शुक्रवार, 25 अगस्त 2023

महानगरों की ट्रैफिक समस्या का समाधान


देश के महानगरों में ट्रैफिक जाम होना एक आज आम बात हो गयी है। अक्सर ऐसे जामों में फँस कर आप सभी ने अपना बहुमूल्य समय और ईंधन ज़रूर गँवाया होगा। देश में बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ-साथ जिस कदर वाहनों की संख्या भी तेज़ी से बढ़ रही है, ट्रैफ़िक जाम तो बढ़ेंगे ही। यातायात पुलिस हो या सड़कों पर चलने वाले आम नागरिक सभी इस समस्या से परेशान हैं। ट्रैफ़िक की इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए जनता और पुलिस को एक दूसरे का सहयोग करना होगा और जाम से निजात पाने के नए विकल्प ढूँढने होंगे। 

पिछले दिनों अख़बार में दिल्ली यातायात पुलिस के विशेष आयुक्त एस एस यादव का एक बयान छपा था। जिसमें श्री यादव ने दिल्ली पुलिस के ट्रैफ़िक स्टाफ़ को एक नए अन्दाज़ में अपनी ज़िम्मेदारी निभाने का निर्देश दिया। ग़ौरतलब है कि दिल्ली पुलिस के आला अधिकारियों के पास यह शिकायत आ रही थी कि दिल्ली के ट्रैफ़िक पुलिसकर्मी बड़ी-बड़ी लक्ज़री गाड़ियों के चालकों से ग़ैर-क़ानूनी ढंग से चालान के बदले मोटी रक़म वसूल रहे थे। दिल्ली के सभी 15 ज़िलों को निर्देशित करते हुए श्री यादव ने यह बात स्पष्ट कर दी कि यदि किसी भी सिपाही को ऐसी ग़ैर-क़ानूनी वसूली का दोषी पाया जाएगा तो संबंधित ट्रैफ़िक इंस्पेक्टर सहित एसीपी व डीसीपी से भी इसका स्पष्टीकरण माँगा जाएगा। इसकी रोकथाम के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा औचक निरीक्षण भी किए गए। इन निरीक्षणों में यह बात भी सामने आई कि ट्रैफ़िक पुलिसकर्मी बड़ी-बड़ी गाड़ियों को रोक कर चेक करने की मंशा से अचानक उनके आगे आ जाते हैं और उन गाड़ियाँ को रुकवाते हैं। अचानक ऐसा करने से न सिर्फ़ दुर्घटना की संभावना बड़ जाती है, बल्कि जाम भी लग जाते हैं। 

इसलिए श्री यादव की ओर से यह एक अच्छी पहल है। परंतु ऐसे औचक निरीक्षण केवल चालान दस्ते पर ही सीमित न हों। ट्रैफ़िक कंट्रोल रूम में बैठने वाले टेलीफोन ऑपरेटर का भी औचक निरीक्षण होना चाहिए। दिन भर के भीड़-भाड़ वाले समय में उन्हें सबसे अधिक फ़ोन कॉल किन-किन इलाक़ों से आए? क्या उन इलाक़ों से ऐसी कॉल रोज़ाना आतीं हैं? क्या इन कॉलों को संबंधित इलाक़े के अधिकारियों को भेज कर ही ज़िम्मेदारी समाप्त हो जाती है? ग़ौरतलब है कि, आज के सूचना प्रौद्योगिकी के युग में गूगल मैप्स की मदद से हम कहीं भी जाने से पहले पूरा मार्ग देख कर यह जान लेते हैं, कि कितना समय लगेगा, जाम है या नहीं। उसी आधार पर वैकल्पिक मार्ग का चयन कर लेते हैं। ठीक उसी तरह क्या ट्रैफ़िक पुलिस के अधिकारी कंट्रोल रूम में बैठ कर, गूगल मैप के ज़रिये जाम लगे इलाक़ों की सूचना संबंधित इलाक़े के पुलिस अफ़सरों नहीं दे सकते? यदि ऐसी सूचना संबंधित अधिकारियों को मिल जाए तो उन्हें भी पता चल जाएगा कि उन पर निगरानी रखी जा रही है। उन्हें मौक़े पर पहुँच कर जाम को खुलवाना पड़ेगा। देश भर की ट्रैफ़िक पुलिस को इस सुझाव पर गौर करना चाहिए । 

