शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

देश के नेता कैसे हों?


अक्सर चुनावी व राजनैतिक सभाओं में आपने ऐसे नारे सुने होंगे ‘देश का नेता कैसा हो ..’, जहां नेता के समर्थक उनका नाम जोड़कर नारे को पूरा करते हैं। इसी उम्मीद से कि वो नेता अपने समर्थकों और जानता की सेवा के लिए ही कुर्सी सँभालेंगे। परंतु क्या ये नेता कुर्सी पर बैठते ही जानता की अपेक्षा पर खरे उतरते हैं? क्या ये नेता अपने परिवार और निजी जीवन की परवाह किए बिना जनसेवा करते हैं? यदि ऐसा नहीं करते तो ऐसे नारे लगाने वालों को वास्तव में सोचना होगा की ‘देश के नेता कैसे हों?’

राज्यों के चुनाव हों या दिल्ली की नगर निगम के चुनाव हों, सोशल मीडिया पर इन दिनों कई राजनैतिक दलों के नेताओं पर जनता का ग़ुस्सा फूटते देखा गया है। फिर वो चाहे प्रचार कर रहे इलाक़े के नेता हों, विधायक हों, पार्षद हों या दल के प्रवक्ता हों। इन पर हो रहे जनता के प्रहारों में वृद्धि हो रही है। जनता ही नहीं, राजनैतिक दलों के कार्यकर्ता ही अपने नेताओं की पिटाई करते दिखाई दे रहे हैं।


एक राज्य में चुनाव प्रचार पर निकले नेता का क्षेत्र की जनता ने जूतों के हार से स्वागत किया। इस स्वागत का कारण मतदाताओं को किए वो झूठे वादे थे जिन्हें नेता या उसके पदासीन दल ने पूरा नहीं किया। हर चुनाव से पूर्व जनता को वही पुराने वादों को नये लिबाज़ में पेश कर दिया जाता है। ज़ाहिर सी बात है जनता के सब्र का बांध टूटेगा ही।

पिछले दिनों दिल्ली नगर निगम के चुनावों के प्रचार के दौरान एक इलाक़े में टीवी डेबिट के बीच ही नेता जी व उनके पुत्र की दूसरे दल के समर्थकों द्वारा पिटाई का वीडियो भी सामने आया। इस पिटाई के पीछे भी जनता को गुमराह करना और उनके दल द्वारा किए गए झूठे वायदे ही था। एक दल के नेता के समर्थकों की दूसरे दल के नेता व समर्थकों के बीच ऐसी लड़ाई नई बात नहीं। परंतु ऐसा करने वाले नेता, चाहे किसी भी दल के हों, क्या नेता कहलाने के लायक़ हैं?


आजादी के बाद से अब तक हुए चुनावों में देश की जनता ने अपने शासक चुनने में अक्सर कोई गलती नहीं की। चुनावों के  जनता का जो सामूहिक फैसला निकलकर आया, उसमें अक्सर श्रेष्ठ उम्मीदवार ही विजेता बने। चुनाव नतीजों के जरिये जनता ने बताया है कि वह अपने शासक में कौन-से गुण देखना चाहती है। यदि कोई नेता जनता की उम्मीदों कि कसौटी पर खरा नहीं उतरता तो उसे अगले चुनाव में घर बिठा दिया जाता है। मतदाताओं ने नेता के गुणों और क्षमताओं पर ही उन्हें चुन कर जिताया, लेकिन सिर्फ तब तक जब तक उनमें उन गुणों और चुनावी वादों को पूरा करने की क्षमता थी।

राजनीति के महा ज्ञानी चाणक्य द्वारा अच्छे शासक के गुणों को परिभाषित किया है। यही वही गुण हैं जो नेता बनने से पहले, अच्छे इंसान और अच्छे नागरिक के रूप में दिखने चाहिए। आजकल के नेताओं को गांधी, नेहरू, शास्त्री, इंदिरा, वाजपेयी जैसा विनम्र और मृदुभाषी होना चाहिए। इतिहास गवाह है कि भारत की जनता ने बड़बोले और दंभी नेताओं के बजाय विनम्र और मृदुभाषी व्यक्तित्व को अपने नेता के रूप में पसंद किया है। जिन दलों और नेताओं में घमंड की झलक दिखाई दी, जनता ने उन्हें अपने वोट से वंचित करने में देर नहीं की।


