बुधवार, 16 अगस्त 2023

देश के वीरों के सम्मान की अनूठी पहल


देश के शहीदों को हर कोई अपने-अपने ढंग से सम्मान देता है। कोई उनके नाम पर स्मारक बनाता है। कोई अपने शहर की सड़कों का नाम उनके नाम पर रखता है। कई स्कूलों में शहीदों के नाम पर सभागार या बनाए बनाए जाते हैं। परंतु आज जिस सम्मान के बारे में आपको बताऊँगा उसे जानकर आप भी प्रभावित होंगे। यह पहल की है दिल्ली एनसीआर के एक बाइकर्स समूह ने। जिन्हें आम तौर पर मौज मस्ती करने वाले दबंग युवाओं के रूप में जाना जाता है।  

   
शौक़ के चलते भारी भरकम मोटर साइकिलों को चलाने वाले युवकों के कई समूह देश भर में बने हुए हैं। ये समूह देश के एक कोने से दूसरे कोने तक अपनी मोटरसाइकिल पर सवार होकर अपने साहस भरे शौक़ को अंजाम देते हैं। परंतु 2016 में स्थापित हुए एक समूह ‘थोर’ यानी ‘द हार्मोनी ऑफ़ राइडर्स’ ने देश के वीरों के सम्मान में एक नई पहल की। इन सभी बाइक सवारों ने देश के वीरों और शहीदों के सम्मान में स्वतंत्रता दिवस के दिन दिल्ली छावनी के अस्पताल में रक्तदान किया। इसके बाद इसी ग्रुप ने हर वर्ष जुलाई में ‘कारगिल पराक्रम परेड’ की शुरुआत भी की। तब से अब तक यह समूह हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर या जुलाई में ‘कारगिल दिवस’ के मौक़े पर ‘कारगिल पराक्रम परेड’ का आयोजन करते हैं। हर वर्ष इनके ग्रुप के सदस्यों में बढ़त होती रहती है। 


विभिन्न कार्य क्षेत्रों से आने वाले ‘थोर' समूह के सभी सदस्य सामाजिक कार्यों के प्रति काफ़ी समर्पित रहते हैं। न केवल ‘थोर’ के राइडर्स बल्कि इनके परिवारों के सदस्य भी बढ़ चढ़ कर इनका सहयोग करते हैं। हर वर्ष होने वाली इस परेड में रक्त दान का कैम्प अवश्य लगता है जो दिल्ली एनसीआर के किसी न किसी संस्थान में आयोजित किया जाता है। फिर वो चाहे कोई स्कूल हो, कॉलेज हो या कोई बड़ा अस्पताल। देश के वीरों के सम्मान में होने वाले इस कार्यक्रम में समाज के नामी लोग भी हिस्सा लेते हैं। कार्यक्रम में देश के वीरों और शहीदों को सम्मानित किया जाता है और रंगारंग कार्यक्रम के साथ उन्हें श्रद्धांजलि भी दी जाती है। 


‘थोर’ के बाइकर्स ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम के लिए भी दिल्ली में चलाए जाने वाले ‘डू नॉट हॉंक’ अभियान में हिस्सा लेते हैं। इस अभियान के तहत दिल्ली की गाड़ियों पर एक स्टिकर लगाना शामिल है जिसमें सभी नागरिकों को बेवजह गाड़ी के हॉर्न बजाने पर रोक लगाने के लिए जागरूक किया जाता है। 


इसी तरह देश के जो वरिष्ठ नागरिक जो वृद्ध आश्रम में रहते हैं उनके साथ ‘थोर’ के सदस्य हर वर्ष अपने त्योहार मनाते हैं और ख़ुशियाँ साझा करते हैं। इसी तरह झुग्गियों में रहने वाले ग़रीब बच्चों को ज़रूरत का सामान बाँटना हो या किसी गाँव में योग व मैडिटेशन का कैम्प लगाना हो, ‘थोर’ कभी पीछे नहीं रहता। पाँच दोस्तों से शुरू होने वाले इस समूह में आज सौ से भी ज़्यादा सदस्य हैं। इनकी संख्या इन सदस्यों के परिवारों के जुड़ते ही कई गुना हो जाती है। इतना ही नहीं इनसे प्रेरणा लेकर दिल्ली एनसीआर के अन्य राइडर ग्रुप भी इनके कार्यक्रमों में जुड़ने को उत्सुक रहते हैं। देश भर में ‘थोर’ जैसे युवाओं के कई ग्रुप होने चाहिए जो देश के वीरों और देश के सामाजिक मुद्दों के प्रति समर्पित हों। ज़रूरी नहीं कि ये समूह बाइक राइडर्स के ही बनें बल्कि अन्य खेलों जैसे हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट आदि खेलने वाले युवाओं के भी ऐसे समूह बन सकते हैं। क्योंकि खिलाड़ियों के प्रति स्थानीय समुदायों का विशेष आकर्षण होता है। इसलिए जब ये खिलाड़ी कहल के अतिरिक्त सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहयोग करेंगे तो इनसे छोटी उम्र के बच्चों पर इनका अच्छा प्रभाव पड़ेगा। स्वामी विवेकानंद ने आध्यात्मिक प्रगति के साथ शारीरिक क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया था। बलिष्ठ और संस्कारवान युवा ही नये भारत का सृजन करेंगे।        

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