दिल्ली या अन्य महानगरों में लगने वाले जाम का कारण क्या होता है, इस पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है। आमतौर पर देखा गया है कि सड़कों पर लगने वाले जाम के पीछे बाज़ारों के सामने ग़लत पार्किंग करना। उल्टी दिशा से ट्रैफ़िक का आना। ग़लत लेन में वाहन चलाना। ट्रैफ़िक सिग्नल का सही से काम न करना। भीड़-भाड़ वाले समय में ट्रैफ़िक पुलिसकर्मियों का नदारद रहना। बस स्टैंड या मेट्रो स्टेशन पर ऑटो व रिक्शा की भीड़ लगना। सड़कों का रख-रखाव न होना, जैसे कई कारण हैं। यह बात तो समझ आती है कि हर राज्य के पास ट्रैफ़िक व्यवस्था को संभलने के लिए पर्याप्त स्टाफ़ नहीं है। परंतु इसका मतलब ये नहीं है कि स्टाफ़ की कमी के चलते जाम को बढ़ने दिया जाए। सीमित साधनों से भी असीमित काम किए जा सकते हैं अगर मंशा ठीक हो। हर वो बाज़ार जो मेन रोड को जाम कर सकते हैं, वहाँ पर ट्रैफ़िक पुलिस विभाग को सिविल डिफेंस के जवानों की मदद लेनी चाहिए। जो इस बात को सुनिश्चित करें कि जो भी वाहन ग़लत पार्किंग कर रहा हो वे उसे टोकें, चाहे मेगा माइक की मदद से या सीटी बजा कर। जैसे ही वाहन चालक को सिटी या माइक की आवाज़ सुनाई देगी वो चौकन्ना हो जाएगा। इसके बावजूद भी यदि वो अपना वाहन ग़लत ढंग से पार्क करता है तो उसकी फ़ोटो खींच कर उसे चालान विभाग में भेजा जाए। इसके अलावा जहां पर भी संभव हो वहाँ पुलिस की क्रेन नियमित रूप से चक्कर लगाए। जैसा कि एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन पर होता है। गाड़ी उठाए जाने के डर से कोई भी अपना वाहन ग़लत ढंग से पार्क नहीं करेगा। 

इसी तरह अधिक भीड़ वाले समय पर ट्रैफ़िक सिग्नल का नियंत्रण किसी सिपाही के द्वारा हो तो बेहतर होगा। इसका उदाहरण तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में देखा गया। वहाँ के हर प्रमुख चौराहे पर बने ट्रैफ़िक संतरी पोस्ट पर ट्रैफ़िक सिग्नल का नियंत्रण करने वाला स्विच लगा हुआ है। जिसे वहाँ बैठा सिपाही ट्रैफ़िक की मात्रा के अनुसार चलाता है। जिस भी दिशा में जाने वाले ट्रैफ़िक की मात्रा अधिक होती है वहाँ की ‘हरि बत्ती’ की अवधि बढ़ाई जाती है। इस तरह बेवजह ट्रैफ़िक जाम नहीं होता। ज़रा सोचिए यदि भीड़-भाड़ वाले समय में ऐसे सिग्नल स्वचालित हों तो न सिर्फ़ जाम लगेगा बल्कि जल्दबाज़ी में लोग लाल बत्ती को पार भी करने लगेंगे, जो कि ख़तरनाक साबित होगा। 

देश भर की ट्रैफ़िक पुलिस को ऐसे कुछ नायाब तरीक़ों की खोज करनी होगी जिससे ट्रैफ़िक जाम से छुटकारा पाया जा सकेगा। वरना वाहन चालक और ट्रैफ़िक पुलिस एक दूसरे को ही दोष देते रहेंगे और समस्या का हल कभी नहीं निकल पाएगा।

 

शुक्रवार, 18 अगस्त 2023

ऐसा क्या है डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन क़ानून में?