देश की जनता नेताओं के व्यक्तित्व में नकारात्मकता को पसंद नहीं करती। वोटरों ने प्राय: ऐसे नेताओं को पसंद कर चुना है जो दूसरों की कमियों पर जोर देने की बजाय अपनी सकारात्मक राजनीति को आगे रखते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के भाषणों में आपको ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों के खिलाफ लंबी तकरीरें नहीं मिलेंगी। बापू जनता के सामने हमेशा बेहतर और सकारात्मक मुद्दे ही रखते थे। आज के माहौल में आप ऐसे नेता उँगलियों पर गिन सकते हैं।

किसी भी नेता को चुनने से पहले उसमें यह देखा जाता है कि वो विश्वास योग्य है या नहीं? व्यक्ति का यह वह प्राथमिक गुण है जो अगर न हो तो दूसरे सभी गुण बेकार हैं। नेता का व्यक्तित्व अगर विश्वास करने योग्य न हो, न तो उसकी विनम्रता प्रभावित करेगी और न ही निर्णय लेने की क्षमता।


योग्य नेता में सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए। सही समय पर अहम फैसले लेने से बचने और फ़ैसलों को टालने वाले नेताओं को जनता का समर्थन कभी नहीं मिला। यह गुण नेतृत्व क्षमता का पहला और अनिवार्य गुण माना जाता है। पुरानी पीढ़ी के सफल नेता, चाहे किसी भी दल के हों, अगर सालों तक जनता के प्रिय बने रहे तो इसी गुण के कारण।

चंद्रगुप्त मौर्य के महामंत्री चाणक्य ने राजा के शिक्षित होने पर अच्छा खासा जोर दिया। परंतु उस वक्त शिक्षा के पैमाने आजकल के शिक्षा के स्तर से काफ़ी अलग थे। आजादी के बाद भारतीय नेताओं की औपचारिक शिक्षा पर प्रायः ज़्यादा अहमियत नहीं दी गई। जनता ने नेताओं के शिक्षा के स्तर की कभी कोई विशेष मांग नहीं की। कुछ लोग मानते हैं कि सरकार चलाने की समझ किसी प्रकार की शिक्षा या डिग्री का मोहताज नहीं है। इसके बावजूद हमारे देश के कई ऐसे नेता, भले ही आजकल के दौर के हों या पहले के, उनकी शिक्षा का स्तर काफ़ी अच्छा रहा। ऐसे नेता भीड़ में अलग ही दिखाई देते हैं।

सामंती राज्य काल में राजा से यह उम्मीद नहीं होती थी कि वह जनता के बीच दिखाई दे। उस समय यदि राजा को जनता  के बीच जाना होता था तो ऐसा वो भेष बदलकर करता था। परंतु लोकतंत्र में ऐसा नहीं है। आजकल के शासकों का जनता के बीच दिखाई देना अनिवार्य है। परंतु कुछ नेताओं ने सुरक्षा के बहाने ख़ुद को जनता से अलग कर लिया है। वो केवल चुनावों के नज़दीक ही जनता के पास जाते हैं। अगर जनता उनसे खुश होती है तो जयकारे लगाती है वरना उन्हें जनता के ग़ुस्से का सामना करना पड़ता है।

शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

महिला अपराध और पुलिस जाँच


2012 के छावला बलात्कार और हत्या मामले के सभी आरोपियों को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गत 7 नवम्बर को रिहा कर दिया गया। हैरानी की बात है कि इस जघन्य अपराध में कोई दोषी नहीं पाया गया। कोर्ट ने अपने आदेश में जो कहा, उससे यही पता चलता है कि पुलिस की जांच और निचली अदालत की सुनवाई में कई जगह कमियाँ थीं। ज़ाहिर सी बात है कि इस फ़ैसले से न सिर्फ़ पीड़िता का परिवार बल्कि पूरा देश हैरान है। 
 
रेप और हत्या की जाँच कर रही पुलिस भी सवालों के घेरे में है। अगर बलात्कार और हत्या हुई है तो कोई न कोई दोषी तो होगा ही? अगर इन तीन आरोपियों को सुबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया है तो असली अपराधी कौन है? वो आज भी बेख़ौफ़ क्यों घूम रहा है? यदि ये तीनों बेक़सूर थे तो इतने सालों तक सलाख़ों के पीछे किस आधार पर थे? यदि पुलिस की प्राथमिक जाँच सही नहीं थी तो निचली अदालत ने इन तीन आरोपियों को किस आधार पर फाँसी की सज़ा सुनाई? निचली अदालत ने पुलिस जाँच में हुई ग़लतियों को नज़रअन्दाज़ क्यों किया? निचली अदालत के फ़ैसले पर हाई कोर्ट ने मुहर क्यों लगाई?
 

