आई है। बहरहाल अडानी समूह के शेयरों के दाम निरंतर गिरते जा रहे हैं और दुनिया के तीसरे नंबर पर पहुँचने वाले गौतम अडानी अब बाईसवें नंबर पर पहुँच गये हैं।

अडानी समूह पर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में लगे आरोपों पर अगर देश की जाँच एजेंसियों द्वारा कड़ी कार्यवाही की जाती है तो जनता के बीच ऐसा संदेश जाएगा कि भले ही कोई औद्योगिक समूह कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, जाँच एजेंसियाँ अपना काम स्वतंत्रता और निष्पक्ष रूप से ही करेंगी। इन एजेंसियों का सिद्धांत यह होना चाहिये कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। फिर वो चाहे किसी भी राजनैतिक पार्टी का समर्थक ही क्यों न हो। एजेंसियाँ ऐसे किसी भी अपराधी को नहीं बख्शेंगी। ऐसा करने से न सिर्फ़ वित्तीय अपराधियों के बीच ख़ौफ का संदेश जाएगा बल्कि देश भर की जनता का भी इन एजेंसियों पर विश्वास बढ़ेगा।

एलआईसी और एसबीआई जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में देश की आम जनता अपने भविष्य को सुरक्षित करने की दृष्टि से अपनी कड़ी मेहनत की कमाई का हिस्सा निवेश करती है। ये संस्थाएँ जिस पैसे को किसी भी औद्योगिक समूह में निवेश करती हैं तो वो आम नागरिक का ही पैसा होता है। यदि वो पैसा किसी दागी कंपनी में निवेश किया जाता है तो जनता के मन में इन संस्थाओं पर भरोसा घटेगा। अडानी समूह का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवादों में आना देश के लिए अच्छा नहीं माना जा सकता। भारत सरकार को इस मामले में एक उच्च स्तरीय जाँच के आदेश दे देने चाहिए। उधर विपक्षी दल सयुंक्त संसदीय समिति से इस जाँच को करवाने की माँग कर रहे हैं।

विपक्ष की माँग है कि अडानी समूह पर लगे आरोपों कि न सिर्फ़ जाँच होनी चाहिए बल्कि यह जाँच योग्य लोगों द्वारा ही की जानी चाहिये। यदि गौतम अडानी ने कोई गलती नहीं की है तो हर्षद मेहता, केतन पारिख, विजय माल्या व नीरव मोदी जैसे घोटालेबाज़ों की श्रेणी में उनको न लाया जाए। यदि अडानी के समर्थक इस रिपोर्ट को केवल इस आधार पर नकार रहे हैं कि ये रिपोर्ट एक विदेशी संस्था द्वारा जारी की गई है तो ये ग़लत होगा। आपको याद दिला दें कि राजीव गांधी सरकार पर जब बोफ़ोर्स घोटाले के आरोप लगे थे तो उसे भी स्वीडिश रेडियो द्वारा उजागर किया गया था। उसके बाद क्या हुआ ये सभी जानते हैं।

इसलिए केंद्र सरकार की एजेंसियों को इस रिपोर्ट को भी गंभीरता से लेते हुए मामले की जाँच जल्द-से-जल्द करनी चाहिए, जिससे कि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए। यदि जाँच में देरी होती है तो ये सवाल तो उठेगा ही कि ‘कुछ तो है जिसकी पर्दा-दारी है।’      

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

लद्दाख: ऑल इज़ नॉट वैल !


प्रतिष्ठित रेमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित मैकेनिकल इंजीनियर और हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स, लद्दाख के निदेशक सोनम वांगचुक आजकल फिर से सुर्ख़ियों में हैं। इससे पहले वे अपने व्यक्तित्व पर 2009 में बनी फ़िल्म ‘3 इडिअट्स’ को लेकर सुर्ख़ियों में थे। इसी फ़िल्म का एक मशहूर डायलॉग था ‘ऑल इज़ वैल’। फ़िल्म में यह डायलॉग वांगचुक का किरदार निभा रहे अभिनेता आमिर ख़ान हर कठिन परिस्थिति में ख़ुद को हौसला देने के लिए कहते हैं। परंतु आज इसी बात को लद्दाख निवासी विपरीत ढंग से क्यों कह रहे हैं?
 
दरअसल पिछले कुछ दिनों से लद्दाख के मशहूर इनोवेटर सोनम वांगचुक मीडिया का केंद्र बने हुए हैं। वे 26 जनवरी 2023 को लद्दाख के हालत को लेकर एक आंदोलन करने की तैयारी में थे। परंतु लद्दाख प्रशासन ने उन्हें ऐसा करने से रोका और उन्हें नज़रबंद कर दिया। वांगचुक ने यह जानकारी यूट्यूब पर एक वीडियो के माध्यम से दी। आंदोलन शुरू करने से पहले, 21 जनवरी को वांगचुक ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नाम ‘लद्दाख के मन की बात’ नामक संदेश में, लद्दाख के बिगड़ते हुए हालात की बात की। उसी वीडियो में उन्होंने आंदोलन करने के बारे  में भी बताया। 
 