आए दिन हमें डिजिटल धोखाधड़ी के मामलों के बारे में पता चलता है। कैसे कुछ शातिर लोगों का गैंग एक योजनाबद्ध तरीक़े से भोले-भले लोगों को ठगने की मंशा से उन्हें अपना शिकार बनाते हैं। उनकी मेहनत की कमाई को कुछ ही पल में फुर्र कर देते हैं। उसके बाद ऐसे फ्रॉड का शिकार व्यक्ति अपनी शिकायत लेकर दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाता है। परंतु सरकार ने इस फ्रॉड को रोकने और ज़रूरी निजी जानकारी की सुरक्षा की दृष्टि से ‘डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल’ को संसद में पेश किया है जो अब क़ानून बन गया है।

हाल ही में केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद में डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन बिल, 2023 पेश किया। इस विधेयक के तहत नागरिकों के व्यक्तिगत डाटा की सुरक्षा के अधिकार व्यवस्था करता है। यहाँ सवाल उठता है कि यदि यह बिल नागरिकों की निजी जानकारी सुरक्षा कि दृष्टि से लाया गया है तो इसका इतना विरोध क्यों किया गया? क्या विरोध केवल विरोध के लिए ही है या इसका कोई वाजिब कारण भी है?


संसद के दोनों सदनों में यह बिल पास हो गया। ग़ौरतलब है कि नागरिकों के पर्सनल डेटा की सुरक्षा को लेकर देश भर में पहले से ही काफ़ी बहस चल रही है। परंतु इस बहस को गति देने की पहल देश की सर्वोच्च अदालत ने 24 अगस्त 2017 को अपने फ़ैसले से की। इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “निजता का अधिकार लोगों का मूलभूत अधिकार है।” नौ जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया है। पीठ ने कहा कि “निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है।”


यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि इस बिल के तहत हमारे किस डेटा की सुरक्षा की बात हो रही है। ‘डिजिटल पर्सनल डेटा’ वो होता है जो आप किसी भी ई-कॉमर्स की वेबसाइट पर प्रदान करते हैं। ये डेटा वो होता है जिससे आपकी और आप जैसे करोड़ों उपभोक्ताओं की विभिन्न ई-कॉमर्स वेबसाइट पर पहचान बनती है। उदाहरण के तौर पर आप किसी वेबसाइट से रोज़मर्रा का सामान मँगवाते हैं तो आपका ‘यूज़र नेम’, ‘पासवर्ड’, आपकी जन्मतिथि, आपके घर या ऑफिस का पता, आपका मोबाइल नंबर, पैन नंबर, आधार नम्बर आदि। इसके साथ ही आपके द्वारा मंगाए जाने वाले सामान या भोजन आदि भी आपके प्रोफाइल में अंकित हो जाते हैं। इसके साथ ही आपकी वो निजी जानकारी जो आपके प्रोफाइल में दर्ज हो जाती है, वो है आपके द्वारा कि गई ख़रीदारी का मूल्य। सोशल मीडिया साईट पर आप किस से क्या बात कर रहे हैं। आपकी लोकेशन क्या है। आप किस लोकेशन पर ज़्यादा समय बिताते हैं। ऐसी सभी जानकारियों को ‘डिजिटल पर्सनल डेटा’ कहा जाता है।



‘डिजिटल पर्सनल डेटा’ का दुरुपयोग करना बहुत आसान है। सोशल मीडिया वेबसाइट्स व ई-कॉमर्स वेबसाइट्स या मोबाइल ऐप्स आपके इस डेटा को, बिना आपकी जानकारी के, अन्य कंपनियों को बेच देते हैं। इस ‘डिजिटल पर्सनल डेटा’ के आधार पर विभिन्न वेबसाइट्स आपके कंप्यूटर या फ़ोन पर आपको तरह-तरह के विज्ञापन आदि दिखाते हैं और ग्राहकों को आकर्षित करते हैं। ज़ाहिर सी बात है कि इन विज्ञापनों से इन वेबसाइट्स को मुनाफ़ा होता है। मिसाल के तौर पर अमेरिका में 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान मतदाताओं को प्रभावित करने की मंशा से सोशल मीडिया प्लेटफार्म फ़ेसबुक पर आरोप लगा था और उस पर हज़ारों करोड़ का जुर्माना लगाया था।