दस साल पहले हुए इस अपराध के जाँच अधिकारियों को इस चर्चित मामले में ‘मुस्तैदी’ से जाँच के आधार पर किसी न किसी तरह का इनाम ज़रूर मिला होगा। उन सभी अधिकारियों में से कुछ सेवानिवृत भी हो चुके होंगे। ऐसे में उनके ख़िलाफ़ क्या कार्यवाही की जाएगी? अभियोजन पक्ष की ओर से अदालतों में पेश हुए वकीलों के प्रति सरकार का क्या रवैया रहेगा? क्या उन ‘अनुभवी’ वकीलों के ख़िलाफ़ भी कोई कार्यवाही की जाएगी? ये सभी सवाल हमारी मौजूदा जाँच व्यवस्था को शक के दायरे में लाते हैं।
 
मामला दस साल पुराने छावला रेप और हत्या का हो। बिल्किस बानो का हो। प्रियदर्शनी मट्टू का हो। दहेज उत्पीड़न के कारण बेटियों की रहस्यमयिक मृत्यु का हो। महिलाओं के ख़िलाफ़ हुए इन अपराधों में पुलिस की प्राथमिक जाँच अपराध के जड़ तक पहुँचने की अहम कड़ी होती है। प्राथमिक जाँच ही अपराधी को उसके सही अंजाम तक पहुँचा सकती है। ज़रा सी कोताही केस को ग़लत दिशा में मोड़ सकती है। ये बात केवल महिला अपराधों पर लागू नहीं होती। परंतु प्रायः ऐसा देखा गया है कि पुलिस अधिकारी किन्ही कारणों से जब संगीन अपरोधों की जाँच को पूरी क्षमता से नहीं कर पाते तो उन्हें अदालत की लताड़ झेलनी पड़ती है। जाँच में कोताही के कारण ही असल अपराधी छूट जाते हैं। 
 

मेरठ की स्निग्धा मल्होत्रा की गत 23 अक्तूबर को मृत्यु हुई थी। मृत्यु का कारण स्निग्धा द्वारा मरी हुई बच्ची के कारण हुए इंफ़ेक्शन को बताया जा रहा है। स्निग्धा के परिवार वालों के द्वारा ससुराल पक्ष पर दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाया गया है। ससुराल वालों पर आरोप है कि स्निग्धा के गर्भ में पल रही सात महीने की बच्ची का गर्भपात कराया गया। स्निग्धा के मायके वालों की माँग पर मृत शिशु का पोस्टमार्टम करवाया गया। इस मामले ने तूल तब पकड़ा जब मेरठ निवासियों स्निग्धा को न्याय दिलाने के लिए प्रदर्शन किए। फ़िलहाल पुलिस इस मामले में जाँच कर रही है परंतु आरोपियों के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही नहीं हुई। शायद इस घटना के आरोपी भी रसूख़ वाले हैं। लेकिन कोई कितना भी रसूखदार क्यों न हों कानून के शासन का एक मूल सिद्धांत है, ‘कि आप कितने ऊंचे क्यों न हों कानून आपसे ऊपर है।’ इस मामले की जाँच कर रहे पुलिस अधिकारियों को इस बात को ध्यान में रखते हुए जाँच को सही दिशा में करना चाहिए। 
 

2018 में थॉमसन-रॉयटर्स फ़ाउंडेशन द्वारा एक सर्वे के मुताबिक़ भारत महिला अपरोधों के मामले में सबसे पहले स्थान पर आता है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार साल 2007 और 2016 के बीच महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा व अपराधों के मामलों में 83% की बढ़ोतरी हुई है। दुनिया भर में ऐसे कई देश हैं जहां महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों के लिये बहुत कड़ी सज़ाएँ हैं। मुस्लिम देशों में हाथ काटने से लेकर सिर कलम करने की सज़ा के  प्रावधान भी हैं। भारत के मुक़ाबले और देशों में महिला अपराध पर बहुत जल्द और कड़ी कार्यवाही होती है। हमारे देश के क़ानून कब और कितने सख़्त होंगे ये तो आने वाला समय ही बताएगा। परंतु ऐसे सर्वे में अगर देवियों को पूजने वाला भारत अव्वल नंबर पर आता है तो यह हमारे लिये शर्म की बात है।   
 