वांगचुक ने अपने वीडियो में कहा था कि वह खारदुंगला टॉप पर पांच दिवसीय अनशन पर बैठेंगे। खारदुंगला  टॉप 18,000 फीट की ऊँचाई पर है। यहाँ का तापमान -40 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। उन्होंने लद्दाख में बढ़ते उद्योगों, खनन और पर्यटन विकास को लेकर चिंता जताई है। उनका मानना है कि लद्दाख व अन्य हिमालयी क्षेत्रों को औद्योगिक शोषण से सुरक्षा मिलनी चाहिए। क्योंकि, बढ़ते उद्योगों के चलते पर्यावरण पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है। इसके साथ ही वे कहते हैं कि, “कश्मीर यूनिवर्सिटी और अन्य शोध संगठनों के हाल के अध्ययनों से निष्कर्ष निकला है कि यदि ठीक से देखरेख नहीं की गई तो लेह-लद्दाख में दो-तिहाई ग्लेशियर खत्‍म हो जाएंगे।” जब से उनका ये वीडियो सामने आया है लद्दाख प्रशासन में तनाव का माहौल बन गया है। 
 
आनन-फ़ानन में लद्दाख प्रशासन ने वांगचुक को नज़रबंद कर दिया। उनका आरोप है कि प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाने को लेकर उन्हें नजरबंद कर दिया गया है। जिस तरह लद्दाख की पुलिस मंदिर की दीवार लांघ कर वांगचुक को अपने साथ लेकर गई उस पर सवाल उठ रहे हैं?
 
वांगचुक ने अपने वीडियो के माध्यम से प्रधान मंत्री व केंद्रीय गृह मंत्री का ध्यान लद्दाख की समस्याओं की ओर  आकर्षित किया है। 31 अक्टूबर 2019 को केंद्र सरकार ने लद्दाख को कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बना दिया था। वांगचुक का आरोप है कि, “तीन साल से केंद्र का यूटी प्रशासन नाकाम रहा है। हर आदमी दुखी है। नौकरियाँ नहीं मिल रही है। फंड है लेकिन इसका ज्यादातर हिस्सा वापस चला जाता है। 6 हजार करोड़ रुपये का क्या करना है इसका फैसला केवल यहाँ के उपराज्यपाल ही लेते हैं। इसी बजट का क़रीब 8-9 प्रतिशत बजट वहाँ के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा स्थापित हिल कौंसिल के हिस्से आता है।” वे आगे कहते हैं कि, “12000 नौकरियों का वादा किया गया था लेकिन क़रीब 800 को ही नौकरी मिली वो भी पुलिस में। विकास की कोई भी नई योजना नहीं बनाई गई है।” 
 

वांगचुक के वीडियो से यह भी पता चलता है कि लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के तीन साल बाद जब एक सर्वेक्षण हुआ तो वहाँ के 95 प्रतिशत लोगों ने लद्दाख प्रशासन को 5 में से 1 या 0 अंक दिये। इसका मतलब यह लगाया जा सकता है कि वहाँ की जनता इस निर्णय से खुश नहीं है। 
 
लद्दाख के निवासी केंद्र की भाजपा सरकार को उनके द्वारा किए वादे याद दिला रही है। सोनम वांगचुक ने बताया कि भाजपा ने 2020 में लद्दाख हिल काउंसिल चुनाव के लिए जारी घोषणा पत्र में छठी अनुसूची को शामिल किया था। इसके साथ ही 2019 लोकसभा चुनावों में भी यह वादा भाजपा के पहले तीन वादों में शामिल था। परंतु जनता के हाथ केवल निराशा ही लगी। इसीलिये वहाँ के नागरिक इसके विरुद्ध आवाज़ उठा रहे हैं। 
 
दरअसल, 1949 में संविधान सभा द्वारा पारित छठी अनुसूची, स्वायत्त क्षेत्रीय परिषद और स्वायत्त जिला परिषदों के माध्यम से आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा का प्रावधान करती है। यह विशेष प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 244 (2) और अनुच्छेद 275 (1) के तहत किया गया है। राज्यपाल को स्वायत्त जिलों को गठित करने और पुनर्गठित करने का अधिकार है। फ़िलहाल छठी अनुसूची में पूर्वोत्तर के चार राज्यों असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित विशेष प्रावधान हैं। सितंबर 2019 में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत शामिल करने की सिफारिश की थी। नया केंद्र शासित प्रदेश, लद्दाख मुख्य रूप से आदिवासी बाहुल्य (97% से अधिक) है। यहाँ की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की मंशा से ही ऐसी सिफ़ारिश की गई थी। जनवरी 2022 में गृह मंत्रालय ने केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जी किशन रेड्डी के नेतृत्व में “लद्दाख की भाषा, संस्कृति और भूमि के संरक्षण से संबंधित मुद्दों” को लेकर एक कमेटी का गठन किया था। 
 
यहाँ सवाल उठता है कि दुनिया भर में प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन के आकर्षण का केंद्र बने लद्दाख को अपने अधिकारों के लिए केंद्र सरकार से संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है? लद्दाख के पर्यावरण और वहाँ के नागरिकों की जायज़ माँग को उठाने वाले, विश्व पटल पर लद्दाख का नाम रोशन करने वाले मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित, सोनम वांगचुक को नज़रबंद करना कहाँ तक उचित है? क्या प्रधान मंत्री और गृह मंत्री को लद्दाख समस्या से संबंधित पूरी जानकारी नहीं दी जा रही? यदि जानकारी उन तक नहीं पहुँच रही तो इसके लिये कौन ज़िम्मेदार है? यदि जानकारी मिलने के बावजूद कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जा रही तो ऐसा क्यों? लद्दाख में रहने वाले कब कहेंगे ‘ऑल इज़ वैल’?