ऐसा नहीं है कि निजता के बचाव की मंशा से यह पहली बार हो रहा है। इससे पहले साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट के जज, न्यायमूर्ति ए पी शाह की अध्यक्षता में एक प्राइवेसी कमेटी बनी थी जिसने प्राइवेसी क़ानून बनाने की सिफ़ारिश भी की थी। लेकिन मामला ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। उसके बाद से अब तक कई बार इस मामले पर कमेटी बनीं और विधेयक भी प्रस्तावित किए गए। परंतु ‘डिजिटल पर्सनल डेटा’ की उचित सुरक्षा न हो पाने के कारण विपक्ष और जानकारों ने इसे क़ानून बनने नहीं दिया। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि यह बिल निजी डेटा की सुरक्षा के नाम पर, सरकार ने अपने पास मनमानी शक्तियाँ इकट्ठा कर ली हैं। इसके बाद इस विधेयक को संसद की संयुक्त समिति यानी ‘जेपीसी’ के पास भेजा गया। जेपीसी की रिपोर्ट में इस विधेयक को लेकर कई संशोधन और सुझाव दिये गये। सरकार ने इन सुझावों व संशोधनों के ना मानकर अगस्त 2022 में विधेयक को वापिस ले लिया।
 

इस सबके बाद इस सत्र में इस विधेयक को दोबारा पेश किया गया। परंतु इस बार भी सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि पिछले विधेयक के मुक़ाबले इस विधेयक में क्या बदलाव किये गये हैं। उल्लेखनीय है कि इस विधेयक में ‘जैसा कि निर्धारित किया जाएगा’ वाक्य को 26 बार प्रयोग किया गया है। विपक्ष के अनुसार इसका सीधा मतलब यह है कि काफ़ी कुछ अंधेरे में है और नियमों को बंद दरवाज़े से लाया जाएगा। विपक्ष का आरोप है कि यह बिल निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है और इससे सूचना का अधिकार (आरटीआई) क़ानून भी कमजोर होगा। जबकि सत्ता पक्ष की तरफ़ से लगातार इस बात पर जोर दिया गया कि बिल सिर्फ़ व्यक्तिगत डेटा को सुरक्षा देगा और आरटीआई पर इससे कोई असर नहीं पड़ेगा। देखना यह है कि क्या इस क़ानून का उल्लंघन करने वालों को कड़ी सज़ा या जुर्माना लगेगा या सरकार इस क़ानून का दुरुपयोग करेगी। यह तो आने वाला समय ही बताएगा की यह क़ानून बनने निजता की सुरक्षा को लेकर कितना खरा उतरता है?

बुधवार, 16 अगस्त 2023

देश के वीरों के सम्मान की अनूठी पहल


देश के शहीदों को हर कोई अपने-अपने ढंग से सम्मान देता है। कोई उनके नाम पर स्मारक बनाता है। कोई अपने शहर की सड़कों का नाम उनके नाम पर रखता है। कई स्कूलों में शहीदों के नाम पर सभागार या बनाए बनाए जाते हैं। परंतु आज जिस सम्मान के बारे में आपको बताऊँगा उसे जानकर आप भी प्रभावित होंगे। यह पहल की है दिल्ली एनसीआर के एक बाइकर्स समूह ने। जिन्हें आम तौर पर मौज मस्ती करने वाले दबंग युवाओं के रूप में जाना जाता है।  

   
शौक़ के चलते भारी भरकम मोटर साइकिलों को चलाने वाले युवकों के कई समूह देश भर में बने हुए हैं। ये समूह देश के एक कोने से दूसरे कोने तक अपनी मोटरसाइकिल पर सवार होकर अपने साहस भरे शौक़ को अंजाम देते हैं। परंतु 2016 में स्थापित हुए एक समूह ‘थोर’ यानी ‘द हार्मोनी ऑफ़ राइडर्स’ ने देश के वीरों के सम्मान में एक नई पहल की। इन सभी बाइक सवारों ने देश के वीरों और शहीदों के सम्मान में स्वतंत्रता दिवस के दिन दिल्ली छावनी के अस्पताल में रक्तदान किया। इसके बाद इसी ग्रुप ने हर वर्ष जुलाई में ‘कारगिल पराक्रम परेड’ की शुरुआत भी की। तब से अब तक यह समूह हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर या जुलाई में ‘कारगिल दिवस’ के मौक़े पर ‘कारगिल पराक्रम परेड’ का आयोजन करते हैं। हर वर्ष इनके ग्रुप के सदस्यों में बढ़त होती रहती है। 