महिला सुरक्षा और विकास को लेकर सरकार द्वारा ‘बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ’ जैसे लुभावने नारे तो ज़रूर दिये जाते हैं परंतु ये कितने व्यावहारिक साबित होते हैं इसका पता तब चलता है जब मामले में पीड़ित को न्याय मिलता है या नहीं मिलता। दिल्ली के निर्भया कांड में जिस तरह देश भर में तूफ़ान मचा और फिर कड़े क़ानून बने उससे समाज में कुछ उम्मीद जागी थी। परंतु जिस तरह बिल्किस बानो या छावला रेप के आरोपियों को जाँच की कमियों के चलते छोड़ दिया गया उससे ऐसे नारों पर भी संदेह होता है। सरकार चाहे किसी भी दल की हो नारे केवल चुनाव के दौरान वोट बटोरने के लिए ही होते हैं। नारों को अमल में लाने के लिए सरकारी तंत्र को सही दिशा में चलना होगा और कड़े कदम भी उठाने होंगे। 


शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

समय के साथ बदलने की ज़रूरत


1961 में आई फ़िल्म ‘हम हिंदुस्तानी’ का मशहूर गाना, ‘छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी’, हमें समय के साथ बदलने की सलाह देता है। टाइपराइटर से कंप्यूटर तक के लंबे सफ़र में हम न जाने कितने बदल गये लेकिन कुछ पुरानी बातों और आदतों को बदलना शायद भूल गये। यदि इन आदतों को भी बदला जाए तो निश्चित ही हम समय के साथ चल सकेंगे।

दीपावली से पहले लखनऊ में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसे देख कर तथाकथित सभ्य लोगों के असंवेदनशील व्यवहार का पता चला। घटना लखनऊ के पत्रकारपुरम की है जहां एक महिला डॉक्टर ग़रीब कुम्हारों द्वारा लगाई गई दुकान में मिट्टी के दीयों और अन्य सजावट के सामान को बेरहमी से डंडे से तोड़ रही थी। इस बर्बरता का कारण सिर्फ़ इतना कि ये सभी दुकानें उस महिला के आलीशान घर के ठीक सामने लगी थीं। ऐसा नहीं है कि त्योहारों के समय ऐसी अस्थायी दुकानें या बाज़ार पहले उसी जगह नहीं लगते थे। तो उस दिन अचानक इस महिला के ग़ुस्से का बांध क्यों टूटा? तमाम सोशल मीडिया पर इस महिला डाक्टर की क्रूरता को देखा गया और लगभग सभी की संवेदनाएँ उन ग़रीब कुम्हारों के प्रति ही थीं जिनका नुक़सान हुआ।


सवाल उठता है कि जब बरसों से उस सड़क पर या देश के किसी अन्य शहर की सड़क पर त्योहारों के समय ऐसे बाज़ार और दुकानें लगते आए हैं तो उस दिन ऐसा क्यों हुआ? क्या उस मोहल्ले के लोग वहाँ से सामान नहीं ख़रीदते? क्या वहाँ के प्रशासन को इस बात का नहीं पता कि त्योहारों के समय सड़क पर ऐसे बाज़ार लगाए जाते हैं? सोचने वाली बात यह है कि जब सभी को पता है तो ऐसे बाज़ारों का विरोध क्यों? यदि ऐसे बाज़ार या हमारे मोहल्लों में लगने वाले साप्ताहिक बाज़ार ग़ैर क़ानूनी हैं तो इन्हें लगने क्यों दिया जाता है? यदि ऐसे बाज़ार प्रशासन द्वारा अनुमति प्रदान किए जाने के बाद ही लगते हैं तो इन्हें अनुमति देने वाले अधिकारी क्या इस बात पर ध्यान देते हैं कि इन बाज़ारों के लगने से वहाँ रहने वाले लोगों को किसी प्रकार की असुविधा तो नहीं होगी? फिर वो समस्या क़ानून व्यवस्था की हो या ट्रैफिक की।