विभिन्न कार्य क्षेत्रों से आने वाले ‘थोर' समूह के सभी सदस्य सामाजिक कार्यों के प्रति काफ़ी समर्पित रहते हैं। न केवल ‘थोर’ के राइडर्स बल्कि इनके परिवारों के सदस्य भी बढ़ चढ़ कर इनका सहयोग करते हैं। हर वर्ष होने वाली इस परेड में रक्त दान का कैम्प अवश्य लगता है जो दिल्ली एनसीआर के किसी न किसी संस्थान में आयोजित किया जाता है। फिर वो चाहे कोई स्कूल हो, कॉलेज हो या कोई बड़ा अस्पताल। देश के वीरों के सम्मान में होने वाले इस कार्यक्रम में समाज के नामी लोग भी हिस्सा लेते हैं। कार्यक्रम में देश के वीरों और शहीदों को सम्मानित किया जाता है और रंगारंग कार्यक्रम के साथ उन्हें श्रद्धांजलि भी दी जाती है। 


‘थोर’ के बाइकर्स ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम के लिए भी दिल्ली में चलाए जाने वाले ‘डू नॉट हॉंक’ अभियान में हिस्सा लेते हैं। इस अभियान के तहत दिल्ली की गाड़ियों पर एक स्टिकर लगाना शामिल है जिसमें सभी नागरिकों को बेवजह गाड़ी के हॉर्न बजाने पर रोक लगाने के लिए जागरूक किया जाता है। 


इसी तरह देश के जो वरिष्ठ नागरिक जो वृद्ध आश्रम में रहते हैं उनके साथ ‘थोर’ के सदस्य हर वर्ष अपने त्योहार मनाते हैं और ख़ुशियाँ साझा करते हैं। इसी तरह झुग्गियों में रहने वाले ग़रीब बच्चों को ज़रूरत का सामान बाँटना हो या किसी गाँव में योग व मैडिटेशन का कैम्प लगाना हो, ‘थोर’ कभी पीछे नहीं रहता। पाँच दोस्तों से शुरू होने वाले इस समूह में आज सौ से भी ज़्यादा सदस्य हैं। इनकी संख्या इन सदस्यों के परिवारों के जुड़ते ही कई गुना हो जाती है। इतना ही नहीं इनसे प्रेरणा लेकर दिल्ली एनसीआर के अन्य राइडर ग्रुप भी इनके कार्यक्रमों में जुड़ने को उत्सुक रहते हैं। देश भर में ‘थोर’ जैसे युवाओं के कई ग्रुप होने चाहिए जो देश के वीरों और देश के सामाजिक मुद्दों के प्रति समर्पित हों। ज़रूरी नहीं कि ये समूह बाइक राइडर्स के ही बनें बल्कि अन्य खेलों जैसे हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट आदि खेलने वाले युवाओं के भी ऐसे समूह बन सकते हैं। क्योंकि खिलाड़ियों के प्रति स्थानीय समुदायों का विशेष आकर्षण होता है। इसलिए जब ये खिलाड़ी कहल के अतिरिक्त सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहयोग करेंगे तो इनसे छोटी उम्र के बच्चों पर इनका अच्छा प्रभाव पड़ेगा। स्वामी विवेकानंद ने आध्यात्मिक प्रगति के साथ शारीरिक क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया था। बलिष्ठ और संस्कारवान युवा ही नये भारत का सृजन करेंगे।        

शुक्रवार, 11 अगस्त 2023

दिल्ली एम्स का कायाकल्प



देश भर में स्वास्थ्य सेवाओं की कमियों को लेकर हमेशा सवाल उठाए जाते हैं। सरकारें आती-जाती रहती हैं और वे दावा करती हैं कि देश में स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर बनाएँगी। पर अधिकतर राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल बेहाल है। स्वास्थ्य मंत्रालयों के पास इन सब के लिये बड़ा बजट भी होता है। परंतु इस दिशा में उस गति से कार्य नहीं होते जिस गति से होने चाहिये। ज़्यादातर पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। इसलिए देश भर से मरीज़ इलाज के लिए दिल्ली के एम्स का रुख़ करते हैं। इसी कारण यहाँ पर मरीज़ों की भीड़ लगी रहती है। परंतु आज जिस अनुभव को आपके साथ साझा कर रहा हूँ, वो आपको अच्छा लगेगा।



कुछ दिन पहले दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जाना हुआ। चूँकि मेरा नाता एम्स के साथ सन् 1991 से है इसलिए वहाँ के चप्पे-चप्पे से वाक़िफ़ हूँ। परंतु जैसे ही मुझे पता चला कि एम्स की न्यू राजकुमारी अमृत कौर ओपीडी में जाना है तो उत्सुकता जागी कि ये कब बनी? मेरे ज़हन में तो पुरानी ओपीडी की वही बिल्डिंग थी जहां मरीज़ और उनके तीमारदारों की लंबी-लंबी क़तारें होती हैं। लिफ्ट के बाहर भी ऐसा ही हाल होता था। ओपीडी में डॉक्टर के कमरों के बाहर घुटन भरे माहौल में जाने से जी घबराता था। यदि किसी को व्हील चेयर या स्ट्रेचर चाहिए तो वहाँ पर काफ़ी संघर्ष करना पड़ता था। उसके बाद भी सही से चलने वाली व्हील चेयर मिले तो आपकी क़िस्मत अच्छी है। निर्धारित समय पर यदि डॉक्टर अपने कक्ष में मिल जाएँ तो सोने पे सुहागा। यही हाल जाँच विभाग का भी था, मशीनें तो थी पर वो सही से चलें इसकी गारंटी नहीं। एमआरआई जैसी जाँचों के लिए आपका नंबर कब आएगा ये भगवान भी नहीं बता सकते। 



इन सब पुरानी यादों को दिमाग़ में रखते हुए, काफ़ी हिम्मत करके, कई वर्षों बाद एम्स गया। परंतु वहाँ का बदला हुआ स्वरूप देख कर ऐसा लगा ही नहीं कि ये वही एम्स है। मेन बिल्डिंग में घुसते ही जगह-जगह न्यू राजकुमारी अमृत कौर ओपीडी के दिशा निर्देशक बोर्ड लगे थे। जैसे ही हम अपने गंतव्य पर पहुँचे वहाँ पर भीड़ को नियंत्रित और निर्देशित करते हुए मेगामाइक से लैस गार्ड दिखाई दिये। ओपीडी की बिल्डिंग में साफ़ सुथरे निर्देशक बोर्ड लगे थे। व्हील चेयर इत्यादि के लिए अलग जगह थी, जहां पर अच्छी ख़ासी मात्रा में व्हील चेयर और स्ट्रेचर दिखाई दिये। लिफ्ट के पास भी भीड़ काफ़ी व्यवस्थित दिखाई दी। पूरी बिल्डिंग के वातानुकूलित होने के कारण किसी भी तरह की घुटन का एहसास नहीं हुआ। संबंधित विभाग की ओपीडी पर पहुँचते ही वहाँ पर इंतज़ार कर रहे मरीज़ों के बैठने की भी उचित व्यवस्था थी। डॉक्टर को सहयोग करते हुए गार्ड भी मरीज़ों से काफ़ी मधुरता से पेश आ रहे थे। डॉक्टर के कक्ष में भी काफ़ी साफ़ सफ़ाई दिखाई दी और आधुनिक मशीनें भी सुचारू रूप से चलती नज़र आईं। 



2020 में शुरू हुई इस न्यू राजकुमारी अमृत कौर ओपीडी में अभी कुछ ही डिपार्टमेंट ही चालू किए गये हैं। सायकायट्री, ऑर्थोपेडिक, मेडिसिन, जीरिएट्रिक मेडिसिन, स्किन, इंडोक्रोनोलॉजी, ईएनटी, मातृ एवं शिशु, सर्जरी, बर्न व प्लास्टिक  सर्जरी विभाग, आदि शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि इन नई बिल्डिंगों के खंडों की योजना 2010 में शुरू हुई थी। 2013 में एम्स के तत्कालीन निदेशक डॉ. (प्रो.) एम सी मिश्रा, के कार्यकाल में ये खंड बन कर तैयार हो गये थे। लंबे इंतजार के बाद जनता के लिए इसे 2020 में खोला गया। 570 कमरों वाले इस नए ओपीडी ब्लॉक में हर मंजिल पर करीब 500 लोगों के बैठने की सुविधा है। इस नई ओपीडी बिल्डिंग की खास बात यह है कि दिव्यांग मरीजों के लिए बेहतर व्यवस्था की गई है। स्वचालित सीढ़ियों से लिफ्ट पर ज़्यादा भार नहीं पड़ता और भीड़ नियंत्रण में भी काफ़ी सुविधा रहती है। इसी तरह एम्स के कैंपस में प्रवेश और निकासी की व्यवस्था भी काफ़ी सुचारु है। पार्किंग की कोई समस्या न हो इसलिए भूमिगत पार्किंग में भी कई तल बनाए गये हैं। 