अक्सर देखा गया है कि जब भी ऐसे बाज़ार लगते हैं, तो वहाँ रहने वाले लोग भले ही वहाँ जा कर सामान ज़रूर ख़रीदें लेकिन इन बाज़ारों का विरोध भी करते हैं। आमतौर पर साप्ताहिक बाज़ार हर उस इलाक़े में उस दिन लगते हैं जहां पर स्थानीय बाज़ारों की साप्ताहिक छुट्टी होती है। उसी हिसाब से उस बाज़ार का नाम भी पड़ता है, जैसे सोम-बाज़ार, बुध-बाज़ार या शनि-बाज़ार आदि। बरसों से हर शहर में ऐसे बाज़ार लगाने वाले दिन किसी न किसी नए मोहल्ले में निर्धारित स्थानों पर अपनी दुकान लगाते आए हैं। कई जगह तो ऐसे बाज़ार लोगों के घरों के बाहर लगा करते थे।


ग्रामीण इलाक़ों में लगने वाले ऐसे बाज़ारों को ‘हाट’ के नाम से जाना जाता है। जहां आस-पास के गाँव वाले अपने खेतों की सब्ज़ियाँ या अनाज और कुटीर उद्योग में बने सामान आदि बेचा करते हैं। इस बिक्री से मिले पैसों से वे लोग उसी हाट से कपड़े, अनाज और अपने घर की अन्य जरूरत का सामान खरीद कर अपने गांव की ओर लौट जाते हैं। ग्रामीण इलाक़ों में ऐसा सदियों से होता आ रहा है। ग्रामीण और शहरी इलाक़ों में लगने वाले बाज़ारों में बस इतना फ़र्क़ है कि ग्रामीण बाज़ार हमेशा किसी ख़ाली मैदान में लगते हैं और शहरी बाज़ार रिहायशी इलाक़ों में। ग्रामीण इलाक़ों में आज भी यह बाज़ार बिना किसी विरोध के लगते हैं। इन बाज़ारों के लगने से समस्या केवल शहरी इलाक़ों में ही है।


शहरों में आधुनिकरण के नाम पर जिस तरह ज़्यादातर सामान आपको घर बैठे ही उपलब्ध हो जाता है, इन बाज़ारों का औचित्य समाप्त होता जा रहा है। पर आम लोगों के लिये और पॉश इलाक़ों में काम करने वाले घरेलू सेवकों के लिये इनका आज भी खूब महत्व है। वहीं दो सालों तक कोविड जैसी महामारी ने तो लोगों के घर से निकालने पर पाबंदी ही लगा डाली थी। ऐसे में इन बाज़ारों का होना न होना बराबर हो गया था। परंतु हमारे बचपन में जब ये साप्ताहिक बाज़ार लगते थे तब शहरी इलाक़ों में आबादी भी कम थी और सड़क पर वाहन भी गिने चुने होते थे। इसलिए इन बाज़ारों से सभी को आराम था। लेकिन जैसे-जैसे आबादी बढ़ी वैसे ही वाहनों और मकानों की संख्या भी बढ़ी। इसके चलते इन बाज़ार लगाने वालों को भी समझौता करना पड़ा। बाज़ारों में दुकानें भी कम होने लगीं और ग्राहक भी।

विकास के नाम पर शहरों में प्रशासन द्वारा नई-नई कॉलोनीयाँ बसाई जाने लगी। वहाँ बड़े-बड़े टावर या आलीशान बंगले बनने लगे। जब तक इन कॉलोनीयों में बसावट नहीं थी तब तक इन बाज़ारों का फ़ायदा उस इलाक़े में रहने वाले पुराने लोगों को होने लगा। इसलिए किसी को भी इन से दिक़्क़त नहीं थी। ज्यों-ज्यों बसावट बढ़ी त्यों-त्यों वहाँ ऐसे लोग भी आए जिन्होंने इन बाज़ारों के ख़िलाफ़ प्रशासन में शिकायत भी की और कुछ तो कोर्ट में भी गए। लेकिन समस्या का कोई स्थाई समाधान नहीं निकल पाया। यदि दोनों पक्ष अपनी बात पर अड़े रहेंगे तो समझौता कैसे होगा? दोनों पक्षों को थोड़ा धैर्य रखने और व्यवहारिक समझ की आवश्यकता है।