कुल मिलाकर देखा जाए तो एम्स की न्यू राजकुमारी अमृत कौर ओपीडी में जा कर एक बेहद ही अच्छा अनुभव हुआ। देश के स्वास्थ्य मंत्रालय के पास अच्छा ख़ासा बजट है। यदि सही दिशा में और सही ढंग से इस बजट को इस्तेमाल किया जाए तो वो दिन दूर नहीं जब पूरे देश में दिल्ली के एम्स जैसे कई अस्पताल खुल जाएँगे। देश भर के दूर दराज़ इलाक़ों से आने वालों को इलाज के लिए दिल्ली न आ कर अपने नज़दीकी एम्स में ही जाना होगा। सरकार को भी चाहिए कि देश भर में अधिक से अधिक मात्रा में दिल्ली एम्स जैसे आधुनिक सुविधाओं वाले अस्पताल खोले जाएँ जहां मरीज़ों को कम ख़र्च में बेहतर से बेहतर इलाज मिले। ज़ाहिर सी बात है कि यदि जनता के कर का पैसा ईमानदारी और पारदर्शिता से जनता के विकास पर लगेगा तो हर चुनावों से पहले सरकार के पास भी जनता को बताने के लिए ठोस आँकड़े होंगे। चुनावी वादों को सुन-सुन कर थक चुकी जनता को सरकार पर विश्वास तभी होगा जब जनता के विकास के लिए ज़मीनी स्तर पर कुछ ठोस नज़र भी आएगा।   

शुक्रवार, 4 अगस्त 2023

मणिपुर: मुख्य न्यायाधीश और दोषियों को सज़ा?



मशहूर शायर शहाब जाफ़री का एक चर्चित शेर है, “तू इधर उधर की न बात कर ये बता कि क़ाफ़िला क्यों लुटा। मुझे रहज़नों से गिला नहीं तिरी रहबरी का सवाल है।” मणिपुर हिंसा को लेकर पिछले कुछ दिनों से देश की सर्वोच्च अदालत भी सरकार से कुछ ऐसे ही सवाल कर रही है। मणिपुर में हुई बर्बरता के चलते पूरा देश शर्मसार है। परंतु इस मामले पर जब भी कोई मणिपुर की सरकार या सत्तारूढ़ दल के नेताओं से सवाल पूछता है तो वे दूसरे राज्यों में हुई महिला अपराधों की घटनाओं या अन्य हिंसा के मामलों कि तुलना करते हैं। ऐसा करके वे असल मुद्दे से ध्यान भटकाने का काम कर रहे हैं। 



बीती 3 मई को मणिपुर में आरक्षण के मुद्दे को लेकर जो हिंसा भड़क उठी उसने अब तक 160 से ज्यादा लोगों की जान ली और सैंकड़ों लोगों को बेघर कर दिया है। बीते मंगलवार को जिस तरह देश के मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र सरकार के वकीलों को आड़े हाथों लिया उससे एक बात तो निश्चित है कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में ढिलाई बर्दाश्त नहीं करेगा। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ के अधिकतर सवालों का जवाब देश के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के पास नहीं था। दो दिन से सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार से जो-जो सवाल पूछे जा रहे थे उनका उत्तर या संबंधित आँकड़े मीडिया के माध्यम से सभी को पता हैं परंतु अफ़सोस की बात है कि सरकार के वकीलों के पास कोई जानकारी नहीं थी। 



बीते सोमवार को जब मुख्य न्यायधीश ने मणिपुर की हिंसा की तुलना देश के अन्य शहरों में होने वाली हिंसा से होती देखी तो वे इस बात पर बहुत आक्रोशित हुए। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने जो भी कहा उसे देश भर ने पढ़ा और सुना। न्यायाधीश ने कहा कि, “मणिपुर में जो हुआ उसे हम यह कहकर सही नहीं ठहरा सकते कि ऐसे मामले और प्रदेशों में भी हुए हैं। यह मामला ‘निर्भया’ जैसा नहीं है। वह भी भयानक था। लेकिन यहां यह एक अलग स्थिति है। यहां सांप्रदायिक और जातीय हिंसा प्रभावित क्षेत्र में ऐसी घटनाओं का एक पैटर्न है।” 


उल्लेखनीय है कि मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने इस बात पर ज़ोर देते हुए कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि जिस इलाक़े में यह बर्बरता हुई उस इलाक़े की पुलिस को इस वारदात की कोई जानकारी ही नहीं थी? कितनी ज़ीरो एफ़आईआर फाइल हुई? क्या इन ज़ीरो एफ़आईआरों को संबंधित पुलिस थानों में पहुँचाया गया? न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ को सरकार से इस बात का भी जवाब नहीं मिला कि मणिपुर में दर्ज हुई 6000 एफ़आईआर में किस अपराध पर कितनी एफ़आईआर दर्ज हुई हैं? हर बात पर सॉलिसिटर जनरल का जवाब था कि इसकी जानकारी प्राप्त करनी पड़ेगी। इन सभी जवाबों से तंग आकर ही मणिपुर के डीजीपी को तालाब किया गया। आने वाली 7 अगस्त को मणिपुर के डीजीपी को ना सिर्फ़ कोर्ट में मौजूद रहना होगा बल्कि सभी सवालों के जवाब भी साथ लाने होंगे और कोर्ट में पूछे जाने वाले सवालों का भी जवाब देना होगा।


तमाम टीवी डिबेट में सत्तापक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर लांछन लगाने पर तुले हैं। कोई भी इस समस्या की गहराई तक जाता नहीं दिखाई दे रहा। एनसीआरबी व बीपीआरडी की पूर्व महानिदेशक आईपीएस मीरा चड्ढा बोरवांकर का कहना है कि, इन सभी 6000 एफ़आईआर को यदि 10-10 कर पुलिस अधिकारियों के बीच बाँट दिया जाए तो इसके लिये न सिर्फ़ 600 जाँच अधिकारी चाहिए होंगे बल्कि 600 प्रासीक्यूटर भी चाहिए होंगे। बड़ी संख्या में टेक्निकल अधिकारी भी चाहिए होंगे जो इस बात की पुष्टि करेंगे कि मोबाइल की लोकेशन के आधार पर वहाँ कौन-कौन मौजूद था। मौक़े का पंचनामा करने के लिए कई जाँच टीमों की ज़रूरत होगी, जिनमें कई फॉरेंसिक अधिकारी भी शामिल होंगे, जो अपराध की कई बारीकियों की जाँच भी करेंगे। एफ़आईआर की इतनी बड़ी संख्या को झेलने के लिए बड़ी संख्या में स्पेशल अदालतों की भी आवश्यकता होगी, जो इन मामलों की सुनवाई मणिपुर के बाहर करेंगी। सोचने वाली बात यह है कि जो भी दल मणिपुर पर राजनीति कर रहे हैं क्या उनके पास इस बात का उत्तर है कि इतनी बड़ी संख्या में दर्ज हुई एफ़आईआर को सही मुक़ाम पर ले जाने के लिए क्या केंद्र सरकार या किसी राज्य सरकार के पास इतनी बड़ी फ़ोर्स है? अगर नहीं है तो प्रश्न उठता है कि इन एफ़आईआर पर निर्णय कब तक आएगा? दोषियों को सज़ा कब मिलेगी?


सत्ता और विपक्ष के सभी राजनैतिक दल केवल असली मुद्दों से ध्यान भटकाने और एक दूसरे पर लांछन लगाने का काम कर रहे हैं। कोई भी समस्या के हल की तरफ़ जाता नहीं दिखाई दे रहा। किसी भी दल ने ऐसी हिंसा करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा देने की बात नहीं की। ऐसी निर्मम घटनाओं को अंजाम देने वाले दोषियों को ऐसी सज़ा देनी चाहिए जिससे कि मिसाल क़ायम हो और भविष्य में कोई भी ऐसी वारदात को अंजाम देने से पहले कई बार सोचे।

 
ऐसी वारदातों पर इधर-उधर की बात करने से कोई हल नहीं निकलेगा केवल ये चर्चाएँ ही होती रहेंगी और दोषी खुले आम घूमते रहेंगे। इन्हें सजा देना एक बड़ी चुनौती होगी। ऐसे में अब देखना यह होगा कि देश की सर्वोच्च अदालत इस मामले में क्या रुख़ अपनाती है? कैसे इन सवालों का हल ढूँढती है? कैसे नाकारा मुख्य मंत्री और उनकी सरकार को उसकी हैसियत दिखाती है? सारे देश और दुनियाँ की निगाहें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर टिकी हैं।