इसके साथ ही प्रशासन को भी इस बात का हल निकालना चाहिए कि यदि ऐसे बाज़ारों से किसी को आपत्ति है तो इन बाज़ारों को किसी ऐसी जगह पर पुनः स्थापित किया जाए जहां सभी को सहूलियत हो। ऐसे बाज़ार इलाक़े के ख़ाली मैदानों में लगें या उन स्थानों पर जहां पुलिस विभाग को क़ानून और ट्रैफ़िक व्यवस्था बनाए रखने में भी आसानी हो। ऐसे बदलावों से ही इस समस्या का समाधान निकलेगा। यदि ऐसे बदलाव किए जाते हैं तो कभी भी किसी सभ्य व्यक्ति का ग़रीबों के प्रति ऐसा ग़ुस्सा नहीं फूटेगा जैसा लखनऊ में हुआ, जो कि काफ़ी निंदनीय है। समय के साथ हम सभी को बदलने की ज़रूरत है केवल एक तबके के लोगों को नहीं।



शुक्रवार, 4 नवंबर 2022

भारत में दवा उद्योग को भी दवा की ज़रूरत


मशहूर दवा कम्पनी रैनबैक्सी के व्हिसिल ब्लोअर और हेल्थ एक्टिविस्ट के नाम से जाने जाने वाले दिनेश ठाकुर की नई किताब ‘द ट्रूथ पिल’ इन दिनों काफ़ी चर्चा में है। इसके लेखक ने जब इस नामी दवा कम्पनी में हो रही गड़बड़ियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई तो इससे न सिर्फ़ भारत को बल्कि दुनिया भर के लोगों उनकी इस मुहिम से फ़ायदा हुआ। उनके हाल ही के अभियान से हमें यह पता चलता है कि देश में ‘ड्रग रेगुलेटर’ या दवा नियामक का कितना ख़स्ता हाल है। दवा उद्योग में ज़रूरी मानकों की कमी के कारण आम जनता को मिलावटी दवाओं का शिकार होना पड़ता है और अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है।  


दिनेश ठाकुर पेशे से डाक्टर नहीं हैं बल्कि एक केमिकल इंजीनियर हैं। भारत से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद उन्होंने अमरीका से स्नातकोत्तर की उपाधि भी हासिल की। 2003 में देश की सेवा की मंशा से उन्होंने मशहूर दवा कम्पनी रैनबैक्सी में काम करना शुरू किया। जैसे ही उनको इस कम्पनी में होने वाली गड़बड़ियों के बारे में पता चला तो उन्होंने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। चूँकि इस कम्पनी में बनी कई दवाएँ अमरीका समेत कई देशों में भेजी जाती हैं, इसलिए यह मामला अमरीकी कोर्ट में गया। आख़िरकार 2013 में रैनबैक्सी ने अपनी ग़लतियाँ मानी और अमरीका की कोर्ट ने रैनबैक्सी पर 500 मिल्यन डॉलर का जुर्माना लगाया। इस मुहिम का नतीजा यह हुआ कि विदेशों में एक्सपोर्ट होने वाली दवाओं की गुणवत्ता में काफ़ी सुधार आया। भारत से विदेशों में निर्यात की जाने वाली दवाओं की जाँच करने के लिए विशेषज्ञ विदेशों से आने लग गए। किसी भी लापरवाही के लिए जुर्माने की रक़म भी बढ़ाई गई। दिनेश ठाकुर द्वारा उठाई गई आवाज़ एक अच्छी पहल थी। इस पूरे मामले पर उन्होंने ‘बॉटल औफ़ लाइज़’ नाम से एक अन्य किताब भी लिखी है।


इस साल अक्तूबर के पहले सप्ताह में खबर आई कि हरियाणा की एक दवा कंपनी मेडेन फार्मास्यूटिकल्स द्वारा बनाए गए सर्दी-खांसी के सिरप पीने से पश्चिमी अफ्रीकी देश गांबिया में 66 बच्चों की मौत हुई है। यह भारत के लिए एक शर्मनाक बात है। इस घटना के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) ने चेतावनी जारी कर लोगों को आगाह किया है कि भारत में बनी खांसी की इन दवाओं का फिलहाल इस्तेमाल न किया जाए। ये चार सिरप हैं कोफ़ेक्समालिन बेबी कफ सिरप, मकॉफ़ बेबी कफ सिरप, प्रोमेथाज़िन ओरल सॉल्यूशन और मैग्रीप एन कोल्ड सिरप। इस हादसे के बाद दिल्ली में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन ने मामले की जांच के आदेश भी दिए। वहीं ऑल इंडिया आर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट ने एक बयान जारी कर कहा है कि संबंधित कंपनी के सिरप सिर्फ निर्यात होते हैं, भारत में इनकी बिक्री नहीं की जाती।

ठाकुर के अनुसार गांबिया का हादसा पहला हादसा नहीं है। इससे पहले जम्मू, मुंबई, चेन्नई और गुड़गाँव में ऐसे हादसे हो चुके हैं जहां खांसी के सिरप से बच्चों ने अपनी जान गवाई। 2019 के जम्मू के हादसे में 11 बच्चों की जान गई थी। इस हादसे में मरने वाले बच्चों को भी खांसी और सर्दी के लिए ऐसा ही एक सिरप दिया गया था। सिरप पीने के बाद इन बच्चों की हालत सुधारने के बजाए बिगड़ने लगी तो जम्मू के स्वास्थ्य केंद्र की समझ में भी कुछ नहीं आया। उन्हें जम्मू से चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल भेजा गया। वहाँ जाँच में पता चला कि जो सर्दी-खांसी का सिरप बच्चों को पिलाया गया है उसमें एक तिहाई हिस्सा एक ऐसे केमिकल का है जो किसी भी दवाई में इस्तेमाल नहीं होता। हिमाचल की दवा कम्पनी ‘डिजिटल विज़न’ द्वारा बनाए गए ‘कोल्डबेस्ट-पीसी’ कफ सिरप में एक ख़तरनाक केमिकल ‘डाई इथाइलीन ग्लाइकोल’ (डीईजी) की मिलावट हो रही थी। ग़ौरतलब है कि इस केमिकल का इस्तेमाल गाड़ियों के ‘ब्रेक आयल’ बनाने के लिए किया जाता है। इस कम्पनी द्वारा बनाए गए कफ सीरप बाज़ार में धड़ल्ले से बिक रहे थे।

बच्चों की दवाओं में कड़वाहट हटाने की दृष्टि से दवाओं में ऐसे केमिकल मिलने की अनुमति तो है। परंतु केमिकल मिलाने से पहले उस केमिकल की पूरी जाँच होना भी ज़रूरी है। 2019 के जम्मू के इस हादसे के बाद ठाकुर ने तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्ष वर्धन को एक पत्र लिख कर इस मामले के जाँच की माँग की। ठाकुर के अनुसार यदि ऐसे हादसे बार-बार हो रहे हैं तो हमारे देश की दवा बनाने वाली कम्पनियों की जाँच के तय माणकों में कहीं न कहीं गड़बड़ी हो रही है। अपनी लिखित याचिका में ठाकुर ने न सिर्फ़ इस सिरप की बिक्री पर रोक लगाने का आग्रह किया बल्कि बाज़ार से इस दवा व इससे मिलती जुलती दवा जिसमें डीईजी का इस्तेमाल हो रहा था उसे वापस मंगाने का भी आग्रह किया। परंतु हमारे देश में ऐसा क़ानून न होने के कारण दवा बाज़ार से वापिस नहीं मंगाई जा सकी। 8 महीने बाद उसी दवा कम्पनी द्वारा नाम बदल कर बनाए गए एक नए सिरप पीने से एक और बच्ची की जान चली गई।

मिलावटी दवाओं से मरीज़ों की जान जाना हमारे देश में पहली बार नहीं हुआ है। ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएँगे जहां मोटे मुनाफ़े के लिए दवा कम्पनियाँ दवाओं में मिलावट करती हैं। इन कम्पनियों को पता है कि हमारे देश में दवा बनाने से पहले दवा में मिलाने वाले केमिकल की जाँच के कौनसे मानक हैं और उनसे कैसे बचा जा सकता है। आज एक दवा पर रोक लगती है तो दवा कम्पनी नाम बदल कर दूसरी दवा बाज़ार में उतार देती है। ऐसा कब तक चलेगा?

दिनेश ठाकुर की किताब ‘द ट्रूथ पिल’ न सिर्फ़ दवा कम्पनियों के इस ख़ौफ़नाक सच को उजागर करती है। बल्कि दवा उद्योग पर सरकार द्वारा किस तरह कड़े नियम लगा कर जनता की ज़िंदगी से होने वाले खिलवाड़ से भी बचा जा सकता है। हमारे देश के हुक्मरान कब और क्या करेंगे यह तो आने वाला समय ही बताएगा।